<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>धर्म-अध्यात्म - Chhattisgarh Aaj Feed</title><link>https://chhattisgarhaaj.com</link><description>Chhattisgarh Aaj Feed Description</description><item><title> खत्म नहीं हो रहा घर का लड़ाई-झगड़ा, तो आजमाएं ये टिप्स</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2292</link><description>फेंगशुई को चीनी वास्तु शास्त्र भी कहा जाता है। इसमें भी वास्तु शास्त्र की तरह जीवन को सुखमय बनाने के नियम बताए गए हैं। अगर घर में पारिवारिक विवाद खत्म नहीं हो रहा है, तो आप इससे छुटकारा पाने के लिए कुछ फेंगशुई टिप्स अपना सकते हैं। मान्यता है कि अगर आप अपने घर में फेंगशुई के नियमों का ध्यान रखते हैं, तो इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। आज हम आपको घर से नेगेटिविटी दूर करने के कुछ फेंगशुई टिप्स बताने जा रहे हैं।
मुख्य द्वार का ख्याल
फेंगशुई में घर के मुख्य द्वार को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि मुख्य द्वार से ही घर में ऊर्जाएं प्रवेश होती है। अगर आप चाहते हैं कि घर में पॉजिटिव एनर्जी जाए, तो दरवाजे को हमेशा साफ रखें।
इन बातों का रखें ध्यान
इस बात का भी ध्यान रखें कि आपका मुख्य द्वार जर्जर हालात में नहीं होना चाहिए और न ही मेन गेट पर नेम प्लेट टूटी हुई होनी चाहिए। मुख्य द्वार पर फालतू का सामान रखने से भी बचना चाहिए। इससे आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है, जिससे लड़ाई-झगड़े की स्थिति में आपको लाभ देखने को मिल सकता है।
कछुए की मूर्ति
घर में बिना वजह के लड़ाई-झगड़ा होता है, तो आप फेंगशुई में बताए गए ये उपाय कर सकते हैं। आपको घर में कछुए की मूर्ति रखने से फायदा मिल सकता है। फेंगशुई के अनुसार, कछुए को सही स्थान और सही प्रकार रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है। पौराणिक ग्रंथों और हिंदू धर्म में कछुए को सुख-समृद्धि देने वाला माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, विष्णुजी ने स्वयं कच्छप अवतार लिया था। साथ ही, कछुए को शांत जीव माना जाता है।
फेंगशुई कछुआ रखने के नियम
मान्यता है कि उत्तर दिशा माता लक्ष्मी की होती है। ऐसे में कछुए को अपने घर में उत्तर दिशा में ही रखना चाहिए। मान्यता है कि उत्तर दिशा में कछुआ रखने से शत्रुओं का भी नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
कपूर के उपायों से लाभ
फेंगशुई के मुताबिक घर में कपूर जलाने से भी सकारात्मकता बढ़ती है। साथ ही घर में खुशबूदार चीजें जैसे मोमबत्तियां, फूलदान व क्रिस्टल बॉल आद भी रख सकते हैं, जिससे माहौल में शांति बनी रहती है।
कौन सा प्लांट लगाएं
इसके साथ ही फेंगशुई में माना गया है कि मनी प्लांट, जेड प्लांट और बैम्बू ट्री को घर में रखने से नकारात्मकता दूर होती है। फेंगशुई में माना गया है कि आपके घर में यदि घर में टपकता हुआ पानी, टूटी घड़ी, बर्तन, आइना, खराब पड़े जूते या फिर इलेक्ट्रॉनिक सामान आदि रखा हुआ है, तो इससे नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है। ऐसे में इन चीजों को या तो तुरंत ठीक करवा लेना चाहिए या फिर हटा देना चाहिए।
</description><guid>2292</guid><pubDate>15-Apr-2026 10:28:06 am</pubDate></item><item><title> झगड़े और नकारात्मक ऊर्जा से पाएं छुटकारा, घर से निकालें ये 4 चीज़ें</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2291</link><description>वास्तु शास्त्र की ही तरह फेंगशुई चीन की प्राचीन विद्या है, जो घर में ऊर्जा (Chi) के संतुलन को बनाए रखने पर जोर देती है.कहा जाता है कि हमारे घर में रखी हर एक चीज घर के माहौल और परिवार के मनोबल पर गहरा असर डालती है. अगर घर में अशांति, लड़ाई-झगड़ा या नकारात्मक ऊर्जा बढ़ रही है, तो इसका एक कारण गलत या खराब चीजें घर में रखना भी हो सकता है. इसलिए, फेंगशुई के अनुसार कुछ ऐसी चीजें हैं जिन्हें घर से हटाकर शांति, सकारात्मकता और सुख-समृद्धि लाई जा सकती है.
1. टूटी हुई घड़ी
टूटी हुई या बंद पड़ी घड़ी को घर में रखना शुभ नहीं माना जाता. फेंगशुई के अनुसार घड़ी समय और ऊर्जा का प्रतीक होती है. अगर यह बंद होती है, तो यह रुकावट, धीमी चाल और नकारात्मक ऊर्जा का संकेत देती है. इसलिए टूटी घड़ी को तुरंत घर से बाहर निकाल देना चाहिए.
2. टूटे हुए बर्तन
घर में फालतू या टूटा हुआ बर्तन रखना न केवल बेकार सामान जमा करने जैसा लगता है, बल्कि इससे परिवार के रिश्तों में तनाव और नकारात्मक सोच भी बढ़ सकती है. फेंगशुई में कहा गया है कि जैसे घर की व्यवस्था साफ और व्यवस्थित होती है, वैसे ही जीवन में सुख-शांति बनी रहती है.इसलिए पुराने बर्तन को घर से हटा दें.
3. टूटा हुआ शीशा / कांच
टूटा हुआ शीशा या कांच सबसे अशुभ माना जाता है. इसकी ऊर्जा में नेगेटिव वाइब्स और तनाव भी होता है. फेंगशुई के हिसाब से ऐसे टूटे शीशे या ग्लास को घर से बाहर निकाल देना चाहिए ताकि सकारात्मक ऊर्जा का मार्ग खुल सके.
4. टूटी हुई चप्पल / जूते
कई लोग टूटे हुए जूते या स्लीपर को घर में रख देते हैं, सोचते हैं कि शायद बाद में काम आ जाएं. लेकिन फेंगशुई के अनुसार ऐसे टूटे चप्पल घर की ऊर्जा को भारी बनाते हैं और मनमुटाव, चिंता और रिश्तों में खटास को बढ़ा सकते हैं.इन्हें तुरंत हटाना चाहिए.
क्यों यह काम करता है?
फेंगशुई विद्या के अनुसार, घर में अव्यवस्थित, टूटी-फूटी और पुरानी चीजें जमा होने से ऊर्जा का प्रवाह बाधित होता है. यह ऊर्जा घर के सदस्यों के मनोबल, रिश्तों और मानसिक स्थिति पर असर डालती है.जब आप इन चीजों को बाहर निकालते हैं, तो घर में पॉजिटिव एनर्जी का मार्ग खुलता है, जिससे तनाव, झगड़े और नकारात्मकता कम होती है और सुख-शांति बनी रहती है.
</description><guid>2291</guid><pubDate>15-Apr-2026 10:26:33 am</pubDate></item><item><title> हाथ के नाखूनों की बनावट खोलती है व्यक्ति के व्यक्तित्व से जुड़े कई राज</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2290</link><description>हस्त रेखा शास्त्र में हाथ की रेखाओं के अलावा नाखूनों का भी खास महत्व है। हाथ के नाखूनों की बनावट भी व्यक्ति के व्यक्तित्व व स्वभाव से जुड़े कई राज खोलते हैं। हर व्यक्ति के हाथ के नाखूनों की बनावट अलग-अलग होती है। कुछ लोगों के नाखून छोटे, किसी के लंबे या चौड़े होते हैं। जानें हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार हाथ के नाखूनों की बनावट से क्या संकेत मिलते हैं।
चौड़े नाखून
कहते हैं कि जिन लोगों के हाथ के नाखून चौड़े होते हैं वे बुद्धि के धनी होते हैं। ऐसे लोगों में सोचने व फैसला लेने की क्षमता अधिक होती है। ये अपने सभी कार्यों में सफलता पाते हैं।
गोलाकार नाखून
हस्त रेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों के नाखून गोलाकार होते हैं, वे व्यक्ति सशक्त विचारों वाले एवं तुरंत फैसला लेने वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति जो भी फैसला लेते हैं उन पर अमल करना भी जानते हैं।
चौकोर नाखून
हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, चौकोर नाखून वाले व्यक्ति स्वभाव से गंभीर माने जाते हैं। इन लोगों में लीड करने की क्षमता होती है। कहते हैं कि लोग राजनीति में सफल होते हैं।
लंबे नाखून
हस्त रेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों के लंबे नाखून होते हैं, वे रोमांस से भरपूर होते हैं। यह स्वभाव से भोले और विनम्र होते हैं। यह लोग आसानी से दूसरों पर भरोसा कर लेते हैं।
पूर्ण नाखून
हस्त रेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों के हाथ के नाखूनों चौड़ाई की अपेक्षा मामूली लंबे होते हैं और अपनी प्राकृतिक चमक लिए हुए होते हैं। ऐसे व्यक्ति उत्तम विचारों वाले और निरंतर आगे की ओर बढ़ते रहने की भावना रखने वाले होते हैं। ऐसे लोग सामाजिक मान-प्रतिष्ठा पाते हैं।
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</description><guid>2290</guid><pubDate>04-Apr-2026 10:28:52 am</pubDate></item><item><title> भाग्यशाली लोगों के हाथ में होती हैं ये रेखाएं</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2289</link><description>हिंदू धर्म में हस्तरेखा शास्त्र को हमेशा से खास महत्व दिया गया है। माना जाता है कि इंसान की हथेली में मौजूद रेखाएं उसके स्वभाव, भाग्य, करियर और धन योग तक का संकेत देती हैं। यही वजह है कि वर्षों से लोग अपनी हथेली की रेखाओं को देखकर भविष्य का आकलन करते आए हैं। खासकर वे रेखाएं, जो धन और भाग्य से जुड़ी होती हैं, उन्हें बेहद शुभ माना जाता है। आज हम समझेंगे कि किस प्रकार की रेखाएं यह बताती हैं कि व्यक्ति जीवन में कब और कैसे धनवान बन सकता है।
भाग्य रेखा क्या होती है?
हर व्यक्ति की भाग्य रेखा अलग होती है। किसी की सीधी, किसी की टूटी हुई, किसी की कटी-फटी तो किसी की पूरी तरह टेढ़ी-मेढ़ी। हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, वह रेखा जो कलाई के पास से शुरू होकर सीधे मध्यमा उंगली (सबसे लंबी उंगली) की तरफ जाती है, वही भाग्य रेखा कहलाती है। इस रेखा की मजबूती और गहराई यह बताती है कि व्यक्ति की किस्मत उसे कितनी दूर तक ले जाएगी और जीवन में कब अवसर मिलेंगे। अगर आपकी भाग्य रेगा सीधी और गहरी है तो यह अच्छे करियर और स्थिर सफलता का संकेत है। अगर टूटी या कटी हुई रेखा है तो ये जीवन में उतार-चढ़ाव और संघर्ष का संकेत है और अगर टेढ़ी-मेढ़ी रेखा है तो ये जीवन में अस्थिरता, लेकिन अचानक मिलने वाले अवसर का संकेत देती है।
धन रेखा कहाँ होती है?
हथेली में एक विशेष रेखा होती है जिसे धन रेखा कहा जाता है। जब आप अपनी हथेली को देखें, तो अनामिका ऊंगली यानी रिंग फिंगर के नीचे सूर्य पर्वत से निकलकर जो रेखा हृदय रेखा को पार करते हुए मस्तिष्क रेखा की ओर बढ़ती है, उसे धन रेखा माना जाता है।
ऐसी रेखा वाले लोग माने जाते हैं बेहद भाग्यशाली
हस्तरेखा शास्त्र में एक विशेष संयोजन को अत्यंत शुभ कहा गया है। अगर किसी व्यक्ति की रेखा कलाई के पास से शुरू होकर सीधे शनि पर्वत (मध्यमा उंगली के नीचे) तक जाती हो और फिर हल्का-सा मुड़कर गुरु पर्वत (तर्जनी उंगली के नीचे) की ओर पहुंच जाए, तो यह बहुत ही दुर्लभ और शुभ योग माना जाता है। ऐसे लोग बेहद भाग्यशाली होते हैं।
</description><guid>2289</guid><pubDate>04-Apr-2026 10:27:02 am</pubDate></item><item><title> सूर्य की राशि में लगेगा चंद्र ग्रहण, इन राशियों पर पड़ेगा प्रभाव</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2288</link><description> 3 मार्च 2026 का दिन ज्योतिष दृष्टि से बेहद खास है। इस तिथि पर साल का पहला चंद्र ग्रहण लग रहा है। यह ग्रहण दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। बड़ी बात यह है कि, यह भारत में नजर आएगा और इसका प्रभाव भी मान्य होगा। ज्योतिषियों के मुताबिक, यह चन्द्र ग्रहण सूर्य की राशि सिंह में लग रहा है। सिंह राशि में पहले से केतु हैं और इसलिए यहां चंद्रमा से उनकी युति हो रही है, जिससे ग्रहण योग भी बन रहा है। ऐसे में यह समय 12 राशियों के जीवन पर असर डाल सकता है। इस दौरान कुछ राशियों को शुभ परिणाम, तो कुछ जातकों के तनाव में वृद्धि हो सकती हैं। ऐसे में आइए चंद्र ग्रहण का सभी राशियों पर प्रभाव जानते हैं।
 मेष राशि
मेष राशि वालों के लिए समय थोड़ा सतर्क रहने वाला रहेगा।
आपको निवेश से लेकर यात्रा पर जाने तक विशेष सावधानियां रखनी होगी।
किसी भी कार्य में जल्दबाजी करना आपके तनाव को बढ़ा सकता है।
वृषभ राशि
आपको धन लाभ और नए घर की प्राप्ति के योग बन सकते हैं, क्योंकि समय लाभदायक साबित हो सकता है।
रुके हुए कार्य पूरे होंगे और आर्थिक स्थिति में सुधार देखने को मिल सकता है।
विवाह के योग है और परिवार का सहयोग भी मिलेगा।
मिथुन राशि
मिथुन राशि वालों को नई नौकरी की प्राप्ति होगी।
कार्यक्षेत्र में नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं।
किसी पर अधिक भरोसा करना आपके दुखों को बढ़ा सकता है।
व्यापार करने वालों के कार्यों का विस्तार संभव है।
कर्क राशि
कर्क राशि वालों को अलर्ट रहने की जरूरत रहेगी।
खासकर धन से जुड़े मामलों में सतर्क रहें।
इस समय भूलकर भी आप भावनाओं में आकर कोई बड़ा निर्णय लेने से बचें।
सिंह राशि
सिंह राशि वालों की परेशानियां बढ़ सकती हैं और उनके विरोधी सक्रिय रह सकते हैं।
सेहत का भी ध्यान रखना आवश्यक रहेगा।
आर्थिक लाभ भी संभव है परंतु खर्च भी अधिक रहेगा।
कन्या राशि
कन्या राशि के लिए समय खास रहेगा और मेहनत का मनचाहा फल प्राप्त होगा।
करियर में तरक्की के योग बन सकते हैं।
पारिवारिक समस्याओं के चलते परेशान होना पड़ सकता है।
तुला राशि
तुला राशि वालों को सफलता मिलने के संकेत हैं।
सेहत पहले से बेहतर होगी और लंबे समय से चल रही परेशानियां दूर हो सकती हैं।
समाज में आपका मान-सम्मान बढ़ेगा और स्वयं को भाग्यशाली महसूस करेंगे।
वृश्चिक राशि
वृश्चिक राशि वालों के लिए समय सामान्य रहेगा।
नियमित कार्यों पर ध्यान दें और विवादों से दूर रहें।
धन लाभ हो सकता है पर लेनदेन सावधानी से करें।
धनु राशि
धनु राशि वालों के जीवन में कुछ बदलाव आ सकते हैं।
शुरुआत में थोड़ा दबाव महसूस हो सकता है।
कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने का समय होगा।
मकर राशि
मकर राशि वालों को लाभ मिलने की संभावना है।
व्यापार और नौकरी दोनों में सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।
समय आपके लिए कई नई परेशानियां लेकर आ सकता है।
कुंभ राशि
कुंभ राशि वालों को भी लाभ के संकेत हैं।
नए अवसर मिल सकते हैं और आय के नए स्रोत बन सकते हैं।
लेकिन लव पार्टनर के साथ गलतफहमियां पनप सकती हैं।
मीन राशि
मीन राशि वालों को सावधानी रखने की आवश्यकता है।
सेहत और खर्चों पर विशेष ध्यान दें।
अचानक से कुछ एक बड़े खर्च आपके सामने आएंगे।
</description><guid>2288</guid><pubDate>02-Mar-2026 7:41:00 pm</pubDate></item><item><title>अष्टधातु का छल्ला पहनने के फायदे व नियम</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2287</link><description>अष्टधातु के छल्ले और अंगूठी का ज्योतिषशास्त्र में खास महत्व बताया गया है। यह आठ धातुओं सोना, तांबा, पीतल, चांदी, सीसा, लोहा, कांसा और जस्ता से मिलकर बना होता है। इन आठों धातुओं अलग-अलग महत्व होता है जो किसी न किसी ग्रह से संबंधित होता है। ऐसे में अष्टधातु के छल्ले को विधिपूर्वक और नियमों का ख्याल रखते हुए धारण करने से कुंडली में ग्रहों की स्थिति बेहतर होती है और उनके प्रतिकूल प्रभाव से भी राहत पाई जा सकती है। यह छल्ला जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। इसे धारण करने से धन संबंधी समस्याओं से भी मुक्ति मिल सकती है और फिजूलखर्ची दूर होने लगती है।
ऐसे में आइए विस्तार से जानें की इसे कैसे, कब, किसे और किस दिन पहनना चाहिए। साथ ही, अष्टधातु का छल्ला धारण करने के फायदे भी जानें...
अष्टधातु का छल्ला पहनने के नियम
  शास्त्रों के अनुसार अष्टधातु से निर्मित छल्ला या अंगूठी शनिवार और मंगलवार के दिन धारण करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा, इसे पूर्णिमा और शुक्ल पक्ष में शुभ मुहूर्त में धारण करना अत्यंत लाभदायक माना गया है। इससे जातक के जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं।
  अष्टधातु के छल्ले को अनामिका उंगली में पहनना सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अलावा, आप यह छल्ला तर्जनी उंगली में भी धारण कर सकते हैं, इसे गुरु की उंगली माना जाता है। इससे ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव से बचाव होता है।
  अष्टधातु का छल्ला धारण करने से पहले स्नानादि करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। फिर, पूजा-पाठ करके अपने कुल देवी-देवता, भाग्येश अथवा लग्नेश के मंत्रों का जाप करके छल्ला धारण करना चाहिए। इसे पूर्व दिशा की ओर मुख करके पहनना उत्तम माना जाता है।
  शनिवार या मंगलवार के दिन छल्ले को धारण करने से पहले इसे गंगाजल से शुद्ध भी अवश्य करना चाहिए और धूप अगरबत्ती दिखाकर अष्टधातु का छल्ला या अंगूठी धारण करें। इसे धारण करने वालों को तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए।
  मेष, वृश्चिक, धनु, मकर और कुंभ आदि राशि वालों को अष्टधातु का छल्ला अवश्य धारण करना चाहिए। ऐसा करने से बेहद शुभ फल की प्राप्ति होती है। वहीं, जिनकी कुंडली में राहु की स्थिति अशुभ हो वे भी इस छल्ले को पहन सकते हैं।
  अष्टधातु का छल्ला धारण करने से पहले ज्योतिषी को अपनी कुंडली जरूर दिखानी चाहिए। उनकी सलाह लेकर सही धातु धारण करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
अष्टधातु का छल्ला पहनने के फायदे
ज्योतिषशास्त्र में अष्टधातु के छल्ले को धारण करना बहुत शुभ माना जाता है। इससे कुंडली में ग्रहों के अशुभ प्रभावों को कम किया जा सकता है और उनकी स्थिति भी सही की जा सकती है। अगर आप करियर, नौकरी या कारोबार में समस्याओं और बाधाओं का सामना कर रहे हैं तो उससे भी यह निजात दिला सकता है। इससे जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और आर्थिक तंगी से छुटकारा मिल सकता है। साथ ही, फिजूलखर्ची कम होने लगती है। लेकिन अष्टधातु का छल्ला धारण करने से पहले नियमों का ध्यान जरूर रखना चाहिए। इससे जातक को जीवन में सुखों की प्राप्ति हो सकती है और सफलता के मार्ग खुलते हैं।</description><guid>2287</guid><pubDate>01-Jan-2026 2:32:25 pm</pubDate></item><item><title>   सुंदरता एवं वास्तुकला का अनूठा संगम  नौलखा मंदिर </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2286</link><description> -जानिये अपने मंदिरों को
नौलखा मंदिर' भारत में कई स्थानों पर हैं, जिनमें मुख्य रूप से बेगूसराय (बिहार) और देवघर (झारखंड) के मंदिर प्रसिद्ध हैं, जो अपनी अद्भुत वास्तुकला और धार्मिक महत्व के लिए जाने जाते हैं। बाबा वैद्यनाथ की नगरी में अपनी सुंदरता एवं वास्तुकला का अनूठा संगम नौलखा मंदिर देवघर शहर के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों में से एक है।
सभी ने नौलखा हार के बारे में सुना होगा, परंतु मंदिर का यह नाम कैसे पड़ा इसके पीछे एक रोचक इतिहास है। भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप को समर्पित यह मंदिर नौ-लाख रुपये की लागत से बना अतः यह जनमानस के बीच नौलखा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दक्षिण भारतीय मंदिरों जैसी शैली, ग्रेनाइट और संगमरमर से निर्मित इस मंदिर में विग्रह स्वरूप भगवान श्री कृष्ण बाल रूप में विराजमान हैं, साथ ही साथ संत बालानंद ब्रह्मचारी जी की एक मूर्ति भी स्थापित है। अतः मंदिर का वास्तविक नाम गुरु और गोविंद के स्वरूप को समर्पित जुगल मंदिर है।
नौलखा मंदिर की ऊंचाई 146 फीट है। मंदिर झारखंड के देवघर शहर से सिर्फ 2 किमी दूर स्थित है तथा अपनी स्थापत्य कला की सुंदरता के लिए भक्तों एवं पर्यटकों दोनों के ही बीच अत्यधिक प्रसिद्ध है। मंदिर की वास्तुकला कोलकाता में बेलूर मठ अर्थात रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय से प्रेरित जान पड़ती है।
प्रचलित नाम: जुगल मंदिर, नौलखा मंदिर देवघर, नौलक्खा मंदिर
दर्शन समय
7.00 AM - 12.00 PM, 2.00 PM - 7:30 PM
नौलखा मंदिर देवघर का इतिहास
पथूरिया घाट की रानी श्रीमती चरुशिला ने अपने पति अक्षय घोष और बेटे जतिंद्र घोष को कम उम्र में ही खो दिया था। मौत की इन घटनाओं ने रानी को अत्यधिक दुखी कर दिया। शांति की तलाश में रानी ने अपना घर छोड़ दिया और संत श्री बालानंद ब्रह्मचारी से मुलाकात के लिए देवघर पहुँची और बालानंद ब्रह्मचारी के आश्रम में रहीं। उनकी शिक्षा और उपदेशों से प्रभावित होकर चरुशिला जी महाराज जी की शिष्या बन गईं। श्री बालानंद ब्रह्मचारी जी ने उन्हें भगवान श्री कृष्ण का एक मंदिर बनाने की प्रेरणा दी। मंदिर के निर्माण के लिए रानी चरुशिला ने 9 लाख रुपये का अभूतपूर्व दान दिया। 1941 के लगभग 9 लाख रुपये अपने में ही एक बहुत बड़ी राशि हुआ करती थी।

1. बेगूसराय का नौलखा मंदिर (बिहार)
स्थान: बिशनपुर, बेगूसराय.
निर्माण: 1953 में संत महावीर दास द्वारा.
खासियत: राजस्थानी वास्तुकला का प्रभाव, सफेद संगमरमर की मूर्तियां, सुंदर नक्काशी, और शहर का विहंगम दृश्य.
2. अन्य नौलखा मंदिर
बक्सर (बिहार): दक्षिण भारतीय शैली और सुंदर मूर्तियों वाला एक और धार्मिक स्थल.
गुजरात (घुमली): 12वीं सदी का सूर्य मंदिर.

</description><guid>2286</guid><pubDate>30-Dec-2025 7:36:28 am</pubDate></item><item><title> नए साल 2026 में लकी नंबर</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2285</link><description>मूलांक 1  सूर्य का वर्ष
मूलांक 1 वाले 2026 में लीडरशिप और तरक्की के राजा बनेंगे। लकी नंबर 1, 3, 5 आपके लिए धन और सम्मान लाएंगे। शादी या रिलेशनशिप में मूलांक 2, 4 और 7 सबसे परफेक्ट हैं। ये जोड़ी आपको सपोर्ट करेगी और जीवन में बैलेंस लाएगी। मूलांक 1 की जोड़ी में हमेशा रोमांस और तरक्की बनी रहती है।
मूलांक 2  चंद्रमा की कृपा
मूलांक 2 वाले 2026 में भावनात्मक स्थिरता और पारिवारिक सुख पाएंगे। लकी नंबर 2, 4, 6 आपके लिए शांति और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 1, 4 और 6 सबसे अच्छे हैं। ये जोड़ी आपको समझेगी और जीवन में मिठास घोलेगी। मूलांक 2 की जोड़ी में प्यार गहरा और लंबा चलता है।
मूलांक 3  गुरु की कृपा
मूलांक 3 वाले 2026 में क्रिएटिविटी और प्रसिद्धि पाएंगे। लकी नंबर 3, 6, 9 आपके लिए धन और ज्ञान लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 3, 6 और 9 सबसे परफेक्ट हैं। ये जोड़ी आपको सपोर्ट करेगी और जीवन में रंग भरेगी। मूलांक 3 की जोड़ी में हमेशा खुशी और उत्साह रहता है।
मूलांक 4  राहु का प्रभाव
मूलांक 4 वाले 2026 में मेहनत का फल पाएंगे। लकी नंबर 4, 5, 8 आपके लिए स्थिरता और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 1, 2 और 7 सबसे अच्छे हैं। ये जोड़ी आपको सपोर्ट करेगी और जीवन में बैलेंस लाएगी। मूलांक 4 की जोड़ी में विश्वास और मजबूती रहती है।
मूलांक 5  बुध की कृपा
मूलांक 5 वाले 2026 में ट्रैवल और एडवेंचर पाएंगे। लकी नंबर 5, 1, 6 आपके लिए मौके और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 3, 5, 6 और 8 सबसे परफेक्ट हैं। ये जोड़ी आपको एक्साइटमेंट और सपोर्ट देगी। मूलांक 5 की जोड़ी में कभी बोरियत नहीं आती है।
मूलांक 6  शुक्र का प्रभाव
मूलांक 6 वाले 2026 में लव और लग्जरी पाएंगे। लकी नंबर 6, 3, 9 आपके लिए सुख और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 3, 6 और 8 सबसे अच्छे हैं। ये जोड़ी आपको प्यार और लग्जरी देगी। मूलांक 6 की जोड़ी में हमेशा रोमांस और सुख रहता है।
मूलांक 7  केतु का प्रभाव
मूलांक 7 वाले 2026 में आध्यात्म और ज्ञान पाएंगे। लकी नंबर 7, 2, 5 आपके लिए शांति और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 1 और 4 सबसे परफेक्ट हैं। ये जोड़ी आपको गहराई और समझ देगी। मूलांक 7 की जोड़ी में आत्मिक जुड़ाव रहता है।
मूलांक 8  शनि की कृपा
मूलांक 8 वाले 2026 में मेहनत का बड़ा फल पाएंगे। लकी नंबर 8, 4, 5 आपके लिए शक्ति और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 1, 3, 5 और 6 सबसे अच्छे हैं। ये जोड़ी आपको सपोर्ट और ताकत देगी। मूलांक 8 की जोड़ी में मजबूती और समृद्धि रहती है।
मूलांक 9
मूलांक 9 वाले 2026 में दान और सेवा से प्रसिद्धि पाएंगे। लकी नंबर 9, 3, 6 आपके लिए सम्मान और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 3 (क्रिएटिव), 6 (रोमांटिक) और 9 (धार्मिक) सबसे परफेक्ट हैं। ये जोड़ी आपको ऊर्जा और प्रेम देगी। मूलांक 9 की जोड़ी में हमेशा सेवा और सुख रहता है। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों के पूर्णतया सत्य एवं सटीक होने का हम दावा नहीं करते हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
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</description><guid>2285</guid><pubDate>21-Dec-2025 10:30:00 am</pubDate></item><item><title> पुरुषों का कान छिदवाना और बाली पहनना शुभ होता है या अशुभ</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2284</link><description>हिंदू ज्योतिष और धार्मिक परंपराओं में पुरुषों का कान छिदवाना और बाली पहनना मुख्य रूप से शुभ माना जाता है। कर्णवेध संस्कार हिंदू धर्म के षोडश संस्कारों में से एक है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कान छिदवाने से राहु-केतु के दुष्प्रभाव कम होते हैं, बुद्धि बढ़ती है और स्वास्थ्य लाभ मिलता है। हालांकि, कुछ मान्यताओं में एक कान छिदवाना या गलत धातु की बाली पहनना अशुभ हो सकता है। आधुनिक समय में यह फैशन भी है, लेकिन शास्त्रों में इसका गहरा महत्व है।
कर्णवेध संस्कार का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व
हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में कर्णवेध नवम संस्कार है। पुरुषों के लिए यह बहुत शुभ है। ज्योतिष के अनुसार, कान केतु ग्रह से जुड़े हैं। कान छिदवाने से केतु और राहु के बुरे प्रभाव कम होते हैं। इससे व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है और बुद्धि तेज होती है। प्राचीन काल में राजा-महाराजा और योद्धा कान छिदवाते थे, जो साहस और शक्ति का प्रतीक था। भगवान शिव और विष्णु से जुड़े होने से यह सम्मान और भक्ति का संकेत है।
पुरुषों के लिए बाली पहनने के ज्योतिषीय लाभ
ज्योतिष शास्त्र में सोने या चांदी की बाली पहनना पुरुषों के लिए शुभ है। सोना सूर्य और गुरु से जुड़ा है, जो आत्मविश्वास और निर्णय शक्ति बढ़ाता है। इससे मानसिक तनाव कम होता है और नकारात्मक विचार दूर रहते हैं। राहु-केतु के दोष में बाली पहनने से लाभ मिलता है। आयुर्वेद के अनुसार, कान में एक्यूप्रेशर पॉइंट्स होते हैं, जो बाली पहनने से रक्त संचार बेहतर होता है, सुनने की क्षमता बढ़ती है और सिरदर्द जैसी समस्याएं कम होती हैं। सेलिब्रिटी जैसे विराट कोहली और रणबीर कपूर भी बाली पहनते हैं, जो फैशन के साथ ज्योतिषीय लाभ लेते हैं।
क्या अशुभ हो सकता है?
कुछ स्थितियों में कान छिदवाना या बाली पहनना अशुभ हो सकता है:
  केवल एक कान छिदवाना (खासकर बायां पहले) कुछ मान्यताओं में अशुभ है।
  लोहे या निकल की बाली पहनना - इससे शनि या राहु का प्रभाव बढ़ सकता है।
  अशुभ मुहूर्त में छिदवाना - शनिवार-रविवार से बचें।
  अगर कुंडली में मंगल या शनि मजबूत नहीं तो पहले ज्योतिषी से सलाह लें।
  गलत धातु या तरीके से करने पर स्वास्थ्य समस्या या मानसिक अशांति हो सकती है।
सही तरीका और उपाय--
पुरुषों के लिए दोनों कान छिदवाना और सोने की बाली पहनना सबसे शुभ है। शुभ मुहूर्त में (सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार) करवाएं। बाली में सोना या चांदी चुनें। अगर फैशन के लिए कर रहे हैं, तो भी ज्योतिषीय लाभ मिलेगा। स्वास्थ्य और भाग्य के लिए यह परंपरा अपनाएं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पुरुषों का कान छिदवाना और बाली पहनना शुभ है। यह स्वास्थ्य, बुद्धि और ग्रह दोष निवारण के लिए लाभदायक है।
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</description><guid>2284</guid><pubDate>21-Dec-2025 10:27:46 am</pubDate></item><item><title> रविवार के दिन बाल कटवाने से कमजोर होता है ये ग्रह</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2283</link><description>नहीं करने चाहिए ये काम
ज्योतिष शास्त्र में हफ्ते के हर एक दिन के महत्व को बताया गया है। हिंदू धर्म में सोमवार से लेकर रविवार को किसी ना किसी वजह के चलते महत्वपूर्ण माना गया है। बात की जाए रविवार की तो इसका संबंध सूर्य ग्रह से होता है। सारे ग्रहों में सूर्य सबसे बड़ा होता है और इसका प्रभाव भी काफी पड़ता है। ऐसे में रविवार के दिन ऐसी चीजें करने से बचना चाहिए जिससे ये ग्रह कमजोर हो। नीचे विस्तार से जानें कि रविवार के दिन कौन सी चीजें करने से बचना चाहिए।
ना कटवाएं अपने बाल
आम तौर पर लोग ग्रूमिंग से जुड़ी चीजों को छुट्टी वाले दिन करवाना पसंद करते हैं। इत्मीनान की वजह से लोग रविवार को ही हेयरकट और सेविंग करवाते हैं लेकिन शास्त्र के हिसाब से ये गलत है। रविवार के दिन बाल कटवाने से बचना चाहिए। अगर ऐसा किया जाता है तो धीरे-धीरे सूर्य ग्रह कमजोर होने लगता है। सूर्य के कमजोर होते ही सबसे बुरा प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। जिन लोगों का सूर्य कमजोर होने लगता है, उन्हें स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें होने लगती हैं।
अवॉइड करें इस रंग के कपड़ें
हर एक दिन किसी ना किसी ग्रह से प्रभावित हैं। हर एक ग्रह का संबंध किसी ना किसी रंग के साथ जरूर होता है। ऐसे में किसी दिन विशेष के हिसाब से कुछ रंगों को अवॉइड करना भी जरूरी होता है। बात करें रविवार की तो इस दिन काले और नीले रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए। सूर्य की कृपा पाने के लिए रविवार को 4 रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन लाल, पीला, नारंगी और सुनहरे रंग के कपड़े पहनना अच्छा होता है। इन रंगों का सीधा संबंध सूर्य के साथ ही होता है।
ना करें इन चीजों का सेवन
रविवार के दिन मास-मदिरा और लहसुन-प्याज जैसी तामसिक चीजों को खाना अवाइड करना चाहिए। साथ ही इस दिन खट्टी चीजों के सेवन से बचना चाहिए। इसके अलावा रविवार को नींबू, इमली और आचार जैसी चीजों का सेवन भी नहीं करना चाहिए। कई लोग इस दिन काली उदड़ दाल भी नहीं खाते हैं।
</description><guid>2283</guid><pubDate>14-Dec-2025 10:04:43 am</pubDate></item><item><title> वास्तुशास्त्र के अनुसार हर घर में होनी चाहिए ये चीजें</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2282</link><description>वास्तुशास्त्र केवल दिशा-निर्देश नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन, खुशहाली और स्थिरता लाने का एक प्राचीन तरीका है। माना जाता है कि घर में कुछ चीजें रखने से ऊर्जा का प्रवाह बेहतर होता है, रिश्तों में मधुरता आती है और आर्थिक स्थिरता भी बढ़ती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार हर घर में कुछ खास चीजें अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि यह न सिर्फ वातावरण को पवित्र बनाती हैं बल्कि परिवार के लोगों के मन पर भी अच्छा प्रभाव डालती हैं।
तुलसी का पौधा- तुलसी घर में पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा लाती है। इसे पूर्व या उत्तर दिशा में लगाए तो सबसे अच्छा होता है। तुलसी नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखती है और घर के वातावरण को शांत करती है।
पानी से भरा कलश- घर के मंदिर या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में तांबे या पीतल का जल-कलश रखना शुभ माना जाता है। यह शुद्धता, शांति और स्थिरता का प्रतीक है। कहा जाता है कि इससे घर में मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ती है।
शंख- शंख घर में सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। पूजा के समय शंख बजाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। घर में शंख रखा होना भी शुभ माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि इससे बुरी शक्तियां प्रवेश नहीं करतीं।
स्वास्तिक या ऊॅं का चिन्ह- मुख्य दरवाजे के पास स्वास्तिक, ऊॅं, शुभ-लाभ जैसे प्रतीक ऊर्जा को स्थिर रखते हैं। इन्हें लगाने से घर में समृद्धि आती है और बुरी नजर से सुरक्षा मिलती है।
पीतल या तांबे की घंटी- घर में पीतल या तांबे की घंटी रखें। घंटी की ध्वनि घर से नकारात्मक ऊर्जा हटाती है। पूजा के समय पीतल या तांबे की छोटी घंटी बजाने से वातावरण पवित्र होता है और मन में शांति आती है। घर में इसे मंदिर के पास रखना शुभ माना जाता है।
</description><guid>2282</guid><pubDate>23-Nov-2025 9:22:34 pm</pubDate></item><item><title> तुलसी के पास भूल से भी ना लगाएं ये पौधे</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2281</link><description>हिंदू धर्म में तुलसी का पौधा बहुत ही पवित्र माना जाता है. इन्हें सिर्फ मां लक्ष्मी का प्रतीक ही नहीं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक माना जाता है. हर घर के आंगन में माता तुलसी विराजमान होती है और जहां तुलसी होंगी वहीं श्रीहरि भी विराजमान होंगे. इनके बिना किसी भी धार्मिक कार्य को अधूरा समझा जाता है.
वास्तु शास्त्र के अनुसार, हर सुबह-शाम तुलसी के सामने दीपक जलाना, जल चढ़ाना और इनकी परिक्रमा करना शुभ फल देता है. लेकिन बहुत से लोग गलती से माता तुलसी के पास ऐसे पौधे लगा देते हैं जो उनकी पवित्रता को कम कर देते हैं. वास्तुशास्त्र के अनुसार, ये पौधे तुलसी की ऊर्जा को कमजोर कर देते हैं, जिससे घर में अशुभ प्रभाव बढ़ता है. तो आइए जानते हैं उन पौधों के बारे में जिनको तुलसी के पास नहीं लगाना चाहिए.
1. कैक्टस
कैक्टस भले ही देखने में सुंदर लगे, लेकिन वास्तु शास्त्र के अनुसार इसके कांटे अशुभता और नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माने जाते हैं. तुलसी जहां शांति और सुख की ऊर्जा फैलाती है, वहीं कैक्टस के कांटे कलह, क्रोध और मतभेद बढ़ाने का कारण बनते हैं. साथ ही, इसको तुलसी के पास लगाने से परिवार में लड़ाई-झगड़े जैसी स्थिति भी उत्पन्न होने लगती है.
2. मनी प्लांट
वास्तु शास्त्र के अनुसार, वैसे तो मनी प्लांट को बहुत ही शुभ माना जाता है. लेकिन तुलसी के पास इसे रखना शुभ नहीं होता है. इन दोनों के स्वभाव में विरोध होने के कारण, दोनों साथ उगने पर एक-दूसरे की वृद्धि रोकते हैं.
3. अपराजिता
अपराजिता का पौधा बहुत ही शुभ और देवी की आराधना में उपयोगी माना जाता है, लेकिन इसे तुलसी के पास लगाना वर्जित है. दरअसल, तुलसी के पास अपराजिता लगाने से दोनों की ग्रोथ प्रभावित होती है और तुलसी का पौधा धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है.
4. धतूरा
धतूरा भगवान शिव को अर्पित किया जाता है, लेकिन तुलसी के पास इसे रखना बहुत बड़ा दोष माना गया है. धतूरा विषैला पौधा है और उसकी तीव्र तासीर तुलसी की कोमल ऊर्जा को नष्ट कर देती है. तुलसी का पौधा जहां शुद्धता और सात्त्विकता का प्रतीक है.
5. नींबू का पौधा
नींबू के पौधे में बहुत ही सारी औषधीय गुण पाए जाते हैं. लेकिन, वास्तु शास्त्र के अनुसार तुलसी के पास नींबू का पौधा नहीं लगाना चाहिए. कहते हैं कि ऐसा करने से घर की समृद्धि में रुकावट आ जाती है और आर्थिक कार्यों में बाधाएं आने लगती हैं.
</description><guid>2281</guid><pubDate>16-Nov-2025 9:31:23 pm</pubDate></item><item><title> तुलसी विवाह के दिन करें तुलसी माता का श्रृंगार, घर में आएगी खुशहाली</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2280</link><description>कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को तुलसी विवाह कराया जाता है. इस तिथि को देवोत्थान एकादशी, देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं. इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है, जिनमें भगवान विष्णु विश्राम अवस्था में रहते हैं. जब वे इस दिन पुनः जागृत होते हैं, तो समस्त सृष्टि में शुभ कार्यों का प्रारंभ होता है. इसी दिन तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है, जो धार्मिक रूप से अत्यंत शुभ माना गया है. तुलसी विवाह के दिन माता तुलसी का विशेष प्रकार से श्रृंगार किया जाता है. जानते हैं कि तुलसी विवाह के दिन माता तुलसी का श्रृंगार कैसे करें ताकि उनका आशीर्वाद प्राप्त हो सके.
तुलसी विवाह की तैयारी और पूजन विधि
सबसे पहले घर या आंगन में जहां तुलसी का पौधा स्थापित है, उस स्थान की सफाई करें, उसके बाद गंगाजल या पवित्र जल का छिड़काव करें. तुलसी माता को नए वस्त्र पहनाएं, पास में एक सुंदर आसन पर शालिग्राम भगवान को स्थापित करें, उन्हें पीले वस्त्र पहनाएं, चंदन, फूल और तुलसी दल अर्पित करें. इस दौरान मंगल गीत, विवाह मंत्र, और आरती गाई जाती है. पूजा के बाद प्रसाद स्वरूप पंचामृत, मिठाई या खीर का भोग लगाया जाता है. इस दिन देवउठनी एकादशी का व्रत रखा जाता है. संध्या समय तुलसी जी की आरती की जाती है.
तुलसी विवाह का महत्व
तुलसी विवाह में माता तुलसी (जिसे वृंदा देवी भी कहा जाता है) और श्री शालिग्राम भगवान (जो भगवान विष्णु का स्वरूप हैं) का विवाह होता है. मान्यता है कि इस विवाह से घर में सुख, समृद्धि, और सौभाग्य का वास होता है. जो लोग अपने घर में यह विवाह कराते हैं, उन्हें भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है. मान्याता है कि इस दिन व्रत रखने से अविवाहित कन्याओं को अच्छा वर मिलता है. वहीं विवाहित दंपतियों के जीवन में इस व्रत को रखने से खुशहाली आती है.
तुलसी माता का श्रृंगार
मां तुलसी का श्रृंगार करना तुलसी विवाह का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. इस दिन विशेष रूप से माता तुलसी को दुल्हन की तरह सजाया जाता है. सबसे पहले तुलसी के गमले या स्थान को अच्छी तरह साफ करें. पवित्र जल से शुद्ध करें. इसके बाद तुलसी माता को लाल या पीले रंग की साड़ी पहनाएं, क्योंकि ये रंग शुभता और मंगल के प्रतीक माने जाते हैं.
मां तुलसी को चुनरी, चूड़ी, नथनी, मांग टीका, हार, कंगन, बिंदी, फूल, कमरबंद और अन्य हल्के आभूषणों से सजाएं. उनके चारों ओर सुंदर रंगोली बना कर दीपक जलाएं.
</description><guid>2280</guid><pubDate>30-Oct-2025 10:31:45 am</pubDate></item><item><title> तुलसी विवाह पर हल्दी से करें ये अचूक उपाय, विवाह में आ रही बाधाएं होंगी दूर</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2279</link><description>हिंदू धर्म में तुलसी विवाह को पवित्र और बेहद ही शुभ माना जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है। कार्तिक द्वादशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व देव उठनी एकादशी के अगले दिन मनाया जाता है। इसलिए इसे देव उठान द्वादशी भी कहा जाता है। इस दिन माता तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के शालीग्राम रूप से कराया जाता है।
तुलसी विवाह के दिन भगवान विष्णु के शालीग्राम स्वरूप और माता तुलसी का विधि-विधान से विवाह संस्कार किया जाता है। मान्यता है कि तुलसी विवाह में कराने से घर-परिवार में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का आगमन होता है। वैवाहिक जीवन में आ रही कठिनाइयों दूर होती हैं और विवाह में देरी जैसी समस्याओं का समाधान निकलता है। कहा जाता है कि तुलसी विवाह वैवाहिक जीवन में प्रेम को बढ़ाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने असुरराज जालंधर का वध किया था, जिससे क्रोधित होकर उसकी पत्नी वृंदा ने भगवान को श्राप दिया कि वे शालीग्राम पत्थर के रूप में पूजे जाएंगे। बाद में वृंदा ने शरीर त्याग दिया और उनका पुनर्जन्म तुलसी के रूप में हुआ। अपनी भक्ति के प्रभाव से उन्होंने भगवान विष्णु को पति रूप में प्राप्त किया। तभी से हर वर्ष तुलसी विवाह परंपरा प्रचलित है।
हल्दी के उपाय से दूर होगी विवाह में देरी
तुलसी विवाह के दिन हल्दी का उपाय करने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। तुलसी विवाह के दिन स्नान से पहले पानी में एक चुटकी हल्दी मिलाएं। यह उपाय शरीर-मन की शुद्धि और गुरु ग्रह की शक्ति बढ़ाने के लिए शुभ माना जाता है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर तुलसी और शालीग्राम की पूजा करें। पूजा में हल्दी या हल्दी मिले दूध का लेप अर्पित करें। ऐसा करने से कुंडली में बृहस्पति मजबूत होते हैं और शुभ विवाह के योग बनते हैं।
</description><guid>2279</guid><pubDate>30-Oct-2025 10:25:35 am</pubDate></item><item><title> आंवला नवमी....जानें आंवला के पेड़ की पूजा व दान करने से क्या फल मिलता है?</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2278</link><description>पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी (31 अक्टूबर 2025) से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक भगवान विष्णु आंवले के वृक्ष पर निवास करते हैं, इसलिए इसे आंवला नवमी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन की गई पूजा-अर्चना और दान का अक्षय फल मिलता है, इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है। आंवला नवमी के दिन ही कृष्ण ने कंस के आमंत्रण पर वृंदावन छोड़कर मथुरा की ओर प्रस्थान किया था।
भारतीय शास्त्रों में आंवले को दैवीय फल माना जाता है। पद्म और स्कंद पुराण में वर्णन है कि आंवला ब्रह्माजी के आंसुओं से उत्पन्न हुआ। वहीं, एक अन्य कथा कहती है कि समुद्र मंथन के समय निकले अमृत कलश से पृथ्वी पर अमृत की बूंदें गिरने से आंवले अस्तित्व में आया।
एक बार देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं। उनकी इच्छा हुई कि भगवान विष्णु और शिव की एक साथ पूजा की जाए। उन्होंने विचार किया कि विष्णु को तुलसी अत्यधिक प्रिय है और शिव को बेल। इन दोनों के गुण एक साथ आंवले में हैं। देवी लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। माता लक्ष्मी ने आंवले के पेड़ के नीचे उन्हें भोजन कराया और उसके बाद स्वयं भोजन को प्रसाद रूप में ग्रहण किया। उस दिन से ही यह तिथि आंवला नवमी के नाम से प्रसिद्ध हुई।
ऐसी मान्यता है कि इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा, आंवले से स्नान, आंवले को खाने और आंवले का दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है। चरक संहिता में उल्लेख मिलता है कि कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन ही महर्षि च्यवन ने आंवले के सेवन से सदा युवा रहने का वरदान प्राप्त किया था। एक मान्यता यह भी है कि सतयुग की शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को हुई थी।
एक अन्य कथा के अनुसार इसी दिन आदि शंकराचार्य को एक निर्धन स्त्री ने भिक्षा में सूखा आंवला दिया था। उस निर्धन स्त्री की गरीबी से द्रवित होकर शंकराचार्य ने मां लक्ष्मी की मंत्रों द्वारा स्तुति की, जो कनकधारा स्तोत्र के रूप में जानी जाती है। उस निर्धन स्त्री के भाग्य में धन न होते हुए भी शंकराचार्य की विनती पर मां लक्ष्मी ने उसके घर स्वर्ण आंवलों की वर्षा करके उसकी दरिद्रता दूर की।
</description><guid>2278</guid><pubDate>30-Oct-2025 10:23:21 am</pubDate></item><item><title> 7 नवंबर से इन राशियों की बदलेगी किस्मत, राहु के स्वाति नक्षत्र में शुक्र करेंगे गोचर</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2277</link><description>सुख-संपत्ति, वैभव व ऐश्वर्य आदि के कारक शुक्र समय-समय पर अपनी राशि व नक्षत्र में बदलाव करते रहते हैं। 7 नवंबर 2025, शुक्रवार को शुक्र रात 09 बजकर 13 मिनट पर स्वाति नक्षत्र में गोचर करेंगे। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, स्वाति नक्षत्र का स्वामी राहु है। राहु के नक्षत्र में शुक्र का गोचर मेष से लेकर मीन राशि तक अपना प्रभाव डालेगा। शुक्र के नक्षत्र परिवर्तन से कई राशि वालों की लाइफ में सकारात्मक बदलाव होंगे और यह अवधि वित्त, करियर व व्यावसायिक रूप से लाभकारी सिद्ध होगी। जानें शुक्र का नक्षत्र गोचर किन राशियों के लिए रहेगा अच्छा।
1. वृषभ राशि- वृषभ राशि वालों को शुक्र नक्षत्र परिवर्तन से अच्छे फलों की प्राप्ति होगी। इस समय आपको करियर में नई उपलब्धि हासिल हो सकती है। नौकरी करने वालों को अच्छे प्रस्ताव मिल सकते हैं। इनकम के नए साधन बनेंगे और पुराने स्रोत से भी रुपए-पैसे आएंगे। परिवार का साथ मिलेगा। भौतिक सुखों में वृद्धि होगी।
2. कुंभ राशि- कुंभ राशि वालों के लिए शुक्र नक्षत्र परिवर्तन अच्छा रहने वाला है। इस समय आपकी आय में आकस्मिक वृद्धि हो सकती है। अटके हुए धन की वापसी होने से आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। मानसिक तौर पर आप मजबूत महसूस करेंगे। व्यावसायिक रूप से आपकी स्थिति सुदृढ़ होगी। नौकरी चाकरी के लिहाज से समय अनुकूल रहने वाला है।
3. मीन राशि- मीन राशि वालों के लिए शुक्र नक्षत्र गोचर लाभकारी रहने वाला है। इस समय आपकी आय में वृद्धि के साथ प्रमोशन मिलने के संकेत हैं। व्यापारिक विस्तार मिल सकता है। यात्रा लाभकारी रहेगी। पारिवारिक परेशानियां सुलझाने में सफल रहेंगे। अपनों का साथ मिलेगा। भाग्य का साथ मिलेगा और कार्यों में सफलता पाएंगे।
</description><guid>2277</guid><pubDate>30-Oct-2025 10:21:35 am</pubDate></item><item><title>गोवर्धन पूजा: जब कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के क्रोध से बचाया</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2276</link><description>गोवर्धन पर्वत ने एक बार ब्रज के गोप-गोपियों की रक्षा की थी। गोवर्धन पर्वत उठाने की यह घटना तब की है, जब भगवान कृष्ण को आत्मबोध हुआ था। भगवान आत्मबोध होने के बाद एक संकेत की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब गुरु गर्गाचार्य ने कृष्ण को याद दिलाया कि वह कौन हैं और उनके जीवन का ध्येय क्या है, तो गोवर्धन पर्वत पर खड़े-खड़े कृष्ण को एक तरह का बोध हुआ। फिर भी, गोकुलवासियों के लिए अपने प्यार के कारण उनका मन अब भी ऊहापोह में था।
जो ध्येय अभी बहुत दूर है, क्या उसके लिए उन्हें वाकई यह सब भूल जाना चाहिए, जो वह जानते हैं और जो उन्हें पसंद है? अपने अंदर कहीं वह इसे पक्का करने का एक संकेत ढूंढ़ रहे थे कि उन्हें जो बोध हुआ है, और जो उन्हें याद दिलाया गया है, वह इतना अहम मकसद है कि उसके लिए उन्हें वह सब कुछ भूल जाना चाहिए, जो उन्हें पसंद है।
इंद्रोत्सव मनाना बंद करने और गोपोत्सव का नया उत्सव शुरू करने के इस क्रांतिकारी कदम के बाद गोवर्धन पहाड़ की तराई में हर कोई खुशी मना रहा था। अचानक बारिश की जोरदार बौछारों के साथ एक भयानक तूफान उठा और नदी उफनने लगी। गोकुल के सीधे-सादे लोगों को लगा कि इंद्रोत्सव न मनाने के कारण इंद्र देव उनसे कुपित हो गए हैं और बारिश की इन बौछारों में उन्हें डुबाने वाले हैं। यमुना का पानी बढ़ता जा रहा था। कृष्ण इस इलाके को अच्छी तरह से जानते थे। उन्होंने गोवर्धन पहाड़ में कई जगह सुराख देखे थे। वह गोकुल के युवाओं को वहां लेकर गए। जब उन्होंने ज्यादा जगह बनाने के लिए कुछ चट्टानें हटाईं, तो वहां एक विशाल गुफा का पता चला। पशुओं सहित हर कोई उस विशाल गुफा के अंदर जाने लगा, मगर वह जगह काफी नहीं थी।
फिर अचानक पूरा पहाड़ जमीन से छह फीट ऊपर उठ गया और वह गुफा इतनी बड़ी हो गई कि जानवरों समेत ब्रज का सारा जनसमूह उसमें समा सकता था। वे आराम से कुछ दिनों तक उसमें रहे। बाढ़ का पानी उतरने के बाद ही वे बाहर निकले। इस प्रकार कृष्ण ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की और इंद्र का मान-मर्दन किया।</description><guid>2276</guid><pubDate>20-Oct-2025 3:52:09 pm</pubDate></item><item><title>दिवाली से पहले घर से निकाल दें ये 6 अशुभ चीजें</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2275</link><description>दिवाली का पवित्र त्योहार आने वाला है. इस साल दीपावली 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी. कहते हैं कि दिवाली-धनतेरस जैसे शुभ त्योहार आने से पहले घर की अच्छी तरह सफाई कर लेनी चाहिए और कुछ अशुभ चीजों को बाहर निकाल देना चाहिए, जिनके कारण घर में दरिद्रता पांव पसारती है. ऐसी ही कुछ चीजों के बारे में ज्योतिषाचार्य प्रवीण मिश्र ने बताया है.
खंडित मूर्तियां-
दिवाली से पहले घर के मंदिर की साफ-सफाई जरूर करनी चाहिए. इस दौरान टूटी या खंडित मूर्तियों को घर से बाहर निकाल दें. इन मूर्तियों को कूड़े-कचरे में बिल्कुल न फेंके. इन्हें या तो नदी-तालाब में विसर्जित कर दीजिए या फिर किसी पवित्र या खाली स्थान पर रख दीजिए.
बंद घड़ी
आपके घर में जितनी भी बंद घड़ियां हैं या तो उन्हें चालू करवा लें या फिर घर से बाहर कर दें. घर में बंद घड़ियों का होना शुभ नहीं माना जाता है. वास्तु शास्त्र के अनुसार, बंद घड़ियां इंसान के दुर्भाग्य का कारण बन सकती हैं. ऐसे लोगों के घर में दरिद्रता बहुत जल्दी पांव पसारती है.
जंग लगी चीजें
यदि घर में जंग लगा हुआ लोहा या अनुपयोगी सामान पड़ा है तो उसे तुरंत बाहर कर दीजिए. कोई भी ऐसा सामान जो बहुत दिनों से उपयोग नहीं हुआ है. टूटा-फूटा या खराब हो चुका है, उसे फौरन बाहर कर दें. जंग लगा हुआ ताला, पुराने खोटे सिक्के, पुराने बर्तन या कोई भी गैर-जरूरी सामान घर में बिल्कुल न रहने दें.
खराब फर्नीचर
दिवाली की सफाई में टूटा हुआ फर्नीचर भी घर से बाहर करें. दीमक लगा सोफा, टूटी हुई कुर्सी या जंग खाई मेज घर में रहने रहने से नकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है. यदि वो रिपेयर कराने की स्थिति में है तो करवा लीजिए, अन्यथा घर से बाहर करना ही एकमात्र विकल्प है.
टूटा शीशा
दिवाली की सफाई में कांच का टूटा हुआ सामान भी घर से बाहर कर दें. अक्सर लोग कांच का महंगा सामान घर ले आते हैं. लेकिन उसके टूटने के बावजूद उसे बाहर नहीं फेकते हैं. ऐसा करना गलत है. घर में टूटा हुआ कांच रखना अशुभ होता है. कांच के टूटे बर्तन या आईना रखना भी ठीक नहीं माना जाता है.
फटे-पुराने कपड़े
अपने घर में फटे-पुराने कपड़े बिल्कुल न रखें. जो कपड़े पुराने हो चुके हैं. फट चुके हैं और आप अब उनका इस्तेमाल नहीं करते हैं, उन्हें तुरंत घर से बाहर कर दीजिए. ऐसे कपड़े आदमी को बदकिस्मत बनाते हैं.</description><guid>2275</guid><pubDate>18-Oct-2025 2:15:40 pm</pubDate></item><item><title>कार्तिक मास में क्या खाएं क्या नहीं खाएं</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2274</link><description>कार्तिक मास की शुरुआत 7 अक्टूबर, मंगलवार से हो चुकी है। इस महीने का हिंदू धर्म में खास महत्व होता है और इसे बेहद पवित्र माना गया है। इस दौरान विष्णुजी नारायण रूप में जल में विराजमान रहते हैं। ऐसे में इस माह को धर्म मास भी कहा जाता है। इसलिए इस महीने के दौरान कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए और खान-पान से जुड़े नियमों का ख्याल रखना भी आवश्यक होता है। शास्त्रों में कार्तिक मास में खान-पान के कई नियम बताए गए हैं। इनका पालन करने से स्वास्थ्य बेहतर रहता है और लक्ष्मी-नारायण की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि आने के संयोग बनते है। ऐसे में आइए विस्तार से जानें की कार्तिक मास में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए...
कार्तिक मास में बैंगन से करें परहेज
मान्यता है कि कार्तिक मास में बैंगन खाने से बचना चाहिए। कहा जाता है कि इस महीने के दौरान पित्त दोष संबंधित समस्याएं होने का भय अधिक रहता है। वहीं, बैंगन खाने से पित्त दोष बढ़ सकता है। यही कारण है कि कार्तिक के महीने में बैंगन खाने के मनाही होती है। उत्तेजना वर्धन होने के चलते बैंगन को धार्मिक दृष्टि से शुद्ध नहीं माना जाता है और इस महीने के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
कार्तिक मास में न खाएं दही
इस अवधि के दौरान दही खाने की मनाही होती है, क्योंकि इसे कार्तिक मास में स्वास्थ्य के लिए सही नहीं माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक के महीने में दही खाना संतान के लिए अच्छा नहीं होता है। हालांकि, इस अवधि में आप दही की जगह दूध का सेवन कर सकते हैं।
भूलकर भी न खाएं मछली
कार्तिक के महीने में तामसिक भोजन करना वर्जित माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से इस अवधि में विशेष रूप से मछली का सेवन करना शुभ नहीं माना जाता है। कहा जाता है कि इस महीने में भगवान विष्णु जल में अपने मत्स्य अवतार के रूप में होते हैं। यही कारण है कि कार्तिक के महीने में मछली का सेवन करना वर्जित माना गया है। इसके अलावा, आषाढ़ में अधिक वर्षा और बाढ़ आने से जल प्रदूषित हो जाता है। ऐसे में वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसका सेवन करना सही नहीं माना जाता है।
करेले का सेवन करना है वर्जित
माना जाता है कि कार्तिक मास में करेला का सेवन करने से भी बचना चाहिए। इसे वातकारक माना गया है और इसमें कभी-कभी कीड़े भी लग जाते हैं। ऐसे में अगर आप इस समय करेला खाते हैं तो स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि कार्तिक मास में करेले का सेवन करना सही नहीं माना जाता है।
मूली का सेवन करने से मिलेगा लाभ
​कार्तिक मास में कुछ चीजों को खाना सही नहीं माना जाता है। लेकिन कुछ चीजों का सेवन करना बेहद फायदेमंद माना गया है। माना जाता है कि इस महीने में मूली खाना बेहद लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इस मौसम में कफदोष और पित्तदोष जैसी समस्याएं होने का भय होता है। ऐसे में मूली का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।
कार्तिक मास में खाएं आंवला
इस महीने में आंवला नवमी मनाई जाती है, जिसमें आंवले के वृक्ष और भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान होता है। स्वास्थ्य के लिहाज से भी कार्तिक के महीने में आंवला खाना बहुत फायदेमंद माना गया है। इससे जातक के सेहत पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। कार्तिक के महीने में आंवला नवमी पर आंवले की वृक्ष की पूजा करने से लक्ष्मी-नारायण का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।
कार्तिक के महीने में जरूर करें ये काम
इस अवधि में खान-पान से जुड़े नियमों का ध्यान रखने के साथ-साथ एक काम भी अवश्य करना चाहिए। मान्यता है कि कार्तिक के महीने में नियमित रूप से भगवान विष्णु को तिल जरूर अर्पित करने चाहिए। साथ ही, इस दौरान तिल का सेवन करना भी लाभदायक माना जाता है। ऐसा करने से आपको विष्णुजी की कृपा प्राप्त हो सकती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
</description><guid>2274</guid><pubDate>18-Oct-2025 2:08:32 pm</pubDate></item><item><title>धनतेरस पर घर ले आएं ये चीजें</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2273</link><description>कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है. कहते हैं कि इसी दिन भगवान धनवंतरी समुद्र मंथन से अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे. धनतेरस पर धनवंतरी, मां लक्ष्मी और कुबेर महाराज की पूजा करने से बहुत लाभ मिलता है. इस दिन कुछ खास चीजों को खरीदना भी बहुत शुभ माना जाता है. इस साल 18 अक्टूबर को धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा. आइए जानते हैं कि धनतेरस पर कौन सी चीजें खरीदने से आपकी तकदीर संवर सकती है.
लक्ष्मी जी की प्रतिमा
दिवाली के शुभ अवसर पर भगवान गणेश और लक्ष्मी जी की पूजा का विधान है. इस दिन मां लक्ष्मी और बुद्धि के देवता गणेश दोनों की संयुक्त पूजा की जाती है. धनतेरस पर माता लक्ष्मी और गणेश की मूर्ति खरीदें. लक्ष्मी और गणेश की मूर्तियां अलग-अलग होनी चाहिए. ध्यान रहे कि इस दिन कमल पर विराजित लक्ष्मी को घर लाना उत्तम होता है.
दक्षिणावर्ती शंख
समुद्र मंथन से निकलने वाले दक्षिणावर्ती शंख को मां लक्ष्मी का भाई माना जाता है. इस शंख की ध्वनि बेहद मंगलकारी होती है. धनतेरस पर दक्षिणाणवर्ती शंख खरीदें और उसे घर के मंदिर में रख दें. दीपावली पर इसकी पूजा करना बेहद फलदायी माना जाता है.
कुबेर यंत्र
धनतेरस के त्योहार पर घर में कुबेर यंत्र की स्थापना करना भी बहुत शुभ होता है. इस दिन कुबेर यंत्र लेकर आएं और घर के मंदिर में स्थापित करें. पूरे साल धन लाभ होगा.
चांदी
चांदी सुख-समृद्धि देने वाली धातु मानी जाती है. धनतेरस पर चांदी के आभूषण या चांदी का सिक्का खरीदना शुभ माना जाता है. दिवाली पूजा में इस सामान को देवी लक्ष्मी के समक्ष रखा जाता है.
गोमती चक्र
गोमती चक्र एक खास तरह का पत्थर होता है. यह कई रंगों का होता है, लेकिन सफेद गोमती चक्र सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. आप इसे रत्न की तरह अंगूठी में डाल सकते हैं. धनतेरस पर आप दो या पांच गोमती चक्र खरीद सकते हैं. गोमती चक्र दीपावली के दिन मां लक्ष्मी को अर्पित किया जाता है.
खील बताशे
धनतेरस के दिन खील बताशे खरीदना बहुत शुभ माना जाता है. खील बताशे शुक्र का प्रतीक होते हैं और सुख-संपन्नता बढ़ाते हैं. दिवाली की पूजा के दौरान मां लक्ष्मी को खील बताशे अर्पित किए जाते हैं. खील बताशे को मिटटी के पात्र में रखकर पूजा करना उत्तम होता है.
कौड़ी
कौड़ी समुद्री जीवों का खोल है. धन के रूप में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है. धनतेरस पर पांच या नौ कौड़ियां खरीदें. कौड़ी को दीपावली के दिन अर्पित करने या पूजा में इस्तेमाल करने से आर्थिक मोर्चे पर लाभ होता है और घर में सुख-शांति बनी रहती है.
झाड़ू
शास्त्रों में झाड़ू को शुभता और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है. इसलिए धनतेरस पर झाड़ू खरीदने की परंपरा है. धनतेरस और दिवाली के दिन इसकी पूजा भी करनी चाहिए. इसके बाद ही इसका उपयोग करें.
बर्तन
धनतेरस पर आप किसी भी तरह का बर्तन खरीद सकते हैं. हालांकि इस त्योहार पर पानी का पात्र खरीदना सबसे अच्छा है. इस दिन आप गिलास, कलश या लोटा खरीद सकते हैं. इन बर्तनों को दीपावली के बाद प्रयोग करें.
धनिया
धनतेरस के दिन साबुत धनिया खरीदना भी बहुत शुभ माना जाता है. इस दिन धनिया लाने के बाद उन्हें पूजन स्थल पर रखें. कहते हैं कि इससे भगवान कुबेर और धनवतंरी प्रसन्न होते हैं. दिवाली के बाद सुबह इन्हें गमले में डाल दें.</description><guid>2273</guid><pubDate>18-Oct-2025 2:05:55 pm</pubDate></item><item><title>छोटे से घर की सजावट को पूरा कर देंगी ये रंगोली डिजाइन, देख लें फोटोज</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2272</link><description>छोटे से कमरे के लिए रंगोली की डिजाइन
दिवाली की सजावट रंगोली के बिना अधूरी लगती है। लेकिन बड़े शहरों में छोटे घरों में रहने वाले लोगों को बिना रंगोली बनाए ही दिवाली की सजावट करनी होती है। अगर आपको रंगोली बनाना पसंद है तो छोटे से कमरे में एक कोने में रंगोली की ये छोटी और सरल डिजाइन बनाएं।
दीये वाली डिजाइन
कमरे के कोने में छोटी सी जगह में दिवाली के दीये सी जगमगाती इस डिजाइन को बनाएं। कम रंगों के इस्तेमाल से ये डिजाइन फटाफट बनकर तैयार हो जाती है।
शुभ लाभ वाली रंगोली
पूजा घर के कोने में रंगोली बनाना चाहती हैं तो इस तरह की शुभलाभ वाली रंगोली को बनाकर ट्राई कर सकती हैं। किनारों पर रंगों के ढेर रखने के साथ दीये जलाना ना भूलें।
फूलों वाला कोना
रंगोली के नाम पर वहीं पुराने टाइम वाला अल्पना ना बनाएं. बल्कि ये यूनिक, सिंपल और छोटी सी डिजाइन को घर के फ्रंट में एक कॉर्नर पर बनाकर डेकोरेशन को पूरा करें।
मां लक्ष्मी के चरण
पूजा घर के फ्रंट में छोटी सी जगह में मां लक्ष्मी के चरण के साथ रंगों को यूं बिखेर दें। बस दीया जलाकर रंगोली की डिजाइन को पूरा कर दें।
मां लक्ष्मी के चरण और फूल
सबसे छोटी और दिखने में सुंदर होने के साथ ही बनाने में बिल्कुल आसान सी है ये रंगोली। साथ ही इसमे आपको मां लक्ष्मी के चरण अलग से बनाने की भी जरूरत नहीं होगी।
बनाएं फूलों के साथ दीया
घर के किसी कोने में थोड़ी जगह है तो दीया के साथ फूलों वाली इस डिजाइन को बना लें। ये बनाने में बहुत आसान है और फटाफट बनकर तैयार हो जाएगी।
बना लें अल्पना
रंगोली बनाने के लिए कोई डिजाइन नहीं बन पा रही है तो बस ये सुंदर से फूल को रंगों की मदद से सजा लें। बन जाएगी छोटे से कमरे के दरवाजे पर ये रंगोली डिजाइन।</description><guid>2272</guid><pubDate>18-Oct-2025 2:02:53 pm</pubDate></item><item><title>छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली में क्या अंतर है? दूर करें कंफ्यूजन</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2271</link><description>दिवाली, जिसे दीपावली भी कहा जाता है, हिंदू धर्म का प्रमुख पर्व है जो अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और अज्ञानता पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है. यह पर्व पांच दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली दो प्रमुख दिन होते हैं. इन दोनों में तिथियों, पूजा विधियों और धार्मिक महत्व के आधार पर अंतर होता है.
छोटी दिवाली (नरक चतुर्दशी)
छोटी दिवाली, जिसे नरक चतुर्दशी या रूप चौदस भी कहते हैं, दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाती है. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध कर 16,100 कन्याओं को मुक्त किया था. इसी कारण इस दिन को नरक चतुर्दशी कहा जाता है. इस दिन सूर्योदय से पहले उबटन और स्नान करने की परंपरा है, जिससे समस्त पाप समाप्त होते हैं. साथ ही यमराज की पूजा करके अकाल मृत्यु से मुक्ति की कामना की जाती है और घर में दीपक जलाकर वातावरण को शुद्ध किया जाता है.
बड़ी दिवाली (लक्ष्मी पूजन)
बड़ी दिवाली, जिसे मुख्य दिवाली या लक्ष्मी पूजन भी कहते हैं, कार्तिक माह की अमावस्या को मनाई जाती है. इस दिन भगवान रामचन्द्रजी 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे थे, तभी अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया. इसी कारण इस दिन को दीपावली कहा जाता है. इस दिन देवी लक्ष्मी, भगवान गणेश और सरस्वती की पूजा करके घर में सुख, समृद्धि और ज्ञान की प्राप्ति की कामना की जाती है. घर को दीपों और रंग-बिरंगी झालरों से सजाया जाता है.
छोटी और बड़ी दिवाली: उत्सव और परंपराओं में अंतर
छोटी दिवाली के दिन लोग सामान्य रूप से हल्का भोजन करते हैं और साधारण पूजा-अर्चना में ही अपने दिन की शुरुआत करते हैं. इस दिन का मुख्य उद्देश्य आत्म-शुद्धि और अंधकार पर विजय है, इसलिए उत्सव सरल और शांतिपूर्ण रहता है. इसके विपरीत, बड़ी दिवाली पर पूरे घर और परिवार में उल्लास और खुशी का माहौल होता है. लोग पूरे परिवार और मित्रों के साथ मिलकर दीप जलाते हैं, रंगोली बनाते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और विशेष पूजा-अर्चना के साथ समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं. बड़ी दिवाली का उत्सव न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और पारिवारिक रूप से भी आनंदपूर्ण होता है.</description><guid>2271</guid><pubDate>13-Oct-2025 3:09:53 pm</pubDate></item><item><title>इस बार 6 दिनों का होगा दीपावली का त्योहार, जानें कब से होगा शुरू</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2270</link><description>पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व को दिवाली या दीपावली भी कहा जाता है. इस पर्व में धनतेरस, नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली), दिवाली (लक्ष्मी पूजा), गोवर्धन पूजा और भाई दूज शामिल हैं. यह पर्व कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुरू होता है और शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि तक मनाया जाता है. यह प्रकाश और समृद्धि का प्रतीक है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतिनिधित्व करता है. इस उत्सव में हर दिन का अपना विशेष महत्व और अनुष्ठान होता है. पंंचांग के अनुसार, साल 2025 में दिवाली का पर्व 20 अक्टूबर दिन सोमवार को मनाया जाएगा.
पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व कब है?
पांच दिवसीय प्रकाश पर्व की शुरुआत धनतेरस के साथ होती है और भाई दूज पर इसका समापन होता है. पांच दिनों तक मनाया जाने वाला यह त्योहार इस बार 6 दिनों का होने वाला है. इस साल पंच दीपोत्सव की शुरुआत 18 अक्टूबर से हो रही है, जिसका समापन 23 अक्टूबर 2025 को होगा. इस तरह से दीपोत्सव 5 नहीं, बल्कि 6 दिनों तक मनाया जाएगा.
इस बार 6 दिन का होगा दीपोत्सव
पांच दिवसीय दीपोत्सव का 6 दिन पड़ने के पीछे का कारण है त्रयोदशी तिथि में बढ़ोतरी. इस बार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि दो दिन पड़ेगी. जिसकी वजह से दीपोत्सव 6 दिनों का हुआ है. इस साल छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली दोनों एक ही दिन मनाई जाएगी. आइए जानते हैं किस तिथि पर कौन से त्योहार मनाए जाएंगे.
दीपावली के 5 दिन कौन से हैं?
धनतेरस:- दिवाली पर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है, जिसे धनत्रयोदशी भी कहते हैं. इस दिन भगवान धन्वंतरी, कुबेर और लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और लोग बर्तन, धातु व आभूषण खरीदते हैं.
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली):- धनतेरस के अगले दिन छोटी दिवाली का पर्व मनाया जाता है. इस दिन भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर राक्षस का वध किया गया था, जो कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है.
दिवाली (बड़ी दिवाली):- दिवाली का त्योहार कार्तिक अमावस्या के दिन मनाया जाता है और इसमें लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा के साथ दीपक जलाए जाते हैं. यह दीपावली का मुख्य दिन होता है.
गोवर्धन पूजा:- यह पांच दिवसीय दीपोत्सव का चौथा दिन होता है. इस दिन भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने का स्मरण किया जाता है, जिसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है.
भाई दूज:- पांच दिवसीय उत्सव का आखिरी दिन भाई दूज भाई-बहन के रिश्ते को समर्पित है, जिसमें भाई अपनी बहन के घर जाकर भोजन करते हैं और बहन भाई की लंबी उम्र की कामना करती है.</description><guid>2270</guid><pubDate>13-Oct-2025 3:08:37 pm</pubDate></item><item><title>धनतेरस पर क्यों खरीदे जाते हैं सोना-चांदी और नए बर्तन? क्या है वजह</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2269</link><description>धनतेरस के त्यौहार से ही दिवाली की शुरुआत मानी जाती है. धनतेरस का पर्व सुख समृद्धि और नई शुरुआत का संदेश देता है. प्राचीन काल से ही धनतेरस के दिन सोना-चांदी और नए बर्तन खरीदने की परंपरा चली आ रही है. हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस का पर्व मनाया जाता है. इस दिन सोना,-चांदी और नए बर्तन खरीदने के साथ-साथ भगवान धन्वंतरि देव की पूजा की जाती है.
इस दिन को धन त्रयोदशी भी कहा गया है. इस दिन धातु और नई वस्तुएं खरीदने को शुभ माना जाता है, लेकिन क्या कभी आपने इस पर विचार किया है कि आखिर इस दिन सोना-चांदी और नए बर्तन क्यों खरीदे जाते हैं? तो चलिए जानते हैं कि प्राचीन काल से लोग इस परंपरा को क्यों निभाते चले आ रहे हैं?
कब है धनतेरस?
हिंदू पंचांग के अनुसार, शनिवार 18 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 18 मिनट पर कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत हो रही है. इसके अगले दिन 19 अक्टूबर को दोपहर 01 बजाकर 51 मिनट पर ये त्रयोदशी तिथि समाप्त हो जाएगी. इस प्रकार 18 अक्टूबर को धनतेरस मनाया जाएगा.
इसलिए धनतेरस पर की जाती है खरीदारी
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को समुद्र मंथन के दौरान धन्वंतरि देव अमृत कलश लेके प्रकट हुए थे. धन्वंतरि देव जो कलश लेकर प्रकट हुए थे वो सोने का था, इसलिए इसे धन त्रयोदशी भी कहा जाता है. माना जाता है कि इस दिन सोना,-चांदी या नए बर्तन खरीदने से मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे घर में धन-धान्य बढ़ता है. धनतेरस के दिन लोग सिर्फ सोना-चांदी ही नहीं, बल्कि तांबे, पीतल और स्टील के बर्तनों की भी खरीदारी करते हैं. ये धातुएं शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है. यही कारण है कि धनतेरस पर सोना-चांदी और नए बर्तन खरीदने की परंपरा है. वहीं, धनतेरस के दिन काले रंग की वस्तुएं भूलकर भी नहीं खरीदना चाहिए. धनतेरस के दिन काले रंग की वस्तुएं खरीदना अशुभ होता है.</description><guid>2269</guid><pubDate>13-Oct-2025 3:07:44 pm</pubDate></item><item><title>क्या है धनतेरस और समुद्र मंथन का गहरा संबंध?</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2268</link><description>हिंदू धर्म में हर पर्व का अपना विशेष धार्मिक और पौराणिक महत्व होता है. दिवाली, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है इसका समुद्र मंथन से भी गहरा संबंध है. पुराणों में उल्लेख मिलता है कि प्राचीन समय में देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, ताकि अमृत कलश प्राप्त कर अमरता का वरदान प्राप्त कर सके. इस मंथन से कई दिव्य रत्न और अद्भुत वस्तुएं प्रकट हुईं. सबसे महत्वपूर्ण था धन्वंतरि देव का प्रकट होना, जिनके हाथ में अमृत कलश था. धन्वंतरि देव को आयुर्वेद और स्वास्थ्य के देवता माना जाता है, इसलिए उनका प्रकट होना स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक बन गया.
दिवाली और समुद्र मंथन में संबंध
इस पौराणिक घटना का प्रत्यक्ष संबंध धनतेरस से है, जो दिवाली से दो दिन पहले आता है और इसे धन त्रयोदशी कहा जाता है. मान्यता है कि इस दिन धन्वंतरि देव सोने का अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे. इसी कारण इस दिन सोना, चांदी और नए बर्तन खरीदने की परंपरा शुरू हुई. यह केवल एक धार्मिक रिवाज नहीं, बल्कि घर में मां लक्ष्मी की कृपा लाने, धन-वैभव बढ़ाने और परिवार में सुख-शांति बनाए रखने का माध्यम माना जाता है.
धनतेरस पर होने वाले शुभ कार्य और परंपराएं--
धनतेरस के दिन कुछ विशेष उपाय और परंपराएं अपनाने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.
सोना, चांदी और धातु के बर्तन खरीदें: केवल सोना और चांदी ही नहीं, बल्कि तांबे, पीतल और स्टील के बर्तन खरीदना भी शुभ माना जाता है. ये धातुएं शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती हैं.
घर की साफ-सफाई: घर को अच्छे से साफ करना बहुत शुभ होता है. इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में शांति और खुशहाली बनी रहती है.
दीपक जलाना: मुख्य द्वार, खिड़कियों और घर के महत्वपूर्ण स्थानों पर दीपक जलाने से उजाला और सकारात्मक ऊर्जा फैलती है. यह मां लक्ष्मी और धन की देवी को आमंत्रित करने का भी प्रतीक है.
कुबेर यंत्र स्थापित करना: घर में धन के देवता कुबेर का यंत्र रखने से आर्थिक स्थिरता और धन-वैभव बढ़ता है.
दान करना: जरूरतमंदों को भोजन, कपड़े या अन्य आवश्यक वस्तुएं दान करने से पुण्य मिलता है और मन में संतोष और करुणा का भाव बढ़ता है.</description><guid>2268</guid><pubDate>13-Oct-2025 3:06:16 pm</pubDate></item><item><title> धनतेरस पर क्यों होती है खरीदारी शुभ? जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथा और महत्व</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2267</link><description>दीपोत्सव की शुरुआत का प्रतीक, धनतेरस का त्योहार हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन सोना, चांदी, और नए बर्तन खरीदना बेहद शुभ माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि धनतेरस पर खरीदारी करने से घर में धन-धान्य और सौभाग्य में तेरह गुना वृद्धि होती है. पंचांग के अनुसार, इस साल धनतेरस का शुभ पर्व शनिवार, 18 अक्टूबर को मनाया जाएगा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन खरीदारी को इतना शुभ क्यों माना जाता है? इसके पीछे दो प्रमुख पौराणिक कथाएं हैं, जो इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देती हैं.
धनतेरस पर खरीदारी का महत्व, भगवान धन्वंतरि की कथा
समुद्र मंथन और अमृत कलश
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीर सागर में समुद्र मंथन किया था. कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही, मंथन के दौरान, भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे. जब वह प्रकट हुए, तो उनके हाथों में अमृत से भरा एक स्वर्ण/पीतल का कलश था. यह कलश धन और आरोग्य का प्रतीक था. चूंकि भगवान धन्वंतरि अपने साथ अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को धन त्रयोदशी कहा गया.
इस दिन किसी भी धातु या नई वस्तु (विशेषकर बर्तन और धातु) को खरीदना बहुत शुभ माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि इससे घर में धन और आरोग्य का वास होता है, और धन की कमी दूर होती है. खास तौर पर पीतल के बर्तन खरीदना बहुत ही शुभ माना जाता है क्योंकि भगवान धन्वंतरि के हाथ में पीतल का कलश था.
धनतेरस पर सोना-चांदी खरीदने की दूसरी पौराणिक कथा
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने राजा बलि के अहंकार को तोड़ने के लिए वामन अवतार लिया था, तब उन्होंने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में माँगी थी. राजा बलि ने दान देने का वचन दिया.वामन भगवान ने अपने पहले पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया.दूसरे पग में स्वर्गलोक को नाप लिया. तीसरा पग रखने के लिए जब कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर वामन भगवान के चरणों में रख दिया.
इस तरह राजा बलि ने अपना सब कुछ दान में गंवा दिया. माना जाता है कि राजा बलि ने देवताओं से जो धन-संपत्ति छीन ली थी, उससे कई गुना धन-संपत्ति देवताओं को वापस मिल गई थी. इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है, जिससे धन-संपत्ति की वृद्धि का संदेश मिलता है.</description><guid>2267</guid><pubDate>12-Oct-2025 3:23:35 pm</pubDate></item><item><title>क्या होता है दीपदान? जानिए कार्तिक मास में दीपदान का महत्व और तरीका</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2266</link><description>कार्तिक मास हिंदू कैलेंडर का आठवां महीना होता है, जो कि बहुत ही पवित्र माना गया है. यह मास जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है. इस दौरान भगवान विष्णु के साथ ही तुलसी की पूजा को बहुत महत्व दिया गया है. इसके अलावा, कार्तिक मास में दीपदान करना बेहद खास माना जाता है. इस लेख में हम आपको बताएंगे कि दीपदान क्या होता है, दीपदान करने की विधि और कार्तिक मास में दीपदान का क्या महत्व होता है.
दीपदान क्या होता है?
दीपदान का अर्थ है दीपक जलाकर किसी उपयुक्त स्थान पर दान करना या रखना. दीपदान किसी देवता, पवित्र नदी या किसी विद्वान ब्राह्मण के घर किया जाता है. मुख्य रूप से दीपदान जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है. दीपदान को ज्ञान और उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक भी माना जाता है. खासकर कार्तिक मास में दीपदान का विशेष महत्व है और इससे अक्षय पुण्य मिलता है.
कार्तिक मास में दीपदान का महत्व
कार्तिक मास में दीपदान बहुत शुभ फल देने वाला माना जाता है. कार्तिक मास में दीपदान करने से व्यक्ति को दिव्य कान्ति से युक्त होने और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होने का लाभ मिलता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, कार्तिक मास में दान करने से व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल सकती है और अगले जन्म में महान कुल में जन्म लेने का आशीर्वाद भी मिलता है.
  मोक्ष और पुनर्जन्म से मुक्ति:- कार्तिक मास में दीपदान करने से व्यक्ति जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है.
  दिव्य कान्ति की प्राप्ति:- कार्तिक मास में श्रीकेशव के निकट अखंड दीपदान करने से व्यक्ति दिव्य कान्ति से युक्त हो जाता है.
  पुण्य की प्राप्ति:- कार्तिक माह में दीपदान करने से सभी यज्ञों और तीर्थों का फल प्राप्त होता है, जो कि अन्य दान-पुण्य से प्राप्त होने वाले फल से कहीं ज्यादा है.
  पापों का नाश:- कार्तिक मास में सूर्योदय से पहले स्नान करके दीपदान करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है.
  अगले जन्म में शुभ फल:- कार्तिक मास में तुलसी के सामने दीपक जलाने से व्यक्ति के अगले जन्म में एक महान कुल में जन्म लेने की संभावना बनती है.
कार्तिक मास में दीपदान करने से कौन सा लोक प्राप्त होता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक मास में दीपदान करने से विष्णु लोक, लक्ष्मी लोक और मोक्ष जैसे लोक प्राप्त होते हैं. साथ ही, कार्तिक मास में दीपदान करने से अक्षय पुण्य भी मिलता है. कार्तिक मास में मंदिर में दीपदान से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है. वहीं, नदी घाट पर दीपदान दान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष मिलता है. घर के मुख्य द्वार या तुलसी के पौधे के पास दीपदान करने से धन और समृद्धि आती है और सभी पाप नष्ट होते हैं.
दीपदान कब करें?
दीपदान विशेष रूप से कार्तिक मास में किया जाता है, जो दीपदान का महीना कहलाता है. इसके अलावा, दीपावली, नरक चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर भी दीपदान करना महत्वपूर्ण माना जाता है. दीपदान इसे अंधेरा होने पर यानी सूर्योदय से पहले (ब्रह्म मुहूर्त) या सूर्यास्त के बाद करना चाहिए. दीपदान घर के पूजा स्थान, तुलसी के पौधे के पास, नदी या तालाब के घाट पर और मंदिरों में किया जाता है.
दीपदान करते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?
कार्तिक मास में दीपदान करते समय शुभं करोति कल्याणं मंत्र बोलना चाहिए, जिसका अर्थ है कि शुभ और कल्याण करने वाली, आरोग्य और धन-संपदा देने वाली और शत्रु बुद्धि का विनाश करने वाली दीपक की ज्योति को नमस्कार है.
कार्तिक मास में दीप दान कैसे करें?
दीपक तैयार करें:- एक मिट्टी का दीपक लेकर उसमें घी या तिल का तेल भरें. फिर एक रुई की बत्ती बनाकर दीपक में रखें.
स्थान चुनें:- किसी नदी या तालाब के किनारे, घर के मंदिर या तुलसी के पौधे के पास दीपदान कर सकते हैं.
दीपदान करें:- दीपक को सीधे जमीन पर रखने के बजाय चावल या सप्तधान के ऊपर रखें, ताकि भूमि को नुकसान न पहुंचे.
प्रार्थना और मंत्र:- दीपक जलाते समय भगवान का स्मरण करें और अपनी मनोकामना बोलनी चाहिए.
जल अर्पित करें:- दीपक के साथ थोड़ा जल भी अर्पित करें.
वापस घर आएं:- दीपक जलाने और पूजन करने के बाद बिना देखे वापस घर आ जाएं.
दीपदान करने के नियम---
दीपदान में दीपों की संख्या और बत्तियां मनोकामना के अनुसार तय की जाती हैं.
अगर नदी के पास नहीं जा सकते, तो घर पर ही नदी का आवाहन करके दीपदान कर सकते हैं.
दीपदान करते समय एक दीपक से दूसरा दीपक नहीं जलाना चाहिए.</description><guid>2266</guid><pubDate>12-Oct-2025 3:20:48 pm</pubDate></item><item><title> इन 4 राशि वालों को धनतेरस-दिवाली पर होगा विशेष लाभ</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2265</link><description>बालोद से पंडित प्रकाश उपाध्याय
सूर्य 17 अक्तूबर 2025 को दोपहर 1 बजकर 36 मिनट पर तुला राशि में प्रवेश करेंगे। अगले दिन यानी 18 अक्तूबर 2025 को धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा।19 अक्तूबर 2025 को गुरु राशि परिवर्तन करने वाले हैं। वह इस दिन दोपहर 12 बजकर 57 मिनट पर कर्क में गोचर करेंगे। इस दिन छोटी दिवाली भी मनाई जाएगी। इसके बाद चंद्रमा कन्या से तुला में प्रवेश करेंगे। 23 अक्तूबर को भाई दूज का पर्व मनाया जाएगा। फिर वृश्चिक राशि में 24 अक्तूबर 2025 को बुध आएंगे।मंगल भी 27 अक्तूबर 2025 को दोपहर 02 बजकर 43 मिनट पर वृश्चिक में प्रवेश करेंगे। ऐसे में ग्रहों के इस दुर्लभ संयोग का खास प्रभाव कुछ राशि वालों पर बना रहेगा। इन जातकों को धन लाभ, शुभ समाचार और हर क्षेत्र में सफलता मिल सकती हैं। आइए इनके बारे में जानते हैं।
सिंह राशि
यह समय सिंह राशि वालों के लिए शुभ रहेगा। व्यापारियों को नए सौदे मिलेंगे। आप वाहन की खरीदारी करेंगे। निवेश करने पर अच्छा रिटर्न आएगा। पार्टनरशिप का प्रस्ताव भी आपको मिल सकता है। इस दौरान जो लोग नौकरीपेशा हैं, उनको नए मौके मिलेंगे। भाग्य का साथ मिलेगा।
कन्या राशि
आपके लिए ग्रहों की ये चाल बदलावों से भरी रहेगी। आप जो भी काम करेंगे, उसमें धन लाभ, विस्तार और नए लोगों का साथ आपको मिलेगा। इस दौरान कोर्ट के मामले पक्ष में आ सकते हैं। आप अपनी नौकरी के साथ-साथ कोई दूसरा काम भी करेंगे।
तुला राशि
तुला राशि वालों के विवाह की बात बन सकती हैं। कार्यक्षेत्र में नए-नए तरह के अवसरों की प्राप्ति होने से प्रभाव बढ़ेगा। इस समय आप सोना-चांदी या वाहन खरीदने का सपना अपना पूरा करेंगे। विदेश यात्रा या विदेश व्यापार संबंधी योजनाओं में सफलता मिलने की संभावना बन रही है।
वृश्चिक राशि
आपके लिए समय कई उम्मीदें और सकारात्मक बदलाव लेकर आ सकता है। रिश्तों में बदलाव आपके तनाव को कम करेंगे और विश्वास और बढ़ेगा। विवाह के अच्छे प्रस्ताव आ सकते हैं। संतान सुख की प्राप्ति होगी। अच्छा आर्थिक लाभ मिलेगा।</description><guid>2265</guid><pubDate>09-Oct-2025 8:18:07 am</pubDate></item><item><title> भगवान विष्णु को प्रिय है कार्तिक मास</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2263</link><description>कार्तिक मास में जो कार्तिक के नियमों का पालन करता है, वो भगवान विष्णु की कृपा पाता है। कार्तिकके महीने में मोन-व्रत का पालन करना चाहिए। इस महीने में कई नियमों का पालन होता है, जैसे तिल से मिले हुए जल में स्नान, धरत पर सोना, ऐसा करने वालों के युग-युग के पापों का नाश कर डालता है। जो कार्तिक मासमें भगवान् विष्णुके सामने जागरण करता है, उसे सहस्त्र गोदानों का फल मिलता है। इस महीने में दिवाली, धनतेरस, करवा चौथ, आदि पर्व और त्योहार आते हैं।
08 अक्टूबर 2025 : कार्तिक मास का प्रारंभ।
10 अक्टूबर शुक्रवार: करवा चौथ, वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी।
13 अक्टूबर सोमवार: अहोई अष्टमी (अहोई अष्टमी), कालाष्टमी।
17 अक्टूबर शुक्रवार: रमा एकादशी, गोवत्स द्वादशी, सूर्य तुला संक्रांति।
18 अक्टूबर शनिवार: धनतेरस (धन त्रयोदशी), यम दीपदान, प्रदोष व्रत
19 अक्टूबर रविवार: काली चौदस (रूप चतुर्दशी), नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)।
20 अक्टूबर सोमवार: दीपावली (लक्ष्मी-कुबेर पूजन), नरक चतुर्दशी (उदया तिथि), कार्तिक अमावस्या।
21 अक्टूबर मंगलवार: स्नान-दान कार्तिक अमावस्या।
22 अक्टूबर बुधवार: गोवर्धन पूजा, अन्नकूट।
23 अक्टूबर गुरुवार: भाई दूज (यम द्वितीया), चित्रगुप्त पूजा।
25 अक्टूबर शनिवार: छठ पूजा का प्रारंभ (नहाय खाय), विनायक चतुर्थी।
26 अक्टूबर रविवार: छठ पूजा (खरना) पंचमी।
27 अक्टूबर सोमवार: छठ पूजा (संध्या अर्घ्य) षष्ठी।
28 अक्टूबर मंगलवार: छठ पूजा (उषा अर्घ्य) सप्तमी।
30 अक्टूबर गुरुवार: गोपाष्टमी पर्व।
31 अक्टूबर शुक्रवार: आंवला नवमी (अक्षय नवमी)।
02 नवंबर रविवार: देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी)।
03 नवंबर सोमवार: तुलसी विवाह, सोम प्रदोष व्रत।
05 नवंबर 2025 बुधवार: कार्तिक पूर्णिमा (देव दिवाली), गुरु नानक जयंती।
</description><guid>2263</guid><pubDate>08-Oct-2025 9:16:32 am</pubDate></item><item><title> कार्तिक स्नान क्या होता है और इसमें क्या करना चाहिए, तुलसी की पूजा कैसे करें</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2262</link><description>कार्तिक मास कल से शुरू होने वाला है। इस मास में मां तुलसी और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि इस महीने में विष्णु भगवान जल में निवास करते हैं। इस महीने में तुलसी और जो मनुष्य कार्तिक में आंवले की जड़ में भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, उसके सभी कष्ट का निवारण श्री विष्णु करते हैं। है। जैसे भगवान् विष्णुकी महिमाका पूरा-पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता है, उसी प्रकार आंवले और तुलसी के माहात्म्य का भी वर्णन नहीं हो सकता | जो आंवले और तुलसी की उत्पत्ति-कथा को भक्तिपूर्वक सुनता वो मोक्ष को पाता है। जो लोग कार्तिक मास में तुलसी का वृक्ष लगाते हैं, वे कभी यमराजको नहीं देखते। कार्तिक स्नान क्या होता है और इसमें क्या करना चाहिए, यहां पढ़ें सब कुछ
कार्तिक स्नान में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, वो भगवान विष्णु की कृपा पाता है। इसकी बाद तुलसी के पास दीपक जलाकर कार्तिक स्नान की कथा सुनी जाती है। पद्म पुराण में लिखा है कि पुष्कर आदि तीर्थ, गंगा आदि नदियां तथा वासुदेव आदि देवता--ये सभी तुलसीदल में निवास करते हैं। जो मनुष्य तुलसीकाष्ठ का चन्दन लगाता है, उसके शरीरको पाप नहीं लगता है।
कार्तिक मास के दौरान सात्विक आहार और संयम का खास महत्व है। इस दौरान तामसिक चीजों को ग्रहण नहीं किया जाता है। इस समय प्याज, लहसुन, मांस और मद्यपान का पूर्ण त्याग कर फल, दूध और सादा आहार लेने का विधान है।मां तुलसी की विशेष अराधना करनी चाहिए। सुबह-शाम तुलसी के सामने दीपक जलाना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि इस मास में तुलसी का एक दीप कई दीप के बराबर माना जाता है।
</description><guid>2262</guid><pubDate>08-Oct-2025 9:14:58 am</pubDate></item><item><title> दिवाली से पहले पेंट कराने वाले हैं घर, तो वास्तु के अनुसार चुनें शुभ रंग</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2261</link><description>वास्तु शास्त्र में उत्तर दिशा को धन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, जो कुबेर और जल तत्व से संबंधित है। इस दिशा की दीवारों के लिए हल्का हरा, नीला या सफेद रंग शुभ है। ये रंग सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करते हैं और आर्थिक प्रगति में मदद करते हैं। गहरे रंगों से बचें, क्योंकि वे ऊर्जा को बाधित कर सकते हैं।
पूर्व दिशा के लिए रंग
पूर्व दिशा सूर्य और स्वास्थ्य से जुड़ी है। वास्तु के अनुसार, इस दिशा में हल्का पीला, क्रीम या सफेद रंग का उपयोग करें। ये रंग सकारात्मकता, ऊर्जा और स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं। विशेष रूप से, दीपावली के समय पीले रंग का उपयोग सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। गहरे लाल या काले रंगों से बचें।
दक्षिण दिशा के लिए रंग
दक्षिण दिशा मंगल ग्रह और शक्ति से संबंधित है। वास्तु के अनुसार, इस दिशा में हल्का लाल, गुलाबी या कोरल रंग शुभ है। ये रंग ऊर्जा और स्थिरता लाते हैं। हालांकि, बहुत गहरे लाल रंग से बचें, क्योंकि यह आक्रामकता को बढ़ा सकता है। दीपावली से पहले इस दिशा को संतुलित रंगों से सजाएं।
पश्चिम दिशा के लिए रंग
पश्चिम दिशा शनि और वरुण से जुड़ी है, जो शांति और रचनात्मकता का प्रतीक है। इस दिशा के लिए हल्का नीला, ग्रे या सफेद रंग उपयुक्त है। ये रंग मानसिक शांति और रचनात्मकता को बढ़ाते हैं। दीपावली के समय इन रंगों का उपयोग परिवार में सौहार्द और शांति लाता है। गहरे काले रंग से बचें।
पूजा कक्ष के लिए रंग
वास्तु शास्त्र में पूजा कक्ष उत्तर-पूर्व दिशा में होना चाहिए। इसकी दीवारों के लिए सफेद, हल्का पीला या हल्का नारंगी रंग शुभ है। ये रंग आध्यात्मिक ऊर्जा और शुद्धता को बढ़ाते हैं। दीपावली पर पूजा कक्ष को इन रंगों से सजाने से लक्ष्मी-गणेश की कृपा प्राप्त होती है। गहरे या चटकीले रंगों से बचें, क्योंकि वे ध्यान भटका सकते हैं।
वास्तु टिप्स और सावधानियां
रंगों को दिशा के अनुसार चुनें। हल्के और सौम्य रंगों को प्राथमिकता दें। गहरे काले, भूरे या बहुत चटकीले रंगों से बचें। दीपावली से पहले घर को साफ करें और फिर पेंट करें। रंगाई से पहले वास्तु विशेषज्ञ से सलाह लें। ये उपाय घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि लाते हैं।
शुभ रंगों से सजाएं घर
वास्तु शास्त्र के अनुसार, दिवाली से पहले घर को शुभ रंगों से पेंट करना सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि को आकर्षित करता है। उत्तर में हरा, पूर्व में पीला, दक्षिण में गुलाबी और पश्चिम में नीला रंग चुनें। पूजा कक्ष में हल्के रंगों का उपयोग करें। सही रंगों का चयन कर घर को दीपावली के लिए सजाएं और सुख-शांति का स्वागत करें।
</description><guid>2261</guid><pubDate>08-Oct-2025 9:11:16 am</pubDate></item><item><title> शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए करें ये खास उपाय</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2260</link><description>शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म में एक बहुत ही पवित्र और शुभ रात मानी जाती है। इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी धरती पर आती हैं और भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। इस पवित्र रात में चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों से अमृत बरसता है। इस साल शरद पूर्णिमा 6 अक्टूबर को है। शरद पूर्णिमा की रात को खीर बनाने और चंद्रमा की रोशनी में रखने का खास महत्व है। कहा जाता है कि ऐसा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है और मां लक्ष्मी की कृपा मिलती है। इसके अलावा इस रात कुछ और उपाय भी किए जा सकते हैं, जो घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली लाते हैं।
शरद पूर्णिमा पर करें ये उपाय:
चंद्रमा को अर्घ्य दें: एक लोटे में पानी भरें, उसमें चावल और फूल डालकर चंद्रमा की ओर मुख करके अर्पित करें। ऐसा करने से चंद्र देव की कृपा मिलती है और घर में शांति व धन का वास होता है।
खीर का महत्व: खीर बनाकर रात में खुले आसमान के नीचे रखें, preferably मिट्टी के बर्तन में। इससे अच्छी सेहत और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद मिलता है।
मंत्र जप: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रिभुवन महालक्ष्म्यै अस्मांक दारिद्र्य नाशय प्रचुर धन देहि देहि क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ का 108 बार जाप करें। इससे धन-संपत्ति और समृद्धि बढ़ती है।
घी का दीपक जलाएं: तुलसी के पौधे के पास शुद्ध घी का दीपक जलाएं और तुलसी माता को प्रणाम करें। इससे घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
पूजा सामग्री: धान की बाली, ईख, नारियल और ताड़ के फल से बने खूजा का उपयोग पूजन में करें। यह पूजा अधिक प्रभावी होती है।
जागरण करें: रातभर जागरण करें और मां लक्ष्मी की पूजा करें। इससे मां लक्ष्मी की विशेष कृपा करती हैं और घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।</description><guid>2260</guid><pubDate>05-Oct-2025 2:14:22 pm</pubDate></item><item><title>शरद पूर्णिमा पर कैसे करें मां लक्ष्मी का पूजन, कल होगी अमृतवर्षा</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2259</link><description>सोमवार को शरद पूर्णिमा के अवसर पर मां कोजागरी लक्ष्मी व लक्खी पूजा होगी। पारंपरिक रीति रिवाज के अनुसार पूजा व अनुष्ठान किया जाता है। विवाहित स्त्रियां जहां परिवार की सुख-समृद्धि और उन्नति के लिए व्रत रखती हैं। पंडित के अनुसार 6 अक्टूबर की रात घी का दीपक जलाकर महालक्ष्मी का पूजन करने का विधान है। इस दिन लक्ष्मी घर घर घूमती है। और रात्रि जागरण कर पूजन करने वाले को सुख समृद्धि प्रदान करती हैं। शरद पूर्णिमा की अमृतोमय चांदनी से सिक्त खीर दूसरे दिन प्रात: प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने से धन ऐश्वर्य और बल में वृद्धि होती है।
इस दिन 100 दीपक जलाने का विधान है। पश्चिम बंगाल से सटे इलाकों के हर गांव व घर में होती है पूजा बोकारो से सटे पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे क्षेत्र में सोमवार हर गांव और प्रत्येक घर में मां लक्खी की पूजा होगी। मंदिरों में विधि-विधान से मां की मूर्ति स्थापित की जाएगी। जिनके बाद ग्रामीण इस दौरान विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम कर सारी रात मां की आराधना में विलिन रहते हैं। चंदनकियारी, कसमार, चास सहित कई स्थानों में शरद पूर्णिमा पर मां की मूर्ति स्थापित कर मां का पूजन विधि पूर्वक किया जाता है। चंदनकियारी में हर दशकों से बांग्ला यात्रा का आयोजन होता है, जिसमें लोग मां की आराधना करने के पश्चात बांग्ला यात्रा देख रातजग्गा करते हैं।
कैसे करें कोजागिरी पूर्णिमा पूजा
कोजागिरी पूर्णिमा के संध्या समय में स्नान करने के पश्चात स्वर्ण, रजत अथवा मिट्टी के कलश स्थापित कर मां लक्ष्मी की स्वर्णमयी प्रतिमा लाल वस्त्र में लपेटकर कलश के ऊपर स्थापित कर उसकी उपलब्ध सामग्रियों से पूजा करनी चाहिए रात्रि में भजन, कीर्तन और जागरण निश्चित रूप से करनी चाहिए। चंदनकियारी में यात्रा का आयोजन लक्खी पूजा के अवसर पर हर बार की तरह इस बार भी चंदनकियारी में कोलकाता के प्रसिद्ध यात्रा का आयोजन किया जाएगा। इस बाबत पंडित ने जानकारी देते हुए बताया कि चंदनकियारी में इस बार नीलाम होलो सिथेर सिंदूर बांग्ला यात्रा का आयोजन किया जाएगा। जिसमें पश्चिम बंगाल के पसिद्ध कलाकार यात्रा में भाग लेंगे। इस दौरान भारी संख्या में आम लोगों की भीड़ उमड़ने की संभावना है। पूरे देश में मनाया जाता है
त्योहार : उड़िया मान्यता के अनुसार शरण पूर्णिमा के दिन भगवान शिव के पराक्रमी पुत्र कुमार कार्तिकेय का जन्म हुआ था। इसलिए ओड़िशा में इसे कुमार पूर्णिमा कहते हैं। गुजराती समुदाय के लोग आज शरद पूनम मनाते हैं।
मराठी समुदाय में शरद पूर्णिमा को परिवार के जेष्ठ संतान को सम्मानित करने की परंपरा है। बंगाली समुदाय के लोग शरद पूर्णिमा को हर्षोल्लास के साथ मां लक्खी की पूजा करते हैं, जिसे कोजोगोरी लक्खी पूजा कहा जाता है। लोग रातभर जागकर समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं।</description><guid>2259</guid><pubDate>05-Oct-2025 2:12:54 pm</pubDate></item><item><title>शरद पूर्णिमा..... इस एक गलती से रुष्ट हो सकती हैं मां लक्ष्मी, बढ़ेगी कंगाली</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2258</link><description>शरद पूर्णिमा का त्योहार 6 अक्टूबर को मनाया जाएगा. ऐसी मान्यताएं हैं कि इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है और मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक पर भ्रमण करती हैं. ज्योतिषविद ऐसा मानते हैं कि शरद पूर्णिमा के दिन कुछ खास बातों का विशेष ख्याल रखना चाहिए. इस दिन एक छोटी सी गलती आपको आर्थिक मोर्चे पर कंगाल बना सकती है. आइए जानते हैं कि ये गलतियां कौन सी हैं.
1. दूध, चीनी और चावल का उधार
शरद पूर्णिमा की रात चांद की रोशनी में खीर रखकर खाने की परंपरा है. कहते हैं कि इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है. इसलिए इसकी छाया में रखी खीर खाने से इंसान का भाग्योदय होता है. खीर दूध, चीनी और चावल से मिलकर बनती है और ज्योतिष में इन तीनों चीजों को चंद्रमा से जोड़कर देखा जाता है. इसलिए कहते हैं कि शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाने के लिए इसकी सामग्री को किसी से उधार नहीं लेना चाहिए. इन्हें अपनी मेहनत की कमाई से खरीदकर ही खीर बनाएं और मां लक्ष्मी को भोग लगाएं.
2. भोजन का अपमान
इंसान के घर में अन्न-धन का अंबार लगाने वाली मां अन्नपूर्णा और मां लक्ष्मी जब तक कृपा बरसाती हैं, तब तक आदमी का जीवन खुशियों से भरा रहता है. लेकिन एक बार देवी नाराज हुईं तो दुख-कष्ट पीछा नहीं छोड़ते हैं. कहते हैं कि अन्न का अपमान करने से मां लक्ष्मी और अन्नपूर्णा नाराज होती हैं. शरद पूर्णिमा के दिन भूलकर भी घर में यह गलती न करें.
3. सूर्यास्त के बाद धन का लेन-देन
ज्योतिषविद कहते हैं कि शरद पूर्णिमा के शुभ अवसर पर शाम को सूर्यास्त के समय पैसों का लेन-देन करने की भूल न करें. इस एक गलती से भी मां लक्ष्मी रुष्ट हो सकती हैं. सूर्यास्त के बाद न तो किसी से पैसा उधार लें और न ही किसी को पैसा दें. यदि इस दिन धन का लेन-देन करना आवश्यक है तो इस काम को शाम होने से पहले ही निपटा लें
4. मुख्य द्वार पर गंदगी
मां लक्ष्मी को साफ-सफाई अत्यंत प्रिय है. इसलिए शरद पूर्णिमा के दिन घर में बिल्कुल गंदगी न करें. खासतौर से मुख्य द्वार और उत्तर दिशा में तो साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें. अन्यथा मां लक्ष्मी घर में वास नहीं करेंगी. एक बात का और ख्याल रखें कि इस दिन शाम होने के बाद घर में झाड़ू न लगाएं. घर की साफ-सफाई से जुड़े कार्य दोपहर तक निपटा लें.</description><guid>2258</guid><pubDate>05-Oct-2025 2:10:17 pm</pubDate></item><item><title> शरद पूर्णिमा के दिन पृथ्वी पर आती हैं मां लक्ष्मी, मुख्य द्वार पर जरूर करें ये एक काम</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2257</link><description>6 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाएगा. मान्यता है कि इस रात चंद्रमा धरती के सबसे निकट होता है. शरद पूर्णिमा के व्रत की भी विशेष महिमा बताई गई है. कहते हैं कि इसी दिन धन की देवी मां लक्ष्मी का अवतरण हुआ था. ऐसा विश्वास है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है.
नारद पुराण के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी उल्लू पर सवार होकर पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं. इसलिए इस दिन माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है. कहा जाता है कि इस दिन लक्ष्मी जी अपने श्रद्धालुओं को धन, वैभव, यश और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं. इसलिए घर के मुख्य द्वार पर दीप जलाकर देवी का स्वागत करना चाहिए.
शरद पूर्णिमा की रात होती है बेहद खास
शास्त्रों के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात ही भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में राधा और गोपियों संग अद्भुत महारास का आयोजन किया था. कहा जाता है कि इस दिन भगवान कृष्ण ने गोपियों संग नृत्य करने के लिए अनेक रूप प्रकट किए थे. यह दिव्य रासलीला केवल नृत्य नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और आनंद का अद्वितीय प्रतीक भी मानी जाती है.
मां लक्ष्मी का अवतरण
शरद पूर्णिमा की रात ही समुद्र मंथन के समय माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं. यही कारण है कि शरद पूर्णिमा का दिन लक्ष्मी पूजन के लिए बेहद खास माना जाता है. कई जगहों पर इस दिन कुंवारी कन्याएं सूर्य और चंद्र देव की पूजा करती हैं. और उनसे आशीर्वाद लेती हैं.
क्यों खुले आसमान के नीचे रखी जाती है खीर?
शरद पूर्णिमा के दिन आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा है. कहते हैं कि इस रात चंद्रमा की रोशनी से अमृत वर्षा होती है. इस खीर को खाने से अच्छी सेहत का वरदान और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद भी मिलता है. इसलिए लोग शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की छाया में खीर रखते हैं और फिर उसे अगले दिन सुबह खाते हैं. कहते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात चांद की रोशनी में रखी खीर खाने से इंसान का भाग्योदय होता है और परिवार को रोग-बीमारियों से मुक्ति मिलती है.</description><guid>2257</guid><pubDate>05-Oct-2025 2:09:52 pm</pubDate></item><item><title> शरद पूर्णिमा के साथ नया सप्ताह होगा शुरू, 3 राशियों पर बरसेगा पैसा</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2256</link><description>अक्टूबर माह का नया सप्ताह शुरू होने वाला है. यह सप्ताह 6 अक्टूबर से लेकर 12 अक्टूबर तक रहेगा. खास बात यह है कि इस सप्ताह की शुरुआत शरद पूर्णिमा से हो रही है. शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है और इस दिन मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक पर भ्रमण भी करती हैं. ज्योतिषविदों का कहना है कि यह दुर्लभ संयोग तीन राशि के जातकों को शुभ परिणाम दे सकता है. आइए इन लकी राशियों के बारे में जानते हैं.
मिथुन राशि- आपके रुके हुए काम पूरे होंगे. धन लाभ होगा. कहीं से उधार दिया हुआ या फंसा हुआ पैसा वापस मिल सकता है. करियर की समस्याएं हल हो सकती हैं. पारिवारिक समस्याएं हल होंगी. स्वास्थ्य बेहतर होता जाएगा. घर में जिन बुजुर्गों की सेहत खराब चल रही थी, उसमें सुधार आने वाला है. धार्मिक कार्यों में व्यस्तता रहेगी. परिवार में खुशहाली आएगी. शिवजी को जल अर्पित करें.
तुला राशि- अचानक धन लाभ के योग बनते दिख रहे हैं. आपका कोई महत्वपूर्ण काम बन जाएगा. मानसिक तनाव कम होगा. घर-परिवार में चल रही कोई बड़ी चिंता दूर हो सकती है. ऑफिस की समस्या हल हो सकती है. कार्यस्थल पर आपके काम से लोग प्रसन्न रहेंगे. छोटी यात्रा हो सकती है. परिवार संग किसी धार्मिक स्थल पर दर्शन के लिए जा सकते हैं. स्वास्थ्य में सुधार होगा. शिवजी को जल अर्पित करें.
कुंभ राशि- धन लाभ के उत्तम योग बनने वाले हैं. आय के स्रोतों में वृद्धि होगी. गुप्त स्रोतों से धन की प्राप्ति हो सकती है. करियर में सफलता मिलेगी. क्रिएटिव फील्ड में कार्यरत लोगों को विशेष लाभ मिल सकता है. आपके लंबे समय से रुके हुए काम अब पूरे होंगे. करियर की रुकावट दूर होगी. प्रमोशन-इन्क्रीमेंट की प्रबल संभावनाएं बन रही हैं. स्वास्थ्य अच्छा रहेगा.
उपाय
इस बार शरद पूर्णिमा सोमवार के दिन पड़ रही है. यह वार भगवान शिव को समर्पित है. ऐसे में शरद पूर्णिमा और सोमवार के संयोग में भगवान शिव को प्रसन्न करने से बहुत लाभ मिल सकता है. इस दिन सुबह स्नानादि के बाद शिवलिंग का जलाभिषेक करें. शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाएं. फिर महादेव के मंत्रों का जप करें. यह एक उपाय आपके जीवन की दिशा-दशा बदल सकता है.</description><guid>2256</guid><pubDate>05-Oct-2025 2:09:27 pm</pubDate></item><item><title> 2 अक्टूबर को मनाया जाएगा दशहरा, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, महत्व और उपाय</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2255</link><description>साल 2025 में दशहरा या विजयादशमी 2 अक्टूबर, गुरुवार को है। हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर माता सीता को मुक्त कराया था। यह त्योहार पूरे भारत में अलग-अलग रूपों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध करके राक्षसों से पृथ्वी को मुक्त किया था। इसलिए, दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। कहीं रावण दहन होता है तो कहीं देवी दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन।
तिथि और शुभ मुहूर्त-
दशमी तिथि: 1 अक्टूबर 2025 की शाम 7:01 बजे से 2 अक्टूबर 2025 की शाम 7:10 बजे तक।
विजय मुहूर्त: 2 अक्टूबर को 2:09 PM से 2:56 PM तक।
अपराह्न पूजा मुहूर्त: 1:21 PM से 3:44 PM तक।
रावण दहन का समय: सूर्यास्त के बाद, लगभग 6:05 बजे के बाद।
पूजा विधि:
सुबह-सुबह उठकर स्नान करें, साफ वस्त्र पहनें।
घर के मंदिर या पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। यह भी माना जाता है कि घर के दरवाजे पर हल्दी या लाल रंग से स्वस्तिक बनाने से शुभता बढ़ती है।
दुर्गा प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और धूप-अगरबत्ती लगाएं।
सिंदूर, अक्षत (चावल), लाल पुष्प, नारियल, मिठाई और मौसमी फल रखें। देवी को लाल चुनरी अर्पित करना भी शुभ माना जाता है।
दशहरा पर शस्त्र, औजार, किताबें और वाहन की पूजा करना परंपरा है। यह विजय और सफलता का प्रतीक माना जाता है।
आरती और मंत्रोच्चारण- दुर्गा चालीसा, रामरक्षा स्तोत्र या दुर्गा मंत्र का पाठ करें। अंत में आरती करें और परिवार के सभी सदस्य आरती में शामिल हों।
रावण दहन- शाम को रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण की पुतलियों का दहन करना अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।
महत्व- दशहरा को विजयादशमी कहा जाता है। विजय यानी जीत और दशमी यानी दसवां दिन। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि चाहे बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंततः अच्छाई की ही जीत होती है। इस दिन को लेकर कई मान्यताएं हैं। कई लोग इस दिन शमी वृक्ष की पूजा करते हैं और उसके पत्तों को सोना मानकर एक-दूसरे को भेंट करते हैं। व्यवसायी वर्ग इस दिन अपने पुराने खातों को बंद कर नए खातों की शुरुआत करते हैं। विद्यार्थी अपनी किताबों और पेन की पूजा करते हैं, ताकि ज्ञान और सफलता बनी रहे। दक्षिण भारत में इसे आयुध पूजा कहा जाता है।
उपाय
नए कार्य का आरंभ: विजय मुहूर्त में नया व्यवसाय, नौकरी या निवेश शुरू करने से सफलता मिलती है।
दान-पुण्य: जरूरतमंदों को अन्न, कपड़े, मिठाई या धन दान करने से पुण्य मिलता है।
मां दुर्गा की आराधना: इस दिन मां दुर्गा को लाल पुष्प अर्पित करना और दुर्गा मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।
शमी पत्तों का आदान-प्रदान: रिश्तों में मजबूती के लिए लोग शमी पत्तों को सोना मानकर आदान-प्रदान करते हैं।
रावण दहन की परंपरा
रावण दहन केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रतीक है अहंकार, लोभ और अन्य बुराइयों को जलाने का। बड़े-बड़े मैदानों में पुतले बनाए जाते हैं, जहां हजारों लोग इकट्ठा होकर आतिशबाजी के बीच रावण दहन देखते हैं। यह दृश्य बच्चों और बड़ों, दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र होता है।</description><guid>2255</guid><pubDate>01-Oct-2025 1:52:13 pm</pubDate></item><item><title> दशहरा पर कर लीजिए इनमें से कोई 1 काम, पूरे साल पाएंगे लाभ और उन्नति</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2254</link><description>नवरात्रि के 9 दिन पूरे होने के बाद अगले दिन यानी दशमी तिथि पर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करने के बाद उनकी विदाई की जाती है। दशहरा को विजयदशमी के नाम से भी जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार, दशहरा का दिन बेहद शुभ होता है और इस तिथि पर दसों दिशाएं खुली रहती हैं। ऐसे में इस दिन किया गया कोई नया काम, पूजा और उपाय जातक को कई गुना फल दिला सकते हैं। ऐसे में 2 अक्टूबर, गुरुवार को दशहरा के दिन कुछ खास और आसान उपाय किए जा सकते हैं। इनमें से एक भी कर लेने से व्यक्ति को पूरे साल लाभ प्राप्त हो सकता है। साथ ही, जीवन में उन्नति प्राप्त होती है।
आर्थिक समस्याओं से राहत पाने का उपाय
दशहरा के दिन एक छोटा सा उपाय करने से आपको आर्थिक समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है। इसके लिए दशहरा के दिन अपने पास के किसी मंदिर में जाकर झाड़ू का दान करें। ऐसा करने से जातक को धन की तंगी से निजात मिल सकती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। साथ ही, इस उपाय से घर की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होने लगती है। इस उपाय को शाम के समय करना सबसे उत्तम माना जाता है और झाड़ू दान करते समय मन में देवी लक्ष्मी का ध्यान करें।
धन-धान्य में वृद्धि का उपाय
इसके लिए दशहरा के दिन शाम के समय भगवान गणेश और लक्ष्मी मां की विधि-विधान से पूजा करें। इस दौरान उन्हें एक नारियल भी जरूर अर्पित करें। इसके बाद, नारियल को अपनी तिजोरी में रख दें और रात के समय नारियल को लेजाकर किसी राम मंदिर में चढ़ाकर आ जाएं। मंदिर में प्रभु श्रीराम से जीवन में सुख-समृद्धि और धन-धान्य में वृद्धि का कामना करें। इस उपाय को करने से जातक को बेहद शुभ फल की प्राप्ति होती है और घर से दरिद्रता दूर हो सकती है।
इस एक उपाय से पुण्य फल होगा प्राप्त
दशहरा के मौके पर प्रभु श्रीराम की आराधना करने का खास महत्व होता है। ऐसा करने के बाद एक लाल रंग के कलम से कम से कम 108 बार राम नाम लिखना चाहिए। इस उपाय को करने श्रद्धापूर्वक करने से जातक को भगवान राम की कृपा प्राप्त हो सकती है और आंतरिक शांति का अनुभव होता है। दशहरा पर श्रीराम से जुड़े इस उपाय से आपको बेहद पुण्य फल प्राप्त हो सकता है।
जीवन में उन्नति प्राप्त करने का उपाय
दशहरा के अवसर पर आप नारियल से जुड़ा एक विशेष उपाय कर सकते हैं। इसके लिए एक नारियल को पीले रंग के साफ वस्त्र में लपेट दें और उसे लेजाकर राम मंदिर में चढ़ा दें। इस उपाय को करने से आपके कार्यों में आ रही बाधाएं दूर हो सकती हैं। साथ ही, जीवन में तरक्की और उन्नति प्राप्त होने लगती है। नारियल का यह उपाय आपको करियर और नौकरी में भी सफलता के मार्ग पर लेकर जा सकता है।
इस उपाय से प्रभु श्रीराम और बजरंगबली की कृपा होगी प्राप्त
मान्यता है कि दशहरा के दिन सुंदरकांड का पाठ करना बेहद शुभ होता है। ऐसा करने से व्यक्ति को भगवान राम, बजरंगबली और जानकीजी की आराधना करने के समान फल प्राप्त होता है। इस दिन पूजा-पाठ करने के साथ-साथ नई चीजें जैसे- वाहन, घर आदि खरीदना भी शुभ माना जाता है। साथ ही, आप दशहरा पर किसी नए काम की शुरुआत कर सकते हैं। इससे जीवन में तरक्की प्राप्त होती है।
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</description><guid>2254</guid><pubDate>01-Oct-2025 1:42:55 pm</pubDate></item><item><title> दशहरा के दिन करें ये 3 नींबू उपाय, दूर होगी नकारात्मकता और बढ़ेगा धन</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2253</link><description>दशहरा का पर्व हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है और इसे बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है. इस दिन सिर्फ रावण दहन नहीं होता, बल्कि जीवन में शुभता और सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए कई पारंपरिक उपाय भी किए जाते हैं. मान्यता है कि दशहरा के दिन किए गए उपाय खास प्रभाव रखते हैं और घर-परिवार में खुशहाली और समृद्धि ला सकते हैं. खासकर नींबू का प्रयोग, जो सदियों से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और धन की वृद्धि के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है, अगर आप इस दशहरा अपने घर में सुख-शांति और धन के अवसर लाना चाहती हैं, तो कुछ आसान लेकिन असरदार उपाय हैं जिन्हें आप आजमा सकती हैं. यहां हमें भोपाल निवासी एक ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित बताने जा रहे हैं तीन ऐसे नींबू के रहस्यमयी उपाय जो आपके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं और घर में लक्ष्मी के वास को मजबूत कर सकते हैं.
1. घर के मुख्य द्वार पर नींबू-मिर्च की माला लटकाएं
दशहरा के दिन घर के मुख्य द्वार पर नींबू और हरी मिर्च की माला लटकाना एक पुरानी परंपरा है. ऐसा माना जाता है कि इससे कोई भी बुरी नजर या नकारात्मक ऊर्जा घर के भीतर प्रवेश नहीं कर सकती. इस उपाय को करने के लिए आप सुबह जल्दी उठकर नींबू और मिर्च की माला तैयार करें और अपने मुख्य दरवाजे पर लटका दें. इस उपाय का असर सिर्फ नकारात्मकता को दूर करना ही नहीं है, बल्कि यह धन को आकर्षित करने में भी मदद करता है. सदियों से यह तरीका परिवारों में अपनाया जाता रहा है और इसे आज भी कारगर माना जाता है, अगर आप इस उपाय को नियमित रूप से दशहरा के दिन करती हैं, तो आपके घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है.
2. नींबू के छिलकों से करें धन लाभ का उपाय
नींबू के छिलके भी धन लाभ और घर की सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने में मदद करते हैं. इसके लिए सबसे पहले नींबू को अच्छे से धोकर उसके छिलके अलग कर लें. अब इन छिलकों को एक बर्तन में रखें और उस पर हल्का सा हल्दी और अक्षत छिड़कें.
इन छिलकों को आप घर के मंदिर या पूजा स्थान में रखें, ऐसी जगह जहां किसी की नजर न पड़े. अगले दिन इन्हें किसी नदी में प्रवाहित कर दें या घर के बाहर किसी पेड़ के नीचे रख दें. यह उपाय घर की नकारात्मकता को दूर करता है और नए अवसर व धन के योग बनाने में सहायक होता है.
3. नींबू के छिलके का दीपक जलाएं
दशहरा से एक दिन पहले ही नींबू के छिलकों को धूप में सुखा लें. दशहरा की रात को इन छिलकों का दीपक जलाकर घर के मुख्य दरवाजे पर या बालकनी जैसे खुले स्थान पर रखें. यह न केवल घर की नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है, बल्कि घर में लक्ष्मी का वास भी बनाए रखता है.
यदि आप घर के मंदिर में भी नींबू के छिलके का दीपक जलाती हैं, तो यह उपाय घर की खुशहाली और समृद्धि को बढ़ाने में और भी मददगार साबित होता है. इसे नियमित रूप से अपनाने से आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और परिवार के सभी सदस्य खुशहाल रहते हैं.
</description><guid>2253</guid><pubDate>01-Oct-2025 1:40:30 pm</pubDate></item><item><title>नवरात्रि में जन्मे बच्चों पर होती है माता रानी का विशेष कृपा</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/religion.php?articleid=2252</link><description>हिंदू धर्म में नवरात्रि को अत्यंत पवित्र और पावन पर्व माना गया है। इन नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की आराधना की जाती है। इस दौरान भक्त सात्विक जीवन जीते हैं और वातावरण में भी एक विशेष शुद्धता बनी रहती है। शास्त्रों में कहा गया है कि नवरात्रि के समय जन्म लेने वाले लोग भी खास गुणों के धनी होते हैं। आइए जानते हैं कि इस अवधि में जन्मे लोगों का स्वभाव कैसा होता है और उनके जीवन कैसा होता है।
नवरात्रि में जन्मे लोगों का स्वभाव
नवरात्रि में जन्म लेने वाले बच्चे बहुत भाग्यशाली माने जाते हैं, क्योंकि इन पर मां दुर्गा की विशेष कृपा होती है। इनके स्वभाव में सकारात्मकता और विनम्रता झलकती है। सामाजिक जीवन में ये अपनी बातों से दूसरों को आकर्षित कर लेते हैं। हालांकि कभी-कभी ये एकांतप्रिय भी हो जाते हैं। ऐसे लोग सीमित मित्र बनाते हैं, लेकिन जिनसे जुड़ते हैं उनके लिए समर्पण भाव रखते हैं।
बौद्धिक क्षमता
नवरात्रि के दौरान जन्म लेने वालों की बुद्धि तेज होती है। वे नई चीजें जल्दी सीखने की सक्षमता रखते हैं। साथ ही कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखते हैं। शिक्षा और ज्ञान की ओर इनका विशेष झुकाव होता है, जिससे इन्हें पढ़ाई में सफलता और सम्मान दोनों मिलते हैं। अक्सर इनके जीवन में शैक्षणिक या बौद्धिक क्षेत्र से जुड़ी कोई न कोई उपलब्धि देखने को मिलती है।
भाग्य का साथ
ऐसे लोग भाग्यशाली माने जाते हैं। हालांकि इन्हें परिश्रम भी करना पड़ता है, लेकिन इनकी मेहनत अपेक्षाकृत जल्दी फल देती है। कई बार इनका भाग्योदय अचानक और अप्रत्याशित रूप से होता है। इनकी एक खासियत यह भी होती है कि ये कर्मशील रहते हैं, इसलिए इनका भाग्य खुद ही इनके प्रयासों का साथ देता है।
नवरात्रि में जन्मी कन्या
नवरात्रि के दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना होती है। मान्यता है कि इस अवधि में यदि किसी घर में कन्या जन्म ले, तो उसका आगमन सुख-समृद्धि का सूचक होता है। ऐसी कन्याएं जहां जाती हैं, वहां समृद्धि और शुभता का संचार होता है। ये कन्याएं प्रभावशाली व्यक्तित्व की धनी होती हैं और समाज में अपना अलग स्थान बना लेती हैं।</description><guid>2252</guid><pubDate>28-Sep-2025 3:30:23 pm</pubDate></item></channel></rss>