AI की मदद से 100 साल पुराने सूर्य रिकॉर्ड से स्पेस वेदर को समझने में मिले नए संकेत
नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से भारतीय वैज्ञानिकों ने 100 वर्षों पुराने सूर्य के हस्तनिर्मित रिकॉर्ड का विश्लेषण कर सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों (Solar Magnetic Activity) को समझने में बड़ी सफलता हासिल की है। इस अध्ययन में 1916 से 2007 तक के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया, जिससे यह पता लगाने में मदद मिली कि सूर्य पर मौजूद चुंबकीय रूप से सक्रिय चमकीले क्षेत्र (Plages) समय के साथ कैसे बदलते रहे।
यह अध्ययन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान (ARIES) के शोधकर्ता दिव्य कीर्ति मिश्रा के नेतृत्व में किया गया। इस शोध में भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (IIST), भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA) और अमेरिका के साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया।
शोधकर्ताओं ने कोडाइकनाल सोलर ऑब्जर्वेटरी (KoSO) में संरक्षित 1904 से 2022 तक के सूर्य के दैनिक हस्तनिर्मित चित्रों (Suncharts) का उपयोग किया। इन चित्रों में सूर्य पर दिखाई देने वाले सनस्पॉट, प्लेज, फिलामेंट और प्रोमिनेंस जैसी गतिविधियों को सावधानीपूर्वक दर्ज किया गया था।
हालांकि, हाथ से बने इन रिकॉर्डों में अलग-अलग ड्राइंग शैली, कागज की गुणवत्ता और स्कैनिंग की समस्याओं के कारण उनका विश्लेषण करना आसान नहीं था। इस चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने U-Net आधारित सुपरवाइज्ड मशीन लर्निंग मॉडल का उपयोग किया।
AI मॉडल ने दो चरणों में काम किया:
सबसे पहले प्रत्येक चित्र में सूर्य की डिस्क का केंद्र, आकार और झुकाव (Tilt) स्वतः पहचानकर सभी विशेषताओं की सही स्थिति निर्धारित की।
इसके बाद 1916 से 2007 तक फैले 9 सौर चक्रों के दौरान सूर्य पर मौजूद प्लेज (Plages) यानी चुंबकीय रूप से सक्रिय चमकीले क्षेत्रों की पहचान और ट्रैकिंग की गई।
‘बटरफ्लाई डायग्राम’ से समझे गए सौर चक्र
AI की मदद से तैयार किए गए आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने ‘बटरफ्लाई डायग्राम’ तैयार किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि समय के साथ सूर्य की चुंबकीय गतिविधियां किस प्रकार अलग-अलग अक्षांशों पर स्थानांतरित होती हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि हस्तनिर्मित चित्रों से प्राप्त प्लेज डेटा, KoSO के Ca II K फुल-डिस्क ऑब्जर्वेशन से प्राप्त आंकड़ों से काफी मेल खाता है। इससे यह साबित हुआ कि पुराने रिकॉर्ड आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य की दीर्घकालिक चुंबकीय गतिविधियों का सटीक रिकॉर्ड भविष्य में स्पेस वेदर (अंतरिक्ष मौसम) को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा।
सौर गतिविधियां उपग्रहों, जीपीएस, संचार प्रणाली और बिजली ग्रिड को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में 100 वर्षों के लगातार उपलब्ध आंकड़े भविष्य की अंतरिक्ष मौसम संबंधी भविष्यवाणियों को अधिक सटीक बनाने में सहायक होंगे।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह अध्ययन दर्शाता है कि मशीन लर्निंग की सहायता से दशकों पुराने और असंगत ऐतिहासिक रिकॉर्ड को भी विश्वसनीय वैज्ञानिक डेटा में बदला जा सकता है। इससे सूर्य के ऊर्जा उत्सर्जन, चुंबकीय प्रभाव और विभिन्न सौर चक्रों की तुलना करने में नई संभावनाएं खुलेंगी। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल (The Astrophysical Journal) में प्रकाशित हुआ है।







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