<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>आलेख - Chhattisgarh Aaj Feed</title><link>https://chhattisgarhaaj.com</link><description>Chhattisgarh Aaj Feed Description</description><item><title>प्रेरक है जापान की अनुशासित जीवनशैली</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=734</link><description>मेरी जापान डायरी- 2 : डॉ. अभया जोगलेकर
जापान ने अपने राष्ट्र निर्माण के दौरान बहुत सी लड़ाइयां देखी हैं, मेइजी शासन से लेकर, ताइशो, शोवा काल में जापान के लोगों ने बहुत सहन किया है। सन् 1886 में मेइजी के पुनः स्थापना के बाद यहां आधुनिकीकरण हुआ। साथ ही सैन्यवाद का उदय भी। जापान के लोग मूलतः सैनिक प्रवृति के ही हैं कर्मठ। यह गुण उन्हें सबसे अलग बनाता है। इनका जुझारूपन इनके दैनिक क्रियाकलापों में दिखता है, यही बात जब आप कभी जापान घूमने जाएंगे, तो आप भी महसूस करेंगे। 
जापान के लोगों की जिस बात ने मेरे मन पर सबसे गहरी छाप छोड़ी, वह है वहां की अनुशासित जीवनशैली और स्वच्छता की संस्कृति। जापान में नियम केवल कागजों पर नहीं, बल्कि लोगों के स्वभाव में रचे-बसे हैं। 
1. जीवन का मूल मंत्र: अनुशासन
 जापान में रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अनुशासन का पालन करना उतना ही स्वाभाविक क्रिया है, जितना सांस लेना। दुकान में सामान खरीदते समय, बिल पेमेंट करते समय, मेट्रो स्टेशनों पर कतारों में अपनी बारी का शांति से इंतज़ार करना हो या सार्वजनिक स्थानों पर दूसरों की सुविधा का ध्यान रखते हुए धीमी आवाज़ में बात करना, यह सब जापानी सभ्यता का अभिन्न हिस्सा है। 
2. नियमों का पालन : एक राष्ट्रीय चरित्र
जापान के लोगों को देखकर मैंने यह स्पष्ट समझा कि संस्कार घर से ही प्रारंभ होते हैं। इसी सामूहिक सोच के कारण वहां का हर नागरिक अपने आसपास के वातावरण को साफ़ और स्वच्छ रखता है। उनका मानना है कि साफ़ और व्यवस्थित वातावरण रखना, उनकी भी जिम्मेदारी है क्योंकि ये पूरे समाज की साझा संपत्ति है। विदेशों में बगीचों, पब्लिक टॉयलेट्स में और सार्वजनिक स्थानों पर सफाई कर्मचारी नहीं होते क्योंकि लोग कचरा करना अपनी नैतिकता के विरुद्ध मानते हैं। यह जन- जागरूकता का वह उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां हर व्यक्ति देश को बेहतर बनाए रखना अपनी जिम्मेदारी समझता है।
हर बार की यात्राओं के समान इस यात्रा ने मुझे फिर याद दिलाया कि अनुशासन का अर्थ केवल सख़्त पाबंदियां नहीं समझें, बल्कि इसे परस्पर सम्मान, आत्म-नियंत्रण और राष्ट्र के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझें।</description><guid>734</guid><pubDate>14-Apr-2026 12:16:03 am</pubDate></item><item><title>भारत की जनगणना 2027: बदलते भारत की नई कहानी</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=733</link><description>-हमारी जनगणनाहमारा विकास के संकल्प के साथ छत्तीसगढ़ तैयार
आर्टिकल-रमेश जायभाये, उपनिदेशक, पत्र सूचना कार्यालय
क्या आपने कभी सोचा है कि आपके घर की छोटी-सी जानकारीजैसे पानी, बिजली या परिवार के सदस्यों का विवरणदेश के विकास में कितना बड़ा योगदान दे सकती है? दरअसल, हर नागरिक की दी गई जानकारी मिलकर ही भारत के भविष्य की दिशा तय करती है।
इसी कड़ी में वर्ष 2027 की जनगणना एक खास पड़ाव बनने जा रही है। यह केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि बदलते भारत की एक नई कहानी हैएक ऐसी कहानी जिसमें हर नागरिक की भागीदारी है। इस बार जनगणना पूरी तरह डिजिटल अंदाज़ में होगी, जो इसे पहले की सभी जनगणनाओं से अलग और अधिक आधुनिक बनाती है।
छत्तीसगढ़ में इस महाअभियान को लेकर तैयारियाँ तेज़ी से पूरी की जा रही हैं। वातावरण ऐसा है मानो कोई बड़ा जनउत्सव आने वाला होऔर वास्तव में, यह एक ऐसा अभियान है जिसमें हर व्यक्ति की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है।
कहानी शुरू होती है इतिहास से
भारत में जनगणना की शुरुआत 1872 में हुई थी और 1881 से इसे पूरे देश में व्यवस्थित रूप से लागू किया गया। स्वतंत्रता के बाद 1951 में पहली जनगणना आयोजित हुई, जिसने देश के विकास की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई।
अब वर्ष 2027 की जनगणना इस ऐतिहासिक यात्रा का आधुनिक रूप है। यह न केवल देश की वर्तमान स्थिति का आकलन करेगी, बल्कि भविष्य की योजनाओं की नींव भी तैयार करेगी।
छत्तीसगढ़ में यह प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होगीपहला चरण अप्रैल-मई 2026 में और दूसरा फरवरी-मार्च 2027 में आयोजित किया जाएगा।
राज्य के लिए संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 (रात 12 बजे) निर्धारित की गई है, जिसके आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की गणना की जाएगी।
अब आपकी बारी: खुद करें अपनी जनगणना!
इस बार जनगणना की सबसे रोचक और उपयोगी सुविधा हैस्व-गणना (Self-Enumeration)।
अब आप स्वयं अपने घर और परिवार की जानकारी ऑनलाइन भर सकते हैं। 16 अप्रैल से 30 अप्रैल 2026 के बीच
???? https://se.census.gov.in
पोर्टल पर जाकर मोबाइल नंबर और OTP के माध्यम से लॉगिन कर यह प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।
आपसे परिवार के सदस्यों की संख्या, उनकी आयु, शिक्षा, व्यवसाय और घर की सुविधाओं से जुड़े कुछ सरल प्रश्न पूछे जाएंगे। पूरी जानकारी भरने के बाद आपको एक SE ID प्राप्त होगी।
जब प्रगणक आपके घर आएंगे, तो केवल यह ID दिखानी होगी और आपकी जानकारी सत्यापित कर ली जाएगीयानी बार-बार जानकारी देने की आवश्यकता नहीं होगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जनगणना के दौरान किसी भी प्रकार के दस्तावेज़ दिखाने की आवश्यकता नहीं होती। आप जो जानकारी देंगे, वही दर्ज की जाएगी।
स्व-गणना के प्रति लोगों का रुझान भी तेजी से बढ़ रहा हैदेशभर में लाखों परिवार इस सुविधा का उपयोग कर चुके हैं, जो इस डिजिटल पहल की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।
स्मार्ट तकनीक, सटीक आंकड़े और भरोसेमंद प्रक्रिया
इस बार जनगणना पूरी तरह तकनीक के सहारे संचालित होगी। प्रगणक मोबाइल ऐप के माध्यम से डेटा दर्ज करेंगे, जिससे काम तेज़ और अधिक सटीक होगा।
साथ ही, आधुनिक GIS आधारित डिजिटल मैपिंग का उपयोग कर हर क्षेत्र और गणना ब्लॉक को स्पष्ट रूप से चिन्हित किया जा रहा है, ताकि कोई भी घर या व्यक्ति छूट न जाए।डेटा के बेहतर प्रबंधन और निगरानी के लिए उन्नत डिजिटल सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है, जिससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और व्यवस्थित बनी रहती है।
एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में, इस बार जाति संबंधी आंकड़ों का भी समावेश किया जाएगा, जो दशकों बाद समाज की व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करेगा।जनगणना में समाज के हर वर्ग को शामिल करने का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसी के तहत बेघर व्यक्तियों की गणना भी अलग से, विशेष अभियान के माध्यम से की जाती है, ताकि कोई भी नागरिक इस प्रक्रिया से वंचित न रह जाए।और जहाँ तक आपकी जानकारी की सुरक्षा का सवाल हैयह पूरी तरह गोपनीय रहती है। इसे किसी अन्य विभाग या एजेंसी के साथ साझा नहीं किया जाता।
छत्तीसगढ़ तैयार, अब आपकी भागीदारी जरूरी
छत्तीसगढ़ में इस अभियान के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियाँ की गई हैं। शहरों से लेकर गाँवों तक, हर क्षेत्र में जनगणना टीम सक्रिय रहेगी, ताकि कोई भी परिवार छूट न जाए।
नागरिकों की सुविधा के लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1855 भी जारी किया गया है, जहाँ किसी भी प्रकार की जानकारी या सहायता प्राप्त की जा सकती है।
लेकिन इस पूरे अभियान की असली ताकत हैआपकी भागीदारी।जब आप सही जानकारी देते हैं, तो आप केवल एक फॉर्म नहीं भरते, बल्कि अपने क्षेत्र के विकास में योगदान देते हैं। आपकी दी गई जानकारी से ही तय होता है कि कहाँ नई सड़क बनेगी, कहाँ स्कूल खुलेगा और कहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है।
आखिर में एक छोटी-सी बात
जनगणना एक आईना है, जिसमें देश खुद को देखता है।इस बार यह आईना डिजिटल हैतेज़, सटीक और आधुनिक।और इसमें जो तस्वीर दिखेगी, उसे बनाने में आपका भी योगदान होगा। तो आइए, इस जनगणना अभियान का हिस्सा बनेंस्व-गणना करें, सही जानकारी दें और देश के विकास की कहानी में अपनी भूमिका निभाएं।</description><guid>733</guid><pubDate>14-Apr-2026 8:55:17 am</pubDate></item><item><title>मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है...</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=732</link><description> यादें-आशा भोंसले
 आलेख-मंजूषा शर्मा
दिग्गज गायिका आशा भोसले का 12 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने अपनी आवाज से हिंदी ही नहीं बल्कि कई भाषाओं के गानों को अमर बना दिया। उनके निधन की खबर लगते ही आज सोशल मीडिया के हर प्लेटफार्म पर उनके ही गाये गाने सुनाई दे रहे हैं। आज हम उनके गाये एक गाने की चर्र्चा कर रहे हैं, जो मेरा भी पसंदीदा है- गाने के बोल हैं- मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है। यह फिल्म इजाज़त में शामिल किया गया था, जो वर्ष 1987 में प्रदर्शित हुई थीं। इस फिल्म के लिए आशा भोंसले को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
गाने के बोल सुनकर साफ पता चल जाता है कि ऐसा गाना और कोई नहीं, सिर्फ गुलजार साहब ही लिख सकते हैं। दरअसल यह एक नज़्म है। इस गाने के लिए गुलजार साहब को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।
पूरा गाना है-
मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा हैं
सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे हैं
और मेरे एक ख़त में लिपटी रात पडी हैं
वो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो
पतझड़ हैं कुछ, हैं ना ...
पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहट
कानों में एक बार पहन के लौटाई थी
पतझड़ की वो शांख अभी तक कांप रही हैं
वो शांख गिरा दो, मेरा वो सामान लौटा दो
एक अकेली छतरी में जब आधे आधे भीग रहे थे
आधे सूखे, आधे गिले, सुखा तो मैं ले आई थी
गिला मन शायद, बिस्तर के पास पडा हो
वो भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो
एक सौ सोलह चांद की रातें, एक तुम्हारे कांधे का तिल
गीली मेहंदी की खुशबू, झूठमूठ के शिकवे कुछ
झूठमूठ के वादे भी, सब याद करा दो
सब भिजवा दो, मेरा वो सामन लौटा दो
एक इजाजत दे दो बस
जब इस को दफऩाऊंगी
मैं भी वही सो जाऊंगी.....
गुलजार साहब इतनी सादगी और सरलता से हर बात कह देते हैं कि लगता है , जैसे कोई अपनी ही कहानी बयां कर रहा है। उनकी लेखन की यह सादगी जैसे रूह को छू लेती है। गुलजार साहब द्वारा कही हुई सीधी सी बात भी आंखों में एक सपना बुन देती है ..जिस सहजता व सरलता से वे कहते हैं वो गीत की इन पंक्तियों में दिखाई देती है।
फिल्म इजाजत का गाना मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास है, आशा भोसले का सबसे पसंदीदा गाना हुआ करता था। एक इंटरव्यू में आशा भोसले ने कहा था कि ये गाना पंचम (आर. डी . बर्मन) के साथ उनके खूबसूरत रिश्ते की एक बानगी है।। आशा ताई बताती थींं कि जब ये गाना गुलजार साहब ने लिखा था, तो पंचम दा ने कहा था कि पहली बार ऐसा होगा कि कोई गाना अपने बोल की वजह से अखबार की सुर्खियां बनेगा।
गुलज़ार साहब और पंचम दा की जोड़ी ने एक से बढक़र एक गीत दिए हैं। जब गुलज़ार साहब - मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है.. नज्म को लिखकर पंचम दा के पास लेकर गए और बोले इस पर गाना बनाना है तो पंचम दा ने कहा यार कल से टाइम्स ऑफ़ इंडिया लेकर आ जाना और बोलना इस न्यूज़ पर भी गाना बनाओ । पहले तुम्हारा गाना तो समझ आए। लेकिन उन्होंने गाने की रुह को समझा और एक प्यारी सी धुन भी बना दी। यह गाना सुनकर ऐसा लगता है जैसे जि़न्दगी से जि़न्दगी कुछ कहना चाहती है या अपना दिया कुछ उधार वापस चाहती है, जैसे कुछ कहीं फिर से छूट गया है और एक कसक तथा कुछ पाने की एक उम्मीद शब्दों में ढल जाती है।
शायद उस वक्त का यह पहला ऐसा गाना था, जिसमें कोई तुकबंदी नहीं थी । सही मायने में यह नॉन रिमिंग लिरिक्स था। गाने के पाश्र्व में बजता म्यूजिक सॉफ्ट है। इसमें संतूर का इस्तेमाल हुआ है जिसे उल्हास बापट ने बजाया है। उल्लास , वर्ष 1978 से पंचम दा की म्यूजिक टीम से जुड़ गए और 1942 टु लव स्टोरी फिल्म तक साथ रहे। इजाजत के गाने में उल्लास बापट ने कमाल का संतूर वादन किया है। गाने में पंचम दा का ट्रेंड साफ झलकता है। कुछ इसी प्रकार का म्यूजिक फिल्म मौसम में मदन मोहन साहब ने भी तैयार किया था।
फिल्म इजाजत सुबोध घोष की लिखी बांगला कहानी पर आधारित है जिसकी पटकथा गुलजार ने लिखी और निर्देशन भी उन्हीं का था। इसमें नसीरुद्दीन शाह, रेखा, अनुराधा पटेल के अलावा शशि कपूर ने भी काम किया। इस गाने में रेखा और नसीर नजर आते हैं। नसीर, माया(अनुराधा पटे) का लिखा खत पढक़र पत्नी रेखा को सुनाते हैं-
एक दफा वो याद है तुमको, बिन बत्ती जब साईकिल का चालान हुआ था
हमने कैसे भूखे प्यासे बेचारों सी एक्टिंग की थी,
हवलदार ने उल्टा एक अठन्नी दे कर भेज दिया था
एक चवन्नी मेरी थी, वो भिजवा दो....
इसके बाद यह गाना पाश्र्व में बजता है और अनुराधा पटेल गाते हुए अपने प्रेमी से कहती हैं- कि उसने भले ही उसका भौतिक सामान लौटा दिया है, लेकिन अब वह उसके तमाम वो अहसास भी वापस कर दें, जो उसके साथ बिताए क्षणों के साक्षी रहे हंै। यह गाना एक प्रकार से फिल्म की पूरी कहानी का ही निचोड़ है। गाने के अंत में माया कहती हैं-
एक इजाजत दे दो बस
जब इस को दफऩाऊंगी
मैं भी वही सो जाऊंगी.....
पूरी कहानी नसीर-रेखा और अनुराधा पटेल के बीच घूमती है। अनुराधा पटेल यानी माया अपने नाम के अनुरूप एक माया है, जो नसीर की प्रेमिका रहती है, लेकिन नसीर और रेखा की शादी हो जाती है। दोनों की खुशहाल शादीशुदा जिदंगी है। जब भी माया उनकी जिदंगी के बीच आती है, पारिवारिक जीवन में तनाव आ जाता है। आखिरकार एक दिन रेखा, नसीर को छोडक़र चली जाती है और दूसरी शादी कर लेती है। उधर , माया यानी अनुराधा भी आत्महत्या करने का प्रयास करती है और एक दिन हादसे में उसकी मौत हो जाती है। यह फिल्म सामान्तर फिल्म जगत का हिस्सा थी और एक खास वर्ग ने ही उसे पसंद किया था।
मेरा कुछ सामान, नाम से गुलजार साहब ने बाद में अपने गानों का एक अलबम भी निकाला जिसे वर्ष 2005 में सारेगामा कंपनी ने रिलीज किया था। वहीं आशा भोंसले के 75 जन्मदिन पर भी इसी कंपनी ने जो अलबम जारी किया था, उसका नाम भी मेरा कुछ सामान, रखा गया था जिसमें यह गाना शामिल था। मई 2011 में गुलजार की कहानियों पर आधारित जिन नाटकों का मंचन मुंबई और दिल्ली में हुआ था, उस श्रृंखला का नाम भी मेरा कुछ सामान- रखा गया था।
</description><guid>732</guid><pubDate>12-Apr-2026 6:11:44 pm</pubDate></item><item><title>जादुई आवाज की मलिका आशा नहीं रहीं...</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=731</link><description>-लता मंगेशकर के प्रशंसक संगीतकारों को आशा ने कभी निराश नहीं किया 
-आलेख- प्रशांत शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)
जादुई आवाज की मलिका आशा भोसले का निधन संगीत की दुनिया में एक और खालीपन छोड़ गया है। 92 साल की उम्र में भी वे बड़ी जिंदादिल और चंचल थीं। यह खूबी उनकी गायिकी में भी झलकती थी। लता मंगेशकर की बहन होना और फिर उनकी छाया से अलग होकर विविधता भरा मुकाम हासिल करना, किसी भी नई गायिका के लिए नामुमकिन था लेकिन आशा भोसले ने इसे चुनौती माना और सफलता के उच्च शिखर तक पहुंची। 
 आशा को बरसों-बरस लता की छोटी बहन के तौर पर जाना जाता रहा। जाहिर है एक गायिका के रूप में उन्हें अपनी मौलिक पहचान बनाने में बड़ी दिक्कतें आईं। 1940 के दशक में जब आशा ने पाश्र्व गायन की दहलीज पर कदम रखा, तब लता मंगेश्कर अपनी पहचान बना चुकी थीं। उस वक्त संगीतकार नौशाद की तूती बोलती थी। नौशाद के गाने की शुरुआत लता से ही होती थी। आशा भोसले उस वक्त की चर्चित गायिका शमशाद बेगम और गीता दत्त से बहुत प्रभावित हुर्इं । नौशाद ने आशा को मौका यही सोचकर दिया कि वह भी लता की तरह गाने में असर पैदा कर पाएंगी, लेकिन आशा ने लता दीदी की नकल करने की बजाय अपनी पहचान को महत्व दिया। बाद में आशा नौशाद की मुख्य गायिका बन गई और उनके संगीत निर्देशन में उन्होंने अनगिनत हिट गाने गाये। नौशाद ने आशा की आवाज में पहला गाना तब रिकॉर्ड करवाया, जब उन्हें आशा पर भरोसा नहीं था। वहीं लता के लिए समर्पित संगीतकार सज्जाद और सी. रामचंद्र ने भी जब आशा को मौका दिया तो उन्हें निराश नहीं होना पड़ा। सज्जाद तो लता के बिना रुखसाना फिल्म बनाना ही नहीं चाहते थे। पर बाद में इस फिल्म के गानों को उन्होंने आशा से गवाया और फिर खुद सज्जाद सभी से आशा की तारीफ करने लगे। इस फिल्म में आशा-किशोर का युगल गीत यह चार दिन बहार के उस वक्त काफी लोकप्रिय हुआ।
संगीतकार अनिल विश्वास के आशा के लिए शब्द थे- आशा की आवाज देह के साथ उपस्थित होती है तो लता की आवाज आत्मा के साथ । संगीतकार अनिल विश्वास तो अपने रिकॉर्डिंग रूम में लता के अलावा किसी को देखना नहीं चाहते थे, लेकिन वे भी आशा के मुरीद हो गए। इस बारे में आशा ने कहा था-अनिल दा के साथ काम करते समय उन्हें बड़ा डर लग रहा था। उन्हें भी दिल की गहराइयों में डूबकर आत्मा से सुर निकालना पड़ा। संगीतकार सी. रामचंद्र लता के प्रशंसक होने के साथ-साथ उनके काफी करीबी थे। आशा ने कभी सोचा ही नहीं था कि उनके साथ काम करने का मौका मिलेगा। सी. रामचंद्र ने जब आशा के सामने सोजा रे चंदा सोजा (फिल्म-आशा) का शास्त्रीय गीत गाने की पेशकश की तो वे आश्चर्य में पड़ गईं। इस गाने से आशा को एक नया मुकाम हासिल हुआ।
संगीतकार रोशन के लिए भी लता ही पसंदीदा गायिका बनी रहीं। हालांकि उस वक्त तक आशा के कई एकल और युगल गीत हिट हो चुके थे। कहा जाता है कि उस दौर में रोशन गायिका राजकुमारी या गीता दत्त से भी गाना गवाने के बारे में सोच सकते थे, पर आशा के बारे में नहीं। उन्हें इस बात का भी अंदाज नहीं था कि दिल ही तो है का यमन राग में लयबद्घ हिट कव्वाली निगाहें मिलाने को जी चाहता है आशा इतनी बखूबी गाएंगी। बाद में रोशन ने आशा की काबिलियत को पहचाना और उन्हें कई मौके दिए। ताजमहल की कव्वाली चांदी का बदन सोने की नजर आज भी भुलाएं नहीं भूलती।
मदन मोहन एक ऐसे संगीतकार थे जो लता के पर्याय माने जाते रहे। सच कहें तो अगर उनके संगीत में लता की आवाज निकाल दी जाए तो कुछ भी नहीं बचेगा। मदन मोहन के संगीत में आशा ने वही गाने गवाये जिन्हें लता ने गाने से मना कर दिया। लता और आशा की आवाज का फर्क उन्होंने फिल्म अदालत की इस गाने में बखूबी बताया- जा जा रे जा साजना, काहे सपनों में आये जाके देस पराए... नरगिस के लिए लता की गंभीर और दर्दभरी आवाज का इस्तेमाल और चुलबुली सह नायिका के लिए आशा की आवाज। अश्कों से तेरी हमने तस्वीर बनाई है गीत के लिए मदन मोहन ने आशा की काफी तारीफ की। 
1984 में फिल्म उत्सव में भी इसी तरह का प्रयोग लक्ष्मीकांत - प्यारे लाल ने किया। फिल्म का एक हिट गीत -मन क्यों बहका री बहका, में उन्होंने लता-आशा की जोड़ी बनाई। दोनों बहनों की अलग गायकी के अंदाज ने इस गाने को यादगार बना दिया। 
संगीतकार शंकर जयकिशन की सफलता में लता का बहुत बड़ा हाथ था। उन्होंने आशा की आवाज या तो बच्चों के लिए इस्तेमाल की या तेज गति से गानों के लिए जैसे- श्री 420 का मुड़-मुड़ के न देख गीता जब शंकर-जयकिशन ने करोड़पति का हाय! सावन बन गए नैन गीत आशा को गाने दिया तो इसके पीछे उनकी लता से चल रही अनबन ही मुख्य वजह थी। यह गीत आशा के कालजयी गीतों में से एक माना जाता है। लता से उखड़ी यह संगीतकार जोड़ी फिर आशा के साथ ही बंधकर रह गई। 
संगीतकार सलिल चौधरी का संगीत आशा को बेहद पसंद था पर अन्य संगीतकारों की तरह सलिल चौधरी के लिए आशा दूसरी पसंद रहीं। संगीतकार खय्याम की हस्ती लता से ही थी, लेकिन आशा ने भी उन्हें हिट गाने दिए। लता के प्रशंसक खय्याम ने जब फिल्म उमराव जान के संगीत की कमान संभाली तो सभी ने सोचा कि लता ही उनकी मुख्य गायिका होंगी, लेकिन खय्याम ने आशा का चुनाव करके सबको हैरत में डाल दिया। इस फिल्म की गजलों में एक नई आशा लोगों के सामने आई। खय्याम ने आखिर आशा में कैसे यह चमत्कार पैदा किया, यह सभी के लिए एक बड़ा आश्चर्य था। इस फिल्म के लिए आशा ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।
गुलजार की फिल्म इज्जत में आशा की कलात्मक गायिकी लोगों के सामने आई। मेरा कुछ सामान गीत आशा ने इतनी खूबसूरती से गाया कि यह आशा का भी पसंदीदा बना गया। इस गाने की मुरकियां सुनते ही बनती हैं। इस फिल्म के लिए भी आशा ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। आशा भोंसले का जिक्र संगीतकार ओ.पी. नैयर के बिना अधूरा है। नैयर के संगीत में आशा ने एक से बढक़र एक गाने दिये। लता से खटपट ओ. पी. नैयर को आशा के इतना करीब ले आई कि वे आशा के बिना अपने संगीत की कल्पना भी नहीं करते थे। 
पॉप की दुनिया में आर.डी. बर्मन ने आशा की आवाज का अच्छा इस्तेमाल किया, लेकिन उन्होंने मेरा कुछ सामान जैसे गाने भी गवाकर आशा की काबिलीयत की सही परख भी की। आशा पंचम दा की जीवन संगिनी भी बनी और पंचम दा के संगीत को आशा ने जो सुर दिए, वह शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। पंचम के साथ शादी उन्हें उनके पिता और संगीतकार एस.डी. बर्मन के संगीत निर्देशन से जरूर दूर ले गईं। एस.डी. बर्मन का साथ आशा ने वर्ष1957 के बाद हमेशा दिया। बर्मन दा वर्ष 1963 में बिमल राय की फिल्म बंदिनी के लिए लता को वापस बुलाने वाले थे, लेकिन उन्होंने अपना विचार बदला और आशा पर अपनी सारी आशाएं लगा दीं। अब के बरस भेज भइयां को बाबुल गाने में आशा ने अपनी सारी प्रतिभा उड़ेल दी। ज्वैलथीफ के गीत रात अकेली है के लिए दादा आशा की तारीफ करते नहीं थकते थे।</description><guid>731</guid><pubDate>12-Apr-2026 9:11:45 pm</pubDate></item><item><title>  विशेष लेख : स्वाभिमान की नई पहचान : छत्तीसगढ़ में महिला सशक्तिकरण का स्वर्णिम दौर</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=730</link><description>विशेष लेख :  डॉ. दानेश्वरी संभाकर, उप संचालक 
रायपुर ।छत्तीसगढ़ में वर्ष 2026 को महतारी गौरव वर्ष के रूप में मनाते हुए महिलाओं के सम्मान, स्वाभिमान और आर्थिक सशक्तिकरण को नई दिशा दी जा रही है। विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार की योजनाएं अब जमीनी स्तर पर प्रभावी परिणाम दे रही हैं, जिसका स्पष्ट प्रतिबिंब आंकड़ों में दिखाई देता है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि महतारी गौरव वर्ष महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने का व्यापक अभियान है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने बजट में महिलाओं और बच्चों के पोषण एवं स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए आंगनबाड़ी संचालन के लिए 800 करोड़ रुपए, पूरक पोषण आहार के लिए 650 करोड़ रुपए तथा कुपोषण मुक्ति व पोषण अभियान के लिए 235 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, जो आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ और सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण निवेश है।
महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े ने कहा कि राज्य में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में महतारी वंदन योजना एक मील का पत्थर साबित हुई है। 10 मार्च 2024 को प्रारंभ इस योजना के तहत लगभग 70 लाख महिलाओं को प्रतिमाह 1 हजार रुपए की सहायता मिल रही है। अब तक 26 किस्तों के माध्यम से 16 हजार 881 करोड़ रुपए से अधिक राशि सीधे लाभार्थियों के खातों में अंतरित की जा चुकी है, वहीं इस योजना के लिए 8 हजार 200 करोड़ रुपए का बजट प्रावधान राज्य सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
उन्होंने बताया कि बेटियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए प्रस्तावित रानी दुर्गावती योजना के तहत 18 वर्ष की आयु पूर्ण होने पर 1 लाख 50 हजार रुपए की सहायता दी जाएगी, जिसके लिए 15 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।
राज्य में महिलाओं के लिए आधारभूत सुविधाओं का विस्तार भी तेजी से हो रहा है। महतारी सदनों के निर्माण के लिए 75 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जिसके अंतर्गत अब तक 368 सदनों को स्वीकृति दी जा चुकी है और 137 का निर्माण पूर्ण हो चुका है। साथ ही 500 नए आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्माण के लिए 42 करोड़ रुपए निर्धारित किए गए हैं, जिससे ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में सेवाओं की पहुंच और मजबूत होगी।
मातृत्व सुरक्षा के क्षेत्र में प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना के अंतर्गत 3 लाख 73 हजार से अधिक पंजीयन दर्ज किए गए हैं तथा 235 करोड़ रुपए से अधिक की राशि का भुगतान किया जा चुका है। वर्ष 2023-24 में जहां 1 लाख 75 हजार से अधिक पंजीकरण हुए, वहीं 2024-25 में यह संख्या बढ़कर 2 लाख 19 हजार से अधिक हो गई। वर्ष 2025-26 में फरवरी तक 2 लाख 4 हजार से अधिक पंजीयन हो चुके हैं, जो निर्धारित लक्ष्य का 93 प्रतिशत से अधिक है।
पोषण अभियान में भी राज्य ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। पोषण माह 2024 के दौरान प्रति केंद्र प्रदर्शन में प्रदेश को प्रथम स्थान तथा कुल गतिविधियों में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। वहीं न्योता भोज जैसे नवाचारों के तहत 9 हजार 700 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनसे 1 लाख 83 हजार से अधिक बच्चों को लाभ मिला।
मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने बताया कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्व-सहायता समूहों को रेडी-टू-ईट जैसे कार्यों से जोड़ा जा रहा है तथा लखपति दीदी योजना के माध्यम से उन्हें व्यवसायिक अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। उज्ज्वला योजना के तहत लगभग 38 लाख महिलाएं लाभान्वित हो रही हैं, जिससे उन्हें स्वच्छ ईंधन की सुविधा मिली है। वहीं सखी वन स्टॉप सेंटरों की संख्या 27 से बढ़ाकर 34 कर दी गई है, जहां 14 हजार 300 से अधिक प्रकरणों में से 8 हजार 900 से अधिक का निराकरण किया जा चुका है।
स्पष्ट है कि महतारी गौरव वर्ष केवल एक प्रतीकात्मक पहल नहीं, बल्कि ठोस परिणाम देने वाला अभियान है। विष्णु देव साय और लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में महिलाएं अब विकास की धुरी बनकर उभर रही हैं और राज्य को नई दिशा दे रही हैं।
</description><guid>730</guid><pubDate>11-Apr-2026 12:00:56 am</pubDate></item><item><title> उद्योग और श्रम विभाग के आपसी समन्वय से संवर रहा है - छत्तीसगढ़</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=729</link><description>(उद्योग व श्रम मंत्री श्री लखनलाल देवांगन के जन्मदिन के अवसर पर विशेष )
छगन लाल लोन्हारे
उप संचालक जनसम्पर्क
 रायपुर /मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने जिस स्पष्ट नीति के साथ श्रमिकों और उद्योगों के समन्वित विकास को प्राथमिकता दी है, वह आज ठोस परिणामों के रूप में सामने आ रही है। श्रम विभाग की योजनाओं में यह भावना स्पष्ट झलकती है कि श्रमिक केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि समाज की आधारशिला हैं। उनके जीवन में स्थायित्व, सम्मान और सुरक्षा लाना ही सच्चे विकास का संकेत है। 12 अप्रैल का यह विशेष अवसर उद्योग तथा श्रम मंत्री श्री लखनलाल देवांगन के समर्पण, कार्यक्षमता और जनसेवा की भावना को याद करने का दिन है। आपके कुशल नेतृत्व से ही छत्तीसगढ़ प्रगति, समृद्धि और समान अवसरों का आदर्श राज्य बनकर उभरा है।
 2026 रजत जयंती वर्ष में छत्तीसगढ़ के विकास की वर्तमान यात्रा केवल योजनाओं और घोषणाओं की कहानी भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे नेतृत्व की कथा है जिसने श्रमिक, युवा, उद्यमी और समाज के हर वर्ग को साथ लेकर आगे बढ़ने का संकल्प लिया है। इस परिवर्तनकारी दौर में उद्योग व श्रम मंत्री श्री लखनलाल देवांगन का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनका कार्य केवल प्रशासनिक दक्षता तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और दूरदर्शिता का जीवंत उदाहरण है। छत्तीसगढ़ सरकार ने 25 वर्ष की अल्प आयु में उद्योग के क्षेत्र में जो एक नया इतिहास रचने का संकल्प लिया है वह किसी से छिपा नहीं है। उद्योग के क्षेत्र में आज छत्तीसगढ़ की अपनी एक अलग पहचान है। नई उद्योग नीति (2024-2030) में छत्तीसगढ़ के समावेशी विकास पर जोर दिया गया है।
 श्रमिकों के सशक्तिकरण की दिशा में उठाए गए कदमों में सबसे प्रेरणादायक पहल श्रमिकों के बच्चों को उत्कृष्ट विद्यालयों में निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना है। यह केवल एक योजना नहीं, बल्कि परिवर्तन का वह मार्ग है जिससे कि आने वाली नई पीढ़ी ज्ञान और अवसरों के माध्यम से अपना सुनहरा और सुरक्षित भविष्य स्वयं गढ़ सके। आज के संदर्भ में श्रमिक परिवारों के बच्चों का राज्य के प्रतिष्ठित स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करना, एक नए छत्तीसगढ़ की तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही मेरिट में आने वाले विद्यार्थियों को लाखों रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान करना सरकार की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें प्रतिभा का सम्मान सर्वाेपरि है। यह न केवल उन बच्चों के लिए गौरव का क्षण है, बल्कि पूरे श्रमिक समाज के लिए आत्मविश्वास का स्त्रोत भी है।
 उद्योग और श्रम विभाग से आर्थिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। पिछले दो वर्षों में सैकड़ों करोड़ रुपये सीधे श्रमिकों के खातों में हस्तांतरित किए गए हैं, जिससे न केवल पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि सरकार की योजनाओं का वास्तविक लाभ भी सुनिश्चित हुआ है। प्रतिदिन हजारों श्रमिकों को विभिन्न योजनाओं का लाभ मिलना इस बात का प्रमाण है कि शासन की नीतियां धरातल पर प्रभावी रूप से लागू हो रही हैं। श्रमिकों के जीवन को अधिक सुरक्षित और सम्मानजनक बनाने के लिए आवास सहायता, शहीद वीर नारायण सिंह श्रम अन्न योजना, दुर्घटना में त्वरित आर्थिक सहयोग जैसी पहलें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से श्रम अन्न योजना के अंतर्गत मात्र 5 रुपये में गरम और पौष्टिक भोजन। श्रम अन्न योजना के अंतर्गत मात्र 5 रुपये में गरम और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना, एक मानवीय और संवेदनशील शासन का परिचायक है। औद्योगिक विकास के क्षेत्र में भी मंत्री लखनलाल देवांगन के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ ने नई ऊंचाईयों को छुआ है। औद्योगिक विकास नीति 2024-30 के माध्यम से राज्य में निवेशको को प्रोत्साहित करने और रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं। करोड़ों रुपये के निवेश प्रस्ताव, सैकड़ों नए उद्योगों की स्थापना और हजारों युवाओं को रोजगार मिलना इस नीति की सफलता को प्रमाणित करता है।
 नवा रायपुर में देश का पहला एआई डाटा सेंटर स्थापित करने की दिशा में बढ़ता कदम, सेमीकंडक्टर और आईटी जैसे उभरते क्षेत्रों में निवेश, तथा स्टार्टअप नीति का क्रियान्वयन ये सभी पहलें छत्तीसगढ़ को पारंपरिक अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ाकर आधुनिक तकनीकी युग में स्थापित कर रही हैं। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को भी नई दिशा देने वाला है। प्रशासनिक सुधारों के क्षेत्र में ई-निविदा प्रणाली और सिंगल विंडो सिस्टम जैसे कदमों ने पारदर्शिता को बढ़ाया है जिससे निवेशकों का विश्वास मजबूत हुआ है और राज्य में व्यापार करने की प्रक्रिया सरल बनी है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ आज निवेशकों के लिए एक आकर्षक गंतव्य बनता जा रहा है।
सामाजिक समावेशन को छत्तीसगढ़ सरकार ने अपनी विकास यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन, कामकाजी महिलाओं के लिए हॉस्टल और दूरस्थ क्षेत्रों में औद्योगिक विकास की योजनाएं यह सुनिश्चित करती हैं कि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। सामाजिक समावेश नही किसी भी राज्य की वास्तविक प्रगति का आधार होता है।
उद्योग तथा श्रम मंत्री श्री लखनलाल देवांगन ने अपने गंभीर व दूर-दृष्टि सोच एवं विभागीय दायित्वों के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि यदि नेतृत्व में संवेदनशीलता और स्पष्ट दृष्टि हो, तो विकास केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोगों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाता है। वहीं मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय सरकार के मार्गदर्शन में यह परिवर्तन और अधिक सशक्त और व्यापक रूप ले रहा है।</description><guid>729</guid><pubDate>11-Apr-2026 6:05:41 pm</pubDate></item><item><title>कभी बंदूक अब रोज़गार : आत्मसमर्पित माओवादियों का आजीविकामूलक गतिविधियों से सुधर रहा भविष्य</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=728</link><description>विशेष लेख : मुख्यधारा में लौटे माओवादियों का शिक्षा पर भी विशेष ध्यान
रायपुर । जिन हाथों ने कभी बंदूक थामकर हिंसा की मार्ग अपनाया था, अब वहीं हाथ अपने हुनर का कमाल दिखा रहे हैं। भानुप्रतापपुर के पास ग्राम चौगेल के पुनर्वास केन्द्र में प्रशिक्षण प्राप्त आत्मसमर्पित नक्सलियों द्वारा हुनर दिखाते हुए काष्ठ कला से नेम प्लेट, छत्तीसगढ़ शासन का लोगो, ग्राम पंचायतों के लिए बोर्ड, बच्चों के लिए की-रिंग सहित अन्य सजावटी सामग्री तैयार की जा रही है, साथ ही कपड़े का थैला, कार्यालयों के लिए बस्ता भी तैयार किया जा रहा है। सरकार द्वारा घोषित नक्सल पुनर्वास नीति के तहत कलेक्टर श्री निलेशकुमार महादेव क्षीरसागर के मार्गदर्शन में जिला प्रशासन कांकेर द्वारा आत्मसमर्पित नक्सलियों को कुशल और दक्ष बनाने का सार्थक प्रयास किया जा रहा है। यहां पर उन्हें काष्ठशिल्प के साथ ही इलेक्ट्रिशियन, ड्रायविंग, सिलाई, राजमिस्त्री जैसे पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। कभी नक्सली गतिविधियों में संलिप्त रहे युवक-युवतियॉ अब विभिन्न व्यवसाय में दक्ष हो रहे हैं, ताकि वे समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के बाद आजीविकामूलक गतिविधियों से जुड़कर सम्मानपूर्वक जीवन निर्वाह कर सकें।
मुख्यधारा में लौटे माओवादियों का शिक्षा पर भी विशेष ध्यान
चौगेल कैंप बना कौशल प्रशिक्षण केंद्र
वर्षों से लाल आतंक के साए में हिंसा का दंश झेल रहा बस्तर संभाग अब विकास की ओर आगे बढ़ रहा है। शासन द्वारा नक्सल मुक्त बस्तर घोषित किया जा चुका है। हिंसा की राह त्यागकर मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों को सरकार कौशल विकास का प्रशिक्षण दे रही है, ताकि वे सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकें। आत्मसमर्पित नक्सलियों को पुनर्वास नीति-2025 के अंतर्गत भानुप्रतापपुर विकासखंड के पास ग्राम चौगेल (मुल्ला) कैम्प में विभिन्न सृजनात्मक और रोजगारमूलक गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कभी बीएसएफ का कैम्प रहा चौगेल (मुल्ला) का यह कैम्प अब हुनर सिखाने वाला गढ़ बन चुका है। यहां पर जिला प्रशासन द्वारा मुख्यधारा में लौटे 40 आत्मसमर्पित माओवादियों को अलग-अलग पाठयक्रमों जैसे- काष्ठ शिल्प, इलेक्ट्रिशियन, सिलाई, ड्राइविंग, राजमिस्त्री इत्यादि का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, साथ ही उनकी शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दी जा रही है। पढ़ने के लिए पाठ्य सामग्री, पुस्तकें, पेन-पेंसिल दिए गए हैं तथा पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षकों की व्यवस्था भी की गई है। स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा आत्मसमर्पित नक्सलियों का नियमित रूप से स्वास्थ्य परीक्षण कर आवश्यकतानुसार दवाईयां भी दी जाती हैं। कैम्प में मनोरंजनात्मक गतिविधियां जैसे कैरम, वाद्य यंत्र, विभिन्न प्रकार के खेल भी आयोजित किया जाता है। चौगेल पुनर्वास केंद्र में राजमिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन, वाहन चालक के साथ ही कांकेर में घुड़सवारी का भी प्रशिक्षण दिया जा चुका है। वर्तमान में सिलाई मशीन, काष्ठ शिल्प एवं असिस्टेंट इलेक्ट्रिशियन का प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। स्वरोजगार के लिए सशक्त बनाने हेतु कृषि विभाग, मत्स्य पालन विभाग, उद्यानिकी, पशुधन विकास विभाग के साथ बिहान के द्वारा एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन भी किया गया है।
प्रशिक्षण उपरांत नियोजन करने वाला पहला जिला बना कांकेर
पुनर्वास केंद्र में प्रशिक्षण उपरांत नक्सली पीड़ित एवं आत्मसमर्पित नक्सलियों को रोजगार से जोड़ने वाला कांकेर पहला जिला बन चुका है। कलेक्टर श्री निलेशकुमार महादेव क्षीरसागर ने अपने हाथों से तीन नक्सली पीड़ित और एक आत्मसमर्पित नक्सली को निजी क्षेत्र में नौकरी के लिए नियुक्ति पत्र सौंपा, इनमें पुनर्वासित सगनूराम आंचला एवं नक्सल पीड़ित रोशन नेताम, बीरसिंह मंडावी और संजय नेताम शामिल थे। इन सभी को निजी फर्म का नियुक्ति पत्र प्रदान किया गया, जहां उन्हें 15 हजार रूपए प्रतिमाह मानदेय और अन्य प्रकार की वित्तीय सुविधाएं प्राप्त होंगी। इन्होंने चौगेल कैम्प में असिस्टेंट इलेक्ट्रिशियन का प्रशिक्षण प्राप्त किया था तथा उन्हें निजी क्षेत्र में नियोजित किया गया है। मुख्यधारा में लौटकर प्रशिक्षण के उपरांत रोजगार प्रदान करने के मामले में उत्तर बस्तर कांकेर पहला जिला है। निजी क्षेत्र में नौकरी मिलने पर खुशी व्यक्त करते हुए माओवाद पीड़ित श्री बीरसिंह मंडावी ने कहा कि ग्राम मुल्ला (चौगेल) के कैम्प में पुनर्जीवन मिला है, जहां निःशुल्क प्रशिक्षण देकर उन्हें कुशल एवं पारंगत बनाया गया, वहीं प्रशिक्षण के बाद जिला प्रशासन द्वारा रोजगार भी उपलब्ध कराया जा रहा है।</description><guid>728</guid><pubDate>08-Apr-2026 7:16:18 pm</pubDate></item><item><title> जीवन दौड़ने का नहीं, महसूस करने का नाम</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=727</link><description>0- मेरी जापान डायरी- डा. अभया जोगेलेकर
रायपुर। हम सब केवल अपनी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और संघर्षों में इतने उलझ जाते हैं, जीवन की सरल सुंदरता को भूल जाते हैं। जीवन केवल दौड़ने का नाम नहीं, महसूस करने का भी नाम है। प्रकृति की सुंदरता, अपने भीतर की शांति और उन क्षणों का आनंद जो हमें वास्तव में जीवित महसूस कराते हैं। यह सब मैंने जापान में महसूस किया, क्योंकि यहां आकर मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। 
थॉमस कुक के साथ हमारी जापान यात्रा की 22 से होकर 31 मार्च तक थी। 22 मार्च की सुबह जब टोक्यो की गलियों में कदम रखा, तो महसूस हुआ कि यहां की हवा में एक अजीब सी ताजगी थी, जैसे हर सांस में कोई नई शुरुआत छिपी हो। सड़कों के किनारे खिलते चेरी ब्लॉसम (जापानी लोग इसे सकुरा कहते हैं) पेड़ों ने पूरे शहर को गुलाबी और सफेद रंगों से रंग दिया था। ऐसा लग रहा था मानो आसमान ने खुद धरती पर उतरकर फूलों की चादर बिछाई हो।
हर पंखुड़ी हवा में तैरती हुई किसी कहानी का हिस्सा लग रही थी। बच्चे नौजवान, बूढ़े और हम जैसे सैलानी इस अद्भुत नज़ारे को देख रहे थे। हमारे गाइड ने बताया इन पेड़ों पर पहले गुलाबी रंग के फूल लगते हैं। यही बाद में सफ़ेद रंग में बदल जाते है और अंत में सफ़ेद फूलों के झड़ने के बाद इनमें हरी पत्तियां आती हैं। कुछ पेड़ गुलाबी, कुछ सफ़ेद और कुछ ऐसे पेड़ जिनमें पट्टियां आ रही थी, ये दृश्य देखने में मजा आ रहा था। इन पेड़ों के नीचे बच्चे खेल रहे थे और हम जैसे उत्साही लोग सेल्फी लेकर यादें संजोने का काम कर रहे थे और वहां के बुजुर्ग शांत मन से उस सुंदरता को निहार रहे थे। यह सिर्फ एक मौसम का नजारा नहीं था, यह जीवन का उत्सव था। एक तरह से क्षणभंगुरता में भी सुंदरता खोजने का प्रतीक।
यूएनई पार्क, दागोजी टेम्पल, हकोने, क्योटो और हिरोशिमा में बैठकर जब उन फूलों को गिरते देखा, तो मन में केवल एक ही विचार आया शायद यही अल्टीमेट ब्लॉसम है। वह क्षण जब फूल अपनी पूरी सुंदरता में खिलता है और फिर बिना किसी पछतावे के हवा में बिखर जाता है। जीवन भी तो कुछ ऐसा ही है... खिलना, मुस्कुराना, और फिर समय के साथ सहजता से आगे बढ़ जाना।
उन सभी स्थानों में जहां- जहां हमने सकुरा को खिलते हुए देखा... सुबह हो या शाम, जब सूरज का उदय हो रहा हो या फिर सूरज ढल रहा था और चेरी ब्लॉसम की पंखुड़ियां सुनहरी रोशनी में चमक रही थीं, तब महसूस हुआ कि जापान सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक भावना है सादगी, अनुशासन और क्षणिक सुंदरता की भावना।
यह अध्याय मेरे सफर की शुरुआत था, जहां हर फूल ने मुझे सिखाया कि सुंदरता स्थायी नहीं होती, पर उसकी यादें हमेशा दिल में खिली रहती हैं। जीवन के भाग दौड़ में कुछ पल अपने लिए अपनों के बीच संजोने का अवसर सदा यादगार रहेगा।
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</description><guid>727</guid><pubDate>08-Apr-2026 11:05:02 am</pubDate></item><item><title>राजनीति है एक अखाड़ा </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=726</link><description>-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
राजनीति है एक अखाड़ा, आजा तू भी दाँव लगा ले।
चाटुकारिता की चटनी से, जीवन को स्वादिष्ट बना ले।।
अनपढ़ अँगूठा छाप चलेगा, जोड़-तोड़ में होशियार हो।
अहंकार मक्कारी भर-भर, शेर भीतर रँगा सियार हो।
गिरगिट जैसे रंग बदलकर, धोखेबाजी की कला दिखा ले।।
चाटुकारिता की चटनी से, जीवन को स्वादिष्ट बना ले।।
पड़े जरूरत तुरत गधे को, अपना वह बाप बना ले।
स्वार्थ-सिद्धि होती है जिसमें, झुककर एकाध लात खा ले ।
झिझक माँगने में हो कैसी, माँग-माँग कर काम बढ़ा ले।।
चाटुकारिता की चटनी से, जीवन का स्वाद बढ़ा ले।।
बिन पेंदी का लोटा बनकर, लुढ़के जिधर भी फायदा हो।
सांठगांठ रखता गुंडों से, बदतमीज बेकायदा हो।
बेशर्मी का लगा मुखौटा, सिक्कों में ईमान बिका ले।।
चाटुकारिता की चटनी खा, जीवन को स्वादिष्ट बना ले।।</description><guid>726</guid><pubDate>05-Apr-2026 2:16:04 pm</pubDate></item><item><title>बदले-बदले सुर गीतों के</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=724</link><description>गीत
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
बदले-बदले सुर गीतों के,
लेकिन बोल पुराने हैं।
गाँव वही जाना पहचाना,
लोग हुए अनजाने हैं ।।
नहीं कटोरी सब्जी की अब,
आती-जाती खिड़की से।
नहीं पड़ोसी चाचा-मामा,
भय न किसी की झिड़की से।
सीमित होते गए दायरे,
दोस्त हुए बेगाने हैं।।
सूनी हैं बाड़ी अमराई,
नहीं मिले सब्जी ताजी।
त्योहारों की रौनक फीकी,
नहीं ताश की है बाजी।
हँसी-खुशी सुख मेल-जोल के,
मेले नहीं ठिकाने हैं।।
दास बने सब सुख-सुविधा के,
नहीं काम कर से होता।
नहीं स्नेह सहयोग समन्वय,
गाँव उपेक्षित हो रोता।
सूने-सूने घर के आँगन,
भरे हुए मयखाने हैं।।
</description><guid>724</guid><pubDate>29-Mar-2026 3:31:58 pm</pubDate></item><item><title>त्याग वह वज्र, जिससे संभव है मानवता की रक्षा</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=723</link><description>-डॉ. नीरज गजेंद्र
भारतीय पौराणिक परंपरा में त्याग और लोककल्याण के अनेक उदाहरण मिलते हैं, किंतु ऋषि दधीचि की कथा उन सबमें अद्वितीय है। यह एक पौराणिक प्रसंग नहीं, मनुष्य को यह समझाने वाला गहन आध्यात्मिक संदेश है कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य स्वयं के लिए जीना नहीं, समाज और सृष्टि के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करना है।
ऋषि दधीचि का उल्लेख प्रमुख रूप से ऋग्वेद, भागवत पुराण और महाभारत में मिलता है। इन ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार उस समय असुरों का अत्याचारी राजा वृत्रासुर इतना शक्तिशाली हो गया था कि देवताओं को भी पराजित कर चुका था। देवताओं के स्वामी इन्द्र सहित सभी देवता संकट में पड़ गए।
देवताओं ने सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु से समाधान पूछा। विष्णु ने बताया कि वृत्रासुर का वध उस अस्त्र से संभव है जो महान तपस्वी दधीचि ऋषि की हड्डियों से बनाया जाएगा। देवताओं के सामने यह एक कठिन स्थिति थी किसी ऋषि से उसके शरीर का दान कैसे मांगा जाए।
जब देवता दधीचि के आश्रम पहुंचे और उनसे विनम्रता से अपनी समस्या बताई, तब ऋषि दधीचि ने बिना किसी संकोच के अपनी हड्डियां दान करने की सहमति दे दी। उन्होंने कहा कि यदि मेरे शरीर का उपयोग लोककल्याण के लिए हो सकता है, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा। इसके बाद उन्होंने योगबल से अपना शरीर त्याग दिया। उनकी हड्डियों से देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा ने वज्र बनाया, जिससे इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया और संसार में पुनः संतुलन स्थापित हुआ।
यह कथा एक वीरगाथा नहीं, भारतीय धर्म और दर्शन का गहन सिद्धांत प्रस्तुत करती है। ऋषि दधीचि ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि मनुष्य का शरीर भी तभी सार्थक है जब वह समाज के काम आए।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह कथा हमें अहंकार से ऊपर उठने का संदेश देती है। मनुष्य प्रायः अपने शरीर, संपत्ति और पद को ही अपना सर्वस्व मान बैठता है। किंतु भारतीय दर्शन कहता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत। जब यह समझ विकसित हो जाती है, तब त्याग कठिन नहीं रह जाता। दधीचि ने इसी सत्य को जीकर दिखाया।
यदि इस कथा को आधुनिक संदर्भ में देखें, तो इसका सबसे बड़ा संदेश अंगदान और परोपकार की भावना में दिखाई देता है। आज चिकित्सा विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि किसी व्यक्ति के अंग कई अन्य लोगों को नया जीवन दे सकते हैं। जिस प्रकार दधीचि की हड्डियों से बना वज्र समस्त देवताओं की रक्षा का कारण बना, उसी प्रकार आज किसी व्यक्ति का अंगदान कई परिवारों के लिए आशा की किरण बन सकता है।
इतिहास में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां किसी व्यक्ति के त्याग ने पूरे समाज की दिशा बदल दी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक सामाजिक आंदोलनों तक, हर युग में कुछ ऐसे लोग रहे जिन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधा को त्यागकर समाज के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। दधीचि की कथा इन सभी त्यागों का आध्यात्मिक आधार प्रतीत होती है।
इस कथा का एक और गहरा संदेश है कि सच्ची शक्ति तप, ज्ञान और त्याग से उत्पन्न होती है। दधीचि की हड्डियां साधारण नहीं थीं; वे वर्षों की तपस्या, आत्मसंयम और आध्यात्मिक शक्ति का परिणाम थीं। इसलिए उनसे बना वज्र इतना प्रभावी हुआ। यह हमें बताता है कि व्यक्ति की आंतरिक साधना ही उसकी वास्तविक शक्ति होती है।
आज जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों, स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और नैतिक संकट से गुजर रहा है, तब दधीचि की कथा एक प्रकाशस्तंभ की तरह सामने आती है। यह हमें याद दिलाती है कि सभ्यता की असली प्रगति तकनीक या संपत्ति से नहीं, त्याग और करुणा से होती है।



</description><guid>723</guid><pubDate>23-Mar-2026 12:17:36 am</pubDate></item><item><title>तीजा के लुगरा</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=721</link><description>छत्तीसगढ़ी कहानी
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
सावित्री हर होत बिहनिया उठ के अंगना कुरिया मन
ला बहार डारिस अउ नहा धो के ओनहा मन ला तको फटकार के छत मा सुखो के आगे । कंघी करत करत कुरिया डाहर झाँकिस , अभी दुनो लइका निंदिया रानी के कोरा मा मस्त माते रिहिन। नोनी रानी हर बारह बछर के रहिस अउ नानचुन बाबू ल ए साल नौ बछर हो जाही। ओखर गोंसइया सरवन हर घलो खटिया म करवट बदलत सुते रिहिस । आज ऊंखर छुट्टी ए त जम्मो झन अराम ले उठहीं, फेर महतारी मन के का छुट्टी अउ का डिप्टी। सबो दिन एक बरोबर लागथे, स्कूल,आफिस के छुट्टी रहिथे पेट ल तो सबो दिन भोजन चाही । हाँ फेर टाइम म करे के ओतेक हड़बड़ी नइ राहय, सावित्री ल ओखर गोंसइया हर देरी ले उठे बर कहिथे फेर सालों के आदत परे कइसे छूटही । नींद ह अपन टाइम म खुलेच जाथे।
   सावित्री हर सोझे नामे के सावित्री नोहय। अपन सत ले सत्यवान के परान यमराज ले मांग के लवइया सावित्री ले ओखर पत हर कोनो जिनिस म कमती नोहय । ओहर अपन गोसइया ले अबड़ मया करय, हारी बीमारी म बिकट सेवा करय । सास ससुर, घर परिवार के बड़ तोरा जतन करय तेखर पाय के जम्मो नता रिश्तेदार ओला बड़ मया करयँ । फेर कोनो के जिनगी हर पूरा नइ राहय , कोनो ल तन के दुख त कोनो ल मन के । सबके जिनगी म एकाध ठन कमी रहि जाथे। ज इसे गोड़ के पनही ल मुड़ म नइ पहिर सकयँ वइसनहे
सरवन हर कतनो मया दय मइके के पूर्ति नइ कर सकय। छत्तीसगढ़ के बहिनी महतारी मन बर भादो के महीना हर खुशहाली लेके आथे काबर कि भादो के तृतीया म हरितालिका तीजा के तिहार आथे। एमा मइके ले बाप भाई मन ब्याहता बहिनी, फूफू ल लेहे बर जाथें । उमन मइके म निराहार बिना अन्न जल के उपास रहिथें अउ शंकर पार्वती के पूजा कर के अपन सुहाग ल अमर बनाय बर प्रार्थना करथें। दूसर दिन चौथ के भिनसरहे नहा धो पूजा पाठ करके मइके के नवा लुगरा पहिर के फरहार करथें। कका,बड़ा नाते रिश्तेदार घर तको फरहार करे के नेवता आथे। सबो बहिनी , फूफू संगे संग खाये पिये जाथें, बचपन के गोठ करथें, संगी जहुँरिया के सुरता करथें। अपन अतीत ल फेर जीथें। आजकल के भाई भौजी मन ए मरम ल नइ जानै , नेंग जोग ल फोकट के खर्चा कहिके बोझा मानथें। हजारों रूपिया गहना कपड़ा बर फूँक दिहीं फेर बहिनी ल देत खानी ऊँखर हाथ नइ खुलय । फेर ए घर बर तीजा हर त बिक्कट दुख के कारन बन जाथे।
   सावित्री अउ सरवन नानपन के संगी एके पारा म रहँय। एके स्कूल म संगे संग पढ़ें जाँय । दुनो परिवार म आना जाना घलो रिहिस। नान्हे पन के दोस्ती हर कब मया के रूप धर लीसा कोनो गम ना पाइन । ऊंखर संगी जहुंरिया मन तको नइ जानिंन दुनों झन के अंतस म का चुरत हे। सरवन के नौकरी लगे के बाद जब दुनों झन के घर मा बिहाव के गोठ बात होय लागिस तब ऊमन अपन घर म मया अउ बिहाव के गोठ ल गोठियाइन। आगबबूला होगे सावित्री के बाबूजी  अइसनहा गोठियाय के तैं हिम्मत कइसे करे ? हमन मालगुजार अउ ओ बिसउहा हमर नौकर । ओहर मोर समधी बनही, मर जहूँ फेर ए गजब तमाशा नइ होन दंव । बाबूजी हर अपन जिद म अड़े रिहिस , जात-पात के सुरसा हर सरवन-सावित्री के मया ल खाय बर मुँह फार दे रिहिस । सरवन अउ सावित्री बालिग होगे रिहिन भाग के बिहाव कर लिन। बाबूजी हर त भरे समाज म कहि दिस आज ले मर गे सावित्री मोर बर । बाप बर बहुत
सरल रहिथे ए कहना , काबर के ओहर नौ महीना ओला अपन कोख म नइ धरे रहय । माँ हर बपरी अब्बड़ कलप-कलप रोइस  मोर एक ठिन मयारू बेटी , चार भाई के बाद आय रिहिस । सबके जोरा करइया, एक ठिन गलती करिस तो ओखर सब गुण ल भुला देव ।  कतेक सउँख रिहिस बेटी के सुग्घर बिहाव करतेंव , बपरी ल अकेल्ला छोड़ दिस । सगा समाज बेटी के खुशी ले बड़े होगे । कोन आही सेवा करे,अपनेच खून काम आही । हाय रे ,मोर दुलउरीन बेटी ।
   गौंटिया बाड़ा ले कपड़ा लत्ता अउ दिगर जरुरत के समान लेहे बर नौकर-चाकर रायपुर आत-जात रहँय। महतारी के मन नइ मानय, बेटी बर घर के दूध-दही ,साग भाजी , कपड़ा लत्ता कुछु कांही एक झन विश्वास पात्र जून्ना नौकर तिर भेजत राहय। ए गोठ ल सावित्री के बाबू ल कोनो दुश्मन बता दिस तो ओहर बिक्कट चिल्लाईस  तोला बड़ मया हे बेटी के त जा घर छोड़ के , उहें रहिबे ।
   अतेक बछर होगे बिहा के आये ए घर मा । सास-ससुर, ननद,देवर , लइका बाला सबके तोरा ल करेंव। फेर मोर कोनो मान नइहे। सब निर्णय खुदेच लेथें ,कभू मोर अंतस के पीरा ल नि समझिन। बेटी हर बनेच करिस,अइसन जीवन साथी खोजिस जउन ओखर मन ल समझिस, जउन जिंदगी भर ओखर कदर करही , मया करही । सावित्री के माँ हर बड़बड़ा के रहिगे।
   रिश्ता के मरजाद रखे बर कतनो महतारी अपन मन ल मार के रहि जाथें। सावित्री के माँ हर कइसनहो करके तीजा आय त बेटी बर लुगरा खच्चित भेजवातिस। साल भर मन ल मार के रहि जाय फेर तीजा म मन नइ मानय। दू बछर होगे बाप के कलेजा न इ पिघलिस। माँ हर जब ले सुने रिहिस सावित्री सरवन के घर बेटी आय हे , ओखर खुशी के ठिकाना नइ रिहिस । नतनीन ल देखे के सउँख हर ओला अतेक हिम्मत दिस के ए तीजा म ओहर बेटी के घर जाय के मन बना लिस। घर म गोठियाय ले कोनो चिटपोट नइ करिन। भाई मन तको लुका-लुका बहिनी ल भेंटें जांय फेर बाप के आघू म बोले के कोनो हिम्मत ना करँय। मां हर सावित्री तिर अपन जाय के गोठ कहिस त सावित्री के बाबू जी हर धमकाइस - तैं उहाँ जाबे त मोर मरे मुख देखबे।  कोन जानी गौंटनिन के मन म का रिहिस। तीजा के लुगरा लेहे बर जाथंव कहिके रायपुर जाय बर निकलिस । सोलह श्रृंगार करके मन भर के समान बेटी दमाद, नतनिन बर बिसाइस अउ बेटी के घर गिस। कतेक बछर के बाँधे मया आँसू के धार बन के बोहाय लागिस। मन भर दुनो झन दुख सुख गोठियाइन। बेटी ल खुश देख के दाई के जी जुड़ा गे । लहुटती खानी रद्दा के बड़े तरिया तिर गाड़ी ल रुकवाइस । नौकर मन ल थिराय बर कहिके एती ओती पठो दिस। फेर चुप्पे तरिया म उतर के जल समाधि ले लिस । गाँव भर गोहार परगे। सावित्री के बाबू हर ओखर लहाश ल देख के मूर्छा खाके गिर गे। होश आवय तो छाती पीट-पीट रोवय पछतावय ।  काबर अतेक बड़ कदम उठाए ,मैं मूरख अपन रुतबा, रुपिया पइसा अउ उच्च जात के घमंड म अपन घर के सत्यानाश कर डारेंव। तैं ए उमर म
मोला अकेल्ला छोड़ के कइसे चल दे । तैं कहिते त अपन अहंकार ल छोड़ के महूं तोर संग सावित्री घर चल देतेंव..। जम्मो झन इही गोठियात रिहिन अब का फायदा पछताय के ओखर प्रान के चिरैया हर त उड़ागे।
    सावित्री के तो जइसे जान निकलगे,बड़ मुश्किल से सरवन हर ओला सँभालिस , लइका के मुँह ल देख के सँभलगे नइते उहू पगला जाय रहितिस । सावित्री के माँ के जाय ले कई बेर ओखर बाबूजी हर ओला देवाय भेजिस फेर सावित्री नइ गिस । ओखर नाती नतनिन ले ओला दूरिहा नइ करिस । उमन ममाघर आथे जाथें, ममा मामी घलो आथें। हर बछर तीजा म लुगरा आथे फेर सावित्री ओला छुवय नहीं। एकेच ठन लुगरा ल पहिर के तीजा के दिन फरहार करथे जेला देहे बर ओखर माँ हर अपन जान दे दिस । तीजा के ओ लुगरा म सावित्री हर अपन माँ ले भेंट करथे साल म एक घं । महतारी के ममता भरे छुअन, मया अउ दुलार भरगे हे ओ लुगरा मा, ओखर प्रान समा गये हे ओ तीजा के लुगरा मा ।</description><guid>721</guid><pubDate>22-Mar-2026 3:26:02 pm</pubDate></item><item><title>सीएम विष्णु देव साय बस्तर में देंगे राज्य की सबसे बड़े हेरिटेज मैराथन की सौगात</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=720</link><description> धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक /जयंत देवांगन, संयुक्त संचालक
रायपुर/ छत्तीसगढ़ सरकार राज्य में खेल, पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए बस्तर हेरिटेज मैराथन 2026 का आयोजन रविवार 22 मार्च को करने जा रही है। यह राज्य का अब तक का सबसे बड़ा रनिंग इवेंट होगा, जिसकी शुरुआत जगदलपुर के ऐतिहासिक लालबाग मैदान से होगी और समापन विश्वप्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात पर होगा। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस रूट पर दौड़ते हुए प्रतिभागियों को बस्तर की अद्भुत वादियों और सांस्कृतिक पहचान का अनूठा अनुभव मिलेगा।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने इस आयोजन को छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय बताते हुए कहा कि बस्तर हेरिटेज मैराथन केवल खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि राज्य की समृद्ध परंपरा, प्राकृतिक संपदा और जनभागीदारी का उत्सव है। उन्होंने कहा कि बस्तर दौड़ेगा, देश जुड़ेगा के संदेश के साथ यह आयोजन न केवल फिटनेस को बढ़ावा देगा, बल्कि बस्तर को राष्ट्रीय और अंतरर्राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर और अधिक मजबूती से स्थापित करेगा। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य ऐसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय युवाओं को अवसर देना, रोजगार सृजन को बढ़ावा देना और क्षेत्रीय विकास को गति देना है।
मैराथन में 42 किलोमीटर (फुल मैराथन), 21 किलोमीटर (हाफ मैराथन), 10 किलोमीटर और 5 किलोमीटर (फन रन) की श्रेणियां रखी गई हैं, ताकि हर आयु वर्ग और फिटनेस स्तर के लोग इसमें भाग ले सकें। प्रतिभागियों के लिए कुल 25 लाख रुपये की आकर्षक पुरस्कार राशि निर्धारित की गई है। पंजीकरण शुल्क मात्र 299 रुपये रखा गया है, जबकि बस्तर संभाग के सातों जिलों के प्रतिभागियों के लिए यह पूरी तरह निःशुल्क है, जिससे स्थानीय स्तर पर अधिकतम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
प्रतिभागियों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मैराथन मार्ग पर व्यापक व्यवस्थाएं की गई हैं। पूरे रूट पर नियमित अंतराल पर रिफ्रेशमेंट पॉइंट्स (आरपीएन) स्थापित किए जाएंगे, जहां एनर्जी ड्रिंक्स और पानी की उपलब्धता रहेगी। इसके अलावा मेडिकल सपोर्ट, इमरजेंसी सेवाएं और सुव्यवस्थित रूट मैनेजमेंट भी सुनिश्चित किया गया है ताकि प्रतिभागियों को सुरक्षित और सुगम अनुभव मिल सके। इस आयोजन को और यादगार बनाने के लिए प्रत्येक प्रतिभागी को फिनिशर मेडल, ई-सर्टिफिकेट और प्रोफेशनल रनिंग फोटोग्राफ्स प्रदान किए जाएंगे। साथ ही जुम्बा सेशन और लाइव डीजे जैसे आकर्षक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे, जिससे प्रतिभागियों में उत्साह और ऊर्जा बनी रहे।
रन फॉर नेचर, रन फॉर कल्चर (प्रकृति के लिए दौड़ो, संस्कृति के लिए दौड़ो) की थीम पर आधारित यह मैराथन बस्तर की प्राकृतिक धरोहर और जनजातीय संस्कृति को देशभर के सामने प्रस्तुत करने का एक सशक्त माध्यम बनेगी। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने देशभर के खिलाड़ियों, फिटनेस प्रेमियों और पर्यटकों से इस ऐतिहासिक आयोजन में भाग लेने की अपील करते हुए कहा कि यह अवसर न केवल दौड़ने का है, बल्कि बस्तर को करीब से जानने और उसकी विरासत को महसूस करने का भी है। इच्छुक प्रतिभागी
https://bastarheritage.run/registration
लिंक के माध्यम से या आधिकारिक पोस्टर में दिए गए क्यूआर कोड को स्कैन कर अपना पंजीकरण करा सकते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह आयोजन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के फिट इंडिया, एक भारत श्रेष्ठ भारत और देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के विजन से प्रेरित है। प्रधानमंत्री ने हमेशा भारत की सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने पर जोर दिया है। बस्तर हेरिटेज मैराथन उसी सोच को आगे बढ़ाने का एक प्रयास है, जहां खेल, संस्कृति और प्रकृति एक साथ जुड़ते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार बस्तर को देश के प्रमुख पर्यटन और स्पोर्ट्स डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस तरह के आयोजनों से न केवल युवाओं में फिटनेस के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। बस्तर के कारीगरों, कलाकारों और छोटे-छोटे व्यवसायों को भी इसका प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।
मुख्यमंत्री श्री साय ने देशभर के खिलाड़ियों, फिटनेस प्रेमियों और पर्यटकों से इस ऐतिहासिक आयोजन में भाग लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि वह देश के हर कोने से युवाओं और नागरिकों को आमंत्रित करते हैं कि वे बस्तर आएं, यहां की प्रकृति, संस्कृति और ऊर्जा को महसूस करें और इस ऐतिहासिक मैराथन का हिस्सा बनें।</description><guid>720</guid><pubDate>21-Mar-2026 1:43:51 pm</pubDate></item><item><title>रूठी हमसे क्यों गौरैया...</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=719</link><description>-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद) 
20 मार्च विश्व गौरैया दिवस पर एक बाल-सजल
रूठी हमसेक्यों गौरैया ।
निशदिन आती नहीं मड़ैया ।।
भूख-प्यास से व्याकुल हो क्या ।
कब से किया न ता ता थैया ।।
दाना लेकर आई हूँ मैं ।
पानी लेकर आते भैया ।।
मेरी छत पर नीड़ बनाना ।
वहाँ आम की शीतल छैया ।।
देखो पंखे से बच रहना ।
उड़ मत ,आना पैया-पैया ।।
मनभावन तुम खेल दिखाना ।
पानी में कर छप्पक-छैया ।।
बच्चों का मैं ध्यान रखूँगी ।
जैसे रखती मेरी मैया ।।

</description><guid>719</guid><pubDate>19-Mar-2026 12:18:40 am</pubDate></item><item><title>समस्या से होती है समाधान की शुरुआत</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=718</link><description>डॉ. नीरज गजेंद्र
अक्सर हम अपनी जिंदगी में आए संघर्षों को समस्या मान लेते हैं। जीवन में समस्याओं का आना स्वाभाविक है। लेकिन असली संकट तब पैदा होता है जब हम समस्या के साथ-साथ उसके समाधान से भी दूरी बना लेते हैं। हम समस्या से भागने लगते हैं। उसे टालने लगते हैं। या यह मान लेते हैं कि इसका कोई रास्ता नहीं है। दरअसल यही मानसिकता हमें कमजोर बनाती है।
भारतीय दर्शन और धर्मग्रंथों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने जीवन की हर समस्या को एक अवसर के रूप में देखने की दृष्टि दी है। वेद, पुराण और उपनिषद ये पूजा-पाठ के ग्रंथ नहीं हैं, यह हमारे मार्गदर्शक हैं। इनमें बार-बार यह संदेश मिलता है कि समस्या से डरे बिना ही उसके समाधान की दिशा में आगे बढ़ें।
सबसे प्रसिद्ध उदाहरण भगवद्गीता का है। जब महाभारत के युद्ध में अर्जुन अपने ही परिजनों और गुरुओं को सामने देखकर विचलित हो गए थे, तब उन्होंने अपने धनुष-बाण नीचे रख दिए। उनके सामने समस्या युद्ध नहीं नैतिक और मानसिक संकट थी। उस समय श्रीकृष्ण ने उन्हें भागने का नहीं, समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया। गीता का मूल संदेश यही है कि जीवन के संघर्षों से भागना समाधान नहीं है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि परिस्थितियां चाहे जितनी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। यह शिक्षा आज के आधुनिक जीवन में भी उतनी ही प्रासंगिक है। जब हम अपने दायित्वों से बचने लगते हैं, तब समस्या और बड़ी हो जाती है।
इसी तरह ऋग्वेद में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विचार मिलता है चरैवेति चरैवेति, अर्थात निरंतर चलते रहो। यह संदेश भौतिक यात्रा का नहीं, जीवन के संघर्षों में आगे बढ़ने का संकेत है। ऋग्वेद का यह भाव हमें बताता है कि ठहर जाना या हार मान लेना जीवन का मार्ग नहीं है। समस्या आए तो उससे सीखते हुए आगे बढ़ते रहना ही जीवन की सच्ची साधना है।
ये कथाएं हमें एक गहरी मनोवैज्ञानिक सच्चाई बताती है। अक्सर समस्या बाहर नहीं हमारे मन के भीतर होती है। हम अपनी शक्ति को भूल जाते हैं और यह मान लेते हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते। लेकिन जैसे ही हमें अपनी क्षमता का विश्वास मिलता है, समस्याएं छोटी लगने लगती हैं।
अगर आधुनिक जीवन की बात करें तो आज का मनुष्य तकनीक, सुविधा और संसाधनों के बावजूद मानसिक तनाव से घिरा हुआ है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि हम समस्याओं का सामना करने के बजाय उनसे बचने की आदत बना चुके हैं। सोशल मीडिया, मनोरंजन और भागदौड़ भरी जीवनशैली हमें कुछ समय के लिए समस्या से दूर तो कर देती है, लेकिन समाधान नहीं देती।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा हमें यह सिखाती है कि समस्या से भागना नहीं चाहिए, भीतर छिपे संदेश को समझना चाहिए। उपनिषद में कहा गया है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका भय और भ्रम है। जब मनुष्य अपने भीतर के डर को जीत लेता है, तब वह किसी भी चुनौती का सामना कर सकता है।
आज के युवा और समाज के लिए यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। अगर हम अपने व्यक्तिगत जीवन, समाज और राष्ट्र के स्तर पर देखें तो अधिकांश समस्याओं का समाधान हमारे पास ही मौजूद है। जरूरत सही दृष्टि और साहस की है।
आध्यात्म हमें यही सिखाता है कि जीवन में आने वाली हर चुनौती हमें मजबूत बनाने के लिए आती है। आधुनिकता हमें साधन देती है, लेकिन अध्यात्म हमें दिशा देता है। जब ये दोनों एक साथ चलते हैं, तभी जीवन संतुलित और सफल बनता है।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि समस्या से भागना समाधान नहीं है। असली साहस यह है कि हम उसका सामना करें, उससे सीखें और आगे बढ़ें। भारतीय संस्कृति का सार भी यही है कि जीवन के संघर्षों को स्वीकार कर उन्हें साधना में बदल देना। और शायद यही भारतीय दर्शन का सबसे बड़ा संदेश है समस्या जीवन का अंत नहीं, समाधान की शुरुआत होती है।</description><guid>718</guid><pubDate>16-Mar-2026 1:52:36 pm</pubDate></item><item><title>हर-हर के दिन आगे </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=717</link><description>-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद) 
छन्न पकैया छन्न पकैया, हर-हर के दिन आगे।
सुन्ना होगे गली चौक मन, घर मा सबो धँधागे।।
छन्न पकैया छन्न पकैया,
किसम-किसम के भाजी।
मन नइ भाय तेलहा-फुलहा, कढ़ी अमटहा खा जी।।
छन्न पकैया छन्न पकैया, स्वाद अनोखा घोरे।
नूनचरा लाई बरी संग, खाथन बासी बोरे।।
छन्न पकैया छन्न पकैया, तरिया नदी सुखावय।
चुचुवावत हे खरा पसीना, मुँह घलो चोपियावय।।
छन्न पकैया छन्न पकैया, नोहर होगे पानी।
चिट-चिट चिट-चिट जरत भोंभरा, तीपत हावय छानी।।</description><guid>717</guid><pubDate>15-Mar-2026 2:54:40 pm</pubDate></item><item><title>ओडिशा जा रहे हैं तो इतिहास और संस्कृति को उकेरती ये जुड़वा गुफाएं आपको रोमांचित कर सकती हैं.....</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=716</link><description>आलेख- प्रशांत शर्मा
कुछ समय पहले ओडिशा जाने का मौका मिला। पुरी की यह मेरी पहली यात्रा थी। यहां महाप्रभु जगन्नाथ के अद्भुत दर्शन ने मन को आनंदित कर दिया। काफी समय से इच्छा थी वहां जाने की, पर कोई ना कोर्ई अडंगा आ ही जाता था, कहते हैं ना भगवान का जब तक बुलावा नहीं आए, उनके दर्शन नहीं हो पाते।
ओडिशा में वैसे तो बहुत से दर्शनीय और पर्यटन स्थल हैं, लेकिन यदि आपकी इतिहास के पन्नों में झांकने में रुचि है, तो भुवनेश्वर के पास स्थित उदयगिरि और खंडगिरि की दो पहाडिय़ां आपको रोमांचित कर सकती हैं। इन गुफाओं को देखने के बाद इसके बारे में और जानने की जिज्ञासा हो गई। ये गुफाएं ओडीशा क्षेत्र में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रभाव को दर्शाती हैं। 
इसके इतिहास को जानने की जिज्ञासा ने पुराने रिकार्ड खंगालने पर मजबूर कर दिया। मिले आंकड़ों के अनुसार हाथीगुम्फा शिलालेख में इन गुफाओं का वर्णन कुमारी पर्वत के रूप में आता है। पहले कटक या कट्टाका गुफाओं के नाम से जानी जाने वाली उदयगिरि और खंडगिरि गुफाओं की खोज 19वीं शताब्दी में युवा ब्रिटिश अधिकारी एंड्रयू स्टर्लिंग ने की थी। बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इन गुफाओं की गणना कराई और इन वस्तुओं के आधार पर इनके अलग-अलग नाम रखे।
ऐसा कहा जाता है कि जैन भिक्षु घुमंतू जीवन व्यतीत करते थे। बारिश के मौसम में उनके निवास के लिए ही प्राचीन ओडिशा यानी कलिंग के नरेश खारावेला ने (209-170 ईसा पूर्व के बीच) इसका निर्माण कराया था। वे जैन धर्म को मानने वाले थे। इतिहास गवाह है कि अशोक सम्राट ने नरेश खारावेला को युद्ध में हरा दिया था। कलिंग विजय के बाद जब अशोक का शासन हुआ और राजा खारावेला की सभी संपत्तियों पर उनका अधिकार हो गया, तो धीरे-धीरे जैन धर्म के स्थान पर बौद्ध धर्म का प्रभाव बढऩे लगा।
ये दोनों गुफाएं लगभग दो सौ मीटर के अंतर पर हैं और एक दूसरे के सामने हैं। उदयगिरि में गुफाओं की संख्या है 18 और खंडगिरि में 15। गुफाओं के निर्माण के दौरान इस बात का ख्याल रखा गया है कि सूर्य की रौशनी प्रत्येक कक्ष के दरवाजे तक पहुंचे और यहां पर उजाला रहे। वहीं चांदनी रात में भी गुफाओं के अंदर तक रौशनी देखी जा सकती है। प्रत्येक गुफा में एक छोटे नहर के माध्यम से जल का स्रोत आता था; प्रत्येक गुफा में संचार के लिए छेद थे, दीपक जलाने के लिए जगह थी और फर्श थोड़ा झुका हुआ था ताकि वह सिरहाने का काम कर सके। इनमें से कई गुफाओं में एक ऊपरी कक्ष था, जहाँ माना जाता है कि भिक्षु गहन ध्यान में लीन होते थे।
उदयगिरि गुफाओं की बात करें तो सीढ़ीनुमा पत्थरों पर चलते-चलते 18 गुफाओं के दर्शन हो जाते हैं। सभी गुफाएं एक दूसरे से काफी अलग हैं और सबका अपना अलग महत्व और नाम है। गुफा संख्या 1, रानीगुम्फा यानी रानी की गुफा है जो दो मंजिला है। यह गुफा ध्वनि संतुलन की विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध है और समझा जाता है कि इसका प्रयोग मंत्रोच्चार के लिए और नाट्य प्रदर्शनों के लिए किया जाता है। यहां पर रथ पर सवार सूर्य देवता की भी मूर्ति है। नीचे वाली मंजिल के दायें भाग में एक कक्ष है जिसके तीन प्रवेश स्थल हैं और खंभों वाला बरामदा है। प्रवेश स्थल पर दो संतरियों की मूर्तियों सहित इसमें कुछ सुंदर वास्तुकला के दृश्य हैं।
केन्द्रीय भाग में चार कक्ष हैं। यहां पर नरेश के विजय अभियान और उनकी यात्रा को दर्शाया गया है। यहां पर रक्षकों के कक्ष हैं जिन्हें पहाड़ी से गिरते झरनें, फलों से लदे वृक्षों, वन्य जीवों, बानरों और कमल-ताल में अठखेलिया करते हाथियों की मूर्तियों से सजाया गया है। ऊपर की मंजिल में छह कक्ष हैं।
 गुफा संख्या दो बाजाघर गुम्फा कहलाती है, जहां सामने दो विशाल स्तंभ हैं और अंदर एक और स्तंभ है। गुफा संख्या तीन को छोटा हाथी गुम्फा कहते हैं। गुफाएं संख्या पांच, छह, सात और आठ जय-विजय गुम्फा, पनासा गुम्फा, ठकुरानी गुम्फा और पातालपुरी गुम्फा के नाम से प्रसिद्ध है। पांचवीं और सातवीं गुम्फाएं दो मंजिला हैं। इनमें चित्रकारी और पक्षियों आदि के चित्र हैं। गुफा संख्या नौ, मंचापुरी और स्वर्गपुरी गुफाएं हैं, वे भी दो मंजिला हैं । गुफा संख्या दस गणेश गुम्फा है। जम्बेश्वर गुम्फा की संख्या 11 है। गुफा संख्या 12, कम ऊँचाई वाली और दो दरवाजों वाली व्याघ्र गुम्फा है। गुफा संख्या 13 सर्प गुम्फा है, जो बहतु ही छोटी है। अन्य गुफाओं में गुफा संख्या 14- हाथी गुम्फा, गुफा संख्या 15-धनागार गुम्फा, गुफा संख्या 16- हरिदास गुम्फा, गुफा संख्या 17, जगम्मठ गुम्फा और गुफा संख्या 18- रोसई गुम्फा है।
वहीं खंडगिरि में गुफा संख्या 1 और 2 को तातोवा गुम्फा कहा जाता है। दोनों गुफाओं के प्रवेश द्वार पर दो द्वारपालों की आकृतियाँ, साथ ही दो शेरों और दो बैलों की आकृतियाँ बनी हुई हैं। गुफा संख्या 3 से 6 को अनंत गुम्फा, तेंतुली गुम्फा, खंडगिरि गुम्फा और ध्यान गुम्फा के नाम से जाना जाता है। गुफा संख्या 7 को नवमुनि गुम्फा कहा जाता है, जिसमें शासन देवियों और जैन धर्म के नौ तीर्थंकरों की अद्भुत मूर्तियां हैं। ऐसा माना जाता है कि ये मूर्तियां 11वीं शताब्दी में कलिंग में सोमवंशी राजवंश के शासनकाल के दौरान बनाई गई थीं। गुफा संख्या 8, जिसकी कोठरियों की दीवारों पर 25 जैन तीर्थंकरों के चित्र अंकित हैं, को भारभुजी गुम्फा कहा जाता है। तृसूला गुम्फा, अम्भिका गुम्फा और ललतेंदु केशरी गुम्फा को क्रमश: 9, 10 और 11 गुफाओं के रूप में क्रमांकित किया गया है। गुफा संख्या 12, 13 और 15 को कोई नाम नहीं दिया गया है।
 इन गुफाओं के कक्ष तक पहुंचते-पहुंचते और इन्हें करीब से जानते -जानते कब पूरा दिन गुजर गया, पता ही नहीं चला। लेकिन इसे और जानने की उत्सुकता पूरे दिन भर बनी रही। उत्कृष्ट शिल्प कौशल और प्राचीन इतिहास को दर्शाने वाले ब्राह्मी भाषा में अंकित शिलालेखों से परिपूर्ण यह स्थान इतिहास प्रेमियों के लिए एक खजाना है। यदि आप उदयगिरि और खंडगिरि गुफाओं की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो यहां पर्याप्त समय लेकर जाइये। इसके हर कोने का अपना इतिहास है, असीम सुकून और शांति है।</description><guid>716</guid><pubDate>14-Mar-2026 3:05:31 pm</pubDate></item><item><title>महिला दिवस </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=715</link><description>-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद) 
 सुनो! आज हमारी संस्था महिला दिवस पर कुछ विशिष्ट सफल महिलाओं को सम्मानित करने जा रही है तो आज मुझे देर हो जाएगी, तुम खाना खा लेना  दिया ने अपने पति अमन से कहा।
 हूँजरूर , पर यह बताओ महिला दिवस क्या प्रबुद्ध व विशिष्ट महिलाओं के लिए ही है या सबके लिए?  अमन ने सफाई करती रमिया और खाना बनाती केतकी की ओर इशारा करते हुए पूछा।
 ओह ! मैंने यह क्यों नहीं सोचा ? दिया ने अपने पर्स से पाँच-पाँच सौ के नोट निकाल कर रमिया, केतकी को देते हुए कहा  आप दोनों शाम को अपने परिवार के साथ कुछ खा लेना और हाँ शाम की छुट्टी ..महिला दिवस की शुभकामनाएं । दोनों के खिले चेहरे देखकर दिया को महिला दिवस की सार्थकता अब महसूस हुई।</description><guid>715</guid><pubDate>08-Mar-2026 2:12:07 pm</pubDate></item><item><title>देखभाल से जुड़ी अर्थव्यवस्था: महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास की संरचनात्मक बुनियाद</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=714</link><description> आलेख- अन्नपूर्णा देवी, केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हुए, हम न सिर्फ भारत की महिलाओं की उपलब्धियों, बल्कि उनकी दृढ़ता, पालन-पोषणकारी, दृढ़ निश्चयी और परिवर्तनकारी अदम्य भावनाओं का भी सम्मान करते हैं। महिला दिवस महज कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं है, बल्कि यह इस बात की पुष्टि है कि भारत की विकास यात्रा में महिलाओं की भूमिका परिधि में नहीं, बल्कि केंद्र में रही है। हमारी महिलाएँ केवल संस्थानों और बोर्डरूम तक सीमित नहीं हैं; वे आंगनों, खेतों, प्रयोगशालाओं, कक्षाओं, सुरक्षा बलों और प्रशासनिक तंत्र में नेतृत्व का एक नया अध्याय रच रही हैं।
उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) के क्षेत्रों में वे नई पहचान गढ़ रही हैं। रक्षा सेवाओं में महिला अधिकारी विशिष्ट सेवाएँ दे रही हैं-लड़ाकू विमान उड़ाने से लेकर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त करने तक, वे नए क्षितिज का विस्तार कर रही हैं।
समूचे ग्रामीण भारत में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी करोड़ों महिलाएँ स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बना रही हैं। वे आर्थिक स्वतन्त्रता की नींव पर सामूहिक समृद्धि का सृजन कर रही हैं। पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व वैश्विक स्तर पर नए मानक स्थापित कर रहा है। यह साबित करता है कि जमीनी स्तर का नेतृत्व समावेशी और प्रभावशाली, दोनों ही है। वैश्विक खेल मंच पर, उत्कृष्टता और दृढ़ता का प्रदर्शन करते हुए भारतीय महिलाएँ लगातार देश को गौरवान्वित कर रही हैं।
इतिहास साक्षी है कि भारतीय नारी का सामर्थ्य कोई नई बात नहीं है। रानी लक्ष्मीबाई ने निडर होकर अपने देश की रक्षा की। सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देकर बेटियों की शिक्षा में अग्रणी भूमिका निभाई। देवी अहिल्याबाई होलकर ने बुद्धिमत्ता एवं करुणा से जन कल्याण को शासन के केन्द्र में रखा। नीतिगत सुधार और दृढ़ संकल्प की उनकी विरासत आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही है।
आज, यह अमिट विरासत सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करने के निरंतर प्रयासों में परिलक्षित होती है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में, महिलाओं को केवल लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि विकास की अग्रदूत के रूप में मान्यता दी गई है। महिला-नेतृत्व वाला विकास आज एक सशक्त नीतिगत-दृष्टि है, जो बजट, कार्यक्रमों और संस्थागत सुधारों में परिलक्षित होती है। महिला दिवस हमें याद दिलाता है कि उत्सव को बदलाव के रूप में साकार करना होगा। प्रत्येक महिला- चाहे वह किसी निगम का नेतृत्व करती हो, वर्दी में सेवा करती हो, खेत में पसीना बहाती हो, छोटा उद्यम चलाती हो या घर पर अपने परिवार का भरण-पोषण करती हो, मोदी सरकार उसका अभिनंदन करती है।
हमारी प्राचीन सभ्यतागत परंपरा में नारी शक्ति का सम्मान केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, यह हमारे अस्तित्व का मूल आधार है। वह परंपरा की धरोहर को सहेजती है और बदलाव की बयार को नेतृत्व देती है। उसके व्यक्तित्व में करुणा का सागर भी है और साहस का अडिग शिखर भी; वह जहाँ एक ओर नैतिक मूल्यों की मर्यादा में बंधी है, वहीं दूसरी ओर अपने सपनों को उड़ान देने के लिए उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी है। बहुआयामी भूमिकाओं को एक साथ साधने का उसका कौशल सदियों से भारतीय नारी की जीवन-शैली का अभिन्न हिस्सा रहा है। वह अपनी जिम्मेदारियों को सहज भाव से ओढ़ती है, धैर्य के साथ परिवार की नींव को सींचती है और अपने 'शांत नेतृत्व' से समाज को एक नई दिशा और शक्ति प्रदान करती है।
समाज की हर दृश्यमान उपलब्धि के पीछे एक आधारशक्ति अनवरत कार्य करती है-'देखभाल की अर्थव्यवस्था' (Care Economy)। यह वह मौन ऊर्जा है जो भारत के अस्तित्व को हर पल संबल प्रदान करती है। यह उस माँ का समर्पण है, जो सूर्योदय से पूर्व अपनों के लिए चूल्हा सुलगाती है और फिर जीविका की चुनौतियों की ओर निकल पड़ती है। यह उस पत्नी की अटूट निष्ठा है, जो कठिन से कठिन समय में भी परिवार की नींव को दरकने नहीं देती। यह उस बेटी का निःस्वार्थ भाव है, जो दिनभर की थकान के बाद भी रात के पहर अपने वृद्ध माता-पिता के सिरहाने बैठती है। यह शक्ति किसी यश या प्रशंसा की आकांक्षी नहीं है; वह तो बस कर्तव्य की उस अविरल धारा की तरह है, जो बिना शोर मचाए सृजन करती रहती है।
ऐतिहासिक रूप से, महिलाओं के योगदान का एक विशाल हिस्सा- विशेषकर अवैतनिक देखभाल (Unpaid Care), अनौपचारिक श्रम और सामुदायिक सेवा- पारंपरिक आर्थिक गणनाओं की परिधि से बाहर रहा है। किंतु इस हकीकत को पहचानते हुए,मोदी सरकार ने हमेशा देखभाल के इस अदृश्य पहलू' को कम करने, उसे सामाजिक मान्यता देने और उसके न्यायसंगत पुनर्वितरण पर बल दिया है। सरकार का दृष्टिकोण देखभाल से जुड़ी सेवाओं को पेशेवर स्वरूप प्रदान कर उन्हें समावेशी विकास के एक नए 'इंजन' के रूप में रूपांतरित करना है।
भारत में महिला श्रम शक्ति सहभागिता दर (FLFPR) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है। यह आंकड़ा भारतीय महिलाओं की बढ़ती आकांक्षाओं और आर्थिक गतिविधियों में उनके बढ़ते प्रभुत्व का सूचक है। सवैतनिक कार्यों में महिलाओं की यह भागीदारी न केवल घरेलू समृद्धि का आधार बनती है, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाती है।
आर्थिक सर्वेक्षण इस वास्तविकता को रेखांकित करता है कि यदि हम 'अवैतनिक देखभाल' के बोझ को कम कर सकें और इन सेवाओं को एक व्यावसायिक स्वरूप प्रदान करें, तो महिला रोजगार के परिदृश्य में एक क्रांतिकारी बदलाव आएगा। भारतीय 'केयर इकोनॉमी' वर्तमान में ही लाखों लोगों की आजीविका का संबल है, और आने वाले दशक में इसमें रोजगार सृजन की अपार संभावनाएँ हैं।
यही कारण है कि केंद्रीय बजट 2026-27 में 'केयर इकोनॉमी' को सुदृढ़ करने पर विशेष बल दिया गया है। 'महिलाओं के नेतृत्व में विकास' (Women-led Development) के प्रति हमारी अटूट प्रतिबद्धता ऐतिहासिक 'जेंडर बजट' में स्पष्ट झलकती है, जिसका आवंटन अब तक के उच्चतम स्तर-5 लाख करोड़ रुपये से अधिक पर पहुँच गया है। सरकार के समग्र दृष्टिकोण के अंतर्गत, हम 1.5 लाख देखभालकर्ताओं के कौशल विकास में निवेश कर रहे हैं, कामकाजी महिला छात्रावासों का विस्तार कर रहे हैं और आंगनवाड़ी केंद्रों को आधुनिक बनाकर प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल सुनिश्चित कर रहे हैं। साथ ही, स्वास्थ्य एवं पोषण प्रणालियों के समन्वय को भी सशक्त किया जा रहा है। ये सभी प्रयास एक स्पष्ट राजनीतिक और नैतिक प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं- जब महिलाओं को आवश्यक सहयोग और मंच मिलता है, तो संपूर्ण अर्थव्यवस्था की गति तीव्र हो जाती है।

सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थिति संहिता जैसे वैधानिक ढांचे शिशु देखभाल केंद्रों और श्रमिक कल्याण के प्रावधानों को सुदृढ़ करते हैं। ये सुधार एक गहरे सिद्धांत को प्रतिपादित करते हैं- शिशु देखभाल सहायता कोई गौण विकल्प या सुविधा मात्र नहीं, बल्कि यह आर्थिक न्याय का एक अनिवार्य संरचनात्मक आधार है।
हमारी सरकार महिलाओं और बच्चों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के केन्द्र में रखती है, जो देश की कुल जनसंख्या का 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। अतः उनका सर्वांगीण कल्याण एक अनिवार्य रणनीतिक आवश्यकता है। वर्ष 2050 तक वरिष्ठ नागरिकों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। इससे परिवार के भीतर भी देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारियाँ बढ़ेंगी। साथ ही, करोड़ों बच्चों को उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक वर्षों के दौरान- जब सीखने की क्षमता और भविष्य की उत्पादकता की नींव रखी जाती है- व्यवस्थित प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा, सुदृढ़ पोषण और स्वास्थ्य सहायता की नितांत आवश्यकता होगी।
तेजी से होते शहरीकरण, प्रवासन और एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने हमारी पारंपरिक सामाजिक सहायता प्रणालियों को बुनियादी रूप से बदल दिया है। अनौपचारिक ढांचों पर बढ़ते दबाव के कारण अब सुलभ, किफायती और गुणवत्तापूर्ण शिशु देखभाल व पारिवारिक सेवाओं की आवश्यकता अनिवार्य होती जा रही है। संगठित और सामुदायिक सेवाओं की यह मांग केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों (Tier-2  3 Cities) और ग्रामीण जनपदों में भी तीव्रता से उभरेगी।
देखभाल की अर्थव्यवस्था में निवेश एक साथ कई राष्ट्रीय लक्ष्यों को मजबूत करता है। इससे महिला श्रमशक्ति की भागीदारी बढ़ती है, बाल विकास के परिणाम सुधरते हैं, बुजुर्गों का कल्याण सुनिश्चित होता है और गरिमापूर्ण रोजगार के नए अवसर सृजित होते हैं। देखभाल प्रणालियों के संस्थागत और पेशेवर होने से महिलाएँ सशक्त होती हैं, परिवारों को स्थिरता मिलती है और संपूर्ण अर्थव्यवस्था को गति प्राप्त होती है।
जैसे-जैसे भारत 'अमृतकाल' से 'विकसित भारत @2047' की ओर बढ़ रहा है, हम इस परिवर्तनकारी सत्य को स्वीकार कर रहे हैं कि सामाजिक बुनियाद को सुदृढ़ किए बिना विकास को टिकाऊ नहीं बनाया जा सकता-और केयर इकॉनमी ही वह अनिवार्य आधार है।
इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर, हम देखभाल के अदृश्य श्रम को सम्मान देने और उसे संस्थागत रूप से सशक्त करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं। 'महिलाओं के नेतृत्व वाले विकसित भारत' का हमारा दृष्टिकोण केवल बोर्डरूम एवं संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सशक्त देखभाल प्रणालियों पर आधारित है, जो महिलाओं के विकल्पों, गरिमा और आर्थिक सामर्थ्य का विस्तार करती हैं।
</description><guid>714</guid><pubDate>07-Mar-2026 7:57:18 pm</pubDate></item><item><title>महतारी गौरव वर्ष : महिला सशक्तिकरण के नवयुग की ओर अग्रसर छत्तीसगढ़</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=713</link><description> विशेष लेख : डॉ. दानेश्वरी संभाकर उप संचालक, जनसंपर्क विभाग
रायपुर। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ आज महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दौर से गुजर रहा है। मातृशक्ति के सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राज्य सरकार ने इस वर्ष को महतारी गौरव वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की है। यह पहल केवल एक औपचारिक घोषणा नहीं है, बल्कि महिलाओं को राज्य की विकास यात्रा के केंद्र में स्थापित करने का सशक्त संकल्प है।
विश्वास से निर्माण और अब गौरव की ओर
मुख्यमंत्री श्री साय ने अपने कार्यकाल के पहले वर्ष को विश्वास वर्ष के रूप में शासन-प्रशासन और जनता के बीच भरोसे की पुनर्स्थापना को समर्पित किया। इसके बाद दूसरे वर्ष को भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में अटल निर्माण वर्ष के रूप में मनाते हुए अधोसंरचना विकास और जनकल्याणकारी योजनाओं को नई गति दी गई। अब तीसरा वर्ष महतारी गौरव वर्ष के रूप में माताओं और बहनों को समर्पित किया गया है, जिसमें राज्य की अधिकांश योजनाओं का केंद्रबिंदु महिलाएं होंगी। यह क्रम सरकार की संवेदनशील और समावेशी विकास की सोच को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
महतारी वंदन योजना : आत्मसम्मान और आर्थिक सुरक्षा का आधार
छत्तीसगढ़ सरकार की महतारी वंदन योजना आज महिला सशक्तिकरण का मजबूत स्तंभ बन चुकी है। इस योजना के तहत प्रदेश की लगभग 70 लाख विवाहित महिलाओं को प्रतिमाह 1,000 रुपये की सहायता सीधे उनके बैंक खातों में प्रदान की जा रही है। अब तक 15 हजार 595 करोड़ रुपये से अधिक की राशि डीबीटी के माध्यम से महिलाओं को दी जा चुकी है। हाल ही में 24वीं किस्त के रूप में 68 लाख से अधिक महिलाओं को 641 करोड़ रुपये की राशि प्रदान की गई।यह नियमित आर्थिक सहयोग महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ ही उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बना रहा है। कई महिलाएं इस राशि को केवल घरेलू खर्च तक सीमित न रखकर स्वरोजगार और छोटे व्यवसायों में निवेश कर रही हैं।
संघर्ष से स्वावलंबन तक : रोहनी पटेल की प्रेरक कहानी
बालोद जिले के ग्राम खैरडीह की श्रीमती रोहनी पटेल इसका एक प्रेरणादायक उदाहरण हैं। पति की असमय मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। घर में वृद्ध सास की देखभाल और कॉलेज में पढ़ रहे दो बच्चों की पढ़ाई की चिंता उनके लिए बड़ी चुनौती थी।ऐसे कठिन समय में महतारी वंदन योजना उनके लिए उम्मीद की किरण बनकर आई। योजना से मिलने वाली राशि को उन्होंने सावधानीपूर्वक बचत कर अपने खेत में सब्जी उत्पादन का कार्य शुरू किया। बीज, खाद और कृषि सामग्री की व्यवस्था कर उन्होंने पूरी मेहनत से खेती की।
आज श्रीमती रोहनी पटेल अपने खेत में उगाई गई ताजी सब्जियों को स्थानीय बाजारों में बेचकर नियमित आय अर्जित कर रही हैं। इस आय से वे अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर रही हैं और बच्चों की पढ़ाई भी निर्बाध रूप से जारी है। उनका यह प्रयास गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन चुका है।
बिहान से बदली जिंदगी : लखपति दीदी बनीं श्रीमती माहेश्वरी यादव
बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के ग्राम कोरदा की श्रीमती माहेश्वरी यादव भी महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरक मिसाल हैं। पहले उनका जीवन सामान्य गृहिणी की तरह घर-परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित था। लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन बिहान से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया।
समूह के सहयोग और परिवार के समर्थन से उन्होंने गांव में एक छोटी किराना दुकान शुरू की। अपनी मेहनत और बेहतर प्रबंधन के बल पर यह दुकान धीरे-धीरे गांव में भरोसेमंद केंद्र बन गई। आज इस दुकान से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 1 से 1.5 लाख रुपये की आय हो रही है और वे लखपति दीदी बन चुकी हैं। इससे उनके बच्चों की शिक्षा और परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
आधुनिक तकनीक से नई पहचान : ड्रोन दीदी सुश्री सीमा वर्मा
बिलासपुर जिले के मस्तूरी क्षेत्र की सुश्री सीमा वर्मा ने भी यह साबित किया है कि अवसर और प्रशिक्षण मिलने पर महिलाएं आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में भी नई पहचान बना सकती हैं।
स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने पहले मशरूम उत्पादन का कार्य शुरू किया और बाद में ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। शासन की सहायता से उन्हें ड्रोन सेट, जनरेटर और ई-वाहन उपलब्ध कराया गया।
आज सीमा वर्मा किसानों के खेतों में ड्रोन के माध्यम से कीटनाशक छिड़काव कर रही हैं और इस कार्य से उन्हें सम्मानजनक आय प्राप्त हो रही है। गांव में लोग उन्हें स्नेहपूर्वक ड्रोन दीदी के नाम से जानते हैं।
बजट में महिला कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता
राज्य सरकार ने महिला एवं बाल विकास विभाग के लिए 8 हजार 245 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है।
आंगनबाड़ी एवं पोषण योजनाओं के लिए 2 हजार 320 करोड़ रुपये, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के लिए 120 करोड़ रुपये, मिशन वात्सल्य के लिए 80 करोड़ रुपये तथा रानी दुर्गावती योजना के लिए 15 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
इसके अतिरिक्त 750 नए आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्माण के लिए 42 करोड़ रुपये और 250 महतारी सदनों के निर्माण के लिए 75 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। यह बजटीय प्रावधान महिलाओं और बच्चों के समग्र विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
सुरक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा की सुदृढ़ व्यवस्था
महिला सुरक्षा के क्षेत्र में भी राज्य ने प्रभावी तंत्र विकसित किया है। वन स्टॉप सेंटर, 181 महिला हेल्पलाइन और डायल 112 के माध्यम से संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। सुखद सहारा योजना के अंतर्गत 2 लाख 18 हजार से अधिक विधवा एवं परित्यक्ता महिलाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है।
स्वावलंबन से नेतृत्व तक
प्रदेश में 42 हजार से अधिक महिला स्व-सहायता समूहों को रियायती ऋण प्रदान कर आर्थिक रूप से सशक्त बनाया गया है। रेडी-टू-ईट कार्य महिला समूहों को सौंपे जाने से उन्हें स्थायी आय का स्रोत मिला है। इसके साथ ही डिजिटल सखी, दीदी ई-रिक्शा, सिलाई मशीन सहायता, मिनीमाता महतारी जतन योजना और लखपति दीदी जैसी पहलें महिलाओं को नए आजीविका अवसर प्रदान कर रही हैं।
महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के अनुसार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें सुरक्षित तथा सम्मानजनक वातावरण प्रदान करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
विकसित छत्तीसगढ़ की सशक्त आधारशिला
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य के अनुरूप छत्तीसगढ़ अंजोर विजन 2047 के माध्यम से राज्य को समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को अनिवार्य तत्व माना गया है।
महतारी गौरव वर्ष केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का व्यापक अभियान है। यह वर्ष छत्तीसगढ़ में मातृशक्ति के सम्मान, आत्मविश्वास और नेतृत्व को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संकल्प लेकर आया है। आज प्रदेश की महिलाएं आत्मनिर्भरता, नवाचार और नेतृत्व के साथ विकास की नई कहानी लिख रही हैं। यही सशक्त मातृशक्ति विकसित और समृद्ध छत्तीसगढ़ की सबसे मजबूत आधारशिला बनेगी।</description><guid>713</guid><pubDate>07-Mar-2026 5:00:24 pm</pubDate></item><item><title>67 साल पहले रिलीज हुआ था होली का ये कालजयी गाना ....अरे जा रे हट नटखट</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=712</link><description>-प्रशांत शर्मा(वरिष्ठ पत्रकार)
बॉलीवुड में पहले होली पर खूब गाने बना करते थे। आजकल ये ट्रेंड कम होता जा रहा है। आज यदि होली पर गाने बनते भी हैेंं तो यादगार नहीं रह पाते। पुराने होली गानों में एक गाना- अरे जा रे हट नटखट ..... आज भी खूब बजता है। यकीन मानिये 67 साल पहले इसे रिलीज किया गया था और आज भी इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है।
साल 1959 में निर्माता-निर्देशक वी. शांताराम ने एक फिल्म बनाई थी 'नवरंग' , जिसमें कथानक के अनुसार काफी गाने शामिल किए गए थे। उन्हीं में से एक गाना था- अरे जा रे हट नटखट....। यह सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि पर्दे पर रची गई एक ऐसी कलाकारी है जिसे आज के दौर की तकनीक और बड़े बजट वाली फिल्में भी मात नहीं दे सकतीं हैं। सी. रामचंद्र के संगीत निर्देशन में तैयार इस गाने में आशा भोंसले और महेंद्र कपूर ने अपनी आवाजें दीं। फिल्म की नायिका संध्या , जो वी. शांताराम की पत्नी थीं , ने गाने में नायक और नायिका , दोनों का किरदार निभाया और ऐसे मदमस्त होकर क्लासिकल डांस किया कि लोग बस देखते ही रह गए। गाने में संध्या ने एक पल में राधा का नखरा दिखाया और अगले ही पल कृष्ण की नटखट लीला भी दिखा दी।
निर्देशक शांताराम चाहते थे कि संध्या एक असली हाथी की चाल और उसकी थाप के साथ तालमेल बिठाकर डांस करें। यह काफी जोखिम भरा था। पर एक्ट्रेस संध्या शांताराम ने इसका भी तोड़ निकाल लिया। उन्होंने इस गाने की शूटिंग से पहले कई हफ्तों तक उस हाथी के साथ वक्त बिताया। वे खुद उसे खाना खिलातीं, पानी पिलातीं और घंटों उससे बातें करतीं। जब हाथी उन्हें अपना दोस्त समझने लगा और उनके इशारों को पहचानने लगा, तब जाकर कैमरे के सामने उसे लाया और इस तरह से एक कालजयी गाना बन गया।
अरे जा रे हट नटखट मुख्य रूप से राग भैरवी पर आधारित है, जिसमें कोमल स्वरों (रे, ग, ध, नी) का प्रयोग किया गया है। संगीतकार सी. रामचंद्र द्वारा रचित इस गीत में शास्त्रीय रागदारी के साथ-साथ गुजराती लोक संगीत और लोक धुनों का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। गाने की शुरुआत में जो बोल हैं - अटक-अटक झटपट पनघट पर....संगीतकार सी. .रामचंद्र ने खुद गाया था। उन्होंने चितलकर के नाम से हिन्दी फिल्मों में काफी गाने गाए हैं।</description><guid>712</guid><pubDate>04-Mar-2026 7:46:37 pm</pubDate></item><item><title>रंग ही नहीं इस होली संगत भी बदलें... और मूल्यवान बनें</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=711</link><description>-डॉ. नीरज गजेंद्र
सब्जी तौलते समय तराजू पर एक मक्खी बैठ जाए तो एक पैसे का भी अंतर मुश्किल से पड़ता है। वही मक्खी यदि सोना तौलते समय बैठ जाए तो हजारों रुपए का अंतर बन जाता है। मक्खी वही, वजन वही, तौलने का पैमाना भी वही लेकिन संदर्भ और मूल्य बदल जाता है। जीवन भी ठीक ऐसा ही तराजू है। हम कहां बैठे हैं, किसके साथ बैठते हैं, किन विचारों के बीच बैठते हैं, हमारा मूल्य उसी आधार पर तय होने लगता है। यह बात धर्म, अध्यात्म और आधुनिकता तीनों कसौटियों पर परखी जाए तो और स्पष्ट दिखाई देती है।
भारतीय चिंतन में सत्संग का विशेष महत्व बताया गया। रामायण में श्रीराम का वनवास श्रेष्ठ संगति की कथा का श्रेष्ठ उदाहरण है। निषादराज, शबरी, हनुमान इन सबके साथ जुड़कर धर्म का आदर्श और उज्ज्वल हुआ। दूसरी ओर रावण जैसा विद्वान भी कुसंगति और अहंकार के कारण पतन की ओर बढ़ा। धर्म यह नहीं कहता कि मनुष्य जन्म से महान या तुच्छ बनता है। धर्म कहता है कि संगत से स्वभाव ढलता है, स्वभाव से कर्म बनते हैं, कर्म से भाग्य। होली का पर्व भी इसी सच्चाई की याद दिलाता है। होलिका दहन की कथा में प्रहलाद की भक्ति और सत्य के साथ संगति ने उसे अग्नि में भी सुरक्षित रखा। अर्थात जब जीवन का तराजू हमें परखे, तब यह देखा जाएगा कि हम किसके साथ खड़े हैं।
वास्तव में अध्यात्म भीतर की यात्रा सिखाता है। मन ही असली तराजू है। जिस विचार के साथ हम बैठते हैं, वही हमारे भीतर का मूल्य तय करता है। यदि मन नकारात्मक लोगों, ईर्ष्या, तुलना और शिकायतों के साथ बैठता है, तो आत्मा का मूल्य धीरे-धीरे घटने लगता है। लेकिन जब मन सकारात्मकता, ध्यान, सेवा और सृजन के साथ बैठता है, तब वही व्यक्ति भीतर से सोना बन जाता है। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं से कहा था कि अपने आसपास ऐसे लोगों को रखो जो तुम्हें ऊंचा उठाएं। आज हम जिन पुस्तकों को पढ़ते हैं, जिन वीडियो को देखते हैं, जिन पोस्टों को साझा करते हैं, वे सब हमारी संगति का हिस्सा बन चुके हैं। यदि हमारी डिजिटल संगति विषाक्त हो, तो मन का तराजू भी दूषित हो जाएगा। इसलिए अध्यात्म हमें सजग रहने की शिक्षा देता है।
आधुनिक युग में नेटवर्किंग और ब्रांड वैल्यू की चर्चा होती है। कॉर्पोरेट दुनिया में यह स्वीकार किया गया सिद्धांत है कि व्यक्ति की पहचान उसके सर्कल से बनती है। एक स्टार्टअप यदि श्रेष्ठ मेंटर्स और दूरदर्शी साथियों के साथ जुड़ता है, तो उसका मूल्यांकन अचानक कई गुना बढ़ जाता है। यही सिद्धांत व्यक्तिगत जीवन में भी लागू होता है। आज की पीढ़ी सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स की संख्या से मूल्य मापती है। परंतु असली मूल्य फॉलोअर्स से नहीं, फॉलो करने योग्य आदर्शों से बनता है। यदि युवा ऐसे लोगों के साथ बैठते हैं जो मेहनत, अनुशासन और नैतिकता का सम्मान करते हैं, तो उनका भविष्य स्वर्णिम बन सकता है। आधुनिकता यह नहीं सिखाती कि परंपरा छोड़ दो। आधुनिकता यह सिखाती है कि चयन बुद्धिमानी से करो।
होली रंगों का उत्सव है। रंग मिलते हैं तो नया रंग बनता है। यदि हम अच्छे रंगों के साथ मिलेंगे तो जीवन में उजास बढ़ेगा। इस रंगोत्सव पर नई पीढ़ी के लिए संदेश स्पष्ट रहे कि अपनी संगति को सजगता से चुनो। अपने मित्रों को देखकर अपने भविष्य का अनुमान लगाओ। अपने विचारों की गुणवत्ता पर ध्यान दो। ऐसे लोगों के साथ बैठो जो तुम्हें प्रेरित करें, न कि भटकाएं। मक्खी का वजन छोटा रहा, पर संदर्भ बड़ा है। हम स्वयं को हल्का न समझें। हम कहां बैठते हैं, यह तय करेगा कि हमारा मूल्य सब्जी या सोने में किसके जितना आंका जाएगा। इस होली पर रंग न बदलें, संगत भी बदलें। चेहरे पर ही गुलाल न लगाएं, मन में भी सद्भाव और विवेक का रंग भी भरें। रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।</description><guid>711</guid><pubDate>02-Mar-2026 1:35:39 pm</pubDate></item><item><title> ज्ञान, गति के बाद संकल्प </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=708</link><description>--साय सरकार का बजट अमृत काल के लक्ष्यों और विकसित छत्तीसगढ़ 2047 की परिकल्पना पर आधारित
लेख / बजट - 2026-257
--प्रशांत शर्मा
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार का वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 1.72 लाख करोड़ रुपए का बजट वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी ने पेश किया। साय-सरकार का यह तीसरा बजट अमृत काल के लक्ष्यों और विकसित छत्तीसगढ़ 2047 की परिकल्पना पर आधारित है। इस बजट का मुख्य विषय संकल्प रखा गया है, जिसका अभिप्राय है- सर्व समावेशी विकास, अधोसंरचना, निवेश, कुशल मानव संसाधन, अंत्योदय, आजीविका और पॉलिसी से परिणाम तक। वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी ने तकनीक और पारदर्शिता के साथ जो वित्तीय ढाँचा तैयार किया है, वह छत्तीसगढ़ को देश के टॉप राज्यों में शुमार करेगा। यह बजट केवल आँकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पौने तीन करोड़ जनता की आकांक्षाओं को पूर्ण करने वाला संकल्प पत्र है। यह बजट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के स्वप्न को विकसित छत्तीसगढ़ के माध्यम से साकार करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।
बजट में राजकोषीय अनुशासन और विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए प्रस्तुत छत्तीसगढ़ का बजट राज्य की अर्थव्यवस्था को एक नई ऊँचाई देने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस वर्ष कुल बजट का आकार 1.72 लाख करोड़ निर्धारित किया गया है, जो पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में लगभग 4 प्रतिशत की उत्साहजनक वृद्धि को दर्शाता है। यह विस्तार राज्य सरकार की विकासपरक सोच और बढ़ती आर्थिक गतिविधियों का परिचायक है। बजट के आंतरिक ढांचे को देखें तो सरकार ने अपने दैनिक कार्यों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को सुचारू रखने के लिए 1.45 लाख करोड़ रुपए का राजस्व व्यय प्रस्तावित किया है। इसके साथ ही, राज्य के भविष्य के निर्माण और स्थायी संपत्तियों के सृजन के लिए पूंजीगत व्यय के मद में 26,500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। कुल बजट का 15.4 प्रतिशत हिस्सा पूंजीगत कार्यों पर खर्च करना यह स्पष्ट करता है कि सरकार सड़क, पुल, स्कूल और अस्पतालों जैसे बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने के प्रति गंभीर है। राज्य की समग्र आर्थिक सेहत की बात करें तो, छत्तीसगढ़ का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) 7,09,553 करोड़ रुपए होने का अनुमान लगाया गया है। सरकार को उम्मीद है कि राज्य की अर्थव्यवस्था 12.4 प्रतिशत की प्रभावशाली दर से आगे बढ़ेगी। वित्तीय अनुशासन के मोर्चे पर, सरकार ने संतुलन बनाने की सफल कोशिश की है। राज्य का राजकोषीय घाटा 20,400 करोड़ रुपए अनुमानित है, जो कि कुल जीएसडीपी का 2.87 प्रतिशत है। यह आँकड़ा केंद्र सरकार और एफआरबीएम एक्ट द्वारा निर्धारित 3 प्रतिशत की सीमा के भीतर है, जो छत्तीसगढ़ की मजबूत और नियंत्रित वित्तीय स्थिति को प्रमाणित करता है। बजट प्रावधानों की चर्चा करें तो यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार का बजट संकल्प से सिद्धि की ओर बढ़ते विकसित छत्तीसगढ़ का ब्ल्यू प्रिंट है। बजट में राज्य के सर्वांगीण विकास को गति देने के लिए सरकार ने 5 विशेष मिशनों की घोषणा की है, जो भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं- सड़कों, पुलों और भवनों के आधुनिक निर्माण के लिए मुख्यमंत्री अधोसंरचना मिशन, प्रदेश को तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में अग्रणी बनाने हेतु मुख्यमंत्री एआई मिशन, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए मुख्यमंत्री पर्यटन विकास मिशन, युवाओं को जॉब सीकर के बजाय जॉब क्रिएटर बनाने हेतु मुख्यमंत्री स्टार्टअप मिशन और खिलाडिय़ों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएँ प्रदान करने के लिए मुख्यमंत्री खेल उत्कर्ष मिशन। छत्तीसगढ़ की जीएसडीपी 12 प्रतिशत की दर से बढ़कर 7,09,553 करोड़ रुपए होने का अनुमान है।
पूंजीगत व्यय में 63 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्शाती है कि सरकार राज्य में संपत्ति निर्माण पर निवेश कर रही है। राज्य का स्वयं का कर राजस्व 14 प्रतिशत बढ़कर 52,000 करोड़ रुपए होने का अनुमान है। बजट का सबसे बड़ा हिस्सा, यानी 13.5 प्रतिशत, स्कूल शिक्षा के लिए आवंटित किया गया है। बस्तर के सुदूर क्षेत्र अबूझमाड़ और जगरगुंडा में दो भव्य एजुकेशन सिटी बनाई जाएंगी, जो शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाएंगी। प्रदेश के युवाओं के शैक्षणिक भ्रमण के लिए इस युवा दर्शन योजना की शुरुआत का प्रस्ताव बजट में है। मेधावी छात्रों के लिए मुख्यमंत्री शिक्षा सहयोग योजना के तहत आवासीय सहायता दी जाएगी। बस्तर फाइटर में 1500 नई भर्तियों का प्रावधान किया गया है, जो सुरक्षा के साथ-साथ रोजगार के अवसर भी पैदा करेगा। प्रदेश सरकार के इस बजट में कृषि प्रधान राज्य होने के नाते अन्नदाताओं का विशेष ध्यान रखा गया है। कृषि क्षेत्र के लिए 13,500 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है। 3100 रुपए प्रति क्विंटल की दर पर धान खरीदी और उसकी अंतर राशि का एकमुश्त भुगतान भविष्य में भी जारी रहेगा। भूमि विकास बैंक के जरिए कृषि ऋण योजना के लिए 200 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई है। इंद्रावती नदी पर देवरगांव और मटनार बराज के निर्माण के लिए 2000 करोड़ रुपए से अधिक का प्रावधान किया गया है, जो बस्तर के खेतों तक पानी पहुँचाएगा। इसी के साथ बस्तर और सरगुजा में खाद्य एवं कृषि प्रसंस्करण उद्योगों के लिए 100 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है। बकरी, सूअर और मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देकर ग्रामीण आय को दोगुना करने का लक्ष्य भी तय किया गया है। अधोसंरचना और शहरी विकास के दृष्टिगत बजट में स्मार्ट सिटी की तर्ज पर विकास सुनिश्चित करने के लिए मुख्यमंत्री आदर्श शहर समृद्धि योजना के तहत नगरपालिकाओं के विकास हेतु 200 करोड़ रुपए दिए गए हैं। द्रुतगामी सड़क संपर्क योजना के जरिए आर्थिक केंद्रों को जोडऩे के लिए 200 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है। 23 नए औद्योगिक पार्कों की स्थापना के लिए 250 करोड़ रुपए का प्रावधान है, जिससे स्थानीय स्तर पर व्यापार बढ़ेगा। बजट में महिला सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय पर फोकस करते हुए स्टाम्प ड्यूटी में छूट स्वागतेय है। महिलाओं के नाम पर संपत्ति (भूमि/भवन) रजिस्ट्री कराने पर पंजीकरण शुल्क में 50 प्रतिशत की छूट देने का प्रस्ताव महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। बजट में लखपति दीदियों के भ्रमण और अनुभव साझा करने के लिए विशेष बजट प्रावधान किया गया है। इसी प्रकार सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए कैशलेस उपचार की व्यवस्था की जा रही है, जिससे उनके परिवार को स्वास्थ्य सुरक्षा मिलेगी। बिजली सब्सिडी देते हुए कृषि पंपों के लिए मुफ्त बिजली हेतु 6,700 करोड़ रुपए का प्रावधान है। पं. दीनदयाल उपाध्याय भूमिहीन कृषि मजदूर कल्याण योजना के लिए 600 करोड़ रुपए का प्रस्ताव है।
प्रतियोगी परीक्षाओं (यूपीएससी, पीएससी, नीट और जेईई) की तैयारी के लिए 33 करोड़ रुपए का विशेष कोष बनाया गया है। दुर्ग, जशपुर, रायपुर और रायगढ़ के कॉलेजों में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना की जाएगी। महतारी वंदन योजना के तहत विवाहित महिलाओं की आर्थिक सहायता के लिए 8,200 करोड़ रुपए के प्रावधान के साथ-साथ इस बार एक नई रानी दुर्गावती योजना शुरू की जा रही है, जिसमें लड़कियों को 18 वर्ष की आयु पूरी करने पर 1.5 लाख रुपए की वित्तीय सहायता दी जाएगी। बस्तर और सरगुजा के विकास को प्राथमिकता में सबसे ऊपर रखा गया है। छत्तीसगढ़ को भगवान श्री राम का ननिहाल और उनके वनवास का प्रमुख केंद्र माना जाता है। वर्तमान भाजपा सरकार ने अपने विशेषकर संकल्प बजट 2026-27 में इस सांस्कृतिक विरासत को आर्थिक और बुनियादी ढाँचे के विकास के साथ जोडऩे का प्रयास किया है। बस्तर (दण्डकारण्य) और सरगुजा के लिए की गई घोषणाएँ काफी अहमियत रखती हैं। सरकार ने इन दुर्गम क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोडऩे के लिए इरादे से प्रभाव की नीति अपनाई है। बस्तर और सरगुजा संभाग में आवागमन सुगम बनाने के लिए 'मुख्यमंत्री बस सेवा योजना के तहत 10 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। जगदलपुर (बस्तर) और अंबिकापुर (सरगुजा) एयरपोर्ट के विकास के लिए संयुक्त रूप से 80 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई है, जो पर्यटन को गति देगी। जगदलपुर व अंबिकापुर में हवाई सेवाओं का विस्तार किया जा रहा है और पर्यटन के क्षेत्र में होमस्टे योजना के लिए 10 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। जनजातीय क्षेत्रों की सड़कों के लिए 500 करोड़ रुपए और नई सड़कों के लिए 2,000 करोड़ रुपए का भारी-भरकम निवेश किया गया है। राम वनगमन पथ के इन क्षेत्रों में कृषि ही आजीविका का मुख्य आधार है, इसके दृष्टिगत बस्तर की जीवनदायिनी इंद्रावती नदी पर बैराज परियोजना के लिए 2,024 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए हैं। इससे लगभग 32 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता बढ़ेगी। बस्तर और सरगुजा में कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए 100 करोड़ रुपए का निवेश किया गया है, ताकि स्थानीय उत्पादों (जैसे मक्का, कोदो-कुटकी) का मूल्य संवर्धन हो सके। अबूझमाड़ और जगरगुंडा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में 100 करोड़ रुपए की लागत से एजुकेशन सिटी की स्थापना की घोषणा की गई है। बीजापुर में 200 बिस्तरों वाला अस्पताल और चिरमिरी (सरगुजा क्षेत्र) में नए मेडिकल कॉलेज की स्थापना से स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार होगा। भगवान राम की स्मृतियों को संजोने के लिए बजट में विशेष ध्यान दिया गया है, जिसके तहत शक्तिपीठ परियोजना में प्रदेश के पाँच प्रमुख शक्तिपीठों को जोडऩे की योजना के साथ-साथ राम वनगमन पथ के स्थलों को इको-टूरिज्म के रूप में विकसित किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ के नागरिकों को अयोध्या दर्शन कराने के लिए 35 करोड़ रुपए का विशेष प्रावधान किया गया है। विकास के लिए शांति अनिवार्य है, इसलिए सरकार ने सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी है। स्थानीय युवाओं को रोजगार देने और सुरक्षा मजबूत करने के लिए 1,500 नए पदों का सृजन किया गया है। बस्तर-सरगुजा ओलंपिक युवाओं को खेल के माध्यम से जोडऩे के लिए 10 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार का यह बजट केवल वित्तीय आंकड़ा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक गौरव और आधुनिक विकास का संगम है। जहां एक ओर भगवान राम के पदचिह्नों वाले इन क्षेत्रों को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर उभारा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर भारी पूंजीगत व्यय के माध्यम से वहां के आदिवासियों के जीवन स्तर को सुधारने का संकल्प लिया गया है।
-लेखक छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं।</description><guid>708</guid><pubDate>25-Feb-2026 1:54:21 pm</pubDate></item><item><title>अहंकार की आग में जलता संवाद और राख बनता अस्तित्व  </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=707</link><description>-डॉ. नीरज गजेंद्र
बहुत पुरानी बात है। एक पक्षी था भारूंड। उसके दो सिर थे, पर शरीर एक ही। दोनों सिरों की अपनी-अपनी सोच, अपनी-अपनी जिद, अपनी-अपनी पहचान। समस्या यह नहीं थी कि वे अलग सोचते थे; समस्या यह थी कि वे साथ सोच नहीं पाते थे। एक दिन एक सिर को स्वादिष्ट फल मिला। उसने कहा मैंने पाया है, मैं ही खाऊंगा। दूसरे ने कहा हमारा शरीर एक है, तो हिस्सा भी साझा होना चाहिए। पर पहला नहीं माना। उसने फल अकेले खा लिया। दूसरे के मन में चोट लग गई। अपमान की आग भीतर ही भीतर सुलगती रही।
कुछ दिन बाद दूसरा सिर एक फल उठा लाया। पहला घबरा गया, कहा यह फल जहरीला है, मत खाओ। पर इस बार दूसरे ने जिद पकड़ ली, उस दिन मेरा स्वाद नहीं पूछा था, आज मैं भी नहीं पूछूंगा। और उसने विषैला फल खा लिया। कुछ ही देर में पूरा शरीर तड़प-तड़प कर मर गया। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असल में कहानी तो हमारे भीतर यहीं से शुरू होती है। हम सबके भीतर भी दो सिर हैं। एक कहता है मुझे चाहिए, अभी चाहिए। दूसरा कहता है रुको, सोचो, समझो। एक अहंकार है, दूसरा विवेक। जब अहंकार हावी हो जाता है, तो विवेक की आवाज हमें कड़वी लगने लगती है। हम वही करते हैं जो उस समय अच्छा लगता है, भले बाद में उसका परिणाम जहरीला निकले।
धर्म हमें सबसे पहले यही सिखाता है कि जीवन अलग-अलग टुकड़ों में नहीं बंटा है। परिवार हो, समाज हो या राष्ट्र, सब एक ही शरीर की तरह हैं। महाभारत में कौरव और पांडव अलग-अलग दल थे, पर वंश एक था। जब संवाद टूटा, तो युद्ध हुआ। युद्ध में कोई सचमुच जीतता नहीं; हार सबकी होती है। यही बात हम अपने घरों में भी देख सकते हैं, जब ईगो टकराते हैं, तो रिश्ते टूटते हैं। और जब रिश्ते टूटते हैं, तो जीतने वाला भी भीतर से खाली रह जाता है।
आध्यात्म हमें भीतर झांकना सिखाता है। श्रीमद्भगवद्गीता का पूरा संवाद मन के द्वंद्व को शांत करने का उपाय ही तो है। अर्जुन युद्धभूमि में खड़ा है, पर असली लड़ाई उसके भीतर चल रही है। तभी श्रीकृष्ण उसे समझाते है कि अपने कर्तव्य को पहचानो, मोह और क्रोध से ऊपर उठो। अगर अर्जुन भी जिद पकड़ लेता, तो परिणाम अलग होता। आध्यात्म कहता है असली जीत बाहर नहीं, भीतर होती है। पुराणों में अहंकार के उदाहरण भरे पड़े हैं। रामायण के रावण को ही देख लीजिए। विद्वान था, तपस्वी था, पर जिद और अभिमान ने उसे अंधा बना दिया। समझाने वाले थे, पर उसने किसी की नहीं सुनी। आखिरकार उसका अंत हुआ। यही हाल हिरण्यकशिपु का हुआ। शक्ति थी, सामर्थ्य था, पर भीतर का विष उसे ले डूबा।
अब जरा आज के समय को देखिए। हमारे पास तकनीक है, साधन हैं, जानकारी है। पर क्या हमारे भीतर संवाद है? परिवारों में छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव हो जाता है। दफ्तरों में टीम के लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं। राजनीति में दल एक-दूसरे को खत्म करने की होड़ में रहते हैं। नतीजा? विकास की जगह टकराव, शांति की जगह तनाव। भारूंड की तरह हम भी भूल जाते हैं कि शरीर एक है। अगर एक हिस्सा जलता है, तो पूरा शरीर दर्द महसूस करता है। अगर हम बदले की आग में कुछ गलत कदम उठा लें, तो उसका असर दूसरे पर ही नहीं पड़ता, हम खुद भी उसके शिकार होते हैं।
धर्म, आध्यात्म और आधुनिकता तीनों को अलग-अलग देखने की जरूरत नहीं है। धर्म हमें सही-गलत का आधार देता है। आध्यात्म हमें भीतर से मजबूत बनाता है। आधुनिकता हमें साधन देती है। पर अगर इन तीनों के बीच तालमेल न हो, तो असंतुलन पैदा होता है। जैसे भारूंड के दो सिर अलग-अलग दिशा में खींच रहे थे, वैसे ही जब हमारा मन और बुद्धि अलग-अलग रास्ते पकड़ लेते हैं, तो जीवन की गाड़ी डगमगाने लगती है।
असल सवाल यह नहीं है कि हमारे भीतर मतभेद क्यों हैं। सवाल यह है कि हम उन्हें कैसे संभालते हैं। क्या हम हर असहमति को अपमान मान लेते हैं। क्या हम हर चोट का जवाब चोट से देना चाहते हैं। या हम रुक कर सोच सकते हैं कि हमारा लक्ष्य क्या है। भारूंड की मौत चेतावनी देती है कि अहंकार और बदले की भावना अंततः आत्मघाती होती है। अगर हम सच में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो हमें संवाद सीखना होगा, धैर्य रखना होगा, और यह समझना होगा कि जीत वही है जिसमें सबका भला हो। क्योंकि अंत में, हम सब एक ही शरीर का हिस्सा हैं। और जब हम खुद से ही लड़ते हैं, तो हार भी हमारी ही होती है।
(लेखक, एक प्रखर विश्लेषक, चिंतक और समसामयिक विषयों के मर्मज्ञ हैं, जो तथ्य और तर्क पर आधारित संवाद को समाज में स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।)</description><guid>707</guid><pubDate>23-Feb-2026 1:51:19 pm</pubDate></item><item><title>एक दिन </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=706</link><description>-कहानी
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद) 
दिव्या आज सुबह उठी तो सूर्य नारायण अपने दायित्व निभाने आसमान में तैनात हो गए थे और दिव्या को उसके आलस पर चिढ़ा रहे थे । सुबह की भागदौड़ और अधिक मुश्किल हो जाती है यदि उठने में देर हो जाए । वो तो शुक्र है कि उसने रात में ही आधी तैयारी कर ली थी । नाश्ते के लिए आलू की सब्जी पहले ही बना कर रख दी थी , फटाफट आलू के पराठे सेंकती गई और देती गई ।
  आज जितनी बार वह अपने किशोर बेटे शिशिर के कमरे में गई वह फोन पकड़े ही दिखा । फिर तू मोबाइल लेकर बैठ गया...जब देखो तब फोन में पता नहीं क्या देखता रहता है । कुुुछ दिनों के बाद परीक्षा है....मम्मी शिशिर को डाँट रही थी और उसके कानों पर जूूं नहीं रेंग रही थी , वह फोन पर ही लगा रहा । कुछ देर बाद दिव्या उधर गई तो शिशिर को फिर फोन के कारण डाँट पड़ी - हे भगवान ! मैंने इसे मोबाइल लेकर क्यों दिया , अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है ...तू नहीं
सुधरा तो मोबाइल छीन लूँगी तुझसे। मम्मी ने फोन लेकर टेबल पर रख दिया ।
 नहीं पढूँगा जा ..गुस्से में कॉपी - किताबें पटक रहा था शिशिर । पन्द्रह - सोलह वर्ष की यह वय ही ऐसी होती है ....उन्हें लगता है वे जो कर रहे हैं वही
सही है और बाकी गलत । बहुत जल्दी गुुस्सा आ जाता है और चिड़चिड़े भी हो जाते हैं । उन्हें कोई कारण नहीं सुनना
जिसकी वजह से उनका कोई काम रुके , किसी की सलाह भी नहीं लेनी । माता - पिता तो उनकी नजर में बुद्धू ही रहते हैं ।
      तब - तब ऐसा वाकया होता रहता है जब - जब
उनकी बातें नहीं सुनी जाती । माँ - बेटे में कुछ पल अबोला रहता है , फिर पता नहीं कब उनमें सुलह भी हो जाती है । बेटा माँ को लाड़ करते रहता है और माँ उसकी फेवरिट डिश पका कर खिलाती रहती है ।
   पर इस बार विवाद कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था
क्योंकि बोर्ड की परीक्षा होने के कारण माँ परेशान थी..
मोबाइल बेटे की कमजोरी बन गई थी । जब भी उसे
मना करते वह कहता पढ़ाई का काम कर रहा हूँ । गूगल
पर कुछ सर्च कर रहा हूँ । न फोन छीनते बन रहा था और न उसे देने का मन कर रहा था । बस अधिक रोक-टोक बुरी लग गई और बेटे ने बदतमीजी से बात की । माँ आहत हुई ....उसके आँसू तो जैसे पलकों में ही सवार रहते हैं ....कुछ हुआ नहीं और टपकना शुरू । आज बेटा स्कूल जाते वक्त आवाज देता रहा ,उसे छोड़ने नहीं गई... नहीं तो उसके बाहर छोड़ने आये बिना कोई घर से जा नही सकता ।
  शिशिर भी खूब बड़बड़ाता रहा --ऐसी माँ होनी ही
नहीं चाहिए , दिन भर टोकते ही रहती है । फोन पकड़ना मतलब गेम खेलना ही होता है क्या ? मेरी फीलिंग्स कुछ समझती ही नहीं । हुँह.... मैं अपना काम खुद ही कर लूँगा , समझती क्या है मुझे ।
     शाम को दिव्या के किसी कलीग ने उसके पति तुषार को फोन किया कि स्कूल से लौटते वक्त दिव्या का एक्सीडेंट हो गया है और उसे भिलाई के सेक्टर-9 हॉस्पिटल में एडमिट कराए हैं तो पल भर के लिए वह कमजोर हो गए , फिर
जल्दी से सब सामान पैक कर वहाँ पहुँचे तो दिव्या के
पैर में प्लास्टर चढ़ा हुआ था । शिशिर को उसकी दीदी स्नेहा ने एक्सीडेंट के बारे में बताया तो कुछ देर के लिये उसे लगा जैसे उसी के कारण यह सब हुआ । फिर उसने एक लंबी .साँस भरी और सोचा.. चलो यार !कुछ दिन मम्मी हॉस्पिटल में रहेगी तो उनकी बक - बक से मुक्ति तो मिलेगी । चैन से रहूँगा अकेले ... उसने जैसे अपने - आप से कहा था । मैगी का बड़ा पैकेट ले आया था वह । माइक्रोवेेेव में पकाने रखकर फोन लेकर बैठ गया । पर आज न मैगी खाने में मजा था और न फोन खेलने में , मम्मी के मना करते रहने पर छुप कर या उन्हें खिझा कर जो मजा आता था । ट्यूशन जाते वक्त न चाहते हुए भी मुँह से निकल गया था - मम्मी, मै जा रहा हूँ । लगा ...अभी मम्मी बाहर आयेगी और ढेर सारी हिदायतें देंगी गाड़ी चलाने को लेकर ....गाड़ी धीरे चलाना ....मोड़ पर हॉर्न बजाना ....ओवरब्रिज में सावधान रहना । वह मम्मी से कहता - रोज वही - वही बात कहती हो मम्मी , आप
रिकॉर्ड क्यों नहीं कर लेती ..बस रिकॉर्डर ऑन कर दिया करो , आपका काम हो जाएगा ।
आज न जाने क्यों वही बातें फिर से सुनने को दिल चाह रहा है । कहाँ तो मम्मी को धमकी देता मैं अपने सब काम खुद कर लूँगा पर अब कुछ भी नहीं हो रहा मुझसे । पापा थोड़ी देर के लिये अस्पताल से घर आये थे तब बुआ और स्नेहा मम्मी के पास थे। रात को पापा फिर चले गए थे । मेरी परीक्षा पास होने के कारण मुझसे कुछ नहीं कहा जा रहा था । शिशिर दूसरे दिन अलार्म लगा कर सोया था ताकि समय पर स्कूल जा सके । मम्मी एक जोड़ी यूनिफार्म हमेशा तैयार रखती थी इसलिये उसे दिक्कत नहीं हुई पर उसे उठाते वक्त वह खूब लाड़ करती थीं... स्नेहा से कहीं अधिक । उसका सिर सहलाती ,नाक खींचती , उसके गालों पर प्यार करती ...आज कुछ कमी सी महसूस हुई थी । टिफिन के लिये भी शिशिर के बड़े नखरे होते ....नहीं आज पराठा नहीं सैंडविच , कभी साबूदाने की खिचड़ी , कभी कटलेट...वह बनावटी गुस्सा दिखाते हुए सब बना देती । मोजे मुश्किल से मिले , बैठे - बैठे मम्मी से बॉटल , जूते मोजे माँगने की आदत जो पड़ी हुई थी । आज मैगी नहीं खाया गया , न ही कैंटीन में कुछ खाने की इच्छा हुई...तब बहुत होती थी जब मम्मी वहाँ कुछ भी न खाने की ताकीद करती ।शायद किसी काम को नहीं करने की ताकीद ही उसे करने को उकसाती है । किसी ने ठीक ही कहा है किसी का महत्व उनके न रहने पर ही मालूम होता है ।
अभी तो एक ही दिन हुए थे मम्मी के बिना ...और
शिशिर कोउनकी बेहद कमी खल रही थी ...हर बात में ...दिन भर । जब वह होती थी तब भी और जब नहीं होती थी तब भी...उनकी जो बातें पकाऊ लगतीं थीं आज उसके कान
वो सब सुनने को तरस रहे थे । लगता था जैसे एक भरम में जी रहा था कि वह अब बड़ा हो गया है और
उसे मम्मी की जरूरत नहीं है लेकिन अब समझ में आ
रहा है ...शायद कुछ बातों के लिये वह कभी बड़ा नहीं
 होगा और बड़े होने के बाद भी मम्मी के बिना जीवन अधूरा ही लगेगा । शाम की ट्यूशन छोड़कर अप्रत्याशित सा शिशिर मम्मी को देखने हॉस्पिटल पहुँच गया था ...वह लेटी हुई थी ..उसे देखकर चमक उठी थीं उनकी आँखें ...और वह रोते हुए उनके गले लग गया था , अपने मन में खड़े किये कई विद्रोहों की दीवारों को तोड़कर ....आज ममता के आगोश में वे सब कुतर्क ध्वस्त हो रहे थे । मम्मी के एक दिन के अलगाव और आँसुओं ने उसकी अकड़ को धो दिया था ...... उसका दिमाग सही ठिकाने लग गया था।</description><guid>706</guid><pubDate>22-Feb-2026 3:38:22 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ मे आदिवासी नेतृत्व गढ़ रहा है विकास के नए सोपान</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=705</link><description>मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के जन्मदिवस पर विशेष)
-छगन लाल लोन्हारे (उप संचालक जनसंपर्क )
रायपुर /	छत्तीसगढ़ की खूबसूरत वादियों में स्थित जशपुर जिला के ग्राम बगिया में 21 फरवरी को जन्म लेने वाले मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय सज्जनता और सहृदयता की एक मिसाल है। दो वर्ष के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ राज्य में विकास का एक नया आयाम गढ़ने वाले तथा प्रदेश के नागरिकों के दिलों में राज करने वाले मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय आज अपनी लोकप्रियता के शिखर पर विद्यमान है। श्री विष्णुदेव साय जनता के बीच के एक ऐसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं जिनकी सदाशयता और दूरगामी योजनाओं से प्रदेश में विकास और प्रगति का राह आसान हुआ है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय आदिवासी पृष्ठभूमि से आते हैं।
केबिनेट बैठक में राज्य में समर्थन मूल्य पर धान बेचने वाले किसानों को 3100 रूपए प्रति क्विंटल के मान से अंतर की राशि होली पर्व से पहले एकमुश्त भुगतान किए जाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में 25 लाख 24 हजार 339 किसानों से 141.04 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा
कृषक उन्नति योजना के तहत धान के मूल्य के अंतर की राशि के रूप में लगभग 10 हजार करोड़ रूपए का भुगतान होली त्यौहार से पहले एकमुश्त किया जाएगा। मुख्यमंत्री स्वयं एक किसान पुत्र हैं वे किसानों की पीड़ा को भलीभांति जानते हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा कृषक उन्नति योजना के तहत राज्य के किसानों से प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी 3100 रूपए प्रति क्विंटल के मान से की की गई है, जो देश में सर्वाधिक है। बीते दो वर्षों में कृषक उन्नति योजना के तहत राज्य के किसानों को धान के मूल्य के अंतर के रूप में 25 हजार करोड़ रूपए से अधिक का भुगतान किया जा चुका है। इस साल होली से पूर्व किसानों को 10 हजार करोड़ रूपए का भुगतान होने से यह राशि बढ़कर 35 हजार करोड़ रूपए हो जाएगी। किसान हितैशी सरकार के इस निर्णय से बाजार भी गुलजार होंगे, जिससे शहरी अर्थव्यवस्था पर सीधा असर दिखाई देगा, ट्रैक्टर आदि की बिक्री में वृद्धि होगी।
प्रदेश की नवीन औद्योगिक नीति से राज्य में अब तक 7 लाख 83 हजार करोड़ रूपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हो चुके हैं। मुख्यमंत्री ने अपने दो साल के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ को पूरे देश में एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने प्रदेश की जनता के बीच जाकर जनता का न केवल विश्वास जीता है बल्कि उनके हित को ध्यान में रखकर उन्होंने ऐसी योजनाओं का क्रियान्वयन किया है जिससे छत्तीसगढ़ का समग्र विकास सम्भव हो पाया है। यह केवल और केवल श्री विष्णुदेव साय जैसे एक संवेदनशील, कर्मठ तथा ऊर्जावान मुख्यमंत्री ही सम्भव कर सकते हैं।
श्री विष्णु देव की सुशासन में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। वर्ष 2026 को महतारी गौरव वर्ष घोषित किया गया है। राज्य सरकार ने मातृशक्ति का सम्मान करते हुए 70 लाख महिलाओं को महतारी वंदन योजना के अंतर्गत प्रतिमाह 1000 रूपए की सहायता राशि प्रदान की जा रही है। प्रदेश के 42 हजार 878 महिला स्व- सहायता समूहों को आसान ऋण से अब तक 129.46 करोड़ रूपए का लाभ दिया गया है। प्रधानमंत्री मातृवंदना योजना के अंतर्गत 4.81 लाख महिलाओं को 237 करोड़ रूपए की सहायता राशि दी गई है। राज्य की 19 लाख से अधिक महिलाओं को पूरक पोषण आहार सुनिश्चित की गई है। महिला सुरक्षा के लिए सखी वन स्टॉप सेंटर और महिला हेल्पलाइन 181 की स्थापना की गई है। महिलाओं को रोजगार मूलक कार्यों के जरिए स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाने के लिए पंचायत स्तर पर 52.20 करोड़ की लागत से 179 महतारी सदनों का निर्माण कराया जा रहा है। महिला समूहों के उत्पादों की बिक्री हेतु 200 करोड़ की लागत से नवा रायपुर में यूनिटी मॉल का निर्माण कराया जाएगा। मुख्यमंत्री की पहल पर दीनदयाल उपाध्याय भूमिहीन कृषि मजदूर कल्याण योजना के अंतर्गत प्रदेश के 5.62 लाख भूमिहीन कृषि मजदूरों को प्रतिवर्ष 10 हजार रूपए की आर्थिक सहायता दी जा रही है।
	राज्य सरकार द्वारा आवास और सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रख कर अब तक 26 लाख परिवारों को प्रधानमंत्री आवास स्वीकृति किए गए हैं। स्वच्छ पेयजल सबका अधिकार है। प्रदेश के 41 लाख से अधिक घरों तक स्वच्छ पेयजल पहुंच रहा है। गुणवत्तापूर्ण जलापूर्ति के लिए राज्य में 77 जल परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित की गई है। 70 समूह जल प्रदाय योजनाओं से प्रदेश के 3208 गांव लाभान्वित हो रहे हैं। इसके अलावा राज्य के शत्-प्रतिशत गांवों का विद्युतीकरण किया जा रहा है।
	डबल इंजन की सरकार में रावघाट-जगदलपुर रेल परियोजना के साथ रेल नेटवर्क मैप से बस्तर जुड़ रहा है। जगदलपुर-विशाखापट्नम और रायपुर-विशाखापट्नम नई सड़क परियोजनाओं से विकास की नई राहें खुल रही है। प्रदेश के 32 नगरीय निकायों में नॉलेज बेस्ड सोसाइटी हेतु लाइट हाउस निर्माण की पहल की जा रही है।
		मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने प्रदेश के हर वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने प्रदेश के हर वर्ग की बुनियादी सुविधाओं और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पीएम आवास योजना, कृषक उन्नति योजना, नियद नेल्ला नार, अखरा निर्माण योजना जैसी योजनाओं का शुभारम्भ किया है और जनता के बीच अपनी एक अलग छवि निर्मित की है।
	मुख्यमंत्री श्री साय जनता के बीच और हर समुदाय के बीच एक ऐसा पुल बनाना जानते हैं जिससे सभी एक दूसरे से जुड़ सके और सभी प्रदेश के हित में अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह भी कर सके। उन्होंने अपने जीवन का बहुमूल्य समय पद्रेश की जनता को समर्पित कर यह सिद्ध कर दिया है कि उनका जीवन केवल उनका नहीं है अपितु प्रदेश की जनता की निः स्वार्थ सेवा के लिए समर्पित है। वे सही मायने में एक ऐसे जननेता हैं जिनके लिए जनता ही सब कुछ हैं। ऐसे सेवाभावी और लोकप्रिय जनसेवक बहुत कम होते हैं जिनके लिए जनता का विकास और जनता का साथ ही सबसे महत्वपूर्ण होता है।
	मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय का अब तक का कार्यकाल इस बात का प्रमाण है कि यदि नेतृत्व ईमानदार, समर्पित और जनता की आकांक्षाओं से जुड़ा हो तो विकास की राह कठिन नहीं होगी।</description><guid>705</guid><pubDate>19-Feb-2026 10:31:27 pm</pubDate></item><item><title>धान-परती भूमि में सरसों की खेती से किसानों की अच्छी आय संभव</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=704</link><description>आलेख- -डॉ. पी.के. राय, निदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान
रायपुर। छत्तीसगढ़ की परती भूमि अब सोना उगलने लगी है। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस राज्य में किसानों का रुझान राई-सरसों की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इससे न केवल किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिलना शुरू हुई है, बल्कि देश को खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने की राह भी आसान होती नजर आ रही है। बता दें कि यहां के किसान धान कटाई के बाद खेतों को खाली छोड़ देते हैं, यानी रबी फसल की बुवाई नहीं करते हैं।इस कारण उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। किसानों के इन हालातों को देखते हुए आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, रायपुर ने ठोस रोडमैप के साथ प्रयास शुरू किए। परिणामस्वरूप परती भूमि पर अब सरसों की फसल लहलहाने लगी है। संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि राज्य की भूमि में खजाना छिपा हुआ है। यदि किसान धान कटाई के बाद देर से पकने वाली राई-सरसों किस्मों की बुवाई करें तो उनकी आर्थिक स्थिति में असम के किसानों के समान बदलाव देखने को मिल सकता है।गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में कुल कृषि क्षेत्र 4.78 मिलियन हेक्टेयर है। इसमें केवल 23 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है। वार्षिक वर्षा लगभग 1190 मिमी है, जिसमें लगभग 88 प्रतिशत वर्षा मानसून (मध्य जून से सितंबर) के दौरान होती है। इस दौरान किसान धान का बड़े पैमाने पर उत्पादन लेते हैं। वहीं रबी में गेहूं और थोड़े क्षेत्रफल में दलहनों की बुवाई करते हैं, लेकिन राई-सरसों का उत्पादन हाशिए पर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि परती भूमि, बस्तर के पठारी और उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में राई-सरसों की खेती की अच्छी संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि संस्थान का यह शुरुआती प्रयास है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।उन्होंने बताया कि धान कटाई के बाद कृषि भूमि परती रह जाती है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता और किसानों की आय बढ़ाने के अवसर सीमित हो जाते हैं। राई-सरसों की फसल परती भूमि को उत्पादक बनाने में मददगार बन सकती है।
परती भूमि की चुनौती
छत्तीसगढ़ में लगभग 3.9 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है, जबकि धान उत्पादन लगभग 9.8 मिलियन टन है। खरीफ में अधिक वर्षा और चिकनी मिट्टी के कारण धान का उत्पादन भरपूर होता है, लेकिन रबी में यही खेती सीमित रह जाती है। धान के कुल क्षेत्र का लगभग 32 प्रतिशत भाग ही सिंचित है, जिससे कटाई के बाद पठारी और पहाड़ी क्षेत्रों के लगभग 4060 प्रतिशत खेत परती रह जाते हैं। इस स्थिति में राई-सरसों का बुवाई क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।
31 हजार हेक्टेयर में खेती
संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने बताया कि यहां की जलवायु रबी तिलहन के लिए अनुकूल है, बशर्ते खरीफ के बाद मृदा में नमी का संरक्षण और उचित कृषि तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया जाए। क्योंकि राई-सरसों को कम पानी में उगाया जा सकता है और यह कम समय में पक जाती है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में महज 31 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सरसों की खेती होती है। करीब 17,260 टन उत्पादन और उत्पादकता 563 किग्रा प्रति हेक्टेयर है, जिसे वैज्ञानिक तकनीकों के समावेश से और बढ़ाया जा सकता है।
20 प्रतिशत ज्यादा उपज
उन्होंने बताया कि अनुसंधान परीक्षण के आधार पर धान के परती खेतों में राई-सरसों की अच्छी पैदावार मिलती है। इस फसल की लगभग 20 प्रतिशत अधिक पैदावार प्राप्त हुई है। प्रदर्शन के दौरान सरसों की किस्म डीआरएमआर-150-35 ने उत्साहजनक परिणाम दिए। यह किस्म 95110 दिनों में पक जाती है, जिससे धान की कटाई के बाद मध्य नवंबर से दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक इसकी बुवाई सहजता से की जा सकती है। इसके अलावा किसान छत्तीसगढ़ सरसों, टीबीएम, एनआरसीएचबी-101 और बीबीएम-1 जैसी किस्मों का उपयोग कर सकते हैं।
किसानों को आजीविका सुरक्षा
धान परती क्षेत्रों में राई-सरसों को शामिल करने से किसानों की आय और आजीविका सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार संभव है। वर्षा आधारित धान पारिस्थितिकी तंत्र में किए गए प्रदर्शनों से यह सिद्ध हुआ है कि शून्य जुताई के तहत राई-सरसों से 814 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। इससे प्रति हेक्टेयर 27 हजार रुपये से अधिक का शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। साथ ही सरसों के साथ मधुमक्खी पालन करके किसान अपनी आमदनी को और भी बढ़ा सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में राई-सरसों की खेती किसानों को त्रिस्तरीय लाभ दे सकती है, जिसमें आय वृद्धि, परती भूमि का उपयोग और खाद्य तेल उत्पादन में बढ़ोतरी शामिल है। इस फसल से राज्य के कृषि परिदृश्य को बदला जा सकता है। इस फसल पर अनुसंधान के काफी उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं।

</description><guid>704</guid><pubDate>16-Feb-2026 7:31:47 pm</pubDate></item><item><title>महादेव मैं याचक बनकर </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=703</link><description>-गीत
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद) 
महादेव मैं याचक बनकर
तेरे दर पर आया हूँ ।
भक्ति-भाव के पुष्प-मनोहर
अन्तस् में भर लाया हूँ ।।
देव-दनुज जो भी तप करते,
दर्शन देने आ जाते ।
शुचिता पूर्वक करें साधना
मनवांछित फल सब पाते ।
कल्याण सभी का करते हो
माँगे बिना बहुत पाया हूँ ।।
भक्ति भाव....
सुन लेना प्रभु यही प्रार्थना
मुझे शरण अपनी रखना ।
धीरज संयम देना विष यदि,
पड़े उपेक्षा का चखना ।
नीलकंठ हे आशुतोष शिव
आगे शीश झुकाया हूँ ।।
भक्ति भाव....
निर्विवाद छवि रही सदा ही
निर्विकार संतोषी तुम ।
द्वेष-दंभ सब हुए तिरोहित,
जलवाष्प धूप में ज्यों गुम ।
आत्मलीन हो जानूँ खुद को
अहंकार बिसराया हूँ ।।
भक्ति भाव....
शिव ही सत्य जगत सब मिथ्या
शक्ति भक्ति के शुचि साधक ।
कुपित हुए जब तांडव करते,
भस्म हुए हैं सब बाधक ।
विश्वनाथ की वह अनुपम छवि
मन में सदा बसाया हूँ ।।
भक्ति भाव....</description><guid>703</guid><pubDate>15-Feb-2026 3:22:58 pm</pubDate></item><item><title>मदनोत्सव </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=702</link><description>-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद) 
मदनोत्सव का असर हर शै पर दिखाई दे रहा था । पथ खूबसूरत पुष्पों से सुसज्जित थे । टेसू के फूलों से आसमान दूर तक रंगे हुए दिखाई दे रहे थे । भौंरे मधुरस का पान करने के लिए फूलों के चक्कर काट रहे थे...प्रकृति के इस खुशनुमा वातावरण के साथ प्रत्येक जीव खुशी मना रहा था । मन का उत्साह छलका जाता था ..शीतल , मंद पवन देह में सिहरन उत्पन्न कर रही थी ।थका-हारा सूरज घर जाने की तैयारी में था , साँझ लाज की अबीर से ढकी नवयौवना सी सुन्दर लग रही थी । इस प्रेममयी वातावरण में भी राधा कृष्ण की उपेक्षा से दुःखी होकर मुँह फुलाए उपवन में बैठी थी और कृष्ण सब कुछ भूल गोप-मित्रों के साथ व्यस्त थे । गोपियाँ राधा को बुलाने आई थी पर राधा कहाँ मानने वाली थी...एकांत में ही बैठी रही... जिसने नाराज किया उसे तो कोई फर्क नहीं पड़ा । हरसिंगार के फूल झरने लगे थे मानो किसी के लिए सेज तैयार कर रहे हों । मधुमालती के फूलों से सुगन्धित शाम मादक हो रही थी... आखिर कृष्ण को राधा की कमी महसूस होने लगी और उन्होंने अपनी बाँसुरी होठों पर लगा ली व छेड़ दी मधुर तान । प्रेम की धुन पर सब नृत्य करने लगे...लताएँ , पुष्प , शाखें , जीव - जंतु , चर , अचर सब प्रेम की लय पर झूम उठे ।
राधा कब तक रोके रखती अपने - आप को..दौड़ पड़ी कृष्ण की राधे - राधे पुकारती धुन की ओर....वृंदावन में प्रेम - रास चरम पर पहुँच गया था । आनन्द की मानो बारिश सी होने लगी चहुँ ओर...ऋतुराज वसन्त ने आकर रुख ही बदल दिया था संसार का...चाँद अपनी किरणों के द्वारा धरा को प्रेम , उत्साह , खुशी से सींच रहा था ।</description><guid>702</guid><pubDate>10-Feb-2026 12:32:23 am</pubDate></item><item><title>मित्रता, प्रतिज्ञा और परिणाम का आधुनिक अर्थ</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=701</link><description>-डॉ. नीरज गजेंद्र
धर्म के अनुसार मित्रता निभाना पुण्य है। वचन निभाना श्रेष्ठ गुण है और प्रतिज्ञा को जीवन की रीढ़ माना गया है। ये बातें सुनने में जितनी सुंदर हैं, उतनी ही अधूरी भी है। यदि मित्रता निभाना ही सर्वोच्च धर्म होता, तो महाभारत में कर्ण क्यों मारे जाते। वे भी तो अपने मित्र दुर्योधन के प्रति अंत तक निष्ठावान रहे। यदि प्रतिज्ञा निभाना ही परम सत्य होता, तो भीष्म पितामह शरशैया पर क्यों पड़े रहे होते। वे अपनी प्रतिज्ञा से कभी नहीं डिगे। और यदि वचन निभाना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य होता, तो राजा दशरथ को मृत्यु क्यों स्वीकार करनी पड़ती, उन्होंने भी तो अपने वचन का पालन किया। यहीं से धर्म का असली प्रश्न जन्म लेता है। समस्या मित्रता, वचन या प्रतिज्ञा में नहीं वह किसके साथ, किस उद्देश्य से और किस दिशा में जा रहा उस पर निहित है।
धर्म सिर्फ नियमों का पालन नहीं है, वह विवेक है। धर्म यह समझने की क्षमता है कि जिसे हम निष्ठा कह रहे हैं, वह सत्य के पक्ष में है या अहंकार, मोह और अन्याय के पक्ष में खड़ी हो चुकी है। कर्ण इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वे दानवीर थे, महान धनुर्धर थे, अपार सामर्थ्य के स्वामी थे। किंतु उनकी मित्रता दुर्योधन से थी। एक ऐसे व्यक्ति से जो अन्याय, ईर्ष्या और सत्ता-लालसा का प्रतीक था। कर्ण जानते थे कि पांडव धर्म के साथ हैं, कृष्ण सत्य के साथ हैं, फिर भी उन्होंने मित्रता निभाने के नाम पर अधर्म का साथ नहीं छोड़ा। परिणाम यह हुआ कि वीर होते हुए भी वे विनाश को प्राप्त हुए। भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा भी यही सिखाती है। उन्होंने जीवनभर ब्रह्मचर्य और सिंहासन-त्याग की प्रतिज्ञा निभाई, लेकिन जब अधर्म दरबार में निर्लज्ज होकर खड़ा था। जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब वे मौन रहे। प्रतिज्ञा विवेक से बड़ी हो गई और वहीं धर्म चूक गया। यहां प्रतिज्ञा बची रही, और धर्म हार गया।
आज के समय में यह प्रश्न और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। हम गर्व से कहते हैं मैं अपने दोस्त के लिए कुछ भी कर सकता हूँ। लेकिन यह शायद ही पूछते हैं कि वह दोस्त हमें किस दिशा में ले जा रहा है। हम कहते हैं मैंने कमिटमेंट किया है, पीछे नहीं हट सकता। लेकिन यह नहीं देखते कि वह कमिटमेंट समाज, परिवार और आत्मा के लिए सही है या नहीं। आधुनिक जीवन में कर्ण हर जगह हैं। गलत बॉस के लिए अनैतिक काम करना, गलत नेता के लिए झूठ फैलाना, गलत दोस्त के लिए गलत रास्ते पर चलना यह सब वफादारी के नाम पर होता है। लेकिन अंत में नुकसान उसी का होता है जो मित्रता निभा रहा होता है।
दान का सिद्धांत भी यही कहता है। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि अयोग्य को दिया गया दान, देने वाले और पाने वाले दोनों को दुख देता है। आज दान भी सोच-समझकर नहीं किया जाता। कभी दिखावे के लिए, कभी सौदे की तरह कि एक देंगे तो दस पाएंगे। यह दान नहीं, निवेश है। दान तभी पवित्र होता है जब उसका उपयोग सही दिशा में हो। यही नियम मित्रता और प्रतिज्ञा पर भी लागू होता है। हर निभाई गई मित्रता पुण्य नहीं होती और हर निभाई गई प्रतिज्ञा धर्म नहीं होती। धर्म वही है जो लोक-कल्याण की ओर ले जाए, जो आत्मा को हल्का करे और मन को शांत रखे।
इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि मित्रता निभानी चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है किससे निभानी चाहिए। जब प्रतिबद्धता गलत हाथों में पड़ जाती है, तो गुण भी दोष बन जाता है। इसलिए अपनी संगत पर ध्यान दीजिए। आपका लगाव किसके प्रति है, आपका समर्पण किस दिशा में है। यही आपका भविष्य तय करता है। कृष्ण के साथ चलेंगे तो रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन मंज़िल सुरक्षित होगी। दुर्योधन जैसे मित्रों के साथ चलेंगे तो सुविधा मिलेगी, लेकिन अंत विनाशकारी होगा। चयन हमें करना है मित्र कौन और कैसा हो।</description><guid>701</guid><pubDate>09-Feb-2026 2:57:11 pm</pubDate></item><item><title>वासंती दोहे</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=700</link><description>-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद) 
सरसों खिलकर दे रही , फागुन का संदेश ।
चमन महक कर कह रहा ,अवसर आज विशेष ।।
गदराया रस गंध से , टपका महुआ फूल ।
शाखों पर था कल चढ़ा ,आज पड़ा है धूल ।।
अधर सुधा रस से भरे , मीनल से हैं नैन ।
प्रिया रूप ज्यों चाँदनी , याद करे बेचैन ।।
मदन मनोहर रूप में , आया सखी वसंत ।
चले गए परदेश जो , लौटे मेरे कंत ।।
ऋतु वसंत का आगमन , हृदय भरे उल्लास ।
सुधियाँ परिमल हो उठीं , पिया मिलन की आस ।।</description><guid>700</guid><pubDate>09-Feb-2026 2:49:32 pm</pubDate></item><item><title>कुंडलिया</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=699</link><description>-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)    
चलते-चलते राह में, जाने कब हो शाम।
पूर्ण सभी दायित्व हों, सुखी रखें निज धाम।।
सुखी रखें निज धाम, सोच रख सोते-जागें।
प्रियजन हों खुशहाल, कर्म करने को भागें।।
पूरी हो हर चाह, भाव मानस में पलते।
कर लें कुछ सत्कर्म, सोचते चलते -चलते।।
उड़ने प्रेम-पतंग दें, नभ में उच्च उड़ान।
त्याग-समर्पण-भाव से, रिश्ते को दें मान।।
रिश्ते को दें मान, दिशा जीवन की मोड़ें।
द्वेष-दंभ से मुक्त, स्वार्थ की सीमा तोड़ें।।
स्नेह-डोर को थाम, नई राहें दें जुड़ने।
चले गगन में साथ, प्रेम के पंछी उड़ने।।
जीवन के हर मोड़ पर, साथी देना साथ।
बनें सहारा हम चलें, ले हाथों में हाथ।
ले हाथों में हाथ, थकन मिट जाए सारी।
कंधे पर रख शीश, नींद आती है प्यारी।।
बनी रहे यह प्रीति, अमर है मन का बंधन।
पति-पत्नी हम साथ, बिताएँ सुख से जीवन।।
जीवन की पुस्तक सरल, समझें तो है ठाठ।
पृष्ठ बदलते जो रहे, पढ़ें न कोई पाठ।।
पढ़ें न कोई पाठ, उलझते जाते प्रतिदिन।
कमियों से अनजान, थकें मुश्किल पल गिन-गिन।।
होती है जब हार, दुखी हो जाता है मन।
सुलझे रहें विचार, सुखद हो जाता जीवन।।</description><guid>699</guid><pubDate>08-Feb-2026 2:47:06 pm</pubDate></item><item><title>साथी बनकर रहें हमेशा  </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=698</link><description>-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)                                                                                                                        साथी बनकर रहें हमेशा, बातें क्यों जीत-हार के ।
जाओ न मुझे छोड़ पिया जी, तोड़ो मत तार प्यार के ।
मेरे मन में बसे हुए हो, मुझसे कैसी दूरी है ।
आसमान में छिटक रहे क्यों , जानूँ क्या मजबूरी है ।
बिना तेल के जले न बाती, स्याही बिन क्या करे कलम ।
भूल हुई क्या ऐसी मुझसे, जरा बता दो मुझे बलम ।
बढ़ा न मेरी मुश्किल प्रियतम, दुख छोड़िए तकरार के ।।
तुम्हीं चाँद मेरे आँगन के, गायब हुए अमावस -से ।
अंतर्मन की धरा सूखती , झूमो बरसो पावस-से ।
कली भ्रमर की बाट जोहती, बेचैनी है खिलने की ।
कैद पंखुड़ी बीच कमलिनी , आकुल रवि से मिलने की ।
नीलांबर में मेघ पधारे , आओ प्रिय हास् धार के ।।
नयन बंद कर तुझे निहारूँ , बसे सीप में मोती से ।
भासित हो अंतस में ऐसे , जलती हूँ दीपज्योति से ।
नहीं पास तू मन उदास है , पुष्पहार मुरझाए हों ।
फैला कजरा बिखरा गजरा ,आया पतझर मधुवन ज्यों ।
रूखी अलकें सूनी पलकें , वन हुए बिना बहार के ।।</description><guid>698</guid><pubDate>08-Feb-2026 2:37:43 pm</pubDate></item><item><title>अतीत की धरोहर ही नहीं भविष्य की संभावना भी है सिरपुर, क्योंकि यहां प्रेम मौन और इतिहास है मुखर</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=697</link><description>-डॉ. नीरज गजेंद्र
सिरपुर, एक प्राचीन नगर ही नहीं, छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रमाण है, जिसने सदियों पहले धर्म, ज्ञान, प्रेम व सहिष्णुता को एक साथ साधा। आज भी यहां छठवीं शताब्दी और उससे भी पूर्व के पुरातात्विक अवशेष उसी गरिमा के साथ मौजूद हैं, जैसे वे समय की धारा को थामे खड़े हों। यही कारण है कि सिरपुर को विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित करने के प्रयास तेज हो गए हैं। यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल करने की दिशा में गंभीर पहल चल रही है।
अब तक हुई खुदाइयों से जो तथ्य सामने आए हैं, वे सिरपुर के महत्व को और गहराई देते हैं। यहां ऐसा शिवलिंग मिला है, जिसे काशी विश्वनाथ में स्थापित प्राचीन शिवलिंग के समतुल्य माना जा रहा है। दो हजार वर्ष पुराने, पौरुष पत्थर से निर्मित इस विशाल शिवलिंग की गोलाई लगभग ढाई फीट है। पुरातत्व विभाग के अनुसार यह छत्तीसगढ़ में अब तक मिला सबसे प्राचीन और विशाल शिवलिंग है। यह खोज सिद्ध करती है कि सिरपुर शैव परंपरा का अत्यंत प्राचीन केंद्र रहा है।
सिरपुर की विशेषता शैव धर्म तक सीमित नहीं रही। यहां शैव, वैष्णव, जैन और बौद्ध चारों परंपराओं के अनुयायियों का समन्वय दिखाई देता है। बौद्ध विहारों की लंबी शृंखला यह संकेत देती है कि यह क्षेत्र बौद्ध शिक्षा और साधना का भी बड़ा केंद्र था। यह भी कहा जाता है कि भगवान बुद्ध स्वयं यहां आए थे, हालांकि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण अभी नहीं मिले हैं, लेकिन बौद्ध स्थापत्य इस दावे को मजबूती जरूर देता है। यही बहुलतावादी सांस्कृतिक चरित्र सिरपुर को वैश्विक महत्व प्रदान करता है।
सिरपुर की पुरा विशेषताओं का केंद्र है लक्ष्मण मंदिर। यह एक मंदिर या स्थापत्य स्मारक नहीं, अपितु अगाध प्रेम और मौन समर्पण का अद्वितीय प्रतीक है। ईसवी 635640 के बीच दक्षिण कौशल के राजा हर्षगुप्त की स्मृति में उनकी पत्नी, मगध नरेश सूर्यवर्मा की पुत्री रानी वासटादेवी ने इस मंदिर का निर्माण कराया। यह तथ्य खुदाई में प्राप्त शिलालेखों से प्रमाणित हुआ है। इस दृष्टि से लक्ष्मण मंदिर, आगरा के ताजमहल से लगभग 1100 वर्ष अधिक प्राचीन प्रेम-स्मारक सिद्ध होता है।
चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी अपने यात्रा-वृत्तांत में श्रीपुर (आज का सिरपुर) और रानी वासटादेवी का उल्लेख किया है। लक्ष्मण मंदिर में अंकित विष्णु के दशावतार, शैव और वैष्णव संस्कृतियों के संगम को दर्शाते हैं। मिट्टी से बनी, पकी हुई ईंटों से निर्मित यह मंदिर दक्षिण कौशल की शैव परंपरा और मगध की वैष्णव संस्कृति के अद्भुत मिलन का गवाह है।
इतिहास की आपदाओं ने भी लक्ष्मण मंदिर की गरिमा को कम नहीं किया। 12वीं शताब्दी के भीषण भूकंप में पूरा श्रीपुर ध्वस्त हो गया। 14वीं15वीं शताब्दी में महानदी की विकराल बाढ़ ने नगर को उजाड़ दिया, लेकिन इसके बावजूद लक्ष्मण मंदिर आज भी अडिग खड़ा है। इसके समीप स्थित कुछ मंदिर पूरी तरह नष्ट हो गए और तिवरदेव विहार में दरारें पड़ गईं, फिर भी लक्ष्मण मंदिर का सुरक्षित रहना इसके स्थापत्य कौशल और ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है।
साहित्यकारों ने ताजमहल को पुरुष के प्रेम की मुखर अभिव्यक्ति और लक्ष्मण मंदिर को नारी के मौन प्रेम और समर्पण का प्रतीक बताया है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ताजमहल को समय के गाल पर जमा आंसू कहा था, तो लक्ष्मण मंदिर को समय के भाल पर चमकती बिंदी कहना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। यूरोपीय साहित्यकार एडविन एराल्ड ने भी इसे लाल ईंटों से बना नारी के मौन प्रेम का साक्षी कहा है।
आज जब नालंदा जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्र को वैश्विक मानचित्र पर पुनः प्रतिष्ठित किया गया है, तब यह प्रमाणित हो चुका है कि सिरपुर नालंदा से भी प्राचीन है। ऐसे में सिरपुर को भी उसी दृष्टि और गंभीरता से विकसित किया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ शासन और भारत सरकार ने हाल के वर्षों में सिरपुर महोत्सव, पर्यटन अधोसंरचना, सड़क और सुविधाओं के विस्तार जैसे प्रयास शुरू किए हैं, जो स्वागतयोग्य हैं। लेकिन अभी और बहुत कुछ किया जाना शेष है टीलों की खुदाई, व्यापक शोध, अंतरराष्ट्रीय प्रचार, संरक्षित पर्यटन विकास और स्थानीय समुदाय की सहभागिता के साथ सिरपुर को नए स्वरूप में देखा जा सकता है।
सिरपुर को विश्व पर्यटन और वैश्विक धरोहर बनाने के लिए आवश्यक है कि इसे उत्सवों तक सीमित न रखा जाए, इसे एक जीवंत ऐतिहासिक-सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। यदि योजनाबद्ध संरक्षण और संवेदनशील विकास किया जाए, तो सिरपुर छत्तीसगढ़ ही नहीं भारत की वैश्विक पहचान का सशक्त आधार बन सकता है। सिरपुर अतीत की धरोहर ही नहीं, भविष्य की संभावना है। जहां इतिहास बोलता है, प्रेम मौन रहता है और संस्कृति समय को चुनौती देती है।
-लेखक, छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक और चिंतनशील लेखक हैं।</description><guid>697</guid><pubDate>31-Jan-2026 2:10:27 pm</pubDate></item><item><title>सुशासन से समृद्धि की ओर छत्तीसगढ़</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=696</link><description>विष्णु के सुशासन से संवर रहा छत्तीसगढ़
 विशेष-लेख- छगन लोन्हारे, उप संचालक (जनसंपर्क)
रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 2 वर्ष के मुख्यमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ राज्य में विकास का एक नया आयाम गढ़कर राज्य के नागरिकों के दिलों में राज करने वाले मुख्यमंत्री के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। विष्णुदेव साय जनता के बीच के एक ऐसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं जिनकी सदाशयता और दूरगामी योजनाओं से प्रदेश में विकास और प्रगति का राह आसान हुआ है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आदिवासी पृष्ठभूमि से आते हैं। इस दृष्टि से आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाले वे प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री हैं। प्रदेश मे हाल ही में पुलिस महानिदेशकों एवं पुलिस महानिरीक्षको का सम्मेलन आयोजित किया गया। जिसमें प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह शामिल हुए।
 मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार ने एक साल के भीतर छत्तीसगढ़ के किसान भाइयों के खाते में 52 हजार करोड़ रुपए अंतरित कर उन्हें उत्साह से भर दिया है। धान खरीदी समाप्त होने के एक सप्ताह के भीतर किसानों को भुगतान कर दिया गया है। 52 हजार करोड़ रुपए किसानों के खाते में आने से वे खेती किसानी में भरपूर निवेश कर रहे हैं और इससे बाजार भी गुलजार हुए हैं जिससे शहरी अर्थव्यवस्था पर सीधा असर दिख रहा है। ट्रैक्टर आदि की बिक्री ने रिकार्ड आंकड़ा छू लिया है। धान का उचित मूल्य मिलने से किसानों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई और गत वर्ष 25 लाख 72 हजार किसानों ने 149 लाख 25 हजार मीट्रिक टन रिकॉर्ड धान बेचा। सरकार बनने के दूसरे दिन ही केबिनेट की बैठक कर मोदी जी की गारंटी के अनुरूप 18 लाख 12 हजार 743 प्रधानमंत्री आवास उपलब्ध कराने की स्वीकृत करने का निर्णय लिया गया।
 विष्णु देव साय ने अपने दो साल के संक्षिप्त कार्यकाल में छत्तीसगढ़ को सम्पूर्ण देश में एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। बहुत कम समय में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने प्रदेश की जनता के बीच जाकर पूरे प्रदेश की जनता का विश्वास जीता है और न केवल विश्वास जीता है बल्कि उनके हित को ध्यान में रखकर उन्होंने ऐसी योजनाओं का क्रियान्वयन किया है जिससे छत्तीसगढ़ का समग्र विकास सम्भव हो पाया है। यह केवल और केवल विष्णुदेव साय जैसे एक संवेदनशील, कर्मठ तथा ऊर्जावान मुख्यमंत्री ही सम्भव कर सकते हैं। नक्सल हिंसा प्रभावित गांवों में नियद नेल्लानार योजना के माध्यम से सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार जैसी मूलभूत सुविधाएं दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच रही है। प्रदेश में अब तक कुल 69 सुरक्षा केंद्र स्थापित किए गए हैं।
 मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने मुख्यमंत्री पद का शपथ लेते ही प्रदेश की समस्त महिलाओं को महतारी वंदन योजना जैसी एक लाभकारी योजना का सौगात दिया है। महतारी वंदन योजना से प्रदेश की महिलाओं को हर माह एक हजार रुपए की राशि दी जाती है जिससे वे स्वावलंबी बन सके एवं स्वयं का रोजगार भी प्रारंभ कर सके। साथ ही प्रदेश भर के किसानों को 2 साल का बकाया बोनस और 31 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी जैसे वादों को पूरा कर छत्तीसगढ़ के किसानों का मान बढ़ाया है। प्रदेश की नवीन औद्योगिक नीति से राज्य में अब तक 7.69 लाख रूपए के निवेश के प्रस्ताव मिले हैं।
खरीफ सीजन में उपज का वाजिब कीमत 3100 रूपए प्रति क्विंटल की दर से धान का उपार्जन किया गया। सरकार किसानों से 21 क्विंटल प्रति एकड़ धान खरीदी की है। मुख्यमंत्री श्री साय की नेतृत्व वाली सरकार के माध्यम से किसानों के खाते में 52 हजार करोड़ रूपए की राशि अंतरित (ट्रांसफर) हुई है। प्रदेश के नगर पालिका चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश प्राप्त हुआ। प्रदेश में अब ट्रिपल इंजन की सरकार से नगरों का सर्वांगीण विकास होगा।
 मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे जवानों के अदम्य साहस और सरकार के निरंतर प्रयासों से नक्सलवाद अब अंतिम सांस ले रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमितशाह का संकल्प है कि मार्च 2026 तक नक्सलवाद समाप्त कर देंगे। वो संकल्प पूरा होते साफ दिख रहा है विशेषकर बस्तर क्षेत्र में, जो वर्षों से विकास की मुख्यधारा से अछूता रहा है। वहां अब विकास की गंगा बहेगी।
 मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि प्रदेश में बीते 02 वर्षों में 529 नक्सली मारे जा चुके हैं, 1975 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया है और 2628 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। प्रदेश के बस्तर अंचल में आतंक का पर्याय रहे हार्डकोर नक्सली लीडर बसवराजू, लक्ष्मी नरसिम्हा चालम उर्फ सुधाकर, और माडवी हिड़मा को न्यूट्रलाइज किया गया इन पर करोड़ों का ईनाम घोषित था।
 मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने प्रदेश के हर वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने प्रदेश के हर वर्ग की बुनियादी सुविधाओं और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पीएम आवास योजना, कृषक उन्नति योजना, नियद नेल्ला नार, अखरा निर्माण योजना जैसी योजनाओं का शुभारम्भ किया है और जनता के बीच अपनी एक अलग छवि निर्मित की है।
 मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जनता के बीच और हर समुदाय के बीच एक ऐसा पुल बनाना जानते हैं जिससे सभी एक दूसरे से जुड़ सके और सभी प्रदेश के हित में अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह भी कर सके। उन्होंने अपने जीवन का बहुमूल्य समय पद्रेश की जनता को समर्पित कर यह सिद्ध कर दिया है कि उनका जीवन केवल उनका नहीं है अपितु प्रदेश की जनता की निस्वार्थ सेवा के लिए समर्पित है। वे सही मायने में एक ऐसे जननेता हैं जिनके लिए जनता ही सब कुछ हैं। ऐसे सेवाभावी और लोकप्रिय जनसेवक बहुत कम होते हैं जिनके लिए जनता का विकास और जनता का साथ ही सबसे महत्वपूर्ण होता है। यह सभी प्रदेशवासियों के लिए गौरवान्वित होने का विषय है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय उनके अपने बीच के लोकप्रिय नेता हैं जिनके लिए प्रदेश की जनता की खुशहाली ही सर्वाेपरि है।</description><guid>696</guid><pubDate>27-Jan-2026 12:33:48 pm</pubDate></item><item><title>हौसले की लौ जलाइए उम्र, बीमारी और कठिनाइयां मान लेंगी हार </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=695</link><description>-डॉ. नीरज गजेंद्र
जब मनुष्य के भीतर हौसला मजबूत होता है, तब उम्र सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाती है। बीमारी एक चुनौती और कठिनाइयां जीवन की परीक्षा बन जाती हैं। क्योंकि वास्तविक शक्ति शरीर में नहीं, सोच में बसती है। और जहां सोच सकारात्मक, आशावान और उद्देश्यपूर्ण हो, वहां सीमाएं स्वतः ही टूटने लगती हैं। भारतीय दर्शन और पुराणों में मन की इस शक्ति को बार-बार रेखांकित किया गया है। कठोपनिषद कहता है कि उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। अर्थात उठो, जागो और श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति तक मत रुको। यह वाक्य युवाओं के साथ हर उस व्यक्ति के लिए है, जो जीवन की किसी भी अवस्था में हताशा से घिर गया हो। जब भीतर से उठने का संकल्प जागता है, तब उम्र, बीमारी और परिस्थितियां स्वयं पीछे हटने लगती हैं।
पुराणों में राजा हरिश्चंद्र की कथा सत्य और अदम्य हौसले का प्रमाण बनती है। राजपाट, परिवार और सम्मान सब कुछ खो देने के बाद भी उन्होंने सत्य और धैर्य का साथ नहीं छोड़ा। परिस्थितियां कितनी ही कठिन क्यों न हों, मन का संकल्प यदि अडिग हो, तो जीवन की दिशा बदली जा सकती है। यही संदेश आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है, जब लोग छोटी-सी असफलता में भी टूटने लगते हैं।
आध्यात्म हमें सिखाता है कि बीमारी शरीर को छू सकती है, आत्मा को नहीं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः। आत्मा न कटती है, न जलती है। जब मनुष्य इस सत्य को आत्मसात कर लेता है, तब बीमारी का भय भी कम होने लगता है। आशा, विश्वास और सकारात्मक सोच स्वयं एक औषधि बन जाती है, जो शरीर और मन दोनों को संबल देती है। हमारे पुराणों में वृद्धावस्था को कमजोरी नहीं, अनुभव और तपस्या का काल माना गया है। ऋषि-मुनि वन में रहकर भी समाज को दिशा देते थे। उनकी आयु अधिक थी, साधन सीमित और संकल्प असीम थे। यह दर्शाता है कि जीवन की सार्थकता उम्र से नहीं, उद्देश्य से तय होती है। जब उद्देश्य स्पष्ट हो, तब कठिनाइयां राह की बाधा नहीं, अपितु सीढ़ी बन जाती हैं।
आशा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उसकी कोई सीमा नहीं होती। वह अंधकार में भी दीपक बनकर रास्ता दिखाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो आशा ईश्वर से जुड़ने का माध्यम है। जब मनुष्य कर्म करता है और फल को ईश्वर पर छोड़ देता है, तब चिंता स्वतः कम हो जाती है। यही भाव कर्मयोग का मूल यानि पूरी निष्ठा से प्रयास और पूर्ण विश्वास के साथ आगे बढ़ना है। आज के दौर में जब तनाव, रोग और अनिश्चितता जीवन का हिस्सा बन चुके हैं, तब सकारात्मक सोच किसी विलासिता नहीं, आवश्यकता बन गई है। हर सुबह यदि मन में यह भाव हो कि मैं कर सकता हूं, मेरे भीतर सामर्थ्य है, तो वही भाव दिनभर की ऊर्जा तय करता है। जैसे-जैसे सोच बदलती है, वैसे-वैसे परिस्थितियां भी बदलने लगती हैं।
जीवन का सार यही है कि हौसला भीतर से जागे। क्योंकि जब हौसला मजबूत होता है, तब उम्र, बीमारी और कठिनाई तीनों पीछे रह जाते हैं। आशाएं अनंत हैं, सोच असीम है और मनुष्य की आत्मिक शक्ति अपार। यही वह सत्य है, जिसे हमारे धर्म, दर्शन और पुराण सदियों से कहते आए हैं। अब आवश्यकता इसे समझने और अपने जीवन में उतारने की है।</description><guid>695</guid><pubDate>24-Jan-2026 2:44:26 pm</pubDate></item><item><title> वसंत पंचमी की मंगल कामनाएँ</title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=693</link><description>-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
हे पद्मजा सुरवंदिता, माँ शारदे वरदान दे।
विचलित नहीं पथ से रहूँ, कर्त्तव्य का संज्ञान दे।।
सौदामिनी हे विधिप्रिया, वागीश्वरी हंसासिनी।
ब्रह्मात्मजा ज्योतिर्मयी, पद पंकजा पद्मासिनी ।
माँ बुद्धिदात्री भारती, भुवनेश्वरी वरदायिनी।
दुर्गा भवानी अंबिका, सुखदायिनी स्वरदायिनी ।।
वर दे शुभे विद्योत्तमे ,शुचि भक्ति का अभिमान दे ।।
जगदंबिका हे ज्ञानदा, मन का अँधेरा दूर कर ।
माँ श्वेतवस्त्रा शोभिता, पीड़ा जगत की शीघ्र हर।
कर वेद-पुस्तकधारिणी, उत्थान कर ममतामयी ।
हो श्रीप्रदा हे वैष्णवी, दिव्यांगना करुणामयी ।।
माँ चंद्रिका शुभदा सदा, सच-झूठ पथ का भान दे ।।
सौम्या सुरासुर है नमन, हे कालरात्री माँ सुनो।
चित्रांबरा श्वेतासना, आवास हित मम उर चुनो ।
हे चित्रगंधा वरप्रदा, भंडार गीतों का भरो।
माँ पद्मनिलया मालिनी,भयमुक्त मन निर्मल करो ।।
आशीष देकर लेखनी , नव चेतना उत्थान दे ।।</description><guid>693</guid><pubDate>24-Jan-2026 2:46:41 pm</pubDate></item><item><title>नए वर्ष  </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=692</link><description>-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
नए वर्ष की भोर ने, फूँक दिया है शंख ।
आशा के उडगन उड़े, ले सपनों के पंख ।।
कर्म वृक्ष को सींचना, तप श्रम का ले नीर ।
सही वक्त पर फल लगें, रखना थोड़ी धीर ।।
बेला है नव वर्ष की, जागी नव उम्मीद।
चलें समय के साथ सब, करता यह ताकीद ।।
झेले थे संकट बहुत, दिवस रहे दुर्द्धर्ष ।
नया वर्ष यह आस दे, हो जीवन-उत्कर्ष ।।
अहं ब्रह्म की भ्रांति को, मानस में मत पाल ।
टिका नहीं कोई यहाँ , कहता जाता साल ।।
खुशी मनाते हैं सभी , आया है नव वर्ष ।
झूमे नाचे आज हम , छाया मन में हर्ष ।।
मिलजुलकर हम सब रहें, आई नूतन भोर ।
खुशियों की सौगात पा, भीगे नैना कोर ।।
अनुभव जीवन का नया , लेकर आया साल ।
करके अच्छे कर्म को ,उन्नत होता भाल ।।
लोग याद रखते सदा , करते हैं शुभ कर्म ।
करें भलाई जन सभी ,छूता सबका मर्म ।।
शीत लहर यह चल रही , मना रहे नव वर्ष ।
मदद करें हम दीन की , होता सबको हर्ष ।।
देते हैं शुभकामना , कुशल सभी का क्षेम ।
आँगन भीगे प्यार से ,सुख का बरसे हेम ।।</description><guid>692</guid><pubDate>18-Jan-2026 3:18:33 pm</pubDate></item><item><title>बाज की उड़ान और युवा चेतना का वैचारिक जीवन सूत्र </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=691</link><description>-डॉ. नीरज गजेंद्र
स्वामी विवेकानंद की जयंती भारतीय युवा चेतना को आत्मबल, विवेक और साहस की याद दिलाने का अवसर है। विवेकानंद का पूरा दर्शन इस मूल भाव पर टिका है कि मनुष्य कमजोर नहीं है, वह स्वयं में असीम शक्ति का स्रोत है। आज का युवा जब प्रतिस्पर्धा, आलोचना, असुरक्षा और निरंतर दबाव से घिरा हुआ है, तब विवेकानंद के विचार उसे भीतर से सशक्त बनाने का कार्य करते हैं। वे युवाओं को संघर्ष से भागने के बजाए साधना में बदलने की प्रेरणा देते हैं। धर्म के विषय में स्वामी विवेकानंद की दृष्टि अत्यंत स्पष्ट और आधुनिक रही है। उनके लिए धर्म किसी एक पंथ या कर्मकांड तक सीमित नहीं रहा। वह मनुष्य के चरित्र, साहस और आत्मविश्वास का निर्माण करने वाली शक्ति रहा है। वे कहते थे कि जो धर्म आपको निर्बल बनाता है, वह स्वीकार्य नहीं हो सकता। आज जब धर्म को लेकर शोर, आरोप-प्रत्यारोप और टकराव दिखाई देता है, तब स्वामी जी का संदेश युवाओं को यह सिखाता है कि सच्चा धर्म वह है जो भीतर दृढ़ता, करुणा और उद्देश्य पैदा करे।
इसी संदर्भ में एक प्रेरक दृष्टांत हमारे जीवन को गहराई से समझाता है। कहा जाता है कि बाज दुनिया का सबसे शक्तिशाली पक्षी होता है। उसकी दृष्टि तीक्ष्ण होती है और उड़ान ऊंचाइयों की ओर होती है। परंतु कई बार एक साधारण कौंआ उसकी पीठ पर बैठकर उसकी गरदन पर चोंच मारने लगता है। कौंआ बाज को परेशान करने की कोशिश करता है, उसे चुनौती देता है। आश्चर्य की बात यह है कि बाज न तो पलटकर कौंए पर हमला करता है, न ही उससे उलझता है। वह बस अपने पंख और फैलाता है और ऊपर की ओर उड़ान भरने लगता है। जैसे-जैसे वह ऊंचाई पर जाता है, हवा का दबाव बदलता है, सांस लेना कठिन हो जाता है और अंततः कौंआ स्वयं ही नीचे गिर जाता है, क्योंकि उस ऊंचाई पर टिके रहने की उसकी क्षमता ही नहीं होती। बाज कौंए को जवाब नहीं देता, क्योंकि वह जानता है कि अपनी ऊर्जा व्यर्थ करने से बेहतर है अपनी उड़ान पर ध्यान देना।
स्वामी विवेकानंद का जीवन और विचार इसी बाज की उड़ान जैसे हैं। उन्होंने युवाओं को सिखाया कि हर आलोचना का उत्तर देना आवश्यक नहीं, हर विरोध से उलझना बुद्धिमानी नहीं है। जीवन में ऐसे लोग, परिस्थितियां और व्यवस्थाएं मिलेंगी जो प्रतिभाशाली की प्रगति से असहज होंगी, उन्हें रोकने या नीचा दिखाने का प्रयास करेंगी। लेकिन प्रतिभाशाली अपनी ऊर्जा प्रतिक्रियाओं में खर्च कर देगा, तो वह अपनी ऊंचाई खो बैठेगा। विवेकानंद कहते थे कि ताकतवर बनो, निर्भीक बनो। अध्यात्म को उन्होंने पलायन नहीं, आत्मजागरण का मार्ग बताया है। उनके अनुसार अध्यात्म का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, संसार में रहते हुए स्वयं को पहचानना है। आधुनिक जीवन में जब युवा मानसिक तनाव, असमंजस और उद्देश्यहीनता से जूझ रहा है, तब अध्यात्म उसे भीतर स्थिरता देता है। आज जिसे हम आत्मविश्वास, फोकस और मानसिक स्वास्थ्य कहते हैं, वही विवेकानंद के अध्यात्म का आधुनिक रूप है।
आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन विवेकानंद की विशेषता थी। उन्होंने पश्चिम की वैज्ञानिक सोच, संगठन और कर्मठता की प्रशंसा की, लेकिन उन्होंने भारत की आत्मा और आध्यात्मिक दृष्टि को नहीं छोड़ा। आज का युवा तकनीक, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ रहा है, पर यदि उसके पास आंतरिक अनुशासन और मूल्य नहीं होंगे, तो सफलता भी उसे संतोष नहीं दे पाएगी। विवेकानंद का संदेश है ऊंचा सोचो, बड़ा करो, लेकिन भीतर से खोखले मत बनो।
बाज और कौंए की कथा आज के सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन का प्रतीक है। हर प्रतिभाशाली युवा के आसपास ऐसे लोग होंगे जो उसकी उड़ान से चिढ़ेंगे, उसे व्यर्थ विवादों में उलझाना चाहेंगे। पर विवेकानंद का युवा वही है जो अपनी दिशा नहीं छोड़ता, जो ऊंचाई चुनता है। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता है, नकारात्मकता स्वयं छूटती चली जाती है। आशय कि हमें अपनी ऊर्जा जवाब देने में नहीं, उड़ान भरने में लगानी चाहिए। आलोचनाओं से नहीं, कर्म से उत्तर देना चाहिए। और यह भी याद रखना चाहिए कि जिस ऊंचाई पर आपको पहुंचना है, वहां हर कोई साथ नहीं चल सकता। यही जीवन का सत्य है, यही स्वामी विवेकानंद का अमर संदेश।
(लेखक हिंदी पत्रकारिता के वरिष्ठ हस्ताक्षर, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक और विचारोत्तेजक लेखन के वैचारिक स्तंभकार हैं।)</description><guid>691</guid><pubDate>12-Jan-2026 2:33:47 pm</pubDate></item><item><title>हिंदी प्यारी भाषा </title><link>https://chhattisgarhaaj.com/document.php?articleid=690</link><description>विश्व हिंदी दिवस पर गीत
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग (वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
विश्व रहा स्वीकार इसे अब, हिंदी प्यारी भाषा है।
बाँध लिया मन स्नेह-सूत्र में, जन-जन की प्रत्याशा है।
सरल-सहज यह पावन धारा, लेकर सबको साथ चली।
राष्ट्र-धर्म की सीमा लाँघी, प्रचलित होती गाँव-गली।
जीत लिया मन सबका इसने, सुखदायी अभिलाषा है।।
विश्व रहा स्वीकार इसे अब, हिंदी प्यारी भाषा है।।
देवनागरी लिपि अद्भुत है, सुंदर सुगढ़ शिल्प-शैली।
अनुपम शब्द-नाद अनुशासित, अंतर्मन तक जड़ फैली।
अर्थ नवल संदर्भ शुभोचित, गढ़े नई परिभाषा है।।
विश्व रहा स्वीकार इसे अब, हिंदी प्यारी भाषा है।।
उन्नत रूप व्याकरणसम्मत,दृष्टिकोण है वैज्ञानिक।
शब्दकोश समृद्ध अति व्यापक, भावमयी यह वैधानिक।
संस्कारों की बनी वाहिका, जागृत ज्ञान-पिपासा है।।
विश्व रहा स्वीकार इसे अब, हिंदी प्यारी भाषा है।।</description><guid>690</guid><pubDate>11-Jan-2026 12:35:07 am</pubDate></item></channel></rss>