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- -डॉ. नीरज गजेंद्रस्वामी विवेकानंद की जयंती भारतीय युवा चेतना को आत्मबल, विवेक और साहस की याद दिलाने का अवसर है। विवेकानंद का पूरा दर्शन इस मूल भाव पर टिका है कि मनुष्य कमजोर नहीं है, वह स्वयं में असीम शक्ति का स्रोत है। आज का युवा जब प्रतिस्पर्धा, आलोचना, असुरक्षा और निरंतर दबाव से घिरा हुआ है, तब विवेकानंद के विचार उसे भीतर से सशक्त बनाने का कार्य करते हैं। वे युवाओं को संघर्ष से भागने के बजाए साधना में बदलने की प्रेरणा देते हैं। धर्म के विषय में स्वामी विवेकानंद की दृष्टि अत्यंत स्पष्ट और आधुनिक रही है। उनके लिए धर्म किसी एक पंथ या कर्मकांड तक सीमित नहीं रहा। वह मनुष्य के चरित्र, साहस और आत्मविश्वास का निर्माण करने वाली शक्ति रहा है। वे कहते थे कि जो धर्म आपको निर्बल बनाता है, वह स्वीकार्य नहीं हो सकता। आज जब धर्म को लेकर शोर, आरोप-प्रत्यारोप और टकराव दिखाई देता है, तब स्वामी जी का संदेश युवाओं को यह सिखाता है कि सच्चा धर्म वह है जो भीतर दृढ़ता, करुणा और उद्देश्य पैदा करे।इसी संदर्भ में एक प्रेरक दृष्टांत हमारे जीवन को गहराई से समझाता है। कहा जाता है कि बाज दुनिया का सबसे शक्तिशाली पक्षी होता है। उसकी दृष्टि तीक्ष्ण होती है और उड़ान ऊंचाइयों की ओर होती है। परंतु कई बार एक साधारण कौंआ उसकी पीठ पर बैठकर उसकी गरदन पर चोंच मारने लगता है। कौंआ बाज को परेशान करने की कोशिश करता है, उसे चुनौती देता है। आश्चर्य की बात यह है कि बाज न तो पलटकर कौंए पर हमला करता है, न ही उससे उलझता है। वह बस अपने पंख और फैलाता है और ऊपर की ओर उड़ान भरने लगता है। जैसे-जैसे वह ऊंचाई पर जाता है, हवा का दबाव बदलता है, सांस लेना कठिन हो जाता है और अंततः कौंआ स्वयं ही नीचे गिर जाता है, क्योंकि उस ऊंचाई पर टिके रहने की उसकी क्षमता ही नहीं होती। बाज कौंए को जवाब नहीं देता, क्योंकि वह जानता है कि अपनी ऊर्जा व्यर्थ करने से बेहतर है अपनी उड़ान पर ध्यान देना।स्वामी विवेकानंद का जीवन और विचार इसी बाज की उड़ान जैसे हैं। उन्होंने युवाओं को सिखाया कि हर आलोचना का उत्तर देना आवश्यक नहीं, हर विरोध से उलझना बुद्धिमानी नहीं है। जीवन में ऐसे लोग, परिस्थितियां और व्यवस्थाएं मिलेंगी जो प्रतिभाशाली की प्रगति से असहज होंगी, उन्हें रोकने या नीचा दिखाने का प्रयास करेंगी। लेकिन प्रतिभाशाली अपनी ऊर्जा प्रतिक्रियाओं में खर्च कर देगा, तो वह अपनी ऊंचाई खो बैठेगा। विवेकानंद कहते थे कि ताकतवर बनो, निर्भीक बनो। अध्यात्म को उन्होंने पलायन नहीं, आत्मजागरण का मार्ग बताया है। उनके अनुसार अध्यात्म का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, संसार में रहते हुए स्वयं को पहचानना है। आधुनिक जीवन में जब युवा मानसिक तनाव, असमंजस और उद्देश्यहीनता से जूझ रहा है, तब अध्यात्म उसे भीतर स्थिरता देता है। आज जिसे हम आत्मविश्वास, फोकस और मानसिक स्वास्थ्य कहते हैं, वही विवेकानंद के अध्यात्म का आधुनिक रूप है।आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन विवेकानंद की विशेषता थी। उन्होंने पश्चिम की वैज्ञानिक सोच, संगठन और कर्मठता की प्रशंसा की, लेकिन उन्होंने भारत की आत्मा और आध्यात्मिक दृष्टि को नहीं छोड़ा। आज का युवा तकनीक, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ रहा है, पर यदि उसके पास आंतरिक अनुशासन और मूल्य नहीं होंगे, तो सफलता भी उसे संतोष नहीं दे पाएगी। विवेकानंद का संदेश है ऊंचा सोचो, बड़ा करो, लेकिन भीतर से खोखले मत बनो।बाज और कौंए की कथा आज के सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन का प्रतीक है। हर प्रतिभाशाली युवा के आसपास ऐसे लोग होंगे जो उसकी उड़ान से चिढ़ेंगे, उसे व्यर्थ विवादों में उलझाना चाहेंगे। पर विवेकानंद का युवा वही है जो अपनी दिशा नहीं छोड़ता, जो ऊंचाई चुनता है। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता है, नकारात्मकता स्वयं छूटती चली जाती है। आशय कि हमें अपनी ऊर्जा जवाब देने में नहीं, उड़ान भरने में लगानी चाहिए। आलोचनाओं से नहीं, कर्म से उत्तर देना चाहिए। और यह भी याद रखना चाहिए कि जिस ऊंचाई पर आपको पहुंचना है, वहां हर कोई साथ नहीं चल सकता। यही जीवन का सत्य है, यही स्वामी विवेकानंद का अमर संदेश।(लेखक हिंदी पत्रकारिता के वरिष्ठ हस्ताक्षर, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक और विचारोत्तेजक लेखन के वैचारिक स्तंभकार हैं।)
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विश्व हिंदी दिवस पर गीत
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग (वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
विश्व रहा स्वीकार इसे अब, हिंदी प्यारी भाषा है।
बाँध लिया मन स्नेह-सूत्र में, जन-जन की प्रत्याशा है।
सरल-सहज यह पावन धारा, लेकर सबको साथ चली।
राष्ट्र-धर्म की सीमा लाँघी, प्रचलित होती गाँव-गली।
जीत लिया मन सबका इसने, सुखदायी अभिलाषा है।।
विश्व रहा स्वीकार इसे अब, हिंदी प्यारी भाषा है।।
देवनागरी लिपि अद्भुत है, सुंदर सुगढ़ शिल्प-शैली।
अनुपम शब्द-नाद अनुशासित, अंतर्मन तक जड़ फैली।
अर्थ नवल संदर्भ शुभोचित, गढ़े नई परिभाषा है।।
विश्व रहा स्वीकार इसे अब, हिंदी प्यारी भाषा है।।
उन्नत रूप व्याकरणसम्मत,दृष्टिकोण है वैज्ञानिक।
शब्दकोश समृद्ध अति व्यापक, भावमयी यह वैधानिक।
संस्कारों की बनी वाहिका, जागृत ज्ञान-पिपासा है।।
विश्व रहा स्वीकार इसे अब, हिंदी प्यारी भाषा है।। -
विशेष लेख : धनंजय राठौर ,संयुक्त संचालक, प्रदीप कंवर ,सहायक संचालक
रायपुर ।आर्थिक रूप से सशक्तिकरण की नींव सशक्त मानसिकता पर आधारित होती है। दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास व्यक्ति को सफलता की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। सूरजपुर जिले की स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं ने इस सोच को व्यवहार में उतारते हुए आत्मनिर्भरता की एक सशक्त मिसाल प्रस्तुत की है। ये महिलाएं न केवल स्वयं सशक्त बन रही हैं, बल्कि जिले की महिलाओं एवं बच्चों को पोषण उपलब्ध कराने के अभियान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।पोषण और महिलाओं का सशक्तिकरण दोनों होता हैपोषण आहार (रेडी-टू-ईट या RTE) निर्माण संयंत्र सरकार द्वारा संचालित ऐसी इकाइयाँ हैं, जो आंगनवाड़ियों और अन्य योजनाओं के तहत बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरी बालिकाओं के लिए पौष्टिक, पहले से तैयार भोजन बनाती हैं, जिसे महिला स्व-सहायता समूहों (SHGs) द्वारा चलाया जाता है, जिससे पोषण और महिलाओं का सशक्तिकरण दोनों होता है, जिसमें गेहूं, दालें, और दूध जैसे घटक शामिल होते हैं, जो प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं।स्वादिष्ट एवं पौष्टिक नमकीन दलिया तथा मीठा शक्ति आहार का निर्माणजिले में आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं एवं बच्चों को गुणवत्तापूर्ण पोषण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तत्काल उपभोग हेतु तैयार पोषण आहार (रेडी टू ईट) निर्माण संयंत्र का शुभारंभ किया गया है। इन संयंत्रों में स्वादिष्ट एवं पौष्टिक नमकीन दलिया तथा मीठा शक्ति आहार का निर्माण किया जा रहा है, जो विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘डी’, थायमिन, राइबोफ्लेविन, नियासिन, पाइरीडॉक्सिन, फोलिक अम्ल, कोबालामिन, लोह तत्व (आयरन), कैल्शियम एवं जिंक जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर है।तीनों संयंत्रों में 32 महिलाएं प्रत्यक्ष रूप से पोषण आहार निर्माण कार्य में संलग्नजिले प्रशासन द्वारा जिले में कुल 07 पोषण आहार निर्माण संयंत्र स्थापित किए गए है। यहां वर्तमान में भैयाथान, प्रतापपुर एवं सूरजपुर विकासखंड में तीन संयंत्रों का सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है। इन तीनों संयंत्रों में 32 महिलाएं प्रत्यक्ष रूप से पोषण आहार निर्माण कार्य में संलग्न हैं। निर्मित पोषण आहार आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों को निःशुल्क प्रदान किया जा रहा है। इस प्रकार स्व-सहायता समूहों की महिलाएं मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुदृढ़ीकरण में अप्रत्यक्ष किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण बात है कि पोषण आहार के निर्माण के साथ-साथ उसके वितरण की भी जिम्मेदारी भी महिला स्व-सहायता समूहों को सौंपी गई है।भैयाथान विकासखंड में 15 स्व-सहायता समूहसूरजपुर विकासखंड में 15 स्व-सहायता समूह तथा प्रतापपुर विकासखंड में 13 स्व-सहायता समूह सक्रिय रूप से वितरण कार्य में अपनी भूमिका निभा रही है। इन समूहों के माध्यम से कुल 430 महिलाएं आंगनबाड़ी केंद्रों तक पोषण आहार वितरण कार्य में सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। इस योजना से महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं। मानसिक रूप से सशक्त ये महिलाएं अब घरेलू कार्यों के साथ-साथ आजीविका से जुड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। यह पहल न केवल निश्चित रूप से जिले में पोषण स्तर सुधारने में सहायक सिद्ध होगी, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत कर रही है। - सूरजपुर। आर्थिक सशक्तिकरण की नींव सशक्त मानसिकता पर आधारित होती है। दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास व्यक्ति को सफलता की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। सूरजपुर जिले की स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं ने इस सोच को व्यवहार में उतारते हुए आत्मनिर्भरता की एक सशक्त मिसाल प्रस्तुत की है। ये महिलाएं न केवल स्वयं सशक्त बन रही हैं, बल्कि जिले की महिलाओं एवं बच्चों को पोषण उपलब्ध कराने के अभियान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं एवं बच्चों को गुणवत्तापूर्ण पोषण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तत्काल उपभोग हेतु तैयार पोषण आहार (रेडी टू ईट) निर्माण संयंत्र का शुभारंभ किया गया है। इन संयंत्रों में स्वादिष्ट एवं पौष्टिक नमकीन दलिया तथा मीठा शक्ति आहार का निर्माण किया जा रहा है, जो विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘डी’, थायमिन, राइबोफ्लेविन, नियासिन, पाइरीडॉक्सिन, फोलिक अम्ल, कोबालामिन, लोह तत्व (आयरन), कैल्शियम एवं जिंक जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर है।जिले प्रशासन द्वारा जिले में कुल 07 पोषण आहार निर्माण संयंत्र स्थापित किए गए है। यहां वर्तमान में भैयाथान, प्रतापपुर एवं सूरजपुर विकासखंड में तीन संयंत्रों का सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है। इन तीनों संयंत्रों में 32 महिलाएं प्रत्यक्ष रूप से पोषण आहार निर्माण कार्य में संलग्न हैं। निर्मित पोषण आहार आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों को निःशुल्क प्रदान किया जा रहा है। इस प्रकार स्व-सहायता समूहों की महिलाएं मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुदृढ़ीकरण में अप्रत्यक्ष किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण बात है कि पोषण आहार के निर्माण के साथ-साथ उसके वितरण की भी जिम्मेदारी भी महिला स्व-सहायता समूहों को सौंपी गई है।भैयाथान विकासखंड में 15 स्व-सहायता समूह,सूरजपुर विकासखंड में 15 स्व-सहायता समूह तथा प्रतापपुर विकासखंड में 13 स्व-सहायता समूह सक्रिय रूप से वितरण कार्य में अपनी भूमिका निभा रही है।इन समूहों के माध्यम से कुल 430 महिलाएं आंगनबाड़ी केंद्रों तक पोषण आहार वितरण कार्य में सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं।इस योजना से महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं। मानसिक रूप से सशक्त ये महिलाएं अब घरेलू कार्यों के साथ-साथ आजीविका से जुड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। यह पहल न केवल निश्चित रूप से जिले में पोषण स्तर सुधारने में सहायक सिद्ध होगी, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत कर रही है।
- नरेंद्र मोदी(नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं और श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं।)सोमनाथ... ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है...“सौराष्ट्रे सोमनाथं च...यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है। शास्त्रों में ये भी कहा गया है:“सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥”अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था।वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था।सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे।1026 में एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण, वहां के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय कांप उठता है। हर पंक्ति में क्रूरता के निशान मिलते हैं, ये ऐसा दुःख है जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है।हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत पर और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बहुत ज्यादा था। ये बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता था। ये एक ऐसे समाज की प्रेरणा था जिसकी आर्थिक क्षमता भी बहुत सशक्त थी। हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे।सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास के साथ और गर्व से ये कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। ये पिछले 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है, ये हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है।1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। यह हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था। लेकिन हर बार जब मंदिर पर आक्रमण हुआ, तब हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया। और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं की भीतर सांस लेती रही। साल 1026 के हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है, कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं, जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है। वो आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है।ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें।1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे, वो अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की।उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे।इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार बार नष्ट किए गए, और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त। पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है। इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।”ये सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। उन्होंने आगे बढ़कर इस दायित्व के लिए कदम बढ़ाया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। महान सरदार साहब इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था।तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी। लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’, अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर रही।इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। सदियों पहले जैन परंपरा के आदरणीय मुनि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य यहां आए थे और कहा जाता है कि प्रार्थना के बाद उन्होंने कहा,“भवबीजाङ्कुरजनना रागाद्याः क्षयमुपगता यस्य।अर्थात्, उस परम तत्व को नमन जिसमें सांसारिक बंधनों के बीज नष्ट हो चुके हैं। जिसमें राग और सभी विकार शांत हो गए हैं।आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से ऐसी ही अनुभूति होती है। मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है।1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है।अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है। सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है। ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है।अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।जय सोमनाथ !***
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)नेह-दिखावे की रीति यहाँ ,झूठ-फरेब की है दुनिया ।मिश्री की डली घुली बोली ,क्रोध दिलों में पलते हैं ।चल कहीं और चलते हैं....!!फट रहा विश्वास का दामन ,नफरतों से है भरा मन ।टकरा रहे जाम हाथों में ,पीछे ख़ंजर चलते हैं...।चल कहीं और चलते हैं....!!फूल बिछाए थे राहों में ,काँटों को छाँटा हमने ।घावों की पीर रहे सहते,बातों के नश्तर चुभते हैं .....।चल कहीं और चलते हैं....!!रिश्तों का खारापन देखा ,उजला - काला मन देखा ।सोचें होगा तन मरुथल -सा ,सीने में समंदर पलते हैं....।चल कहीं और चलते हैं....!!फुलवारी का विनाश देखा ,माली को उदास देखा ।ऐसी जगह नहीं रहना है ,जहाँ वहशी दरिंदे...नन्हीं कलियों को मसलते हैं....।चल कहीं और चलते हैं.....!!
- आर्टिकल -राहुल बोस2025 भारत के खेलों के लिए एक निर्णायक वर्ष साबित हुआ। यह साल सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मेडल जीतने के लिए महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि इसलिए भी खास रहा क्योंकि भारत के खेल तंत्र में बड़े बदलाव शुरू हुए। सरकार और निजी क्षेत्र ने खेलों में निवेश बढ़ाया, नई नीतियां बनाई गई और खेल सुविधाओं का विस्तार किया गया। अब इन कदमों को आगे बढ़ाने की जरूरत है ताकि भारत खेलों में मज़बूत और सफल राष्ट्र बन सके।इस साल सरकार ने नेशनल स्पोर्ट्स पॉलिसी (एनएसपी) 2025 को मंजूरी दी। यह नीति भारतीय खेलों के लिए एक लंबी अवधि की सोच और बेहतर अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन का लक्ष्य तय करती है। भारत पहले ही 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी कर रहा है और 2036 ओलंपिक की मेजबानी करने की इच्छा भी जताई है।इसके बाद नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट 2025 लागू किया गया। इस कानून ने खेल प्रशासन की व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है। अब फैसले मनमर्जी से नहीं, बल्कि पारदर्शी तरीके और तय नियमों के अनुसार होंगे। इस कानून में खिलाड़ियों को केंद्र में रखा गया है। चयन प्रक्रिया, फंडिंग से जुड़े फैसले और शिकायत निवारण जैसी चीजों के लिए साफ नियम, मानक और समय-सीमा तय की गई है।इससे अनियमितता कम होगी और खिलाड़ियों, खासकर छोटे शहरों और कम सुविधाओं वाले पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ियों के बीच भरोसा बढ़ेगा।मेरे लिए सबसे खास बात यह है कि पहली बार इस कानून के तहत खेल संगठनों को अनिवार्य रूप से एक “सेफ स्पोर्ट्स पॉलिसी” अपनानी होगी, ताकि महिलाओं, नाबालिग खिलाड़ियों और कमजोर वर्ग के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। इसके साथ ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार एक आचार संहिता भी लागू करनी होगी।एक स्वतंत्र नेशनल स्पोर्ट्स बोर्ड और विशेष स्पोर्ट्स ट्रिब्यूनल निगरानी रखेंगे, जिससे स्थिरता और निरंतरता बनी रहेगी। वहीं, खिलाड़ियों की भागीदारी और महिलाओं को निर्णय लेने वाली समितियों में शामिल करना, खेल संघों में शक्ति संतुलन को बेहतर बनाता है। इन सभी बदलावों से खेल व्यवस्था में निष्पक्षता, भरोसा और लंबी अवधि की स्थिरता आएगी, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के लिए जरूरी है।प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय खिलाड़ियों में व्यक्तिगत रुचि दिखाई है। वे खिलाड़ियों और टीमों को अपने घर बुलाकर सिर्फ सम्मान ही नहीं देते, बल्कि उनसे खुलकर बातचीत भी करते हैं। इन मुलाकातों में खिलाड़ियों की जीवन यात्रा, उनकी चुनौतियाँ, त्याग और सफलताओं पर बात होती है।मैं भी अलग-अलग खेलों में भारत की प्रगति को बड़ी दिलचस्पी से देख रहा हूँ। इसी महीने जोशना चिनप्पा, अभय सिंह और अनाहत सिंह ने इतिहास रचा, जब भारत ने हांगकांग को 3-0 से हराकर पहली बार स्क्वैश वर्ल्ड कप का खिताब जीता।भारतीय महिलाओं ने 2025 में दुनिया के खेल मंच पर शानदार प्रदर्शन किया। नवंबर 2025 में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने आईसीसी महिला वर्ल्ड कप जीता। इसी तरह, भारतीय महिला ब्लाइंड क्रिकेट टीम ने भी अपनी पहली टी20 वर्ल्ड कप जीतकर इतिहास रचा।मुक्केबाज़ी में भी भारत ने शानदार शुरुआत की और वर्ल्ड बॉक्सिंग कप फाइनल 2025 में नौ स्वर्ण पदक जीते। एशियन यूथ गेम्स 2025 में भी भारत ने अब तक का अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने बिहार के राजगीर में हुए एशिया कप 2025 में दक्षिण कोरिया को 4-1 से हराकर खिताब जीता और आठ साल बाद फिर से एशियाई चैम्पियन बनी।18 साल की शीतल देवी पैराआर्चरी में विश्व चैंपियन बनीं, और दिव्या देशमुख पहली भारतीय महिला बनीं जिन्होंने फाइड (FIDE) महिला वर्ल्ड कप का खिताब जीता।2025 में भारत की खेल सफलताएँ सिर्फ कुछ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों तक फैलीं। हाल ही में एफआईएच पुरुष जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप तमिलनाडु में हुआ, और वर्ल्ड बॉक्सिंग कप फाइनल ग्रेटर नोएडा में आयोजित किए गए। अहमदाबाद में बने नए और विश्वस्तरीय वीर सावरकर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में 11वीं एशियन एक्वेटिक्स चैम्पियनशिप आयोजित हुई।रग्बी में भी बड़ी उपलब्धि देखी गई। बिहार के राजगीर में एशिया रग्बी एमिरेट्स अंडर-20 सेवन टूर्नामेंट हुआ, जिसमें भारतीय महिला टीम ने कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच ब्रॉन्ज मेडल जीता। एशिया रग्बी के अध्यक्ष क़ैस अल धलाई ने कहा कि बिहार में इस तरह का बड़ा युवा रग्बी टूर्नामेंट होना न सिर्फ खेल का जश्न है, बल्कि पूरे एशिया में खेल के फैलते विकास का मजबूत प्रमाण भी है।कई मायनों में रग्बी की प्रगति भी भारत के बड़े खेल बदलाव का ही हिस्सा है। जून 2025 में मुंबई में पहली बार रग्बी प्रीमियर लीग (RPL) का आयोजन हुआ। यह दुनिया की शुरुआती फ्रेंचाइज़ी आधारित रग्बी सेवन्स लीगों में से एक है। इसमें छह शहरों की टीमें (जैसे चेन्नई बुल्स, हैदराबाद हीरोज़, मुंबई ड्रीमर्स आदि) शामिल थीं, जिनमें भारतीय खिलाड़ियों के साथ न्यूज़ीलैंड, साउथ अफ्रीका, फिजी और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े रग्बी देशों के 30 से ज्यादा विदेशी खिलाड़ी भी खेले।15 जून को मुंबई के अंधेरी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में खेले गए पहले मैच में बड़ी संख्या में लोग उत्साह के साथ देखने आए। मैच टीवी और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी लाइव दिखाए गए। चार-चौथाई वाले रोमांचक मैच फॉर्मेट ने नई पीढ़ी के दर्शकों को आकर्षित किया और यह भरोसा दिलाया कि रग्बी भी भारत के व्यावसायिक खेलों का हिस्सा बन सकता है।इससे यह साफ दिखता है कि रग्बी कितनी आगे बढ़ चुकी है, क्योंकि सिर्फ एक महीने बाद भारत ने बिहार के राजगीर जैसे शहर में एशियाई स्तर की रग्बी चैंपियनशिप की मेजबानी भी की।केंद्र सरकार के खेल मंत्रालय ने खेलो इंडिया के तहत कई शहरों में अलग-अलग खेलों के लिए फ्रेंचाइज़ी आधारित लीग शुरू करने की बड़ी योजना बनाई है। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि अस्मिता (ASMITA) महिला रग्बी लीग ने देश के कई शहरों में युवा लड़कियों के बीच रग्बी को काफी बढ़ावा दिया है। साथ ही, निजी क्षेत्र की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। टीवी चैनल और ओटीटी प्लेटफॉर्म खेलों के प्रसारण अधिकार ले रहे हैं और स्पॉन्सर भी अब भारतीय खेलों को एक मजबूत और फायदेमंद अवसर के रूप में देखने लगे हैं।इस साल युवा मामले और खेल मंत्रालय ने नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशंस को मिलने वाली मदद की योजना में बड़े बदलाव किए। अब फेडरेशंस के लिए फंड पाने के लिए साफ नियम तय किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, जिन फेडरेशंस का वार्षिक बजट 10 करोड़ रुपये से ज्यादा है, उन्हें अब एक फुल-टाइम हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर रखना ज़रूरी है, जो खेल की तकनीकी और प्रदर्शन से जुड़ी योजनाओं को संभाले।हर खेल संगठन को अपने बजट का कम से कम 20% हिस्सा जमीनी स्तर के विकास, यानी जूनियर और युवा खिलाड़ियों की ट्रेनिंग पर खर्च करना होगा, और कम से कम 10% हिस्सा कोच और सपोर्ट स्टाफ की ट्रेनिंग पर लगाना होगा।अंतरराष्ट्रीय स्तर के संभावित खिलाड़ियों को अब नॉन-कैम्प दिनों में भी 10,000 रुपये मासिक डाइट भत्ता दिया जाएगा, ताकि कोई खिलाड़ी आर्थिक कमी की वजह से खाना छोड़कर अपने सपने पूरे करने से पीछे न रह जाए।इसी बीच “फिट इंडिया” आंदोलन, खासकर “सन्डेज ऑन साइकिल” पहल (दो बार मैं खुद हिस्सा रहा हूँ), पूरे देश में लोगों को हर हफ्ते साइकिल चलाने और फिट रहने के लिए प्रेरित कर रहा है। यह पहल केंद्रीय खेल मंत्री ने शुरू की है और भारतीयों में शारीरिक फिटनेस बढ़ाने की दिशा में एक अच्छा कदम है।मैं पहले भी कह चुका हूँ और फिर कहूँगा-खेल और फिटनेस समाज की जीवनशैली का हिस्सा बनने चाहिए। तभी असली और टिकाऊ बदलाव आएगा। हमें खेल से जुड़ा एक मानवीय और मजबूत सिस्टम बनाना होगा। सोने के मेडल किसी देश के लिए गर्व का बड़ा कारण होते हैं, लेकिन असली पहचान तब बनती है जब देश में हर किसी के लिए खेल सुलभ हों और खेल संस्कृति आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन जाए।संक्षेप में:नेशनल स्पोर्ट्स पॉलिसी के पाँच स्तंभ हर खेल को देश निर्माण में योगदान देने का मौका देते हैं – सिर्फ प्रदर्शन के जरिए नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर लोगों की भागीदारी, सामाजिक और आर्थिक प्रभाव और शिक्षा से जुड़ाव के माध्यम से भी।नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट खेल व्यवस्था में पहले से कहीं ज्यादा मजबूत नियम और व्यवस्था लाता है और फेडरेशंस को हर स्तर पर बेहतर प्रशासन और पारदर्शिता अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।यह नीति ऐसे नेताओं के लिए बड़ा अवसर देती है जो ईमानदारी से खेल क्षेत्र में योगदान देना चाहते हैं।खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन और केंद्र व राज्य सरकारों की सक्रिय भूमिका सभी हितधारकों-फेडरेशन से लेकर स्पॉन्सर तक को अपनी सोच और लक्ष्यों को और बड़ा करने के लिए प्रेरित करती है।खेलों के विकास के लिए सुरक्षित खेल माहौल बनाना और उम्र की गलत जानकारी (एज फ्रॉड) जैसी समस्याओं को रोकना बहुत ज़रूरी है, खासकर रग्बी जैसे खेलों के लिए।2030 कॉमनवेल्थ गेम्स और अन्य बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों की मेजबानी का अधिकार हासिल करना खिलाड़ियों और दर्शकों दोनों के लिए फायदेमंद है। इससे उन्हें विश्व स्तर के खेल देखने और खेलने का मौका मिलता है।सरकार ने लक्ष्य रखा है कि अगले दस वर्षों में भारत दुनिया के टॉप 10 खेल राष्ट्रों में शामिल हो। इसके लिए मज़बूत नींव तैयार हो चुकी है। अब ज़रूरत है कि हम दिशा बदलने के बजाय लगातार मेहनत, अनुशासन और रफ्तार बनाए रखें। यह भारत, भारतीय खेलों और पूरे समाज के लिए बेहद उत्साहजनक समय है। आगे बढ़ते रहें, नई ऊँचाइयों की ओर!(लेखक रग्बी इंडिया के अध्यक्ष हैं और पूर्व अंतरराष्ट्रीय रग्बी खिलाड़ी हैं)
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विशेष लेख-धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक
-अशोक कुमार चंद्रवंशी, सहायक जनसंपर्क अधिकारीरायपुर। केन्द्रीय प्रसंस्करण इकाई (CPU) ग्रामीण रोजगार में वनोपज और औषधीय पौधों के संग्रह, प्रसंस्करण और मूल्य-वर्धन (value addition) के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ग्रामीणों, खासकर महिलाओं, के लिए आय और रोजगार के नए अवसर पैदा करती है। दुर्ग जिला के पाटन विकासखंड के जामगांव एम में स्थापित केन्द्रीय प्रसंस्करण इकाई ग्रामीण रोजगार, वनोपज प्रसंस्करण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।छत्तीसगढ़ हर्बल ब्रांड’ के नाम से बाजार में उपलब्धयह इकाई लगभग 111 एकड़ क्षेत्र में विकसित की गई है, जहां छत्तीसगढ़ शासन और राज्य लघु वनोपज (व्यापार एवं विकास) सहकारी संघ मर्यादित के माध्यम से वन क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों से वनोपज और औषधीय पौधों का क्रय, संग्रहण और प्रसंस्करण किया जा रहा है। यहां तैयार किए जा रहे हर्बल उत्पाद ‘छत्तीसगढ़ हर्बल ब्रांड’ के नाम से बाजार में उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग स्वास्थ्य लाभ के लिए किया जाता है।प्रसंस्करण इकाई से मिल रहा स्थानीय लोगों को रोजगारप्रसंस्करण इकाई क्रमांक- 01 में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित किए गए हैं। यहां आंवला, बेल और जामुन से जूस, कैंडी, लच्छा, मुरब्बा, शरबत, पल्प और आरटीएस पेय जैसे शुद्ध हर्बल उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इन उत्पादों का विक्रय एनडब्ल्यूएफपी मार्ट और संजीवनी स्टोर के माध्यम से किया जाता है। इस इकाई ने मात्र एक वर्ष में लगभग 44 लाख रुपये मूल्य के उत्पादों का निर्माण और विक्रय कर स्थानीय लोगों की आय बढ़ाने में अहम योगदान दिया है।20 हजार मीट्रिक टन क्षमता का केंद्रीय वेयरहाउसइकाई क्रमांक- 02 में चार बड़े गोदाम बनाए गए हैं, जिनकी कुल भंडारण क्षमता 20,000 मीट्रिक टन है। यहां राज्य के विभिन्न जिलों से प्राप्त वनोपज का सुरक्षित भंडारण किया जाता है। वर्तमान में कोदो, कुटकी, रागी, हर्रा कचरिया, चिरायता, कालमेघ, पलास फूल और साल बीज सहित विभिन्न वनोपज का संग्रह किया गया है। इन उत्पादों का विक्रय संघ मुख्यालय रायपुर द्वारा निविदा प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है। इन दोनों इकाइयों के संचालन से अब तक 5,200 से अधिक मानव दिवस का रोजगार सृजित हो चुका है।पीपीपी मॉडल पर हर्बल एक्सट्रैक्शन यूनिट यूनिट की स्थापनाजामगांव एम में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत हर्बल एक्सट्रैक्शन यूनिट की स्थापना की गई है। यह यूनिट छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज संघ और स्फेयर बायोटेक कंपनी के संयुक्त प्रयास से बनी है, जिसका लोकार्पण वर्ष 2025 में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और वन मंत्री श्री केदार कश्यप द्वारा किया गया था। लगभग 6 एकड़ क्षेत्र में बनी इस यूनिट में गिलोय, कालमेघ, बहेड़ा, सफेद मुसली, जंगली हल्दी, गुड़मार, अश्वगंधा और शतावरी जैसे औषधीय पौधों से अर्क निकाला जा रहा है। इन अर्कों का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं और वेलनेस उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।ग्रामीणों और संग्राहकों को स्थायी लाभहर्बल एक्सट्रैक्शन यूनिट के माध्यम से ग्रामीण संग्राहकों से वनोपज और औषधीय पौधों का पूर्ण क्रय सुनिश्चित किया जा रहा है, जिससे उन्हें उचित मूल्य और नियमित आय मिल रही है। इससे वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है और नए रोजगार अवसर भी सृजित हो रहे हैं। जामगांव एम की केन्द्रीय प्रसंस्करण इकाई, वेयरहाउस और हर्बल एक्सट्रैक्शन यूनिट वनोपज की मूल्यवृद्धि के साथ-साथ ग्रामीणों और संग्राहकों के लिए आजीविका के मजबूत साधन बन रहे हैं। - *पुण्यतिथि (30 दिसंबर) पर विशेष*- डॉ सुधीर शर्मा-अध्यक्ष हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिलाई, छत्तीसगढ़हिंदी साहित्य में दुष्यंत कुमार (1933–1975) का नाम एक ऐसे कवि के रूप में दर्ज है, जिसने ग़ज़ल को महज़ प्रेम, विरह और व्यक्तिगत संवेदनाओं की सीमाओं से बाहर निकालकर राजनीतिक चेतना और सामाजिक प्रतिरोध का सशक्त माध्यम बना दिया। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल की परंपरागत रूमानियत को नकारे बिना उसे भारतीय लोकतंत्र की जमीनी सच्चाइयों से जोड़ा। यही कारण है कि दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें आज भी संसद, सड़क, अख़बार और आंदोलन—हर जगह समान रूप से प्रासंगिक दिखाई देती हैं।दुष्यंत कुमार का रचनाकाल स्वतंत्र भारत के उस दौर से जुड़ा है, जब लोकतंत्र स्थापित तो हो चुका था, परंतु सत्ता और जनता के बीच दूरी बढ़ती जा रही थी। स्वतंत्रता के बाद के वादे—रोज़गार, समानता, न्याय—धीरे-धीरे खोखले प्रतीत होने लगे थे। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में दुष्यंत कुमार की राजनीतिक चेतना विकसित होती है।दुष्यंत कुमार की राजनीतिक चेतना दल-विशेष या विचारधारा-विशेष से बंधी नहीं है। वह किसी राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के कवि हैं। उनकी ग़ज़लों में सत्ता का विरोध है, लेकिन अराजकता नहीं; व्यवस्था की आलोचना है, लेकिन निराशा नहीं; आक्रोश है, परंतु उम्मीद के साथ।उनकी राजनीति मूलतः मानवीय राजनीति है—जहाँ केंद्र में आम आदमी है। वे सत्ता से सवाल पूछते हैं, क्योंकि सत्ता जनता से जवाबदेह होनी चाहिए। उनका एक प्रसिद्ध शेर है—“सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”यह शेर दुष्यंत कुमार के संपूर्ण राजनीतिक काव्य का घोषणापत्र कहा जा सकता है। वे केवल शोर मचाने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि परिवर्तन के पक्षधर हैं।दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों का सबसे सशक्त पक्ष है—सत्ता की संवेदनहीनता पर सीधा प्रहार। वे सत्ता के दमनकारी और झूठे चरित्र को बेनकाब करते हैं। उनकी भाषा सरल है, पर अर्थ गहरा और तीखा।“मत कहो आकाश में कोहरा घना है,यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।”यह शेर सत्ता की उस मानसिकता पर कटाक्ष है, जहाँ हर असुविधाजनक सच को ‘व्यक्तिगत आलोचना’ कहकर नकार दिया जाता है। यहाँ ‘कोहरा’ राजनीतिक भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और नैतिक पतन का प्रतीक है।दुष्यंत कुमार यह स्पष्ट कर देते हैं कि समस्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिस्टम की है। उनकी ग़ज़लें सत्ता के इस झूठे नैरेटिव को तोड़ती हैं।दुष्यंत कुमार लोकतंत्र के सबसे बड़े समर्थक हैं, लेकिन वे उसके खोखलेपन के सबसे बड़े आलोचक भी हैं। वे उस लोकतंत्र पर प्रश्न उठाते हैं, जिसमें जनता केवल वोटर बनकर रह जाती है।“यह जो लोकतंत्र है, इसमें कुर्सियाँ बहुत हैं,जनता के लिए मगर रास्ते ही नहीं हैं।”यहाँ ‘कुर्सियाँ’ सत्ता, पद और अधिकार का प्रतीक हैं, जबकि ‘रास्ते’ जनता की भागीदारी और न्यायपूर्ण अवसरों के। यह शेर आज के राजनीतिक परिदृश्य में भी उतना ही सटीक बैठता है।दुष्यंत कुमार लोकतंत्र की उस विडंबना को उजागर करते हैं, जहाँ सत्ता तो जनप्रतिनिधियों के पास है, लेकिन संवेदना गायब है।दुष्यंत कुमार की राजनीतिक चेतना का केंद्र आम आदमी है—वह आदमी जो महँगाई, बेरोज़गारी, शोषण और अन्याय से जूझ रहा है। उनकी ग़ज़लें इस आदमी की सामूहिक आवाज़ बन जाती हैं।“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”यहाँ ‘पीर’ केवल निजी दुख नहीं, बल्कि पूरे समाज का संचित कष्ट है। ‘गंगा’ परिवर्तन, जनआंदोलन और नई चेतना का प्रतीक है। यह शेर राजनीतिक निष्क्रियता के विरुद्ध सक्रिय संघर्ष का आह्वान करता है। *प्रतिरोध का कवि*दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें प्रतिरोध की संस्कृति को जन्म देती हैं। वे डर के माहौल में भी सच कहने का साहस प्रदान करती हैं।“कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए,कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।”यह शेर सत्ता द्वारा किए गए वादों और वास्तविकता के बीच की खाई को उजागर करता है। ‘चिराग़’ विकास, सुख और समान अवसर का प्रतीक है, जो जनता तक पहुँच ही नहीं पाता।दुष्यंत कुमार की राजनीतिक ग़ज़लों की सबसे बड़ी ताक़त है—सरल, संवादात्मक और अख़बारी भाषा। वे कठिन बिंबों या दुरूह प्रतीकों का सहारा नहीं लेते। उनकी भाषा सीधे पाठक से संवाद करती है।उनकी ग़ज़लें अक्सर संपादकीय टिप्पणी जैसी लगती हैं—संक्षिप्त, स्पष्ट और प्रभावशाली। यही कारण है कि उनके शेर नारे बन जाते हैं, पोस्टर पर लिखे जाते हैं और आंदोलनों में गूँजते हैं।*निराशा नहीं, उम्मीद का कवि*दुष्यंत कुमार का राजनीतिक स्वर निराशावादी नहीं है। वे अंधेरे को पहचानते हैं, लेकिन रोशनी की संभावना से इंकार नहीं करते।“अँधेरे में ही सही, हाथ तो मिलाओ यारो,नई सुबह की कोई तो शुरुआत हो।”यह आशावाद उनकी राजनीतिक चेतना को संतुलित बनाता है। वे जानते हैं कि परिवर्तन धीरे आता है, लेकिन आता ज़रूर है।आज जब लोकतंत्र पर फिर से सवाल उठ रहे हैं—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की भूमिका, जनता की आवाज़—ऐसे समय में दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें और अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि—सत्ता से सवाल करना नागरिक का अधिकार है चुप रहना सबसे बड़ा अपराध हैकविता भी प्रतिरोध का हथियार हो सकती है। दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में राजनीतिक चेतना केवल विचार नहीं, अनुभव और संघर्ष से उपजी हुई संवेदना है। उनकी ग़ज़लें सत्ता के विरुद्ध जनता का काव्यात्मक घोषणापत्र हैं। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि ग़ज़ल केवल महफ़िल की शायरी नहीं, बल्कि सड़क की आवाज़ भी बन सकती है।अख़बार के पाठक के लिए दुष्यंत कुमार आज भी उतने ही ज़रूरी हैं, क्योंकि वे हमें यह सिखाते हैं कि—साहित्य जब जनता के पक्ष में खड़ा होता है,तब वह राजनीति से बड़ा और लोकतंत्र से गहरा हो जाता है।
- -लघुकथा-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)आज वर्षों बाद उषा को स्टेशन में देख कर रेखा की आँखें भर आईं। एक जमाने में दोनों की दोस्ती लोगों के लिए मिसाल बन गई थी। दोनों ने बचपन से एक साथ पढ़ाई की , दोनों के घर भी पास थे तो वे हर जगह साथ ही जाते । उषा की तबीयत खराब होने पर रेखा उसके लिए नोट्स तैयार करती इसी प्रकार रेखा को कहीं जाना पड़ता तो उषा उसके सारे काम करती । गर्मी की छुट्टियों के दिन थे, रेखा के मम्मी-पापा को कुछ काम से बाहर जाना पड़ा ।उसकी दादी के बीमार होने के कारण रेखा को रुकना पड़ा ।उसने उषा को साथ रहने के लिए बुलाया। वह जाने के लिए तैयार ही हुई थी कि उसके पापा को हृदयाघात हुआ और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा । व्यस्तता के कारण उषा रेखा को कुछ बता पाई नहीं पाई और रेखा को यह गलतफहमी हो गई कि वह जान-बूझकर नहीं आई । उसने सच्चाई या कारण पता करने की जरूरत भी नहीं समझी और आना- जाना , बात करना बंद कर दिया ।इधर उषा भी रेखा से नाराज थी कि उसके पापा की इतनी गम्भीर स्थिति होने पर रेखा मिलने नहीं आई , न ही उनका हाल पूछा । दोनों अपने मन में शिकायतें रखे रहे और एक- दूसरे से दूर होते गए । कुछ समय बाद उषा के पापा का स्थानांतरण हो गया और वे वहाँ से चले गये । उनके जाने के बाद रेखा को असलियत मालूम हुई और उसे अपने दुर्व्यवहार पर बहुत अफसोस हुआ परन्तु तब तक उनकी दोस्ती में बहुत बड़ी दरार पड़ चुकी थी । वक्त ने कभी मौका भी नहीं दिया कि वह माफी माँगकर इस गलती को सुधार ले । आज उषा को सामने देख उसकी पीड़ा आँसुओं के रूप में बह निकली थीं ।
- -लघुकथा-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)आज अक्षत घर आ रहा था । घर में त्यौहार-सा माहौल था। राखी बेहद खुश थी , उसका बेटा अर्चित केलिफोर्निया में एक अच्छी नौकरी पाकर आ रहा था । उसे ऐसा लग रहा था मानो उसकी वर्षों की साधना आज सफल हुई हो । अतीत के काले साए अब उसे डराने नहीं, उसका हौसला बढ़ाते महसूस हो रहे थे । आज से बीस वर्ष पहले यदि उसने अपने शराबी व दुर्व्यसनी परन्तु अमीर पति को छोड़ने का साहस नहीं दिखाया होता तो शायद यही बेटा घर के किसी कोने में पीकर पड़ा होता । पिता को देखकर उनके पीने व लड़खड़ाने का अभिनय करता अर्चित समझ ही नहीं पाया था कि माँ ने क्यों उसे तमाचा लगा दिया था । शायद पिता का अनुकरण करने के भय ने ही राखी को इतनी हिम्मत दी कि वह परिवार व समाज के खिलाफ उठ खड़ी हुई थी । बहुत परिश्रम और संघर्ष करके वह अपने बच्चों को स्वावलंबन की शिक्षा दे पाई थी । बच्चे तो कच्ची मिट्टी से होते हैं जो देखते हैं वही सीखते हैं , उन्हें जिस साँचे में ढालो ,वे ढल जाते हैं । उसकी लगन और संस्कार का बच्चों ने मान रखा था । अर्चित और आराध्या ने उसे अपना आदर्श मानकर कभी श्रम से जी नहीं चुराया और आगे बढ़े । सच है सुखद *भविष्य* के सपने कठोर परिश्रम के पलकों में ही पलते हैं विलासिता के हिंडोले में नहीं ।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)जुड़ते जाते लोग सब, मन में हो सद्भाव।कठिन कार्य भी पूर्ण हो, धन का नहीं अभाव।।धन का नहीं अभाव, काज हो जन-कल्याणी।जनता देती साथ, निवेदन करती वाणी।।सही रहे उद्देश्य, नहीं जन पीछे मुड़ते।एक करे प्रारंभ, लोग सब जाते जुड़ते ।।यादों के संदूक में, अच्छी बातें जोड़।कड़वी बातें भूलकर, जीवन दें नव मोड़।।जीवन दें नव मोड़, पुरातनता को छोड़ें।मन में भर उत्साह, सोच की धारा मोड़ें ।।करें निरंतर कर्म, बनें पक्के वादों के।घोलें सदा मिठास, कोष भर उन यादों के।।मिलता है श्रम का सदा, सुखद सफल परिणाम।सरिता सम बहते रहें, पहुँचे सागर-धाम।।पहुँचे सागर-धाम, तोड़कर सब बाधाएँ।निश्चित करके लक्ष्य, निरंतर बढ़ते जाएँ।संघर्षों के बाद, सुमन जीवन का खिलता।करें सतत् अभ्यास, लक्ष्य निश्चित ही मिलता।।
- राजकपूर की जयंती (14 दिसंबर) पर विशेषआलेख- प्रशांत शर्माभारतीय फिल्में आम आदमी का व्यक्तिगत गीत है। भारतीय सिनेमा और अभिनेता राजकपूर उसके श्रेष्ठतम गायकों में एक हैं। जब भी भारतीय फिल्मों के इतिहास का जिक्र होगा, तब राजकपूर की फिल्में और उनका कालखंड इसके खास पन्नों में दर्ज रहेगा। आजाद भारत के साथ राजकपूर की सृजन यात्रा भी शुरू होती है। उनकी पहली फिल्म आग 1948 में रिलीज हुई थी। वहीं उनकी आखिरी फिल्म राम तेरी गंगा मैली, 15 अगस्त 1985 को प्रदर्शित हुई।अपनी पहली फिल्म आग के नायक की तरह राजकपूर जीवन में कुछ असाधारण कर गुजरना चाहते थे। जलती हुई महत्वाकांक्षा उनका र्ईंधन बनी। उनके पिता पृथ्वीराज उनकी प्रेरणा के तीसरे स्रोत थे। राजकपूर की अपने पिता के प्रति असीम श्रद्धा थी और वे हमेशा ऐसा काम करना चाहते थे जिससे उनके पिता का गौरव बढ़े। ऐसा हुआ भी।राजकपूर को सफेद रंग से काफी प्रेम था और उनकी पत्नी कृष्णा हो या फिर फिल्मों में उनकी नायिका ज्यादातर सफेद लिबास में ही नजर आती थीं। यह राजकपूर का कृष्णा के प्रति पहली नजर का प्रेम ही था, जो ताउम्र बना रहा। दरअसल राजकपूर ने जब पहली बार रीवा में कृष्णा को देखा तो वे सफेद साड़ी में काफी खूबसूरत नजर आ रही थीं। राजकपूर उन्हें दिल दे बैठे और फिर उनकी शादी भी हो गई। बताते हैं कि राज कपूर की शाही शादी हुई थी। मुंबई से बॉम्बे-हावड़ा ट्रेन से पहले बारात मध्य प्रदेश के सतना पहुंची। सतना से बारात को रीवा तक लाने के लिए रीवा रियासत के राजा और आईजी करतार नाथ ने वीवीआईपी गाडिय़ों का काफिले भेजा था। हजारों लोग इस शादी के साक्षी बने थे। कृष्णा रीवा के आईजी करतारनाथ मल्होत्रा की बेटी थीं। रीवा में एक नाटक के मंचन के दौरान करतार नाथ और राजकपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर की गहरी दोस्ती हो गई थी। उस वक्त राजकपूर मात्र 22 साल के थे। पृथ्वीराज कपूर ने आईजी करतार नाथ के साथ अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का फैसला कर चुके थे। उसी दौरान राजकपूर ने कृष्णा को पहली बार देखा और दिल हार बैठे। पिता से प्रस्ताव आने के बाद राजकपूर ने तुरंत ही शादी के लिए हां कह दिया। 12 मई 1946 को जब दोनों शादी के बंधन में बंधे, तो यह रीवा की ऐतिहासिक शादियों में से एक साबित हुई। कृष्णा और राज कूपर की शादी में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।कहा जाता है कि कृष्णा मल्होत्रा से विवाह के बाद तो जैसे राज कपूर की किस्मत ही चमक गई। एक-एक कर राज कपूर की फिल्में सुपरहिट होने लगीं। धीरे-धीरे पूरी दुनिया में राज कपूर प्रसिद्ध होते गए और उनको बॉलीवुड का शोमैन कहा जाने लगा। शो मैन क्योंकि वे अपनी फिल्मों में सपने बुनते थे और उसे काफी भव्यता के साथ प्रदर्शित करते थे।राजकपूर ने काफी नाम कमाया, लेकिन इस सफलता के बीच उनका असली नाम कहीं खो गया। पिता पृथ्वीराज ने अपने पहले बेटे का नाम रणबीर राज रखने का फैसला किया था। 14 दिसंबर 1924 को जब उनकी पहली संतान ने इस दुनिया में कदम रखा तो किसी कारण से यह नाम बदलकर सृष्टि नाथ कपूर हो गया, लेकिन फिल्मों में इस बेटे ने राजकपूर के नाम से कदम रखा और अपने अभिनय, जुनून, शैली से एक अलग ही इतिहास रच दिया। उन्हीं सृष्टि नाथ कपूर को पूरी दुनिया आज शोमैन राज कपूर के नाम से जानती है।
- -छगन लोन्हारे उप संचालक (जनसंपर्क)रायपुर, /विकसित भारत और विकसित छत्तीसगढ़ के लक्ष्य अनुरूप छत्तीसगढ़ में न केवल तेजी से अधोसंरचनाएं विकसित हो रही है, बल्कि सस्टेनबल डेवलपमेंट गोल के लक्ष्य को भी हासिल किया जा रहा है। विगत दो वर्षों में छत्तीसगढ़ भारत के विकास इंजन के रूप में भी तेजी से अपनी पहचान बना रहा है। प्रदेश की नवीन औद्योगिक नीति में डिफेंस, आईटी, एआई, ग्रीन एनर्जी जैसे नए क्षेत्रों को विशेष पैकेज दिया जा रहा है। राज्य में अब तक 7.69 लाख रूपए के निवेश के प्रस्ताव मिल चुके हैं। राज्य में विकास, विश्वास और सुरक्षा का नया वातावरण बना है। राज्य की प्रगति में माओवाद आतंक हमेशा से ही बाधक रही है। अब यह बाधा दूर होने जा रही है। माओवाद अब अंतिम सांसें ले रहा है।मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। राज्य सरकार ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली को अधिक सुदृढ़ एवं परिणाम आधारित बनाने के लिए सुशासन एवं अभिसरण विभाग का गठन किया है। शासन व्यवस्था में अनुशासन और समयबद्धता सुनिश्चित करने हेतु 01 दिसम्बर 2025 से मंत्रालय महानदी भवन में अधिकारियों के लिए बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू कर दी गई है, जिससे कार्य संस्कृति और जवाबदेही को नई पहचान मिल रही है।प्रदेश के लोकतांत्रिक इतिहास में एक अत्यंत गौरवपूर्ण क्षण जुड़ा है नवा रायपुर अटल नगर में छत्तीसगढ़ के नए भव्य विधानसभा भवन का लोकार्पण प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा किया गया। यह विधानसभा भवन नई ऊर्जा, नई सोच और विकसित छत्तीसगढ़ के संकल्प का प्रतीक है।पिछले 2 वर्षों में बस्तर और सरगुजा अंचल के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए वहां सड़क, रेल, स्वास्थ्य और संचार सहित कई नई परियोजनाएं भी शुरू की गई। नई औद्योगिक नीति में पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया गया है। बस्तर में पर्यटन सुविधाओं को बढ़ाने का प्रयास किए जा रह हैं। इसके लिए नई होम स्टे पॉलिसी और इको टूरिज्म के लिए विशेष प्रावधान रखे है। बस्तर और सरगुजा अंचल में उद्योगों की स्थापना पर विशेष सुविधाएं, छूट और रियायतें दी जा रही है। इसके अलावा उद्योगों को विशेष पैकेज के अंतर्गत सस्ती जमीन उपलब्ध कराई जा रही है।नियद नेल्ला नार योजना के अंतर्गत माओवाद आतंक से प्रभावित क्षेत्रों में स्थापित 69 सुरक्षा कैम्पों के माध्यम से मूलभूत सुविधाओं के साथ ही केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। बस्तर की बदलती फिजा को सबके सामने लाने में बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे बड़े आयोजनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बस्तर के युवा अब विकास से जुड़ना चाहते है, इसकी बानगी यहां चलाए जा रहे हैं। स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों में देखी जा सकती है। बस्तर की युवाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए और उन्हें रोजगार से जोड़ने के लिए पर्यटन ऑटोमोबाईल, पायलट, आईटी आदि क्षेत्रों में स्किल डेवलपमेंट के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है।राज्य में सस्टेनबल डेवलपमेंट गोल को हासिल करने के लिए सामाजिक, आर्थिक गतिशीलता के लिए शुरू की गई कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है। जल जीवन मिशन के अंतर्गत 40 लाख घरों में पीने का स्वच्छ जल मुहैया कराया जा रहा है। इसी प्रकार 26 लाख से अधिक परिवारों के लिए पीएम आवास स्वीकृत किए गए हैं। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने और समाज में उनकी भूमिका बढ़ाने के लिए महतारी वंदन योजना में 70 लाख से अधिक महिलाओं के बैंक खाते में एक-एक हजार रूपए की राशि दी जा रही है। इस योजना के अंतर्गत लगभग 14 हजार करोड़ रूपए की राशि जारी की जा चुकी है। आयुष्मान भारत योजना के दायरे में राज्य की 98 प्रतिशत आबादी को लाया जा चुका है।छत्तीसगढ़ में धान की पैदावार और समर्थन मूल्य में खरीदी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मुख्य धुरी है। किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने के लिए मोदी की गारंटी के अंतर्गत किसानों को देश में सर्वाधिक धान का मूल्य दिया जा रहा है। राज्य के 2300 से अधिक धान उपार्जन केंद्रों में सफलतापूर्वक धान की खरीदी की जा रही है। किसानों से धान प्रति एकड़ 21 क्विंटल के मान से तथा 3100 रूपए प्रति क्विंटल की कीमत दी जा रही है। किसान हितैषी फैसलों के फलस्वरूप छत्तीसगढ़ में किसानों के खाते में एक लाख करोड़ रूपए से अधिक की राशि अंतरित की जा चुकी है। किसान इस राशि का खेती किसानी में भरपूर निवेश कर रहे हैं और इससे बाजार भी गुलजार हुए हैं जिससे शहरी अर्थव्यवस्था पर सीधा असर दिख रहा है। ट्रैक्टर आदि की बिक्री ने रिकार्ड आंकड़ा छू लिया है।
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विशेष लेख -छगनलाल लोन्हारे उप संचालक (जनसंपर्क)
रायपुर / विकसित भारत और विकसित छत्तीसगढ़ के लक्ष्य को साधने के लिए मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की पहल पर प्रदेश में नई औद्योगिक नीति (2024-30) लागु की गई है। राज्य की उद्योग हितैषी नीति के फैसले निवेशक छत्तीसगढ़ में उद्योग-धंधा स्थापित करने की दिशा में आकर्षित हो रहे हैं। प्रदेश में 01 जनवरी 2024 से अक्टूबर 2025 तक 2415 उद्योग स्थापित हुए जिनके द्वारा लगभग 18058.34 करोड़ का निवेश किया गया एवं लगभग 42 हजार 500 रोजगार सृजित हुए। 01 जनवरी 2024 से अक्टूबर 2025 तक उद्योगों को 1000 करोड़ से अधिक अनुदान का वितरण किया गया।निवेश प्रोत्साहननई औद्योगिक विकास नीति 2024-30 को 1 नवंबर 2024 से प्रभावी किया गया है। पहली बार नीति को रोज़गार उन्मुख बनाया गया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री लखनलाल देवांगन की पहल पर प्रशिक्षण सब्सिडी ईपीएफ प्रतिपूर्ति तथा 1000 से अधिक रोजगार देने वाली इकाइयों के लिए कस्टमाइज़्ड पैकेज की व्यवस्था की गई है। राज्य में श्रम-प्रधान उद्योगों को आकर्षित करने हेतु 27 मई 2025 को की गई संशोधन के माध्यम से रोज़गार सृजन सब्सिडी एवं एम्प्लॉयमेंट मल्टिप्लायर का प्रावधान किया गया है। सेवा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने हेतु औद्योगिक विकास नीति के तहत पात्र सेवा क्षेत्रों की सूची को बढ़ाकर 43 किया गया है।पहली बार पर्यटन एवं स्वास्थ्य सेवाओं को औद्योगिक विकास नीति में शामिल किया गया है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और खेल प्रशिक्षण को बढ़ावा देने हेतु 27 मई 2025 के संशोधन द्वारा निजी विद्यालय निजी शीर्ष 100 एवं विदेशी विश्वविद्यालय तथा निजी आवासीय खेल अकादमियों को औद्योगिक विकास नीति में सम्मिलित किया गया है। नीति के प्रचार-प्रसार व निवेश आकर्षित करने हेतु रायपुर, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु ओसाका, जगदलपुर एवं अहमदाबाद में इन्वेस्टर कनेक्ट कार्यक्रम आयोजित किए गए।इन प्रयासों के चलते राज्य को लगभग 7.69 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिनमें स्टील पावर, सेमीकंडक्टर, टेक्सटाइल, आईटी, बीपीओ लीन एनर्जी आदि क्षेत्र शामिल हैं। नवा रायपुर में राज्य में देश का प्रथम एआई डाटा सेन्टर तथा सेमीकंडक्टर निर्माण हेतु रु 11.000 करोड़ के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं इनकी स्थापना की जा रही है।ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेसअनुपालनों को कम करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए, राज्य ने अनुपालन बोझ को घटाने की पहल की है। इसके तहत 1167 जटिल अनुपालनों की पहचान की गई, 231 प्रावधानों को अपराध मुक्त (decriminalize) किया गयाए 369 प्रक्रियाओं-प्रक्रियाओं को डिजिटल किया गया, 194 प्रावधानों-प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया, तथा 14 प्रावधानों में अनावश्यकता (redundancy) को समाप्त किया गया।कुल 716 व्यवसाय केंद्रित अनुपालनों में से 117 प्रावधानों को अपराधमुक्त किया गया, 231 प्रक्रियाएँ प्रक्रियाओं को डिजिटल किया गया, 153 प्रावधानों प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया और 14 प्रावधानों में अनावश्यकता कम की गई। इसके अलावा कुल 451 नागरिक केंद्रित अनुपालनों को सुव्यवस्थित किया गया है, जिनमें से 114 प्रावधानों को अपराधमुक्त 138 प्रक्रियाओं प्रक्रियाओं को डिजिटल, तथा 41 प्रावधानों प्रक्रियाओं को सरल किया गया है।इन सभी पहलों का उद्देश्य राज्य में व्यवसायों के लिए एक अनुकूल और सहज वातावरण तैयार करना है ताकि उद्योग और व्यापार क्षेत्र और अधिक विकसित हो सके। बिज़नेस रिफॉर्म एक्शन प्लान के तहत विभिन्न विभागों के नियम और प्रक्रियाएँ सरल की गईं। महिलाओं को सुरक्षित तरीके से 24×7 कार्य की अनुमति देने हेतु संबंधित नियमों में संशोधन किए गए। राज्य में 435 बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान को क्रियान्वयित किया गया है। बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान के अंतर्गतराज्य 4 श्रेणियों में टॉप अचीवर बना।82 जिला स्तरीय सुधारों की पहचान की गई, जिनमें से 124 सुधार लागू किए जा चुके हैं नई सिंगल विंडो प्रणाली भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के आधार पर विकसित की गई है। नया पोर्टल 1 जुलाई 2025 को लॉन्च किया गया। राज्य के विभिन्न अधिनियमों में छोटे अपराधों को अपराध मुक्त (decriminalize) करने हेतु विभाग द्वारा छत्तीसगढ़ जनविश्वास प्रावधानों में संशोधन अधिनियम 2025 मानसून सत्र में विधानसभा द्वारा पारित किया गया। अधिनियम के माध्यम से 8 अधिनियमों के अंतर्गत 163 प्रावधानों को गई अपराधिकृत किया गया। जनविश्वास अधिनियम पारित करने वाला देश में दूसरा राज्य बना। औद्योगिक भूमि आवंटन को अधिक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बनाने हेतु छत्तीसगढ़ भूमि आवंटन नियमों में संशोधन किया गया है। अब औद्योगिक क्षेत्रों में भूमि आबंटन फर्स्ट-कम-फर्स्ट-सर्व की जगह ई-टेंडरिंग के माध्यम से किया जा रहा है।औद्योगिक अधोसंरचनापिछले एक वर्ष में 7 औद्योगिक पार्क स्थापित किए गए तथा 7 अन्य स्मार्ट इंडस्ट्रियल पार्क की स्थापना प्रक्रिया में हैं। विगत दो वर्षों में औद्योगिक लैंड बैंक हेतु कुल 05 जिलों में कुल रकबा 255.725 हेक्टेयर भूमि का आधिपत्य विभाग को प्राप्त हुआ है। औद्योगिक लैंड बैंक हेतु कुल 08 जिलों में कुल रकबा 940.65 हेक्टेयर नैशनल इंडस्ट्रियल कॉरिडोर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड हेतु 02 जिलों में कुल रकबा 172.112 हेक्टेयर भूमि का चिन्हांकन किया गया है तथा हेल्थ एण्ड वेलनेस हेतु 07 जिलों में कुल रकबा 82.000 हेक्टेयर शासकीय भूमि का चिन्हांकन किया गया है।एक्सपोर्ट फ़ैसिलिटेशन काउंसिलसरकारी खरीद को पारदर्शी और किफायती बनाने हेतु राज्य सरकार द्वारा जीईएम पोर्टल अपनाया गया है। सीएसआईडीसी के माध्यम से जीईएम टीम द्वारा जिलेवार और विभागवार प्रशिक्षण आयोजित किए जा रहे हैं। राज्य के निर्यात को बढ़ावा देने हेतु आईआईएफटी कोलकाता के साथ एमओयू कर राज्य स्तर पर एक्सपोर्ट फ़ैसिलिटेशन काउंसिल स्थापित की गई है। साथ ही निर्यात संवर्धन हेतु प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग यूनिट निर्यात आयुक्त कार्यालय में नियुक्त की गई है। - ~छत्तीसगढ़ी कहानी-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)निधि के आँखी के आघु म घुप अमावस के रात सही मुंधियार होगे अउ ओहर अपन मुड़ी ल धर के उही मेर बैठ गे । छाती म कस के पीरा उठिस अउ ओहर भुंइया म निश्चेत होके ढलंग गे बीच रोड म ,देखो देखो होगे । दु-चार झन लइका मन ओला अस्पताल पहुंचाइन । कोन जनी के घण्टा ओहर बेहोश रिहिस होश म आइस त मुड़ी पीरा हथौड़ा कस घन-घन परत रिहिस । फेर ओ फोटो हर ओखर दिमाग म छप गे रिहिस , आँखी खुले बंद सब्बो डहर उही दिखत रिहिस । ओखर आघु म बीस पच्चीस साल पहिली के बात मन सनीमा सही घूमे लगीन ।सावन के महीना अउ नौकरी के पहली दिन दुनो संघरा आईन निधि के जिनगी म । घर ले निकलिस अउ टिपिर-टापर बूँद गिरे बर चालू होगे । इही थोरकिन देर पहिली गिरतीस त घर ले रेनकोट नई ते छाता लेके निकलतेंव ..ओहर बस म बैठ के सोचत रहय । बस म बीस किलोमीटर रद्दा तय करके ओहर रिक्शा कर लिस अउ लकर-धकर ऑफिस जाए बर निकलिस । पहिली दिन ओहर देरी मत होवय सोचत रिहिस त उल्टा होगे । भीजत बाँचत कइसनहो कर के ऑफिस पहुँचीस । सब्बो झन ओला आँखी गड़िया के देखत रहय , तभे पहिली मुलाकात होय रिहिस नवीन ले । लंबा-चौड़ा स्मार्ट अउ सुंदर नवीन हर ओला देख के मुस्कियाइस अउ अपन नांव बताइस । ओला पोंछे बर एक ठन नेपकिन दिस अउ बने सही बोल के ओकर हड़बड़ासी ल कमती करे के कोशिश करीस । अतका सहायता निधि बर बहुत बड़े सहारा के काम करीस । शुरुआत म कतेक कन फिकिर म डूबे रहिथे मन हर ,धुकधुकी छूट त रहीस तेन हर नवीन के गोठ बात ले थोरकिन निडर होइस ।सुक्खा भुइंया म सावन के पहिली फुहार समाथे त सोन्ध-सोन्ध महके लगथे भुइंया हर वैसनहे निधि के मन म नवीन के सुघ्घर व्यवहार हर अपन सुवास छोड़ दे रिहिस । दिनों दिन उमन के दोस्ती हर बाढ़त गिस अउ कब ए दोस्ती के ऊपर परेम के रंग चढ़ गे पता नई चलिस । निधि के अतेक ख्याल रखना ,ओखर घर परिवार जम्मो झन के पूछ परख हर निधि के मन ल जीते बर बहुत रिहिस । फेर ओखर ऑफिस के लोगन मन काबर ए ते नवीन ले छिटियाय सही करय । निधि के एक झन संगी हर त ओला चेताय के भी कोसिस करीस के अतेक झटकुन कोनो बर भरोसा नई करना चाही । पहिली बने पता कर के रिश्ता बनाना चाही । फेर जेन ला पियार हो जाथे ओखर आँखी म बिश्वास के परदा पर जाथे । ओला सब्बो झन जलनखोर लगय जउन मन ल नवीन हर भाव नई दिस । ए दुनिया के सब्बो माया हर मन के रचे आय जइसन हमर मन के इस्थिति रहिथे वइसनहे हम ला दुनिया दिखथे । मन हर फरेब के झटका खाथे त दुनिया के जम्मो मइनखे फरेबी लागथे अउ मन हर बने-बने रहिथे त जम्मो डहर खुशी के फूल खिले दिखथे । एहि पाय केहे गे हे "मन के हारे हार हे मन के जीते जीत "।उंखर जिनगी के बड़ सुघ्घर दिन बादर आय रिहिस । दिन हर आँखी म आँखी डारे निकल जाय अउ रात हर सुंदर भविष्य के सपना गढ़े म । नवीन के चकोर मन हर अपन चंदा ल छोड़े के मन नई करय अउ ओहर निधि ल छुए के मौका देखत रहय । लड़की अउ लड़का के मया म इही अंतर रहिथे । लड़की मन देह ले जियादा मन के मया के चाह रखथें । नवीन हर अब्बड़ कोशिश करय के ओमन तन मन ले एक हो जाय फेर निधि हर ए मामला म अब्बड़ कट्टर रिहिस । ओहर रिश्ता के मरजाद ल समझत रिहिस । बिहाव के पहिली सम्बंध बनाना ओखर नजर म पाप रिहिस । नवीन हर कतको बरजोरी करीस फेर निधि हर तइयार नई होइस । इही ओखर प्रेम के परीक्षा तको रिहिस के अगर नवीन ल ओखर ले सच्ची म प्रेम हे त ओहर ओकर इंतजार करही । मॉडर्न होय के मतलब अपन रीति परम्परा ल बिसराना नोहय । हमर पुरखा मन जउन मर्यादा बनाय हे तउन बहुत सोच बिचार के बनाय हे । जेन लड़की मन ए बात ल नई समझय तउने मन ल उंखर प्रेमी मन उंखर देह ल भोग के गर्भवती बना के छोड़ के भाग जाथे । फेर पछताय के सिवा कुछु नई कर सकय । फेर निधि के ए ब्यवहार हर नवीन के आकर्षण ल कमती करे लागिस ।ओहर त मदमस्त भौंरा रहय कभू ए फूल म कभु ओ फूल म बइठ के ओकर रस चूस के निकल जाने वाला भंवरा । एहि गोठ ल बताय के निधि के सहेली मन कतेक कोशिश करीन फेर ओहर कोनो ऊपर बिश्वासे नई करीस ।मया पीरीत के बंधना म बंधाय उंखर जावर जोड़ी के खबर हर लुकाय म कहाँ लुकाही , दुनो झन के घर म ए गोठ होय लागिस । निधि हर अपन अम्मा ल जम्मो जिनिस ल गोठियाय त उमन ल कोनो आपत्ति नई रिहीस । बने कमात खात लइका , अपने जात के अउ बने पोठ घर के , अउ का खोजही दाई ददा मन । फेर नवीन हर बड़हर घर के एकलौता बेटा रिहिस । ओखर माँ बाप मन अपनेच सही नइते अपन ले अउ बड़हर घर देखत रिहिन । निधि सही सामान्य घर म उमन बिहाव करे बर राजी नई होइन । नवीन ल तो खाली टाइम पास करना रिहिस बिहाव तो ओह अपन मां बाप के मर्जी ले विधायक के सुंदर अउ धनवान लड़की संग करीस । ओहर अपन माँ बाप ल एको घ नई कहीस कि ओहर निधि ले प्यार करथे अउ बिहाव करना चाहत हे । नवीन के छल अउ पहिली प्यार के सपना टूटे के पीरा हर अब्बड़ दुखदायी रिहिस । खड़े फसल म पाला परे ले ओखर जेन हाल होथे निधि के दुनिया हर वइसनहे उजड़ गे रिहिस । अम्मा पापा अउ भाई बहिनी के संग रहे ले ओला बड़ सहारा मिलिस ।ओखर ऑफिस के मन भी ओखर बहुत संग निभाईन काबर कि ओमन नवीन के बनावटी पियार ल अउ कपटी ब्यवहार ल जानत समझत रिहिन । निधि हर काम , बात-ब्यवहार म बढ़िया रिहिस त सब्बो झन ल ओखर दुख ह पीरा देवत रिहिस । सब्बो संगी रिश्तेदार मन के पियार के पतवार हर निधि ल पीरा के समंदर ले बाहिर निकले म मदद करीस । निधि हर बड़ मुश्किल ले ए सदमा ले बाहिर आइस ।समाज म बदनामी त होइस फेर ओला संतोष रिहिस के ओहर नवीन के झांसा म आके अपन आप ल समर्पित नई करीस नइते आज फांसी म झूले के अलावा अउ कुछु रद्दा नई बाँचतीस । ओखर देह ह पवित्र हे सीता सही फेर ओहर कहाँ कहाँ अग्नि परीक्षा देतिस । माँ बाप ओखर बिहाव के जिहा खबर देवय ओखर बदनामी हर ओखर ले पहिली पहुंच जाय अउ बिहाव टूट जाय ।" अब मेंहर बिहावेच नई करव अम्मा तुमन मोर फिकिर छोड़ दव । अगर मोर किस्मत म खुशी लिखाय होही त ओहर मोला मिलबेच करही , ओहर बहुत मजबूत होके ए गोठ ल कहे सकिस । " बड़े ले बड़े घाव हर बखत के संग भर जाथे लोगन कहिथे तौन एकदम सच्ची बात हे । दू चार साल म जम्मो बने बने रहे लागिन ।बिहाव करे के बाद नवीन हर जूना नौकरी ल छोड़ के दूसर कम्पनी म चल दिस । निधि ल बने लागिस रोज-रोज ओखर मुंह ल देखतीस त ओखर धोखा के घाव हर कभू नई भरतीस । उहा ले टरे म ओला भुलाना आसान होगे । ओखर ऑफिस के इंचार्ज सुभाष वर्मा हर बने इंसान रिहिस । निधि ल चार पाँच साल ले ईमानदारी ले काम करत देखे रिहिस अउ ओखर शांत स्वभाव , गुण ल जानत सुनत रिहिस । ओहर एक दिन अपन माँ बाप अउ बहिनी ल ले के सीधा ओखर घर जाके निधि के हाथ मांगे बर चल दिस । अगर निधि ल मंजूर होही तभे हमन बिहाव करबो कइके उमन निधि के इच्छा के सम्मान भी करीन । निधि अउ ओखर अम्मा बाबूजी जम्मो झन ल अब्बड़ खुशी होइस । सब गोठ ल जान सुन के जेन मन खुद रिश्ता लेके आय हे उमन के सुविचार के स्वागत होना चाही कहिके झटकुन बिहाव के तारीख पक्का कर दिन । सुभाष हर खुद एक समझदार अउ अच्छा इंसान रिहिस संघरा म ओखर घर परिवार के सोच भी खुले रिहिस । उमन निधि ल अपन बेटी के मान दिन । कभू ओखर जिनगी के पुराना अध्याय के ऊपर उमन चर्चा नई करीन अउ न कभू पूछीन ।दाम्पत्य जीवन म प्रेम अउ बिश्वास दु ठन डोर के मजबूती रहय त उंखर अंगना ले खुशी हर कहूँ नई जाय । सुभाष अउ निधि के जिनगी के बगइचा मा खुशहाली के फूल खिलगे । दू बछर के बाद बेटी के जनम हर ऊंखर खुशी ल दुगुना कर दिस ।ओखर लालन पालन म कइसे दिन बीते लगीस पता नई चलीस।अस्पताल म निधि ल होश आइस त ओखर आस पास घर के जम्मो आदमी सखलाय रिहिन , का होगे , कइसे बेहोश होगे कइके सब्बो झन ल फिकिर होगे रिहिस । सुभाष हर डॉक्टर ल बने सही जम्मो टेस्ट करे बर कहत रिहिस । ओ बपुरा हर का जानतीस ए हर निधि के शरीर के पीरा नोहय ए हर ओखर मन के पीरा ए जउन सालों से नासूर बनके ओला सालथे । आज ओहर अपन बेटी ल एक झन लड़का संग म घूमत देख के फेर उभरगे । निधि हर फिकर म बूड़ गे, बाढ़त बेटी ल सही अऊ गलत के चिनहारी कराना जरूरी हे। निखिल के संग मया करके ओखर उपर बिस्वास करके निधि हर अब्बड़ दुख पाईस । ए गोठ ला कभू ओहर लइका मन के आघू म नई गोठियाय रिहिस ।जउन किस्सा ल निधि हर अपन मन के अंदरूनी हिस्सा म गंठिया के राख दे रिहिस तेला अब खोले के बेरा आ गेहे । ओला अपन बेटी ल दुनिया के ऊंच नीच सिखोय बर ए गड़े मुर्दा ल उखाने बर परहि ।निधि सोचिस अउ ए निर्णय लिस के एखर बर ओला हिम्मत करे बर परही । बेटी हर मोर बारे मे कुछु सोचय फेर मोला ओला भविष्य बर तैयार करे बर परहि । ओला बताय बर परहि कि सच्चा प्रेम के परख करे म नइहे ओला निभाय म हे।
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-पक्की सड़कों ने जुड़ा गांव-गांव, बढ़ी व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीणों में बड़ी नई उम्मीद
रायपुर / पहाड़ों, वनाच्छादित और दूरस्थ भौगोलिक स्थितियों के कारण लंबे समय तक संपर्कहीनता की समस्या से जूझता रहा मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर -एमसीबी जिला। कई गांव ऐसे थे जहां पहुंचना मौसम के भरोसे होता था। बरसात में सड़कें कट जाती थीं, लोग घरों में कैद हो जाते थे और रोगी, छात्र, किसान सभी कठिनाइयों का सामना करते थे।पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGYS) ने इस जिले का भूगोल ही बदल दिया। आज मनेन्द्रगढ-चिरमिरी-भरतपुर जिले के अधिकांश गांव पक्की सड़कों से जुड़ चुके हैं और जहां कार्य शेष है, वहां निर्माण युद्धस्तर पर जारी है। यहां सड़कों का जाल सिर्फ कंक्रीट या डामर का ढांचा नहीं है बल्कि यह गांवों की नई किस्मत है, ग्रामीण जीवन की धड़कन है और विकास की असली आधार है।एमसीबी जिले की ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों, दुरूह घाटियों और गहरे जंगलों में बसे गांव वर्षों तक मुख्यधारा से दूर रहे। गांवों तक पहुँचने के लिए कभी पगडंडी, कभी नदी का उफान और कभी पहाड़ी रास्तों का सहारा लेना पड़ता था। पीएमजीएसवाई के तहत जब सड़कों का सर्वेक्षण शुरू हुआ, तो ग्रामीणों के बीच उम्मीद की एक नई किरण जागी। आज वही गांव पक्की सड़कों से जुड़ चुके हैं। अब छोटे वाहनों से लेकर एम्बुलेंस और कृषि वाहन तक आराम से पहुंचते हैं। बरसात के मौसम में भी आवागमन बाधित नहीं होता। स्कूल, अस्पताल, बाजार और तहसील सबकी दूरी कम हो गई है। यह बदलाव सिर्फ यात्रा में समय घटने का नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता बढ़ने का है।पहले किसान खेतों से उपज को बैलगाड़ी या अपने सिर पर उठाकर ले जाते थे। कई बार फसल मंडी तक पहुंचते-पहुंचते खराब भी हो जाती थी। नई सड़कों का प्रभाव कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी रहा, जिसमें ट्रैक्टर, पिकअप, मिनी ट्रक अब गांव तक पहुंच रहे हैं। धान, कोदो-कुटकी, मक्का, सब्जियां और लघु वनोपज आसानी से मंडी पहुंच रही हैं। परिवहन लागत कम होने से अब किसानों की बचत बढ़ी है। खरीदी समय पर होने से किसानों की आय में स्थायी वृद्धि हुई है। आज किसान गर्व से कहते हैं कि सड़क आई, तो बाजार भी हमारे गांव आ गया।पहले बीमार व्यक्ति को अस्पताल तक लाने में कई घंटे लग जाते थे। पहले एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती थी। पर अब स्थिति बदल चुकी है और 108 एम्बुलेंस सीधे घर तक पहुंच रही है, गर्भवती महिलाओं का सुरक्षित संस्थागत प्रसव सुनिश्चित हुआ, टीकाकरण, पोषण व स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी आई, गंभीर मरीजों को समय पर जिला अस्पताल पहुंचाया जा रहा है। सड़क निर्माण से अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और मोबाइल मेडिकल यूनिट की पहुँच आसान और सुविधाजनक हो गया है।पहले दूरस्थ गांवों के बच्चे बारिश में स्कूल नहीं जा पाते थे। कई बच्चे पहाड़ी रास्तों से डरकर पढ़ाई छोड़ देते थे। अब स्कूल वैन, बसें और ऑटो आसानी से पहुंचते हैं, अध्यापक समय पर स्कूल जा पा रहे हैं। छात्र उच्च शिक्षा के लिए कस्बों और शहरों तक आसानी से आ-जा रहे हैं, जिससे ड्रॉपआउट में कमी आया है ।पीएमजीएसवाई निर्माण ने हजारों ग्रामीणों को रोजगार दिया। सड़क बनने से स्थानीय व्यवसाय, किराना, ढाबा, गैराज आदि, अब खुले परिवहन सेवाओं में वृद्धि हुई, जिससे निर्माण सामग्री की सप्लाई में स्थानीय लोगों को लाभ मिला । पर्यटन स्थलों तक पहुंच आसान हुई, जिससे स्थानीय गाइड और स्टे सुविधा बढ़ी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में यह एक स्थायी और मजबूत निवेश साबित हुआ है।जिले में सड़क निर्माण की निगरानी के लिए प्रशासन द्वारा लगातार निरीक्षण, गुणवत्ता परीक्षण और समयबद्ध समीक्षा बैठकें आयोजित की जाती हैं। मानक अनुसार रोड बेस, साइड ड्रेन और सीसी स्ट्रक्चर, पुल-पुलियों का मजबूत निर्माण, सड़क किनारे सुरक्षा चिन्ह व रिफ्लेक्टर, नागरिकों की शिकायतों का त्वरित समाधान मिल रहा है । इन सभी प्रयासों से पीएमजीएसवाई सड़कों की गुणवत्ता लंबे समय तक टिकाऊ बनी रह रही है।भविष्य की कदम शत-प्रतिशत कनेक्टिविटी की ओरएडिशनल पैकेजों के तहत कई नए मार्ग स्वीकृत हुए हैं, जिनका निर्माण जारी है। लक्ष्य यह है कि जिले का कोई भी गांव सड़क विहीन न रहे, आपदा और बरसात में भी आवागमन बाधित न हो, सभी ग्रामीण सेवाओं की पहुँच अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित हो। एमसीबी जिले में सड़कें अब सिर्फ रास्ते नहीं रहीं बल्कि अब विकास, विश्वास और परिवर्तन की सशक्त पहचान बन चुकी हैं। - -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)सोते रहते उन्हें उठाना।शंखनाद कर नींद भगाना।।रिश्ते महकाते जीवन को!सीखें रूठा मित्र मनाना!!बाँट खुशी हम भी सुख पाएँ ।सत्कर्मों का मार्ग सुहाना ।दिव्य दृष्टि रख अर्जुन जैसी !लक्ष्य साध कर लगा निशाना।।भेद मिटा कथनी-करनी में।सीख स्वयं फिर पाठ पढ़ाना।।कुंडलियों के भ्रम में मत पड़।काम जरूरी हृदय मिलाना।।
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विशेष लेख-- गोविन्द पटेल, प्रबंधक (जनसंपर्क) छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर कंपनीज, रायपुर
- हर महीने 20 मेगावॉट की दर से बढ़ रही है बिजली की खपत- धरती को छह बार लपेट सकें, इतनी बिछ गई लाइनछत्तीसगढ़ राज्य बनने का सबसे बड़ा लाभ यहां के लोगों को जिस चीज से मिला वह है बिजली। ऐसा इसलिए क्योंकि बीते 25 वर्षों में बिजली की उपलब्धता जितनी छत्तीसगढ़ में रही है, उतनी उपलब्धता किसी राज्य में नहीं रही। यहीं कारण है कि चाहे उद्योगों में उत्पादन के मामले में हो या फिर धान से लेकर सब्जियों व अन्य फसलों की पैदावार हो, सभी क्षेत्र में बिजली का अहम योगदान रहा है। आज भी हम बिजली के मामले में सरप्लस स्टेट हैं और बिजली का उत्पादन लगातार मांग के अनुरूप बढ़ते जा रही है।जब मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ का बंटवारा हुआ तब विद्युत मंडल का विभाजन नहीं किया गया था। 15 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ सरकार ने मध्यप्रदेश सरकार की मंशा के विपरीत जाकर छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल का गठन करने की अधिसूचना जारी कर दी। आज छत्तीसगढ़ में विद्युत मंडल अलग हुए 25वें वर्ष पूरे हो चुके हैं।अविभाजित मध्यप्रदेश के दौरान मुझे याद है, जब मैंने पहली बार कंप्यूटर खरीदा था, तब दुकानदार ने मुझे दो स्टेबलाइजर भी खरीदने कहा। स्टेबलाइजर इसलिए ताकि कंप्यूटर चलाते समय यदि वोल्टेज अप या डाऊन हो तो कंप्यूटर खराब न हो। परन्तु आज किसी भी उपकरण चलाने के लिए स्टेबलाइजर खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती है क्योंकि छत्तीसगढ़ बनने के बाद वोल्टेज की वैसी समस्या नहीं रही, जैसी अविभाजित मध्यप्रदेश में हुआ करती थी। अब तो इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। यह वह भरोसा है, जिसे छत्तीसगढ़ में बिजली की गुणवत्तापूर्ण उपलब्धता का। यह भरोसा एक दिन में नहीं आया। इसके लिए नन्हें कदमों से शुरूआत हुई, जो अब तेज कदमों की आहट में बदलने लगी है।जब छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल बना तक हमारे यहां 1300 मेगावॉट बिजली पैदा होती थी। परन्तु इस बिजली को गांव-गांव तक, खेतों तक, उद्योगों तक गुणवत्तापूर्ण तरीके से पहुंचाने के लिए पारेषण तंत्र, सब-स्टेशन, ट्रांसफार्मर और लाइनें नहीं थी। धीरे-धीरे राज्य शासन ने विद्युत क्षेत्र में भारी निवेश किया और हर घर तक बिजली पहुंचाने के संकल्प को पूरा किया।छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल अब छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर कंपनीज़ के रूप में संचालित है। अब उत्पादन, पारेषण और वितरण की तीन कंपनियों के माध्यम से प्रदेश में निर्बाध विद्युत आपूर्ति हो रही है।नौ हजार दिनों में रोज 20 मेगावॉट बढ़ रही है खपतछत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना को 25 वर्ष यानी 300 महीने यानी 9125 दिन बीत चुके हैं। छत्तीसगढ़ में कोयला और पानी की उपलब्धता को देखते हुए बड़े पैमाने पर बिजली संयंत्र लगाए गए। प्रदेश में बिजली की मांग देखें तो औसतन हर महीने 20 मेगावॉट की दर से बढ़ी है। यह 1300 से बढ़कर 7306 मेगावॉट पहुंच गई है। यह मांग यूं ही नहीं बढ़ी। पहाड़ से लेकर नदियों को लाघंते हुए विशालकाय टॉवरों को तंत्र विकसित किया।रोज खड़े किये जा रहे दो विशालकाय टॉवरकिसी भी आम आदमी के लिए यह समझना मुश्किल होता है कि उसके गांव में बड़े-बड़े टॉवर का क्या महत्व है, पर बिजली घरों में जितनी गुणवत्तापूर्ण बिजली पैदा हो रही है, उतनी पूरे वोल्टेज के साथ उपभोक्ताओं तक पहुंच सके, इसलिये ये टॉवर लगाये जाते हैं। पहले मध्यप्रदेश की ओर ये विशालकाय टॉवर अधिक थे, इसलिए छत्तीसगढ़ में बल्ब टिमटिमाते रहते थे। राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ के भीतर बेहतर वोल्टेज देने विशालकाय टावरों का जाल बिछाया गया। औसतन रोजाना दो विशालकाय टॉवर खड़े किये गए। तब पूरे प्रदेश में महज सात हजार पारेषण टॉवर थे, वह आज 25 हजार टॉवर से अधिक हो गई है। पहले अतिउच्च दाब के सब-स्टेशन की संख्या केवल 26 थी, वह अब बढ़कर 137 हो गई है।इतनी लाइन बिछ गई कि धरती को लेपटा जा सकता है छह बारपारेषण तंत्र के बाद उपभोक्ताओं तक बिजली वितरण कंपनी के माध्यम से पहुंचती है। बस्तर से लेकर सरगुजा के हर गांव और हर घर को रोशन करना लक्ष्य था, इसलिए निम्नदाब की लाइनें बिछाना आवश्यक था। 25 बरस में छत्तीसगढ़ में इतनी निम्नदाब लाइनें बिछाई गईं हैं, जिससे धरती को छह बार लपेटा जा सकता है। राज्य गठन के समय ये लाइनें केवल 51 हजार सर्किट किलोमीटर थी जो अब बढ़कर दो लाख 44 हजार सर्किट किलोमीटर पहुंच गई हैं।रोजाना लगाए जा रहे 25 ट्रांसफार्मरउपभोक्ताओं की सुख-सुविधाओं के यंत्र व मशीनों की पहुंच बढ़ती गई तो ट्रांसफार्मर के लोड भी बढ़ते गए। प्रदेश में 25 वर्षों में प्रतिदिन 25 ट्रांसफार्मर स्थापित किये गये। हर किसी चौक-चौराहे में ये ट्रांसफार्मर लगे दिखाई देते हैं, आज की स्थिति में ऐसे दो लाख 52 हजार स्थानों में ये ट्रांसफार्मर क्रियाशील हैं, जबकि प्रदेश बनने के समय इनकी संख्या केवल 29 हजार ही थी।हर घर बिजली पहुंचाने की बात करें तो रोजाना पांच सौ घरों में बिजली पहुंचाई गई। यह संख्या 18 लाख से बढ़कर आज 65 लाख पहुंच गई है।प्रतिदिन पांच किसानों को मिला पंप कनेक्शनविद्युत विकास केवल गांव-गली तक सीमित नहीं रहा यह हर खेत तक पहुंचा। पहाड़ से लेकर नदियों को लाघंते हुए किसानों की फसलों में सिंचाई के लिए बिजली पहुंचाई गई। 25 वर्षों में औसतन रोज पांच किसानों को पंप कनेक्शन प्रदान किये गए, जिससे कृषि पंप कनेक्शन की संख्या 73 हजार से बढ़कर आठ लाख की संख्य़ा को पार कर गया।हर दूसरे दिन एक उद्योग को मिली बिजलीप्रदेश में जितनी बिजली पैदा होती है, उसका बड़ा हिस्सा औद्योगिक विकास के लिए जाता है। हर दूसरे दिन औसतन एक उद्योग तक बिजली पहुंचाई गई। राज्य गठन के समय जहां उद्योगों की संख्या 530 थी, वह अतिउच्च दाब कनेक्शन बढ़ते हुए चार हजार 130 पहुंच गई है।विद्युत विकास के इस तंत्र से न केवल खेती समृद्धि हुई, बल्कि उद्योग-धंधे विकसित हुए और लोगों को रोजगार मिला। प्रदेश की तरक्की के लिए बिजली हर क्षेत्र में पूरक है। इसके बिना किसी क्षेत्र के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।युवा छत्तीसगढ़ मैराथन दौड़ने है तैयारयह दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण कितना सार्थक निर्णय रहा। शासन-प्रशासन की व्यवस्था मजबूत हुई है। जनता की तंत्र जनता के लिए बेहतर साबित हो रही है। पर 25 बरस का यह पड़ाव शिखर नहीं है। 2047 तक विकसित भारत और विकसित छत्तीसगढ़ का संकल्प को पूरा करने अब मैराथन दौड़ने की तैयारी कर रहे हैं, जिसमें प्रदेश में ऐसी बिजली पैदा की जाएगी, जो पर्यावरण के अनुकूल हो। इसके लिए 7700 मेगावॉट के पंप स्टोरेज संयंत्र लगाने की दिशा में काम चल रहा है। इसी तरह परमाणु ऊर्जा के संयंत्र लगाने की दिशा में भी प्रयास किये जा रहे हैं। बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है। - -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)भंग नीति का शील, पड़ेगी चुप्पी भारी ।शुष्क संवेदन-झील, पड़ेगी चुप्पी भारी।।हुए उपेक्षित वृद्ध, दूरियाँ मन में आईं।चुभे हृदय में कील, पड़ेगी चुप्पी भारी।।आँगन में दीवार, बँटी माँ दो हिस्सों में।दुख दे सीना छील, पड़ेगी चुप्पी भारी।।दुर्व्यसनी हो पुत्र, नशे में धुत मिलता है।क्यों दी इतनी ढील, पड़ेगी चुप्पी भारी।।लिए हथेली जान, दाँव पर रखते जीवन।बना रहे हैं रील, पड़ेगी चुप्पी भारी ।।धूमिल हैं संस्कार, दौड़ अंधी फैशन की।मूल्य गए सब लील, पड़ेगी चुप्पी भारी ।।
- छत्तीसगढ़ में महतारियों के सशक्तिकरण की कहानी-डॉ. दानेश्वरी संभाकरउप संचालक, जनसंपर्क विभागरायपुर। छत्तीसगढ़ अपने विकास-यात्रा के स्वर्णिम पड़ाव पर है। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बनी हैं - राज्य की महिलाएँ, जिन्हें स्नेह व सम्मान से “महतारी” कहा जाता है।बीते वर्षों में छत्तीसगढ़ सरकार ने महिला सशक्तिकरण को केवल नीतिगत प्राथमिकता नहीं बनाया, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की धुरी के रूप में स्थापित किया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में आज महिलाएँ योजनाओं की लाभार्थी मात्र नहीं, परिवर्तन की वाहक बनकर उभरी हैं। राज्य में महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए सरकार ने विविध योजनाएँ शुरू की हैं।सबसे उल्लेखनीय महतारी वंदन योजना है, जिसके तहत लगभग 70 लाख महिलाओं को अब तक 12,983 करोड़ रुपए की राशि वितरित की गई है। यह सहायता महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि परिवार व समाज में निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता भी प्रदान करती है।दीदी ई-रिक्शा योजना ने 12,000 महिलाओं को रोजगार के नए अवसर दिए। सक्षम योजना के तहत 32,000 महिलाओं को 3 प्रतिशत ब्याज पर 2 लाख रुपए तक व्यवसायिक ऋण दिया गया, जबकि महतारी शक्ति ऋण ने 50,000 महिलाओं को बिना जमानत ऋण प्रदान कर आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त किया। मुख्यमंत्री सिलाई मशीन सहायता योजना से 1.15 लाख महिलाएँ घर-परिवार के साथ उत्पादन कार्य से जुड़कर सम्मानजनक आय अर्जित कर रही हैं।कोंडागांव की रतो बाई का जीवन कभी नक्सली भय से घिरा था। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) से उन्हें 1.20 रुपए लाख और मनरेगा से 90 दिन का रोजगार मिला। आज वे पक्के घर में सुरक्षित जीवन जीती हैं और सब्ज़ी विक्रय के माध्यम से जीवन यापन करती हैं। उज्ज्वला, नल-जल जैसी सुविधाएँ उनके जीवन में प्रकाश भर रही हैं। दंतेवाड़ा जिले की गंगादेवी SHG की महिलाएँ आज टाटा मैजिक वाहन का संचालन कर 26,000 रुपए मासिक आय अर्जित कर रही हैं। यह उदाहरण बताता है कि ग्रामीण महिलाएँ अवसर मिलने पर कैसे नए व्यवसायों का संचालन कर सकती हैं।सरगुजा की श्रीमती श्यामा सिंह ने बिहान योजना के तहत 95,000 रुपए की सहायता से 30 सेंट्रिंग प्लेट से काम शुरू किया। आज उनके पास 152 प्लेट हैं तथा वे 50,000 रुपए प्रतिमाह कमाती हैं। कोरबा की श्रीमती मंझनीन बाई को DMF फंड से स्वास्थ्य केंद्र में नियुक्त होकर उन्हें 9,000 रुपए मासिक मानदेय मिलता है। यह न सिर्फ आर्थिक स्थिरता, बल्कि सामाजिक सम्मान भी देता है।कभी नक्सली हिंसा से भयभीत बस्तर आज नए परिदृश्य के साथ उभर रहा है। यह इलाका आत्मनिर्भरता, सम्मान और अवसरों की नई पहचान बन गया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय कहते हैं कि “बस्तर का पुनर्निर्माण केवल सड़क या पुल बनाना नहीं, यह वहाँ के हर घर में विश्वास का दीप जलाने का संकल्प है।”केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 15,000 विशेष आवास स्वीकृत किए, जिनमें से 3,000 बस्तर, सुकमा, कांकेर, बीजापुर और दंतेवाड़ा में बन रहे हैं। अब तक 12,000 से अधिक लोग सुरक्षित आवास पा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में महिला SHG की संख्या 2,80,362 है, जिनमें से लगभग 60,000 समूह बस्तर में सक्रिय हैं। वनोपज और हस्तशिल्प आधारित उद्यमों से करोड़ों का कारोबार हो रहा है। “लखपति महिला मिशन” के अंतर्गत 2,000 महिलाएँ सालाना 1 लाख रुपए से अधिक कमाती हैं। ‘जशप्योर’ और बस्तर बेंत उत्पाद राष्ट्रीय पहचान पा चुके हैं। महिलाएँ अब रोजगार पाने तक सीमित नहीं, बल्कि रोजगार-दाता भी बन रही हैं।स्वास्थ्य और सुविधा को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार की उज्ज्वला योजना के अंतर्गत स्वीकृत 25 लाख नए LPG कनेक्शन में से 1.59 लाख कनेक्शन छत्तीसगढ़ को मिले, जिससे नियद नेल्लानार ग्रामों की महिलाएं भी लाभान्वित हो रही है। मुख्यमंत्री श्री साय कहते हैं -“स्वच्छ रसोई, स्वस्थ परिवार और सशक्त महिला - यही उज्ज्वला का सार है।छत्तीसगढ़ के 27 जिलों में सखी वन-स्टॉप सेंटर स्थापित हैं, महिला हेल्पलाइन - 181, डायल - 112, 24’7 कार्यरत हैं। नवाबिहान योजना से कानूनी व परामर्श सहायता दी जा रही है। शुचिता योजना से 3 लाख किशोरियाँ लाभान्वित हो रही हैं। 2,000 स्कूलों में नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाई गई है। इन पहलों ने महिलाओं के मन में सुरक्षा और आत्मविश्वास की नई ऊर्जा भरी है।योजनाएँ महिलाओं को तकनीक-आधारित सशक्तिकरण की ओर ले जा रही हैं। ड्रोन दीदी योजना से महिलाओं का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जशप्योर ब्रांड से लगभग 500 महिलाएँ, 10,000 रुपए प्रति माह कमा रही हैं। नवा रायपुर के यूनिटी मॉल में SHG उत्पादों को प्राथमिकता दी जा रही है। ये नारी शक्ति को स्थानीय से राष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँचाने का मार्ग तैयार कर रही हैं।महिला एवं बाल विकास मंत्रीश्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े कहती हैं कि “नया छत्तीसगढ़ वह होगा जहाँ भय नहीं, विश्वास होगा, जहाँ महिलाएँ आश्रित नहीं, सशक्त होंगी। ”आज छत्तीसगढ़ का हर गाँव, हर घर, हर परिवार में बदलाव की अग्नि प्रज्वलित है। जहाँ पहले भय था - वहाँ आज आत्मनिर्भरता है। जहाँ मजबूरी थी- वहाँ आज सम्मान है। छत्तीसगढ़ की महतारियाँ अब परिवर्तन की राह नहीं देख रहीं- वे स्वयं परिवर्तन की दिशा रच रही हैं।
- लेखक - श्री विजय कुमार ,सचिव (पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय)भविष्य के एक ऐसे भारत की कल्पना करें जहां मालढुलाई ट्रकों के बजाय नावों से हो, लॉजिस्टिक्स गलियारे राजमार्गों की जगह नदियों के किनारे बने हों और व्यापार बढ़ने के बाद भी कार्बन उत्सर्जन कम हो। ऐसा भविष्य कोरी कल्पना नहीं है बल्कि हमारी पहुंच के दायरे में है। देश को विकसित भारत और सही मायने में आत्मनिर्भर बनने के लिए अंतर्देशीय जल परिवहन (आईडब्ल्यूटी) को टिकाऊ लॉजिस्टिक्स क्रांति की रीढ़ बनना होगा।भारत 4,000 वर्षों से नदियों के माध्यम से व्यापार करता आ रहा है। नदियों ने लोथल को रोम से, बंगाल को बर्मा से और असम को शेष दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ा है। हालांकि समय के साथ सड़कों और रेलवे ने अपनी रफ्तार और स्टील की चमक से नदियों को पीछे धकेल दिया। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के चलते आर्थिक दबाव के इस दौर में हालात बदल रहे हैं। ऐसा नदियों के प्रति प्रेम की वजह से नहीं, बल्कि जरूरत के कारण हो रहा है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अंतर्देशीय जलमार्ग पर अभूतपूर्व नीतिगत ध्यान दिया जा रहा है। राष्ट्रीय जलमार्गों पर 2013-14 में कार्गो की आवाजाही 18.1 मिलियन मेट्रिक टन थी जो 2024-25 में बढ़कर 145.84 मिलियन मेट्रिक टन हो गई है। जलमार्गों से माल-ढुलाई का खर्च भी कम आता है। जलमार्ग से माल-ढुलाई का खर्च 1.20 रुपये प्रति टन-किलोमीटर है जबकि रेल से 1.40 रुपये और सड़क से 2.28 रुपये प्रति टन-किलोमीटर का खर्च आता है। जलमार्ग किफायती और ईंधन-कुशल होते हैं। जलमार्ग से परिवहन पर प्रति टन-किलोमीटर केवल 0.0048 लीटर ईंधन की खपत होती है जबकि सड़क से 0.0313 लीटर और रेल मार्ग से 0.0089 लीटर खर्च होता है। यह किसी भी सप्लाई चेन मैनेजमेंट के लिए आंखें खोलने वाली बात है।सबसे महत्वपूर्ण यह है कि नदी परिवहन से प्रति टन-किलोमीटर ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन सड़क परिवहन की तुलना में महज 20 प्रतिशत होता है। गंगा या ब्रह्मपुत्र में चलने वाला हर जहाज न केवल सामान ढो रहे हैं, बल्कि भारत के कार्बन उत्सर्जन को कम करने की सजगता को भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित कर रहा है।भारत सरकार ने 2016 में राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर जलमार्ग विकास परियोजना को मंजूरी दी थी, जिससे गंगा-भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली में कार्गो की आवाजाही बढ़ रही है। वाराणसी और साहिबगंज जैसे मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स हब राष्ट्रीय राजमार्ग लॉजिस्टिक्स प्रबंधन लिमिटेड (एनएचएलएमएल) के साथ साझेदारी में विकसित किए जा रहे हैं तथा इंडियन पोर्ट रेल एंड रोपवे कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईपीआरसीएल) और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (डीएफसीसीआईएल) के जरिये रेल लिंक बनाए जा रहे हैं ताकि नदी, रेल और सड़क को सुगमता से जोड़ा जा सके। राष्ट्रीय जलमार्ग-2 (ब्रह्मपुत्र नदी) पर जोगीघोपा आईडब्ल्यूटी टर्मिनल को मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स पार्क (एमएमएलपी) से जोड़ा जा रहा है, जो भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्ग के जरिये कोलकाता और हल्दिया बंदरगाह को जोड़ता है।अंतर्देशीय जल परिवहन की क्षमता अब साफ़ दिखने लगी है। असम में नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड (एनआरएल) की विस्तार परियोजना का हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने उद्घाटन किया था। रिफाइनरी के लिए ओवर डाइमेंशनल कार्गो (ओडीसी) और ओवर वेट कार्गो (ओडब्ल्यूसी) जैसे भारी उपकरण आईडब्ल्यूएआई की देखरेख में भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्ग और ब्रह्मपुत्र नदी के जरिये ट्रांसपोर्ट किए गए थे। इसमें 24 कंसाइनमेंट शामिल थे जो एनआरएल जेट्टी तक आसानी से और सुरक्षित रूप से पहुंचाए गए। इससे भीड़भाड़ वाले राजमार्गों और बड़े कार्गो के लिए सड़क परिवहन की मुश्किलों से भी बचा गया। इस ऑपरेशन से पता चला कि नदी लॉजिस्टिक्स न केवल पर्यावरण के लिए अच्छा है, बल्कि यह भारत के सबसे मुश्किल औद्योगिक शिपमेंट को संभालने में भी पूरी तरह से सक्षम है। सही मायने में यह लागत-प्रभावी, सुरक्षा और सतत परिवहन का बेजोड़ मेल है।उद्योग के लिए यह अतीत की यादों में खोने या राष्ट्रीय गर्व की ही बात नहीं है बल्कि यह मार्जिन और मार्केट के बारे में है। जलमार्ग से सामान भेजना सस्ता, ज्यादा स्वच्छ और तेज होता जा रहा है क्योंकि मल्टीमोडल हब ऑनलाइन आ रहे हैं। आज की दुनिया में वैश्विक निवेशक सप्लाई चेन को केवल दक्षता के लिहाज से ही नहीं बल्कि उनके पर्यावरणीय प्रभाव को भी देखते हैं, ऐसे में नदी परिवहन को अपनाना रणनीतिक रूप से फायदेमंद है। कार्बन उत्सर्जन घटाने पर भी जोर है, जिससे अंतर्देशीय जलमार्ग आधुनिक लॉजिस्टिक्स के लिए बेहतर और ज्यादा टिकाऊ विकल्प बन गए हैं। जलमार्गों के जरिये माल भेजने से कम लागत, बेहतर पर्यावरण, सामाजिक और गवर्नेंस (ईएसजी) क्रेडेंशियल्स का दोहरा फायदा मिलता है।सामाजिक लाभ असली है। कम ट्रक मतलब कम दुर्घटनाएं, सड़कों के रखरखाव पर कम दबाव, स्वच्छ हवा और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था। नदी किनारे रहने वाले कई समुदाय जो कभी फेरी ट्रांसपोर्ट या छोटे पैमाने के व्यापार पर निर्भर थे, वे अब लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, हैंडलिंग, वेयरहाउसिंग और अंतर्देशीय पोत्तन सेवाओं में नया रोजगार पा सकते हैं। यह व्यापार और रोजगार को बढ़ाने का एक सुदृढ़ साधन है।ऐसा नहीं है कि इसमें कोई चुनौती नहीं है। मौसम का असर नेविगेशन पर पड़ता है। कुछ हिस्सों में लगातार ड्रेजिंग की दरकार होती है। मालवाहन बेड़े भी सीमित हैं। राज्यों, बंदरगाहों और मंत्रालयों के बीच संस्थागत समन्यवय भी बड़ी चुनौती है। लेकिन सरकार एंड-टू-एंड ड्रेजिंग, मल्टी-मोडल हब का विस्तार, अंतर्देशीय पोत कानून जैसी नीतियों को लागू करके इन चुनौतियों से निपट रही है। इसके साथ ही सरकार राष्ट्रीय जलमार्ग पर निजी जेट्टी बनाकार और ‘हरित नौका’ के तहत पर्यावरण मानदंडों का पालन करके इस क्षेत्र को स्वच्छ और हरित तरीकों की ओर ले जा रही है। कार-डी (कार्गो डेटा पोर्टल), जलयान और नाविक, जल-समृद्धि, पानी और नौदर्शिका (नेशनल रिवर ट्रैफिक और नेविगेशन सिस्टम) पोर्टल जैसे डिजिटल टूल परिवहन को आसान बनाते हैं और रुकावटों को कम करते हैं।पूरी दुनिया में नदी परिवहन का विस्तार हो रहा है। डेन्यूब और राइन नदियां यूरोप का माल ढोती हैं। भारत मालवहन योग्य नदियों के समृद्ध नेटवर्क के साथ मजबूत स्थिति में है। भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, ऐसे में जलमार्ग उसके लिए विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता है। जल परिवहन दक्षता, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी सभी के लिहाज से उयुक्त है।मुंबई में चल रहे इंडिया मैरीटाइम वीक 2025 में वैश्विक और स्थानीय नीति निर्माता, लॉजिस्टिक्स की दिग्गज कंपनियों से लेकर नए लोगों तक, सरकारें, निवेशक, मैरीटाइम विशेष, पर्यावरणविद और उत्साही लोग इस दिशा में अगला कदम उठाने के लिए अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। यह आयोजन कार्गो-केंद्रित नदी परिवहन के भविष्य की झलक दिखाएगा कि कैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र और दूसरे जलमार्ग हरे-भरे और ज्यादा कुशल भारत की रीढ़ बन सकते हैं। नदियों ने हमारी सभ्यता बनाई है। अपनी समृद्ध विरासत को अपनाकर और दुनिया की श्रेष्ठ कार्यप्रणाली के साथ भारत एक नए और आधुनिक अंतर्देशीय जल परिवहन प्रणाली के जरिये टिकाऊ अर्थव्यवस्था बनाने के लिए तैयार है। नदी की धारा आखिरकार हमारे पक्ष में बह रही है, जो हरित लॉजिस्टिक्स के भविष्य को ताकत दे रही है।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)सुघरा सुघरा कतका राखे, मानुष तन बड़बोला ला ।बखत आय त्यागे ला परही, ए माटी के चोला ला।।परब तिहार बिहाव मड़ाए, ढम गँड़वा बाजा बाजे।चिकमिक नवा ओनहा पहिरे,तन गहना गुंठा साजे।अहंकार मा डोलत मनखे, बड़े काज कर डारे तैं।लालच मा होगे हस अंधा, नाता मया ल मारे तैं।कोठी भरे हवय तब्भो ले, फैलाए हस झोला ला ।।बखत आय त्यागे ला परही, ए माटी के चोला ला ।।फूल सेमरा झरथे जइसे, झरही डारा ले पाना।साँस चलत ले मजा उड़ा ले, मया प्रीत के गा गाना।सुरुज उगे ले जइसे भागे, पल्ला मारत मुँधियारी।जोत बरे ले धरम करम के, कलुष ह भागय सँगवारी।लेजे बर जमदूत आय हे, कोन छेंकही डोला ला ।।बखत आय त्यागे ला परही, ए माटी के चोला ला।।आठों पीढ़ी बर जोरत हे, धन दौलत के ढेरी ला।करत हवय निशदिन पइसा बर, कलह कपट के फेरी ला।संग जाय नइ महल अटारी, तभो बने हे ब्यापारी।दया मया कल्यान भुला के, लूट करत अत्याचारी।जान बूझ के गलती करथे, कोन सिखोवय भोला ला।।बखत आय त्यागे ला परही, ए माटी के चोला ला।।
- आलेख- माया चंद्राकर,प्रकाशन अधिकारी, (दुर्ग रीजन) छत्तीसगढ़ स्टेट डिस्ट्रीब्यूशन कंपनीदुर्ग जिला जो अविभाजित मध्यप्रदेश में सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाला जिला था, अपनी पहचान मुख्य रुप से भिलाई इस्पात संयंत्र के कारण बना चुका था। यह संयंत्र न केवल भारत के औद्योगिक मानचित्र पर एक चमकता सितारा था, बल्कि इसने दुर्ग-भिलाई के शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों को शुरुआती दौर में ही भरपूर बिजली और आधुनिकता दी। हालाकि इस औद्योगिक चमक के नीचे एक विरोधाभास छिपा था कि शहरों में जहॉं बिजली की बहुतायत थी, वहीं अविभाजित दुर्ग जिले जिसमें बालोद एवं बेमेतरा जिला भी शामिल था, के कई दूर-दराज गॉंव अभी भी बिजली की पहुंच से दूर थे और जिन क्षेत्रों में बिजली थी जैसे कि पाटन, बालोद, बेमेतरा, साजा एवं बेरला और आसपास के गांव भी लो-वोल्टेज, ओवरलोडिंग एवं विद्युत कटौती की अत्याधिक गंभीर समस्याओं से त्रस्त थे। इस बिजली संकट का सबसे गहरा असर कृषक वर्ग पर पड़ा। दुर्ग क्षेत्र जो कृशि प्रधान है, के किसानों को कृशि पंप चलाने में भारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता था।वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से 2025 तक का सफर दुर्ग रीजन (दुर्ग, बालोद, बेमेतरा जिले) के लिए बिजली के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन का काल रहा। इन 25 वर्षों में छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के तहत वितरण नेटवर्क के विस्तार, आधुनिकीकरण और उपभोक्ताओं को बेहतर सेवा देने की दिशा में तेजी से प्रगति हुई है।केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं, जैसे कि राजीव गांधी ग्रामीण राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (RGGVY) और दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (DDUGJY) ने दुर्ग रीजन के विद्युतीकरण को गति प्रदान की। राज्य गठन के बाद सिर्फ गांव तक बिजली पहुंचाना ही नहीं, बल्कि सौभाग्य योजना के अंतर्गत हर घर को कनेक्शन मिलना भी सुनिश्चित किया गया, जिसके परिणामस्वरुप वर्तमान स्थिति में दुर्ग रीजन(दुर्ग, बालोद, बेमेतरा जिला) में घरेलू बिजली कनेक्शन की दर लगभग 100 प्रतिशत है।वर्श 2000 से सितंबर 2025 तक बिजली वितरण में हुई उल्लेखनीय वृद्धि - वर्ष 2000 से सितंबर 2025 तक के बिजली वितरण नेटवर्क के विस्तार और क्षमता में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। निम्न आंकड़ा इस अवधि में हुए तीव्र बुनियादी ढांचे के विकास और विद्युतीकरण के सफल प्रयासों को उजागर करता है।विवरण वर्ष 2000 वर्ष 2025 सितंबर वृद्धिवितरण ट्रांसफार्मरों की संख्या 4787 34367 7 गुणा से अधिक33 केवी लाईनों की लंबाई 885.32 किमी 3311.50 किमी लगभग 4 गुणा11 केवी लाईनों की लंबाई 4758.22 किमी 15842.45 किमी 03 गुणा से अधिक33/11 केवी उपकेन्द्रों की संख्या 39 195 5 गुणाअति उच्चदाब कंेद्रों की संख्या 03 19 06 गुणा से अधिककृशि पंपों की संख्या 19615 121355 06 गुणा से अधिकएलटी लाईनों की लंबाई 9460 किमी 36715.25 किमी लगभग 4 गुणाकुल विद्युतीकृत गांव - 1760 (सभी ग्राम) शत-प्रतिशतसंभाग 05 09 लगभग दोेगुनीउपसंभाग 12 19 वृद्धिवितरण केंद्र 43 62 वृद्धिकुल उच्चदाब कनेक्शन 83 660 लगभग 08 गुणाकुल निम्नदाब कनेक्शन 355312 987708 लगभग ढाई गुणानेटवर्क विस्तार से न केवल घरेलू उपभोक्ताओं को लाभ मिला बल्कि कृषि और औद्योगिक क्षेत्र भी मजबूत हुए। कृषि पंपों की संख्या 06 गुणा से अधिक (19615 से 1,21,355) बढ़ी है, जो कृषि क्षेत्र के विद्युतीकरण पर विशेष ध्यान केंद्रित किए जाने का प्रमाण है। रीजन मंे उच्च दाब (एचटी) उपभोक्ताओं की संख्या इन 25 वर्षों में 83 से बढ़कर 656 हो गई। औद्योगिक विकास और शहरीकरण की बढ़ती गति को बनाए रखने के लिए सीएसपीडीसीएल ने लाइनों के रखरखाव और निर्माण पर जोर दिया, जिससे उद्योगों को लगभग चौबीस घंटे सातों दिन बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। एलटी उपभोक्ताओं की संख्या 355312 से लगभग ढाई गुणा बढ़कर 981735 हो गई। आज की तारीख में एलटी उपभोक्ताओं को वार्षिक 2010.23 करोड़ एवं एचटी उपभोक्ताओं को 1539.12 करोड़ की बिजली बेची जा रही है। वितरण ट्रांसफार्मरों और 33/11 केवी उपकेन्द्रों की संख्या में क्रमशः 07 गुणा से अधिक और 05 गुणा की वृद्धि हुई है, जो नेटवर्क की क्षमता और विश्वसनीयता में बड़े सुधार को दर्शाती है। 33 केवी और एलटी लाईनों की लंबाई में लगभग 04 गुणा की वृद्धि हुई है, जिससे दूर-दराज के क्षेत्रों तक बिजली पहुंचना संभव हुआ है। दुर्ग, बालोद एवं बेमेतरा जिले के सभी 1760 ग्रामों का विद्युतीकरण हो चुका है, जो इस अवधि की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है। संभाग, उपसंभाग और वितरण केंद्रों की संख्या में भी वृद्धि हुई है, जो बढ़े हुए नेटवर्क के कुशल प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक ढांचे के विस्तार को दर्शाता है। यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से बिजली वितरण के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग को दर्शाता है, जिससे अधिक उपभोक्ताओं तक गुणवत्तापूर्ण बिजली की पहुंच संभव हुई है।पिछले एक दशक में, रीजन में बिजली के क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव तकनीकी आधुनिकीकरण और उपभोक्ता-केंद्रित सेवाओं के रूप में आया है। हाल के वर्षों में स्मार्ट मीटर लगाने की परियोजना एक बड़ा कदम है। भारत सरकार की आरडीएसएस योजना के तहत, ये स्मार्ट मीटर उपभोक्ताओं को बिजली की खपत की सटीक जानकारी ‘‘मोर बिजली’’ ऐप के माध्यम से हर आधे घंटे में उपलब्ध करा रहे हैं। इससे बिलिंग में पारदर्शिता आई है और मानवीय त्रुटियां कम हुई हैं। यह उपभोक्ताओं को अपनी बिजली खपत को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में भी मदद करता है।डिजीटल सेवाएं प्रदान करने मंे भी विद्युत कंपनी ने तरक्की की है। बिजली बिल का भुगतान, नए कनेक्शन के लिए आवेदन और शिकायत निवारण जैसी सेवाएं पूरी तरह से डिजिटल हो गई हैं, जिससे उपभोक्ताओं को बिजली विभाग के कार्यालयों में जाने की आवश्यकता कम हो गई है।वर्ष 2025 तक, दुर्ग की बिजली व्यवस्था अब केवल पारंपरिक स्रोतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि नवीकरणीय ऊर्जा की ओर भी बढ़ रही है। सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी के कारण घरों और व्यवसायों में ‘‘प्रधानमंत्री सूर्यघर मुफ्त बिजली योजना’’ के तहत सोलर रूफटॉप सिस्टम लगाने का चलन बढ़ रहा है।दुर्ग जिले का यह सफर, भिलाई की औद्योगिक रोशनी से शुरु होकर हर गांव के घर को रोशन करने तक, भारत की विकास यात्रा का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह सफर स्पष्ट रुप से दर्शाता है कि राज्य निर्माण के शुरुआती वर्षों में जहाँ बिजली को हर घर तक पहुँचाने पर जोर था, वहीं बाद के वर्षों में आपूर्ति की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और उपभोक्ता सेवाओं को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया। स्मार्ट मीटर, ऑनलाइन सेवाएं और सौर ऊर्जा की ओर रुझान, यह दर्शाता है कि दुर्ग की बिजली व्यवस्था एक आधुनिक, कुशल और भविष्य के लिए तैयार ग्रिड की दिशा में अग्रसर है।
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विशेष लेख : छगन लोन्हारे, उप संचालक (जनसंपर्क)
रायपुर। छत्तीसगढ राज्य स्थापना के समय 16 जिलों में से 09 जिलों में श्रम कार्यालय तथा 04 जिलों में औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा कार्यालय संचालित है। वर्तमान में राज्य के समस्त 33 जिलों में श्रम कार्यालय तथा 10 जिलों में औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा तथा वर्ष 2008 से रायपुर में इंडस्ट्रीयल हाईजिन लैब का राज्य स्तरीय कार्यालय प्रारंभ किया गया है। राज्य स्थापना के बाद से वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल तथा वर्ष 2011 में छत्तीसगढ़ असंगठित कर्मकार राज्य सामाजिक सुरक्षा मंडल का गठन किया गया है। उक्त मण्डलों में श्रमिकों के पंजीयन, नवीनीकरण तथा विभिन्न योजनाओं में आवेदन विभागीय पोर्टल/श्रमेव जयते मोबाईल ऐप के माध्यम से ऑनलाईन करने की सुविधा दी गयी है तथा विभिन्न योजनाओं में डी०बी०टी के माध्यम से श्रमिकों को लाभान्वित किया जा रहा है।श्रम विभाग अंतर्गत 25 वर्षों की विभागीय उपलब्धियां52 लाख 75 हजार 618 संगठित/निर्माण/असंगठित श्रमिक पंजीकृत31 जुलाई, 2025 तक छ0ग0 श्रम कल्याण मंडल अंतर्गत 5लाख 41 हजार 920 संगठित श्रमिक, छ0ग0 भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मण्डल अंतर्गत 30 लाख 21 हजार 624 निर्माण श्रमिक तथा छ०ग० असंगठित कर्मकार राज्य सामाजिक सुरक्षा मंडल अंतर्गत 17 लाख 12 हजार 074 असंगठित श्रमिक पंजीकृत हैं। इस प्रकार विभाग अंतर्गत संचालित मंडलों में कुल 52 लाख 75 हजार 618 संगठित, निर्माण, असंगठित श्रमिक पंजीकृत हैं। राज्य स्थापना के बाद से 57 लाख 24 हजार 745 श्रमिकों को 23 अरब 70 करेाड 24 लाख 56 हजार 757 रूपये से लाभांवित किया गया।छ0ग0 श्रम कल्याण मंडल में 80 लाख 713 संगठित श्रमिक को 31 जुलाई, 2025 तक राशि रूपये 26 करोड 56 लाख 2 हजार 131 से, छ०ग० भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मण्डल में 51 लाख 72, हजार 579 निर्माण श्रमिकों को राशि रूपये 19 करोड 82 लाख 69 लाख 48 हजार 448 तथा छ०ग० असंगठित कर्मकार राज्य सामाजिक सुरक्षा मंडल में 4 लाख 71 हजार 453 अंगठित कर्मकारों को राशि रूपये 3अरब 60 करोड 99 लाख 06 हजार 178 से इस प्रकार राज्य स्थापना के बाद से कुल 57 लाख 24 हजार 745 श्रमिकों को राशि रूपये 23 अरब 70 करोड़ 24 लाख 56 हजार 757 (तेईस अरब सत्तर करोड़ चौबीस लाख छप्पन हजार सात सौ सात रूपये) से लाभांवित किया गया है।श्रमिक सहायता केन्द्र 24x7 संचालितश्रमिकों के हितलाभ संरक्षण, सहायता एवं उनके शिकायतों के निराकरण करने के लिए राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री श्रमिक सहायता केन्द्र (Helpline Center) रायपुर में 24x7 संचालित है। प्रत्येक जिले में जिला स्तरीय तथा समस्त विकासखंडों में मुख्यमंत्री श्रम संसाधन केन्द्र संचालित किया जा रहा है, जिसके माध्यम से 31 जुलाई 2025 तक 84 हजार 810 निर्माण श्रमिकों को पंजीयन एवं योजनाओं के आवेदन में सहयोग प्रदान किया गया है। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के अंतर्गत विभिन्न श्रम कानूनों के अंतर्गत कारखानों, दुकान व स्थापनाओं, ठेकेदारों आदि का पंजीयन, नवीनीकरण, संशोधन तथा विभाग अंतर्गत गठित मंडलों में श्रमिकों के पंजीयन, नवीनीकरण, संशोधन तथा योजनाओं हेतु आवेदन/स्वीकृति विभागीय वेब पोर्टल एवं श्रमेव जयते मोबाईल एप के माध्यम से ऑनलाईन की जा रही है। साथ ही विभिन्न श्रम अधिनियमों के अंतर्गत पंजियों/अभिलेखों को ऑनलाईन डिजिटल रूप में संधारित करने तथा एकीकृत वार्षिक विवरणी ऑनलाईन प्रस्तुत करने की सुविधा नियोजकों को प्रदान की गई है।ई-गवर्नेस के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारभारत सरकार कार्मिक, लोक शिकायत मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा छ०ग० शासन श्रम विभाग को 2020-21 हेतु ‘ई-श्रमिक सेवा‘ सहित सार्वभौमिक पहुंच हेतु ‘ई-गवर्नेस के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार‘ रूपये 02 लाख पुरस्कार राशि के साथ गोल्ड पुरस्कार प्रदान किया गया। प्रवासी श्रमिकों के हित संरक्षण, कल्याण एवं सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न विभागों के समन्वय से दिनांक 19 जुलाई 2021 से छ०ग० राज्य प्रवासी श्रमिक नीति, 2020 लागू किया गया है, जिसमें पलायन पंजी के ऑनलाईन संधारण की व्यवस्था की गई है।श्रमिक परिवारों के बच्चों के लिये अटल उत्कृष्ट शिक्षा योजनामुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणा एवं श्रम मंत्री के निर्देशानुसार पंजीकृत निर्माण श्रमिक परिवारों के बच्चों को उत्कृष्ट निजी शालाओं में निःशुल्क अध्ययन कराये जाने हेतु छ०ग० भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल द्वारा ‘अटल उत्कृष्ट शिक्षा योजना‘ 08.जनवरी 2025 से प्रारंभ की गई है। योजना के तहत मंडल में 01 वर्ष पूर्व पंजीकृत निर्माण श्रमिकों के प्रथम 02 बच्चों को कक्षा 6 वीं में प्रवेश दिया जाकर कक्षा 12 वीं तक आवासीय विद्यालयों में वर्तमान में 100 श्रमिकों के बच्चों को विभिन्न विद्यालयों में प्रवेश दिया जाकर गुणवत्तायुक्त निःशुल्क शिक्षा प्रदान किया जा रहा है। निर्माण श्रमिकों के स्वयं के आवास क्रय एवं आवास निर्माण हेतु एक लाख रूपये एकमुश्त अनुदान सहायता राशि प्रदाय किया जा रहा है। 31 जुलाई 2025 तक 2 हजार 278 निर्माण श्रमिकों को नवीन आवास क्रय/आवास निर्माण हेतु अनुदान सहायता राशि प्रदाय किया जा चुका है।निर्माण श्रमिकों के लिये पेंशन योजना60 वर्ष आयु पूर्ण कर चुके पंजीकृत निर्माण श्रमिक, जिनका मंडल में 10 वर्ष पूर्व का पंजीयन हो, ऐसे 37 निर्माण श्रमिकों को प्रतिमाह रूपये 1500/- पेंशन योजना से लाभांवित किया जा रहा है। शहीद वीर नारायण सिंह श्रम अन्न योजना इस योजना अंतर्गत पंजीकृत निर्माण, असंगठित एवं संगठित श्रमिकों को रूपये 05 में गरम एवं पौष्टिक भोजन प्रदाय किया जा रहा है। प्रदेश के 17 जिलों में 37 श्रम अन्न योजना केन्द्र संचालित है, जिसमें प्रतिदिन लगभग 8 हजार श्रमिक गरम भोजन प्राप्त करे रहें है।संचालनालय, कर्मचारी राज्य बीमा सेवायेंकर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 के अंतर्गत कर्मचारी राज्य बीमा योजना, राज्य निर्माण के समय श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदाय करने वाली यह योजना केवल कारखानों, सिनेमाघरों, ट्रांसपोर्ट, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर लागू थी। राज्य निर्माण के पश्चात इस योजना में निजी सहायता प्राप्त शैक्षणिक एवं निजि चिकित्सा संस्थाओं तथा राज्य सरकार द्वारा संचालित नगर निगमों, नगर पालिकाएं, नगर परिषद् एवं अन्य स्थानीय निकाय पर भी लागू की गई है।निःशुल्क चिकित्सा हित लाभछ.ग. राज्य गठन के उपरांत कर्मचारी राज्य बीमा योजना का विस्तार छ.ग. राज्य के 15 जिलों के सम्पूर्ण क्षेत्र तथा 17 जिलों के नगरीय निकाय क्षेत्रों में किया गया है। कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948 के अंतर्गत छ.ग. राज्य निर्माण के पूर्व लगभग 30 हजार कामगार बीमित होकर राज्य के संचालनालय, कर्मचारी राज्य बीमा सेवायें के अंतर्गत संचालित औषधालयों के माध्यम से निःशुल्क चिकित्सा हितलाभ प्राप्त कर रहे थे, जो कि अब बढ़कर लगभग 6 लाख 25 हजार हो गये हैं।राज्य निर्माण के पूर्व छ.ग. राज्य में केवल 6 औषधालय संचालित थी जो अब बढ़कर 42 हो गई है। बीमित हितग्राहियों को बेहतर चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध कराने के लिये राज्य के रायपुर, कोरबा, भिलाई तथा रायगढ़ में एक-एक 100 बिस्तरयुक्त चिकित्सालय का निर्माण कर्मचारी राज्य बीमा निगम के द्वारा किया गया है।बीमित हितग्राहियों को कैशलेस चिकित्सा सुविधायेंराज्य निर्माण के पूर्व बीमित हितग्राहियों को अंतःरोगी उपचार पर होने वाले व्यय का वहन पहले स्वयं करना पड़ता था फिर वे चिकित्सा पुर्नभुगतान हेतु अपना देयक प्रस्तुत करते थे। राज्य निर्माण के पश्चात् वर्ष 2014 में बीमित हितग्राहियों को कैशलेस आधार पर सेकेण्डरी केयर चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध कराने के लिये निजी चिकित्सालयों को अधिकृत किया गया है। अधिकृत किये गये चिकित्सालयों में बीमित हितग्राहियों को कैशलेस अधार पर सेकेण्डरी केयर चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध कराई जा रही है।बीमित हितग्राहियों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने तथा उनके प्रकरणों का शीघ्र निराकरण करने के उदद्देश्य से छत्तीसगढ़ कर्मचारी राज्य बीमा सोसायटी का गठन वर्ष 2018 में किया गया है, जिसका लाभ पंजीकृत श्रमिक उठा रहे हैं।

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