<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>आलेख - Chhattisgarh Aaj Feed</title><link>https://chhattisgarhaaj.com</link><description>Chhattisgarh Aaj Feed Description</description><item><title>विष्णु सरकार ने बढ़ाया किसानों का मान-खेती किसानी को मिला नया संबल</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=804</link><description>छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति परंपरा व आस्था से जुड़ा है हरेली तिहार
छगन लाल लोन्हारे
संयुक्त संचालक जनसंपर्क
रायपुर/प्रदेश सरकार किसानों के आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। गांव, गरीब और किसान सरकार की पहली प्राथमिकता में हैं। देश की जीडीपी में कृषि का बड़ा योगदान है, छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था का मूल आधार भी कृषि ही है और छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहलाता है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार की इन ढाई साल के अवधि में किसानों के हित में लिए गए नीतिगत फैसलों से खेती किसानी को नया संबल मिला है। बीते खरीफ विपणन वर्ष में किसानों से समर्थन मूल्य पर 141.05 लाख मीेट्रिक टन धान की खरीदी की गई है। छत्तीसगढ़ में हरेली त्यौहार का विशेष महत्व है। हरेली छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह त्यौहार परंपरागत् रूप से उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन किसान खेती-किसानी में उपयोग आने वाले कृषि यंत्रों की पूजा करते हैं और घरों में माटी पूजन होता है। गांव में बच्चे और युवा गेड़ी का आनंद लेते हैं। इस त्यौहार से छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोक पर्वों की महत्ता भी बढ़ गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में गेड़ी के बिना हरेली तिहार अधूरा है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार द्वारा पंजीकृत किसानों से समर्थन मूल्य पर प्रति एकड़ 21 क्विंटल 3100 रूपए प्रति क्विंटल की मान से धान खरीदीकर न सिर्फ किसानों को मान बढ़ाया, बल्कि किसानों को उन्नति की ओर ले जाने में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। साथ ही किसानों के खाते में रमन सरकार के पिछले दो वर्ष का बकाया धान के बोनस 3716.38 करोड़ रूपए अंतरित कर किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत कर दी है। मुख्यमंत्री का मानना है कि भारत गांवों में बसता है। जब किसान खुशहाल होंगे तो प्रदेश का व्यापार, उद्योग बढे़गा। 
 परंपरा के अनुसार वर्षों से छत्तीसगढ़ के गांव में अक्सर हरेली तिहार के पहले बढ़ई के घर में गेड़ी का ऑर्डर रहता था और बच्चों की जिद पर अभिभावक जैसे-तैसे गेड़ी भी बनाया करते थे। हरेली तिहार के दिन सुबह से तालाब के पनघट में किसान परिवार, बड़े बजुर्ग बच्चे सभी अपने गाय, बैल, बछड़े को नहलाते हैं और खेती-किसानी, औजार, हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती को साफ कर घर के आंगन में मुरूम बिछाकर पूजा के लिए सजाते हैं। माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं। कृषि औजारों को धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ के चीला का भोग लगाया जाता है। अपने-अपने घरों में अराध्य देवी-देवताओं की साथ पूजा करते हैं। गांवों के गुड़ी में ठाकुरदेव की पूजा की जाती है।
 हरेली पर्व के दिन पशुधन के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए औषधियुक्त आटे की लोंदी खिलाई जाती है। गांव में यादव समाज के लोग वनांचल जाकर कंदमूल लाकर हरेली के दिन किसानों को पशुओं के लिए वनौषधि उपलब्ध कराते हैं। गांव के सहाड़ादेव अथवा ठाकुरदेव के पास यादव समाज के लोग जंगल से लाई गई जड़ी-बूटी उबाल कर किसानों को देते हैं। इसके बदले किसानों द्वारा चावल, दाल आदि उपहार में यादवों को भेंट करने की परंपरा रही हैं।
 सावन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हरेली पर्व मनाया जाता है। हरेली का आशय हरियाली ही है। वर्षा ऋतु में धरती हरा चादर ओड़ लेती है। वातावरण चारों ओर हरा-भरा नजर आने लगता है। हरेली पर्व आते तक खरीफ फसल आदि की खेती-किसानी का कार्य लगभग हो जाता है। माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं। कृषि औजारों को धोकर, धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ का चीला भोग लगाया जाता है। गांव के ठाकुर देव की पूजा की जाती है और उनको नारियल अर्पण किया जाता है।
हरेली तिहार के साथ गेड़ी चढ़ने की परंपरा अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग सभी परिवारों द्वारा गेड़ी का निर्माण किया जाता है। परिवार के बच्चे और युवा गेड़ी का जमकर आनंद लेते है। गेड़ी बांस से बनाई जाती है। दो बांस में बराबर दूरी पर कील लगाई जाती है। एक और बांस के टुकड़ों को बीच से फाड़कर उन्हें दो भागों में बांटा जाता है। उसे नारियल रस्सी से बांध़कर दो पउआ बनाया जाता है। यह पउआ असल में पैर दान होता है जिसे लंबाई में पहले कांटे गए दो बांसों में लगाई गई कील के ऊपर बांध दिया जाता है। गेड़ी पर चलते समय रच-रच की ध्वनि निकलती हैं, जो वातावरण को औैर आनंददायक बना देती है। इसलिए किसान भाई इस दिन पशुधन आदि को नहला-धुला कर पूजा करते हैं। गेहूं आटे को गंूथ कर गोल-गोल बनाकर अरंडी या खम्हार पेड़ के पत्ते में लपेटकर गोधन को औषधि खिलाते हैं। ताकि गोधन को रोगों से बचाया जा सके। गांव में पौनी-पसारी जैसे राऊत, लोहार व बैगा हर घर के दरवाजे पर नीम की डाली खोंचते हैं। गांव में लोहार अनिष्ट की आशंका को दूर करने के लिए चौखट में कील लगाते हैं। यह परम्परा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यमान है।
 पिहले के दशक में गांव में बारिश के समय कीचड़ आदि हो जाता था उस समय गेड़ी से गली का भ्रमण करने का अपना अलग ही आनंद रहता था। गांव-गांव में गली कांक्रीटीकरण से अब कीचड़ की समस्या काफी हद तक दूर हो गई है। हरेली के दिन गृहणियां अपने चूल्हे-चौके में कई प्रकार के छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाती है। किसान अपने खेती-किसानी के उपयोग में आने वाले औजार नांगर, कोपर, दतारी, टंगिया, बसुला, कुदारी, सब्बल, गैती आदि की पूजा कर छत्तीसगढ़ी व्यंजन गुलगुल भजिया व गुड़हा चीला का भोग लगाते हैं। इसके अलावा गेड़ी की पूजा भी की जाती है। शाम को युवा वर्ग, बच्चे गांव के गली में नारियल फेंक और गांव के खेल मैदान में कबड्डी आदि कई तरह के खेल खेलते हैं। बहु-बेटियां नए वस्त्र धारण कर सावन झूला, बिल्लस, खो-खो, फुगड़ी आदि खेल का आनंद लेती हैं।
 हरेली तिहार सामाजिक समरसता का प्रतीक है यह केवल धार्मिक या कृषि पर्व नहीं है यह समाज के सभी वर्गों को एक साथ जोड़ने का माध्यम है। गांव के लोग मिल-जुलकर पूजा और कार्यक्रमों का आयोजन करते है। इस दिन परिवार में सुख-समृद्धि की कामना के साथ ही प्रकृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।</description><guid>804</guid><pubDate>10-Aug-2026 12:25:00 am</pubDate></item><item><title>सावन मनभावन आया प्रिय </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=803</link><description>- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
सावन मनभावन आया प्रिय, याद तुम्हारी आई है।
जग पुलकित हर्षित पर मेरी, देह-लता मुरझाई है ।।
ताल दे रहीं बूँदें छम-छम, मौन हुई मेरी पायल।
प्रेमी युगल प्रणय क्रीड़ा रत, देख हुआ अंतस् घायल।
छवि-दर्शन कर तस्वीरों में, आती मुझे रुलाई है ।।
सावन मनभावन आया प्रिय, याद तुम्हारी आई है।।
नेह-मेह आराधन करते, उमड़-घुमड़ गरजें बादल।
अश्रु-धार की झड़ी लगी है, बिखरा नैनों का काजल ।
खिल-खिल बेला इठलाती पर, मन को नहीं लुभाई है।।
सावन मनभावन आया प्रिय, याद तुम्हारी आई है।।
प्रेम-रंग में मन अनुरंजित, रंग नहीं देखे दूजा ।
शिव भक्तों पर करें अनुग्रह, करती हूँ मन से पूजा।
निविड़ निशा कारा पीड़ा की, दिवस लगे दुखदाई है।।
सावन मनभावन आया प्रिय, याद तुम्हारी आई है।।</description><guid>803</guid><pubDate>09-Aug-2026 3:02:36 pm</pubDate></item><item><title>ढाई साल की उपलब्धियाँ- छत्तीसगढ़ का श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में नई पहचान</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=802</link><description>श्रमिकों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण को सर्वाेच्च प्राथमिकता

 विशेष लेख :छगन लाल लोन्हारे , संयुक्त संचालक, जनसंपर्क
रायपुर । पिछले ढाई साल में श्रम विभाग ने गढ़ी सुरक्षा, सम्मान और समृद्धि की मिसाल। छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले ढाई वर्षों में श्रमिकों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए अनेक ऐतिहासिक पहल की हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने श्रमिक कल्याण को केवल योजनाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सुशासन, पारदर्शिता और तकनीकी नवाचार से जोड़ते हुए श्रमिकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का कार्य किया है। वहीं श्रम एवं उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन के मार्गदर्शन में विभाग ने श्रमिकों तक योजनाओं का लाभ तेज़ी और सरलता से पहुंचाने के लिए व्यापक सुधार किए हैं। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा श्रमिकों एवं उनके परिजनों की बेहतरी के लिए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही है, इन योजनाओ के माध्यम से श्रमिकों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है। राज्य में संगठित, असंगठित और निर्माण श्रमिकों के हितों के संरक्षण के लिए विभिन्न श्रम कल्याण मंडलों के माध्यम से 67 कल्याणकारी योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। श्रमिकों के पंजीयन, सहायता और योजनाओं के लाभ को अधिक पारदर्शी एवं सुगम बनाने के लिए श्रम विभाग ने नई यूजर-फ्रेंडली वेबसाइट
https://shramevjayate.cg.gov.in/
श्रमेव जयते मोबाइल एप विकसित किया है, जिससे श्रमिक अब ऑनलाइन आवेदन, पंजीयन और अन्य सुविधाओं का लाभ आसानी से प्राप्त कर रहे हैं।  ढाई वर्षों में श्रम विभाग ने प्रशासनिक व्यवस्था को भी मजबूत किया है। 5 नए जिलों (मोहला-मानपुर-अंबागढ़,चौकी, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, ,सारंगढ़-बिलाईगढ़, मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर एवं सक्ती) में श्रम अधिकारी कार्यालय की स्थापना हेतु 20 पदों का सृजन किया गया है। वर्तमान में 10 जिलों के सहायक श्रमायुक्त कार्यालय तथा 23 जिलों में श्रम पदाधिकारी कार्यालय संचालित है। इस प्रकार राज्य के सभी 33 जिलों में श्रम कार्यालयों का संचालन सुनिश्चित किया गया है। इसके साथ ही विभिन्न पदों पर नियुक्तियां कर विभागीय क्षमता को भी बढ़ाया गया है। उद्योगों और श्रमिकों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से श्रम कानूनों में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं। दुकानों एवं स्थापना अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन, फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट, महिला श्रमिकों के लिए रात्रिकालीन कार्य की सुविधा, फैक्ट्री लाइसेंस की अवधि बढ़ाने जैसे अनेक निर्णयों ने रोजगार सृजन के साथ श्रमिक अधिकारों को भी मजबूत किया है। श्रम विभाग की उपलब्धियों में सबसे उल्लेखनीय सफलता श्रमिक पंजीयन और हितलाभ वितरण रही है। 1 जनवरी 2024 से 30 जून 2026 के बीच लगभग 12.65 लाख नए श्रमिकों का पंजीयन किया गया। लगभग 17.82 लाख श्रमिकों को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लाभान्वित किया गया, जिन पर लगभग 800 करोड़ रुपये से अधिक की राशि व्यय की गई। निर्माण श्रमिकों को लगभग 780 करोड़ रुपये तथा असंगठित श्रमिकों को लगभग 187 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की गई। लाभ वितरण को पारदर्शी बनाने के लिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणाली लागू की गई है।
मुख्यमंत्री श्रम संसाधन केंद्रों की स्थापना श्रमिकों के लिए बड़ी राहत साबित हुई है। मुख्यमंत्री श्रमिक सहायता केंद्र 24 घंटे, सात दिन संचालित किया जा रहा है। संचालित राज्यभर में मोबाइल शिविर आयोजित कर लाखों श्रमिकों के पंजीयन, नवीनीकरण और आवेदन संबंधी समस्याओं का समाधान किया गया है। इससे दूरस्थ क्षेत्रों के श्रमिकों को भी सरकारी सेवाओं का लाभ घर के समीप मिल रहा है। राज्य सरकार ने श्रमिक परिवारों के सामाजिक सुरक्षा कवच को भी मजबूत किया है। मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक आवास सहायता योजना के तहत आवास सहायता राशि बढ़ाकर 1.50 लाख रुपये की गई है। मृत्यु एवं दिव्यांग सहायता, छात्रवृत्ति, श्रमिक परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा सहायता तथा अन्य योजनाओं के माध्यम से हजारों परिवारों को आर्थिक संबल मिला है।
महिला श्रमिकों के सम्मान और सुरक्षा की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य हुए हैं। मिनीमाता महतारी जतन योजना के अंतर्गत निर्माण एवं असंगठित क्षेत्र की 1.60 लाख से अधिक महिला श्रमिकों को मातृत्व सहायता प्रदान की गई। वहीं शहीद वीरनारायण सिंह श्रम अन्न योजना के माध्यम से पंजीकृत श्रमिकों को मात्र 5 रुपये में पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। श्रमिकों के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को ध्यान में रखते हुए मेधावी शिक्षा सहायता, निःशुल्क प्रतियोगी परीक्षा कोचिंग तथा छात्रवृत्ति योजनाओं का प्रभावी संचालन किया जा रहा है। हजारों विद्यार्थियों को इन योजनाओं का लाभ मिला है, जिससे श्रमिक परिवारों के सपनों को नई उड़ान मिल रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में श्रमिक कल्याण को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का जो संकल्प लिया गया है, उसे श्रम एवं उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन के नेतृत्व में श्रम विभाग प्रभावी रूप से जमीन पर उतार रहा है। पारदर्शी व्यवस्था, तकनीकी नवाचार, त्वरित सेवा, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक सम्मान की भावना ने छत्तीसगढ़ को श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में नई पहचान दी है। ढाई वर्षों की यह यात्रा केवल योजनाओं और आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि लाखों श्रमिक परिवारों के जीवन में आए विश्वास, सुरक्षा और समृद्धि की नई शुरुआत है।</description><guid>802</guid><pubDate>07-Aug-2026 8:36:58 pm</pubDate></item><item><title> जरूरतमंदो की संजीवनी बना छत्तीसगढ़ का समाज कल्याण मॉडल</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=801</link><description>-सामाजिक सुरक्षा से आत्मनिर्भरता की राह पर
आलेख- डॉ. दानेश्वरी सम्भाकर (उप संचालक )
रायपुर । भारत जब विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह स्पष्ट हो चुका है कि वास्तविक विकास वही है जिसमें समाज का कोई भी वर्ग पीछे न छूटे। सामाजिक सुरक्षा, सम्मानजनक जीवन, सुगम अवसर और आत्मनिर्भरताकृये चार स्तंभ किसी भी आधुनिक कल्याणकारी राज्य की पहचान होते हैं। छत्तीसगढ़ ने पिछले ढाई वर्षों में इन्हीं मूल्यों को केंद्र में रखकर समाज कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन प्रस्तुत किया है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और समाज कल्याण मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में राज्य ने दिव्यांगजन, वरिष्ठ नागरिक, विधवा एवं परित्यक्त महिलाओं, उभयलिंगी व्यक्तियों और अन्य जरूरतमंद वर्गों के लिए ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित की हैं, जिन्होंने सामाजिक न्याय को प्रशासनिक प्राथमिकता के रूप में स्थापित किया है। दिसंबर 2023 से जून 2026 के बीच की उपलब्धियाँ इस परिवर्तन की सशक्त तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।
राज्य की पेंशन योजनाएँ आज लाखों परिवारों के लिए आर्थिक संबल बन चुकी हैं। मुख्यमंत्री पेंशन योजना के लाभार्थियों की संख्या 7.10 लाख से बढ़कर 7.56 लाख हो गई है। वृद्धावस्था, विधवा, दिव्यांगजन, सामाजिक सुरक्षा और सुखद सहारा जैसी योजनाओं को मिलाकर 21.73 लाख से अधिक नागरिक नियमित सहायता प्राप्त कर रहे हैं।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता इसका डिजिटल सशक्तीकरण है। लगभग 96 प्रतिशत हितग्राहियों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से भुगतान किया जा रहा है और आधार सीडिंग का कार्य भी लगभग पूर्ण हो चुका है। ई-केवाईसी आधारित सत्यापन ने अपात्र प्रविष्टियों को हटाकर व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और विश्वसनीय बनाया है।
छत्तीसगढ़ ने दिव्यांगजन कल्याण को दान या सहायता की दृष्टि से नहीं, बल्कि अधिकार और समान अवसर के दृष्टिकोण से आगे बढ़ाया है। विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र (यूडीआईडी) धारकों की संख्या 2.44 लाख से बढ़कर 2.77 लाख हो गई है।कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण योजना में लाभार्थियों की संख्या 1,161 से बढ़कर 17,038 तक पहुँचना राज्य की सक्रिय पहुँच और प्रभावी क्रियान्वयन का प्रमाण है। सामर्थ्य विकास योजना के माध्यम से कौशल, पुनर्वास और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया गया है।
दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति योजनाओं का विस्तार विशेष रूप से उल्लेखनीय है। राज्य छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 14 हजार से अधिक हो गई है। इससे स्पष्ट है कि राज्य शिक्षा को दिव्यांगजन सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी माध्यम मान रहा है।फिजिकल रिफरल रिहैबिलिटेशन सेंटर, स्पेशल पाली क्लिनिक और विशेष विद्यालयों के विस्तार ने स्वास्थ्य, शिक्षा और पुनर्वास सेवाओं को एकीकृत स्वरूप प्रदान किया है।
बढ़ती वृद्धजन आबादी के बीच छत्तीसगढ़ ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए संवेदनशील सहायता तंत्र विकसित किया है। वृद्धाश्रमों, आश्रय गृहों और देखरेख संस्थाओं की क्षमता में वृद्धि के साथ-साथ सियान हेल्पलाइन (155326) को प्रभावी सहायता मंच के रूप में विकसित किया गया है।इस हेल्पलाइन पर प्राप्त कॉलों की संख्या 1.14 लाख से बढ़कर 2.87 लाख तक पहुँच गई है। यह केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि बुजुर्ग नागरिकों के बढ़ते विश्वास और प्रशासन की सक्रिय पहुँच का संकेत है।
समाज कल्याण विभाग ने नशामुक्ति को स्वास्थ्य और सामाजिक पुनर्वास दोनों से जोड़कर देखा है। भारत माता वाहिनी योजना के अंतर्गत संचालित नशामुक्ति केंद्रों की संख्या 11 से बढ़कर 29 हो गई है, जबकि लाभार्थियों की संख्या 1,967 से बढ़कर 5,220 तक पहुँच गई है।
इन केंद्रों में उपचार के साथ परामर्श, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे प्रभावित व्यक्तियों को पुनः सम्मानजनक जीवन की मुख्यधारा में लौटने का अवसर मिल रहा है।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम और एक्सेसिबल इंडिया अभियान की भावना को आगे बढ़ाते हुए राज्य ने सुगम्य छत्तीसगढ़ अभियान प्रारंभ किया है। सार्वजनिक भवनों, कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य सरकारी परिसरों को दिव्यांग-अनुकूल बनाने की दिशा में व्यवस्थित कार्य किया जा रहा है।यह पहल केवल रैंप या भौतिक सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन सेवाओं को सभी नागरिकों के लिए सुलभ बनाने की व्यापक सोच का हिस्सा है। दिव्यांगजनों के अधिकारों की प्रभावी निगरानी के लिए आयुक्त राज्य के नवीन पद की स्वीकृति इस दिशा में दूरदर्शी प्रशासनिक पहल मानी जा रही है।
कल्याणकारी योजनाओं की स्थिर सफलता के लिए मजबूत संस्थागत ढाँचा आवश्यक होता है। इसी उद्देश्य से राज्य सरकार ने विशेष विद्यालय, माना कैंप रायपुर के भवन निर्माण, दृष्टि एवं श्रवण बाधित विद्यालयों के उन्नयन, फिजिकल रिहैबिलिटेशन सेंटर के विस्तार, दिव्यांगजन वित्त विकास निगम के माध्यम से ऋण वितरण तथा नशामुक्ति केंद्रों के सुदृढ़ीकरण के लिए महत्वपूर्ण निवेश किए हैं।वित्तीय वर्ष 2023-24 में समाज कल्याण विभाग का बजट 1,512 करोड़ रुपये था, जिसे बढ़ाकर वर्ष 2025-26 में 1,600 करोड़ रुपये प्रस्तावित किया गया है। यह वृद्धि दर्शाती है कि राज्य सरकार सामाजिक कल्याण को व्यय नहीं, बल्कि मानव पूंजी और सामाजिक स्थिरता में दीर्घकालिक निवेश के रूप में देख रही है।
छत्तीसगढ़ मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहाँ डिजिटल प्रशासन और मानवीय संवेदनशीलता एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य कर रहे हैं। डीबीटी, आधार सीडिंग, ई-केवाईसी, डिजिटल डेटा प्रबंधन और हेल्पलाइन आधारित सहायता प्रणाली ने योजनाओं की दक्षता बढ़ाई है।साथ ही पुनर्वास, परामर्श, आश्रय, सामुदायिक सहयोग और व्यक्तिगत सहायता जैसी सेवाओं को समान महत्व देकर यह सुनिश्चित किया गया है कि तकनीक मानव केंद्रित शासन का माध्यम बने, उसका विकल्प नहीं।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और समाज कल्याण मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ ने यह प्रमाणित किया है कि प्रभावी समाज कल्याण केवल योजनाओं की घोषणा से नहीं, बल्कि संवेदनशील नीति, पारदर्शी क्रियान्वयन और सतत संस्थागत निर्माण से संभव होता है।
पिछले ढाई वर्षों की उपलब्धियाँ लाखों वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षित वृद्धावस्था, हजारों दिव्यांगजनों की बढ़ती आत्मनिर्भरता, जरूरतमंद महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा, नशामुक्त जीवन की ओर बढ़ते युवाओं और सम्मानजनक पुनर्वास की नई संभावनाओं का जीवंत दस्तावेज हैं।
छत्तीसगढ़ का यह समावेशी समाज कल्याण मॉडल सामाजिक न्याय, तकनीकी नवाचार और मानवीय गरिमा के संतुलित समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह केवल राज्य की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस विकसित और संवेदनशील भारत की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान है, जहाँ हर नागरिक को सुरक्षा, सम्मान और आगे बढ़ने का समान अवसर प्राप्त हो सके।</description><guid>801</guid><pubDate>06-Aug-2026 9:32:34 pm</pubDate></item><item><title> नवजात का पहला सुरक्षा कवच- स्तनपान और इसका सामाजिक महत्व</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=800</link><description>-माँ का दूध नवजात शिशु की प्रतिरक्षा की पहली खुराक है
-अमृत तुल्य है माँ का पहला गाढ़ा पीला दूध
विशेष लेख - धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक, जनसंपर्क                                                          
रायपुर / विश्व स्तनपान सप्ताह हर साल 1 से 7 अगस्त तक मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य शिशु के स्वास्थ्य के लिए माँ के दूध के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक करना है। जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करना और शुरुआती छह महीने तक केवल माँ का दूध ही देना बच्चे के लिए सबसे जरूरी है। स्तनपान के दौरान त्वचा से त्वचा का संपर्क मां और बच्चे के बीच भावनात्मक बंधन को मजबूत करता है, जिससे आराम, गर्माहट और सुरक्षा की भावना मिलती है जो स्वस्थ भावनात्मक विकास में सहायक होती है।
 हर साल 1 अगस्त से 7 अगस्त तक दुनिया भर में विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य माताओं और समाज को शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूक करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के अनुसार, शिशु के जन्म के बाद पहला घंटा और शुरुआती छह महीने उसका पूरा जीवन संवारने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं। स्तनपान करने वाले शिशुओं में दस्त, निमोनिया, कान के संक्रमण और कुछ श्वसन संबंधी संक्रमण जैसी आम बचपन की बीमारियों का खतरा कम होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, इष्टतम स्तनपान शिशुओं को जानलेवा संक्रमणों से बचाकर विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लाखों शिशु मृत्यु को रोकने की क्षमता रखता है।
 जन्म के पहले कुछ घंटों में, माँ का दूध सिर्फ़ भोजन नहीं होता, बल्कि यह नवजात शिशु की प्रतिरक्षा की पहली खुराक होती है, जो सीधे माँ के शरीर से बच्चे तक पहुँचती है। जन्म के बाद का पहला घंटा, जिसे अक्सर गोल्डन आवर कहा जाता है, स्तनपान शुरू करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान बच्चे स्वाभाविक रूप से सतर्क रहते हैं और सहज रूप से स्तन की तलाश करते हैं। त्वचा से त्वचा का शुरुआती संपर्क न केवल सफल स्तनपान की दर को बढ़ाता है, बल्कि बच्चे के तापमान, हृदय गति और रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में भी मदद करता है।
 शिशु के जन्म के तुरंत बाद (एक घंटे के भीतर) मां का पहला गाढ़ा पीला दूध, जिसे कोलस्ट्रम कहा जाता है, बच्चे का पहला प्राकृतिक टीका होता है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीबॉडीज, प्रोटीन और विटामिन होते हैं, जो नवजात शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूती प्रदान करते हैं और उसे विभिन्न प्रकार के संक्रमणों से बचाते हैं।
चिकित्सकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की स्पष्ट सलाह है कि जन्म से लेकर 6 महीने की उम्र तक बच्चे को केवल मां का दूध ही देना चाहिए। इस अवधि के दौरान बच्चे को पानी, ऊपर का दूध या शहद जैसी चीजें देने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि मां के दूध में बच्चे की प्यास और भूख बुझाने के लिए सही अनुपात में पानी और सभी आवश्यक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। 6 महीने पूरे होने के बाद, स्तनपान जारी रखते हुए बच्चे को धीरे-धीरे ऊपरी पौष्टिक आहार देना शुरू किया जा सकता है, जिसे 2 साल या उससे अधिक समय तक जारी रखा जा सकता है।
 शिशु के लिए स्वास्थ्य वरदान है, स्तनपान कराने से बच्चों में दस्त, निमोनिया, कान के संक्रमण और कुपोषण का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि स्तनपान करने वाले बच्चों का बौद्धिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य अन्य बच्चों की तुलना में बेहतर होता है। यह आगे चलकर बच्चों में मोटापा, डायबिटीज और अस्थामा जैसी क्रोनिक बीमारियों की संभावना को घटाता है।
 स्तनपान कराने से माताओं में स्तन कैंसर और अंडाशय के कैंसर का जोखिम कम होता है। यह प्रसव के बाद वजन घटाने और गर्भाशय को पुनः सामान्य आकार में लाने में मदद करता है। मां और बच्चे के बीच एक भावनात्मक और अटूट संबंध स्थापित होता है। स्तनपान केवल एक मां की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह परिवार और समाज की साझी जिम्मेदारी है। अक्सर देखा जाता है कि जानकारी के अभाव, सामाजिक रूढ़ियों, या कामकाजी माहौल में सुविधाओं की कमी के कारण महिलाएं समय पर स्तनपान नहीं करा पातीं। प्रसव के बाद मां को सही पोषण, मानसिक शांति और आराम मिलना आवश्यक है ताकि वह बिना किसी तनाव के बच्चे को स्तनपान करा सके। कामकाजी माताओं के लिए कार्यस्थलों में क्रैच सुविधा, मैटरनिटी लीव (प्रसूति अवकाश) और ब्रेस्टफीडिंग ब्रेक जैसी सुविधाएं होना बेहद जरूरी है। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और मॉल जैसे सार्वजनिक स्थानों पर माताओं के लिए सुरक्षित और स्वच्छ फीडिंग रूम की व्यवस्था होनी चाहिए।
 विश्व स्तनपान सप्ताह हमें यह याद दिलाता है कि बच्चों को उनका मौलिक अधिकार मां का दूध दिलाने के लिए हम सभी को मिलकर एक अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा। जब एक मां बिना किसी संकोच और बाधा के अपने बच्चे को स्तनपान करा सकेगी, तभी हम एक कुपोषण-मुक्त और स्वस्थ समाज की कल्पना साकार कर सकते हैं।</description><guid>800</guid><pubDate>05-Aug-2026 9:33:09 pm</pubDate></item><item><title> सशक्त बचपन, समृद्ध छत्तीसगढ़</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=799</link><description>-बच्चों के पोषण, संरक्षण और सर्वांगीण विकास का नया अध्याय
-पोषण पखवाड़ा में छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय स्तर पर पहले स्थान पर
आलेख  डॉ. दानेश्वरी सम्भाकर(उप, संचालक)
रायपुर / किसी भी राज्य की वास्तविक प्रगति उसके बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा से मापी जाती है। छत्तीसगढ़ ने इसी सोच को आधार बनाकर बच्चों के सर्वांगीण विकास को शासन की सर्वाेच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की दूरदर्शी नीतियों और महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के सक्रिय नेतृत्व में प्रदेश में बच्चों के पोषण, संरक्षण और भविष्य निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल हुई हैं। आईसीडीएस, मिशन वात्सल्य, पोषण अभियान और बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन ने राज्य को बाल विकास के क्षेत्र में नई पहचान दिलाई है।
प्रदेश में 11 हजार 490 आंगनबाड़ी केंद्रों को सक्षम और आकर्षक बनाने का कार्य तेजी से जारी है। इन केंद्रों में बिल्डिंग एज़ लर्निंग एड (BaLA) पेंटिंग, पोषण वाटिका, खेल एवं शिक्षण आधारित गतिविधियों जैसी आधुनिक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं, जिससे बच्चे सीखने के साथ आनंदमय वातावरण में विकसित हो सकें। मनरेगा अभिसरण के माध्यम से 2 हजार 337 नए आंगनबाड़ी भवनों के निर्माण को स्वीकृति मिली है। वहीं पीएम जनमन योजना के अंतर्गत 191 नए आंगनबाड़ी केंद्र संचालित किए जा चुके हैं। नियद नेल्ला नार 2.0 के तहत 10 जिलों में 12 हजार 964 आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों तक सेवाएं पहुंचा रहे हैं।
मानव संसाधन सुदृढ़ीकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की संख्या 51 हजार 45 से बढ़कर 52 हजार 258 तथा सहायिकाओं की संख्या 44 हजार 826 से बढ़कर 51 हजार 548 हो गई है, जिससे सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता दोनों में सुधार आया है। छत्तीसगढ़ राज्य में बच्चों में कुपोषण कम करने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। पोषण ट्रैकर ऐप के आंकड़ों के अनुसार 0-5 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में स्टंटिंग में 7.82 प्रतिशत की कमी, वेट में 4.36 प्रतिशत की कमी, अंडरवेट में 2.76 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। दिसंबर 2023 में जहां बौनापन की दर 30.27 प्रतिशत थी, वह जून 2026 तक घटकर 22.45 प्रतिशत रह गई। यह उपलब्धि पोषण प्रबंधन, नियमित मॉनिटरिंग, सामुदायिक सहभागिता और आंगनबाड़ी आधारित सेवाओं के प्रभावी संचालन का परिणाम है।
राष्ट्रीय पोषण माह और पोषण पखवाड़ा के दौरान छत्तीसगढ़ ने देशभर में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वित्तीय वर्ष 2024-25 में छत्तीसगढ़ राज्य प्रति आंगनबाड़ी गतिविधियों में प्रथम स्थान पर रहा। अप्रैल 2025 के पोषण पखवाड़ा में भी छत्तीसगढ़ ने राष्ट्रीय स्तर पर पहला स्थान प्राप्त किया। प्रदेश में सितंबर-अक्टूबर 2025 के पोषण माह के दौरान 71 हजार 887 गतिविधियां और अप्रैल 2026 के पोषण पखवाड़ा में 34 लाख 93 हजार 474 गतिविधियां आयोजित की गईं। साथ ही स्थानीय स्तर पर पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए रेडी टू ईट इकाइयों की स्थापना की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल शुरू हो चुकी है।
अनाथ, परित्यक्त और विशेष संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के लिए मिशन वात्सल्य प्रभावी सुरक्षा कवच बनकर उभरा है। राज्य में बाल देखरेख संस्थाओं की संख्या बढ़कर 109 हो गई है।
मुख्यमंत्री बाल उदय योजना के माध्यम से सैकड़ों बच्चों को शिक्षा, देखभाल और पुनर्वास का लाभ मिला है। चाइल्ड हेल्पलाइन में प्राप्त 1 लाख 65 हजार 979 कॉलों पर त्वरित कार्रवाई करते हुए हजारों मामलों का निराकरण किया गया। बाल संरक्षण सेवाओं के विस्तार का प्रभाव दत्तक ग्रहण और स्पॉन्सरशिप योजनाओं में भी स्पष्ट दिखाई देता है। दत्तक ग्रहण से लाभान्वित बच्चे 42 से बढ़कर 234 और स्पॉन्सरशिप से लाभान्वित बच्चे 767 से बढ़कर 2 हजार 37 हो गए हैं। यह वृद्धि बच्चों को पारिवारिक वातावरण और बेहतर भविष्य उपलब्ध कराने की दिशा में राज्य सरकार की संवेदनशील प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
राज्य सरकार द्वारा प्रारंभ किए गए बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान ने सामाजिक जागरूकता और प्रशासनिक सक्रियता दोनों को नई दिशा दी है। बाल विवाह प्रतिरोध अधिकारियों की संख्या बढ़कर 1 हजार 382 हो गई है। इसके परिणामस्वरूप रोके गए बाल विवाहों की संख्या 109 से बढ़कर 888 तक पहुंच गई है। यह परिवर्तन केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि बेटियों के शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव का संकेत है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में संचालित ये प्रयास छत्तीसगढ़ के लाखों बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षा, शिक्षित और सशक्त भविष्य की ओर अग्रसर कर रहे हैं। आधुनिक आंगनबाड़ी व्यवस्था, पोषण सुधार, बाल संरक्षण सेवाओं का विस्तार और बाल विवाह उन्मूलन जैसे बहुआयामी प्रयासों ने छत्तीसगढ़ को बाल विकास के क्षेत्र में एक प्रेरणादायी और आदर्श राज्य के रूप में स्थापित किया है।
सशक्त बचपन ही विकसित छत्तीसगढ़ की सबसे मजबूत नींव है और राज्य सरकार उसी नींव को और अधिक मजबूत बनाने के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रही है।</description><guid>799</guid><pubDate>05-Aug-2026 7:55:19 pm</pubDate></item><item><title>कृष्ण-राधा-प्रेम ने जग को अचंभित कर दिया...</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=798</link><description>सजल
- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
कृष्ण-राधा-प्रेम ने जग को अचंभित कर दिया।
छोड़कर अधिकार सब प्रिय को समर्पित कर दिया।।
आज की पीढ़ी न जाने त्याग करना प्रेम में।
स्वार्थ का विष घोल रिश्तों को कलंकित कर दिया।।
प्रेम है विश्वास का घर क्यों भला संशय वहाँ?
दंभ के वातास ने प्रियता तिरोहित कर दिया।।
दूसरों की थाल लगती है सदा व्यंजन भरी।
मूल्य संस्कृति भूल बैठे आत्म प्रवंचित कर दिया।।
दीप के नीचे अँधेरा पल रहा था रात भर।
रोशनी को दोष देकर व्यर्थ दंडित कर दिया।।</description><guid>798</guid><pubDate>02-Aug-2026 1:38:06 pm</pubDate></item><item><title>सुहानी रात ढल चुकी, न जाने तुम कब आओगे...</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=796</link><description>मोहम्मद रफी- पुण्यतिथि पर विशेष-31 जुलाई
आलेख प्रशांत शर्मा
सुहानी रात ढल चुकी , न जाने तुम कब आओगे, यह गाना मोहम्मद रफी साहब ने गाया है और आज उनकी पुण्यतिथि के मौके पर इसी गाने और इस फिल्म तथा इसके कलाकारों की चर्चा हम यहां कर रहे हंै।
फिल्म थी दुलारी और इसका निर्माण 1949 में हुआ था। फि़ल्म के मुख्य कलाकार थे सुरेश, मधुबाला और गीता बाली। फि़ल्म का निर्देशन अब्दुल रशीद कारदार साहब ने किया था। 1949 का साल गीतकार शक़ील बदायूनी और संगीतकार नौशाद के लिए ढेर सारी खुशियां लेकर आया। 1949 में महबूब ख़ान की फि़ल्म अंदाज़ , ताजमहल पिक्चर्स की फि़ल्म चांदनी रात , तथा ए. आर. कारदार साहब की दो फि़ल्में दिल्लगी और दुलारी प्रदर्शित हुई थीं और ये सभी फि़ल्मों का गीत संगीत बेहद लोकप्रिय सिद्ध हुआ था। फिल्म दुलारी 1 जनवरी 1949 को प्रदर्शित हुई थी। पूरी फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट है।
आज जब दुलारी के इस गाने की चर्चा हो रही है, तो हम बता दें कि इसी फिल्म में लता मंगेशकर और रफ़ी साहब ने अपना पहला डुएट गीत गाया था और यह गीत था-मिल मिल के गाएंगे दो दिल यहां, एक तेरा एक मेरा । फिल्म में दोनों का गाया एक और युगल गीत था -रात रंगीली मस्त नज़ारे, गीत सुनाए चांद सितारे । लता और रफी की यह जोड़ी काफी पसंद की गई और उसके बाद तो उन्होंने ऐसे- ऐसे यादगार गाने दिए हैं कि यदि उनका जिक्र करते जाएं तो न जाने कितने ही दिन गुजर जाएंगे, लेकिन बातें खत्म नहीं होंगी।
फिल्म में मोहम्मद रफ़ी की एकल आवाज़ में नौशाद साहब ने सुहानी रात ढल चुकी गीत.. -राग पहाड़ी पर बनाया । इसी फि़ल्म का गीत तोड़ दिया दिल मेरा.. भी इसी राग पर आधारित है। राग पहाड़ी नौशाद साहब का काफी लोकप्रिय शास्त्रीय राग रहा है और उन्होंने इस पर आधारित कई गाने तैयार किए हैं। इसमें से जो गाने रफी साहब की आवाज में हैं, वे हैं-
1.. आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले (फिल्म-राम और श्याम)
2. दिल तोडऩे वाले तुझे दिल ढ़ूंढ रहा है (सन ऑफ़ इंडिया)
3. दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन आज की रात (कोहिनूर)
4. कोई प्यार की देखे जादूगरी (कोहिनूर)
5. ओ दूर के मुसाफिऱ हम को भी साथ ले ले (उडऩ खटोला)
फिल्म दुलारी में कुल 12 गाने थे। 14 रील की इस फिल्म में ये गाने कहानी की तरह ही चलते हैं । नायिका मधुबाला के लिए लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी। वहीं गीता बाली के लिए शमशाद बेगम ने दो गाने गाए थे। जिसमें से शमशाद बेगम का गाया एक गाना - न बोल पी पी मोरे अंगना , पक्षी जा रे जा...काफी लोकप्रिय हुआ था। नायक सुरेश के लिए रफी साहब ने आवाज दी थी। इसमें से 9 गाने लता मंगेशकर ने गाए जिसमें रफी साहब के साथ उनका दो डुएट भी शामिल है। रफी साहब ने केवल एक गाना एकल गाया और वह है -सुहानी रात ढल चुकी जिसे आज भी रफी साहब के सबसे हिट गानों में शामिल किया जाता है। पूरा गाना इस प्रकार है-
सुहानी रात ढल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे
जहां की रुत बदल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे
अंतरा-1. नज़ारे अपनी मस्तियां, दिखा-दिखा के सो गये
सितारे अपनी रोशनी, लुटा-लुटा के सो गये
हर एक शम्मा जल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे
सुहानी रात ढल...
अंतरा- 2- तड़प रहे हैं हम यहां, तुम्हारे इंतज़ार में
खिजां का रंग, आ-चला है, मौसम-ए-बहार में
हवा भी रुख बदल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे
सुहानी रात ढल......
गाने में नायक की नायिका से मिलने की बैचेनी और इंतजार का दर्द शकील साहब ने अपनी कलम से बखूबी उतारा है, तो रफी साहब ने अपनी आवाज से इस गाने को जीवंत बना दिया है। गाने में शब्दों का भारी भरकम जाल नहीं है बल्कि बोल काफी सिंपल हैं, जो बड़ी सहजता से लोगों की जुबां पर चढ़ जाते हैं। गाने की यही खासियत इसे आज तक जिंदा रखे हुए है। गाने के शौकीन आज भी किसी कार्यक्रम में इसे गाना नहीं भूलते हैं। राग पहाड़ी के अनुरूप इसका फिल्मांकन भी हुआ है और दृश्य में नायक चांदनी रात में सुनसान जंगल में नायिका का इंतजार करते हुए यह गाना गाता है। दृश्य में एक टूटा फूटा खंडहर भी नजर आता है, तो नायक की विरान जिंदगी को दर्शाता है, जिसे बहार आने का इंतजार है।
दुलारी फिल्म की कहानी कुछ इस प्रकार थी-प्रेम शंकर एक धनी व्यावसायिक का बेटा होता है जिसकी शादी उसके माता-पिता रईस खानदान में करना चाहते हंै। प्रेम शंकर को एक बंजारन लड़की दुलारी से प्यार हो जाता है। यह लड़की बंजारन नहीं बल्कि एक रईस खानदान की बेटी शोभा रहती है, जिसे बंजारे लुटेरे बचपन में उठा लाए थे। यह रोल मधुबाला ने निभाया है। प्रेमशंकर इस लड़की को इस नरक से निकालने के लिए उससे शादी करने का फैसला लेता है। बंजारन की टोली में एक और लड़की रहती है कस्तूरी जिसका रोल गीता बाली ने निभाया है। वह इसी टोली के एक बंजारे लड़के से प्यार करती है, लेकिन उसकी नजर दुलारी पर होती है। प्रेमशंकर के पिता इस शादी के खिलाफ हैं। काफी जद्दोजहद के बाद प्रेमशंकर , दुलारी को इस नरक से निकालने में कामयाब हो जाता है और उनके पिता को भी इस बात का पता चल जाता है कि दुलारी और कोई नहीं उनके ही मित्र की खोई हुई बेटी है जिसे वे बचपन से ही अपनी बहू बनाने का फैसला कर चुके थे। फिल्म के अंत में सब कुछ ठीक हो जाता है और नायक को अपना सच्चा प्यार मिल जाता है। फिल्म में मधुबाला से ज्यादा खूबसूरत गीता बाली नजर आई हैं, लेकिन उनके हिस्से में सह नायिका की भूमिका ही थी। लेकिन फिल्म के प्रदर्शन के एक साल बाद ही उन्हें फिल्म बावरे नैन में राजकपूर की नायिका बनने का मौका मिला और इसके कुछ 5 साल बाद उन्होंने शम्मी कपूर के साथ शादी कर ली। दुलारी फिल्म मधुबाला की प्रारंभिक फिल्मों में से है। मधुबाला ने जब यह फिल्म की उस वक्त उनकी उम्र मात्र 16 साल की थी।
फिल्म की पूरी कहानी चंद पात्रों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। सुरेश के पिता के रोल में अभिनेता जयंत थे जिनका असली नाम जकारिया खान था, लेकिन उन्हें जाने-माने फिल्म निर्माता और निर्देशक विजय भट्ट ने जयंत नाम दिया था। विजय भट्ट आज की फिल्मों के निर्माता-निर्देशक विक्रम भट्ट के दादा थे। जयंत के बेटे अमजद खान हैं जिन्हें आज भी गब्बर सिंह के रूप में पहचाना जाता है। फिल्म दुलारी में नायक सुरेश की मां का रोल प्रतिमा देवी ने निभाया था, जो ज्यादातर फिल्मों में मां का रोल में ही नजर आईं। उनकी फिल्मों में अमर अकबर एंथोनी, पुकार प्रमुख हैं। आखिरी बार वे वर्ष 2000 में बनी फिल्म पलकों की छांव में दिखाई दी थीं। मधुबाला के पिता के रोल में अभिनेता अमर थे। अभिनेता श्याम कुमार ने खलनायक का रोल निभाया था, जो बाद में रोटी, जख्मी जैसी कई फिल्मों में खलनायक के रूप में नजर आए।
कभी फुरसत मिले तो इस फिल्म को जरूर देखिएगा, अपने दिलकश गानों की वजह से यह फिल्म दिल तो सुकून देती है। हालांकि अब इसके प्रिंट काफी धुंधले पड़ गए हैं। फिल्म की तकनीक और कहानी आज की पीढ़ी को भले ही पुरानी लगे, लेकिन अपने दौर की यह हिट और क्लासी फिल्म है।</description><guid>796</guid><pubDate>31-Jul-2026 3:09:08 pm</pubDate></item><item><title>सबका वक्त बदलते देखा...</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=795</link><description>सजल
- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
सबका वक्त बदलते देखा।
खोटा सिक्का चलते देखा।।
कंटक मध्य सुमन मुस्काते।
पीड़ा में सुख पलते देखा।।
सब कुछ देकर कुछ न माँगते।
पावस बनकर ढलते देखा ।।
अनजानों से मिला सहारा।
अपनों को भी छलते देखा।।
सूर्य अस्त हो गया साँझ को।
दीप रात भर जलते देखा।।</description><guid>795</guid><pubDate>26-Jul-2026 3:04:08 pm</pubDate></item><item><title>  विशेष पिछड़ी जनजातियों के सर्वांगीण विकास की नई पहल</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=794</link><description>-धमतरी में बनेंगे व्यवसायिक परिसर, बोरई बनेगा अंतर्राज्यीय व्यापार एवं परिवहन का नया केंद्र
लेख एस.आर.पाराशर, उप संचालक
धमतरी । राज्य शासन एवं भारत सरकार द्वारा विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) के समग्र विकास के लिए संचालित योजनाओं को धमतरी जिले में प्रभावी ढंग से क्रियान्वित किया जा रहा है। विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय को आत्मनिर्भर बनाने, आजीविका के नए अवसर उपलब्ध कराने तथा सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में जिला प्रशासन द्वारा कई महत्वपूर्ण पहलें की जा रही हैं। इसी कड़ी में जिले के विभिन्न क्षेत्रों में कमार समुदाय के लिए आधुनिक व्यवसायिक परिसरों (कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स) का निर्माण कराया जाएगा, ताकि वे स्वरोजगार स्थापित कर अपनी आय में वृद्धि कर सकें।
 जिला प्रशासन द्वारा प्रस्तावित इन व्यवसायिक परिसरों का निर्माण जिले के बेलरगांव, कसपुर, बोरई, कुकरेल, सिंगपुर, दुगली एवं केरेगांव में किया जाएगा। इन परिसरों में कमार समुदाय के हितग्राही अपनी आवश्यकता एवं रुचि के अनुसार दुकानें संचालित कर सकेंगे। इससे उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे, आर्थिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी बढ़ेगी तथा आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को भी नई मजबूती मिलेगी।
 भारत सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री जनमन (PM JANMAN - Pradhan Mantri Janjati Adivasi Nyaya Maha Abhiyan) योजना के माध्यम से विशेष पिछड़ी जनजातियों तक मूलभूत सुविधाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सड़क, पेयजल, बिजली, आजीविका एवं अन्य विकास योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा रहा है। धमतरी जिले में इस योजना के उत्कृष्ट क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप जिले को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, जो जिले के लिए गौरव का विषय है। यह उपलब्धि जनजातीय विकास के प्रति जिला प्रशासन की प्रतिबद्धता तथा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का प्रमाण है।
 शिक्षा के क्षेत्र में भी कमार समुदाय के बच्चों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। वर्तमान में संचालित कमार विद्यालय को उच्चीकृत कर कक्षा दसवीं से बारहवीं तक संचालित करने की प्रक्रिया जारी है। इससे विद्यार्थियों को उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए दूरस्थ क्षेत्रों में जाने की आवश्यकता नहीं होगी तथा विशेष पिछड़ी जनजाति के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अपने क्षेत्र में ही उपलब्ध हो सकेगी। यह पहल नई शिक्षा नीति के उद्देश्यों तथा जनजातीय विद्यार्थियों के शैक्षणिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी।
 इसी प्रकार जिले के औद्योगिक एवं व्यापारिक विकास को गति देने के उद्देश्य से बोरई में अंतर्राज्यीय बस टर्मिनल स्थापित करने का प्रस्ताव भी शासन को भेजा गया है। छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं कांकेर जिले को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण संपर्क बिंदु के रूप में विकसित हो रहे बोरई में बस टर्मिनल के निर्माण से यातायात सुविधाएं बेहतर होंगी, यात्रियों को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होंगी तथा व्यापार एवं पर्यटन को भी नई गति मिलेगी। बस टर्मिनल के साथ विकसित होने वाला व्यवसायिक परिसर स्थानीय युवाओं एवं जनजातीय हितग्राहियों के लिए रोजगार और व्यवसाय के नए अवसर उपलब्ध कराएगा। बस टर्मिनल के लिए स्थल चयन कर लिया गया है ।
राज्य शासन की जनजातीय कल्याण संबंधी योजनाओं तथा भारत सरकार की पीएम जनमन, प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन, आयुष्मान भारत, राष्ट्रीय आजीविका मिशन एवं अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं के समन्वित क्रियान्वयन से धमतरी जिले के दूरस्थ एवं जनजातीय क्षेत्रों में विकास की नई तस्वीर उभर रही है। जिला प्रशासन का प्रयास है कि विकास की मुख्यधारा का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे तथा विशेष पिछड़ी जनजातियों को सम्मानजनक जीवन, स्थायी आजीविका और बेहतर भविष्य उपलब्ध कराया जा सके।कलेक्टर श्री अबिनाश मिश्रा ने बताया कि विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय के समग्र विकास के लिए जिला प्रशासन पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहा है। हमारा उद्देश्य केवल आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें स्थायी आजीविका, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ना है। विभिन्न क्षेत्रों में बनाए जा रहे व्यवसायिक परिसर कमार समुदाय के लोगों को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करेंगे। साथ ही कमार विद्यालय को उच्च माध्यमिक स्तर तक विकसित करने तथा बोरई को अंतर्राज्यीय परिवहन एवं व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में भी प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री जनमन योजना के उत्कृष्ट क्रियान्वयन के लिए जिले को प्राप्त राष्ट्रपति पुरस्कार हमारी पूरी टीम और जनप्रतिनिधियों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। आने वाले समय में भी जनजातीय क्षेत्रों के समग्र विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी रूप से पहुंच सके।मालूम हो कि धमतरी जिले के नगरी विकासखंड के अंतर्गत ग्राम पंचायत संकरा के आश्रित गाँव मसानडबरा में प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना के तहत विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय के लिए पक्के मकान बनाए गए हैं, ताकि उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक आवास मिल सके। यह पहल कमार जनजाति के रहन-सहन और मूलभूत आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए की जा रही है |
यह देश की दूसरी और छत्तीसगढ़ की पहली पीएम जनमन आवास कॉलोनी है । यह कॉलोनी विशेष रूप से पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय के लिए बनाई जा रही है। आधुनिकता के दौर में कमार समुदाय की परम्परा,सांस्कृतिक से जुड़े रहने का भी पूरा ख्याल रखा गया है । ताकि नई पीढ़ी को भी अपनी समुदाय की परम्परा, सांस्कृतिक से जुड़े रहे। मसानडबरा में पीएम जनमन आवास कॉलोनी में. पी.एम. सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना से की कार्य योजना बनाई जा रही है । ये आवास पी.एम. सूर्य घर मुफ्त बिजली से जगमग होंगे ।
जिले में 1481 आवास स्वीकृत किए गए हैं। इनमें से 1046 आवास पूर्ण हो चुके हैं, जबकि 435 आवास निर्माणाधीन हैं। अधिकारियों ने बताया कि शेष आवास अगले चार माह में पूर्ण कर लिए जाएंगे। ग्रामीणों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण आवास उपलब्ध कराना प्रशासन की पहली प्राथमिकता है।
पीएमजनमन योजना के तहत 36 सड़कों का निर्माण स्वीकृत किया गया है। इन सड़कों की कुल स्वीकृति लागत 1341.60 लाख रुपए है। अधिकांश निर्माण कार्य प्रगति पर है। सड़कें बन जाने से दूरस्थ बसाहटों को बाजार, स्वास्थ्य एवं प्रशासनिक सेवाओं से बेहतर जोड़ मिलेगा।
जल जीवन मिशन के अंतर्गत सभी घरों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करा दिया गया है। साथ ही हर घर का विद्युतीकरण पूर्ण हो चुका है। गांवों में रोशनी पहुँचने से बच्चों की पढ़ाई, आजीविका कार्यों और सुरक्षा की स्थिति में बड़ा सुधार हुआ है।
जनजातीय समुदायों के सर्वांगीण विकास के लिए भारत सरकार द्वारा स्थापित बहुउद्देश्यीय केंद्र ग्रामीण अंचलों में नई संभावनाएँ तैयार कर रहे हैं।
नगरी ब्लॉक के बोईरगांव में निर्मित नया बहुउद्देश्यीय केंद्र शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और आजीविका संबंधी गतिविधियों का केंद्र बन रहा है।
आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चों को ज्ञानवर्धक शिक्षण सामग्री और खिलौने उपलब्ध कराए गए हैं। ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं का लाभ, प्रशिक्षण और आवश्यक मार्गदर्शन भी यहीं प्राप्त होगा।
  50-सीटर बालक छात्रावास निर्माण नगरी विकासखंड के बाजार कुर्रीडीह में 50-सीटर बालक छात्रावास का निर्माण जारी है। इसका कार्य जनवरी तक पूर्ण हो जाएगा। छात्रावास तैयार होने के बाद कमार जनजाति के बच्चों को सुरक्षित आवास, भोजन और अध्ययन की सभी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध होंगी।
ग्राम पिपरहीभर्री में एकीकृत ग्राम योजना एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत सामाजिक एवं संसाधन मानचित्र, गैप एनालिसिस, लघुवनोपज प्रबंधन और आजीविका कार्ययोजनाओं का दस्तावेजीकरण किया गया है।
यह कार्य ग्रामीण समुदाय को अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन और टिकाऊ विकास की दिशा में सशक्त आधार प्रदान करता है।
133 बसाहटों में त्वरित गतिविधियों की सौ फीसदी संतृप्ति
 जिले की 133 बसाहटों में त्वरित गतिविधियों की पूर्ण संतृप्ति हासिल की गई है। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि प्रत्येक कमार परिवार तक योजना का लाभ समय पर पहुँचे। पीएमजनमन योजना के माध्यम से विकास, सम्मान और आत्मनिर्भरता की रोशनी अब जिले की हर जनजातीय बसाहट तक पहुँच रही है।
दूरस्थ अंचलों में रहने वाले परिवार अब मुख्यधारा से तेजी से जुड़ रहे हैं और सुरक्षित, स्वस्थ तथा बेहतर जीवन की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा रहे हैं।</description><guid>794</guid><pubDate>25-Jul-2026 4:33:18 pm</pubDate></item><item><title> प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण का अनूठा संगम है नंदनवन जंगल सफारी</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=793</link><description>-320.15 हेक्टेयर में फैला नंदनवन जंगल सफारी बना प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों का पसंदीदा केंद्र
आलेख -धनंजय राठौर , संयुक्त संचालक, जनसंपर्क,अशोक कुमार चंद्रवंशी ,सहायक जनसंपर्क अधिकारी
 नंदनवन जंगल सफारी नवाँ रायपुर में पर्यटकों के लिए कई प्रकार की रोमांचक सफारी राइड्स उपलब्ध हैं, जिनमें शाकाहारी सफारी, टाइगर सफारी, भालू सफारी और लायन सफारी प्रमुख हैं। इसके अलावा यहाँ एक छोटा चिड़ियाघर (नंदनवन जू) भी है। छत्तीसगढ़ की राजधानी नवा रायपुर (अटल नगर) के सेक्टर-39 में स्थित नंदनवन जंगल सफारी राज्य के प्रमुख पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण केंद्रों में शामिल है। 320.15 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह विशाल परिसर प्रकृति प्रेमियों, वन्यजीव प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यहां वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ पर्यटकों को प्राकृतिक वातावरण में वन्यजीवों को देखने और उनके बारे में जानने का अवसर मिलता है। नंदनवन की शुरुआत वर्ष 1979 में रायपुर में नंदनवन मिनी जू के रूप में हुई थी। यह वन्यजीवों के रेस्क्यू और राहत केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। वर्ष 2008 में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) ने इसे आधिकारिक रूप से मिनी जू की मान्यता दी।
इसके बाद नवा रायपुर में आधुनिक और विशाल जंगल सफारी विकसित करने के लिए वर्ष 2012 से 2015 के बीच 320.15 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई। 1 नवंबर 2016 को छत्तीसगढ़ राज्य के 16वें स्थापना दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने नंदनवन जंगल सफारी का उद्घाटन किया। नंदनवन जंगल सफारी का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों का संरक्षण, दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण एवं प्रजनन और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यहां वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप सुरक्षित और तनावमुक्त आवास उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है।
विद्यार्थियों और पर्यटकों को वन्यजीवों तथा जैव विविधता के महत्व की जानकारी देने के लिए यहां विभिन्न पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। नंदनवन जंगल सफारी को वन्यजीवों की सुरक्षा और पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग जोन में विकसित किया गया है। 30.89 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस जोन में चीतल, सांभर, नीलगाय और काला हिरण जैसे वन्यजीव प्राकृतिक वातावरण में विचरण करते हैं। 20.03 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित भालू सफारी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। यहां भालुओं को प्राकृतिक वातावरण में देखने का अवसर मिलता है।
20.04 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली बाघ सफारी में पर्यटक देश के राष्ट्रीय पशु बाघ को करीब से देखने का रोमांचक अनुभव प्राप्त करते हैं। 20.01 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित सिंह सफारी में एशियाई शेरों का संरक्षण किया जा रहा है।
50 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जू जोन में विभिन्न प्रजातियों के पक्षी, सरीसृप और अन्य वन्यजीव आकर्षण का केंद्र हैं। नंदनवन जंगल सफारी में विभिन्न चिड़ियाघरों के साथ पशु विनिमय कार्यक्रम के माध्यम से कई दुर्लभ और विशेष वन्यजीवों को लाया गया है। यहां सफेद बाघ, दरियाई घोड़ा, घड़ियाल और क्लोन जंगली भैंसा दीपाशा जैसे वन्यजीव पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण हैं।
वनमंडलाधिकारी श्री थेजस शेखर ने बताया कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप की मंशानुरूप नंदनवन जंगल सफारी पर्यटकों के बीच लगातार लोकप्रिय हो रहा है। गौरतलब है कि वर्ष 2018-19 में ही देश-विदेश से 1 लाख 74 हजार 611, वर्ष 2019-20 में 1 लाख 60 हजार 767 ,वर्ष 2020-21 में 1 लाख 60 हजार 32, वर्ष 2021-22 में 1 लाख 73 हजार 72, वर्ष 2022-23 में 2 लाख 77 हजार 881, वर्ष 2023-24 में 2 लाख 62 हजार 486, वर्ष 2024-25 में 2 लाख 70 हजार 942, वर्ष 2025-26 में 3 लाख 24 हजार 785, से अधिक पर्यटकों ने जंगल सफारी का भ्रमण किया। यह आंकड़ा इसकी बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है। नंदनवन जंगल सफारी में अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस, विश्व बाघ दिवस और वन्यजीव सप्ताह जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से लोगों, विद्यार्थियों और पर्यटकों को वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है।
नंदनवन जंगल सफारी नवा रायपुर (अटल नगर) के सेक्टर-39 में स्थित है। यह स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे, रायपुर से लगभग 15 किलोमीटर और रायपुर रेलवे स्टेशन से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जंगल सफारी प्रत्येक सोमवार को बंद रहती है। नंदनवन जंगल सफारी आज छत्तीसगढ़ में पर्यटन, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा का ऐसा अनूठा केंद्र बन चुका है, जहां प्रकृति के करीब पहुंचकर वन्यजीवों को देखने के साथ-साथ उनके संरक्षण का संदेश भी मिलता है l</description><guid>793</guid><pubDate>24-Jul-2026 9:36:52 pm</pubDate></item><item><title>कॉमेडी को एक नया आयाम देने वाले महमूद, कभी ड्राइवर हुआ करते थे</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=792</link><description>मेहमूद की पुण्यतिथि पर विशेष-23 जुलाई
_आलेख- प्रशांत शर्मा
लोगों को हंसाने की विलक्षण प्रतिभा के धनी प्रख्यात हास्य कलाकार महमूद को कॉमेडी को भारतीय फिल्मों का अभिन्न अंग बनाने का श्रेय जाता है। हंसी-मजाक में बड़ी खूबसूरती से जिंदगी का फलसफा बयान करने का हुनर रखने वाले इस कलाकार ने हास्य भूमिका को नए आयाम और मायने दिये।
महमूद ने भारतीय फिल्मों में महज औपचारिकता मानी जाने वाली कॉमेडी को एक अलग और विशेष स्थान दिलाया। उन्होंने कॉमेडी को एक नया स्तर और ऊंचाई देने के साथ-साथ यह भी साबित किया कि फिल्म का हास्य कलाकार उसके नायक पर भी भारी पड़ सकता है।
महमूद को भारतीय फिल्मों में कॉमेडी के नए युग की शुरुआत करने वाला कलाकार माना जाता है। इस फनकार ने कॉमेडी को भारतीय फिल्मों के कथानक का अंतरंग हिस्सा बनाया। उन्हीं के प्रयासों का नतीजा था कि 60 के दशक में फिल्मों पर कॉमेडी हावी होने लगी थी और महमूद अभिनय की इस विधा के बेताज बादशाह बन गए थे। महमूद ने 60 के दशक में अपने अभिनय की विशिष्ट शैली के जादू से हिन्दी फिल्मों में कॉमेडियन की भूमिका को विस्तार दिया और एक वक्त ऐसा भी आया जब महमूद दर्शकों के लिये अपरिहार्य बन गए।
महमूद का जन्म 29 सितम्बर 1932 को मुम्बई में हुआ था। अपने माता-पिता की आठ में से दूसरे नम्बर की संतान महमूद ने शुरुआत में बाल कलाकार के तौर पर कुछ फिल्मों में काम किया था।
बॉलीवुड में कदम रखने के लिए महमूद सभी तरह के प्रयास करते थे। महमूद ने इसके लिए ड्राइविंग तक सीख ली और निर्माता ज्ञान मुखर्जी के ड्राइवर बन गए। महमूद ने सोचा की अब उन्हें कलाकारों और निर्माता, निर्देशक के करीब जाने का मौका मिलेगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही। यही से खुली महमूद की किस्मत और उन्हें दो बीघा जमीन , प्यासा जैसी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल मिलने शुरू हो गए। 1958 में आई फिल्म परवरिश से महमूद को बड़ा ब्रेक मिला। इस फिल्म में उन्होंने राजकपूर के भाई की भूमिका निभाई थी। महमूद के अभिनय को हर किसी ने पसंद किय। इसके बाद छोटी बहन फिल्म उनके करिअर की अहम फिल्म साबित हुई। इन फिल्मों की सफलता के बाद तो महमूद के लिए बॉलीवुड के दरवाजे पूरी तरह से खुल गए। महमूद ने फिल्म गुमनाम में एक दक्षिण भारतीय रसोइये का कालजयी किरदार अदा किया। उसके बाद उन्होंने प्यार किये जा, प्यार ही प्यार, ससुराल, लव इन टोक्यो और जिद्दी जैसी हिट फिल्में दीं।
बॉलीवुड में महमूद की धाक का अंदाज आप इस तरह से लगा सकते हैं कि उन्होंने अमिताभ बच्चन को पहला सोलो रोल दिया था। ये वही महमूद हैं जिन्होंने आर.डी बर्मन और पंचम दा जैसे संगीत के धुरंधरों को पहला ब्रेक दिया था। अपनी अनेक फिल्मों में महमूद नायक के किरदार पर भारी नजर आए। यह उनके अभिनय की खूबी थी कि दर्शक अक्सर नायक के बजाय उन्हें देखना पसंद करते थे।
फिल्मों में अपनी बहुविविध कॉमेडी से दर्शकों को दीवाना बनाने के बाद महमूद ने अपनी फिल्म निर्माण कम्पनी पर ध्यान देने का फैसला किया। उनकी पहली होम प्रोडक्शन फिल्म छोटे नवाब थी। बाद में उन्होंने बतौर निर्देशक सस्पेंस-कॉमेडी फिल्म भूत बंगला बनाई। जिसमें उन्होंने अपने दोस्त और संगीतकार आर. डी. बर्मन को भी अभिनय करने का मौका दिया। उसके बाद उनकी फिल्म पड़ोसन 60 के दशक की जबरदस्त हिट कॉमेडी फिल्म साबित हुई। पड़ोसन को हिंदी सिने जगत की श्रेष्ठ हास्य फिल्मों में गिना जाता है। इसमें सुनील दत्त भी एक अच्छे कॉमेडी कलाकार बनकर उभरे।
अभिनेता, निर्देशक, कथाकार और निर्माता के रूप में काम करने वाले महमूद ने बॉलीवुड के मौजूदा किंग शाहरुख खान को लेकर वर्ष 1996 में अपनी आखिरी फिल्म दुश्मन दुनिया बनाई , लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नाकाम रही। अपने जीवन के आखिरी दिनों में महमूद का स्वास्थ्य काफी खराब हो गया। उन्हें अनेक बीमारियां हो गई थी। वह इलाज के लिये अमेरिका गए जहां 23 जुलाई 2004 को उनका निधन हो गया। उनकी बीमारी का एक कारण उनका अत्यधिक धूम्रपान करना भी था।</description><guid>792</guid><pubDate>24-Jul-2026 9:05:32 pm</pubDate></item><item><title> 23,723 तेन्दूपत्ता संग्राहक परिवारों को मिलेगा 3.92 करोड़ रुपये का बोनस</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=790</link><description>-3.84 करोड़ रुपये सीधे बैंक खातों में हस्तांतरित, शेष राशि का भुगतान जारी
-तेन्दूपत्ता संग्राहकों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में सरकार का बड़ा कदम
लेख: एस.आर.पाराशर, उप संचालक
धमतरी । तेन्दूपत्ता संग्राहकों का लंबे समय से प्रतीक्षित प्रोत्साहन पारिश्रमिक (बोनस) अब उनके खातों में पहुंचना शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय द्वारा राष्ट्रीय सहकारिता सप्ताह के दौरान रायपुर स्थित कृषि मण्डपम में तेन्दूपत्ता संग्रहण वर्ष 2023 के संग्राहकों को बोनस वितरण का शुभारंभ किए जाने के बाद धमतरी जिले में भी बोनस राशि का ऑनलाइन भुगतान तेजी से किया जा रहा है। यह पहल वनाश्रित परिवारों की आर्थिक समृद्धि, सामाजिक सुरक्षा और आजीविका सुदृढ़ीकरण की दिशा में राज्य शासन की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
जिला लघु वनोपज सहकारी संघ मर्यादित, वनमंडल धमतरी के प्रबंध संचालक एवं वनमंडलाधिकारी श्री जाधव श्रीकृष्ण ने बताया कि वर्ष 2023 के तेंदूपत्ता विक्रय में लाभ अर्जित करने वाली जिले की 25 प्राथमिक लघु वनोपज सहकारी समितियों के 212 फड़ों से जुड़े ग्रामों के 23 हजार 723 संग्राहक परिवारों को कुल 3 करोड़ 92 लाख रुपये प्रोत्साहन पारिश्रमिक (बोनस) स्वीकृत किया गया है। यह राशि ऑनलाइन सॉफ्टवेयर के माध्यम से सीधे हितग्राहियों के बैंक खातों में अंतरित की जा रही है। 20 जुलाई 2026 तक 3 करोड़ 84 लाख रुपये की राशि संग्राहकों के खातों में सफलतापूर्वक हस्तांतरित की जा चुकी है तथा शेष पात्र हितग्राहियों को भी शीघ्र भुगतान की प्रक्रिया जारी है।उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ शासन द्वारा वर्ष 2026 के लिए तेन्दूपत्ता संग्रहण दर 5,500 रुपये प्रति मानक बोरा निर्धारित की गई है, जिससे संग्राहकों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित हुई है। तेन्दूपत्ता संग्रहण केवल मौसमी रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि वनाश्रित परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। राज्य शासन द्वारा पारिश्रमिक, बोनस तथा विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से इस परंपरागत आजीविका को निरंतर सशक्त बनाया जा रहा है।
वर्ष 2026 में जिले को 26 हजार 800 मानक बोरा तेन्दूपत्ता संग्रहण का लक्ष्य प्राप्त हुआ था, जिसके विरुद्ध 23 हजार 751 मानक बोरा तेन्दूपत्ता संग्रहित किया गया, जो लक्ष्य का लगभग 88.70 प्रतिशत है। संग्रहण कार्य में 26 हजार 550 संग्राहकों ने भागीदारी निभाई, जिन्हें 13 करोड़ 7 लाख रुपये से अधिक का पारिश्रमिक भुगतान किया जा चुका है।वर्ष 2025 में जिले में 25 हजार 275.63 मानक बोरा तेन्दूपत्ता संग्रहित हुआ था, जिसके लिए 27 हजार 887 संग्राहकों को 13 करोड़ 90 लाख रुपये का पारिश्रमिक पूर्ण रूप से वितरित किया गया था।
तेन्दूपत्ता संग्राहकों के कल्याण के लिए विभिन्न सामाजिक सुरक्षा एवं सुविधामूलक योजनाओं का भी प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है। वर्ष 2024-25 में 27 हजार 532 महिला संग्राहकों को चरण पादुका का वितरण किया गया है, जबकि 2025-26 में 28 हजार 723 पुरुष संग्राहकों को चरण पादुका उपलब्ध कराई जा रही है।इसके अलावा, वर्ष 2022 के बोनस के रूप में 24 हजार 529 संग्राहकों को 6 करोड़ 33 लाख रुपये का भुगतान किया जा चुका है। वहीं वर्ष 2023 के लिए स्वीकृत 3 करोड़ 92 लाख रुपये में से अधिकांश राशि का भुगतान पूर्ण हो चुका है तथा शेष राशि शीघ्र ही लाभार्थियों के खातों में पहुंच जाएगी।
वनधन विकास योजना के अंतर्गत वर्ष 2025-26 में न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना के तहत 144.68 क्विंटल लघु वनोपज का संग्रहण किया गया, जिसके एवज में 64 संग्राहकों को लगभग 3.50 लाख रुपये का भुगतान किया गया। इससे लघु वनोपज संग्रहण को भी आर्थिक मजबूती मिल रही है।
संघ संचालित समूह बीमा योजना के अंतर्गत मई 2026 तक प्राप्त 258 प्रकरणों में से 205 प्रकरणों का निराकरण कर 24.60 लाख रुपये की सहायता राशि वितरित की गई है।
इसी प्रकार राजमोहिनी देवी तेंदूपत्ता संग्राहक सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत प्राप्त 392 प्रकरणों में से 339 प्रकरणों को स्वीकृति प्रदान कर लगभग 4 करोड़ 43 लाख रुपये की सहायता राशि हितग्राहियों को उपलब्ध कराई गई है। इन योजनाओं से संकट की घड़ी में संग्राहक परिवारों को आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हो रही है।
तेन्दूपत्ता संग्राहक परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के उद्देश्य से संचालित शिक्षा प्रोत्साहन योजना के तहत शैक्षणिक वर्ष 2024-25 में 347 छात्र-छात्राओं को 39.13 लाख रुपये की छात्रवृत्ति प्रदान की गई। इस योजना के माध्यम से मेधावी एवं प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के साथ-साथ व्यावसायिक और गैर-व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहन मिल रहा है।
पीएम जनमन योजना के अंतर्गत विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय के लिए कल्लेमेटा में वनधन विकास केंद्र स्थापित किया गया है। यहां स्व-सहायता समूहों को दोना-पत्तल निर्माण, बांस आधारित उत्पाद निर्माण तथा अन्य स्वरोजगार गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है। इससे जनजातीय परिवारों की आय बढ़ने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं।
तेन्दूपत्ता संग्रहण से लेकर बोनस वितरण, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, बीमा, वनधन विकास तथा स्वरोजगार योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से जिला वनोपज सहकारी यूनियन, धमतरी वनाश्रित परिवारों के समग्र विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। राज्य शासन की जनकल्याणकारी नीतियों का लाभ सीधे हितग्राहियों तक पहुंचने से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है, बल्कि वन क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के जीवन स्तर में भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है।</description><guid>790</guid><pubDate>24-Jul-2026 5:41:02 pm</pubDate></item><item><title>ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना..... </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=789</link><description>अमर गायक मुकेश की जयंती पर विशेष 22 जुलाई 
फिल्मफेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरुष गायक थे मुकेश
मुकेश चंद माथुर (जन्म - 22 जुलाई 1923, दिल्ली, भारत - निधन- 27 अगस्त 1976),
-आलेख- प्रशांत शर्मा
लोकप्रिय तौर पर सिर्फ़ मुकेश के नाम से जाने वाले, हिन्दी सिनेमा के एक प्रमुख पाश्र्व गायक थे, जिनके गाने आज की पीढ़ी भी बड़े चाव से गुनगुनाती है। 
मुकेश की आवाज़ बहुत खूबसूरत थी पर उनके एक दूर के रिश्तेदार मोतीलाल ने उन्हें तब पहचाना जब उन्होंने उसे अपनी बहन की शादी में गाते हुए सुना। मोतीलाल उन्हें बम्बई ले गये और अपने घर में रहने दिया। यही नहीं उन्होंने मुकेश के लिए रियाज़ का पूरा इन्तजाम किया। इस दौरान मुकेश को एक हिन्दी फि़ल्म निर्दोष (1941) में मुख्य कलाकार का काम मिला। पाश्र्व गायक के तौर पर उन्हें अपना पहला काम 1945 में फि़ल्म पहली नजऱ में मिला। मुकेश ने हिन्दी फि़ल्म में जो पहला गाना गाया, वह था दिल जलता है तो जलने दे ....जिसमें अदाकारी मोतीलाल ने की। इस गीत में मुकेश के आदर्श गायक के एल सहगल के प्रभाव का असर साफ़-साफ़ नजऱ आता है। 1959 में अनाड़ी फि़ल्म के सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी गाने के लिए सर्वश्रेष्ठ पाश्र्व गायन का पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। 1974 में मुकेश को रजनीगन्धा फि़ल्म में कई बार यूं भी देखा है .... गाना गाने के लिए राष्ट्रीय फि़ल्म पुरस्कार मिला।
60 के दशक में मुकेश का करिअर अपने चरम पर था और अब मुकेश ने अपनी गायकी में नये प्रयोग शुरू कर दिये थे। उस वक्त के अभिनेताओं के मुताबिक उनकी गायकी भी बदल रही थी। जैसे कि सुनील दत्त और मनोज कुमार के लिए गाये गीत। 70 के दशक का आगाज़ मुकेश ने जीना यहां मरना यहां गाने से किया। उस वक्त के हर बड़े फि़ल्मी सितारों की ये आवाज़ बन गये थे। साल 1970 में मुकेश को मनोज कुमार की फि़ल्म पहचान के गीत के लिए दूसरा फि़ल्मफेयर मिला और फिर 1972 में मनोज कुमार की ही फि़ल्म के गाने के लिए उन्हें तीसरी बार फि़ल्मफेयर पुरस्कार दिया गया। 
इस दौर में मुकेश ज़्यादातर कल्याणजी-आंनदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर. डी. बर्मन जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम कर रहे थे। अपने उत्कृष्ट गायन के लिये ऐसा कौन सा पुरस्कार है जिसे मुकेश ने प्राप्त न किया हो। वे फिल्मफेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरुष गायक थे। वे उस ऊंचाई पर पहुंच गए थे कि पुरस्कारों कि गरिमा उनसे बढऩे लगी थी, लोकप्रियता के उस शिखर पर विद्यमान थे जहां पहुंच पाना किसी के लिए एक सपना होता है। करोड़ों भारतवासियों के हृदयों पर मुकेश का अखंड साम्राज्य था और रहेगा।
मुकेश ने विनोद मेहरा और फिऱोज़ ख़ान जैसे नये अभिनेताओं के लिए भी गाने गाये। 70 के दशक में भी इन्होंने अनेक सुपरहिट गाने दिये जैसे फि़ल्म धरम करम का एक दिन बिक जाएगा। फि़ल्म आनंद और अमर अकबर एंथनी की वो बेहतरीन नगमें। साल 1976 में यश चोपड़ा की फि़ल्म कभी कभी के इस शीर्षक गीत के लिए मुकेश को अपने करिअर का चौथा फि़ल्मफेयर पुरस्कार मिला और इस गाने ने उनके करिअर में फिर से एक नयी जान फूंक दी। मुकेश ने अपने करिअर का आखिरी गाना अपने दोस्त राज कपूर की फि़ल्म के लिए ही गाया था। मुकेश की राजकपूर के साथ अच्छी दोस्ती थी, लेकिन उन्होंने दिलीप कुमार के लिए सबसे अधिक गाने गाए। 
अपने करीब 35 साल के कॅरिअर में मुकेश ने हजारों कर्णप्रिय और लोकप्रिय गाने गाए जो आज भी उतने ही हसीन लगते हैं जितने पहली बार लोगों ने इन्हें सुना था। मुकेश ने हर तरह के गीत गाए हैं - रोमांस, देशभक्ति, खुशी और गम में डुबे हुए, लेकिन जो भी गाया पूर्णता और परिपक्वता से। रियाज़ से सन्तुष्ट होने पर ही रिकार्डिंग की सहमति देते थे। मेरा नाम जोकर का कालजयी गीत, जाने कहां गए वो दिन, उन्होंने सत्रह दिनों के अभ्यास के बाद रिकार्ड कराया था। पाश्चात्य और शास्त्रीय संगीत क अद्भुत संगम है इस गीत में। मुकेश की मधुर आवाज़ में उभरते दर्द ने इसे सर्वकालिक महान गीत बना दिया है।
 मुकेश का निधन 27 अगस्त, 1976 को अमेरिका में एक स्टेज शो के दौरान दिल का दौरा पडऩे से हुआ। उस समय वह गा रहे थे, एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल । उस कार्यक्रम का लता मंगेशकर और नितिन मुकेश भी हिस्सा थे। 
मुकेश साहब के गाए 15 लोकप्रिय गाने..
1. दिल जलता है, तो जलने दे 
2. जाने कहां गए वो दिन 3. सावन का महीना
4. चंदन सा बदन चंचल चितवन
5. कहीं दूर जब दिन ढल जाए
6. कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है
7. ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना
8. जीना यहां मरना यहां
9. तारो में सजके अपने सूरज से 
10. कई बार यूं भी देखा है 
11. मेरा जूता है जापानी
12. मेहबूब मेरे 
13. आवारा हूं
14. दुनिया बनाने वाले
15. डम डम डिगा डिगा</description><guid>789</guid><pubDate>22-Jul-2026 12:07:53 am</pubDate></item><item><title> सीड बॉल अभियान- हरियाली बढ़ाने का सरल और प्रभावी माध्यम</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=788</link><description>-जनभागीदारी से साकार हो रहा हरित छत्तीसगढ़ का संकल्प
विशेष लेख -धनंजय राठौर , संयुक्त संचालक , अशोक कुमार चंद्रवंशी ,सहायक जनसंपर्क अधिकारी
 सीड बॉल पर्यावरण को हरा-भरा बनाने और वनीकरण (रिफॉरेस्टेशन) का एक बेहद सरल, किफायती और अत्यधिक प्रभावी माध्यम है। इसमें बीजों को मिट्टी और जैविक खाद के मिश्रण से छोटी-छोटी गोलियों के रूप में सुरक्षित कर दिया जाता है, जिससे वे बिना मेहनत के दुर्गम स्थानों पर भी उग जाते हैं। सीड बॉल- बीज, मिट्टी (मुख्य रूप से चिकनी मिट्टी) और जैविक खाद (गोबर या वर्मीकम्पोस्ट) का एक छोटा और सूखा गोला होता है। बीजों को इस प्राकृतिक आवरण में लपेटकर सुखा लिया जाता है। मानसून की पहली अच्छी बारिश के बाद जब मिट्टी में पर्याप्त नमी हो, तब सीड बॉल्स का उपयोग करना सबसे अच्छा होता है। इन्हें यात्रा करते समय या खाली जगहों पर पैदल चलते हुए मिट्टी पर बिखेर दें। पानी के संपर्क में आते ही ये पौधे के रूप में विकसित होना शुरू हो जाती हैं।
 बारिश का मौसम पौधारोपण और वनों के विस्तार के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। इसी उद्देश्य से वन विभाग द्वारा सीड बॉल (बीज गोला) अभियान चलाया जा रहा है। यह अभियान जनभागीदारी के माध्यम से ऐसे क्षेत्रों में हरियाली बढ़ाने का प्रभावी प्रयास है, जहाँ पौधारोपण करना कठिन होता है।
क्या है सीड बॉल?
सीड बॉल मिट्टी, गोबर या जैविक खाद और विभिन्न वृक्षों के बीजों से तैयार किया गया छोटा गोलाकार गोला होता है। इसे जंगलों, पहाड़ियों, खाली भूमि और दुर्गम क्षेत्रों में फेंक दिया जाता है। वर्षा का पानी मिलने पर बीज अंकुरित होकर पौधों का रूप ले लेते हैं।
वन विभाग का हरित अभियान
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के सशक्त नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप के निर्देशानुसार छत्तीसगढ़ वन विभाग द्वारा एक पेड़ मां के नाम, वन महोत्सव तथा युवा फॉर नेचर जैसे अभियानों के साथ सीड बॉल कार्यक्रम को भी व्यापक स्तर पर संचालित किया जा रहा है। स्कूलों, महाविद्यालयों, स्वयंसेवी संस्थाओं, महिला स्व-सहायता समूहों और स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी से हजारों-लाखों सीड बॉल तैयार कर जंगलों और खाली भूमि में डाली जा रही हैं।
जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका
सीड बॉल में महुआ, इमली, हर्रा, बहेड़ा, जामुन, करंज, नीम, बरगद, पीपल, आम, जामुन, शाल, बीजा, चार, खमार सहित स्थानीय प्रजातियों के बीजों का उपयोग किया जाता है। इससे प्राकृतिक वनों का विस्तार होता है, वन्यजीवों को भोजन और आश्रय मिलता है तथा जैव विविधता का संरक्षण भी सुनिश्चित होता है।
पर्यावरण संरक्षण का सशक्त माध्यम
सीड बॉल अभियान से हरित आवरण बढ़ने के साथ-साथ जल संरक्षण, मिट्टी के क्षरण या कटाव में कमी, कार्बन अवशोषण तथा जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में भी सहायता मिलती है। यह कम लागत में अधिक क्षेत्र को हरित बनाने का प्रभावी उपाय है।
जनभागीदारी से बनेगा हरित भविष्य
 वन विभाग का उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि समाज में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता विकसित करना भी है। जब बच्चे, युवा, महिलाएं और ग्रामीण इस अभियान से जुड़ते हैं, तो हर व्यक्ति प्रकृति संरक्षण का सहभागी बनता है।
हर नागरिक निभाए अपनी जिम्मेदारी
 यदि प्रत्येक नागरिक वर्षा ऋतु में कुछ सीड बॉल तैयार कर उपयुक्त स्थानों पर डाले या पौधारोपण में भागीदारी करे, तो आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ का हरित क्षेत्र और अधिक समृद्ध होगा। सीड बॉल अभियान प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी निभाने का एक सरल, सुलभ और प्रभावी माध्यम है।</description><guid>788</guid><pubDate>22-Jul-2026 2:24:44 pm</pubDate></item><item><title>धमतरी मॉडल बना देश के लिए प्रेरणा</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=787</link><description>-औषधीय पौधों की खेती से बदली महिलाओं की तकदीर, बढ़ेगा दायरा
-अनुपयोगी भूमि पर उगी समृद्धि की नई फसल
विशेष लेख-धनंजय राठौर संयुक्त संचालक, शशिरत्न पाराशर उप संचालक
रायपुर / छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा रायपुर सहित विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष योजना चलाई जा रही है। इसके तहत, अनुपयोगी पड़ी घरों की बाड़ी में महिलाओं को सिंदूरी, सतावर और अश्वगंधा जैसे औषधीय पौधे निरूशुल्क दिए जा रहे हैं, जिससे उन्हें घर पर ही नियमित आय मिल रही है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले की महिलाओं द्वारा अनुपयोगी भूमि और यहाँ तक कि बेकार नाले के पानी का उपयोग कर औषधीय पौधे उगाने की कई प्रेरक पहलें देखने को मिली हैं। इन प्रयासों से न केवल बंजर जमीन हरी-भरी हो रही है, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भरता और बेहतर स्वास्थ्य का लाभ भी मिल रहा है।
जहां कभी अनुपयोगी भूमि थी, वहां आज औषधीय पौधों की हरियाली लहरा रही है। जहां महिलाएं केवल पारंपरिक खेती तक सीमित थीं, वहीं आज वे लाखों रुपये की आय अर्जित कर आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं। यह केवल एक जिले की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण, प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग और कृषि नवाचार का ऐसा मॉडल है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। छत्तीसगढ़ का धमतरी जिला आज औषधीय एवं सुगंधीय फसलों के कृषिकरण का राष्ट्रीय मॉडल बनकर उभरा है। यहां कृषि, आजीविका, पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ऐसा समन्वय देखने को मिलता है, जो विकसित भारत और आत्मनिर्भर गांवों की अवधारणा को साकार करता है।
 धमतरी कृषि प्रधान जिला है। यहां की अधिकांश आबादी धान आधारित खेती पर निर्भर रही है। हालांकि धान उत्पादन जिले की पहचान है, लेकिन सीमित आय, प्राकृतिक जोखिम और अनुपयोगी भूमि की चुनौती लंबे समय से बनी हुई थी। महानदी के किनारे की रेतीली भूमि, कटाव प्रभावित क्षेत्र और ग्राम पंचायतों की अनुपयोगी जमीन आर्थिक दृष्टि से पर्याप्त उपयोग में नहीं आ पा रही थी। ऐसे समय में जिला प्रशासन ने इन चुनौतियों को अवसर में बदलने का निर्णय लिया। सोच स्पष्ट थीकृयदि अनुपयोगी भूमि पर ऐसी फसलें उगाई जाएं जिनकी बाजार में स्थायी मांग हो, जिनमें लागत कम और लाभ अधिक हो, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन लाया जा सकता है।
 वर्ष 2025 में कलेक्टर श्री अबिनाश मिश्रा के मार्गदर्शन में जिला प्रशासन ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) तथा राज्य औषधीय पादप बोर्ड के सहयोग से औषधीय एवं सुगंधीय फसलों के कृषिकरण की अभिनव पहल प्रारंभ की। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसे केवल कृषि कार्यक्रम नहीं माना गया, बल्कि महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण आजीविका का व्यापक मिशन बनाया गया। योजना के प्रारंभिक चरण में जिले का विस्तृत सर्वेक्षण कराया गया। अनुपयोगी भूमि, रेतीले क्षेत्र और कम उत्पादक भूमि की पहचान कर वहां औषधीय खेती की संभावनाओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया।
 महिला स्व-सहायता समूहों को इस अभियान का केंद्र बनाया गया। राज्य औषधीय पादप बोर्ड के सहयोग से खस, ब्राह्मी, बच, लेमनग्रास, पामारोजा और पचौली जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों की गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री उपलब्ध कराई गई। महिलाओं को विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और नियमित फील्ड सपोर्ट दिया गया। सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था रहीकृशत-प्रतिशत बाय-बैक, जिससे किसानों और महिलाओं को अपने उत्पाद के विपणन की चिंता नहीं रही। प्रथम चरण में लगभग 150 एकड़ क्षेत्र में 200 महिला स्व-सहायता समूह सदस्यों को जोड़ा गया। लगभग 80 एकड़ में खस, 20 एकड़ में ब्राह्मी, 10 एकड़ में बच तथा 40 एकड़ में लेमनग्रास, पामारोजा और पचौली का रोपण किया गया। कुछ ही समय में परिणाम सामने आने लगे। जो भूमि पहले अनुपयोगी मानी जाती थी, वहीं से प्रति एकड़ लगभग एक लाख रुपये तक की आय प्राप्त होने लगी। महिलाओं ने इस आय का उपयोग बच्चों की शिक्षा, परिवार की जरूरतों, कृषि उपकरणों की खरीद और छोटे व्यवसाय शुरू करने में किया। इससे उनकी आर्थिक स्थिति के साथ-साथ सामाजिक आत्मविश्वास में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। आदर्श महिला कृषक समूह कंडेल सत्या ढीमर बताती हैं कि पहले उनकी पूरी निर्भरता धान की खेती पर थी। औषधीय खेती के बारे में जानकारी नहीं थी, लेकिन प्रशिक्षण, पौध सामग्री और खरीद की सुनिश्चित व्यवस्था ने उनका भरोसा बढ़ाया। आज उनकी आय कई गुना बढ़ चुकी है। समूह पूना साहू ,श्रीमती कुंती ढीमर कहती हैं कि इस योजना ने केवल आय ही नहीं बढ़ाई, बल्कि महिलाओं को निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी दिया है। अब वे बैंकिंग, समूह प्रबंधन और उद्यमिता में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं तथा अन्य महिलाओं को भी इस दिशा में प्रेरित कर रही हैं।
किसान श्री अशोक नेताम बताते हैं कि कम पानी वाली भूमि में लेमनग्रास और खस जैसी फसलें उम्मीद से कहीं अधिक सफल साबित हुई हैं। अब जिले के अनेक किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ औषधीय खेती को भी अपनाने लगे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार की प्राथमिकताओं में महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को विशेष महत्व दिया गया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार महिला स्व-सहायता समूहों को स्वरोजगार, मूल्य संवर्धन और बाजार से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। राज्य में लखपति दीदी अभियान को गति देने के लिए कृषि, वनोपज, पशुपालन और ग्रामीण उद्यमिता को एकीकृत किया जा रहा है।
 धमतरी का औषधीय खेती मॉडल इसी सोच का प्रभावी उदाहरण है। इस पहल ने महिलाओं को केवल खेती तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें उद्यमी बनने का अवसर प्रदान किया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय का स्पष्ट विजन है कि छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थानीय संसाधनों पर आधारित, टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाया जाए। औषधीय एवं सुगंधीय फसलों का विस्तार इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
धमतरी मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल उत्पादन पर नहीं, बल्कि संपूर्ण वैल्यू चेन विकसित करने पर जोर दिया गया है। कुरूद विकासखंड के कोटगांव और पचपेड़ी में औषधीय पौधों की नर्सरी विकसित की जा रही है, ताकि स्थानीय स्तर पर गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही भविष्य में औषधीय उत्पादों के प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग), आवश्यक तेल (म्ेेमदजपंस व्पस) निष्कर्षण, पैकेजिंग और मूल्य संवर्धन की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है। यदि स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित होते हैं, तो इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, परिवहन लागत घटेगी और किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलेगा। यह ग्रामीण औद्योगिकीकरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल होगी।
धमतरी के इस नवाचार को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली। 9 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित महाकुंभ-2025 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और कृषि जागरण के संयुक्त मंच पर जिले को औषधीय एवं सुगंधीय पौधों के कृषिकरण में उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया गया। इसके बाद हैदराबाद, बिहार, मध्यप्रदेश सहित अनेक राज्यों के किसान, अधिकारी, स्वयंसेवी संस्थाएं और विभिन्न संगठन धमतरी पहुंचकर इस मॉडल का अध्ययन करने लगे। आज धमतरी का मॉडल देश के अनेक जिलों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।
 प्रथम चरण की सफलता के बाद अब लक्ष्य इस पहल को 500 एकड़ तक विस्तारित करने का है। इसके माध्यम से 500 से अधिक महिलाओं को लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। राज्य औषधीय पादप बोर्ड, कृषि विभाग, उद्यानिकी विभाग, बिहान तथा अन्य विभागों के समन्वय से चारों विकासखंडों में प्रशिक्षण, कार्यशालाएं और तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है, ताकि अधिकाधिक किसान और महिला समूह इस अभियान से जुड़ सकें। औषधीय खेती का महत्व केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं है। ब्राह्मी, बच, लेमनग्रास और अन्य औषधीय पौधे स्वास्थ्य परंपरा को भी मजबूत करते हैं। इन फसलों से भूमि संरक्षण, हरित आवरण में वृद्धि, जैव विविधता का संवर्धन तथा जलवायु परिवर्तन के प्रति कृषि की अनुकूलन क्षमता भी बढ़ती है। आज जब पूरी दुनिया टिकाऊ कृषि (ैनेजंपदंइसम ।हतपबनसजनतम), प्राकृतिक खेती और जैव विविधता संरक्षण की बात कर रही है, तब धमतरी का यह मॉडल इन सभी उद्देश्यों को व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करता है।
धमतरी की यह सफलता बताती है कि जब दूरदर्शी नेतृत्व, प्रभावी प्रशासन, वैज्ञानिक तकनीक, महिला शक्ति और स्थानीय संसाधनों का समन्वय होता है, तब विकास की नई संभावनाएं जन्म लेती हैं। यह मॉडल केवल औषधीय खेती का नहीं, बल्कि ग्रामीण नवाचार, महिला उद्यमिता, आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास का जीवंत उदाहरण है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार किसानों की आय बढ़ाने, महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने, मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहित करने और स्थानीय संसाधनों पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था विकसित करने के लिए सतत कार्य कर रही है। धमतरी का औषधीय खेती मॉडल इन प्रयासों का उत्कृष्ट प्रतिफल है।
आज धमतरी जिला ने यह सिद्ध कर दिया है कि विकास केवल बड़े उद्योगों से नहीं, बल्कि गांव की महिलाओं के हाथों में नई संभावनाएं सौंपकर भी संभव है। औषधीय खेती की यह हरियाली केवल खेतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह आत्मनिर्भर गांवों, सशक्त महिलाओं, समृद्ध किसानों और विकसित छत्तीसगढ़ की नई पहचान बन चुकी है। आने वाले वर्षों में यह मॉडल निश्चित रूप से देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा।</description><guid>787</guid><pubDate>20-Jul-2026 4:07:31 pm</pubDate></item><item><title>कौशल से सशक्त युवा, विकसित छत्तीसगढ़ की ओर मजबूत कदम</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=786</link><description>-विश्व युवा कौशल विकास दिवस
- विशेष लेख  लक्ष्मीकांत कोसरिया, उप संचालक
कौशल ही आज के समय की सबसे बड़ी पूंजी है। जिस युवा के पास हुनर है, उसके लिए अवसरों की कोई कमी नहीं है। इसी सोच को साकार करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के माध्यम से प्रदेश के युवाओं को रोजगारोन्मुखी एवं उद्योगों की मांग के अनुरूप आधुनिक कौशल प्रशिक्षण प्रदान कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की विशा में लगातार कार्य कर रही है।
विश्व युवा कौशल विकास दिवस के अवसर पर यह कहना सार्थक होगा कि छत्तीसगढ़ ने कौशल विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। राज्य में युवाओं को केवल प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण के साथ रोजगार सुनिश्चित करने की दिशा में भी प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के प्रारंभ से अब तक प्रदेश के 4 लाख 94 हजार 330 युवाओं को विभिन्न रोजगारपरक ट्रेडों में कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। इनमें से 2 लाख 74 हजार 934 युवाओं को रोजगार से जोड़ा जा चुका है। वर्तमान में योजना के अंतर्गत राज्यभर में 375 व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रवाता (199 शासकीय एवं 176 अशासकीय) के माध्यम से राष्ट्रीय कौशल अर्हता फ्रेमवर्क (NSQF) के अनुरूप उच्च गुणवत्ता वाले प्रशिक्षण संचालित किए जा रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक 9 हजार 418 युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया है, जिनमें से 7 हजार 528 युवाओं को रोजगार प्राप्त हो चुका है, जबकि 6 हजार 679 युवा वर्तमान में विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
राज्य सरकार ने युवाओं को भविष्य की तकनीकों से जोड़ने के लिए कौशल प्रशिक्षण में व्यापक बदलाव किए हैं। अब पारंपरिक ट्रेडों के साथ-साथ इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) मेंटेनेंस, ड्रोन ऑपरेटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं मशीन लर्निंग (AI-ML), साइबर सुरक्षा, सूर्यमित्र (सौर ऊर्जा) जैसे 21 वीं सदी के अत्याधुनिक पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इस वर्ष विशेष रूप से जल वितरण संचालक (Water Distribution Operator) कोर्स प्रारंभ किया गया है, जिसके अंतर्गत 2,770 युवाओं को मल्टी-स्किल प्रशिक्षण देकर सीधे रोजगार से जोड़ने की कार्ययोजना बनाई गई है।
गुणवत्ता पर विशेष जोर
छत्तीसगढ़ में कौशल विकास केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। अब प्रत्येक प्रशिक्षक के लिए शैक्षणिक योग्यता एवं अनुभव के साथ प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण (Training of Trainers-TOT) प्रमाणन अनिवार्य किया गया है। इससे प्रशिक्षण की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आया है। प्रत्येक प्रशिक्षणार्थी के लिए मूल्यांकन से पहले कम से कम सात दिवस का ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग (OJT) अनिवार्य किया गया है, जिससे उन्हें उद्योगों की वास्तविक कार्यप्रणाली का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो सके। प्रशिक्षण केंद्रों में फेस आधारित ऑनलाइन बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू की गई है। साथ ही सभी प्रशिक्षण केंद्रों में आई.पी. आधारित सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिनके माध्यम से प्रशिक्षण गतिविधियों की सतत निगरानी की जा रही है। इन व्यवस्थाओं से पारदर्शिता बढ़ी है तथा प्रशिक्षण की गुणवत्ता और अनुशासन में सुधार हुआ है।
प्रशिक्षण के साथ रोजगार की भी गारंटी
मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रशिक्षण के बाद युवाओं के रोजगार पर विशेष ध्यान दिया जाता है। प्रशिक्षण संचालन की अनुमति देने से पहले प्रत्येक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदाता द्वारा रोजगार उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं का परीक्षण किया जाता है। परीक्षण के बाद ही प्रशिक्षण संचालन की अनुमति प्रदान की जाती है। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण केंद्रों को मिलने वाली राशि का 60 प्रतिशत भुगतान तभी किया जाता है, जब प्रशिक्षित युवाओं का नियोजन सुनिश्चित हो जाता है। यह व्यवस्था प्रशिक्षण संस्थानों को रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण देने के लिए प्रेरित करती है।
बस्तर के युवाओं तक पहुंच रहा कौशल विकास
प्रदेश के दूरस्थ एवं आदिवासी क्षेत्रों के युवाओं तक कौशल विकास पहुंचाने के लिए बस्तर संभाग के प्रत्येक विकासखंड में स्किल डेवलपमेंट सेंटर (SDC) स्थापित करने की कार्यवाही की जा रही है। जिला बीजापुर में असिस्टेंट मेसन कोर्स प्रारंभ किया जा चुका है। वहीं बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, सुकमा, कांकेर एवं बीजापुर सहित छह पुनर्वास केंद्रों का व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदाता के रूप में पंजीयन किया गया है तथा अन्य केंद्रों को भी शीघ्र जोड़ा जा रहा है।
उद्योगों के साथ साझेवारी से बढ़ रही रोजगार क्षमता
राज्य सरकार ने उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के लिए प्रतिष्ठित संस्थाओं के साथ महत्वपूर्ण समझौते किए हैं।
महिंद्रा एंड महिंद्रा के साथ ट्रैक्टर मैकेनिक प्रशिक्षण प्रारंभ किया गया है, जिसके अंतर्गत अब तक 101 युवा प्रशिक्षित हो चुके हैं तथा 60 युवा प्रशिक्षणरत हैं।
साइरोनिक्स टेक्नोलॉजी प्रा. लि. के सहयोग से रायपुर के लाईवलीहुड कॉलेज में इलेक्ट्रिक व्हीकल टेक्नोलॉजी के पांच जॉब रोल में प्रशिक्षण संचालित किया जा रहा है।
नांदी फाउंडेशन के सहयोग से सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित महिलाओं को एम्प्लॉयबिलिटी स्किल्स का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 1,142 युवा प्रशिक्षित हो चुके हैं।
पर्यटन एवं हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में व लॉन्ड्री बैग के साथ साझेदारी कर लॉन्ड्री सुपरवाइजर एवं अन्य रोजगारपरक प्रशिक्षण प्रारंभ किए गए हैं।
स्वास्थ्य क्षेत्र में श्री सत्य साई हेल्थ एवं एजुकेशन ट्रस्ट के सहयोग से कार्डियक एवं स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित उन्नत कौशल प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किए जा रहे हैं।
लाईवलीहुड कॉलेज बने कौशल विकास के सशक्त केंद्र
प्रदेश के जिलों में संचालित लाईवलीहुड कॉलेज आज युवाओं के लिए कौशल विकास का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। वर्ष 2013 से अब तक इन कॉलेजों में 68 हजार 552 युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। इनमें से 28 हजार 820 युवाओं को रोजगार तथा 10 हजार 632 युवाओं को स्वरोजगार प्राप्त हुआ है। इस प्रकार कुल 39 हजार 452 युवा आजीविका से जुड़ चुके हैं। वर्तमान में 2 हजार 413 युवा प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इसी प्रकार पीएम विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत वर्ष 2024 से अब तक 13 हजार 188 युवाओं को लाईवलीहुड कॉलेजों के माध्यम से प्रशिक्षण दिया गया है।
आधुनिक अधोसंरचना का विस्तार
राज्य के 26 जिलों में लाईवलीहुड कॉलेज भवन पूर्ण होकर संचालित हैं। नवीन जिलों में भी भवन निर्माण एवं भूमि आबंटन की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है। प्रदेश में 26 बालिका छात्रावास तथा 20 बालक छात्रावास पूर्ण होकर संचालित हैं। शेष छात्रावासों का निर्माण एवं भूमि आबंटन कार्य प्रगति पर है।
नवा रायपुर में बनेगा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस
छत्तीसगढ़ सरकार युवाओं को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठा रही है।नवा रायपुर में लाईवलीहुड सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना की जाएगी, जहां अत्याधुनिक मशीनों, आधुनिक प्रयोगशालाओं, विशेष कार्यशालाओं तथा उद्योगों की मांग के अनुरूप इंजीनियरिंग एवं गैर-इंजीनियरिंग क्षेत्रों में विश्वस्तरीय कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाएगा। वित्तीय वर्ष 2026-27 में इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए भूमि लीज अनुबंध हेतु 2 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया है।
कौशल विकास से आत्मनिर्भरता की नई विशा
विश्व युवा कौशल विकास दिवस पर छत्तीसगढ़ का अनुभव यह दर्शाता है कि कौशल विकास केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि युवाओं को आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और रोजगारयुक्त बनाने का सशक्त अभियान है। नई तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण, उद्योगों के साथ साझेदारी, रोजगार सुनिश्चित करने की व्यवस्था तथा आधुनिक अधोसंरचना के माध्यम से छत्तीसगढ़ वेश में कौशल विकास का एक प्रभावी मॉडल बनकर उभर रहा है। आने वाले वर्षों में यह पहल न केवल लाखों युवाओं के जीवन में परिवर्तन लाएगी, बल्कि विकसित छत्तीसगढ़ और विकसित भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ की पहचान
प्रदेश के युवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिल रहा है। वर्ष 2025-26 में 19 कौशल ट्रेडों में आयोजित जिला एवं राज्य स्तरीय इंडिया स्किल प्रतियोगिता में 3,327 युवाओं ने भाग लिया, जिनमें से 381 प्रतिभागी राज्य स्तर तक पहुंचे। ईस्ट जोन क्षेत्रीय प्रतियोगिता, भुवनेश्वर में छत्तीसगढ़ के 38 प्रतिभागियों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए 01 स्वर्ण, 02 रजत, 05 कांस्य एवं 04 मेडल ऑफ एक्सीलेंस सहित कुल 12 पदक अर्जित किए।
वहीं राष्ट्रीय स्तर की इंडिया स्किल प्रतियोगिता में राज्य के 03 प्रतिभागियों ने प्रतिनिधित्व किया, जिनमें से 01 प्रतिभागी ने मेडल ऑफ एक्सीलेंस प्राप्त किया। उत्कृष्ट प्रदर्शन एवं सफल आयोजन के लिए भारत सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ को प्रशस्ति पत्र से भी सम्मानित किया गया।</description><guid>786</guid><pubDate>16-Jul-2026 12:31:53 pm</pubDate></item><item><title>अकादमिक सशक्तिकरण, रोजगार सृजन और कर्मचारी हितों के साथ आगे बढ़ता छत्तीसगढ़</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=785</link><description>-362 सहायक प्राध्यापक बने प्रोफेसर, 152 प्रोफ़ेसर हुए प्राचार्य पदोन्नति, शैक्षणिक नेतृत्व को मिली नई मजबूती
-595 पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू, 700 नए पदों की मंजूरी, युवाओं के लिए सरकारी सेवा के बड़े अवसर
-​72 सहायक प्राध्यापकों को 37.23 करोड़ रुपये एरियर्स, 935 की परिवीक्षा अवधि समाप्त
-​सेवा सुरक्षा को मिला मजबूत आधार, 34 अनुकंपा नियुक्तियां, 118 कर्मचारियों को उच्चतर समयमान वेतनमान, कर्मचारी कल्याण को मिली संवेदनशील दिशा
विशेष लेख - विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालक
 ​किसी भी राज्य की प्रगति का वास्तविक पैमाना उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है और इसकी गुणवत्ता केंद्र में खड़े शिक्षक, अधिकारी और कर्मचारियों की सक्षमता, सुरक्षा और सम्मान पर निर्भर करती है। जब उच्च शिक्षा व्यवस्था में कार्यरत मानव संसाधन को पदोन्नति, सेवा सुरक्षा, वित्तीय सम्मान और शोध के अवसर एक साथ मिलते हैं, तब शिक्षा राज्य के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की सबसे मजबूत धुरी बन जाती है। छत्तीसगढ़ का उच्च शिक्षा विभाग इन दिनों इसी व्यापक और समग्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है।
राज्य सरकार ने उच्च शिक्षा विभाग को केवल भवनों, पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं तक सीमित न रखकर उसे अकादमिक गुणवत्ता, प्रशासनिक दक्षता, रोजगार सृजन, शोध संवर्धन और कर्मचारी कल्याण से जोड़ा है। हाल के महीनों में लिए गए निर्णय इस बात के प्रमाण हैं कि सरकार उच्च शिक्षा संस्थानों को भविष्य के ज्ञान-केंद्रों के रूप में विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। पदोन्नतियों की लंबित फाइलों को गति देना, नई भर्तियां, वेतनमान व एरियर्स का निराकरण, तकनीकी स्टाफ की नियुक्ति, शोध को प्रोत्साहन और अनुकंपा नियुक्ति जैसे कदमों से विभाग ने हर मोर्चे पर ठोस और संवेदनशील पहल की है।
 ​उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता का एक बड़ा आधार उनका नेतृत्व होता है। जब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में योग्य और अनुभवी शिक्षकों को समय पर पदोन्नति मिलती है, तो उसका सीधा असर संस्थान की कार्यसंस्कृति और प्रशासनिक क्षमता पर दिखाई देता है। लंबित पदोन्नति प्रक्रियाओं को गति देकर राज्य सरकार ने एक निर्णायक पहल की है।
 ​वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 362 सहायक प्राध्यापकों को पदोन्नत कर प्राध्यापक (प्रोफेसर) बनाया गया है। इसके साथ ही 152 पदोन्नत प्राध्यापकों को स्नातक प्राचार्य तथा 07 स्नातक प्राचार्यों को स्नातकोत्तर (PG) प्राचार्य के पद पर पदोंन्नत किया गया है। इन निर्णयों से महाविद्यालयों की कमान अनुभवी हाथों में पहुँची है, जिससे संस्थागत निर्णय क्षमता, शैक्षणिक अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत होगी।
 ​गुणवत्तापूर्ण शिक्षण व्यवस्था के लिए संस्थानों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक और विशेषज्ञ अनिवार्य हैं। राज्य सरकार ने रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू कर युवाओं के लिए सरकारी सेवा में प्रवेश के बड़े अवसर निर्मित किए हैं। शासकीय महाविद्यालयों में प्राध्यापकों के 595 पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया आधिकारिक रूप से प्रारंभ हो चुकी है।
 ​इसके अतिरिक्त, विभागीय संरचना को सशक्त बनाने के लिए कुल 700 पदों पर सीधी भर्ती को मंजूरी दी गई है। इनमें 625 पद सहायक प्राध्यापक, 50 पद ग्रंथपाल और 25 पद क्रीड़ाधिकारी के शामिल हैं। सहायक प्राध्यापकों की भर्ती से विषयवार अध्यापन की गुणवत्ता बेहतर होगी, ग्रंथपालों से पुस्तकालय अकादमिक संसाधनों के प्रभावी केंद्र बनेंगे और क्रीड़ाधिकारियों से विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास होगा। यह अभियान प्रदेश के योग्य युवाओं को सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराने का सशक्त माध्यम बनने जा रहा है।
 ​राज्य में सहायक प्राध्यापक बनने की आकांक्षा रखने वाले हजारों युवाओं के लिए राज्य पात्रता परीक्षा (CG-SET) एक महत्वपूर्ण अवसर है। विभाग द्वारा CG-SET का आयोजन 04 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित है l सरकार नई पीढ़ी की प्रतिभाओं को अकादमिक करियर में आगे बढ़ाने के लिए गंभीर है। यह परीक्षा छत्तीसगढ़ के युवाओं को प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक परिदृश्य और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बनाने का अवसर देती है।
 ​विज्ञान, प्रौद्योगिकी और व्यावसायिक विषयों के लिए प्रयोगशालाएं, उपकरण और प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ उतने ही आवश्यक हैं जितने कक्षा और कक्ष। वर्ष 2025-26 के दौरान प्रयोगशाला तकनीशियन के 260 रिक्त पदों के विरुद्ध 247 अभ्यर्थियों तथा प्रयोगशाला परिचारक के 429 रिक्त पदों के विरुद्ध 399 अभ्यर्थियों को नियुक्ति आदेश जारी किए जा चुके हैं। तकनीकी स्टाफ की उपलब्धता से प्रयोगशालाओं का नियमित संचालन और विद्यार्थियों को व्यवहारिक प्रशिक्षण देने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी।
विभागीय मजबूती का सबसे बड़ा आधार कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा, न्यायपूर्ण वेतन संरचना और लंबित मामलों का समयबद्ध समाधान है। आपातकालीन रूप से अचयनित रहे 72 सहायक प्राध्यापकों को उनकी प्रथम नियुक्ति तिथि से वरिष्ठ, प्रवर श्रेणी और पे-बैंड-4 की स्वीकृति देकर 37.23 करोड़ रुपये की एरियर्स राशि उनके खातों में अंतरित की गई है, जो संस्थागत न्याय का प्रतीक है।
 ​इसी तरह, वर्ष 2021 और 2022 में नियुक्त लगभग 1168 सहायक प्राध्यापकों में से रिकॉर्ड 935 नवनियुक्त प्राध्यापकों की परिवीक्षा अवधि समाप्त करने के आदेश जारी किए गए हैं। परिवीक्षा समाप्त होना कर्मचारियों के लिए स्थायित्व और पेशेवर सुरक्षा का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिससे विभाग के भीतर प्रतिबद्ध शैक्षणिक कार्यबल तैयार हुआ है।
​उच्च शिक्षा व्यवस्था में शोध और नवाचार की भूमिका को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा 577 सहायक प्राध्यापकों को पीएचडी करने की अनुमति देना एक दूरदर्शी निर्णय है। अधिक शिक्षक जब शोध से जुड़ेंगे, तो कक्षा में अद्यतन ज्ञान पहुंचेगा और महाविद्यालयों में बौद्धिक विमर्श का स्तर ऊपर उठेगा। ​शिक्षकों के साथ-साथ तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी भी व्यवस्था की रीढ़ हैं। दिसंबर 2023 से अब तक दिवंगत कर्मचारियों के 34 आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति प्रदान की गई है, जो संकटग्रस्त परिवारों को जीवन संभालने का संबल देती है। इसके अतिरिक्त, 324 कर्मचारियों को उच्चतर समयमान वेतनमान प्रदान किया गया है और वर्ष 2024-25 की पदोन्नति संबंधी समस्त कार्यवाहियां समय सीमा में पूर्ण कर ली गई हैं।
उच्च शिक्षा विभाग के ये फैसले मिलकर एक व्यापक परिवर्तनकारी मॉडल की रचना करते हैं, जहां नेतृत्व सुदृढ़ीकरण, नई भर्ती, सेवा सुरक्षा, कर्मचारी कल्याण, तकनीकी संसाधन और शोध संवर्धन एक साथ आगे बढ़ते हैं। छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जो परिवर्तन आज दिखाई दे रहे हैं, वे केवल विभागीय उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि एक ऐसी नीति-दृष्टि हैं जिसमें शिक्षा को राज्य के भविष्य निर्माण का केंद्रीय माध्यम माना गया है। आने वाले समय में ये प्रयास छत्तीसगढ़ के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को ज्ञान, शोध, नेतृत्व और सामाजिक परिवर्तन के सशक्त केंद्र के रूप में स्थापित करेंगे।</description><guid>785</guid><pubDate>15-Jul-2026 7:36:49 pm</pubDate></item><item><title>स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सिद्ध योगी और समाज परिवर्तन के अग्रदूत पं. ज्वाला प्रसाद शर्मा... </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=784</link><description>- युगपुरुष पंडित ज्वाला प्रसाद उपाध्याय (शर्मा) की शताब्दी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि
-गुुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी तीन बार रुके थे पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के महासमुंद स्थित निवास स्थान में
-लेखक-प्रशांत शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)
16 जुलाई का दिन छत्तीसगढ़ के लिए गौरव, स्मरण और प्रेरणा का दिन है। आज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, अखिल भारतीय गायत्री परिवार के सिद्ध योगी एवं समाज चेतना के प्रखर संवाहक पंडित ज्वाला प्रसाद उपाध्याय (शर्मा) की शताब्दी जयंती है। यदि वे आज हमारे बीच होते, तो उनका 100वाँ जन्मदिन पूरे प्रदेश में बड़े उत्साह, श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाता। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि जो भी एक बार उनके संपर्क में आता, वह जीवन भर उनका सम्मान करता और उनके स्नेह का मुरीद हो जाता। उनकी कर्मभूमि महासमुंद ही नहीं, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ उनके कार्यों का साक्षी है। अखिल भारतीय गायत्री परिवार के माध्यम से उन्होंने विशेष रूप से महासमुंद सहित पूरे प्रदेश में आध्यात्मिक जागरण, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों की ऐसी अलख जगाई, जिसकी ज्योति आज भी असंख्य लोगों के जीवन को आलोकित कर रही है। मेरा उनसे केवल पारिवारिक रिश्ता नहीं था। वे मेरे बड़े पिताश्री थे, जिन्हें हम सभी स्नेहपूर्वक बड़ा जी कहकर पुकारते थे। बचपन से ही मुझे हमेशा यह अनुभव हुआ कि हमारा संबंध केवल इस जन्म का नहीं, बल्कि संस्कारों, श्रद्धा और आत्मीयता का था। मेरा पैतृक गांव टेकारी (जिला रायपुर) उनकी जन्मभूमि थी, इसलिए इस गाँव से उनका विशेष लगाव था। यह मेरा सौभाग्य रहा कि उनके सान्निध्य में मुझे अपने पैतृक गाँव टेकारी में तीन बार माँ गायत्री महायज्ञ आयोजित कराने का अवसर मिला। आयोजन की जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी, लेकिन मुझे पूरा विश्वास था कि उनके मार्गदर्शन में कोई बाधा नहीं आएगी। 25 गाँवों से हजारों श्रद्धालु तीन दिनों तक इस महायज्ञ में शामिल हुए। बड़ा जी के कुशल नेतृत्व और प्रेरणा से सभी लोगों ने अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ इतनी सहजता और समर्पण के साथ निभाईं कि पूरा आयोजन बिना किसी विघ्न के सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। आज उस घटना को लगभग 24 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन जब भी उन दिनों को याद करता हूँ, तो आश्चर्य होता है कि इतना विशाल आयोजन कितनी सहजता, अनुशासन और सामूहिक सहयोग से सम्पन्न हुआ। मुझे संतोष है कि मैं अपने बड़ा जी की अपने पैतृक गाँव में गायत्री महायज्ञ कराने की इच्छा पूरी करने का माध्यम बन सका। साथ ही मैं यह भी भली-भाँति जानता हूँ कि यदि उनका आशीर्वाद, आत्मबल और अटूट विश्वास साथ न होता, तो यह कार्य संभव नहीं हो पाता। पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा जी केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के भी सच्चे योद्धा थे। उन्होंने दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए सामूहिक एवं दहेज-मुक्त विवाह की अभिनव परंपरा की शुरुआत की। समाज में समानता, भाईचारे और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्होंने सभी जातियों और वर्गों को साथ लेकर सामूहिक विवाह सम्मेलनों का आयोजन कराया। उनके द्वारा बोए गए समाज सुधार के बीज आज छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देशभर में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह जैसी योजनाओं के रूप में फलते-फूलते दिखाई देते हैं। पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के अत्यंत प्रिय शिष्यों में से एक थे। शांतिकुंज, हरिद्वार की युगनिर्माण विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज कल्याण, आध्यात्मिक जागरण और विश्वबंधुत्व के लिए समर्पित कर दिया। उनके अथक प्रयासों और छत्तीसगढ़ में विचार-क्रांति के संकल्प के परिणामस्वरूप युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का तीन बार महासमुंद आगमन हुआ। पहली बार 8 जनवरी 1969 को आचार्य श्री महासमुंद पहुँचे। इस अवसर पर उन्होंने पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के निवास स्थित साधना कक्ष में अखंड ज्योति की स्थापना की, जो आज भी निरंतर प्रज्ज्वलित होकर उनकी साधना, तपस्या और आध्यात्मिक विरासत की साक्षी बनी हुई है। इसके बाद लगातार दो वर्षों तक आचार्य श्री का महासमुंद आगमन होता रहा। पाँच कुंडीय गायत्री महायज्ञ से प्रारंभ हुआ यह अभियान आगे चलकर 1008 कुंडीय विराट गायत्री महायज्ञ के रूप में फलीभूत हुआ। इन आयोजनों की ख्याति केवल महासमुंद तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ इसका साक्षी बना। दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु इन महायज्ञों में भाग लेने महासमुंद पहुँचे। उन दिनों युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का प्रवास राम मंदिर के समीप स्थित पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के निवास पर ही होता था। उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी। इसलिए मैं न तो आचार्य श्री की महानता को पूरी तरह समझ पाता था और न ही बड़ा जी के तेजस्वी व्यक्तित्व की गहराई को। फिर भी आज तक आचार्य श्री का स्नेहिल स्पर्श मेरी स्मृतियों में जीवंत है। उस वक्त पता ही नहीं चलता था कि कब उनके सान्निध्य में, उसी बिस्तर पर, उनकी छत्रछाया में रहता था। आज वे पल मेरी सबसे अनमोल धरोहर हैं। जब भी पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा शांतिकुंज, हरिद्वार जाते थे, तब आचार्य श्री स्वयं उनका आत्मीय स्वागत करते थे। यह उनके प्रति आचार्य श्री के विशेष स्नेह, विश्वास और सम्मान का प्रमाण था। विश्वबंधुत्व, मानव कल्याण और समाज निर्माण की दिशा में बड़ा जी ने जो कार्य किए, वे आज भी प्रेरणादायी और अनुकरणीय हैं। इतना महान योगदान देने के बावजूद पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा जीवनभर आत्मप्रचार से दूर रहे। वे साधना, सेवा और तप में ही रमे रहे। संभवत: यही कारण है कि उनकी तपोभूमि, उनके साधना कक्ष में आचार्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति और उनके सामाजिक-आध्यात्मिक योगदान का जितना व्यापक प्रचार-प्रसार होना चाहिए था, उतना नहीं हो सका। उनकी शताब्दी जयंती पर हम सबका दायित्व है कि उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और समाज के प्रति उनके अमूल्य योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाएं तथा उनके बताए सेवा, साधना और संस्कार के मार्ग पर चलने का संकल्प लें। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।8 मार्च 2019 को उनका स्वर्गारोहण समाज और प्रदेश के लिए अपूरणीय क्षति थी। उनके निधन से एक ऐसा शून्य उत्पन्न हुआ, जिसकी भरपाई करना अत्यंत कठिन है।
</description><guid>784</guid><pubDate>15-Jul-2026 5:38:06 pm</pubDate></item><item><title>300 रुपये की नौकरी... फिर भी ठुकरा दिया 50 हजार रुपये, कार और फ्लैट का ऑफर</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=783</link><description>प्रकाश मेहरा की जयंती 13 जुलाई पर विशेष
पचास हज़ार रुपये, एक फिएट कार, एक फ्लैट... बस हमारी फिल्म डायरेक्ट कर दीजिए।
ये ऑफर एक निर्माता ने प्रकाश मेहरा को दिया था। उस समय तक प्रकाश मेहरा ने बतौर निर्देशक अपना सफर शुरू भी नहीं किया था, हालांकि वह अपनी पहली फिल्म की तैयारी में जुटे हुए थे।
जिस निर्माता ने यह आकर्षक प्रस्ताव रखा था, वह 'अमर सिंह राठौड़' नाम की फिल्म बनाना चाहता था। फिल्म में निरूपा रॉय और पी. जयराज मुख्य भूमिकाओं में थे। जाहिर है, इतना बड़ा ऑफर किसी के भी कदम डगमगा सकता था।
साल 1957 में, जब प्रकाश मेहरा महज़ 300 रुपये महीने की नौकरी कर रहे थे, तब 50 हजार रुपये, एक फिएट कार और एक फ्लैट का प्रस्ताव किसी सपने से कम नहीं था। लेकिन उन्होंने तुरंत हामी नहीं भरी। क्योंकि वे पहले ही तय कर चुके थे कि निर्देशन की शुरुआत अपनी पसंद की फिल्म से ही करेंगे।
उन्होंने निर्माता से तीन-चार दिन का समय मांगा। उन दिनों प्रकाश मेहरा, निर्देशक मोहन सहगल के सहायक थे। वहीं एक असिस्टेंट कैमरामैन थेसरदार बलदेव सिंह। प्रकाश मेहरा ने उनसे इस ऑफर का ज़िक्र किया।
बलदेव सिंह जानते थे कि प्रकाश मेहरा सामाजिक विषयों पर फिल्में बनाना चाहते हैं। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा,
गलती से भी हां मत कहना। यह माइथोलॉजिकल फिल्म है। एक बार इस जॉनर में चले गए, तो फिर उसी में सीमित होकर रह जाओगे।
उन्होंने आगे कहा, अगले साल तुम्हारी फिल्म 'हसीना मान जाएगी' शुरू होगी। थोड़ा सब्र करो।
प्रकाश मेहरा ने अपने साथी की सलाह पर भरोसा किया और इतना बड़ा ऑफर ठुकरा दिया।
जब निर्माता को उनके इंकार की खबर मिली, तो वह बेहद नाराज़ हुआ। उसने कई लोगों से कहा,
बेवकूफ तो बहुत देखे हैं, लेकिन ऐसा बेवकूफ नहीं देखा। 300 रुपये महीने की नौकरी करने वाला आदमी 50 हजार रुपये, कार और फ्लैट का ऑफर ठुकरा रहा है!
लेकिन उस निर्माता को नहीं पता था कि प्रकाश मेहरा कोई छोटा फैसला नहीं ले रहे थे। उनका लक्ष्य सिर्फ एक फिल्म निर्देशित करना नहीं, बल्कि लंबी पारी खेलना था।
आखिरकार, 1968 में रिलीज़ हुई 'हसीना मान जाएगी' से प्रकाश मेहरा ने निर्देशन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने एक से बढ़कर एक सफल फिल्में दीं और हिंदी सिनेमा के सबसे सफल और प्रभावशाली निर्देशकों में अपनी जगह बना ली।
आज, 13 जुलाई को प्रकाश मेहरा की जयंती है। उनका जन्म 13 जुलाई 1939 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर स्थित अपने ननिहाल में हुआ था।
मुंबई में मिली उनकी सफलता रातों-रात नहीं आई थी। इसके पीछे वर्षों का संघर्ष, धैर्य, सही फैसले लेने की क्षमता और अपने सपनों पर अटूट विश्वास था। यही वजह है कि प्रकाश मेहरा का सफर आज भी हर उस इंसान को प्रेरित करता है, जो अपने बड़े सपनों के लिए छोटे-छोटे लालच ठुकराने का साहस रखता है।</description><guid>783</guid><pubDate>13-Jul-2026 3:08:47 pm</pubDate></item><item><title> पहले खुद से प्यार करो</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=782</link><description>- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद) 
सुंदर महल बनाना हो तो, सुदृढ़ प्रथम आधार करो।
रक्षा कर निज स्वाभिमान की, पहले खुद से प्यार करो।।
कठिन परिश्रम सतत प्रयासित, एकलव्य को ज्ञान मिला।
धूप-ताप नित सह-सहकर ही, सरवर में जलजात खिला।
श्रम संयम ताने-बाने से, रूप नवल साकार करो।।
विनम्रता व्यक्तित्व सजाए, रसना मीठे बोल कहे।
ज्ञानवान गुणवान बनो पर, द्वेष-दंभ किंचित न रहे।
धीरज के आभूषण पहनो, शुचिता से शृंगार करो ।।
पर-हितकारी जन को मिलता, लोगों से सम्मान सदा।
सहज-सरल बनकर सहयोगी, वंचित को दो दान सदा।
मानव तन पाया है सुंदर, ईश्वर का आभार करो ।।
दीप ज्ञान का जला हृदय में, कपट-कलुष तम दूर भगा।
प्रेम दया से धोकर कटुता, मन में साहस-शौर्य जगा।
अच्छाई से रहे सुवासित, सुंदर यह संसार करो।।</description><guid>782</guid><pubDate>12-Jul-2026 12:37:05 am</pubDate></item><item><title> गायिका उमा देवी को ऐसे मिला टुनटुन नाम....</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=780</link><description>आलेख- प्रशांत शर्मा
जन्मदिन पर विशेष--11 जुलाई
फिल्मी परदे पर सबको हंसाने वाली प्यारी टुनटुन (जन्म-11 जुलाई 1923 - निधन 23 नवम्बर 2003) की आज बर्थ एनिवर्सिरी है। वे लोगों के दिलों में ऐसे छाई कि आज भी यदि कोई मोटी महिला दिख जाती है, तो लोग मजाक में उसे टुनटुन कह देते हैं। टुनटुन ने अपना कॅरिअर पाश्र्वगायिका के रूप में अपने मूल नाम उमा देवी खत्री से शुरू किया था। अफसाना लिख रही रही हूं... गीत उन्होंने ही गाया है।
नूरजहां के प्रति दीवानगी और गायिकी के जुनून ने उन्हें मथुरा से मुंबई पहुंचाया। चाचा के घर में पली-बढ़ी उमा देवी की हैसियत परिवार में एक नौकर के समान थी। घरेलू काम के सिलसिले में उमादेवी का दिल्ली के दरियागंज इलाके में रहने वाले एक रिश्तेदार के घर अक्सर आना-जाना लगा रहता था। वहीं उनकी मुलाक़ात अख्तर अब्बास क़ाज़ी से हुई, जो दिल्ली में आबकारी विभाग में निरीक्षक थे। काज़ी साहब उमा देवी का सहारा बने, लेकिन वे लाहौर चले गए।
इस बीच उमा देवी ने भी गायिका बनने का ख्वाब पूरा करने के लिए मुंबई जाने की योजना बना ली। दिल्ली में जॉब करने वाली उनकी एक सहेली की मुंबई में फि़ल्म इंडस्ट्रीज के कुछ लोगों से पहचान थी। एक बार जब वो गांव आई, तो उसने उमा देवी को निर्देशक नितिन बोस के सहायक जव्वाद हुसैन का पता दिया। वर्ष 1946 था और उमादेवी 23 बरस की थी। वे किसी तरह हिम्मत जुटाकर गांव से भागकर मुंबई आ गई। जव्वाद हुसैन ने उन्हें अपने घर पनाह दी। मुंबई में उमा देवी की दोस्ती अभिनेता और निर्देशक अरूण आहूजा और उनकी पत्नी गायिका निर्मला देवी से हुई, जो मशहूर अभिनेता गोविंदा के माता-पिता थे। इस दंपत्ति ने उमा देवी का परिचय कई प्रोड्यूसर और डायरेक्टर से करवाया। उस समय तक अख्तर अब्बास काज़ी साहब भी मुंबई आ गए थे। 1947 में उमा देवी और काज़ी साहब ने शादी कर ली।
उसके बाद उमा देवी काम की तलाश करने लगी। उन्हें कहीं से पता चला कि डायरेक्टर अब्दुल रशीद करदार फि़ल्म दर्द बना रहे हैं. वे उनके स्टूडियो पहुंचकर उनके सामने खड़े हो गई। उन्होंने पहले कभी करदार साहब को नहीं देखा था। बेबाक तो वो बचपन से ही थी, उनसे ही सीधे पूछ बैठी, करदार साहब कहां मिलेंगे? मुझे उनकी फि़ल्म में गाना गाना है। शायद उनका ये बेबाक अंदाज़ करदार साहब को पसंद आ गया, इसलिए बिना देर किये उन्होंने संगीतकार नौशाद के सहायक गुलाम मोहम्मद को बुलाकर उमा देवी का टेस्ट लेने को कह दिया। उस टेस्ट में उमादेवी ने फिल्म जीनत में नूरजहां द्वारा गाया गीत आँधियां गम की यूं चली गाया। हालांकि उमा देवी एक प्रशिक्षित गायिका नहीं थी, लेकिन रेडियो पर गाने सुनकर और उन्हें दोहराकर वे अच्छा गाने लगी थी। बरहलाल, उनका गया गाना सबको पसंद आया और वो 500 रुपये की पगार पर नौकरी पर रख ली गई।
जब उमा देवी की मुलाक़ात नौशाद से हुई, तो उनसे भी बेबकीपूर्ण अंदाज़ में उन्होंने कह दिया कि उन्हें अपनी फि़ल्म में गाना गाने का मौका दें, नहीं तो वे उनके घर के सामने समुद्र में डूबकर अपनी जान दे देंगी। नौशाद साहब भी उनकी बेबाकी पर हैरान थे। खैर, उन्होंने उमा देवी को गाने मौका दिया और दर्द फिल्म का गीत अफ़साना लिख रही हूं ...उनसे गवाया। यह गीत बहुत हिट हुआ और आज तक लोगों की ज़ेहन में बसा हुआ है। उस फि़ल्म के अन्य गीत आज मची है धूम, ये कौन चला, बेताब है दिल .. भी लोगों को बहुत पसंद आये।
फिर क्या था , उमा देवी की गायिका के रूप में गाड़ी चल पड़ी। कई फि़ल्मी गीतों को उन्होंने अपनी सुरीली आवाज़ से सजाया। 1947 में ही बनी फि़ल्म नाटक में उन्हें गाने का मौका मिला और उन्होंने गीत दिलवाले जल कर मर ही जाना गाया। फिर 1948 की फि़ल्म अनोखी अदा में दो सोलो गीत काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाए, दिल को लगा के हमने कुछ भी न पाया और फि़ल्म चांदनी रात में शीर्षक गीत'चांदनी रात है, हाय क्या बात है, में भी उन्होंने अपनी आवाज़ दी। उमादेवी को गाने के मौके मिलते रहे और वो गाती रहीं। उन्होंने कई फि़ल्मों में गाने गए। उनके द्वारा गाये गए गीत लगभग 45 के आस-पास हैं।
बच्चों के जन्म के साथ उनकी पारिवारिक जि़म्मेदारियां बढ़ रही थी। साथ ही लता मंगेशकर , आशा भोंसले जैसी संगीत की विधिवत् शिक्षा प्राप्त गायिकाओं का भी बॉलीवुड फि़ल्म इंडस्ट्रीज में पदार्पण हो चुका था। उमादेवी ने गायन का प्रशिक्षण नहीं लिया था। इसलिए धीरे-धीरे उनका गायन का काम सिमटता गया और एक दिन वह अपना गायन करिअर छोड़कर पूरी तरह अपने परिवार में रम गई। परिवार चलाना मुश्किल हुआ तो उमादेवी ने फिर से फि़ल्मों में काम करने का मन बनाया।
वे अपने गुरू नौशाद साहब से मिली। उमादेवी फिर से फि़ल्मों में गाना चाहती थीं, लेकिन समय आगे निकल चुका था। स्थिति को देखते हुए नौशाद साहब ने उन्हें कहा, तुम अभिनय में हाथ क्यों नहीं आजमाती? उमादेवी ने अपने बेबाक अंदाज़ में उन्होंने कह दिया, मैं एक्टिंग करूंगी, लेकिन दिलीप कुमार के साथ। दिलीप कुमार उस समय के सुपरस्टार थे। इसलिए उमादेवी की बात सुनकर नौशाद साहब हंस पड़े, लेकिन इसे किस्मत ही कहा जाए कि अपने अभिनय करिअर की शुरूआत उमादेवी ने दिलीप कुमार के साथ ही की। फिल्म थी - बाबुल जिसमें हिरोइन थीं - नर्गिस। उस वक्त उमा देवी का वजन काफी बढ़ गया था। दिलीप कुमार ने ही मोटी उमा को देखकर टुनटुन नाम दिया और यह नाम हमेशा के लिए उनके साथ जुड़ गया। फि़ल्म रिलीज़ हुई और छोटे से रोल में भी उनका अभिनय काफ़ी सराहा गय। उसके बाद आई मशहूर निर्माता-निर्देशक और अभिनेता गुरु दत्त की फि़ल्म मिस्टर एंड मिस 55 में उन्होंने अपने अभिनय के वे जौहर दिखाए कि हर कोई उनका कायल हो गया.
बाद में टुनटुन की ख्याति इतनी बढ़ गई थी कि फि़ल्मकार उनके लिए अपनी फि़ल्म में विशेष रूप से रोल लिखवाया करते थे और टुनटुन भी हर रोल को अपने शानदार अभिनय से यादगार बना देती थीं। 70 के दशक के बाद उन्होंने फि़ल्मों में काम करना कम कर दिया और अधिकांश समय अपने परिवार के साथ गुजारने लगी। उनकी अंतिम फिल्म 1990 में आई कसम धंधे की थी। 24 नवंबर 2003 में उन्होंने इस दुनिया से विदा ली, लेकिन आज भी वे हिन्दी फिल्मों की पहली और सबसे सफ़ल महिला कॉमेडियन के रूप में याद की जाती हैं।
</description><guid>780</guid><pubDate>12-Jul-2026 1:03:12 pm</pubDate></item><item><title> प्राण ने रोमांटिक हीरो के रूप में कॅरिअर शुरू किया- नूरजहां के भी हीरो बने</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=779</link><description>आलेख- प्रशांत शर्मा
पुण्यतिथि पर विशेष- 12 जुलाई 2013
फिल्म अभिनेता प्राण, जन्म 12 फरवरी, 1920, निधन- 12 जुलाई 2013, उपलब्धियां- अनगिनत। एक अच्छे इंसान, एक अच्छे अभिनेता और एक शानदार शख्सियत। ज्यादातर लोग उन्हें एक खलनायक और चरित्र अभिनेता के रूप में ही जानते हैं। आज उनके जन्मदिन पर हम उनकी जिदंगी के कुछ अनछुए पहलुओं का जिक्र कर रहे हैं।
प्राण साहब ने खलनायकी शुरू करने से पहले कुछ फिल्मों में बतौर हीरो काम भी किया। उस दौरान उनके ऊपर कई गाने भी फिल्माए गए। लेकिन वो गाने इतने लोकप्रिय नहीं हुए, कि लोग उन्हें याद रख सकें। लेकिन कई फिल्मों में खलनायक, सहायक कलाकार होने के बाद भी उन पर कई गाने फिल्माए गए हैं, जो यादगार हैं। आज उन्हीं गानों की चर्चा....
प्राण साहब पर फिल्माए गए कुछ गाने मुझे जो याद आ रहे हैं, उनमें फिल्म उपकार का गाना - कश्मे वादे प्यार वफा, जंजीर- यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी, आके सीधी लगी दिल पे जैसे कटरिया... (फिल्म हाफ टिकट) इत्यादि। जहां तक मुझे याद है प्राण साहब पर कम से कम 25 गाने तो फिल्माए ही गए हैं। आज सिलसिलेवार उनकी ही चर्चा...
नूरजहां के हीरो बने
वर्ष 1942 में प्राण साहब ने जब फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा तो वे हीरो बनकर आए। उन्होंने उस वक्त सोचा भी नहीं था कि वे एक दिन हीरो नहीं, बल्कि खलनायक के रूप में इतने मशहूर होंगे कि लोग अपने बच्चों का नाम भी उनके नाम पर रखना पसंद नहीं करेंगे। फिल्म 1942 में प्राण खानदान फिल्म में नूरजहां के साथ हीरो बनकर आए थे। इस फिल्म में प्राण रोमांटिक हीरो थे। हालांकि उस वक्त हीरो अपने लिए प्लेबैंक सिगिंग खुद किया करते थे, लेकिन प्राण साहब का संगीत की दुनिया से कोई वास्ता नहीं था। लिहाजा उन्होंने गाने से इंकार कर दिया और भविष्य में कभी कोशिश भी नहीं की। इस फिल्म में उनके लिए जिस गायक ने गाना गाए , उसका नाम भी उपलब्ध नहीं है। मेरा अनुमान है कि यह आवाज गुलाम हैदर की है। फिल्म में प्राण के किरदार का नाम भी प्राण ही रखा गया था। इस फिल्म में नूरजहां और प्राण पर एक रोमांटिक गाना था.... गाने के बोल उड़ जा पंछी....जिसे नूरजहां और संगीतकार गुलाम हैदर ने गाया था। फिल्म में प्राण को शहजादा जहांगीर के रूप में देखकर लगता ही नहीं, कि ये प्राण हैं। इसी गाने के बोल हैं - उड़ जा पंछी, इंसान को इंसान से आजाद कराएं , उड़ जा पंछी, जो प्राण साहब की जिंदगी के साथ आज सटीक उतरता नजर आ रहा है।
शारदा के साथ रोमांटिक फिल्म की
फिल्म गृहस्थी में जो 1948 में रिलीज हुई थी, में भी प्राण पर एक गाना फिल्माया गया था जिसके बोल थे- तेरे नाज उठाने को जी चाहता है। यह गाना प्राण और शारदा पर फिल्माया गया था। फिल्म में प्राण साहब के लिए मुकेश ने गाने गाए थे। वहीं देवआनंद साहब की फिल्म मुनीम जी तक आते प्राण साहब को निगेटिव शेड्स में मजा आने लगा था। 1955 में यह फिल्म रिलीज हुई थी। फिल्म में देवआनंद और नलिनी जयवंत मुख्य भूमिकाओं में थे और प्राण खलनायक बने थे। फिल्म का एक गाना -दिल की उमंगे हैं जवान...में देवआनंद, नलिनी और प्राण पर फिल्माया गया था। जिसे हेमंत कुमार और गीता दत्त ने गाया था। फिल्म में यह गाना देवआनंद , प्राण और नलिनी जयवंत पर फिल्माया गया था, लेकिन यह पहला गाना था, जिसमें प्राण ने काफी बेसुरे तरीके से गाया था और यह आवाज किसकी है, इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता, यहां तक कि इसके कैसेट या रिकॉड्र्स में भी नहीं।
है आग हमारे सीने में
राजकपूर ने जब फिल्म जिस देश में गंगा बहती है, बनाई तो उन्होंने प्राण साहब को इसमें महत्वपूर्ण रोल दिया। इस फिल्म में एक गाना- है आग हमारे सीने में ... तुम भी हो हम भी हैं दोनों हैं आमने -सामने,, में राजकपूर और पद्मिनी के साथ प्राण भी नजर आते हैं। इस गाने में प्राण के लिए मन्ना डे साहब ने अपनी आवाज दी थी। यह फिल्म 1961 में रिलीज हुई थी।
प्राण का डांस करने का खास अंदाज
प्राण पर फिल्माए गए मजेदार गानों में फिल्म हाफ टिकट का एक मशहूर गाना है - आके सीधी लगी दिल पे तेरी कटरिया...शामिल है। फिल्म में यह गाना किशोर कुमार ने डबल आवाज में गाया है, यानी प्राण के लिए किशोर कुमार ने गाया और लड़की की आवाज में किशोर कुमार ने खुद ही आवाज बदली। फिल्म में प्राण का डांस का अंदाज आज भी लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट ला देता है। वहीं 1963 आई फिल्म दिल ही तो है, में राजकपूर और नूतन पर एक गाने का फिल्मांकन हुआ है- तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी... में प्राण केवल यही कहते नजर आते हैं... मुश्किल होगी, मुश्किल होगी, क्या मुश्किल होगी?
कश्मे वादे प्यार वफा, सब बातें हैं बातों का क्या...
प्राण साहब के यादगार गानों में 1967 में आई मनोज कुमार की फिल्म उपकार का नाम सबसे ऊपर रखा जा सकता है। इस फिल्म में प्राण ने मलंग चाचा का किरदार निभाया था। प्राण ने इस फिल्म की शूटिंग के लिए बड़ी मेहनत की। फिल्म की पूरी शूटिंग के दौरान उनका दायां पैर घुटने से बंधा रहता था। इसी फिल्म में एक अर्थपूर्ण गाना प्राण पर फिल्माया गया था जिसके बोल हैं- कश्मे वादे प्यार वफा, सब बातें हैं बातों का क्या...। इस फिल्म के बाद तो जैसे प्राण , मनोज कुमार की फिल्मों का एक अभिन्न हिस्सा ही बन गए। प्राण का कॅरिअर ग्राफ बीच में काफी नीचे पहुंच गया था, क्योंकि उस वक्त तक कई खलनायक उभर कर सामने आ रहे थे। ऐसे में मनोज कुमार ने उपकार में मलंग चाचा के रोल में प्राण को लेकर जैसे उनके कॅरिअर में फिर से जान डाल दी। फिल्म बेईमान (1972) में प्राण और मनोज कुमार पर एक गाना पिक्चाइज हुआ था- हम दो मस्त मलंग।
वहीं 1969 में फिल्म नन्हा फरिश्ता में एक गाना था बच्चे में हैं भगवान.. इस गाने को तीन लोगों ने गाया था मोहम्मद रफी, मन्ना डे और महेन्द्र कपूर। यह गाना प्राण, अनवर हुसैन और अजीत पर फिल्माया गया था। इसके अलावा फिल्म विक्टोरिया नंबर 203, प्राण साहब के काफी करीब थी, क्योंकि उन्होंने इसमें काफी हटकर किरदार निभाया था। इस फिल्म में वे अशोक कुमार के साथ गाना गाते नजर आते हैं- दो बेचारे बिना सहारे फिरते हैं मारे - मारे। इस गाने में गायक महेन्द्र कपूर ने प्राण के लिए प्लैबैक सिंगिग की थी।
जंजीर फिल्म से चरित्र भूमिकाएं शुरू की
वर्ष 1973 में आई फिल्म जंजीर फिल्म ने अमिताभ बच्चन को एक एंग्री यंग मैन का दर्जा दे दिया तो उनके शेरखान दोस्त यानी प्राण के कॅरिअर में चरित्र भूमिकाओं का एक नया दौर शुरू हुआ। इस फिल्म के एक गाने यारी है ईमान मेरा, का फिल्मांकन जब हो रहा था, प्राण की पीठ में जबर्दस्त दर्द था। बावजूद इसके उन्होंने इस गाने पर शानदार डांस किया, जबकि डांस के मामले में वे हमेशा कच्चे समझे जाते थे। इस फिल्म के बाद तो जैसे प्र्राण और अमिताभ की जोड़ी हिट हो गई। दोनों ने साथ में 14 फिल्में कीं। जिस फिल्म जंजीर ने अमिताभ की किस्मत बदली, वह उन्हें प्राण की सिफारिश से ही मिली थी। फिल्म शराबी में प्राण, अमिताभ के पिता के रोल में थे। अमिताभ के साथ ही उन्होंने 1974 में कसौटी फिल्म की जिसका एक गाना प्राण गाते हैं, काफी रोचक तरीके से फिल्माया गया है- हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है....। फिल्म में प्राण नेपाली की भूमिका में थे और उनके संवाद बोलने का नेपाली अंदाज काफी लोकप्रिय हुआ था।
वहीं अमिताभ की ही फिल्म मजबूर में प्राण ने हेलेन के साथ -फिर न कहना माइकल दारू पीके दंगा करता है.. में जमकर ठुमके लगाए।
राज की बात कह दूं तो
प्राण साहब पर एक कव्वाली भी फिल्माई गई है जो काफी मशहूर हुई थी। यह कव्वाली फिल्म धर्मा की है जिसके बोल हैं- राज की बात कह दूं तो जाने महफिल में क्या ...इस गाने में प्राण साहब बिन्दू के साथ तकरार करते नजर आते हैं। इस गाने को रफी साहब और आशा भोंसले ने गाया था। फिल्म में नवीन निश्चल और रेखा मुख्य भूमिकाओं में थे।
ऐसे ही कई और गाने हैं, जिसका हिस्सा प्राण साहब रहे थे। आज जब भी ये गाने बजते हैं, लोगों को प्राण साहब का चेहरा जरूर याद आता है। (छत्तीसगढ़आजडॉटकॉम विशेष)
</description><guid>779</guid><pubDate>12-Jul-2026 12:42:32 pm</pubDate></item><item><title>​राजस्व सुधारों की नई इबारत लिखता छत्तीसगढ़: ऑटो म्यूटेशन और ऑटो डायवर्सन से जमीन संबंधी सेवाओं में ऐतिहासिक बदलाव</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=777</link><description>-99.95 प्रतिशत ऑटो म्यूटेशन सफलता दर ने रचा रिकॉर्ड, ऑटो डायवर्सन में 83.71 प्रतिशत प्रकरणों का हुआ निराकरण
-कोरिया बना नंबर-1, धमतरी ने टॉप-5 में दर्ज कराई दमदार मौजूदगी; जिलों के प्रदर्शन ने दिखाई जवाबदेह प्रशासन की तस्वीर
--NGDRS इंटीग्रेशन, मल्टीपल खसरा और रिकवरी मॉड्यूल से राजस्व सेवाओं को मिलेगा नया डिजिटल ढांचा
-​आम नागरिक को दफ्तरों के चक्कर से राहत, पारदर्शिता और समयबद्ध निस्तारण के साथ सुशासन का मजबूत मॉडल बन रहा छत्तीसगढ़
आलेख- विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालक
​रायपुर /सुशासन के नए डिजिटल युग में राजस्व प्रशासन अब फाइलों और लंबित प्रकरणों के पारंपरिक चक्रव्यूह से बाहर निकल चुका है। राज्य शासन के राजस्व, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग ने तकनीक को माध्यम बनाकर जमीन से जुड़ी सेवाओं का पूरी तरह कायाकल्प कर दिया है। 'ऑटो म्यूटेशन' (स्वतः नामांतरण) और 'ऑटो डायवर्सन' (स्वतः व्यवर्तन) जैसी जन-हितैषी व्यवस्थाओं ने विभाग को तेज, पारदर्शी और मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त बनाया है। इससे आम नागरिकों को दफ्तरों के चक्कर, लंबे इंतजार और मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना से स्थायी मुक्ति मिली है।
​पहले रजिस्ट्री के बाद नामांतरण के लिए अलग से आवेदन और भौतिक सत्यापन की थकाऊ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति से अब यह स्वतः संपन्न हो रहा है। इसके साथ ही, भूमि उपयोग परिवर्तन (डायवर्सन) के लिए आवेदन, प्रीमियम निर्धारण और शुल्क गणना को भी आधुनिक तकनीक से त्रुटिहीन बनाया गया है। छत्तीसगढ़ का यह डिजिटल गवर्नेंस मॉडल आज देश के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बनकर उभरा है।
​राजस्व विभाग द्वारा जारी प्रामाणिक आंकड़े इस ऐतिहासिक परिवर्तन की गवाही देते हैं। राज्य में अब तक कुल 1 लाख 40 हज़ार 607 पंजीकृत विलेखों में से रिकॉर्ड 1 लाख 40 हज़ार 536 मामलों का सफलतापूर्वक ऑटो म्यूटेशन किया जा चुका है। संपूर्ण प्रदेश में केवल 71 प्रकरण प्रक्रियाधीन हैं, जिससे विभाग ने 99.95 प्रतिशत की अभूतपूर्व सफलता दर हासिल की है।
​वहीं दूसरी ओर, 'ऑटो डायवर्सन' व्यवस्था के तहत कुल 5 हजार 661 आवेदन दर्ज किए गए, जिनमें से 4 हज़ार 739 मामलों का त्वरित निराकरण किया गया। इस प्रकार 83.71 प्रतिशत प्रकरणों का निस्तारण कर यह साबित कर दिया गया कि जटिल तकनीकी प्रक्रियाओं को भी डिजिटल माध्यम से सुगम और पारदर्शी बनाया जा सकता है। राजस्व सेवाएँ सीधे नागरिक के जीवन, संपत्ति और निवेश से जुड़ी होती हैं; अतः इनमें गति आने से राज्य की आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक गतिविधियों को नई रफ्तार मिली है।
​किसी भी संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद भू-अभिलेखों में नाम दर्ज होना एक अनिवार्य प्रक्रिया है। पुराने दौर में पटवारियों और तहसील कार्यालयों के चक्कर काटना, दस्तावेजों की जांच में महीनों गंवाना और अनिश्चितता का सामना करना आम बात थी, जिसने भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा दिया।
आज छत्तीसगढ़ की तस्वीर बदल चुकी है। 1 लाख 40 हज़ार 607 पंजीकृत विलेखों में से 1 लाख 40 हज़ार 536 मामलों का स्वतः नामांतरण होना यह दर्शाता है कि अब नागरिक को अपने हक के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ रहा है। इस व्यवस्था से समय और धन की भारी बचत हो रही है और रिकॉर्ड रीयल-टाइम अपडेट होने से जमीनी धोखाधड़ी पर लगाम लगी है।
​इस सफलता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा एक सख्त तकनीकी लॉक सिस्टम विकसित किया गया है। इसके तहत, यदि किसी संपत्ति का एक भी पुराना ऑटो म्यूटेशन लंबित है, तो संबंधित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में उस संपत्ति की अगली रजिस्ट्री तब तक नहीं हो पाएगी जब तक पिछला म्यूटेशन क्लियर न हो जाए। यह कदम निचले स्तर के प्रशासनिक अमले को जवाबदेह बनाता है।
​कृषि भूमि को आवासीय, वाणिज्यिक या औद्योगिक उपयोग में बदलना (डायवर्सन) शहरीकरण, निवेश और रोजगार सृजन की रीढ़ है। पहले आवेदकों को शुल्क, आवश्यक दस्तावेजों और समय सीमा की स्पष्ट जानकारी नहीं होती थी। ​फरवरी से जून 2026 के बीच 5 हजार 661 आवेदनों में से 4 हजार 739 का त्वरित निस्तारण यह दिखाता है कि विभाग ने गाइडलाइन दरों के आधार पर प्रीमियम निर्धारण जैसी पेचीदा प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित कर दिया है। वर्तमान में जो 922 लंबित मामले हैं, उनके पीछे अपूर्ण दस्तावेज, चालान राशि में तकनीकी अंतर या नगर तथा ग्राम निवेश (TNCP) के मास्टर प्लान से भिन्न प्रयोजन होना जैसे व्यावहारिक कारण हैं। इन चुनौतियों को सार्वजनिक करना विभाग की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को दर्शाता है।
​ऑटो डायवर्सन के क्रियान्वयन में जिलों के बीच एक स्वस्थ और परिणाम-उन्मुख प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है, जो यह प्रमाणित करती है कि सुधार जमीनी स्तर पर लागू हो चुके हैं। कोरिया जिला कुल 59 प्रकरणों में से सभी 59 का शत-प्रतिशत निराकरण कर 100 प्रतिशत सफलता दर के साथ पूरे राज्य में प्रथम स्थान पर रहा।कोरबा जिला 98.46 प्रतिशत की सफलता दर के साथ अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। इसी तरह ​मुंगेली जिला 94.16 प्रतिशत मामलों का निपटारा कर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।​बालोद जिला 93.72 प्रतिशत निस्तारण दर के साथ शीर्ष जिलों में शामिल रहा।​धमतरी जिला कुल 165 प्रकरणों में से 153 का वैधानिक निराकरण कर 92.73 प्रतिशत सफलता दर के साथ राज्य में पाँचवाँ (शीर्ष-5) स्थान प्राप्त किया। धमतरी का यह प्रदर्शन नियमित समीक्षा और जवाबदेह कार्यशैली का परिणाम है।
​विभाग अपनी वर्तमान उपलब्धियों से आगे बढ़कर एक एकीकृत 'डिजिटल इकोसिस्टम' के निर्माण में जुटा है। ​NGDRS API Integration इसके माध्यम से सरकारी गाइडलाइन दरें सीधे पोर्टल से प्राप्त हो रही हैं, जिससे प्रीमियम का निर्धारण मानवीय हस्तक्षेप के बिना पूरी तरह स्वचालित और पारदर्शी हो गया है।
यदि पहले से डायवर्टेड भूमि का आंतरिक उपयोग बदलना हो (जैसे आवासीय से वाणिज्यिक), तो इस मॉड्यूल के तहत निस्तारण के लिए 15 दिवस की समय सीमा तय की गई है।
एक से अधिक खसरों वाली भूमि के लिए अब एक ही आवेदन में अनेक खसरों का चयन, स्वतः शुल्क गणना और ई-चालान की सुविधा मिलेगी। इसके लिए समय सीमा जुलाई 2026 रखा गया है। पुराने लंबित मामलों के निपटारे के लिए पूर्व भुगतानों की प्रविष्टि, शेष प्रीमियम की गणना, भू-राजस्व/उपकर की मांग और एक उच्च स्तरीय रिकवरी डैशबोर्ड की व्यवस्था की जाएगी।इसके लिए समय सीमा अगस्त 2026 निर्धारित किया गया है।यह ऐतिहासिक बदलाव सिर्फ तकनीकी आंकड़ों का नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के पौने तीन करोड़ नागरिकों के जीवन को सरल और सुरक्षित बनाने का माध्यम है। किसान, गृहस्वामी, व्यापारी और औद्योगिक निवेशक सभी को अब घर बैठे अपने मोबाइल पर पारदर्शी सेवाएँ मिल रही हैं।
​दिसंबर 2026 तक के लिए तय किए गए रोडमैप के अनुसार, राज्य के सभी क्षेत्रों की सैटेलाइट/ड्रोन मैपिंग, टीएनसीपी से एनओसी लिंकिंग और मुख्य भू-अभिलेख पोर्टल का वृहद् अपग्रेडेशन किया जाना है। ये कदम छत्तीसगढ़ को डिजिटल राजस्व प्रशासन के क्षेत्र में एक राष्ट्रीय बेंचमार्क के रूप में स्थापित करने के लिए पूरी तरह तैयार कर रहे हैं। तकनीक, संवेदनशीलता और जवाबदेही के इस बेजोड़ संगम से छत्तीसगढ़ ने जन-केंद्रित शासन की एक नई मिसाल पेश की है। file photo
</description><guid>777</guid><pubDate>08-Jul-2026 7:34:03 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ की वैश्विक अस्मिता की नायिका तीजन बाई</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=776</link><description>-श्रद्धांजलि
-डॉ. सुधीर शर्मा
-अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़
आज छत्तीसगढ़ ने अपनी वह स्वर-साधिका खो दी, जिसने अपनी बुलंद आवाज़, अद्भुत अभिनय और अप्रतिम लोक-प्रतिभा से न केवल पंडवानी को नया जीवन दिया, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को विश्व मंच पर स्थापित किया। पद्म विभूषण से सम्मानित लोकगायिका डॉ. तीजन बाई का निधन केवल एक कलाकार का अवसान नहीं है, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति के एक उज्ज्वल अध्याय का विराम है।
तीजन बाई का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि प्रतिभा किसी सुविधा की मोहताज नहीं होती। दुर्ग जिले के गनियारी ग्राम में जन्मी इस असाधारण लोक कलाकार ने अत्यंत साधारण परिस्थितियों से अपनी यात्रा आरम्भ की। बचपन में अपने नाना से महाभारत की कथाएँ सुनते-सुनते उनके भीतर पंडवानी का बीज अंकुरित हुआ। उन्होंने कठिन संघर्षों के बीच अपनी साधना जारी रखी और समाज की रूढ़ियों को चुनौती देते हुए पंडवानी की कापालिक शैली में प्रस्तुति देने वाली पहली महिला कलाकार बनीं। यह केवल कला का परिवर्तन नहीं था, बल्कि स्त्री अस्मिता और आत्मविश्वास की भी ऐतिहासिक घोषणा थी।
तीजन बाई ने महाभारत को केवल गाया नहीं, बल्कि उसे मंच पर जीवंत कर दिया। उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का रथ और कभी द्रौपदी की वेदना। उनकी वाणी में लोक का दर्द था, अभिनय में महाकाव्य का वैभव और प्रस्तुति में भारतीय संस्कृति की विराटता। दर्शक केवल श्रोता नहीं रहते थे; वे स्वयं महाभारत के पात्रों के साथ चलने लगते थे।
लोक रंगकर्मी हबीब तनवीर की दृष्टि जब तीजन बाई पर पड़ी, तब उनकी कला को राष्ट्रीय पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने देश ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक गरिमा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने सिद्ध किया कि लोककला किसी क्षेत्र की सीमा में बंधी नहीं होती; उसकी संवेदना सार्वभौमिक होती है।
उनकी कला-साधना को भारत सरकार ने पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण और अंततः पद्म विभूषण से सम्मानित किया। अनेक विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियाँ प्रदान कीं। परंतु इन सम्मानों से कहीं अधिक बड़ा सम्मान वह प्रेम था, जो उन्हें करोड़ों श्रोताओं और दर्शकों से मिला।
तीजन बाई छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता की जीवित प्रतीक थीं। उन्होंने यह स्थापित किया कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, संस्कृति और आत्मा की वाहक होती है। उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी लोकपरंपराओं पर गर्व करना सिखाया और यह विश्वास जगाया कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी विश्व पटल पर सम्मान प्राप्त किया जा सकता है।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब उनका स्वर, उनकी शैली और उनकी सांस्कृतिक चेतना सदैव जीवित रहेगी। आने वाली पीढ़ियाँ जब भी पंडवानी का नाम लेंगी, तीजन बाई का स्मरण श्रद्धा और गर्व के साथ करेंगी। वे केवल एक कलाकार नहीं थीं; वे छत्तीसगढ़ की आत्मा की आवाज़ थीं।
छत्तीसगढ़ की धरती अपनी इस महान लोकनायिका को शत-शत नमन करती है। भारतीय लोकसंस्कृति सदैव उनकी ऋणी रहेगी। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करे तथा उनके परिजनों, शिष्यों और असंख्य प्रशंसकों को इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे।
विनम्र श्रद्धांजलि!
स्वर भले मौन हो गया हो, पर संस्कृति का वह आलोक कभी नहीं बुझेगा।
तीजन बाई का नाम भारतीय लोकपरंपरा के इतिहास में सदैव अमर रहेगा।</description><guid>776</guid><pubDate>05-Jul-2026 12:23:43 am</pubDate></item><item><title>सावन मनभावन आया है...</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=775</link><description>- डॉ. दीक्षा चौबे 
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद) 
सावन मनभावन आया है, याद तुम्हारी आई प्रियतम।
पुलकित हर्षित है वसुंधरा, मैं ही हूँ मुरझाई प्रियतम ।।
ताल दे रहीं बूँदें छम-छम, मौन हुई है मेरी पायल।
प्रेमी युगल प्रणय क्रीड़ा रत, देख हुआ है अंतस् घायल।
छवि-दर्शन कर तस्वीरों में, आती मुझे रुलाई प्रियतम ।।
सावन मनभावन आया है, याद तुम्हारी आई प्रियतम।।
नेह-मेह स्वस्त्ययन कर रहे, उमड़-घुमड़ गरजें बादल।
झड़ी लगी चक्षुज-बूँदों की, अस्त-व्यस्त नयनों का काजल ।
खिलकर मधुमालती बुलाती, मन को नहीं लुभाई प्रियतम।।
सावन मनभावन आया है, याद तुम्हारी आई प्रियतम।।
प्रेम रंग में मन अनुरंजित, रंग नहीं अब देखे दूजा ।
शिव भक्तों पर करें अनुग्रह, करती रहती मन से पूजा।
निविड़ तमस कारा पीड़ा की, दिवस लगें दुखदाई प्रियतम।।
सावन मनभावन आया है, याद तुम्हारी आई प्रियतम।।</description><guid>775</guid><pubDate>05-Jul-2026 11:56:34 pm</pubDate></item><item><title> नैनो उर्वरक- छत्तीसगढ़ के खेती-किसानी में आई नई क्रांति</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=774</link><description>-किसान भईयों को कम लागत में होगी अधिक पैदावारी
 विशेष लेख :तेजबहादुर सिंह भुवाल, सहा. जनसंपर्क अधिकारी
रायपुर। छत्तीसगढ़ को देश का धान का कटोरा कहा जाता है। यहां की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है और किसानों की समृद्धि राज्य के विकास से सीधे जुड़ी हुई है। बदलते समय के साथ खेती में नई तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है, जिनमें नैनो उर्वरक किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण नवाचार के रूप में उभरा है। कम लागत, अधिक प्रभाव और पर्यावरण संरक्षण जैसे गुणों के कारण नैनो उर्वरक आज किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा हैं।
नैनो उर्वरक अत्यंत सूक्ष्म कणों से निर्मित होते हैं, जिन्हें पौधे तेजी से और अधिक मात्रा में अवशोषित कर लेते हैं। इसके कारण पौधों को आवश्यक पोषक तत्व सही समय पर उपलब्ध हो जाते हैं और फसलों का विकास बेहतर तरीके से होता है। पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में इनकी मात्रा कम लगती है, जिससे किसानों का खर्च घटता है और उत्पादन में वृद्धि होती है। छत्तीसगढ़ में धान, मक्का, चना, अरहर तथा सब्जी फसलों में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का उपयोग किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है। प्रदेश में कई किसानों ने अनुभव किया है कि नैनो उर्वरकों के प्रयोग से फसल की पैदावार बेहतर होती है, पौधे अधिक हरे-भरे रहते हैं और उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार होता है।
नैनो उर्वरकों का एक बड़ा लाभ यह भी है कि इनके उपयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव कम पड़ता है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से जहां भूमि की गुणवत्ता प्रभावित होती है, वहीं नैनो उर्वरक संतुलित पोषण प्रदान कर मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायता करते हैं। साथ ही जल स्रोतों में रासायनिक तत्वों के बहाव को भी कम करते हैं, जिससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
परिवहन और भंडारण की दृष्टि से भी नैनो उर्वरक काफी सुविधाजनक हैं। पारंपरिक उर्वरकों की भारी बोरियों की जगह छोटी बोतलों में उपलब्ध नैनो उर्वरक किसानों के लिए आसानी से ले जाने और उपयोग करने योग्य होते हैं। इससे समय और श्रम दोनों की बचत होती है।
छत्तीसगढ़ सरकार किसानों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक कृषि तकनीकों से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। नैनो डीएपी और नैनो यूरिया जैसे उन्नत उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देकर खेती को अधिक उत्पादक, किफायती और टिकाऊ बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। आधुनिक तकनीक और नवाचार आधारित खेती ही भविष्य की कृषि का आधार है। नैनो उर्वरकों का उपयोग न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि व्यवस्था को भी बढ़ावा देगा।
 छत्तीसगढ़ सरकार तथा कृषि विभाग किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए लगातार प्रेरित कर रही हैं। इसी क्रम में माननीय मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय जी ने भी राज्य के किसानों से अपील की है कि वे वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों और नवीन तकनीकों को अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी बनाएं। उन्होंने किसानों को नैनो उर्वरकों के उपयोग के प्रति जागरूक होने तथा कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार इनका प्रयोग करने का आग्रह किया है, ताकि उत्पादन बढ़े, लागत घटे और किसानों की आय में वृद्धि हो सके।
वर्तमान में कृषि क्षेत्र में बढ़ती लागत और संसाधनों की सीमित उपलब्धता के बीच नैनो उर्वरक किसानों के लिए एक प्रभावी विकल्प बनकर सामने आए हैं। यह तकनीक कम खर्च में बेहतर उत्पादन, स्वस्थ मिट्टी और सुरक्षित पर्यावरण का मार्ग प्रशस्त करती है। यदि छत्तीसगढ़ के किसान वैज्ञानिक सलाह और संतुलित उपयोग के साथ नैनो उर्वरकों को अपनाते हैं, तो आने वाले समय में यह राज्य की कृषि उन्नति और किसानों की आर्थिक समृद्धि का मजबूत आधार बन सकता है। निस्संदेह, नैनो उर्वरक छत्तीसगढ़ के किसान भाइयों के लिए आधुनिक खेती का नया वरदान साबित हो सकता है।

</description><guid>774</guid><pubDate>29-Jun-2026 6:11:10 pm</pubDate></item><item><title>प्रकृति की गोद में बसा जशपुर का अनुपम पर्यटन स्थल रानीदाह</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=773</link><description>-जहां हरियाली, कल-कल बहता झरना और लोककथाओं का अद्भुत संगम पर्यटकों को करता है मंत्रमुग्ध
 विशेष लेख : * सुनील त्रिपाठी, सहायक संचालक जनसंपर्क
* नूतन सिदार, सहायक संचालक जनसंपर्क
रायपुर। छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला अपनी प्राकृतिक संपदा, घने वनों, पहाड़ियों और मनमोहक जलप्रपातों के लिए पूरे प्रदेश में विशेष पहचान रखता है। इन्हीं प्राकृतिक धरोहरों में शामिल है रानीदाह जलप्रपात, जो अपनी अलौकिक सुंदरता, शांत वातावरण और ऐतिहासिक लोककथाओं के कारण पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन चुका है। जशपुर नगर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह पर्यटन स्थल प्रकृति प्रेमियों, फोटोग्राफी के शौकीनों और रोमांच पसंद पर्यटकों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है।
रानीदाह तक पहुँचने का सफर भी अपने आप में यादगार अनुभव है। हरियाली से आच्छादित पहाड़ियों, घने साल के जंगलों और घुमावदार खूबसूरत सड़कों से गुजरते हुए जैसे ही पर्यटक इस स्थल पर पहुँचते हैं, सामने ऊँची चट्टानों से गिरती दूधिया जलधारा, चारों ओर फैली हरियाली और पक्षियों का मधुर कलरव मन को सुकून से भर देता है। विशेषकर वर्षा ऋतु में यह जलप्रपात अपने पूरे वैभव में दिखाई देता है, जब पानी अनेक धाराओं में विभाजित होकर ऊँचाई से नीचे गिरता है और अद्भुत प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करता है।
रानीदाह केवल प्राकृतिक सौंदर्य का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि यह स्थानीय लोककथाओं और जनश्रुतियों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, बहुत समय पहले ओडिशा की राजकुमारी रानी शिरोमणि इन पहाड़ियों तक पहुँची थीं। जब उनके पिता और पाँच भाई उनका पीछा करते हुए यहाँ आए, तब रानी ने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए इसी गहरी खाई में छलांग लगाकर अपने प्राण त्याग दिए। तभी से इस स्थान का नाम रानीदाह पड़ा, जिसका अर्थ है रानी का जलप्रपात। झरने के समीप स्थित कुछ चट्टानों को आज भी स्थानीय लोग पाँच भैया के नाम से जानते हैं, जिन्हें रानी के पाँच भाइयों का प्रतीक माना जाता है। यह लोककथा आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रानीदाह जलप्रपात अपने शांत वातावरण, स्वच्छ प्राकृतिक परिवेश और मनोहारी दृश्यों के कारण परिवारों, युवाओं और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक आदर्श पिकनिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ आने वाले पर्यटक प्रकृति के बीच सुकून के पल बिताने के साथ-साथ यादगार फोटोग्राफी और ट्रैकिंग का भी आनंद लेते हैं। सप्ताहांत और वर्षा ऋतु में यहाँ बड़ी संख्या में पर्यटक पहुँचते हैं।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक एवं धार्मिक पर्यटन स्थलों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जशपुर जिले के रानीदाह जैसे प्राकृतिक पर्यटन स्थल प्रदेश की पर्यटन पहचान को नई ऊँचाइयाँ दे रहे हैं। यदि आप प्रकृति की अनुपम छटा, शांत वातावरण और लोक संस्कृति का अनूठा अनुभव एक साथ लेना चाहते हैं, तो जशपुर का रानीदाह जलप्रपात निश्चित रूप से आपकी यात्रा सूची में शामिल होना चाहिए।</description><guid>773</guid><pubDate>28-Jun-2026 6:10:54 pm</pubDate></item><item><title>ईमानदारी का थर्मामीटर </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=771</link><description>- लघुकथा
स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
स्वाति आज पहली बार सीमा के साथ बाजार गई थी । उसने देखा सीमा कुछ चुनिंदा दुकानदारों से ही खरीदारी कर रही थी । उसके कई काम की चीजें उनके पास न होने पर वह किसी और से वह सामान नहीं खरीद रही थी बल्कि उन्हें ही अगली बार मँगाकर रखने के लिए कह रही थी । स्वाति ने सीमा को किसी भी दूसरे दुकानदार से वह सामान खरीदने को कहा तो उसने मना कर दिया यह कहकर कि वे ईमानदार नहीं हैं ।
  थोड़ी देर में किसी का चेहरा देखकर तुम कैसे कह सकती हो कि यह ईमानदार है या बेईमान ? स्वाति ने अपनी शंका प्रकट करते हुए कहा ।  मैं जान - बूझकर कई बार उन्हें दो - चार रुपये अधिक दे देती हूँ जो ईमानदार होते हैं वे सच बताते हुए पैसे वापस कर देते हैं , खोटी नीयत वाले चंद रुपयों के लाभ का मोह नहीं छोड़ पाते और ग्राहकों का विश्वास खो देते हैं । बस , यही है मेरा ईमानदारी परखने का थर्मामीटर ।स्वाति को भी भा गया था यह थर्मामीटर ।</description><guid>771</guid><pubDate>28-Jun-2026 3:28:14 pm</pubDate></item><item><title> मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय : सरल, सादगी और संवेदनशीलता के साथ विकास यात्रा का सशक्त नेतृत्व</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=770</link><description>विशेष लेख : - तेजबहादुर सिंह भुवाल, सहा. जनसंपर्क अधिकारी
रायपुर। किसान परिवार से निकलकर छत्तीसगढ़ प्रदेश के सर्वाेच्च नेतृत्व तक पहुंचने वाले मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने अपने सरल व्यक्तित्व, विनम्र व्यवहार और जनसेवा की भावना से जनता के बीच एक अलग पहचान बनाई है। मुख्यमंत्री श्री साय का सार्वजनिक जीवन सादगी, जनसेवा और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। लंबे समय तक जनप्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों, वनवासियों, युवाओं, महिलाओं और वंचित वर्गों की समस्याओं को निकट से समझा और उनके समाधान के लिए निरंतर प्रयास किए हैं। सत्ता के शीर्ष पद पर होने के बावजूद उनकी सादगी और सहजता आज भी उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
मुख्यमंत्री श्री साय आम जनता से सीधे संवाद को लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति मानते हैं। जनदर्शन, सुशासन तिहार और विभिन्न जनसंपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से वे स्वयं लोगों की समस्याएं सुनते हैं और उनके समाधान के लिए त्वरित पहल करते हैं। बुजुर्गों के प्रति सम्मान, बच्चों के प्रति स्नेह तथा जरूरतमंदों की सहायता के लिए तत्परता उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान है।
आदिवासी समाज से आने वाले मुख्यमंत्री श्री साय अपनी संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों से गहराई से जुड़े हुए हैं। गांवों में बैठकर लोगों से चर्चा करना, उनकी समस्याओं को समझना और विकास योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है।
पिछले ढाई वर्षों में छत्तीसगढ़ सरकार ने जनकल्याण, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, अधोसंरचना, निवेश और सुशासन के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। सरकार का लक्ष्य केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना रहा है।
राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी महतारी वंदन योजना के माध्यम से लाखों महिलाओं को 1000 रुपए प्रतिमाह आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। इस वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने 8,200 करोड़ रूपये का बजट महतारी वंदन योजना के लिए आवंटित किया है। महतारी वंदन योजना छत्तीसगढ़ में महिलाओं के स्वावलंबन, स्वास्थ्य और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है, जो लाखों महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार ला रही है।
छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसान हैं। राज्य सरकार ने धान खरीदी को प्राथमिकता देते हुए किसानों से 3100 रूपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी सुनिश्चित की तथा लाखों किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाया।
प्रदेश में गरीब और जरूरतमंद परिवारों को पक्का घर उपलब्ध कराने की दिशा में सरकार ने बड़ी पहल करते हुए लाखों आवासों को स्वीकृति प्रदान की। इससे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आवासीय सुविधाओं का विस्तार हुआ है। प्रधानमंत्री आवास योजना के क्रियान्वयन में छत्तीसगढ़ ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। तेज गति से चल रहे निर्माण कार्यों के चलते प्रदेश में लाखों जरूरतमंद परिवारों का पक्के घर का सपना साकार हो रहा है।
बस्तर के जंगलों में उत्पादित होने वाले तेंदूपत्ता, आदिवासी समाज की जिंदगी का अहम हिस्सा है। इसी तेंदूपत्ता के सहारे हजारों गांवों में गर्मियों के महीनों में रोज़गार मिलता है। इस काम में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल होती हैं, जिससे परिवार की कुल आय में संतुलन बनता है। यही वजह है कि तेंदूपत्ता संग्रहण को सरकार ग्रामीण रोजगार का मजबूत जरिया मानती है। राज्य सरकार ने तेन्दूपत्ता संग्राहकों को बड़ी रहत देते हुए तेंदूपत्ता संग्रहण दर में अहम बदलाव किया है। पूर्व में मिलने वाली राशि को 4,000 रुपये से बढ़ाकर 5,500 रुपये किया है। यह बढ़ोतरी सीधे-सीधे संग्राहकों लाभ पहुंचा रही है। जानकारों के अनुसार पहले बढ़ती महंगाई के मुकाबले संग्रहण की दर कम पड़ रही थी, लेकिन नई दर से मजदूरी और मेहनत का बेहतर मूल्य मिल सकेगा।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार सुरक्षा के साथ-साथ संवेदनशील पुनर्वास और विकास पर भी समान रूप से कार्य कर रही है। नक्सली सरेंडर, विक्टिम रिलीफ एंड रिहैबिलिटेशन पॉलिसी-2025 के तहत आत्मसमर्पित नक्सलियों को वित्तीय सहायता, कौशल विकास प्रशिक्षण, रोजगार के अवसर तथा आवास जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराकर उन्हें सम्मानजनक और मुख्यधारा से जुड़ा जीवन प्रदान किया जा रहा है।
एक नवंबर 2024 से लागू छत्तीसगढ़ सरकार की नई औद्योगिक नीति 2024-30 राज्य को निवेश और उद्योगों के लिए नई पहचान दे रही है। न्यूनतम शासन, अधिकतम प्रोत्साहन के सिद्धांत पर आधारित यह नीति उद्योग स्थापना की प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और निवेशक-अनुकूल बनाती है।
व्यवसाय शुरू करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम 2.0, पूरी तरह ऑनलाइन आवेदन, समयबद्ध स्वीकृति और त्वरित प्रोसेसिंग जैसी आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं। इससे उद्यमियों को कम समय में आवश्यक अनुमतियाँ प्राप्त हो रही हैं और कारोबार करने में सुगमता बढ़ी है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में मजबूत और आधुनिक परिवहन नेटवर्क के निर्माण पर विशेष जोर दिया गया है। राज्य में रेल, सड़क और हवाई संपर्क का तेजी से विस्तार हो रहा है, जिससे उद्योग, व्यापार, पर्यटन और आम नागरिकों की आवाजाही पहले से अधिक सुगम हुई है।
छत्तीसगढ़ सरकार राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों का निरंतर उन्नयन, नई सड़कों और पुलों का निर्माण तथा दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्य मार्गों से जोड़ने के प्रयासों ने प्रदेश की कनेक्टिविटी को नई गति दी है। इससे माल परिवहन की लागत और समय में कमी आई है, जिससे उद्योगों और निवेशकों को सीधा लाभ मिल रहा है।
राज्य शासन की पहल से रेल नेटवर्क के विस्तार और नई रेल परियोजनाओं के माध्यम से औद्योगिक क्षेत्रों, खनिज संपदा वाले इलाकों और प्रमुख शहरों को बेहतर रेल संपर्क उपलब्ध कराया जा रहा है। वहीं, हवाई सेवाओं के विस्तार, नए एयर रूट और बेहतर विमानन सुविधाओं से राज्य की राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच और भी मजबूत हुई है। बेहतर परिवहन अवसंरचना के कारण छत्तीसगढ़ आज निवेश, व्यापार और पर्यटन के लिए अधिक आकर्षक बन रहा है। यह मजबूत कनेक्टिविटी राज्य के समग्र आर्थिक विकास को नई दिशा देने के साथ-साथ रोजगार और क्षेत्रीय विकास के नए अवसर भी सृजित कर रही है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर रुख अपनाते हुए प्रशासनिक जवाबदेही को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी है। योजनाओं में लापरवाही और अनियमितताओं पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही को शासन की आधारशिला बनाया है। भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत प्रशासन को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जन-केंद्रित बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाए गए हैं।
सरकार ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित जांच, दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कड़ी विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई, तथा अनियमितताओं में शामिल व्यक्तियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों की निगरानी को तकनीक आधारित बनाया गया है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों मजबूत हुई हैं। इसके लिए ई-ऑफिस, सिंगल विंडो सिस्टम 2.0, ई-गवर्नेंस और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से प्रशासन को अधिक पारदर्शी, सरल और जवाबदेह बनाया गया है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रशासनिक कार्यप्रणाली को अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और जनोन्मुखी बनाने के लिए सुशासन तिहार के माध्यम से प्रदेश में कही भी औचक निरीक्षण की व्यवस्था को प्रभावी रूप से लागू किया है। मुख्यमंत्री, मंत्रीगण, वरिष्ठ अधिकारी एवं जिला प्रशासन द्वारा नियमित औचक निरीक्षणों के माध्यम से जिलों के सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों, विद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों, राशन दुकानों और विभिन्न विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति का प्रत्यक्ष आकलन किया जा रहा है।
इन निरीक्षणों के दौरान लापरवाही, अनियमितता और भ्रष्टाचार के मामलों में तत्काल कार्रवाई, जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई तथा आवश्यक सुधार के निर्देश दिए जा रहे हैं। इससे प्रशासनिक तंत्र में अनुशासन बढ़ा है और अधिकारियों की जवाबदेही पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है।
औचक निरीक्षणों के परिणामस्वरूप सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में गुणवत्ता, समयबद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित हुई है। आम नागरिकों को मिलने वाली सेवाओं में सुधार आया है तथा जनता का शासन व्यवस्था पर विश्वास और अधिक सुदृढ़ हुआ है।
सुशासन की इसी कार्य पद्धति के माध्यम से छत्तीसगढ़ सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करे तथा शासन की प्रत्येक योजना का लाभ समय पर और प्रभावी ढंग से आमजन तक पहुंचे।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ विकास, सुशासन और जनकल्याण के नए युग की ओर तेजी से अग्रसर है। सरकार का लक्ष्य केवल योजनाओं की घोषणा करना नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से प्रत्येक नागरिक तक विकास का लाभ पहुँचाना है। सुशासन, पारदर्शिता, निवेश, अधोसंरचना, कृषि, महिला सशक्तिकरण, युवाओं के रोजगार और औद्योगिक विकास को केंद्र में रखकर राज्य में व्यापक परिवर्तन की दिशा में कार्य किया जा रहा है। नई औद्योगिक नीति, बेहतर सड़क, रेल और हवाई संपर्क, डिजिटल शासन, भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस, किसानों और महिलाओं के हित में लागू योजनाएँ तथा बुनियादी सुविधाओं का विस्तार विकसित छत्तीसगढ़ की मजबूत नींव तैयार कर रहे हैं।
राज्य सरकार का संकल्प है कि सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के मंत्र को आत्मसात करते हुए छत्तीसगढ़ को देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में स्थापित किया जाए। विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना और प्रत्येक क्षेत्र में संतुलित एवं समावेशी प्रगति सुनिश्चित करना सरकार की सर्वाेच्च प्राथमिकता है।
विकसित छत्तीसगढ़ का यह अभियान केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, सुशासन और आधुनिक अधोसंरचना के माध्यम से एक समृद्ध, आत्मनिर्भर, सशक्त और खुशहाल छत्तीसगढ़ के निर्माण का संकल्प है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य निरंतर नए अवसरों, नई उपलब्धियों और नई संभावनाओं के साथ विकास की नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहा है।
सरल व्यक्तित्व, संवेदनशील हृदय और सशक्त नेतृत्व यही मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की पहचान है, जो छत्तीसगढ़ को विकास और समृद्धि की नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर कर रही है।</description><guid>770</guid><pubDate>28-Jun-2026 3:22:14 pm</pubDate></item><item><title> ​छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा क्षेत्र में PM-USHA की महा-क्रांति </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=769</link><description>-भौगोलिक दूरियां होंगी खत्म: वनांचलों से लेकर शहरों तक पहुंच रही आधुनिक शिक्षा
आलेख- विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालक
रायपुर। छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा जगत में एक नए युग का सूत्रपात हो चुका है। वर्ष 2014 से 2026 के बीच केंद्र सरकार से मिली प्रमुख स्वीकृतियों और सौगातों की शृंखला में 'प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान' (PM-USHA) राज्य के लिए वरदान साबित हो रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के प्रभावी क्रियान्वयन, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की नैशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल (NAAC) ग्रेडिंग में सुधार, और अनुसंधान (Research) के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा भारी-भरकम वित्तीय अनुदान की स्वीकृति दी गई है। यह योजना पूर्ववर्ती राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) का ही एक परिष्कृत और अधिक उन्नत रूप है।
इस योजना के तहत देश भर के लिए कुल 12,926.10 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इस विशाल बजट का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा छत्तीसगढ़ के हिस्से आया है। ​योजना के तहत छत्तीसगढ़ राज्य में चयनित पात्र शासकीय विश्वविद्यालयों को मल्टी-डिसिप्लिनरी एजुकेशन एंड रिसर्च यूनिवर्सिटीज़ (MERU) के अंतर्गत प्रति संस्थान 20 करोड़ से लेकर 100 करोड़ रुपए तक का भारी-भरकम अनुदान मिल रहा है। वहीं, चिन्हित शासकीय महाविद्यालयों को बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण (Grants to Strengthen Colleges) के लिए 5 करोड़ रुपए तक का प्रोजेक्ट-बेस्ड अनुदान स्वीकृत किया जा रहा है। इस वित्तीय भार का वहन केंद्र और राज्य सरकार द्वारा 60:40 के अनुपात (60% केंद्रांश और 40% राज्यांश) में किया जा रहा है।
​छत्तीसगढ़ में यह योजना केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर तेजी से प्रगति कर रही है। छत्तीसगढ़ शासन के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा केंद्र सरकार के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) निष्पादित किया जा चुका है। वर्तमान में, चयनित कॉलेजों द्वारा विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर पोर्टल पर अपलोड की जा रही है। इसके साथ ही, राज्य के शिक्षण संस्थानों में स्मार्ट क्लासरूम, आधुनिक लैब, और कंप्यूटर सेंटर जैसे अत्याधुनिक अधोसंरचना निर्माण का कार्य युद्धस्तर पर जारी है।
​PM-USHA योजना का सबसे खूबसूरत पहलू इसका समावेशी होना है। इस परियोजना का लाभ छत्तीसगढ़ के समस्त 33 जिलों को मिल रहा है। योजना के तहत विशेष रूप से राज्य के ​आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों और दूरस्थ अंचलों जैसे बस्तर संभाग और सरगुजा संभाग,​कम सकल नामांकन अनुपात (GER) वाले क्षेत्रों,​आकांक्षी जिलों जैसे धमतरी, गरियाबंद, महासमुंद आदि के शासकीय कॉलेजों को प्राथमिकता के आधार पर शामिल किया गया है, ताकि विकास की दौड़ में पीछे छूटे क्षेत्रों को मुख्यधारा में लाया जा सके।
 ​इस दूरदर्शी परियोजना से राज्य के विभिन्न शासकीय शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत लगभग 5 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं सीधे लाभान्वित हो रहे हैं। इस योजना का सबसे बड़ा फायदा ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों, अनुसूचित जनजाति (ST), अनुसूचित जाति (SC) और महिला वर्ग के छात्र-छात्राओं को मिल रहा है। अब छत्तीसगढ़ के वनांचलों और दूरदराज के गांवों के युवाओं को भी वैश्विक स्तर की आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान की सुविधाएं अपने ही राज्य में सुलभ हो रही हैं, जो उनके सुनहरे भविष्य की मजबूत नींव रख रही हैं।
</description><guid>769</guid><pubDate>22-Jun-2026 2:45:14 pm</pubDate></item><item><title> स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग: जिंदगी में जीवंतता का समावेश</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=768</link><description>-आलेख -श्री सी.पी. राधाकृष्णन,(लेखक भारत के उपराष्ट्रपति हैं)
सदियों से, भारत की एक अनूठी पहचान रही है। उसकी यह पहचान वसुधैव कुटुंबकम  यानी पूरी दुनिया को एक इकाई और सभी जीव-जंतुओं को एक मानने - की महान सोच में निहित रही है। भारत के इस आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित, योग एक ऐसी प्राचीन विद्या है जो शरीर, मन और आत्मा के बीच एक संतुलन स्थापित करती है। योग के मूल तत्वों में आसन (शारीरिक मुद्राएं), प्राणायाम (सांस लेने की तकनीकें) और ध्यान शामिल हैं। इन तत्वों का मेल शारीरिक स्वस्थता, मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन को बेहतर बनाता है।
दिनांक 27 सितंबर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए, माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने दुनिया को रहने योग्य और स्थिर बनाने के उद्देश्य से लोगों की जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने कहा कि योग मन एवं शरीर, सोच एवं कर्म, संयम एवं संतुष्टि के बीच एकता, इंसान एवं प्रकृति के बीच सामंजस्य और सेहत एवं कल्याण से संबंधित एक समग्र दृष्टिकोण का संगम है। माननीय प्रधानमंत्री के आग्रह पर, 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित करने से संबंधित 174 से अधिक देशों के सम्मिलित प्रस्ताव को मंजूरी दी। वर्ष 2015 से, दुनिया भर में लाखों लोग सार्वजनिक जगहों पर इकट्ठा होकर एक साथ योग करते हैं और इस प्रकार हमारे प्राचीन ज्ञान को एक वैश्विक आंदोलन का रूप देते हैं।
इस वर्ष 21 जून को प्रधानमंत्री श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी जहां कोलकाता में योग दिवस की अगुवाई करेंगे, वहीं मैं इस समारोह में भाग लेने के लिए लद्दाख में रहूंगा। व्यक्तिगत रूप से, पिछले कई वर्षों से मैंने भी योग एवं पंचकर्म के नियमित अभ्यास के लाभों को महसूस किया है। इन दोनों को अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी विधाएं (सिस्टर साइंसेज) कहा जाता है। इन्हीं बेहद समृद्ध करने वाले व्यक्तिगत अनुभवों ने मुझे योग और मानव कल्याण पर इसके गहरे प्रभाव के बारे में अपने विचार साझा करने के लिए प्रेरित किया है।
योग: भारत की एक शाश्वत विरासत
माना जाता है कि शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कल्याण से संबंधित योग के कालजयी अभ्यास की शुरुआत हमारी सभ्यता के उदय के साथ ही हुई थी। योग की परंपरा में भगवान शिव को जहां सबसे पहला योगी या आदि योगी और सबसे पहला गुरु या आदि गुरु माना जाता है, वहीं योग के सिद्धांतों को योग सूत्र में व्यवस्थित रूप से संकलित के कारण महर्षि पतंजलि को शास्त्रीय योग का जनक माना जाता है। महर्षि पतंजलि का तमिलनाडु के साथ गहरा आध्यात्मिक नाता है। ऐसा माना जाता है कि उनकी भौतिक जीव समाधि भी तिरुपत्तूर में स्थित है।
हमारे श्रद्धेय ऋषियों और मुनियों ने दुनिया को योग का अमूल्य खजाना दिया। वर्षों के ध्यान, तपस्या और आध्यात्मिक साधना के बाद, इन ऋषियों और मुनियों ने एक ऐसी समग्र प्रणाली विकसित की जो शरीर, मन और आत्मा को जोड़ती है। श्री रामकृष्ण परमहंस ने योग के तीन महान मार्गों की व्याख्या की है- ज्ञान योग, जो बुद्धि एवं ज्ञान का मार्ग है; कर्म योग, जो निस्वार्थ सेवा एवं सही कर्म का मार्ग है; और भक्ति योग, जो शुद्ध प्रेम और भक्ति का मार्ग है। उन्होंने सिखाया कि ये तीनों मार्ग अंततः परम सत्य की अनुभूति में एकाकार हो जाते हैं।
आज योग भौगोलिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सीमाओं के बंधन से आगे निकल गया है। यह भारत के ऋषियों के शाश्वत ज्ञान और मानवता के कल्याण में उनके चिरस्थायी योगदान का जीवंत प्रमाण है।
स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग
हर वर्ष हमारे देश में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पूरे उत्साह और एक सार्थक विषय के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष के विषय स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग का खास महत्व है। स्वास्थ्य सेवा और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में हुई उल्लेखनीय प्रगति और मृत्यु दर में आई कमी के कारण दुनिया भर में लोगों की औसत आयु बढ़ी है। भारत भी आबादी में हो रहे इस बड़े बदलाव का साक्षी बन रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023 के अनुसार, 2050 तक भारत में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से अधिक होगी।
लंबी आयु के इस अनमोल उपहार का उत्सव मनाते हुए, समाज पर यह सुनिश्चित करने की एक महती जिम्मेदारी भी है कि जिंदगी में मिले इन अतिरिक्त वर्षों का मतलब केवल आयु में बढ़ोतरी ही न हो, बल्कि उन वर्षों में जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर हो। इसी संदर्भ में, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (आईडीवाई) 2026 का विषय  स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग - एक बहत ही सामयिक संदेश के रूप में सामने आया है।
आबादी में आए इस बदलाव के कारण भारत में सिल्वर इकॉनमी का विस्तार हुआ है, जो मुख्य रूप से स्वास्थ्य सेवा और वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों से जुड़े सामानों एवं सेवाओं पर केंद्रित है। उद्योग जगत के विशेषज्ञों का अनुमान है कि अभी इसका आकार लगभग 73,000 करोड़ रुपये का है। आने वाले वर्षों में इस सेक्टर के काफी बढ़ने की उम्मीद है।
आज के दौर में आयु बढ़ने से जुड़ी हकीकतों ने इस तथ्य को उजागर किया है कि बुजुर्ग लोग कैसे विभिन्न प्रकार की मुश्किलों एवं कमजोरियों के जटिल जाल से जूझ रहे हैं। इस संदर्भ में, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी दुनिया भर में बुजुर्गों के बीच गैर-संचारी रोगों, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और सामाजिक अलगाव के बढ़ते बोझ को बार-बार रेखांकित किया है।
मेरा भी यह मानना ​​है कि आज वक्त की यह मांग है कि लोगों को कम आयु से ही योग से जोड़ा जाए। योग का अभ्यास जितनी जल्दी शुरू किया जाए, जीवन भर उसके उतने ही अधिक लाभ मिलते हैं। मुझे यह जानकर बेहद खुशी हुई है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में योग को स्वास्थ्य, कल्याण और मूल्यों पर आधारित शिक्षा के एक अहम हिस्से के तौर पर महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। युवाओं को योग से जोड़ने की दिशा में यह एक सकारात्मक कदम है। इससे निश्चित रूप से विद्यार्थियों में अनुशासन, एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा मिलेगा।
इस प्रकार, हम पाते हैं कि दुनिया भर में बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के बीच भारत दुनिया को सफलतापूर्वक आगे बढ़ने का एक अनूठा मॉडल प्रदान कर रहा है - एक ऐसा मॉडल जो प्राचीन सभ्यतागत ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों के बीच सामंजस्यपूर्ण तालमेल बिठाता है - और वह है योग।
योग - आज के दौर में बुढ़ापे से जुड़ी समस्याओं का समाधान
आज, आधुनिक विज्ञान हमारे उन ऋषियों एवं योगियों की शाश्वत बातों की पुष्टि कर रहा है, जिन्होंने अनुशासित जीवन, योग और आध्यात्मिक साधना के जरिए असाधारण लंबी आयु, जीवन-शक्ति और मानसिक स्पष्टता हासिल की थी। हाल के वर्षों में योग के उपचारात्मक पहलुओं में अकादमिक और क्लिनिकल अभिरुचि तेजी से बढ़ी है।
नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (एनआईएच) एवं हार्वर्ड मेडिकल स्कूल जैसे बड़े संस्थानों और लैंसेट जैसी कई प्रतिष्ठित शोध-पत्रिकाओं ने अपने शोधों में इस तथ्य को दर्शाया है कि नियमित रूप से योग करने से बुजुर्गों में संतुलन, लचीलापन और चलने-फिरने की क्षमता सुरक्षित रूप से बेहतर होती है। इससे उनके गिरने का डर और जोखिम काफी कम हो जाता है। शोधों से यह भी पता चला है कि योग से हड्डियों की मजबूती (बोन डेंसिटी) बढ़ती है, गठिया का दर्द कम होता है, सांस लेने की क्षमता बेहतर होती है, रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) स्थिर रहता है और मानसिक सेहत अच्छी रहती है। साथ ही, ध्यान और सांस लेने के व्यायाम से बुजुर्गों की नींद की गुणवत्ता, कठिन परिस्थितियों का सामना करने की मानसिक क्षमता और सोचने-समझने की शक्ति (कॉग्निटिव फंक्शनिंग) में भी सुधार देखा गया है।
लेकिन मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि योग की असली ताकत उसके समग्र स्वरूप में निहित है। शारीरिक सुधार से कहीं आगे बढ़कर, योग भावनात्मक संतुलन और सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देता है। मैंने देखा है कि आज बुजुर्गों के बीच अकेलेपन का बढ़ता अहसास एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। योग धीरे-धीरे इस अकेलेपन को सामूहिक जुड़ाव की भावना में बदल देता है। यह लोगों को मैं-केंद्रित सोच से हटाकर सहानुभूति, आपसी जुड़ाव एवं आंतरिक शांति पर आधारित हम-केंद्रित सोच की ओर ले जाता है।
मेरे अपने अनुभव के अनुसार, अहम बात यह है कि स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग में बहुत अधिक शारीरिक मेहनत की जरूरत नहीं होती। पारंपरिक योग क्रियाओं को काफी सोच-समझकर ऐसे सरल एवं सुलभ तरीकों में ढाला गया है जो बुजुर्गों के लिए उपयुक्त हैं। इनमें योगिक सूक्ष्म व्यायाम (जोड़ों की हल्की हरकतें), कुर्सी की मदद से किए जाने वाले आसन, सांस लेने की निर्देशित तकनीकें और ध्यान जैसी क्रियाएं शामिल हैं। ये सब बढ़ती आयु के शरीर पर बिना कोई दबाव डाले न्यूरोएंडोक्राइन प्रणाली और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं।
साथ ही, योग उन देखभाल करने वालों और परिवार के सदस्यों के लिए भी हौसले एवं सहनशक्ति का स्रोत है, जो बुजुर्गों की देखभाल की भावनात्मक तथा शारीरिक जिम्मेदारियां उठाते हैं। इन व्यापक लाभों को देखते हुए, आयुष मंत्रालय ने गैर-संचारी रोगों और लक्षित समूहों के लिए योग की 10 विधाओं से जुड़ी एक अहम पहल शुरू की है। इसमें बुजुर्गों की सेहत के लिए खास तौर पर साक्ष्यों पर आधारित योग मॉड्यूल भी शामिल है। इसके अलावा, 100 दिनों का मुफ्त निर्देशित ऑनलाइन योग कार्यक्रम प्रदान करने वाले योग 365 पहल नाम के एक देशव्यापी अभियान को कुछ इस तरह से तैयार किया गया है ताकि योग सभी आयु के नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी का एक सहज एवं स्थायी साथी बन सके।
दो हजार से भी अधिक वर्ष पहले, महान तमिल विद्वान एवं संत तिरुवल्लुवर ने कुरल (949) के जरिए सेहत से संबंधित एक व्यक्ति-केंद्रित दृष्टिकोण की हिमायत की थी। उन्होंने कहा था, उपचार शुरू करने से पहले मरीज की हालत, बीमारी की प्रकृति और उपयुक्त समय पर विचार करें। यह शाश्वत समझ स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग के आधुनिक सिद्धांतों से मेल खाती है, जहां व्यक्ति की उम्र, सेहत और जरूरतों के हिसाब से अभ्यास को सावधानी से अपनाया जाता है ताकि लोग बुढ़ापे में भी अधिक स्वस्थ, सक्रिय और सम्मानजनक जीवन जी पाएं।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर मैं हर नागरिक, शिक्षण संस्थान, नागरिक समाज संगठन, स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े पेशेवर और समुदायों के नेता से आग्रह करता हूं कि वे योग को केवल कभी-कभार की जाने वाली कसरत के रूप में नहीं, बल्कि जीवन भर चलने वाली सांस्कृतिक एवं सेहत से जुड़ी एक आदत के तौर पर अपनाएं। किसी समाज की असल पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों का कितना ख्याल रखता है। इसलिए, आइए हम एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने की कोशिश करें जहां हमारे बुजुर्ग डर, निर्भरता या अकेलेपन के बीच नहीं, बल्कि सम्मान, जोश, सार्थक उद्देश्य और शांति के साथ जीवन जी सकें। योग को जीवन का एक लय बनाकर, हम सब मिलकर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारे नागरिकों के जीवन के सुनहरे वर्ष सचमुच सेहत, सामंजस्य और संतुष्टि से भरे हों!  </description><guid>768</guid><pubDate>21-Jun-2026 11:30:17 am</pubDate></item><item><title>अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026: स्वस्थ जीवन और विकसित भारत का आधार बनेगा योग</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=767</link><description>-योग फॉर हेल्दी एजिंग: स्वस्थ और सक्रिय जीवन की दिशा में एक कदम
विशेष लेख- डॉ. दानेश्वरी सम्भाकर , उप संचालक, जनसंपर्क
रायपुर। भारत में प्राचीन काल से ही योग हमारी जीवनशैली और संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। ऋषि-मुनियों, योगियों और संतों ने योग के माध्यम से स्वस्थ शरीर, शांत मन और आध्यात्मिक चेतना का मार्ग दिखाया। भारतीय ज्ञान परंपरा की यह अमूल्य धरोहर आज विश्वभर में स्वास्थ्य और कल्याण का पर्याय बन चुकी है। इसी विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की पहल पर वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की, जो आज विश्वव्यापी जनआंदोलन का स्वरूप ले चुका है।
वर्ष 2026 के अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम योग फॉर हेल्दी एजिंग (स्वस्थ एवं सक्रिय वृद्धावस्था के लिए योग) रखी गई है। यह थीम योग के माध्यम से जीवन के प्रत्येक चरण में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का संदेश देती है। योग न केवल रोगों से बचाव का प्रभावी माध्यम है, बल्कि स्वस्थ और सक्रिय जीवनशैली की आधारशिला भी है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने योग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में योग आज विश्व के करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका है। प्रधानमंत्री का मानना है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाली जीवन पद्धति है। योग व्यक्ति को स्वस्थ बनाकर परिवार समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने का माध्यम बनता है इस वर्ष राष्ट्रीय स्तर का मुख्य आयोजन कोलकाता में आयोजित किया जा रहा है जहां प्रधानमंत्री स्वयं योगाभ्यास का नेतृत्व करेंगे।
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का राज्य स्तरीय मुख्य समारोह अंबिकापुर में आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय स्वयं योगाभ्यास में सहभागिता करेंगे और प्रदेशवासियों को नियमित योग अपनाकर स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का संदेश देंगे। राज्य सरकार द्वारा योग को जन-जन तक पहुंचाने के लिए विभिन्न विभागों, शैक्षणिक संस्थानों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों के सहयोग से व्यापक स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।मुख्यमंत्री श्री साय का मानना है कि स्वस्थ नागरिक ही विकसित छत्तीसगढ़ और विकसित भारत के निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति हैं। योग शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास को भी बढ़ाता है। यही कारण है कि राज्य सरकार स्वास्थ्य संवर्धन और जनजागरूकता अभियानों में योग को विशेष महत्व दे रही है।
प्राकृतिक संसाधनों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ में योग का संदेश लोगों के जीवन से सहज रूप से जुड़ता है। प्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली योग के मूल सिद्धांतों को प्रतिबिंबित करती है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों और शासकीय संस्थानों में नियमित योग गतिविधियों के माध्यम से स्वस्थ समाज निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं।वर्तमान समय में बढ़ते तनाव, अनियमित जीवनशैली और विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के बीच योग एक सरल, सुलभ और प्रभावी समाधान के रूप में उभरा है। नियमित योगाभ्यास शरीर को निरोग, मन को शांत और जीवन को संतुलित बनाता है। यह व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करता है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि योग को केवल एक दिवस का आयोजन न मानकर दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं। स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए योग को अपनाना समय की आवश्यकता है। आइए, योग के माध्यम से स्वस्थ छत्तीसगढ़, विकसित भारत और समृद्ध विश्व के निर्माण में अपना योगदान दें।</description><guid>767</guid><pubDate>20-Jun-2026 11:59:04 pm</pubDate></item><item><title> विश्व रक्तदान दिवस 14 जून पर विशेष</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=766</link><description>-आपकी रगों में बहता हुआ खून किसी के बुझते हुए घर के चिराग को दोबारा रोशन कर सकता है
-जीवन का उपहार: रक्तदान
आलेख -धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक, जनसंपर्क
रक्तदान महादान  यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि मानवता की सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण है। जब आप रक्तदान करते हैं, तो आप केवल खून की कुछ बूंदें नहीं दे रहे होते, बल्कि किसी को मुस्कुराने का, जीने का और अपने परिवार के साथ रहने का एक और मौका दे रहे होते हैं। हर साल 14 जून को पूरी दुनिया में 'विश्व रक्तदान दिवस' मनाया जाता है। आपकी रगों में बहता हुआ खून किसी के बुझते हुए घर के चिराग को दोबारा रोशन कर सकता है। इस बार सिर्फ स्टेटस न लगाएं, आगे आएं और रक्तदान करें!
दुनिया में कई तरह के दान किए जाते हैं अन्नदान, वस्त्रदान, धनदान और विद्यादान। ये सभी दान सम्मानीय हैं, लेकिन रक्तदान इन सबसे ऊपर है। इसका कारण यह है कि बाकी सभी दान व्यक्ति की सुख-सुविधाओं को पूरा करते हैं, जबकि रक्तदान किसी मरते हुए व्यक्ति को जीवनदान देता है। जब कोई व्यक्ति दुर्घटना का शिकार होता है, किसी बड़ी सर्जरी से गुजरता है, या थैलेसीमिया और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहा होता है, तब उसके पास जिंदगी और मौत के बीच बहुत कम समय होता है। उस वक्त आपकी दी हुई खून की एक यूनिट (लगभग 350-450 मिलीलीटर) किसी का बुझता हुआ घर का चिराग दोबारा रोशन कर सकती है।
अत्याधुनिक युग में भी, विज्ञान आज तक प्रयोगशाला में कृत्रिम खून (Artificial Blood) नहीं बना पाया है। इसका सीधा और कड़वा सच यह है कि किसी इंसान की रगों में बहता खून ही किसी दूसरे इंसान की जान बचा सकता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति और समाज में रक्तदान को 'महादान' का दर्जा दिया गया है।
जब आप एक बार रक्तदान करते हैं, तो आप केवल एक नहीं, बल्कि तीन लोगों की जान बचा सकते हैं।ब्लड बैंक में आपके द्वारा दिए गए रक्त को तीन मुख्य घटकों (Components) में अलग किया जाता है:
1.	लाल रक्त कणिकाएं (Red Blood Cells - RBC): एनीमिया या अत्यधिक खून बह जाने पर काम आती हैं।
2.	प्लाज्मा (Plasma): जलने के मामलों या लीवर की गंभीर बीमारियों में उपयोग होता है।
3.	प्लेटलेट्स (Platelets): डेंगू, कैंसर या कीमोथेरेपी के मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित होती हैं।
रक्तदान का लाभ:-
रक्तदान करने से शरीर हार्ट अटैक का खतरा कम: रक्तदान करने से शरीर में आयरन की मात्रा संतुलित रहती है, जिससे खून का थक्का जमने की संभावना कम होती है और दिल का दौरा पड़ने का खतरा काफी घट जाता है।कैंसर से बचाव: शरीर में आयरन का स्तर नियंत्रित रहने से कुछ प्रकार के कैंसर (जैसे लीवर, फेफड़े और कोलन कैंसर) का जोखिम कम होता है।
नई ऊर्जा का संचार: रक्तदान के बाद शरीर 48 घंटों के भीतर तरल पदार्थ की कमी पूरी कर लेता है और अगले कुछ हफ्तों में नई रक्त कोशिकाएं (New Blood Cells) बनाता है, जिससे शरीर में स्फूर्ति आती है।
फ्री मिनी-हेल्थ चेकअप: रक्तदान से पहले डोनर के हीमोग्लोबिन, ब्लड प्रेशर, पल्स और वजन की जांच की जाती है। साथ ही रक्त की HIV, हेपेटाइटिस बी और सी, तथा मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों के लिए मुफ्त जांच होती है।
रक्तदान क्यों है बेहद ज़रूरी?
चिकित्सा विज्ञान ने आज आसमान छू लिया है, हम कृत्रिम अंग बना सकते हैं, जटिल से जटिल सर्जरी कर सकते हैं, लेकिन आज तक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में कृत्रिम खून (Artificial Blood) नहीं बना पाए हैं। इसका मतलब साफ है कि इंसान की जान बचाने के लिए केवल इंसान का खून ही काम आ सकता है।
इन परिस्थितियों में होती है रक्त की सबसे ज्यादा जरूरत:
	दुर्घटनाएं और इमरजेंसी: सड़क हादसों या अन्य दुर्घटनाओं में अत्यधिक खून बह जाने पर।
	गंभीर बीमारियाँ: थैलेसीमिया, कैंसर, और हीमोफिलिया जैसी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को नियमित रूप से खून की जरूरत होती है।
	प्रसव के दौरान: कई बार डिलीवरी के वक्त महिलाओं को अत्यधिक रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage) के कारण खून चढ़ाना पड़ता है।
	बड़ी सर्जरी: दिल का ऑपरेशन, ऑर्गन ट्रांसप्लांट आदि में।
अगर आप किसी के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं, तो पहले अपनी बाहें आगे बढ़ाएं।
रक्तदान केवल एक सामाजिक या नैतिक कर्तव्य नहीं है, यह विशुद्ध रूप से मानवता का उत्सव है। धर्म, जाति, रंग और ऊंच-नीच की दीवारों को तोड़कर जब एक इंसान का खून दूसरे इंसान की रगों में दौड़ता है, तो वही सच्ची इंसानियत होती है। आइए, इस महादान का हिस्सा बनें। स्वयं भी रक्तदान करें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। याद रखें, आपका थोड़ा सा रक्त किसी के लिए पूरा जीवन बन सकता है।</description><guid>766</guid><pubDate>14-Jun-2026 8:37:44 am</pubDate></item><item><title> सहूलियत, सम्मान और सेहत...  हर घर नल से बदली जिंदगी</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=765</link><description>विशेष लेख-कमलेश साहू, सहायक संचालक जनसंपर्क
रोज सुबह उठते ही घर में नल से साफ पानी आते देखने की खुशी क्या होती है, इसे कमली से पूछिए। उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव को अपने आंगन में लगे नल से आ रहे पानी की धार को दिखाते खुशी से उनकी आंखें डबडबा गईं। जल जीवन मिशन ने कमली जैसी हजारों महिलाओं को अमूल्य खुशियां दी हैं। कभी पीने और निस्तारी के पानी के लिए दिनभर चिंतित रहने वाली इन महिलाओं का जीवन घर में लगे नल ने बदल दिया है। उप मुख्यमंत्री तथा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री श्री अरुण साव अपने चार दिनों के बस्तर प्रवास के दौरान जल जीवन मिशन का काम देखने कमली के भी गांव पहुंचे। कमली के गांव बस्तर जिले के तोकापाल विकासखण्ड के दुगनपाल में उन्होंने कुछ और घरों में भी जाकर नल से पानी आते देखा। जल जीवन मिशन से घर में पानी पहुंचने की खुशी सभी महिलाओं के चेहरे पर दिख रही थी।
 जल जीवन मिशन दूरस्थ गांवों और वनांचलों की महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव ला रहा है। आधी आबादी के एक बड़े हिस्से को पीने के पानी के लिए रोज जूझना पड़ता था। खासतौर से गर्मियों के दिनों में जब हर साल सिर पर पानी के बर्तन का सफर कुछ सौ मीटरों से कुछ किलोमीटरों में बदल जाता था। जीवन के लिए अनिवार्य जरुरत पानी की व्यवस्था गर्मियों में महिलाओं का जीवन दुष्कर बना देती थी। दुगनपाल में भी महिलाओं को रोज गांव के हैंडपंप या कुआं पर जाकर घर के सभी लोगों के लिए पानी का इंतजाम करना पड़ता था। घर में नल लग जाने से अब इस समस्या से निजात मिल गई है। जल जीवन मिशन के काम जैसे-जैसे पूरे होते जा रहे हैं, महिलाओं की बाहर से पानी लाने की चिंता और तकलीफ दूर होते जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में अब तक साढ़े आठ हजार से अधिक योजनाओं को पूर्ण कर संचालन के लिए पंचायतों को सौंपा जा चुका है।  जल जीवन मिशन महज हर घर तक पेयजल पहुंचाने की योजना नहीं है। यह महिलाओं की दिनचर्या और जीवन में भी बड़ा बदलाव ला रहा है। गांवों में परंपरागत रूप से घर में पेयजल और अन्य जरूरतों के लिए पानी के इंतजाम का जिम्मा महिलाओं पर ही है। घर तक पानी की पहुंच न होने के कारण उन्हें हैंडपंपो, सार्वजनिक नलों, कुंओं या अन्य स्रोतों से रोज पूरे परिवार के लिए जल संग्रहण करना पड़ता है।
 रोजाना का यह श्रमसाध्य और समयसाध्य काम बारिश तथा भीषण गर्मी के दिनों में और कठिन हो जाता है। कई इलाकों में गर्मियों में जलस्रोतों के सूख जाने के कारण दूर-दूर से पानी लाने की मजबूरी रहती है। परिवार के लिए पानी की व्यवस्था हर दिन का संघर्ष बन जाता है। महिलाओं के दिन के कई घंटे इसी काम में निकल जाते हैं। जल जीवन मिशन हर घर तक नल से जल पहुंचाने के साथ ही महिलाओं को कई समस्याओं से निजात दिला रहा है। घर तक स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल पहुंचने से वे कई चिंताओं से मुक्त हो गई हैं। अब रोज-रोज पानी के लिए बहुत सारा श्रम और समय नहीं लगाना पड़ता। इससे उन्हें घर के दूसरे कामों, बच्चों की परवरिश, खेती-बाड़ी एवं आजीविका के अन्य कार्यों के लिए अधिक समय मिल रहा है और वे इन कार्यों पर अपना ज्यादा ध्यान व समय दे पा रही हैं।
 जल जीवन मिशन से बारहों महीने घर पर ही जलापूर्ति से लगातार बारिश तथा गर्मी के दिनों में बाहर से पानी लाने की मुसीबत दूर हो गई है। गर्मियों में जलस्तर के नीचे चले जाने से तथा बरसात में लगातार बारिश से जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। गुणवत्ताहीन पेयजल से पेट तथा निस्तारी के लिए खराब जल के उपयोग से त्वचा संबंधी रोगों का खतरा रहता है। जल जीवन मिशन ने सेहत के इन खतरों को भी दूर कर दिया है।</description><guid>765</guid><pubDate>10-Jun-2026 1:00:51 am</pubDate></item><item><title>जागो हे भारत की बेटियों</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=764</link><description>--स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
जागो हे भारत की बेटियों ,
आत्म विश्वास का वरण करो ।
दबना नहीं डरना किसी से ,
लज्जा ,संकोच का हरण करो ।
कमजोर बनाते जो तुमको ,
रूढ़ियों से मुक्त बंधन करो ।
बुरी नजर जो डाले तुम पर ,
दुष्ट दानवों का दमन करो ।
कुचल डालो विषधर का फन ,
अत्याचारियों का शमन करो ।
उड़ो हौसलों के पर लेकर ,
लक्ष्य को विस्तृत गगन करो ।
शिक्षा की उजास जीवन में ,
भर लो साहस को नमन करो ।
धैर्य शक्ति की मिसाल बनना ,
सरस्वती सा आचरण करो ।
रौद्र रूप काली का धरकर ,
अन्यायी का संहरण करो ।
ज्ञान - विज्ञान की वेदी पर ,
अज्ञानता का हवन करो ।
अपने अधिकारों की खातिर ,
जुल्मों से युद्ध आमरण करो ।</description><guid>764</guid><pubDate>07-Jun-2026 3:25:37 pm</pubDate></item><item><title>अब न्याय होगा ऑनलाइन: छत्तीसगढ़ की राजस्व ई-कोर्ट परियोजना बनी डिजिटल सुशासन की नई मिसाल</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=763</link><description>-डिजिटल क्रांति से बदल रही है राजस्व न्याय व्यवस्था
 विशेष लेख - विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालक
भारत तेजी से डिजिटल प्रशासन की ओर बढ़ रहा है और इसी दिशा में छत्तीसगढ़ ने राजस्व प्रशासन को आधुनिक, पारदर्शी और आमजन के लिए सहज बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की है। राज्य सरकार द्वारा लागू की गई राजस्व ई-कोर्ट परियोजना अब केवल एक तकनीकी व्यवस्था नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्रामीण और शहरी नागरिकों के लिए न्याय प्राप्ति की प्रक्रिया को सरल, त्वरित और भरोसेमंद बनाने वाला प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है।
    वर्षों तक राजस्व मामलों में आम लोगों को तहसील, एसडीएम कार्यालय और कलेक्टर कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे। नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, फौती प्रकरण, खाता सुधार या भूमि विवाद जैसे मामलों में पेशी की तारीख जानने, आदेश की प्रति लेने या केस की स्थिति समझने में समय, धन और ऊर्जा तीनों की भारी खपत होती थी। कई बार बिचौलियों और भ्रष्टाचार का सामना भी करना पड़ता था। लेकिन अब वही पूरी प्रक्रिया डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आ चुकी है। छत्तीसगढ़ की ई-कोर्ट परियोजना ने राजस्व न्यायालयों की पारंपरिक कार्यप्रणाली को बदलकर उसे पेपरलेस, स्मार्ट और जनकेंद्रित बना दिया है। नायब तहसीलदार से लेकर कलेक्टर और राजस्व मंडल तक की न्यायिक प्रक्रिया अब ऑनलाइन संचालित हो रही है। इससे न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि आम नागरिकों का भरोसा भी मजबूत हुआ है।
ई-कोर्ट व्यवस्था एक प्रभावी समाधान-मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय
मुख्यमंत्री ने राजस्व ई-कोर्ट परियोजना को सुशासन और डिजिटल प्रशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा है कि राज्य सरकार का उद्देश्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और जनता के लिए सुलभ बनाना है। उन्होंने कहा कि तकनीक का उपयोग तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसका सीधा लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
   राजस्व मामलों में वर्षों से चली आ रही जटिलताओं को समाप्त करने के लिए ई-कोर्ट व्यवस्था एक प्रभावी समाधान बनकर सामने आई है। अब नागरिकों को छोटी-छोटी जानकारियों के लिए कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। सरकार न्याय प्रक्रिया को लोगों के मोबाइल तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ने से भ्रष्टाचार और बिचौलियों की भूमिका स्वतः समाप्त होगी तथा आम लोगों का शासन-प्रशासन पर विश्वास और मजबूत होगा। मुख्यमंत्री के अनुसार, ई-गवर्नेंस केवल तकनीक नहीं, बल्कि जनता को सम्मानपूर्वक और समयबद्ध सेवाएं देने का माध्यम है।
पारदर्शिता और जवाबदेही की नई व्यवस्था
ई-कोर्ट प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आवेदन प्राप्त होते ही उसका ऑनलाइन पंजीकरण किया जाता है और तत्काल डिजिटल पावती जारी होती है। इससे आवेदक को यह भरोसा मिल जाता है कि उसका आवेदन रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है और अब उसे किसी कर्मचारी या दलाल के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा।
   इसके बाद की पूरी प्रक्रियाजैसे नोटिस जारी करना, इश्तहार प्रकाशित करना, पक्षकारों को सूचना भेजना, सुनवाई की तारीख तय करना और अंतिम आदेश पारित करना सभी ऑनलाइन दर्ज होते हैं।प्रत्येक कार्रवाई डिजिटल रिकॉर्ड में सुरक्षित रहती है, जिससे किसी भी स्तर पर हेरफेर की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।
    ई-कोर्ट पोर्टल के माध्यम से नागरिक अपने मोबाइल या कंप्यूटर से घर बैठे यह देख सकते हैं कि उनके मामले में पिछली तारीख पर क्या कार्यवाही हुई, अगली पेशी कब है और आदेश जारी हुआ है या नहीं। इससे न्यायालयों के बाहर लगने वाली भीड़ और अनावश्यक भागदौड़ में उल्लेखनीय कमी आई है।
किसानों और ग्रामीण नागरिकों के लिए बड़ी राहत
 राजस्व मामलों का सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों और भू-स्वामियों पर पड़ता है। पहले किसानों को एक छोटी सी जानकारी के लिए भी पूरे दिन का समय निकालकर तहसील मुख्यालय जाना पड़ता था। कई बार केवल अगली तारीख जानने में ही मजदूरी और किराए का नुकसान हो जाता था।
अब ई-कोर्ट व्यवस्था ने यह परेशानी काफी हद तक समाप्त कर दी है। किसान अपने गांव के लोक सेवा केंद्र, चॉइस सेंटर या मोबाइल फोन के माध्यम से ही अपने प्रकरण की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे समय और धन दोनों की बचत हो रही है तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूती मिल रही है।
   डिजिटल न्याय व्यवस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन के प्रति विश्वास को भी बढ़ाया है। जब लोगों को अपने आवेदन की ऑनलाइन पावती और हर कार्रवाई की जानकारी समय पर मिलने लगती है, तो पारदर्शिता स्वतः स्थापित होती है।
विवादित जमीनों की जानकारी अब सार्वजनिक
 ई-कोर्ट परियोजना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि विचाराधीन भूमि विवादों की जानकारी अब ऑनलाइन उपलब्ध रहती है। इससे जमीन खरीदने वाले लोग पहले ही जांच कर सकते हैं कि संबंधित खसरा नंबर पर कोई विवाद या न्यायालयीन प्रकरण लंबित तो नहीं है । यह व्यवस्था फर्जीवाड़े, अवैध बिक्री और धोखाधड़ी रोकने में अत्यंत प्रभावी साबित हो रही है। पहले कई लोग विवादित भूमि खरीदकर वर्षों तक न्यायालयों के चक्कर काटते रहते थे, लेकिन अब पारदर्शी ऑनलाइन रिकॉर्ड के कारण ऐसी घटनाओं में कमी आई है।
तकनीक के सहारे मजबूत हुआ प्रशासन
राजस्व ई-कोर्ट प्रणाली के सफल संचालन के लिए प्रदेश के राजस्व न्यायालयों में कंप्यूटर, डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली और हाई-स्पीड इंटरनेट की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। इससे न्यायालयों के कार्य निष्पादन की गति बढ़ी है और अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हुई है। डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित सर्वर में संग्रहीत होने से अब फाइलों के गुम होने, फटने या रिकॉर्ड में छेड़छाड़ जैसी समस्याएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। प्रशासनिक निगरानी भी आसान हुई है क्योंकि उच्च अधिकारी किसी भी न्यायालय की कार्यवाही ऑनलाइन मॉनिटर कर सकते हैं।
मोबाइल में कोर्ट की दिशा में बड़ा कदम
 छत्तीसगढ़ की यह पहल वास्तव में मोबाइल में कोर्ट की अवधारणा को साकार करती दिखाई देती है। अब नागरिकों को केवल जानकारी लेने के लिए कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। आदेश की कॉपी डाउनलोड करने से लेकर केस की स्थिति जानने तक अधिकांश सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं।
  ई-कोर्ट व्यवस्था ने यह साबित किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और तकनीक का सही समन्वय हो, तो शासन को वास्तव में जनसुलभ बनाया जा सकता है। यह पहल ई-गवर्नेंस को स्मार्ट गवर्नेंस में बदलने का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरी है।
सुशासन की दिशा में प्रभावी पहल
छत्तीसगढ़ सरकार की राजस्व ई-कोर्ट परियोजना केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि आम जनता को न्याय व्यवस्था से सीधे जोड़ने का अभिनव प्रयास है। इसने प्रशासन और नागरिकों के बीच की दूरी कम की है तथा न्यायिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, त्वरित और भरोसेमंद बनाया है।
  डिजिटल इंडिया के इस दौर में छत्तीसगढ़ की यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है। यह परियोजना दर्शाती है कि तकनीक का उपयोग केवल सुविधाएं बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि शासन को अधिक उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए भी किया जा सकता है। राजस्व न्यायालयों की यह डिजिटल यात्रा वास्तव में गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ के सपने को मजबूत आधार प्रदान कर रही है।जहां न्याय, पारदर्शिता और सुविधा अब लोगों की उंगलियों पर उपलब्ध है।</description><guid>763</guid><pubDate>03-Jun-2026 3:24:53 pm</pubDate></item><item><title>आज कहां है शो मैन राजकपूर का परिवार.....</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=761</link><description>2 जून पुण्यतिथि पर विशेष
आलेख- प्रशांत शर्मा
भारतीय सिनेमा जगत के शो मैन कहे जाने वाले राजकपूर ने आज से 38 साल पहले इस दुनिया को अलविदा कहा था। 2 मई, 1988 को नई दिल्ली में वे दादासाहेब फाल्के पुरस्कार लेने के लिए समारोह में पहुंचे थे, इसी दौरान उन्हें अस्थमा का तीव्र दौरा पड़ा और वे गिर पड़े। एक महीने बाद 2 जून 1988 को उनके निधन की मनहूस खबर आई।
राज कपूर अपनी निडर फिल्म निर्माण शैली और विवादास्पद या संवेदनशील विषयों को उठाने के लिए जाने जाते थे। उनके फिल्म निर्माण करिअर के शुरुआती दौर की उनकी अधिकांश क्लासिक फिल्में सामाजिक नाटक थीं जो आम आदमी या समाज के कमजोर वर्ग की जीत का जश्न मनाती थीं। इनमें से कई फिल्में अपने कथानक के कारण समय से आगे की मानी जाती हैं। श्री 420 फिल्म के एक गाने के बोल और उसमें नायक और नायिका के छाते के नीचे शरण लेने का दृश्यकपूर की फिल्मों की प्रगतिशील प्रकृति का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
 राजकपूर की निजी जिंदगीे से बात करें, तो पांच बच्चों का उनका परिवार आज काफी बड़ा हो चुका है। पत्नी कृष्णा से उनकी पांच संतानें हुर्ई। उनके परिवार में बेटियों रितु नंदा और रीमा जैन के अलावा तीन बेटेें रणधीर, ऋषि और राजीव कपूर हुए। तीनों बेटों ने अभिनय जगत को अपनाया। रणधीर ने अभिनेत्री बबीता से शादी की। आज रणधीर 78 साल के हो चुके हैं, लेकिन बरसों से वे बबीता से अलग रह रहे हैं। रणधीर की दोनों बेटियों करिश्मा और करीना ने भी अभिनय जगत में खूब नाम कमाया। करिश्मा ने अभिषेक बच्चन से सगाई टूटने के बाद बिजनेसमैन संजय कपूर (अब दिवंगत) से शादी की , लेकिन यह शादी लंबी नहीं चली और उनका तलाक हो गया। संजय से करिश्मा को दो बच्चे हैं- बेटी समायरा कपूर और कियान राज कपूर। वहीं करीना अभिनेता सैफ अली खान से निकाह किया। उनके भी दो बेटे हैं-तैमूर अली खान और जेह अली खान।
राजकपूर के दूसरे बेटे ऋषि कपूर को अभिनय जगत में लोकप्रियता हासिल हुई। ऋषि ने अपनी को -स्टार नीतू सिंह से विवाह किया। ऋषि कैंसर से पीडि़त थे और वर्ष 2000 में 67 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। ऋषि कपूर और नीतू कपूर की लाडली बेटी रिद्धिमा ने इसी साल 45 साल की उम्र में अभिनय जगत में कदम रखा। उन्होंने अपनी मां के साथ फिल्म दादी की शादी में अहम किरदार निभाया। लोगों को उनका काम भी पसंद आया। रिद्धिमा पेशे से एक ज्वेलरी डिजाइनर हैं और उन्होंने बिजनेसमैन भरत साहनी से विवाह किया है। उनकी एक बेटी है समारा। ऋषि के बेटे रणबीर कपूर ने फिल्म जगत में अच्छी- खासी सफलता अर्जित की है। उन्होंने अभिनेत्री आलिया भट्ट से विवाह किया है और उनकी एक बेटी का नाम है-राहा।
वहीं तीसरे और सबसे छोटे बेटे राजीव कपूर अपने अभिनय कॅरिअर में सफल नहीं हो पाए और गुमनामी में खो गए। वर्ष 2001 में, उन्होंने आर्किटेक्ट आरती सभरवाल से शादी की, जो कनाडा के वॉन में एक लॉ फर्म में पैरालीगल के रूप में काम कर रही थीं। 2003 में उनका तलाक हो गया। फिर वे भाई रणबीर के साथ रहने लगे। 2021 को उनका दिल का दौरा पडऩे के कारण 58 साल की उम्र में निधन हो गया।
राजकपूर की बड़ी बेटी रितु नंदा एक एंटरप्रेन्योर थीं। उनकी शादी एस्कॉट्र्स लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर राजन नंदा से हुई थी। राजकपूर को घर की बेटियों का फिल्मों में काम करना पसंद नहीं था। इसलिए रितु ने बिजनेस में किस्मत आजमाया। अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता बच्चन की शादी रितु के बेटे निखिल से हुई है। उनके दो बच्चे अगस्त्य नंदा और नव्या नवेली नंदा हैं, जो आज काफी लोकप्रिय हैं। रितु लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन से जुड़ी हुई थीं। बेहद टैलेंटेड रितु के नाम एक दिन में 17 हजार पेंशन पॉलिसी बेचने का भी रिकॉर्ड है, जो गिनीज बुक रिकॉर्ड में भी दर्ज है। रितु को कैंसर था और 71 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
रही बात रीमा की तो राजकपूर उनकी शादी अभिनेता कुमार गौरव से करना चाहते थे। कुमार गौरव के पिता राजेन्द्र कुमार और राजकपूर अच्छे दोस्त थे। सगाई भी हो गई थी, लेकिन एक दिन कुमार गौरव ने यह सगाई तोड़ दी और सुनील दत्त- नरगिस की बेटी नम्रता से शादी कर ली। बाद में रीमा की शादी बिजनेसमैन मनोज जैन से हुई और उनके दो बेटे हैं- अरमान और आदर जैन। अरमान ने कुछ फिल्में की हैं, पर अब तक सफल नहीं हो पाए हैं। रीमा 73 साल की हो चुकी हैं, लेकिन आज भी उनकी खूबसूरती और उनका स्टाइलिश लुक लोगों को आकर्षित करता है।
हाल में पूरा परिवार उस वक्त साथ नजर आया, जब वे राजकपूर की जन्म शताब्दी पर होने वाले समारोह का निमंत्रण देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने पहुंचे। पूरे परिवार ने प्रधानमंत्री के साथ फोटो क्लिक की। सोशल मीडिया यह काफी वायरल भी हुआ।</description><guid>761</guid><pubDate>02-Jun-2026 3:21:15 pm</pubDate></item><item><title>राही जीवन-पथ के सुन ले...</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=758</link><description>-विष्णुपद छंद गीत
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
राही जीवन-पथ के सुन ले,
राह नई गढ़ना ।
फूल मिले या शूल तुम्हें नित ,
आगे ही बढ़ना ।
यत्न सतत कर लक्ष्य-प्राप्ति हो,
तब तक तुम चलना ।
करनी होगी कठिन साधना ,
साधक तुम बनना ।
अपने कदम जमा धरती पर ,
ऊपर तुम चढ़ना ।।
सिक्के के दोनों पहलू को
देखो और कहो ।
सुख-दुख जीवन की सच्चाई ,
जीवन सार गहो ।
अंतस् के कोरे कागज पर ,
फूल खुशी कढ़ना ।।
सत्य-झूठ की धूप-छाँव में ,
सही राह चुनना ।
दुविधा में जब मन डोले तो,
मन की तुम सुनना ।
ढाई आखर की पोथी को ,
सीखो तुम पढ़ना ।।</description><guid>758</guid><pubDate>31-May-2026 3:06:42 pm</pubDate></item><item><title> हिन्दी मिसिंग, हिंग्लिश ऑन एयर</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=756</link><description>हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष
आलेख-डॉ. कमलेश गोगिया(वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद)
सिटी ऑफ जॉय यानी कोलकाता जिसे पूर्व में कलकत्ता (औपनिवेशिक) और कालिकता कहा जाता था, की संस्कृति में टोला, तल्ला और लेन सामाजिक पहचान की नींव है। टोला शब्द किसी खास समुदाय या पेशे की बस्ती को दर्शाता है जबकि लेन का आशय तंग गलियों और तल्ला का अर्थ छायादार वृक्ष के नीचे के स्थान से है। कोलकाता का कालू टोला मोहल्ला, 37 अमरतल्ला लेन, वही ऐतिहासिक स्थान है जहाँ से देश में हिन्दी पत्रकारिता की नींव पड़ी। 30 मई, 1826 को पं. जुगल किशोर शुक्ल ने हिन्दी के प्रथम समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड की शुरुआत की थी। यह वह दौर था जब भारत स्वतंत्र नहीं था और अंग्रेजी, उर्दू, बंगाली तथा फारसी भाषा के समाचार पत्र प्रकाशित हुआ करते थे, उस दौर में हिन्दी भाषा का सामाचार पत्र प्रकाशित करने के साहस के लिए शब्द नहीं मिलते। उदन्त मार्तण्ड जिसका अर्थ उगता हुआ सूर्य होता है, डेढ़ साल तक ही प्रकाशित हो सका। आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हुए यह पत्र दिसंबर 1827 को बंद हो गया। कारण, अंग्रेजी शासन की नीतियाँ और आर्थिक कठिनाइयाँ, फिर हिन्दी के दम पर सरकार से टकराना उस दौर में तो और भी कठिन था। हिन्दी पत्रकारिता रूकी नहीं, अंग्रेजों के शासनकाल में ही देश के विभिन्न क्षेत्रों से हिन्दी के अनेक समाचार पत्र दैनिक, साप्ताहिक और मासिक स्वरूप में प्रकाशित होने लगे। चाहें राजा राममोहन राय के बंगदूत की बात कर लें या फिर आधुनिक हिन्दी पत्रकारिता के जनक भारतेंदू हरिशंचद्र के कवि वचन सुधा, हरिशंद्र मैग्जीन और हिन्दी के प्रथम दैनिक समाचार सुधावर्षण की। देश के लिए मर-मिटने के जुनून के साथ पत्रकारिता स्वतंत्रता संग्राम का अहम हथियार थी। आजादी के बाद पत्रकारिता मिशन से व्यवसाय बन गई। फिर तकनीकी क्रांति और डिजिडलीकरण ने हिन्दी पत्रकारिता को पूरी तरह बदल कर रख दिया। समय के साथ-साथ सब कुछ बदल गया। अब तो उदन्त मार्तण्ड का कोई निशां भी बाकी नहीं रहा, जैसा कि लगभग पाँच वर्ष पूर्व राजीव कुमार झा की जागरण की रिपोर्ट से पता चलता है। रिपोर्ट के अऩुसार, अमरतल्ला लेन आज भी मौजूद हैं, पर 37 नंबर मकान नहीं है। अमरतल्ला लेन एक से शुरू होकर 27 पर खत्म हो जाता है। वहीं, इसी से सटा अमरतल्ला स्ट्रीट एक से शुरू होकर 29 नंबर पर समाप्त हो जाता है। 37 नंबर अमरतल्ला लेन जिस जगह से यह अखबार शुरू हुआ था उस मकान के बारे में वर्तमान समय में रहने वाले वाले लोगों को भी पता नहीं है। इसी लेन व स्ट्रीट में 40-50 सालों से रहने वाले बिहार-उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषी लोगों को भी नहीं पता है कि कभी इस स्थान से हिंदी का पहला अखबार प्रकाशित हुआ था। कोशिश होनी चाहिए थी हिन्दी पत्रकारिता की स्थापना के इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित कर हिन्दी पत्रकारिता दिवस को हर साल भव्य रूप प्रदान करने की।
परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है, लेकिन जो परिवर्तन हिन्दी पत्रकारिता में देखने को मिलता है, उसकी अपेक्षा शायद ही कभी की गई होगी। प्रिंटिंग प्रेस और टाइपराइटर से शुरू हुई हिन्दी पत्रकारिता आज वेब पोर्टल्स, यू ट्यूब और सोशल मीडिया तक पहुँच गई है। सोशल मीडिया के प्लेटफार्म ने हर नागरिक को पत्रकार बना दिया। बाजारवाद और पूंजीकरण के फलस्वरूप मिशन उद्योग बन गया। पत्रकारिता की गंभीरता भी नदारद होती चली गई। भाषा और शैली भी पूरी तरह परिवर्तित हो गई। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि हिन्दी पत्राकरिता से हिन्दी मिसिंग है, हिंग्लिश ऑन एयर है। हिन्दी के समाचार पत्र हों या न्यूज चैनल अथवा पोर्टल, हिन्दी और अंग्रेजी के मिश्रण का तड़का अनिवार्य है। दीक्षांत समारोह जैसे शब्द की जह कन्वोकेशन ने ले ली है तो न्यूज रूम में एंकर को परिस्थिति की जगह सिचुएशन बोलना ज्यादा सरल लगता है। किसी कार्पोरेट कंपनी के मिनिट्स की तरह खबरों की हेडलाइन देखी जा सकती है। जैसे हेडलाइन देखिए 
सीएम का मास्टरस्ट्रोक!
ऑपरेशन क्लीनअप ऑन!
पॉलिटिकल टेम्परेचर हाई!
इश्यू का डीप एनालिसिस

हालांकि इसका सकारात्मक पहलू यह है कि हिन्दी के समाचार पत्र हिन्दी भाषा को बोलचाल के अधिक करीब लाने के उद्देश्य से हिन्दी व्याकरण के साथ अंग्रेजी शब्दों को जोड़कर वाक्यों का निर्माण करते हैं जिससे क्लिष्टता कम हो जाए। फिर डिजिटल युग में सोशल मीडिया और सॉफ्टवेयर से जुड़ी खबरें छपने के कारण अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग अनिवार्य सा हो गया है। जैसे, हैशटैग, ट्रोल, डाउनलोड, ड्रापडाउन, अपडेट आदि। लेकिन प्रायः क्लिष्टता को कम करने का उद्देश्य अपना मार्ग भटक जाता है। अनेक अवसरों पर जानबूझकर हेडलाइन के साथ पूरे समाचार में हिंग्लिश का प्रयोग किया जाता है, विशेष रूप से पेज-थ्री पत्रकारिता के पुलआउट पृष्ठों में। घोटाले की जगह स्कैम लिखना ज्यादा गौरवपूर्ण समझा जाता है। हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष अंग्रेजी का प्रभाव और वर्चस्व किसी चुनौती से कम नहीं। बावजूद इसके हिन्दी के डिजिटल पाठकों की संख्या में निरंतर विस्तार हो रहा है क्योंकि दूरस्थ इलाकों में बसे लोगों तक इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुँच बढ़ गई है। हिन्दी पत्राकारिता की समृद्धि में अहम योगदान ग्रामीण पत्रकारों का है। ग्रामीण पत्रकार मुद्दे को इश्यू नहीं लिखते और न ही स्पर्धा या प्रतियोगिता को कॉम्पटिशन। वे इस तरह के वाक्यों का भी प्रयोग नहीं करते - रेन अटैक: सिटी लाइफ आउट ऑफ कंट्रोल! या फिर हिन्दी हमारी प्राइड है, लेट्स प्रमोट हिंदी, हिंदी इज़ द फ्यूचर। वे प्रायः सरल, सहज और बोलचाल की हिन्दी का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में स्थानीय शब्द, लोकजीवन और क्षेत्रीय संवेदनाएँ शामिल होती हैं। इससे हिन्दी पत्रकारिता केवल शहरी अभिजात भाषा नहीं रहती, बल्कि जनसाधारण की भाषा बनी रहती है।
हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र भले ही डेढ़ साल तक ही साँसें ले पाया, लेकिन हिन्दी पत्रकारिता रूपी जिस ज्योत को शुक्ल जी ने प्रज्जवलित किया, उसकी लौ बीते 200 वर्षों से हिन्दी के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज चैनलों और वेब पोर्टल के माध्यम से आज भी जगमगा रही है। देश की स्वतंत्रता में अहम योगदान देने वाली हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध बनाए रखना हम सभी का कर्तव्य है। हिन्दी पत्रकारिता दिवस के 200 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएं...</description><guid>756</guid><pubDate>29-May-2026 4:46:40 pm</pubDate></item></channel></rss>