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 विवाहित व्यक्ति तलाक लिए बिना लिव-इन संबंध में नहीं रह सकते : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

प्रयागराज. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि शादीशुदा महिला और पुरुष अपने पति या पत्नी के जीवित रहते हुए उनसे तलाक लिए बगैर किसी तीसरे व्यक्ति के साथ कानूनी रूप से सहजीवन (लिव इन) संबंध में नहीं रह सकते। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने कहा कि सक्षम अदालत से तलाक हासिल किए बिना न्यायालय लिव-इन संबंध में रहने वाले याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई रिट या निर्देश जारी नहीं कर सकता है। बहरहाल, अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता परेशान हैं या उन्हें किसी प्रकार की हिंसा की आशंका है तो वे एक विस्तृत प्रार्थना पत्र देकर संबंधित पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर सकते हैं और संबंधित अधिकारी प्रार्थना पत्र की विषय वस्तु की जांच कर याचिकाकर्ताओं के जीवन की सुरक्षा के लिए कानून के मुताबिक आवश्यक कार्रवाई करेगा। 
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने अंजू और उसके पुरुष साथी द्वारा दायर याचिका निस्तारित कर दी जिसमें प्रतिवादियों को उनके ''शांतिपूर्ण जीवन'' में दखल नहीं देने और सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि ''दोनों याचिकाकर्ता पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं और उन्हें अपनी जान का खतरा है।'' राज्य सरकार के स्थायी अधिवक्ता ने कहा कि दोनों याचिकाकर्ता किसी अन्य व्यक्तियों के साथ विवाहित हैं और इन याचिकाकर्ताओं का साथ रहना ''अवैध'' है क्योंकि इन्होंने अपने जीवन साथी से तलाक नहीं लिया है। इस पर अदालत ने कहा, ''ऐसी स्थिति में लिव-इन संबंध में होने का दावा करने वाले इन याचिकाकर्ताओं को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुए सुरक्षा नहीं दी जा सकती।'' अदालत ने 20 मार्च को दिए अपने निर्णय में कहा, "दो वयस्क व्यक्तियों की निजी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी को भी नहीं है और उनके माता पिता तक उनके संबंधों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। लेकिन, स्वतंत्रता का अधिकार या निजी स्वतंत्रता का अधिकार अपने आप में पूर्ण नहीं है, बल्कि इस पर कुछ पाबंदियां भी लागू होती हैं।" अदालत ने कहा, "एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहां खत्म हो जाती है जहां दूसरे व्यक्ति का संवैधानिक अधिकार प्रारंभ होता है। एक पति या पत्नी को अपने जीवन साथी के साथ रहने का कानूनी अधिकार है और निजी स्वतंत्रता के नाम पर उसे उसके इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।" अदालत ने कहा, "यह स्थापित कानून है कि कानून के उलट या दंडात्मक प्रावधान सहित एक कानूनी प्रावधान को विफल करने के लिए निर्देश जारी नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ताओं को कानूनी रूप से सुरक्षा पाने के लिए निर्देश जारी करने की मांग करने का अधिकार नहीं है।"
 

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