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- -भौगोलिक दूरियां होंगी खत्म: वनांचलों से लेकर शहरों तक पहुंच रही आधुनिक शिक्षाआलेख- विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालकरायपुर। छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा जगत में एक नए युग का सूत्रपात हो चुका है। वर्ष 2014 से 2026 के बीच केंद्र सरकार से मिली प्रमुख स्वीकृतियों और सौगातों की शृंखला में 'प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान' (PM-USHA) राज्य के लिए वरदान साबित हो रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के प्रभावी क्रियान्वयन, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की नैशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल (NAAC) ग्रेडिंग में सुधार, और अनुसंधान (Research) के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा भारी-भरकम वित्तीय अनुदान की स्वीकृति दी गई है। यह योजना पूर्ववर्ती राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) का ही एक परिष्कृत और अधिक उन्नत रूप है।इस योजना के तहत देश भर के लिए कुल 12,926.10 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इस विशाल बजट का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा छत्तीसगढ़ के हिस्से आया है। योजना के तहत छत्तीसगढ़ राज्य में चयनित पात्र शासकीय विश्वविद्यालयों को मल्टी-डिसिप्लिनरी एजुकेशन एंड रिसर्च यूनिवर्सिटीज़ (MERU) के अंतर्गत प्रति संस्थान 20 करोड़ से लेकर 100 करोड़ रुपए तक का भारी-भरकम अनुदान मिल रहा है। वहीं, चिन्हित शासकीय महाविद्यालयों को बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण (Grants to Strengthen Colleges) के लिए 5 करोड़ रुपए तक का प्रोजेक्ट-बेस्ड अनुदान स्वीकृत किया जा रहा है। इस वित्तीय भार का वहन केंद्र और राज्य सरकार द्वारा 60:40 के अनुपात (60% केंद्रांश और 40% राज्यांश) में किया जा रहा है।छत्तीसगढ़ में यह योजना केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर तेजी से प्रगति कर रही है। छत्तीसगढ़ शासन के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा केंद्र सरकार के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) निष्पादित किया जा चुका है। वर्तमान में, चयनित कॉलेजों द्वारा विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर पोर्टल पर अपलोड की जा रही है। इसके साथ ही, राज्य के शिक्षण संस्थानों में स्मार्ट क्लासरूम, आधुनिक लैब, और कंप्यूटर सेंटर जैसे अत्याधुनिक अधोसंरचना निर्माण का कार्य युद्धस्तर पर जारी है।PM-USHA योजना का सबसे खूबसूरत पहलू इसका समावेशी होना है। इस परियोजना का लाभ छत्तीसगढ़ के समस्त 33 जिलों को मिल रहा है। योजना के तहत विशेष रूप से राज्य के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों और दूरस्थ अंचलों जैसे बस्तर संभाग और सरगुजा संभाग,कम सकल नामांकन अनुपात (GER) वाले क्षेत्रों,आकांक्षी जिलों जैसे धमतरी, गरियाबंद, महासमुंद आदि के शासकीय कॉलेजों को प्राथमिकता के आधार पर शामिल किया गया है, ताकि विकास की दौड़ में पीछे छूटे क्षेत्रों को मुख्यधारा में लाया जा सके।इस दूरदर्शी परियोजना से राज्य के विभिन्न शासकीय शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत लगभग 5 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं सीधे लाभान्वित हो रहे हैं। इस योजना का सबसे बड़ा फायदा ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों, अनुसूचित जनजाति (ST), अनुसूचित जाति (SC) और महिला वर्ग के छात्र-छात्राओं को मिल रहा है। अब छत्तीसगढ़ के वनांचलों और दूरदराज के गांवों के युवाओं को भी वैश्विक स्तर की आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान की सुविधाएं अपने ही राज्य में सुलभ हो रही हैं, जो उनके सुनहरे भविष्य की मजबूत नींव रख रही हैं।
- -आलेख -श्री सी.पी. राधाकृष्णन,(लेखक भारत के उपराष्ट्रपति हैं)सदियों से, भारत की एक अनूठी पहचान रही है। उसकी यह पहचान ‘वसुधैव कुटुंबकम’ – यानी पूरी दुनिया को एक इकाई और सभी जीव-जंतुओं को एक मानने - की महान सोच में निहित रही है। भारत के इस आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित, योग एक ऐसी प्राचीन विद्या है जो शरीर, मन और आत्मा के बीच एक संतुलन स्थापित करती है। योग के मूल तत्वों में आसन (शारीरिक मुद्राएं), प्राणायाम (सांस लेने की तकनीकें) और ध्यान शामिल हैं। इन तत्वों का मेल शारीरिक स्वस्थता, मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन को बेहतर बनाता है।दिनांक 27 सितंबर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए, माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने दुनिया को रहने योग्य और स्थिर बनाने के उद्देश्य से लोगों की जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने कहा कि योग मन एवं शरीर, सोच एवं कर्म, संयम एवं संतुष्टि के बीच एकता, इंसान एवं प्रकृति के बीच सामंजस्य और सेहत एवं कल्याण से संबंधित एक समग्र दृष्टिकोण का संगम है। माननीय प्रधानमंत्री के आग्रह पर, 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित करने से संबंधित 174 से अधिक देशों के सम्मिलित प्रस्ताव को मंजूरी दी। वर्ष 2015 से, दुनिया भर में लाखों लोग सार्वजनिक जगहों पर इकट्ठा होकर एक साथ योग करते हैं और इस प्रकार हमारे प्राचीन ज्ञान को एक वैश्विक आंदोलन का रूप देते हैं।इस वर्ष 21 जून को प्रधानमंत्री श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी जहां कोलकाता में योग दिवस की अगुवाई करेंगे, वहीं मैं इस समारोह में भाग लेने के लिए लद्दाख में रहूंगा। व्यक्तिगत रूप से, पिछले कई वर्षों से मैंने भी योग एवं पंचकर्म के नियमित अभ्यास के लाभों को महसूस किया है। इन दोनों को अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी विधाएं (सिस्टर साइंसेज) कहा जाता है। इन्हीं बेहद समृद्ध करने वाले व्यक्तिगत अनुभवों ने मुझे योग और मानव कल्याण पर इसके गहरे प्रभाव के बारे में अपने विचार साझा करने के लिए प्रेरित किया है।योग: भारत की एक शाश्वत विरासतमाना जाता है कि शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कल्याण से संबंधित ‘योग’ के कालजयी अभ्यास की शुरुआत हमारी सभ्यता के उदय के साथ ही हुई थी। योग की परंपरा में भगवान शिव को जहां सबसे पहला योगी या ‘आदि योगी’ और सबसे पहला गुरु या ‘आदि गुरु’ माना जाता है, वहीं योग के सिद्धांतों को ‘योग सूत्र’ में व्यवस्थित रूप से संकलित के कारण महर्षि पतंजलि को ‘शास्त्रीय योग का जनक’ माना जाता है। महर्षि पतंजलि का तमिलनाडु के साथ गहरा आध्यात्मिक नाता है। ऐसा माना जाता है कि उनकी भौतिक जीव समाधि भी तिरुपत्तूर में स्थित है।हमारे श्रद्धेय ऋषियों और मुनियों ने दुनिया को योग का अमूल्य खजाना दिया। वर्षों के ध्यान, तपस्या और आध्यात्मिक साधना के बाद, इन ऋषियों और मुनियों ने एक ऐसी समग्र प्रणाली विकसित की जो शरीर, मन और आत्मा को जोड़ती है। श्री रामकृष्ण परमहंस ने योग के तीन महान मार्गों की व्याख्या की है- ज्ञान योग, जो बुद्धि एवं ज्ञान का मार्ग है; कर्म योग, जो निस्वार्थ सेवा एवं सही कर्म का मार्ग है; और भक्ति योग, जो शुद्ध प्रेम और भक्ति का मार्ग है। उन्होंने सिखाया कि ये तीनों मार्ग अंततः परम सत्य की अनुभूति में एकाकार हो जाते हैं।आज योग भौगोलिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सीमाओं के बंधन से आगे निकल गया है। यह भारत के ऋषियों के शाश्वत ज्ञान और मानवता के कल्याण में उनके चिरस्थायी योगदान का जीवंत प्रमाण है।स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योगहर वर्ष हमारे देश में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पूरे उत्साह और एक सार्थक विषय के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष के विषय ‘स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग’ का खास महत्व है। स्वास्थ्य सेवा और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में हुई उल्लेखनीय प्रगति और मृत्यु दर में आई कमी के कारण दुनिया भर में लोगों की औसत आयु बढ़ी है। भारत भी आबादी में हो रहे इस बड़े बदलाव का साक्षी बन रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की ‘इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023’ के अनुसार, 2050 तक भारत में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से अधिक होगी।लंबी आयु के इस अनमोल उपहार का उत्सव मनाते हुए, समाज पर यह सुनिश्चित करने की एक महती जिम्मेदारी भी है कि जिंदगी में मिले इन अतिरिक्त वर्षों का मतलब केवल आयु में बढ़ोतरी ही न हो, बल्कि उन वर्षों में जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर हो। इसी संदर्भ में, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (आईडीवाई) 2026 का विषय – “स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग” - एक बहत ही सामयिक संदेश के रूप में सामने आया है।आबादी में आए इस बदलाव के कारण भारत में ‘सिल्वर इकॉनमी’ का विस्तार हुआ है, जो मुख्य रूप से स्वास्थ्य सेवा और वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों से जुड़े सामानों एवं सेवाओं पर केंद्रित है। उद्योग जगत के विशेषज्ञों का अनुमान है कि अभी इसका आकार लगभग 73,000 करोड़ रुपये का है। आने वाले वर्षों में इस सेक्टर के काफी बढ़ने की उम्मीद है।आज के दौर में आयु बढ़ने से जुड़ी हकीकतों ने इस तथ्य को उजागर किया है कि बुजुर्ग लोग कैसे विभिन्न प्रकार की मुश्किलों एवं कमजोरियों के जटिल जाल से जूझ रहे हैं। इस संदर्भ में, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी दुनिया भर में बुजुर्गों के बीच गैर-संचारी रोगों, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और सामाजिक अलगाव के बढ़ते बोझ को बार-बार रेखांकित किया है।मेरा भी यह मानना है कि आज वक्त की यह मांग है कि लोगों को कम आयु से ही योग से जोड़ा जाए। योग का अभ्यास जितनी जल्दी शुरू किया जाए, जीवन भर उसके उतने ही अधिक लाभ मिलते हैं। मुझे यह जानकर बेहद खुशी हुई है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में योग को स्वास्थ्य, कल्याण और मूल्यों पर आधारित शिक्षा के एक अहम हिस्से के तौर पर महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। युवाओं को योग से जोड़ने की दिशा में यह एक सकारात्मक कदम है। इससे निश्चित रूप से विद्यार्थियों में अनुशासन, एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा मिलेगा।इस प्रकार, हम पाते हैं कि दुनिया भर में बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के बीच भारत दुनिया को सफलतापूर्वक आगे बढ़ने का एक अनूठा मॉडल प्रदान कर रहा है - एक ऐसा मॉडल जो प्राचीन सभ्यतागत ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों के बीच सामंजस्यपूर्ण तालमेल बिठाता है - और वह है योग।योग - आज के दौर में बुढ़ापे से जुड़ी समस्याओं का समाधानआज, आधुनिक विज्ञान हमारे उन ऋषियों एवं योगियों की शाश्वत बातों की पुष्टि कर रहा है, जिन्होंने अनुशासित जीवन, योग और आध्यात्मिक साधना के जरिए असाधारण लंबी आयु, जीवन-शक्ति और मानसिक स्पष्टता हासिल की थी। हाल के वर्षों में योग के उपचारात्मक पहलुओं में अकादमिक और क्लिनिकल अभिरुचि तेजी से बढ़ी है।नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (एनआईएच) एवं हार्वर्ड मेडिकल स्कूल जैसे बड़े संस्थानों और ‘लैंसेट’ जैसी कई प्रतिष्ठित शोध-पत्रिकाओं ने अपने शोधों में इस तथ्य को दर्शाया है कि नियमित रूप से योग करने से बुजुर्गों में संतुलन, लचीलापन और चलने-फिरने की क्षमता सुरक्षित रूप से बेहतर होती है। इससे उनके गिरने का डर और जोखिम काफी कम हो जाता है। शोधों से यह भी पता चला है कि योग से हड्डियों की मजबूती (बोन डेंसिटी) बढ़ती है, गठिया का दर्द कम होता है, सांस लेने की क्षमता बेहतर होती है, रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) स्थिर रहता है और मानसिक सेहत अच्छी रहती है। साथ ही, ध्यान और सांस लेने के व्यायाम से बुजुर्गों की नींद की गुणवत्ता, कठिन परिस्थितियों का सामना करने की मानसिक क्षमता और सोचने-समझने की शक्ति (कॉग्निटिव फंक्शनिंग) में भी सुधार देखा गया है।लेकिन मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि योग की असली ताकत उसके समग्र स्वरूप में निहित है। शारीरिक सुधार से कहीं आगे बढ़कर, योग भावनात्मक संतुलन और सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देता है। मैंने देखा है कि आज बुजुर्गों के बीच अकेलेपन का बढ़ता अहसास एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। योग धीरे-धीरे इस अकेलेपन को सामूहिक जुड़ाव की भावना में बदल देता है। यह लोगों को “मैं-केंद्रित” सोच से हटाकर सहानुभूति, आपसी जुड़ाव एवं आंतरिक शांति पर आधारित “हम-केंद्रित” सोच की ओर ले जाता है।मेरे अपने अनुभव के अनुसार, अहम बात यह है कि ‘स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग’ में बहुत अधिक शारीरिक मेहनत की जरूरत नहीं होती। पारंपरिक योग क्रियाओं को काफी सोच-समझकर ऐसे सरल एवं सुलभ तरीकों में ढाला गया है जो बुजुर्गों के लिए उपयुक्त हैं। इनमें योगिक सूक्ष्म व्यायाम (जोड़ों की हल्की हरकतें), कुर्सी की मदद से किए जाने वाले आसन, सांस लेने की निर्देशित तकनीकें और ध्यान जैसी क्रियाएं शामिल हैं। ये सब बढ़ती आयु के शरीर पर बिना कोई दबाव डाले न्यूरोएंडोक्राइन प्रणाली और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं।साथ ही, योग उन देखभाल करने वालों और परिवार के सदस्यों के लिए भी हौसले एवं सहनशक्ति का स्रोत है, जो बुजुर्गों की देखभाल की भावनात्मक तथा शारीरिक जिम्मेदारियां उठाते हैं। इन व्यापक लाभों को देखते हुए, आयुष मंत्रालय ने “गैर-संचारी रोगों और लक्षित समूहों के लिए योग की 10 विधाओं” से जुड़ी एक अहम पहल शुरू की है। इसमें बुजुर्गों की सेहत के लिए खास तौर पर साक्ष्यों पर आधारित योग मॉड्यूल भी शामिल है। इसके अलावा, 100 दिनों का मुफ्त निर्देशित ऑनलाइन योग कार्यक्रम प्रदान करने वाले ‘योग 365’ पहल नाम के एक देशव्यापी अभियान को कुछ इस तरह से तैयार किया गया है ताकि योग सभी आयु के नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी का एक सहज एवं स्थायी साथी बन सके।दो हजार से भी अधिक वर्ष पहले, महान तमिल विद्वान एवं संत तिरुवल्लुवर ने ‘कुरल’ (949) के जरिए सेहत से संबंधित एक व्यक्ति-केंद्रित दृष्टिकोण की हिमायत की थी। उन्होंने कहा था, “उपचार शुरू करने से पहले मरीज की हालत, बीमारी की प्रकृति और उपयुक्त समय पर विचार करें।” यह शाश्वत समझ स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग के आधुनिक सिद्धांतों से मेल खाती है, जहां व्यक्ति की उम्र, सेहत और जरूरतों के हिसाब से अभ्यास को सावधानी से अपनाया जाता है ताकि लोग बुढ़ापे में भी अधिक स्वस्थ, सक्रिय और सम्मानजनक जीवन जी पाएं।अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर मैं हर नागरिक, शिक्षण संस्थान, नागरिक समाज संगठन, स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े पेशेवर और समुदायों के नेता से आग्रह करता हूं कि वे योग को केवल कभी-कभार की जाने वाली कसरत के रूप में नहीं, बल्कि जीवन भर चलने वाली सांस्कृतिक एवं सेहत से जुड़ी एक आदत के तौर पर अपनाएं। किसी समाज की असल पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों का कितना ख्याल रखता है। इसलिए, आइए हम एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने की कोशिश करें जहां हमारे बुजुर्ग डर, निर्भरता या अकेलेपन के बीच नहीं, बल्कि सम्मान, जोश, सार्थक उद्देश्य और शांति के साथ जीवन जी सकें। योग को जीवन का एक लय बनाकर, हम सब मिलकर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारे नागरिकों के जीवन के सुनहरे वर्ष सचमुच सेहत, सामंजस्य और संतुष्टि से भरे हों!
- -योग फॉर हेल्दी एजिंग: स्वस्थ और सक्रिय जीवन की दिशा में एक कदमविशेष लेख- डॉ. दानेश्वरी सम्भाकर , उप संचालक, जनसंपर्करायपुर। भारत में प्राचीन काल से ही योग हमारी जीवनशैली और संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। ऋषि-मुनियों, योगियों और संतों ने योग के माध्यम से स्वस्थ शरीर, शांत मन और आध्यात्मिक चेतना का मार्ग दिखाया। भारतीय ज्ञान परंपरा की यह अमूल्य धरोहर आज विश्वभर में स्वास्थ्य और कल्याण का पर्याय बन चुकी है। इसी विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की पहल पर वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की, जो आज विश्वव्यापी जनआंदोलन का स्वरूप ले चुका है।वर्ष 2026 के अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम “योग फॉर हेल्दी एजिंग” (स्वस्थ एवं सक्रिय वृद्धावस्था के लिए योग) रखी गई है। यह थीम योग के माध्यम से जीवन के प्रत्येक चरण में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का संदेश देती है। योग न केवल रोगों से बचाव का प्रभावी माध्यम है, बल्कि स्वस्थ और सक्रिय जीवनशैली की आधारशिला भी है।प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने योग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में योग आज विश्व के करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका है। प्रधानमंत्री का मानना है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाली जीवन पद्धति है। योग व्यक्ति को स्वस्थ बनाकर परिवार समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने का माध्यम बनता है इस वर्ष राष्ट्रीय स्तर का मुख्य आयोजन कोलकाता में आयोजित किया जा रहा है जहां प्रधानमंत्री स्वयं योगाभ्यास का नेतृत्व करेंगे।छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का राज्य स्तरीय मुख्य समारोह अंबिकापुर में आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय स्वयं योगाभ्यास में सहभागिता करेंगे और प्रदेशवासियों को नियमित योग अपनाकर स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का संदेश देंगे। राज्य सरकार द्वारा योग को जन-जन तक पहुंचाने के लिए विभिन्न विभागों, शैक्षणिक संस्थानों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों के सहयोग से व्यापक स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।मुख्यमंत्री श्री साय का मानना है कि स्वस्थ नागरिक ही विकसित छत्तीसगढ़ और विकसित भारत के निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति हैं। योग शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास को भी बढ़ाता है। यही कारण है कि राज्य सरकार स्वास्थ्य संवर्धन और जनजागरूकता अभियानों में योग को विशेष महत्व दे रही है।प्राकृतिक संसाधनों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ में योग का संदेश लोगों के जीवन से सहज रूप से जुड़ता है। प्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली योग के मूल सिद्धांतों को प्रतिबिंबित करती है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों और शासकीय संस्थानों में नियमित योग गतिविधियों के माध्यम से स्वस्थ समाज निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं।वर्तमान समय में बढ़ते तनाव, अनियमित जीवनशैली और विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के बीच योग एक सरल, सुलभ और प्रभावी समाधान के रूप में उभरा है। नियमित योगाभ्यास शरीर को निरोग, मन को शांत और जीवन को संतुलित बनाता है। यह व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करता है।अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि योग को केवल एक दिवस का आयोजन न मानकर दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं। स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए योग को अपनाना समय की आवश्यकता है। आइए, योग के माध्यम से स्वस्थ छत्तीसगढ़, विकसित भारत और समृद्ध विश्व के निर्माण में अपना योगदान दें।
- -आपकी रगों में बहता हुआ खून किसी के बुझते हुए घर के चिराग को दोबारा रोशन कर सकता है-जीवन का उपहार: रक्तदानआलेख -धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक, जनसंपर्क"रक्तदान महादान" — यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि मानवता की सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण है। जब आप रक्तदान करते हैं, तो आप केवल खून की कुछ बूंदें नहीं दे रहे होते, बल्कि किसी को मुस्कुराने का, जीने का और अपने परिवार के साथ रहने का एक और मौका दे रहे होते हैं। हर साल 14 जून को पूरी दुनिया में 'विश्व रक्तदान दिवस' मनाया जाता है। आपकी रगों में बहता हुआ खून किसी के बुझते हुए घर के चिराग को दोबारा रोशन कर सकता है। इस बार सिर्फ स्टेटस न लगाएं, आगे आएं और रक्तदान करें!दुनिया में कई तरह के दान किए जाते हैं— अन्नदान, वस्त्रदान, धनदान और विद्यादान। ये सभी दान सम्मानीय हैं, लेकिन रक्तदान इन सबसे ऊपर है। इसका कारण यह है कि बाकी सभी दान व्यक्ति की सुख-सुविधाओं को पूरा करते हैं, जबकि रक्तदान किसी मरते हुए व्यक्ति को जीवनदान देता है। जब कोई व्यक्ति दुर्घटना का शिकार होता है, किसी बड़ी सर्जरी से गुजरता है, या थैलेसीमिया और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहा होता है, तब उसके पास जिंदगी और मौत के बीच बहुत कम समय होता है। उस वक्त आपकी दी हुई खून की एक यूनिट (लगभग 350-450 मिलीलीटर) किसी का बुझता हुआ घर का चिराग दोबारा रोशन कर सकती है।अत्याधुनिक युग में भी, विज्ञान आज तक प्रयोगशाला में कृत्रिम खून (Artificial Blood) नहीं बना पाया है। इसका सीधा और कड़वा सच यह है कि किसी इंसान की रगों में बहता खून ही किसी दूसरे इंसान की जान बचा सकता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति और समाज में रक्तदान को 'महादान' का दर्जा दिया गया है।जब आप एक बार रक्तदान करते हैं, तो आप केवल एक नहीं, बल्कि तीन लोगों की जान बचा सकते हैं।ब्लड बैंक में आपके द्वारा दिए गए रक्त को तीन मुख्य घटकों (Components) में अलग किया जाता है:1. लाल रक्त कणिकाएं (Red Blood Cells - RBC): एनीमिया या अत्यधिक खून बह जाने पर काम आती हैं।2. प्लाज्मा (Plasma): जलने के मामलों या लीवर की गंभीर बीमारियों में उपयोग होता है।3. प्लेटलेट्स (Platelets): डेंगू, कैंसर या कीमोथेरेपी के मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित होती हैं।रक्तदान का लाभ:-रक्तदान करने से शरीर हार्ट अटैक का खतरा कम: रक्तदान करने से शरीर में आयरन की मात्रा संतुलित रहती है, जिससे खून का थक्का जमने की संभावना कम होती है और दिल का दौरा पड़ने का खतरा काफी घट जाता है। कैंसर से बचाव: शरीर में आयरन का स्तर नियंत्रित रहने से कुछ प्रकार के कैंसर (जैसे लीवर, फेफड़े और कोलन कैंसर) का जोखिम कम होता है।नई ऊर्जा का संचार: रक्तदान के बाद शरीर 48 घंटों के भीतर तरल पदार्थ की कमी पूरी कर लेता है और अगले कुछ हफ्तों में नई रक्त कोशिकाएं (New Blood Cells) बनाता है, जिससे शरीर में स्फूर्ति आती है।फ्री मिनी-हेल्थ चेकअप: रक्तदान से पहले डोनर के हीमोग्लोबिन, ब्लड प्रेशर, पल्स और वजन की जांच की जाती है। साथ ही रक्त की HIV, हेपेटाइटिस बी और सी, तथा मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों के लिए मुफ्त जांच होती है।रक्तदान क्यों है बेहद ज़रूरी?चिकित्सा विज्ञान ने आज आसमान छू लिया है, हम कृत्रिम अंग बना सकते हैं, जटिल से जटिल सर्जरी कर सकते हैं, लेकिन आज तक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में कृत्रिम खून (Artificial Blood) नहीं बना पाए हैं। इसका मतलब साफ है कि इंसान की जान बचाने के लिए केवल इंसान का खून ही काम आ सकता है।इन परिस्थितियों में होती है रक्त की सबसे ज्यादा जरूरत:• दुर्घटनाएं और इमरजेंसी: सड़क हादसों या अन्य दुर्घटनाओं में अत्यधिक खून बह जाने पर।• गंभीर बीमारियाँ: थैलेसीमिया, कैंसर, और हीमोफिलिया जैसी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को नियमित रूप से खून की जरूरत होती है।• प्रसव के दौरान: कई बार डिलीवरी के वक्त महिलाओं को अत्यधिक रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage) के कारण खून चढ़ाना पड़ता है।• बड़ी सर्जरी: दिल का ऑपरेशन, ऑर्गन ट्रांसप्लांट आदि में।"अगर आप किसी के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं, तो पहले अपनी बाहें आगे बढ़ाएं।"रक्तदान केवल एक सामाजिक या नैतिक कर्तव्य नहीं है, यह विशुद्ध रूप से मानवता का उत्सव है। धर्म, जाति, रंग और ऊंच-नीच की दीवारों को तोड़कर जब एक इंसान का खून दूसरे इंसान की रगों में दौड़ता है, तो वही सच्ची इंसानियत होती है। आइए, इस महादान का हिस्सा बनें। स्वयं भी रक्तदान करें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। याद रखें, आपका थोड़ा सा रक्त किसी के लिए पूरा जीवन बन सकता है।
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विशेष लेख- कमलेश साहू, सहायक संचालक जनसंपर्क
रोज सुबह उठते ही घर में नल से साफ पानी आते देखने की खुशी क्या होती है, इसे कमली से पूछिए। उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव को अपने आंगन में लगे नल से आ रहे पानी की धार को दिखाते खुशी से उनकी आंखें डबडबा गईं। जल जीवन मिशन ने कमली जैसी हजारों महिलाओं को अमूल्य खुशियां दी हैं। कभी पीने और निस्तारी के पानी के लिए दिनभर चिंतित रहने वाली इन महिलाओं का जीवन घर में लगे नल ने बदल दिया है। उप मुख्यमंत्री तथा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री श्री अरुण साव अपने चार दिनों के बस्तर प्रवास के दौरान जल जीवन मिशन का काम देखने कमली के भी गांव पहुंचे। कमली के गांव बस्तर जिले के तोकापाल विकासखण्ड के दुगनपाल में उन्होंने कुछ और घरों में भी जाकर नल से पानी आते देखा। जल जीवन मिशन से घर में पानी पहुंचने की खुशी सभी महिलाओं के चेहरे पर दिख रही थी।जल जीवन मिशन दूरस्थ गांवों और वनांचलों की महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव ला रहा है। आधी आबादी के एक बड़े हिस्से को पीने के पानी के लिए रोज जूझना पड़ता था। खासतौर से गर्मियों के दिनों में जब हर साल सिर पर पानी के बर्तन का सफर कुछ सौ मीटरों से कुछ किलोमीटरों में बदल जाता था। जीवन के लिए अनिवार्य जरुरत पानी की व्यवस्था गर्मियों में महिलाओं का जीवन दुष्कर बना देती थी। दुगनपाल में भी महिलाओं को रोज गांव के हैंडपंप या कुआं पर जाकर घर के सभी लोगों के लिए पानी का इंतजाम करना पड़ता था। घर में नल लग जाने से अब इस समस्या से निजात मिल गई है। जल जीवन मिशन के काम जैसे-जैसे पूरे होते जा रहे हैं, महिलाओं की बाहर से पानी लाने की चिंता और तकलीफ दूर होते जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में अब तक साढ़े आठ हजार से अधिक योजनाओं को पूर्ण कर संचालन के लिए पंचायतों को सौंपा जा चुका है। जल जीवन मिशन महज हर घर तक पेयजल पहुंचाने की योजना नहीं है। यह महिलाओं की दिनचर्या और जीवन में भी बड़ा बदलाव ला रहा है। गांवों में परंपरागत रूप से घर में पेयजल और अन्य जरूरतों के लिए पानी के इंतजाम का जिम्मा महिलाओं पर ही है। घर तक पानी की पहुंच न होने के कारण उन्हें हैंडपंपो, सार्वजनिक नलों, कुंओं या अन्य स्रोतों से रोज पूरे परिवार के लिए जल संग्रहण करना पड़ता है।रोजाना का यह श्रमसाध्य और समयसाध्य काम बारिश तथा भीषण गर्मी के दिनों में और कठिन हो जाता है। कई इलाकों में गर्मियों में जलस्रोतों के सूख जाने के कारण दूर-दूर से पानी लाने की मजबूरी रहती है। परिवार के लिए पानी की व्यवस्था हर दिन का संघर्ष बन जाता है। महिलाओं के दिन के कई घंटे इसी काम में निकल जाते हैं। जल जीवन मिशन हर घर तक नल से जल पहुंचाने के साथ ही महिलाओं को कई समस्याओं से निजात दिला रहा है। घर तक स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल पहुंचने से वे कई चिंताओं से मुक्त हो गई हैं। अब रोज-रोज पानी के लिए बहुत सारा श्रम और समय नहीं लगाना पड़ता। इससे उन्हें घर के दूसरे कामों, बच्चों की परवरिश, खेती-बाड़ी एवं आजीविका के अन्य कार्यों के लिए अधिक समय मिल रहा है और वे इन कार्यों पर अपना ज्यादा ध्यान व समय दे पा रही हैं।जल जीवन मिशन से बारहों महीने घर पर ही जलापूर्ति से लगातार बारिश तथा गर्मी के दिनों में बाहर से पानी लाने की मुसीबत दूर हो गई है। गर्मियों में जलस्तर के नीचे चले जाने से तथा बरसात में लगातार बारिश से जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। गुणवत्ताहीन पेयजल से पेट तथा निस्तारी के लिए खराब जल के उपयोग से त्वचा संबंधी रोगों का खतरा रहता है। जल जीवन मिशन ने सेहत के इन खतरों को भी दूर कर दिया है। - --स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)जागो हे भारत की बेटियों ,आत्म विश्वास का वरण करो ।दबना नहीं डरना किसी से ,लज्जा ,संकोच का हरण करो ।कमजोर बनाते जो तुमको ,रूढ़ियों से मुक्त बंधन करो ।बुरी नजर जो डाले तुम पर ,दुष्ट दानवों का दमन करो ।कुचल डालो विषधर का फन ,अत्याचारियों का शमन करो ।उड़ो हौसलों के पर लेकर ,लक्ष्य को विस्तृत गगन करो ।शिक्षा की उजास जीवन में ,भर लो साहस को नमन करो ।धैर्य शक्ति की मिसाल बनना ,सरस्वती सा आचरण करो ।रौद्र रूप काली का धरकर ,अन्यायी का संहरण करो ।ज्ञान - विज्ञान की वेदी पर ,अज्ञानता का हवन करो ।अपने अधिकारों की खातिर ,जुल्मों से युद्ध आमरण करो ।
- -डिजिटल क्रांति से बदल रही है राजस्व न्याय व्यवस्थाविशेष लेख - विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालकभारत तेजी से डिजिटल प्रशासन की ओर बढ़ रहा है और इसी दिशा में छत्तीसगढ़ ने राजस्व प्रशासन को आधुनिक, पारदर्शी और आमजन के लिए सहज बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की है। राज्य सरकार द्वारा लागू की गई “राजस्व ई-कोर्ट परियोजना” अब केवल एक तकनीकी व्यवस्था नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्रामीण और शहरी नागरिकों के लिए न्याय प्राप्ति की प्रक्रिया को सरल, त्वरित और भरोसेमंद बनाने वाला प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है।वर्षों तक राजस्व मामलों में आम लोगों को तहसील, एसडीएम कार्यालय और कलेक्टर कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे। नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, फौती प्रकरण, खाता सुधार या भूमि विवाद जैसे मामलों में पेशी की तारीख जानने, आदेश की प्रति लेने या केस की स्थिति समझने में समय, धन और ऊर्जा तीनों की भारी खपत होती थी। कई बार बिचौलियों और भ्रष्टाचार का सामना भी करना पड़ता था। लेकिन अब वही पूरी प्रक्रिया डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आ चुकी है। छत्तीसगढ़ की ई-कोर्ट परियोजना ने राजस्व न्यायालयों की पारंपरिक कार्यप्रणाली को बदलकर उसे “पेपरलेस”, “स्मार्ट” और “जनकेंद्रित” बना दिया है। नायब तहसीलदार से लेकर कलेक्टर और राजस्व मंडल तक की न्यायिक प्रक्रिया अब ऑनलाइन संचालित हो रही है। इससे न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि आम नागरिकों का भरोसा भी मजबूत हुआ है।ई-कोर्ट व्यवस्था एक प्रभावी समाधान-मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव सायमुख्यमंत्री ने राजस्व ई-कोर्ट परियोजना को सुशासन और डिजिटल प्रशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा है कि राज्य सरकार का उद्देश्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और जनता के लिए सुलभ बनाना है। उन्होंने कहा कि तकनीक का उपयोग तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसका सीधा लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।राजस्व मामलों में वर्षों से चली आ रही जटिलताओं को समाप्त करने के लिए ई-कोर्ट व्यवस्था एक प्रभावी समाधान बनकर सामने आई है। अब नागरिकों को छोटी-छोटी जानकारियों के लिए कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। सरकार न्याय प्रक्रिया को लोगों के मोबाइल तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ने से भ्रष्टाचार और बिचौलियों की भूमिका स्वतः समाप्त होगी तथा आम लोगों का शासन-प्रशासन पर विश्वास और मजबूत होगा। मुख्यमंत्री के अनुसार, “ई-गवर्नेंस केवल तकनीक नहीं, बल्कि जनता को सम्मानपूर्वक और समयबद्ध सेवाएं देने का माध्यम है।पारदर्शिता और जवाबदेही की नई व्यवस्थाई-कोर्ट प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आवेदन प्राप्त होते ही उसका ऑनलाइन पंजीकरण किया जाता है और तत्काल डिजिटल पावती जारी होती है। इससे आवेदक को यह भरोसा मिल जाता है कि उसका आवेदन रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है और अब उसे किसी कर्मचारी या दलाल के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा।इसके बाद की पूरी प्रक्रिया—जैसे नोटिस जारी करना, इश्तहार प्रकाशित करना, पक्षकारों को सूचना भेजना, सुनवाई की तारीख तय करना और अंतिम आदेश पारित करना सभी ऑनलाइन दर्ज होते हैं।प्रत्येक कार्रवाई डिजिटल रिकॉर्ड में सुरक्षित रहती है, जिससे किसी भी स्तर पर हेरफेर की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।ई-कोर्ट पोर्टल के माध्यम से नागरिक अपने मोबाइल या कंप्यूटर से घर बैठे यह देख सकते हैं कि उनके मामले में पिछली तारीख पर क्या कार्यवाही हुई, अगली पेशी कब है और आदेश जारी हुआ है या नहीं। इससे न्यायालयों के बाहर लगने वाली भीड़ और अनावश्यक भागदौड़ में उल्लेखनीय कमी आई है।किसानों और ग्रामीण नागरिकों के लिए बड़ी राहतराजस्व मामलों का सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों और भू-स्वामियों पर पड़ता है। पहले किसानों को एक छोटी सी जानकारी के लिए भी पूरे दिन का समय निकालकर तहसील मुख्यालय जाना पड़ता था। कई बार केवल अगली तारीख जानने में ही मजदूरी और किराए का नुकसान हो जाता था।अब ई-कोर्ट व्यवस्था ने यह परेशानी काफी हद तक समाप्त कर दी है। किसान अपने गांव के लोक सेवा केंद्र, चॉइस सेंटर या मोबाइल फोन के माध्यम से ही अपने प्रकरण की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे समय और धन दोनों की बचत हो रही है तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूती मिल रही है।डिजिटल न्याय व्यवस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन के प्रति विश्वास को भी बढ़ाया है। जब लोगों को अपने आवेदन की ऑनलाइन पावती और हर कार्रवाई की जानकारी समय पर मिलने लगती है, तो पारदर्शिता स्वतः स्थापित होती है।विवादित जमीनों की जानकारी अब सार्वजनिकई-कोर्ट परियोजना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि विचाराधीन भूमि विवादों की जानकारी अब ऑनलाइन उपलब्ध रहती है। इससे जमीन खरीदने वाले लोग पहले ही जांच कर सकते हैं कि संबंधित खसरा नंबर पर कोई विवाद या न्यायालयीन प्रकरण लंबित तो नहीं है । यह व्यवस्था फर्जीवाड़े, अवैध बिक्री और धोखाधड़ी रोकने में अत्यंत प्रभावी साबित हो रही है। पहले कई लोग विवादित भूमि खरीदकर वर्षों तक न्यायालयों के चक्कर काटते रहते थे, लेकिन अब पारदर्शी ऑनलाइन रिकॉर्ड के कारण ऐसी घटनाओं में कमी आई है।तकनीक के सहारे मजबूत हुआ प्रशासनराजस्व ई-कोर्ट प्रणाली के सफल संचालन के लिए प्रदेश के राजस्व न्यायालयों में कंप्यूटर, डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली और हाई-स्पीड इंटरनेट की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। इससे न्यायालयों के कार्य निष्पादन की गति बढ़ी है और अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हुई है। डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित सर्वर में संग्रहीत होने से अब फाइलों के गुम होने, फटने या रिकॉर्ड में छेड़छाड़ जैसी समस्याएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। प्रशासनिक निगरानी भी आसान हुई है क्योंकि उच्च अधिकारी किसी भी न्यायालय की कार्यवाही ऑनलाइन मॉनिटर कर सकते हैं।“मोबाइल में कोर्ट” की दिशा में बड़ा कदमछत्तीसगढ़ की यह पहल वास्तव में “मोबाइल में कोर्ट” की अवधारणा को साकार करती दिखाई देती है। अब नागरिकों को केवल जानकारी लेने के लिए कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। आदेश की कॉपी डाउनलोड करने से लेकर केस की स्थिति जानने तक अधिकांश सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं।ई-कोर्ट व्यवस्था ने यह साबित किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और तकनीक का सही समन्वय हो, तो शासन को वास्तव में जनसुलभ बनाया जा सकता है। यह पहल “ई-गवर्नेंस” को “स्मार्ट गवर्नेंस” में बदलने का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरी है।सुशासन की दिशा में प्रभावी पहलछत्तीसगढ़ सरकार की राजस्व ई-कोर्ट परियोजना केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि आम जनता को न्याय व्यवस्था से सीधे जोड़ने का अभिनव प्रयास है। इसने प्रशासन और नागरिकों के बीच की दूरी कम की है तथा न्यायिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, त्वरित और भरोसेमंद बनाया है।डिजिटल इंडिया के इस दौर में छत्तीसगढ़ की यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है। यह परियोजना दर्शाती है कि तकनीक का उपयोग केवल सुविधाएं बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि शासन को अधिक उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए भी किया जा सकता है। राजस्व न्यायालयों की यह डिजिटल यात्रा वास्तव में “गढ़बो नवा छत्तीसगढ़” के सपने को मजबूत आधार प्रदान कर रही है।जहां न्याय, पारदर्शिता और सुविधा अब लोगों की उंगलियों पर उपलब्ध है।
- 2 जून पुण्यतिथि पर विशेषआलेख- प्रशांत शर्माभारतीय सिनेमा जगत के शो मैन कहे जाने वाले राजकपूर ने आज से 38 साल पहले इस दुनिया को अलविदा कहा था। 2 मई, 1988 को नई दिल्ली में वे दादासाहेब फाल्के पुरस्कार लेने के लिए समारोह में पहुंचे थे, इसी दौरान उन्हें अस्थमा का तीव्र दौरा पड़ा और वे गिर पड़े। एक महीने बाद 2 जून 1988 को उनके निधन की मनहूस खबर आई।राज कपूर अपनी निडर फिल्म निर्माण शैली और विवादास्पद या संवेदनशील विषयों को उठाने के लिए जाने जाते थे। उनके फिल्म निर्माण करिअर के शुरुआती दौर की उनकी अधिकांश क्लासिक फिल्में सामाजिक नाटक थीं जो आम आदमी या समाज के कमजोर वर्ग की जीत का जश्न मनाती थीं। इनमें से कई फिल्में अपने कथानक के कारण समय से आगे की मानी जाती हैं। श्री 420 फिल्म के एक गाने के बोल —और उसमें नायक और नायिका के छाते के नीचे शरण लेने का दृश्य—कपूर की फिल्मों की प्रगतिशील प्रकृति का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।राजकपूर की निजी जिंदगीे से बात करें, तो पांच बच्चों का उनका परिवार आज काफी बड़ा हो चुका है। पत्नी कृष्णा से उनकी पांच संतानें हुर्ई। उनके परिवार में बेटियों रितु नंदा और रीमा जैन के अलावा तीन बेटेें रणधीर, ऋषि और राजीव कपूर हुए। तीनों बेटों ने अभिनय जगत को अपनाया। रणधीर ने अभिनेत्री बबीता से शादी की। आज रणधीर 78 साल के हो चुके हैं, लेकिन बरसों से वे बबीता से अलग रह रहे हैं। रणधीर की दोनों बेटियों करिश्मा और करीना ने भी अभिनय जगत में खूब नाम कमाया। करिश्मा ने अभिषेक बच्चन से सगाई टूटने के बाद बिजनेसमैन संजय कपूर (अब दिवंगत) से शादी की , लेकिन यह शादी लंबी नहीं चली और उनका तलाक हो गया। संजय से करिश्मा को दो बच्चे हैं- बेटी समायरा कपूर और कियान राज कपूर। वहीं करीना अभिनेता सैफ अली खान से निकाह किया। उनके भी दो बेटे हैं-तैमूर अली खान और जेह अली खान।राजकपूर के दूसरे बेटे ऋषि कपूर को अभिनय जगत में लोकप्रियता हासिल हुई। ऋषि ने अपनी को -स्टार नीतू सिंह से विवाह किया। ऋषि कैंसर से पीडि़त थे और वर्ष 2000 में 67 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। ऋषि कपूर और नीतू कपूर की लाडली बेटी रिद्धिमा ने इसी साल 45 साल की उम्र में अभिनय जगत में कदम रखा। उन्होंने अपनी मां के साथ फिल्म दादी की शादी में अहम किरदार निभाया। लोगों को उनका काम भी पसंद आया। रिद्धिमा पेशे से एक ज्वेलरी डिजाइनर हैं और उन्होंने बिजनेसमैन भरत साहनी से विवाह किया है। उनकी एक बेटी है समारा। ऋषि के बेटे रणबीर कपूर ने फिल्म जगत में अच्छी- खासी सफलता अर्जित की है। उन्होंने अभिनेत्री आलिया भट्ट से विवाह किया है और उनकी एक बेटी का नाम है-राहा।वहीं तीसरे और सबसे छोटे बेटे राजीव कपूर अपने अभिनय कॅरिअर में सफल नहीं हो पाए और गुमनामी में खो गए। वर्ष 2001 में, उन्होंने आर्किटेक्ट आरती सभरवाल से शादी की, जो कनाडा के वॉन में एक लॉ फर्म में पैरालीगल के रूप में काम कर रही थीं। 2003 में उनका तलाक हो गया। फिर वे भाई रणबीर के साथ रहने लगे। 2021 को उनका दिल का दौरा पडऩे के कारण 58 साल की उम्र में निधन हो गया।राजकपूर की बड़ी बेटी रितु नंदा एक एंटरप्रेन्योर थीं। उनकी शादी एस्कॉट्र्स लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर राजन नंदा से हुई थी। राजकपूर को घर की बेटियों का फिल्मों में काम करना पसंद नहीं था। इसलिए रितु ने बिजनेस में किस्मत आजमाया। अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता बच्चन की शादी रितु के बेटे निखिल से हुई है। उनके दो बच्चे अगस्त्य नंदा और नव्या नवेली नंदा हैं, जो आज काफी लोकप्रिय हैं। रितु लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन से जुड़ी हुई थीं। बेहद टैलेंटेड रितु के नाम एक दिन में 17 हजार पेंशन पॉलिसी बेचने का भी रिकॉर्ड है, जो गिनीज बुक रिकॉर्ड में भी दर्ज है। रितु को कैंसर था और 71 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।रही बात रीमा की तो राजकपूर उनकी शादी अभिनेता कुमार गौरव से करना चाहते थे। कुमार गौरव के पिता राजेन्द्र कुमार और राजकपूर अच्छे दोस्त थे। सगाई भी हो गई थी, लेकिन एक दिन कुमार गौरव ने यह सगाई तोड़ दी और सुनील दत्त- नरगिस की बेटी नम्रता से शादी कर ली। बाद में रीमा की शादी बिजनेसमैन मनोज जैन से हुई और उनके दो बेटे हैं- अरमान और आदर जैन। अरमान ने कुछ फिल्में की हैं, पर अब तक सफल नहीं हो पाए हैं। रीमा 73 साल की हो चुकी हैं, लेकिन आज भी उनकी खूबसूरती और उनका स्टाइलिश लुक लोगों को आकर्षित करता है।हाल में पूरा परिवार उस वक्त साथ नजर आया, जब वे राजकपूर की जन्म शताब्दी पर होने वाले समारोह का निमंत्रण देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने पहुंचे। पूरे परिवार ने प्रधानमंत्री के साथ फोटो क्लिक की। सोशल मीडिया यह काफी वायरल भी हुआ।
- -विष्णुपद छंद गीत-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)राही जीवन-पथ के सुन ले,राह नई गढ़ना ।फूल मिले या शूल तुम्हें नित ,आगे ही बढ़ना ।यत्न सतत कर लक्ष्य-प्राप्ति हो,तब तक तुम चलना ।करनी होगी कठिन साधना ,साधक तुम बनना ।अपने कदम जमा धरती पर ,ऊपर तुम चढ़ना ।।सिक्के के दोनों पहलू कोदेखो और कहो ।सुख-दुख जीवन की सच्चाई ,जीवन सार गहो ।अंतस् के कोरे कागज पर ,फूल खुशी कढ़ना ।।सत्य-झूठ की धूप-छाँव में ,सही राह चुनना ।दुविधा में जब मन डोले तो,मन की तुम सुनना ।ढाई आखर की पोथी को ,सीखो तुम पढ़ना ।।
- हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेषआलेख- डॉ. कमलेश गोगिया ( वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद)सिटी ऑफ जॉय यानी कोलकाता जिसे पूर्व में कलकत्ता (औपनिवेशिक) और कालिकता कहा जाता था, की संस्कृति में टोला, तल्ला और लेन सामाजिक पहचान की नींव है। टोला शब्द किसी खास समुदाय या पेशे की बस्ती को दर्शाता है जबकि लेन का आशय तंग गलियों और तल्ला का अर्थ छायादार वृक्ष के नीचे के स्थान से है। कोलकाता का कालू टोला मोहल्ला, 37 अमरतल्ला लेन, वही ऐतिहासिक स्थान है जहाँ से देश में हिन्दी पत्रकारिता की नींव पड़ी। 30 मई, 1826 को पं. जुगल किशोर शुक्ल ने हिन्दी के प्रथम समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड की शुरुआत की थी। यह वह दौर था जब भारत स्वतंत्र नहीं था और अंग्रेजी, उर्दू, बंगाली तथा फारसी भाषा के समाचार पत्र प्रकाशित हुआ करते थे, उस दौर में हिन्दी भाषा का सामाचार पत्र प्रकाशित करने के साहस के लिए शब्द नहीं मिलते। उदन्त मार्तण्ड जिसका अर्थ उगता हुआ सूर्य होता है, डेढ़ साल तक ही प्रकाशित हो सका। आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हुए यह पत्र दिसंबर 1827 को बंद हो गया। कारण, अंग्रेजी शासन की नीतियाँ और आर्थिक कठिनाइयाँ, फिर हिन्दी के दम पर सरकार से टकराना उस दौर में तो और भी कठिन था। हिन्दी पत्रकारिता रूकी नहीं, अंग्रेजों के शासनकाल में ही देश के विभिन्न क्षेत्रों से हिन्दी के अनेक समाचार पत्र दैनिक, साप्ताहिक और मासिक स्वरूप में प्रकाशित होने लगे। चाहें राजा राममोहन राय के बंगदूत की बात कर लें या फिर आधुनिक हिन्दी पत्रकारिता के जनक भारतेंदू हरिशंचद्र के कवि वचन सुधा, हरिशंद्र मैग्जीन और हिन्दी के प्रथम दैनिक समाचार सुधावर्षण की। देश के लिए मर-मिटने के जुनून के साथ पत्रकारिता स्वतंत्रता संग्राम का अहम हथियार थी। आजादी के बाद पत्रकारिता मिशन से व्यवसाय बन गई। फिर तकनीकी क्रांति और डिजिडलीकरण ने हिन्दी पत्रकारिता को पूरी तरह बदल कर रख दिया। समय के साथ-साथ सब कुछ बदल गया। अब तो उदन्त मार्तण्ड का कोई निशां भी बाकी नहीं रहा, जैसा कि लगभग पाँच वर्ष पूर्व राजीव कुमार झा की जागरण की रिपोर्ट से पता चलता है। रिपोर्ट के अऩुसार, “अमरतल्ला लेन आज भी मौजूद हैं, पर 37 नंबर मकान नहीं है। अमरतल्ला लेन एक से शुरू होकर 27 पर खत्म हो जाता है। वहीं, इसी से सटा अमरतल्ला स्ट्रीट एक से शुरू होकर 29 नंबर पर समाप्त हो जाता है। 37 नंबर अमरतल्ला लेन जिस जगह से यह अखबार शुरू हुआ था उस मकान के बारे में वर्तमान समय में रहने वाले वाले लोगों को भी पता नहीं है। इसी लेन व स्ट्रीट में 40-50 सालों से रहने वाले बिहार-उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषी लोगों को भी नहीं पता है कि कभी इस स्थान से हिंदी का पहला अखबार प्रकाशित हुआ था।“ कोशिश होनी चाहिए थी हिन्दी पत्रकारिता की स्थापना के इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित कर हिन्दी पत्रकारिता दिवस को हर साल भव्य रूप प्रदान करने की।परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है, लेकिन जो परिवर्तन हिन्दी पत्रकारिता में देखने को मिलता है, उसकी अपेक्षा शायद ही कभी की गई होगी। प्रिंटिंग प्रेस और टाइपराइटर से शुरू हुई हिन्दी पत्रकारिता आज वेब पोर्टल्स, यू ट्यूब और सोशल मीडिया तक पहुँच गई है। सोशल मीडिया के प्लेटफार्म ने हर नागरिक को पत्रकार बना दिया। बाजारवाद और पूंजीकरण के फलस्वरूप मिशन उद्योग बन गया। पत्रकारिता की गंभीरता भी नदारद होती चली गई। भाषा और शैली भी पूरी तरह परिवर्तित हो गई। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि हिन्दी पत्राकरिता से हिन्दी मिसिंग है, हिंग्लिश ऑन एयर है। हिन्दी के समाचार पत्र हों या न्यूज चैनल अथवा पोर्टल, हिन्दी और अंग्रेजी के मिश्रण का तड़का अनिवार्य है। दीक्षांत समारोह जैसे शब्द की जह कन्वोकेशन ने ले ली है तो न्यूज रूम में एंकर को परिस्थिति की जगह सिचुएशन बोलना ज्यादा सरल लगता है। किसी कार्पोरेट कंपनी के मिनिट्स की तरह खबरों की हेडलाइन देखी जा सकती है। जैसे हेडलाइन देखिए —“सीएम का मास्टरस्ट्रोक!”“ऑपरेशन क्लीनअप ऑन!”“पॉलिटिकल टेम्परेचर हाई!”“इश्यू का डीप एनालिसिस”हालांकि इसका सकारात्मक पहलू यह है कि हिन्दी के समाचार पत्र हिन्दी भाषा को बोलचाल के अधिक करीब लाने के उद्देश्य से हिन्दी व्याकरण के साथ अंग्रेजी शब्दों को जोड़कर वाक्यों का निर्माण करते हैं जिससे क्लिष्टता कम हो जाए। फिर डिजिटल युग में सोशल मीडिया और सॉफ्टवेयर से जुड़ी खबरें छपने के कारण अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग अनिवार्य सा हो गया है। जैसे, हैशटैग, ट्रोल, डाउनलोड, ड्रापडाउन, अपडेट आदि। लेकिन प्रायः क्लिष्टता को कम करने का उद्देश्य अपना मार्ग भटक जाता है। अनेक अवसरों पर जानबूझकर हेडलाइन के साथ पूरे समाचार में हिंग्लिश का प्रयोग किया जाता है, विशेष रूप से पेज-थ्री पत्रकारिता के पुलआउट पृष्ठों में। घोटाले की जगह स्कैम लिखना ज्यादा गौरवपूर्ण समझा जाता है। हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष अंग्रेजी का प्रभाव और वर्चस्व किसी चुनौती से कम नहीं। बावजूद इसके हिन्दी के डिजिटल पाठकों की संख्या में निरंतर विस्तार हो रहा है क्योंकि दूरस्थ इलाकों में बसे लोगों तक इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुँच बढ़ गई है। हिन्दी पत्राकारिता की समृद्धि में अहम योगदान ग्रामीण पत्रकारों का है। ग्रामीण पत्रकार मुद्दे को इश्यू नहीं लिखते और न ही स्पर्धा या प्रतियोगिता को कॉम्पटिशन। वे इस तरह के वाक्यों का भी प्रयोग नहीं करते - “रेन अटैक: सिटी लाइफ आउट ऑफ कंट्रोल!” या फिर “हिन्दी हमारी प्राइड है”, “लेट्स प्रमोट हिंदी”, “हिंदी इज़ द फ्यूचर”। वे प्रायः सरल, सहज और बोलचाल की हिन्दी का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में स्थानीय शब्द, लोकजीवन और क्षेत्रीय संवेदनाएँ शामिल होती हैं। इससे हिन्दी पत्रकारिता केवल शहरी अभिजात भाषा नहीं रहती, बल्कि जनसाधारण की भाषा बनी रहती है।हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र भले ही डेढ़ साल तक ही साँसें ले पाया, लेकिन हिन्दी पत्रकारिता रूपी जिस ज्योत को शुक्ल जी ने प्रज्जवलित किया, उसकी लौ बीते 200 वर्षों से हिन्दी के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज चैनलों और वेब पोर्टल के माध्यम से आज भी जगमगा रही है। देश की स्वतंत्रता में अहम योगदान देने वाली हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध बनाए रखना हम सभी का कर्तव्य है। हिन्दी पत्रकारिता दिवस के 200 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएं...
- -स्वाद, गुणवत्ता और बढ़ती मांग ने बदली हजारों किसानों की तकदीर- 7800 किसान जुड़े काजू उत्पादन से, देश के कई राज्यों तक पहुंच रही जशपुर की मिठास~आलेख-सुनील त्रिपाठी, सहायक संचालक , नूतन सिदार, सहायक संचालकरायपुर। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में जशपुर जिला खेती और बागवानी के क्षेत्र में लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। पारंपरिक खेती के साथ अब किसान नगदी एवं फल फसलों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। सेब, नाशपाती, स्ट्रॉबेरी और काजू जैसी फसलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे रही हैं। इनमें काजू उत्पादन किसानों के लिए आय का मजबूत और भरोसेमंद साधन बनकर उभरा है।जिला प्रशासन, उद्यान विभाग, रीड्स और नाबार्ड के संयुक्त प्रयासों से जिले में काजू उत्पादन का दायरा तेजी से बढ़ा है। वर्तमान में जिले के लगभग 7800 किसान करीब 7800 एकड़ भूमि पर काजू की खेती कर रहे हैं। अधिकांश किसान अपने एक-एक एकड़ खेत में काजू की खेती कर बेहतर आय अर्जित कर रहे हैं।काजू उत्पादन ने न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाई है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए अवसर भी पैदा किए हैं।जशपुर में उत्पादित काजू अपनी मिठास, गुणवत्ता और बेहतरीन स्वाद के कारण खास पहचान बना चुका है। यही वजह है कि इसकी मांग छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों के साथ-साथ झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में लगातार बढ़ रही है। व्यापारियों और उपभोक्ताओं के बीच जशपुर काजू की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। गुणवत्ता के मामले में जशपुर का काजू बाजार में अपनी अलग पहचान बना चुका है।काजू किसानों के लिए एक अत्यंत लाभदायक नगदी फसल साबित हो रही है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ग्राफ्टेड पौधों से जल्दी फल प्राप्त होते हैं और उत्पादन भी अधिक मिलता है।रोपण के लिए अनुकूल समय और विधिवर्षा ऋतु में पौध रोपण सबसे उपयुक्त माना जाता है।पौधों के बीच लगभग 7 से 8 मीटर की दूरी रखी जाती है।गड्ढों में गोबर खाद और मिट्टी मिलाकर पौधे लगाए जाते हैं।बेहतर उत्पादन के लिए आवश्यक देखभालशुरुआती वर्षों में नियमित सिंचाई जरूरी होती है।खरपतवार नियंत्रण और समय-समय पर छंटाई से उत्पादन बेहतर होता है।पौधे 3 से 4 वर्ष बाद फल देना शुरू करते हैं।8 से 10 वर्षों में पूर्ण उत्पादन प्राप्त होता है।एक विकसित पेड़ से औसतन 8 से 15 किलोग्राम तक काजू प्राप्त किया जा सकता है।काजू से मिल रहे अनेक आर्थिक लाभकाजू का उपयोग मिठाई, नमकीन और ड्राई फ्रूट के रूप में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसके साथ ही काजू के छिलकों से औद्योगिक तेल भी तैयार किया जाता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है। काजू के व्यापार और निर्यात से किसानों की आर्थिक स्थिति लगातार मजबूत हो रही है।बागवानी के क्षेत्र में नई पहचान बना रहा जशपुरजशपुर में काजू उत्पादन की यह सफलता किसानों की मेहनत, आधुनिक खेती तकनीकों और शासन की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का परिणाम है। जिले में फल एवं नगदी फसलों की बढ़ती खेती अब किसानों के जीवन में समृद्धि ला रही है और जशपुर को कृषि एवं बागवानी के क्षेत्र में नई पहचान दिला रही है।
- -कहानी-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)तुम्हें जाना, तुम्हें चाहा, तुम्हें पूजा मैंने ..बस एक यही खता थी मेरी, और खता क्या...शायद पूजा की रूह यही सवाल कर रही होगी सार्थक से और सार्थक...उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है । प्रेम क्या इतना स्वार्थी हो सकता है... किसी को पाने का इतना जुनून कि सही गलत का ध्यान ही न रहे । जिसे अपनी जान से अधिक चाहने का दावा करते हैं . उसे कैसे नुकसान पहुंचा सकते हैं ये । खोने - पाने से परे रूहानी प्रेम का दौर अब नहीं रहा...प्रेम में धोखा देना...एकतरफा प्रेम में पड़कर किसी मासूम चेहरे को तेजाब से जला देना , वर्तमान समय में प्रेम का यह कैसा वीभत्स चेहरा देखने को मिल रहा है... सार्थक को बेड़ियों में जकड़कर ले जाते हुए देखकर चारों तरफ आज यही चर्चा हो रही थी ।सार्थक और पूजा आठ वर्षों से एक - दूसरे को जानते थे, उनके घर आस- पास तो थे ही, स्कूल, कॉलेज की पढ़ाई भी उन्होंने एक साथ की । दोस्ती और अधिक लम्बे साथ ने कब उनके रिश्ते को प्रगाढ़ कर दिया था , इस बात का उन्हें पता ही नहीं चला । कॉलेज की पिकनिक हो या किसी दोस्त की जन्मदिन की पार्टी , सार्थक के साथ होने पर अपने - आपको सुरक्षित महसूस करती थी पूजा और उसके मम्मी - पापा भी उसके साथ कहीं भी भेजने में हिचकिचाते नहीं थे ।उनकी आँखों में सुनहरे भविष्य के ख्वाब सजने लगे थे...दिलों के तार में प्रेम की रागिनियाँ अंगड़ाई लेने लगी थी... दुनिया की हर शै खूबसूरत लगने लगी थी...यह वय ही ऐसी होती है कि अपने प्रिय की हर बात सुहाने लगती है...कमियाँ तो दिखती ही नहीं या उनकी आँखें देखना ही नहीं चाहती ।उन्होंने अपने प्रेम की दुनिया बसाने का निर्णय कर लिया था ।पढ़ाई के बाद नौकरी के लिए दोनों प्रयास कर रहे थे, कई बार निराशा के दौर आये पर दोनों एक - दूसरे की हिम्मत बने रहे । एक - दूसरे के सुख - दुःख में साथ निभाने का वादा किया था उन्होंने । अपने लक्ष्य को पाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे वे दोनों और उनके परिश्रम का सुखद फल भी उन्हें मिल गया । दोनों को एक ही विभाग में नौकरी मिल गई थी । अब तो कोई बाधा नहीं थी , बस दोनों परिवारों की सहमति चाहिए थी और उन दोनों की वर्षों की दोस्ती को रिश्ते में बदलने में कोई कठिनाई नजर नहीं आ रही थी । कई बार राहों में आने वाले रोड़े नजर नहीं आते पर उनकी वजह से हमें ठोकर लग जाती है और कदम लड़खड़ा जाते हैं । ऐसा ही कुछ उनके साथ हुआ ।सार्थक का जो अटेंशन पूजा को सुखद अनुभूतियों से भर देता था , वही अब उसे बन्धन लगने लगा था...इतना अधिक पसेसिवनेस... कभी - कभी पूजा को अजीब लगने लगता था । नौकरी करने के साथ प्राथमिकताएं स्वाभाविक रूप से बदल जाती हैं परन्तु सार्थक को उससे शिकायतें रहने लगी थी । जीवनसाथी बनने के निर्णय ने शायद उसे अधिक अपनेपन और अधिकार का एहसास कराया था कि वह पूजा को एक मिनट के लिए भी अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने देना चाहता था ।पूजा ने महसूस किया कि सार्थक स्वयं तो आजाद पंछी की तरह उड़ना चाहता है परन्तु उस पर कई तरह की पाबन्दियाँ लगाता है । प्रेम तो मुक्त करता है , किसी को बाँधता नहीं ....उसने कभी भी सार्थक को बाँधने की कोशिश नहीं की । उसे अपने प्यार पर विश्वास था और जहाँ विश्वास है वहाँ किस बात का डर ? कॉलेज में एकदम स्वतंत्र व्यवहार रखनेवाला सार्थक आज पूजा को अपने सहयोगियों से घुलने - मिलने पर टोकने लगा था । शादी से पहले ही उसका पागलपन देखकर भयभीत हो गई थी पूजा और अब वह इस रिश्ते से बच रही थी... वह चाहती थी कि सार्थक उसकी भावनाओं को समझे और शादी के बाद भी वे अच्छे दोस्त बने रहें ...लेकिन अभी वह इस रिश्ते में नहीं बंधना चाहती ।सार्थक उसके इस निर्णय से तिलमिला उठा था..उसे अब किसी भी कीमत पर पूजा से अलग रहना गवारा नहीं था । उस दिन खूब लड़कर गया था सार्थक उससे और पूजा का दर्द इन शब्दों में उभर आया था...काश ! मैं जिंदा न होती...जब भी आँखों को बंद करती हूँ ,गहरा अंधेरा देखती हूँ...मैं अपने तमाम डर के ,बोझ तले दब गई हूँ...यहाँ रहने से डरती हूँ ,हम कभी साथ में खिलौनों से खेलते थे..और अब खुद खिलौना बन गए हैं ,सच में लड़के तो लड़के ही होते हैं...और हम लड़कियाँ अपनी बात कह भी नहीं पाती ।।उस दिन पूजा सार्थक से अपने मन की बात कहने गई थी इन्हीं कुछ शब्दों में.... और वह बर्दाश्त न करसका था... क्रोध और आवेश दिग्भ्रमित कर देता है... क्यों पूजा ...आखिर क्यों , यह प्रश्न पूछ्ते हुए अचानक उसकी हथेलियाँ पूजा के गले पर कसती गई...इतना कि पूजा अनुत्तरित रह गई । जब तक वह होश में आता पूजा उसे छोड़कर जा चुकी थी...हमेशा के लिए । हाँ.. यह प्रश्न छोड़कर कि क्या इस प्रेम कहानी का यही अंत होना था ।
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विशेष आलेख
कल्पना कीजिए, आप एक खूबसूरत सफर पर हैं। चारों तरफ फैली खुली शानदार सड़क, रफ्तार पकड़ती गाड़ी और गुनगुनाता सुहाना मौसम। सब कुछ एकदम मुकम्मल लगता है। लेकिन अचानक, अगले ही मोड़ पर कोई अनहोनी हो जाए...। कई बार हाइवे पर हुआ एक अनचाहा हादसा पल भर में जिंदगी की खुशियों को मातम में बदल देता है। ऐसे किसी अनजान और सुनसान सफर पर, जहां दूर-दूर तक कोई अस्पताल या मदद नजर नहीं आती, वहां मोबाइल की स्क्रीन पर चमकता एक नंबर उम्मीद की सबसे बड़ी किरण बनकर उभरता है- 1033। आज देश के राष्ट्रीय राजमार्गों पर यह चार अंकों का नंबर महज एक हेल्पलाइन नहीं, बल्कि हजारों-लाखों मुसाफिरों के लिए संजीवनी साबित हो रहा है।हाइवे पर दुर्घटना होने के बाद जो सबसे पहला घंटा होता है, उसे चिकित्सा विज्ञान में गोल्डन ऑवर (Golden Hour) कहा जाता है। इस एक घंटे के भीतर अगर घायल को सही इलाज मिल जाए, तो उसकी जान बचने की संभावना 80 फीसदी तक बढ़ जाती है। 1033 इसी गोल्डन ऑवर का रक्षक है।जैसे ही कोई इस नंबर पर डायल करता है, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) का कॉल सेंटर तुरंत हरकत में आ जाता है। जीपीएस (GPS) ट्रैकिंग के जरिए हादसे की सटीक लोकेशन ट्रेस की जाती है और चंद मिनटों के भीतर एम्बुलेंस मौके पर पहुंचती है। घायलों को नजदीकी ट्रॉमा सेंटर या अस्पताल पहुंचाया जाता है। साथ ही रास्ता साफ करने के लिए क्रेन और पेट्रोलिंग गाड़ियां तैनात हो जाती हैं।एनएचएआई के 1033 सेवा का लाभ लेने वाले श्री नितिन वर्मा बताते हैं, "मैं रायपुर से बिलासपुर राष्ट्रीय राजमार्ग में सफ़र कर रहा था। दोपहर 2 बजे के करीब हाइवे पर मेरी गाड़ी का एक्सीडेंट हुआ, मोबाइल में नेटवर्क भी कम था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कहां हूं? मैंने 1033 लगाया, और महज 7 से 10 मिनट में एम्बुलेंस मेरे सामने थी। वो नंबर नहीं, मेरे लिए संजीवनी से कम नहीं था।"आमतौर पर लोग सोचते हैं कि यह नंबर सिर्फ एक्सीडेंट के समय काम आता है, लेकिन असल में यह हाइवे पर आपका सबसे भरोसेमंद साथी है। आप कई विपरीत स्थितियों में भी इसकी मदद ले सकते हैं। रात के सन्नाटे में अगर गाड़ी का टायर पंचर हो जाए या इंजन फेल हो जाए, हाइवे पर कोई पेड़ गिर गया हो, मवेशी आ गए हों या कोई भारी मलबा पड़ा हो, यात्रा के दौरान अगर अचानक किसी सहयात्री की तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ जाए, टोल प्लाजा या फास्टैग संबंधी कोई समस्या हो या हाइवे पर असुरक्षा महसूस हो रही हो... तो भी 1033 सेवा का लाभ लिया जा सकता है।ट्रक ड्राइवर श्री गुरदीप सिंह अपने अनुभव साझा करते हैं, "बात रात के करीब 09:45 बजे की है। मैं अपना भारी-भरकम ट्रक लेकर रायपुर से बिलासपुर की ओर बढ़ रहे था। अचानक एक जोरदार आवाज के साथ ट्रक का टायर फट गया। भारी वाहन और ऊपर से रात का सन्नाटा... ऐसी स्थिति में हाइवे के किनारे ट्रक खड़ा करना और मदद ढूंढना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। मैने बिना वक्त गंवाए 1033 पर कॉल किया। एनएचएआई की टीम ने तुरंत मेरी लोकेशन ट्रेस की और हाईवे पेट्रोलिंग टीम मौके पर पहुंच गई। टीम ने न सिर्फ क्रेन और तकनीकी मदद का इंतजाम किया, बल्कि जब तक काम पूरा नहीं हुआ, वहां सुरक्षा सुनिश्चित की, ताकि कोई और बड़ा हादसा न हो।"बिलासपुर-नागपुर रूट के मुसाफिर श्री एस.पी. चौबे ने बताया, "हम अपनी कार से सफर कर रहे थे कि अचानक गाड़ी पंचर हो गई। जब स्टेपनी बदलने की बारी आई, तो एक नई मुसीबत खड़ी हो गई। बहुत दिनों से पहिया खुला नहीं था, इसलिए वह बुरी तरह जाम हो चुका था। मेरा ड्राइवर पसीने से तर-बतर होकर उसे खोलने की नाकाम कोशिश कर रहा था, लेकिन वह टस से मस नहीं हो रहा था। हाइवे के किनारे खड़ी हमारी गाड़ी और ड्राइवर की जद्दोजहद को वहां से गुजर रही 1033 की रूट पेट्रोलिंग व्हीकल (RPV) टीम ने खुद देख लिया।टीम के जवान तुरंत हमारे पास रुके। उन्होंने न सिर्फ अपनी गाड़ी से जरूरी हैवी टूल्स (औजार) निकाले, बल्कि खुद आगे बढ़कर जाम हो चुके चक्के को खोला, टायर बदला और हमारी गाड़ी को रवाना किया। उनके इस अपनेपन और मुस्तैदी ने हमारा दिल जीत लिया।हाइवे पर सुरक्षा सिर्फ छोटे वाहनों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारी-भरकम कमर्शियल वाहनों के लिए भी 1033 एक सुरक्षा कवच है। ऐसा ही एक मामला बिलासपुर से महासमुंद की ओर जा रहे विशाल ट्रेलर के ड्राइवर श्री शिवम यादव के साथ हुआ। उनके ट्रेलर का ब्रेक अचानक जाम हो गया और गाड़ी में जरूरी एयर प्रेशर नहीं बन पा रहा था। बीच हाइवे पर इतने बड़े वाहन का इस तरह रुकना बेहद खतरनाक था।सूचना मिलते ही 1033 की टीम तुरंत मौके पर पहुंची। भारी ट्रेलर के पीछे से आ रही तेज रफ्तार गाड़ियों को सचेत करने के लिए टीम ने सेफ्टी कोन और चेवरॉन साइन बोर्ड लगाए, ताकि एक सुरक्षित बफर जोन बन सके। इस हाई-प्रोफेशनल ट्रैफिक मैनेजमेंट की वजह से न तो हाइवे पर जाम लगा और न ही कोई दुर्घटना हुई। ट्रेलर को सुरक्षित तरीके से सुधरवाने की व्यवस्था की गई।1033 की सबसे खास बात इसकी सरलता और गति है। यह सेवा 24 घंटे, सातों दिन काम करती है। इसमें भाषा की कोई दीवार नहीं है। स्थानीय भाषाओं से लेकर हिंदी और अंग्रेजी, हर भाषा में यहां मदद मिलती है। टोल-फ्री होने के कारण मोबाइल में बैलेंस न होने पर भी इस पर कॉल की जा सकती है।बदलते भारत के साथ हमारे हाइवे आधुनिक और हाई-स्पीड हो रहे हैं, लेकिन रफ्तार के इस दौर में सुरक्षा सबसे अहम है। अगली बार जब आप किसी लंबे सफर पर निकलें, तो अपनी गाड़ी की डिक्की चेक करने के साथ-साथ अपने दिमाग और मोबाइल की स्पीड डायल लिस्ट में 1033 को जरूर सेव कर लें। क्योंकि जब हाइवे पर मुश्किलें रास्ता रोकती हैं, तो यही चार अंक संजीवनी बनकर जिंदगी की रफ्तार को थमने नहीं देते। - -जैव विविधता, जल संरक्षण और जनभागीदारी का अनूठा संगमआलेख-धनंजय राठौर , (संयुक्त संचालक), अशोक कुमार चंद्रवंशी (सहायक जनसंपर्क अधिकारी)छत्तीसगढ़ का पहला रामसर स्थल कोपरा जलाशय आज पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन और सामुदायिक सहभागिता का प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभर रहा है। “जैव विविधता के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस 2026” की थीम “स्थानीय स्तर पर कार्य, वैश्विक प्रभाव” को यह जलाशय वास्तविक रूप में साकार कर रहा है।सुबह के शांत वातावरण में प्रवासी पक्षियों की मधुर आवाजें और जलाशय के आसपास आजीविका से जुड़े ग्रामीणों की गतिविधियां प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंध को दर्शाती हैं। कोपरा जलाशय वर्षों से क्षेत्र के लोगों के लिए जल, मत्स्य पालन, कृषि और पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा जैव विविधता संरक्षण, आर्द्रभूमि विकास और पर्यावरण संतुलन को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जल स्रोतों के संरक्षण, वृक्षारोपण, वन्यजीव सुरक्षा और सामुदायिक भागीदारी से जुड़े कई अभियान प्रदेश में संचालित किए जा रहे हैं, जिनका सकारात्मक प्रभाव कोपरा जलाशय जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है।वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप ने कहा है कि छत्तीसगढ़ की जैव विविधता राज्य की अमूल्य धरोहर है और इसके संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि कोपरा जलाशय यह संदेश देता है कि जब शासन और समाज मिलकर प्रकृति संरक्षण का संकल्प लेते हैं, तब पर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित होता है।कोपरा जलाशय हजारों प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन चुका है। हर वर्ष विभिन्न देशों और राज्यों से आने वाले पक्षी यहां भोजन और विश्राम प्राप्त करते हैं। इसके साथ ही यह जलाशय जलीय जीवों, मछलियों, वनस्पतियों और अनेक सूक्ष्म जीवों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास प्रदान करता है। इसी विशेषता के कारण इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता मिली है।स्थानीय ग्रामीणों, महिला स्व-सहायता समूहों, युवाओं और विद्यालयों की सक्रिय भागीदारी से यहां स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण, पक्षी संरक्षण और बायो-फेंसिंग जैसे कार्य लगातार किए जा रहे हैं। इन प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण को मजबूती मिलने के साथ लोगों में प्रकृति के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना भी विकसित हो रही है।विशेषज्ञों के अनुसार आर्द्रभूमियां प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती हैं। वे बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण, जल शुद्धिकरण और कार्बन अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में कोपरा जलाशय का संरक्षण जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में भी बेहद उपयोगी साबित हो रहा है।कोपरा जलाशय आज यह संदेश दे रहा है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की साझा जिम्मेदारी है। स्थानीय स्तर पर किए गए छोटे-छोटे प्रयास ही वैश्विक स्तर पर बड़े बदलाव की नींव बनते हैं। छत्तीसगढ़ का यह पहला रामसर स्थल आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और सामुदायिक सहभागिता का राष्ट्रीय मॉडल बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि प्रकृति का संरक्षण हमारी साझा जिम्मेदारी है। इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और इसके वैश्विक महत्व पर मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने राज्य के नागरिकों और संरक्षण टीम की सराहना करते हुए अपना संदेश दिया है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि कोपरा जलाशय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामसर स्थल की मान्यता मिलना पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है। हमारी सरकार जैव विविधता संरक्षण, आर्द्रभूमि के विकास और पर्यावरण संतुलन को मजबूत करने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है। कोपरा जलाशय इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जब शासन की नीतियां और समाज का संकल्प एक साथ मिलते हैं, तो स्थानीय स्तर पर किए गए छोटे प्रयास भी वैश्विक स्तर पर बड़ा बदलाव ला सकते हैं। हमारी समृद्ध प्रकृति ही हमारी आने वाली पीढ़ियों का सुरक्षित भविष्य है।
- -कम समय में घने जंगल तैयार कर पर्यावरण संरक्षण को मिल रही नई दिशा-धनंजय राठौर , संयुक्त संचालक ,अशोक कुमार चंद्रवंशी , सहायक जनसंपर्क अधिकारीवन क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावाकी तकनीक एक बेहद प्रभावी और लोकप्रिय विधि बन गई है। जापानी वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित यह तकनीक केवल 2-3 वर्षों में बंजर भूमि को घने, आत्मनिर्भर सूक्ष्म वनों में बदल देती है। पारंपरिक वृक्षारोपण की तुलना में यह विधि 10 गुना तेजी से बढ़ती है और 30 गुना अधिक घने जंगल बनाती है, जो शहरी क्षेत्रों के लिए आदर्श है।छत्तीसगढ़ में पर्यावरण संरक्षण और वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावकी वन तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है। राज्य में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग तथा छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड द्वारा इस तकनीक के जरिए शहरी क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों और खनन प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर हरियाली विकसित की जा रही है। मियावकी पद्धति में स्थानीय प्रजातियों के पौधों को अधिक घनत्व में लगाया जाता है, जिससे मात्र 3 से 5 वर्षों में घना जंगल तैयार हो जाता है।राज्य में तेजी से बढ़ रहा सघन वनीकरणछत्तीसगढ़ में वर्ष 2022 से मियावकी पद्धति के तहत लगातार वृक्षारोपण किया जा रहा है। वर्ष 2022 में कोटा मण्डल में एनटीपीसी लिमिटेड के सहयोग से 1 हेक्टेयर क्षेत्र में 23 हजार पौधे तथा 0.3 हेक्टेयर में 7 हजार पौधे लगाए गए। वर्ष 2023 में कोटा के भिल्मी क्षेत्र में 6.4 हेक्टेयर भूमि पर 64 हजार पौधों का रोपण किया गया। वहीं गेवरा क्षेत्र में 2 हेक्टेयर भूमि पर 20 हजार पौधे लगाए गए। वर्ष 2024 में कोटा के उच्चभट्टी क्षेत्र में 3.2 हेक्टेयर में 32 हजार पौधे लगाए गए। इसके अलावा रायगढ़ मण्डल के तिलईपाली और छाल क्षेत्रों में कुल 3.75 हेक्टेयर भूमि पर 37 हजार 500 पौधों का सफल रोपण किया गया।वर्ष 2025 में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं जारीवर्तमान में राज्य के कई क्षेत्रों में वृक्षारोपण कार्य तेजी से जारी है। बारनवापारा मण्डल में ‘हरियर छत्तीसगढ़’ योजना के तहत 6 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। कोरबा और रायगढ़ क्षेत्रों में साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड के सहयोग से 4 हेक्टेयर क्षेत्र में 40 हजार पौधों का रोपण किया जा रहा है। वहीं विशेष परियोजनाओं के अंतर्गत महानदीकोलफील्ड लिमिटेड द्वारा 1.9 हेक्टेयर भूमि पर 64 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। इसके साथ ही अरपा नदी के किनारे भी बड़े पैमाने पर पौधारोपण कर हरित क्षेत्र का विस्तार किया जा रहा है।पर्यावरण संरक्षण में मिल रहे बहुआयामी लाभविशेषज्ञों के अनुसार मियावकी वन सामान्य जंगलों की तुलना में अधिक कार्बन अवशोषित करते हैं। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। यह तकनीक वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम करने, भू-जल स्तर सुधारने और मिट्टी संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन वनों की शुरुआती वर्षों में देखभाल की जाती है, जिसके बाद ये जंगल स्वतः विकसित होने लगते हैं। इससे रखरखाव की लागत कम होती है और लंबे समय तक पर्यावरणीय लाभ मिलता है।बंजर डंप क्षेत्र से हरित जंगल बनने की ओर गेवरा की प्रेरक पहलछत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अनूठी पहल करते हुए कोरबा जिले के गेवरा क्षेत्र के 12.45 हेक्टेयर डंप क्षेत्र में 33 हजार 935 मिश्रित प्रजातियों के पौधों का सफल रोपण किया है। वन मंत्री केदार कश्यप ने इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि राज्य सरकार पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए लगातार प्रभावी कदम उठा रही है।जहां हरियाली संभव नहीं थी, वहां तैयार हो रहा जंगलकोयला खनन के बाद डंप क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी नीचे दब जाती है और ऊपर पत्थर, कोयला अवशेष तथा अनुपजाऊ मिट्टी रह जाती है। ऐसे क्षेत्रों में पौधों का उगना बेहद कठिन माना जाता है। लेकिन वैज्ञानिक पद्धति और सतत प्रयासों से इस बंजर भूमि को अब हरियाली में बदला जा रहा है।वैज्ञानिक तरीके से किया गया पौधारोपणडंप क्षेत्र की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए वर्मी कम्पोस्ट, नीमखली और डीएपी का उपयोग किया गया। जीपीएस सर्वे और सीमांकन के बाद व्यवस्थित गड्ढे तैयार किए गए तथा 3 से 4 फीट ऊंचाई वाले स्वस्थ पौधों का रोपण किया गया। इस क्षेत्र में नीम, शीशम, सिरस, कचनार, करंज, आंवला, बांस, महोगनी, महुआ और बेल जैसी विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इससे आने वाले समय में यह क्षेत्र पक्षियों और अन्य वन्य जीवों के लिए भी उपयुक्त आवास बन सकेगा।निरंतर देखभाल से मिल रही सफलताशुरुआती 2-3 वर्षों की देखभाल के बाद, यह वन पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाता है और इसे किसी उर्वरक या पानी की आवश्यकता नहीं होती है। रोपण के बाद पौधों की नियमित सिंचाई, खाद, निंदाई-गुड़ाई, घास कटाई और सुरक्षा का कार्य लगातार किया जा रहा है। मृत पौधों का समय पर प्रतिस्थापन भी सुनिश्चित किया जा रहा है। वर्ष 2025 से 2029 तक पांच वर्षों तक रखरखाव के बाद इस विकसित हरित क्षेत्र को साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड गेवरा को सौंपा जाएगा।हरित भविष्य की ओर मजबूत पहलकम जगह में घने जंगल बनाकर शहरों में प्रदूषण (धूल और ध्वनि) को कम करने में सहायक होते हैं। ये वन पारंपरिक वनों की तुलना में 30 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं। गेवरा की यह पहल दर्शाती है कि सही योजना, वैज्ञानिक तकनीक और निरंतर प्रयासों से बंजर और पत्थरीली भूमि को भी घने जंगल में बदला जा सकता है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र सघन हरित वन और जैव विविधता से भरपूर मानव निर्मित जंगल के रूप में विकसित होगा, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रेरणादायक उदाहरण बनेगा।
- विशेष लेख -धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक, , सुनील त्रिपाठी, सहायक संचालकरायपुर / छत्तीसगढ़ सरकार की मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 बीपीएल, घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं के लिए एक राहत पहल है। इसके तहत पुराने बकाये पर सरचार्ज में छूट मिल रही है। बकाया बिजली बिल पर लगने वाला पूरा सरचार्ज (ब्याज) माफ या मूल बकाया राशि एकमुश्त या किस्तों में जमा करने की सुविधा। यह योजना बीपीएल, सामान्य घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं को लंबे समय से लंबित बिजली बिलों के बोझ से मुक्ति दिलाने के लिए लाई गई है।मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार प्रदेशवासियों को आर्थिक राहत प्रदान करने और उनकी दैनिक जीवन से जुड़ी समस्याओं का व्यावहारिक समाधान देने के लिए लगातार जनहितकारी निर्णय ले रही है। इसी कड़ी में शुरू की गई मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए राहत का बड़ा माध्यम बनकर उभरी है। यह योजना विशेष रूप से उन परिवारों के लिए उपयोगी है जो पुराने बकाया बिजली बिल और बढ़ते सरचार्ज के कारण आर्थिक दबाव में थे।क्या है मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 राज्य सरकार की एक विशेष पहल है, जिसका उद्देश्य उपभोक्ताओं के पुराने और लंबित बिजली बिलों का सरल समाधान उपलब्ध कराना है। योजना के तहत बकाया बिजली बिलों पर लगने वाले सरचार्ज को पूरी तरह माफ किया जा रहा है। इसके साथ ही उपभोक्ताओं को शेष राशि का भुगतान एकमुश्त या आसान किस्तों में करने की सुविधा भी दी गई है। पात्र श्रेणियों के उपभोक्ताओं को मूल बकाया राशि पर भी विशेष छूट का लाभ मिल रहा है।28 लाख से अधिक उपभोक्ताओं को मिल चुकी है राहतराज्य शासन के अनुसार इस योजना के माध्यम से अब तक प्रदेश के 28 लाख से अधिक उपभोक्ताओं को 757 करोड़ रुपए से अधिक के सरचार्ज माफ होंगे। यह आंकड़ा दर्शाता है कि योजना न केवल व्यापक स्तर पर लागू की गई है, बल्कि लाखों परिवारों के लिए वास्तविक आर्थिक सहायता का माध्यम भी बनी है।किन उपभोक्ताओं को मिलेगा लाभइस योजना का लाभ मुख्य रूप से बीपीएल परिवारों, सामान्य घरेलू उपभोक्ताओं और कृषि उपभोक्ताओं को दिया जा रहा है। ऐसे उपभोक्ता जिनके बिजली बिल लंबे समय से बकाया हैं और जो एकमुश्त भुगतान करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं, वे इस योजना के माध्यम से अपने बकाया का समाधान कर सकते हैं।योजना से होने वाले प्रमुख फायदेसरचार्ज की पूरी माफी, पुराने बकाया बिलों पर लगने वाला सरचार्ज अक्सर मूल राशि से भी अधिक हो जाता है। इस योजना के तहत सरचार्ज की पूर्ण माफी से उपभोक्ताओं को तत्काल बड़ी राहत मिलती है।आसान किस्तों में भुगतानबड़ी राशि एक साथ जमा करने की बाध्यता समाप्त हो जाती है। उपभोक्ता अपनी सुविधा और आर्थिक क्षमता के अनुसार किस्तों में भुगतान कर सकते हैं। घरेलू बजट पर कम दबाव और सरचार्ज माफी और किस्त सुविधा से परिवारों को अपने मासिक खर्चों का बेहतर प्रबंधन करने में मदद मिलती है।बिजली विच्छेदन का खतरा कमबकाया राशि के कारण बिजली कटने की आशंका रहती है। योजना का लाभ लेने से उपभोक्ता नियमित भुगतान व्यवस्था में लौट सकते हैं। इससे किसानों को सीधा लाभ हो रहा है। कृषि उपभोक्ताओं को बकाया बिजली बिल के बोझ से राहत मिलती है, जिससे सिंचाई और खेती का कार्य निर्बाध रूप से जारी रह सकता है।मानसिक तनाव से राहतलंबित बिलों की चिंता से मुक्ति मिलने पर परिवार आर्थिक रूप से अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। जो उपभोक्ता लंबे समय से भुगतान नहीं कर पा रहे थे, उन्हें फिर से नियमित भुगतान प्रणाली से जुड़ने का अवसर मिलता है।योजना का लाभ कैसे प्राप्त करेंयोजना का लाभ लेने के लिए उपभोक्ता अपने नजदीकी बिजली कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त टोल फ्री नंबर 1912 पर जानकारी प्राप्त की जा सकती है। विस्तृत जानकारी और आवश्यक दिशा-निर्देशों के लिए छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड की आधिकारिक वेबसाइट का उपयोग किया जा सकता है।योजना की अवधिमुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 1 जनवरी 2026 से 31 दिसंबर 2026 तक प्रभावशील रहेगी। राज्य सरकार ने उपभोक्ताओं से समय रहते योजना का लाभ लेने की अपील की है।जनहित और सुशासन का प्रभावी उदाहरणमुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 राज्य सरकार की संवेदनशील और जनोन्मुखी सोच का उदाहरण है। यह योजना केवल बकाया बिलों के समाधान तक सीमित नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों को आर्थिक राहत, मानसिक संतोष और बेहतर वित्तीय प्रबंधन का अवसर भी प्रदान करती है।मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 उन उपभोक्ताओं के लिए अत्यंत लाभकारी है जो पुराने बिजली बिलों के बोझ से परेशान हैं। सरचार्ज माफी, मूल राशि पर छूट और आसान किस्तों जैसी सुविधाएं इसे एक प्रभावी और जनहितकारी योजना बनाती हैं। यह योजना आम नागरिकों को राहत देने के साथ-साथ उन्हें नियमित भुगतान व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। प्रदेशवासियों के लिए यह एक सुनहरा अवसर है कि वे इस योजना का लाभ उठाकर अपने लंबित बिजली बिलों का समाधान करें और आर्थिक राहत प्राप्त करें।
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आर्टिकल- पुलेला गोपीचंद
दो चिंतन शिविरों का हिस्सा बनने का अवसर प्राप्त करने के बाद, मैं भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि यह आज भारतीय खेल जगत की सबसे सामयिक और असरदार पहलों में से एक है। हम अपने राष्ट्र की खेल यात्रा के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं, एक ऐसा मोड़ जहाँ इरादा, निवेश और प्रेरणा अभूतपूर्व रूप से एक साथ मिल रहे हैं।पिछले एक दशक में, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, भारत में खेल हाशिये से मुख्यधारा में आ गया है। इसके महत्व के प्रति भी साफ तौर पर राष्ट्रीय जागरूकता देखी जा सकती है, न केवल एक प्रतिस्पर्धी गतिविधि के रूप में, बल्कि स्वास्थ्य, अनुशासन और राष्ट्रीय गौरव के साधन के रूप में भी। आज, हम एक विशाल और विविध तंत्र देख रहे हैं, जहां राज्य सरकारें, गैर-सरकारी संगठन, निगम, संघ और ज़मीनी स्तर के संस्थान सभी मिलकर खेलों के विकास में सक्रिय रूप से योगदान दे रहे हैं।चिंतन शिविर की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सभी हितधारकों को एक साझा मंच पर लाता है। खेल अपने आप में कई क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है, जिनमें विनिर्माण, मनोरंजन, फिटनेस, मीडिया और शिक्षा शामिल हैं। यह शिविर इन सभी क्षेत्रों को एक साथ लाने में मदद करता है, जिससे एक साझा दृष्टिकोण बनता है, जो दीर्घकालिक सफलता के लिए बेहद ज़रुरी है। यह देश के सामूहिक दृष्टिकोण को सामने लाता है और साथ ही विभिन्न राज्यों की सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रदर्शित करता है, जिससे अनुकरण और नवाचार को भी प्रोत्साहन मिलता है।चिंतन शिविर महज एक सम्मेलन से कहीं बढ़कर, एक शिक्षण तंत्र है। यह इसमें शामिल होने वाले लोगों को विचारों का आदान-प्रदान करने, चुनौतियों को समझने और मिलकर समाधान विकसित करने का अवसर देता है। यह एक शक्तिशाली प्रेरक के रूप में भी काम करता है, सफलता की तमाम कहानियों को सामने लाता है और इस विचार को और पुख्ता करता है कि भारत में खेल महज़ विशिष्ट पदकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भागीदारी, समावेशिता और राष्ट्र निर्माण भी शामिल है।फिट इंडिया मूवमेंट जैसी पहल, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन और साइक्लिंग प्रतियोगिताओं जैसी सामुदायिक गतिविधियों ने खेल के प्रति हमारे नज़रिए को नया रूप दिया है। आज के वक्त में जोर "सभी के लिए खेल" के साथ-साथ, उच्चतम स्तर पर उत्कृष्टता पर है। पदक जीतने की आकांक्षाएं और व्यापक भागीदारी अब अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं, बल्कि वे एक ही प्रक्रिया का हिस्सा हैं।श्रीनगर में शिविर का आयोजन करने से इसका महत्व और भी बढ़ गया है। इस शहर की शांत सुंदरता न केवल खेलों की विचारधारा के लिए एक मनोरम पृष्ठभूमि प्रदान करती है, बल्कि शांत चिंतन का भाव भी देती है, जो सार्थक संवाद के लिए बेहद ज़रुरी है।इस चिंतन शिविर का एक अहम केंद्र बिंदु श्रीनगर खेल संकल्प को अपनाना था। यह संकल्प महज़ एक आशय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि यह एक एकीकृत ढांचा है, जो भारतीय खेल जगत के सभी हितधारकों की आकांक्षाओं को एक साथ बांधता है। साझा लक्ष्यों, प्राथमिकताओं और जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करके, यह एक ऐसा रोडमैप तैयार करता है, जो विखंडन के बजाय सहयोग को प्रोत्साहित करता है।श्रीनगर खेल संकल्प की असली ताकत विभिन्न भागीदारों—सरकारों, संघों, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज को एक मंच पर लाने की क्षमता में निहित है। यह इस विचारधारा को और पुख्ता करता है कि भारत के खेल जगत का उत्थान अलग-थलग प्रयासों से नहीं हो सकता। इसके बजाय, इसे एक समन्वित, सहयोगात्मक दृष्टिकोण से संचालित किया जाना चाहिए, जहां संसाधनों, ज्ञान और विशेषज्ञता को एक साथ लाया जाए।भारत को 2036 तक ओलंपिक खेलों में शीर्ष 10 देशों में शामिल होने की अपनी दीर्घकालिक महत्वाकांक्षा को प्राप्त करने के लिए यह समन्वय बेहद महत्वपूर्ण है। विश्व स्तरीय एथलीट तैयार करने के लिए न केवल प्रतिभा की ज़रुरत होती है, बल्कि एक सुचारू तंत्र की भी आवश्यकता होती है, जिसमें जमीनी स्तर पर पहचान, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचा, उत्कृष्ट कोचिंग, प्रतिस्पर्धा का अनुभव और निरंतर वित्तीय एवं संस्थागत समर्थन शामिल हैं। संकल्प वही रणनीतिक कड़ी है, जो इन सभी तत्वों को एक सुसंगत प्रणाली में जोड़ सकता है।इन वार्ताओं से जो बात सबसे अधिक उभरकर सामने आई है, वह है इस व्यवस्था में मौजूद आशावाद। सभी का यह मानना है कि भारत का खेल भविष्य उज्ज्वल है और सहयोग से हम एक सशक्त, समावेशी और उच्च प्रदर्शन वाली खेल संस्कृति का निर्माण कर सकते हैं।चिंतन शिविर कई मायनों में एक अनूठा प्रयोग है, लेकिन यह पहले से ही सफल साबित हो रहा है। यह संवाद, समन्वय और आपसी समझ के महत्व को दर्शाता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए, ऐसे मंच न केवल लाभकारी हैं, बल्कि आवश्यक भी हैं।अगर हम वैश्विक खेल मंच पर अपनी महत्वाकांक्षाओं को सही मायने में साकार करना चाहते हैं, तो इन संवादों का जारी रहना और इन्हें सामूहिक कार्रवाई से मदद मिलना भी ज़रुरी है। श्रीनगर खेल संकल्प हमें वह दिशा प्रदान करता है। चिंतन शिविर हमें वह मंच प्रदान करता है। ये दोनों मिलकर भारत को अपनी खेल संबंधी आकांक्षाओं को स्थायी ओलंपिक सफलता में बदलने के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करते हैं।(लेखक भारतीय राष्ट्रीय बैडमिंटन टीम के मुख्य राष्ट्रीय कोच हैं) -
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)दीप जलाने से हो जाता, जगमग घर का आँगन।
माँ का होना कर देता है, घर को सुंदर कानन।।
रहे व्यवस्थित सारी चीजें, स्वच्छ रहे हर कोना।
साँझ ढले तुलसी को दीपक, पूजन-अर्चन पावन ।।
त्यौहारों की रौनक माँ से, पकवानों की खुशबू।
रीति-रस्म संस्कार सिखाती, महके घर ज्यों चंदन।।
थकित व्यथित अंतस् को लगती, मरहम माँ की ममता।
संबल संयम धैर्य हौसला, आशा दे अपनापन।।
सबकी उलझन सुलझाती है, पीर रखे निज मन में।
संघर्षों में तपकर निखरी, माँ होती है कंचन।।
आँचल है ममता का सागर, देवपगा सुरसरिता।
माँ धीरज में धरणी जैसी, नभ-सम विस्तृत दामन।। - -हरा सोना, नई उड़ान: वनोपज से आत्मनिर्भरता की ओर छत्तीसगढ़- धनंजय राठौर , संयुक्त संचालक,- अशोक कुमार चंद्रवंशी ,सहायक जनसंपर्क अधिकारीछत्तीसगढ़, जिसे हर्बल स्टेट के रूप में जाना जाता है, आज अपनी समृद्ध वन संपदा और दूरदर्शी शासकीय नीतियों के बल पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दे रहा है। यहाँ के वनों से प्राप्त होने वाला ग्रीन गोल्ड अब केवल स्थानीय उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक बाज़ारों में अपनी चमक बिखेर रहा है। छत्तीसगढ़ की यह पहल न केवल वनों का संरक्षण कर रही है, बल्कि ग्रामीण समाज में स्वावलंबन, आत्मविश्वास और आर्थिक सुरक्षा की एक नई चेतना का संचार कर रही है।‘ग्रीन गोल्ड’ (हरा सोना) वनों की असली पूँजी छत्तीसगढ़ में वनोपज को श्हरा सोनाश् कहा जाता है, जो राज्य की आर्थिक रीढ़ है। तेंदूपत्ता एवं बांस बहुमुखी उपयोगिता के कारण इन्हें प्रमुखता से श्हरा सोनाश् माना जाता है। लाख, शहद और दुर्लभ औषधीय पौधों के साथ-साथ सागौन, साल, बीजा और शीशम जैसे कीमती वृक्ष यहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। आधुनिक प्रसंस्करण के माध्यम से इन कच्चे माल को उच्च मूल्य के उत्पादों में बदला जा रहा है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और वन मंत्री श्री केदार कश्यप द्वारा लोकार्पित यह इकाई वनोपज आधारित अर्थव्यवस्था का पावरहाउस है। आंवला, बेल, गिलोय और अश्वगंधा जैसे उत्पादों को जूस, कैंडी और हर्बल पाउडर में परिवर्तित किया जाता है। वैज्ञानिक भंडारण यहाँ 20 हजार मीट्रिक टन क्षमता वाले अत्याधुनिक गोदाम हैं, जो उपज को सुरक्षित रखते हुए संग्राहकों को बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाते हैं।छत्तीसगढ़ हर्बल्स स्थानीय से वैश्विक तक राज्य सरकार का यह आधिकारिक ब्रांड शुद्धता और प्राकृतिक उत्पादों का पर्याय बन चुका है। संजीवनी स्टोरों की संख्या 30 से बढ़कर अब 1,500 से अधिक हो गई है। ई-कॉमर्स अब ये उत्पाद अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी उपलब्ध हैं। प्रमुख उत्पाद भृंगराज तेल, नीम तेल, च्यवनप्राश, शुद्ध शहद, महुआ उत्पाद, बेल शर्बत और विभिन्न आयुर्वेदिक चूर्ण।इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में महिला स्व-सहायता समूह हैं। दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों की महिलाएं मशीन संचालन, गुणवत्ता परीक्षण और पैकेजिंग का कार्य संभाल रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन में कमी आई है और परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह मॉडल आदिवासी महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्तश् बनाने का सफल उदाहरण है।हर्बल एक्सट्रैक्शन यूनिट (2025) भविष्य की राह को देखते हुए वर्ष 2025 में स्थापित इस यूनिट ने छत्तीसगढ़ को हर्बल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित कर दिया है। यहाँ औषधीय पौधों से उच्च गुणवत्ता वाले अर्क तैयार किए जाते हैं, जिनकी भारी मांग अंतर्राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल और वेलनेस इंडस्ट्री में है। राज्य अब केवल कच्चा माल देने वाला क्षेत्र नहीं, बल्कि परिष्कृत उत्पादों का निर्माता बन गया है।
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विशेष लेख - नितेश चक्रधारी (सहायक जनसंपर्क अधिकारी)
रायपुर / छत्तीसगढ़ में शासन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में “सेवा सेतु” एक गेम-चेंजर पहल साबित हो रही है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार प्रशासनिक सेवाओं को नागरिकों की उंगलियों तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी विजन का परिणाम है कि आज आय, जाति, निवास प्रमाण-पत्र से लेकर राशन कार्ड और भू-नक़ल तक की 441 से अधिक सेवाएं एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं। डिजिटल युग में सुशासन का असली अर्थ है सेवाओं का सरलीकरण और समयबद्धता। “सेवा सेतु” इसी सोच को साकार कर रहा है, जो छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक पहचान को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तैयार है।डिजिटल सुशासन- कार्यालयों के चक्करों से मिली मुक्तिएक समय था जब नागरिकों को प्रमाण-पत्र बनवाने जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए अलग-अलग सरकारी कार्यालयों की दौड़ लगानी पड़ती थी। इसमें न केवल समय और श्रम की बर्बादी होती थी, बल्कि बिचौलियों का डर भी बना रहता था। “सेवा सेतु” ने इस पारंपरिक ढर्रे को बदलते हुए “वन स्टॉप सॉल्यूशन” पेश किया है। अब नागरिक घर बैठे या नजदीकी लोक सेवा केंद्र से ऑनलाइन आवेदन कर निर्धारित समय-सीमा में सेवाओं का लाभ ले रहे हैं। तकनीकी उन्नयन की दिशा में राज्य ने लंबी छलांग लगाई है। छत्तीसगढ़ के पुराने ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल पर जहाँ केवल 86 सेवाएं उपलब्ध थीं, वहीं नए और उन्नत “सेवा सेतु” प्लेटफॉर्म पर अब 441 सेवाएं लाइव हैं।इस पोर्टल पर 30 से अधिक विभागों को एक साथ जोड़ा गया हैइस नई सेवा में 54 नई सेवाओं के साथ विभिन्न विभागों की 329 री-डायरेक्ट सेवाओं का सफल एकीकरण किया गया है, जिससे नागरिकों को अलग-अलग पोर्टल्स पर भटकना नहीं पड़ता। छत्तीसगढ़ लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत समय-सीमा में सेवा देना अब केवल कागजी नियम नहीं, बल्कि हकीकत है। पिछले 28 महीनों के आंकड़े इसकी सफलता की कहानी बयां करते हैं। कुल 75 लाख 70 हजार से अधिक आवेदनों में से 68 लाख 41 हजार से अधिक मामले का निराकरण किया जा चुका है। इस प्रकार 95 प्रतिशत से अधिक आवेदनों का निपटारा तय समय-सीमा के भीतर किया गया।प्रमाण-पत्रों की डिजिटल सुलभताआंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक मांग बुनियादी प्रमाण-पत्रों की रही है। चिप्स (ब्भ्पच्ै) कार्यालय के मुताबिक आय प्रमाण-पत्ररू 32 लाख से अधिक आवेदन, मूल निवास, जाति प्रमाण-पत्र, विवाह पंजीयन और भू-नक़ल सेवाओं का भी बड़े पैमाने पर डिजिटल उपयोग हुआ है।व्हाट्सएप और डिजिटल ट्रांजेक्शन- पहुँच हुई और भी आसानतकनीक को जन-जन तक पहुँचाने के लिए अब “सेवा सेतु” को व्हाट्सएप से भी जोड़ दिया गया है। डिजिटल इंडिया की अवधारणा को धरातल पर उतारते हुए इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से अब तक 3.3 करोड़ से अधिक डिजिटल ट्रांजेक्शन किए जा चुके हैं।पारदर्शिता और विश्वास का नया मॉडल“सेवा सेतु” केवल एक तकनीकी पोर्टल नहीं, बल्कि सरकार और जनता के बीच विश्वास का सेतु है। इलेक्ट्रॉनिक वर्कफ्लो प्रणाली के कारण अब हर आवेदन की रीयल-टाइम निगरानी संभव है, जिससे अनावश्यक देरी और भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म हुई है। यदि इसी गति से सुधार जारी रहा, तो छत्तीसगढ़ का यह मॉडल भविष्य में देश के अन्य राज्यों के लिए प्रेरणा बन सकता है। -
विशेष लेख : धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक
अशोक कुमार चन्द्रवंशी, सहायक जनसंपर्क अधिकारीरायपुर । मन की बात' से राष्ट्रीय क्षितिज तक का सफर- प्रायः सभी प्रकृति प्रेमियों का मानना है कि प्रकृति कभी भी अपना ऋण नहीं भूलती। यदि मनुष्य पूरी ईमानदारी से उसके संरक्षण की ओर एक कदम बढ़ाता है, तो प्रकृति उसे अपनी भव्यता से कई गुना वापस लौटाती है। छत्तीसगढ़ की पावन धरा, जो सदियों से अपनी नैसर्गिक संपदा और सघन वन क्षेत्रों के लिए विख्यात रही है, आज वन्यजीव संरक्षण के एक नए स्वर्णिम युग की ओर बढ़ रही है।छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में स्थित बारनवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य (लगभग 245 वर्ग किमी) में काले हिरणों (ब्लैकबक) का सफलतापूर्वक पुनरुद्धार हुआ है, जहाँ इनकी संख्या अब 200 के करीब पहुँच गई है। 1970 के दशक में विलुप्त हो चुके इन हिरणों को 2018 की पुनरुद्धार योजना और 2026 तक के वैज्ञानिक प्रयासों से वापस लाया गया। हाल ही में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम “मन की बात” में जब बारनवापारा अभ्यारण्य के काले हिरणों की सफल वापसी का उल्लेख किया, तो यह केवल एक राज्य की उपलब्धि नहीं रही, बल्कि भारत के पर्यावरण मानचित्र पर वन्यजीव संरक्षण का एक नया अध्याय बन गई।विजन भरा नेतृत्व और प्रतिबद्धता- इस गौरवमयी उपलब्धि के सूत्रधार छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय हैं। उन्होंने इस सफलता को राज्य की समृद्ध जैव विविधता और पर्यावरण के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता का प्रतिफल बताया है। मुख्यमंत्री श्री साय का मानना है कि प्रधानमंत्री की सराहना केवल एक प्रशंसा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के वन विभाग और वहां के स्थानीय समुदायों के कठिन परिश्रम पर लगी राष्ट्रीय मुहर है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ आज विकास और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के बीच उस दुर्लभ संतुलन को साध रहा है, जिसकी आज पूरे विश्व को आवश्यकता है।वैज्ञानिक रणनीति: विलुप्ति से पुनर्वास तक- बारनवापारा अभ्यारण्य में काले हिरणों (Blackbucks) का दिखाई देना एक समय दुर्लभ हो गया था। लेकिन वन मंत्री श्री केदार कश्यप के कुशल मार्गदर्शन और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) श्री अरुण कुमार पाण्डेय के रणनीतिक निर्देशन ने इस असंभव लक्ष्य को वास्तविकता में बदल दिया। फरवरी 2026 का महीना छत्तीसगढ़ के वन इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ, जब विशेषज्ञों की कड़ी निगरानी में 30 काले हिरणों को उनके प्राकृतिक आवास में 'सॉफ्ट रिलीज' पद्धति से मुक्त किया गया। यह प्रक्रिया केवल उन्हें जंगल में छोड़ने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि वे नए वातावरण में बिना किसी तनाव (Stress-free) के रच-बस सकें। ब्लैकबक कंजर्वेशन सेंटर में बेहतर पोषण और वैज्ञानिक देखभाल से इनकी संख्या में वृद्धि हुई।प्रशासनिक इच्छाशक्ति और मैदानी संघर्ष- इस महाअभियान के पीछे उन जांबाज अधिकारियों और मैदानी अमले की मेहनत है, जिन्होंने दिन-रात एक कर दिया। मुख्य वन संरक्षक (रायपुर) श्रीमती सतोविशा समाजदार और वनमंडलाधिकारी (बलौदाबाजार) श्री धम्मशील गणवीर के नेतृत्व में फील्ड स्टाफ, जीव वैज्ञानिकों और पशु चिकित्सकों की एक समर्पित टीम ने एक ढाल की तरह काम किया। वर्तमान में इन हिरणों की सुरक्षा के लिए हाई-टेक निगरानी प्रणाली, जीपीएस ट्रैकिंग और नियमित पेट्रोलिंग का उपयोग किया जा रहा है, जो छत्तीसगढ़ वन विभाग की तकनीकी दक्षता का प्रमाण है।रामपुर ग्रासलैंड:- एक सुरक्षित भविष्य का पालना बारनवापारा अभ्यारण्य का यह मॉडल आज देश के अन्य राज्यों के लिए एक 'केस स्टडी' बन सकता है। यहाँ केवल काले हिरण की प्रजाति का पुनर्वास नहीं हुआ, बल्कि उनके लिए एक संपूर्ण आवास तंत्र विकसित किया गया। रामपुर ग्रासलैंड का वैज्ञानिक प्रबंधन, प्राकृतिक जल स्रोतों का जीर्णोद्धार और घास की स्थानीय प्रजातियों का संवर्धन वे मुख्य कारक हैं, जिन्होंने काले हिरणों को वहां फलने-फूलने के लिए प्रेरित किया। इसके अतिरिक्त, स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी ने मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व की एक अनूठी मिसाल पेश की है। काला हिरण (ब्लैकबक) भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला एक संकटग्रस्त मृग है। नर काले हिरण का रंग गहरा भूरा से काला होता है, उसके लंबे सर्पिलाकार सींग होते हैं और शरीर का निचला भाग सफेद होता है। मादा काले हिरण हल्के भूरे रंग की होती हैं और सामान्यतः उनके सींग नहीं होते। यह प्रजाति खुले घास के मैदानों में पाई जाती है और दिन के समय सक्रिय रहती है। इसका मुख्य आहार घास और छोटे पौधे होते हैं। इनकी ऊंचाई लगभग 74 से 84 सेंटीमीटर होती है। नर का वजन 20 से 57 किलोग्राम के बीच और मादाओं का 20 से 33 किलोग्राम तक होता है। नर काले हिरण की सर्पिलाकार सींगें, जो लगभग 75 सेंटीमीटर तक लंबी हो सकती हैं, इन्हें आसानी से पहचानने योग्य बनाती हैं।भविष्य की राह और राष्ट्रीय संदेश- बारनवापारा अभ्यारण्य में गूंजती काले हिरणों की चहल-कदमी और उनकी कुलाचें इस बात का जीवंत साक्ष्य हैं कि यदि इंसान प्रकृति के प्रति अपनी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी समझ ले, तो खोई हुई धरोहर को फिर से लौटाया जा सकता है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए एक 'लिविंग लैबोरेटरी' (जीवंत प्रयोगशाला) के रूप में कार्य करेगी, जहाँ वे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना सीख सकेंगी।मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय का मानना है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की 'मन की बात' ने हमारे नवाचारों को एक वैश्विक मंच प्रदान किया है। छत्तीसगढ़ सरकार पर्यावरण संवर्धन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जोड़कर एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर रही है, जहाँ मनुष्य और वन्यजीव दोनों सुरक्षित हों।आज जब हम बारनवापारा अभ्यारण्य की खुली वादियों में कुलाचें भरते काले हिरणों को देखते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति स्वयं मुस्कुराते हुए छत्तीसगढ़ के इस सराहनीय प्रयास को अपना आशीर्वाद दे रही है। यह छत्तीसगढ़ के गौरव का वह उत्कर्ष है, जिसकी चमक अब पूरे देश को प्रेरित कर रही है। - -डबल इंजन की रफ्तार, योजनाओं की बौछार- किसान, आदिवासी, महिला और युवा बने केंद्र में-(एल.डी.मानिकपुरी, सहायक जनसंपर्क अधिकारी, कोरिया)छत्तीसगढ़ में बीते लगभग ढाई वर्षों में शासन की कार्यशैली को लेकर एक नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश दिखाई देती है। विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने 'सुशासन' को केवल एक नारा नहीं, बल्कि जमीनी क्रियान्वयन का आधार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। सीमित समयावधि करीब 2 वर्ष 4 माह 17 दिन में ही सरकार ने विकास का जो खाका तैयार किया है, उसे भविष्य की बड़ी तस्वीर के रूप में देखा जा रहा है।प्रदेश की पहचान ‘धान का कटोरा’ के रूप में रही है, लेकिन इस पहचान को सम्मान देने का काम हालिया नीतिगत निर्णयों में स्पष्ट दिखता है। किसानों से प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी और 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर तय करना केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि अन्नदाताओं के आत्मविश्वास को मजबूत करने की पहल भी है। इसके साथ ही, तेंदूपत्ता संग्राहकों जिन्हें ‘हरा सोना’ से जुड़ा श्रमिक वर्ग कहा जाता है, के लिए पारिश्रमिक दर को 5500 रुपये करना और चरण पादुका वितरण जैसे निर्णयों ने आदिवासी क्षेत्रों में राहत पहुंचाई है।मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही लगभग 18 लाख प्रधानमंत्री आवासों की स्वीकृति देना सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। बेघर और जरूरतमंद परिवारों को छत उपलब्ध कराना सुशासन की पहली सीढ़ी के रूप में देखा गया।राज्य सरकार ने 70 लाख से अधिक विवाहित महिलाओं के खातों में प्रतिमाह 1000 रुपये की सहायता राशि देने की पहल की। यह राशि भले सीमित लगे, लेकिन ग्रामीण और जरूरतमंद परिवारों के लिए यह आर्थिक संबल का काम कर रही है। यह कदम महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक भागीदारी को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।लंबे समय तक नक्सलवाद से प्रभावित रहे बस्तर क्षेत्र में शांति स्थापित करने की दिशा में केंद्र और राज्य के संयुक्त प्रयासों ने असर दिखाया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री श्री अमित शाह की रणनीति और संकल्प के साथ 31 मार्च 2026 तक नक्सलमुक्ति का लक्ष्य एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। इससे विकास कार्यों को गति मिलने की उम्मीद बढ़ी है।विष्णु देव साय सरकार ने युवाओं के लिए पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 'छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग' से जुड़े मामलों में जांच कराना सरकार के जवाबदेही वाले दृष्टिकोण को दर्शाता है। साथ ही, खेल गतिविधियों विशेषकर बस्तर व सरगुजा ओलंपिक जैसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय प्रतिभाओं को मंच प्रदान किया गया है।विगत वर्ष आयोजित ‘सुशासन तिहार’ को इस वर्ष भी 1 मई से 10 जून तक आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य योजनाओं की जमीनी हकीकत को परखना, नागरिकों की समस्याओं का त्वरित समाधान करना और प्रशासन को सीधे जनता से जोड़ना है। श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और राज्य के समन्वय को 'डबल इंजन सरकार' के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। राज्य सरकार का मानना है कि इस समन्वय से विकास योजनाओं को गति मिली है और इसका लाभ प्रदेश के लगभग तीन करोड़ नागरिकों तक पहुंच रहा है।‘बगिया के विष्णु’ के रूप में पहचाने जाने वाले मुख्यमंत्री साय ने प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों ईब से इंद्रावती तक विकास का जो रोडमैप तैयार किया है, वह समावेशी विकास की अवधारणा को दर्शाता है। लक्ष्य स्पष्ट है, अंतिम छोर के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना।छत्तीसगढ़ में सुशासन की यह यात्रा अभी 'प्रारंभिक चरण' में है, लेकिन दिशा स्पष्ट दिखाई देती है। सरकार की प्राथमिकताओं में किसान, महिला, आदिवासी, युवा और ग्रामीण समाज केंद्र में हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये नीतियां किस तरह स्थायी बदलाव का रूप लेती हैं, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि विकास की यह कहानी गति पकड़ चुकी है।
- - धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक जनसंपर्करायपुर /आज के दौर में टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना समय की मांग है। रसायनों के बोझ तले दबती मिट्टी को राहत देने के लिए हरी खाद एक बेहतरीन समाधान बनकर उभरी है। यह न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन की उर्वरता को भी सुरक्षित रखती है। मिट्टी बचेगी, तो किसान बचेगा और किसान बचेगा, तो देश समृद्ध होगा।कृषि विभाग द्वारा किसानों को खेती में हरी खाद के उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और उत्पादन में सुधार लाने में मदद मिल सके। विभाग के अनुसार धान के खेतों में लगातार रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से मिट्टी में लाभदायक सूक्ष्म जीवों की गतिविधियां कम हो रही हैं और मिट्टी की संरचना भी प्रभावित हो रही है।हरी खाद वह सहायक फसल है जिसे मुख्य फसल बोने से पहले खेत में उगाया जाता है और फूल आने की अवस्था में ही उसे हल चलाकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग और उड़द जैसी फसलें हरी खाद के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। हरी खाद के तहत कई फसलों का उपयोग किया जाता है जिनमें दलहनी और बिना दलहनी फसलें शामिल होती हैं। हरी खाद के लिए झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियों, टहनियों को भी उपयोग में ला सकते हैं, लेकिन इसके लिए विशेष रूप से ढैंचा फसलों का उपयोग किया जाता है। इन फसलों को खेतों में लगाकर भूमि में सुधार किया जाता है।हरी खाद का सबसे बड़ा प्रभाव मिट्टी की भौतिक और रासायनिक संरचना पर पड़ता है। यह मिट्टी में नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थों (ह्यूमस) की मात्रा को तेजी से बढ़ाती है। हरी खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाती है, जिससे हवा का संचार बढ़ता है और पौधों की जड़ें गहराई तक जा पाती हैं। इसके उपयोग से मिट्टी की पानी सोखने की शक्ति बढ़ जाती है, जो सूखे के समय फसलों के लिए जीवन रक्षक साबित होती है।जब मिट्टी स्वस्थ होती है, तो उत्पादन का बढ़ना निश्चित है। हरी खाद के प्रयोग से पैदावार में 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है। यूरिया और अन्य रासायनिक खादों पर निर्भरता कम हो जाती है, जिससे किसान की फसल की लागत घटती है। मित्र कीटों से फसल का संरक्षण करता है। यह जमीन के भीतर लाभकारी सूक्ष्मजीवों और केंचुओं की संख्या बढ़ाने में मदद करती है।क्षेत्र की जलवायु के अनुसार सनई या ढैंचा का चुनाव करें। बुवाई का समय मानसून की शुरुआत (जून-जुलाई) इसके लिए सबसे उपयुक्त है। जब फसल लगभग 40-50 दिन की हो जाए और उसमें फूल आने लगें, तब उसे पाटा लगाकर या रोटावेटर की मदद से मिट्टी में मिला दें। पलटने के बाद 10-15 दिनों तक खेत में नमी बनाए रखें ताकि खाद अच्छी तरह सड़कर मिट्टी का हिस्सा बन जाए।हरी खाद केवल एक उर्वरक नहीं है, बल्कि यह मिट्टी का उपचार है। यदि किसान हर दूसरे या तीसरे साल अपने खेत में हरी खाद का प्रयोग करें, तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि हम समाज को रसायनों से मुक्त, शुद्ध और पौष्टिक अनाज भी उपलब्ध करा पाएंगे। हरी खाद का उपयोग कृषि के लिए एक ष्वरदानष् के समान है। वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है, ऐसे में हरी खाद (ळतममद डंदनतम) प्राकृतिक तरीके से मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सुलभ विकल्प है।कृषि विभाग द्वारा खरीफ फसल से पूर्व हरी खाद के बीज उपलब्ध कराने की भी पहल की जा रही है। इसके लिए क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से किसानों से मांग लेकर बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।
- -डॉ. दानेश्वरी संभाकर, उप संचालक (जनसंपर्क)रायपुर /देश का भविष्य जिन नन्हे कदमों से आगे बढ़ता है, वे आज आंगनबाड़ी केंद्रों में नई ऊर्जा, आत्मविश्वास और मुस्कान के साथ संवर रहे हैं। आंगनबाड़ी केंद्र कभी केवल पोषण और देखभाल तक सीमित माने जाते थे, वे अब प्रारंभिक शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक जागरूकता और ग्रामीण रोजगार के समन्वित मॉडल के रूप में विकसित हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ के जशपुर, सूरजपुर, रायगढ़, महासमुंद, धमतरी, मुंगेली और नारायणपुर जैसे जिलें में दिख रहा यह सकारात्मक बदलाव अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रेरणास्रोत बन रहा है।महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) और महिला एवं बाल विकास विभाग के समन्वय से निर्मित आधुनिक आंगनबाड़ी भवनों ने Building as Learning Aid (BALA) की अवधारणा को साकार रूप दिया है। लगभग 11.69 लाख रुपए की लागत से बने इन भवनों में दीवारों, फर्श, सीढ़ियों और खुले स्थानों को शिक्षण सामग्री के रूप में विकसित किया गया है।रंग-बिरंगी चित्रकारी के माध्यम से बच्चों को हिंदी-अंग्रेजी वर्णमाला, अंक, आकृतियाँ, दिशाएँ, जीव-जंतु और स्थानीय परिवेश की जानकारी सहजता से मिल रही है। अब हर दीवारें बोलती हैं, हर कोना सिखाता है आंगनबाड़ी स्वयं एक जीवंत पाठशाला बन गई है।धमतरी जिले में बाला मॉडल ने प्रारंभिक बाल शिक्षा को रोचक और प्रभावी बनाने की दिशा में उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। मनरेगा, आईसीडीएस और 15वें वित्त आयोग के सहयोग से 81 आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ, जिनमें से 51 पूर्ण हो चुके हैं।ग्राम उड़ेंना का केंद्र इस बदलाव की जीवंत तस्वीर है, जहाँ विशेष पिछड़ी जनजाति कमार वर्ग के बच्चे खेल-खेल में सीख रहे हैं। दीवारों पर स्थानीय संस्कृति, गणितीय अवधारणाएँ और भाषा चार्ट, फर्श पर रंग और आकार तथा सीढ़ियों पर गिनती जैसे नवाचार बच्चों में जिज्ञासा और सीखने की रुचि को बढ़ा रहे हैं।मनरेगा के तहत आंगनबाड़ी भवनों के निर्माण ने दोहरा लाभ दिया है। एक ओर गुणवत्तापूर्ण अधोसंरचना विकसित हुई है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण श्रमिकों को रोजगार के अवसर मिले हैं। इससे परिवारों की आय में वृद्धि हुई है और ग्रामीणों के पलायन में कमी आई है।इस प्रकार आंगनबाड़ी केवल बच्चों के विकास का केंद्र नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का माध्यम भी बन गया है।महासमुंद के शहरी क्षेत्रों से लेकर नारायणपुर के दूरस्थ वनांचल तक, आंगनबाड़ी केंद्रों में नया वातावरण साफ दिखाई देता है। आकर्षक दीवारें, शैक्षणिक चार्ट, कविताएँ और खेल सामग्री ने इन्हें आधुनिक प्ले-स्कूल जैसा रूप दे दिया है। बच्चे अब उत्साह के साथ केंद्र आते हैं और भाषा, गणित व व्यवहारिक ज्ञान को आनंदपूर्वक सीखते हैं।आंगनबाड़ी केंद्र अब बच्चों के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और किशोरियों के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र बन चुके हैं। यहाँ पोषण, पूरक पोषण आहार टीकाकरण, स्वास्थ्य परीक्षण और परामर्श सेवाएँ नियमित रूप से उपलब्ध कराई जा रही हैं। दीवारों पर लिखे संदेश “जितनी बेहतर वजन रेखा, उतना स्वस्थ बच्चा” और “लड़का-लड़की एक समान” सामाजिक परिवर्तन का संदेश भी दे रही हैं।आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना, मुख्यमंत्री बाल संदर्भ योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, नोनी सुरक्षा योजना और महतारी वंदन योजना जैसी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो रहा है। इससे माताओं और बालिकाओं को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा मिल रही है।आरओ जल, स्वच्छ रसोई, सुरक्षित खेलघर और नियमित साफ-सफाई ने केंद्रों को बाल-अनुकूल बनाया है। महतारी समितियों की सक्रिय भागीदारी से बच्चों की उपस्थिति और निरंतर सीखने की प्रवृत्ति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।आंगनबाड़ी केंद्रों का यह परिवर्तन राष्ट्रीय शिक्षा नीति और पोषण अभियान के लक्ष्यों को जमीनी स्तर पर साकार कर रहा है। 11.69 लाख रुपए की लागत से निर्मित प्रत्येक केंद्र अब बच्चों के सर्वांगीण विकास, महिलाओं के सशक्तिकरण और ग्रामीण रोजगार का समन्वित मॉडल बन चुका है। आज आंगनबाड़ी केंद्र वास्तव में “बच्चों की पहली पाठशाला” बन गए हैं, जहाँ शिक्षा, पोषण, सुरक्षा और रोजगार मिलकर एक सशक्त, समावेशी और विकसित भारत की नींव रख रहे हैं।
- -सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रभावी पहलविशेष लेख : डॉ. दानेश्वरी संभाकर, उप संचालक (जनसंपर्क)रायपुर। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान, सुरक्षा और समग्र कल्याण को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जा रही है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने वृद्धजनों के लिए एक मजबूत और संवेदनशील सामाजिक सुरक्षा तंत्र विकसित किया है, वहीं समाज कल्याण मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के मार्गदर्शन में विभागीय योजनाएँ प्रभावी रूप से धरातल पर क्रियान्वित हो रही हैं। इन प्रयासों से वरिष्ठ नागरिकों को आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से सशक्त बनाया जा रहा है।सरल प्रक्रिया, सहज लाभराज्य में वरिष्ठ नागरिकों को योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए किसी अलग “सीनियर सिटीजन कार्ड” की आवश्यकता नहीं है। आधार कार्ड एवं अन्य वैध दस्तावेजों के माध्यम से आयु और पात्रता का सत्यापन कर सीधे लाभ प्रदान किया जा रहा है, इससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, सरल और सुलभ बनी है।वृद्धाश्रम :- सम्मानजनक जीवन का आधारप्रदेश के राजधानी रायपुर सहित विभिन्न जिलों में संचालित 27 वृद्धाश्रम निराश्रित एवं असहाय वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षित आश्रय बनकर उभरे हैं। वर्तमान में यहां 675 वृद्धजन लाभान्वित हो रहे हैं। यहाँ निःशुल्क आवास, पौष्टिक भोजन, वस्त्र और अन्य आवश्यक सुविधाएँ नियमित रूप से उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर मिल रहा है।पैलिएटिव केयर (प्रशामक गृह) :- विशेष देखभाल की व्यवस्थागंभीर रूप से बीमार एवं बिस्तर पर आश्रित वृद्धजनों के लिए राज्य में 13 प्रशामक गृह संचालित हैं। वर्तमान में रायपुर, कबीरधाम, दुर्ग, बालोद, रायगढ़ एवं बेमेतरा में 140 वरिष्ठ नागरिक लाभान्वित हो रहे हैं। इन केंद्रों में निरंतर देखभाल, उपचार सहयोग और आवश्यक सेवाएँ प्रदान की जाती हैं, जिससे संवेदनशील स्थिति में भी उन्हें मानवीय और सम्मानजनक जीवन मिल सके।वृद्धावस्था पेंशन :- आर्थिक संबल का आधारसामाजिक सुरक्षा के तहत पात्र वृद्धजनों को नियमित पेंशन दी जा रही है। बीपीएल एवं एसईसीसी वंचन समूह के वृद्धजनों को 500 रुपए प्रतिमाह तथा 80 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों को 680 रुपए प्रतिमाह पेंशन प्रदान की जा रही है। यह सहायता उनके दैनिक जीवन में आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान को मजबूती देती है।सहायक उपकरण और तीर्थ यात्रा :- नई ऊर्जा का संचारवरिष्ठ नागरिक को सहायक उपकरण प्रदाय योजना के अंतर्गत राज्य शासन द्वारा गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के निराश्रित वृद्धजनों को उनकी आवश्यकता के अनुसार सहायक उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इस योजना के तहत चिकित्सकीय परामर्श के आधार पर अधिकतम 6900 रुपए तक के उपकरण जैसे व्हीलचेयर, वॉकर, बैसाखी, छड़ी, श्रवण यंत्र, चश्मा, ट्राइसाइकिल सहित अन्य आवश्यक सामग्री प्रदान की जाती है, जिससे उनका जीवन अधिक सहज बन सके।19 प्रमुख तीर्थ स्थलों की तीर्थ यात्रा योजना के माध्यम से उन्हें आध्यात्मिक और मानसिक संतुलन का अवसर मिल रहा है, जो उनके जीवन में नई ऊर्जा का संचार करता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में 14 यात्राओं के माध्यम से 10 हजार 694 हितग्राहियों को लाभान्वित किया गया है।समग्र कल्याण की दिशा में निरंतर प्रयासछत्तीसगढ़ शासन का लक्ष्य केवल सहायता प्रदान करना नहीं, बल्कि वरिष्ठ नागरिकों को समाज की मुख्यधारा में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना है। पेंशन, स्वास्थ्य देखभाल, आवास, सहायक सुविधाओं और सामाजिक जुड़ाव के माध्यम से राज्य अपने वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक सशक्त, संवेदनशील और समग्र सामाजिक सुरक्षा तंत्र स्थापित कर रहा है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में यह प्रयास आने वाले समय में और अधिक प्रभावी रूप से वृद्धजनों के जीवन को गरिमामय बनाने की दिशा में आगे बढ़ते रहेंगे।













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