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पूंजीगत व्यय बढ़ाने, संकट से प्रभावित क्षेत्रों को समर्थन देने के लिए वित्तीय गुंजाइश उपलब्ध : सीतारमण

नयी दिल्ली. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि राजकोषीय सूझबूझ ने सरकार को पूंजीगत व्यय बढ़ाने और पश्चिम एशिया संकट से प्रभावित क्षेत्रों को समर्थन देने के लिए पर्याप्त वित्तीय गुंजाइश दी है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा भारतीय रिजर्व बैंक उभरती स्थिति से निपटने के लिए ब्याज दरों में और कटौती कर सकता है। सीतारमण ने चुनौतीपूर्ण समय में अच्छी सार्वजनिक वित्त नीति के महत्व का जिक्र करते हुए कहा कि इससे आर्थिक नरमी के दौर में उससे निपटने, विशेष रूप से विपरीत परिस्थितियों में भी टिके रहने की क्षमता में सुधार होता है। उन्होंने यहां राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान (एनआईपीएफपी) के एक कार्यक्रम में कहा कि आज भारी कर्ज और बड़े घाटे वाले कई देशों के पास कोई विकल्प नहीं बचा है और उन्हें मितव्ययिता और अस्थिरता के बीच एक कठिन विकल्प का सामना करना पड़ रहा है। वित्त मंत्री ने कहा, ''इसके उलट, भारत के पास राजकोषीय संसाधन हैं। पूंजीगत व्यय कार्यक्रम को जारी रखने की गुंजाइश है, आरबीआई के पास ब्याज दरें कम करने की गुंजाइश है और प्रभावित क्षेत्रों को लक्षित सहायता प्रदान करने की क्षमता है। यह एक दशक की राजकोषीय सूझबूझ और अनुशासन का परिणाम है।'' उन्होंने कहा कि राजकोषीय गुंजाइश को देखते हुए ही हाल ही में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क कम किए गए और प्रमुख पेट्रोरसायन उत्पादों पर सीमा शुल्क से छूट दी गयी। एसईजेड (विशेष आर्थिक क्षेत्र) को घरेलू शुल्क क्षेत्र में परिचालन की अनुमति दी गयी। सरकार ने 26 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की ताकि युद्ध के बीच बढ़ती वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों के प्रभाव से उपभोक्ताओं को बचाया जा सके। अमेरिका और इजराइल के 28 फरवरी को ईरान पर सैन्य हमले के बाद से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप ईरान ने व्यापक जवाबी कार्रवाई की। सरकार ने डीजल पर 21.50 रुपये प्रति लीटर और विमान ईंधन (एटीएफ) पर 29.50 रुपये प्रति लीटर का निर्यात शुल्क भी लगाया। पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क घटाकर तीन रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है, जबकि डीजल पर यह वर्तमान में शून्य है। भारत ने दो अप्रैल को पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण पोत परिवहन मार्गों में समस्याओं के बीच आपूर्ति स्थिरता सुनिश्चित करने और अंतिम उत्पादों के उपभोक्ताओं को राहत प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण पेट्रोरसायन उत्पादों के आयात को सीमा शुल्क से छूट दी। सीतारमण ने कहा कि यह साल पिछले वर्ष की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा, ''पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करने वाला बड़ा झटका बन गया है और नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का संकेत दे रहा है।'' सीतारमण ने 2025 को प्रभावित करने वाली विभिन्न वैश्विक घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि यह वर्ष नीति निर्माताओं की शुरुआती सोच से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बन गया है। उन्होंने कहा, ''शुल्क और अन्य बाधाओं के कारण व्यापार के प्रभावित होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में गंभीर अनिश्चितता पैदा कर दी है। इसके चलते वैश्विक वृद्धि अनुमान में भारी गिरावट आई...।'' भारत के ऋण-जीडीपी अनुपात का उल्लेख करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि सामान्य सरकारी ऋण-जीडीपी अनुपात (राज्यों के कर्ज के साथ) 81 प्रतिशत के साथ भारत, जर्मनी के बाद प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम है। उन्होंने कहा कि इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत एकमात्र ऐसी प्रमुख अर्थव्यवस्था है जहां अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष का अनुमान है कि यह अनुपात 2030 तक घटकर 75.8 प्रतिशत हो जाएगा। जबकि अमेरिका, चीन, जर्मनी और अन्य जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऋण की स्थिति और खराब होने का अनुमान है। वित्त मंत्री ने कहा, ''सितंबर, 2025 तक हमारा बाह्य ऋण-जीडीपी अनुपात मात्र 19.1 प्रतिशत है, जो उभरते बाजारों में सबसे कम में से एक है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 688 अरब डॉलर (31 मार्च 2026 की स्थिति के अनुसार) से अधिक है, जो लगभग 11 महीनों के आयात को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।'' सीतारमण ने कहा कि वास्तव में यह वर्षों के राजकोषीय प्रबंधन के दौरान लिए गए सुनियोजित, निरंतर और कभी-कभी राजनीतिक रूप से कठिन निर्णयों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि यह इस सरकार की उपयुक्त नीतियों और स्थिर नेतृत्व के कारण संभव हुआ है, जिसका एकमात्र लक्ष्य भारत की तीव्र प्रगति सुनिश्चित करना है। सीतारमण ने कहा कि सूझबूझ के साथ राजकोषीय नीति का अर्थ केवल 'किफायती' या खर्च में कटौती करना नहीं है, बल्कि संसाधनों का कुशल और पारदर्शी तरीके से उपयोग करना भी है। उन्होंने कहा कि इस विवेकपूर्ण प्रबंधन ने भारत की वृहद आर्थिक स्थिरता को मजबूत किया है, जिसके परिणामस्वरूप 2025 में मॉर्निंगस्टार डीबीआरएस, एसएंडपी और आर एंड आई जैसी एजेंसियों ने साख में सुधार किया है। वित्त मंत्री ने कहा कि एक दशक पहले भारत को 'कमजोर पांच अर्थव्यवस्थाओं' में शामिल किया जाता था लेकिन देश अब विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है। उन्होंने कहा, ''हमने एक अस्थिर राजकोषीय घाटे के साथ शुरुआत की थी। हमने इसे जीडीपी के 4.4 प्रतिशत तक कम कर दिया है, जो 2030-31 तक जीडीपी के 50 प्रतिशत ऋण अनुपात की ओर बढ़ रहा है। हमने संदेह पर आधारित कर प्रणाली के साथ शुरुआत की थी। हमने एक ऐसी कर प्रणाली बनाई है जो विश्वास पर आधारित है।'' सीतारमण ने कहा कि विकसित भारत 2047 का मार्ग लंबा है और आगे आने वाली चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। इन चुनौतियों में जलवायु वित्त, ऋण प्रबंधन, जनसांख्यिकीय परिवर्तन के राजकोषीय निहितार्थ, सार्वजनिक निवेश पर प्रतिफल की चुनौती, प्रौद्योगिकी-आधारित व्यवधान आदि शामिल हैं।

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