राजनीति है एक अखाड़ा
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
राजनीति है एक अखाड़ा, आजा तू भी दाँव लगा ले।
चाटुकारिता की चटनी से, जीवन को स्वादिष्ट बना ले।।
अनपढ़ अँगूठा छाप चलेगा, जोड़-तोड़ में होशियार हो।
अहंकार मक्कारी भर-भर, शेर भीतर रँगा सियार हो।
गिरगिट जैसे रंग बदलकर, धोखेबाजी की कला दिखा ले।।
चाटुकारिता की चटनी से, जीवन को स्वादिष्ट बना ले।।
पड़े जरूरत तुरत गधे को, अपना वह बाप बना ले।
स्वार्थ-सिद्धि होती है जिसमें, झुककर एकाध लात खा ले ।
झिझक माँगने में हो कैसी, माँग-माँग कर काम बढ़ा ले।।
चाटुकारिता की चटनी से, जीवन का स्वाद बढ़ा ले।।
बिन पेंदी का लोटा बनकर, लुढ़के जिधर भी फायदा हो।
सांठगांठ रखता गुंडों से, बदतमीज बेकायदा हो।
बेशर्मी का लगा मुखौटा, सिक्कों में ईमान बिका ले।।
चाटुकारिता की चटनी खा, जीवन को स्वादिष्ट बना ले।।








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