एससीईआरटी छत्तीसगढ़ द्वारा आयोजित बौद्धिक कार्यक्रम
“भारतीय ज्ञान परंपरा एवं मेरा लेखन” विषय पर विशेष व्याख्यान एवं चर्चा
रायपुर/ राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (SCERT), छत्तीसगढ़ द्वारा 29 मई 2026 को “भारतीय ज्ञान परंपरा एवं मेरा लेखन” विषय पर एक महत्वपूर्ण बौद्धिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि वक्ता के रूप में प्रख्यात कथाकार, लेखक, संपादक एवं साहित्यकार श्री बलराम प्रेमनारायण (श्री बलराम जी) उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में श्री बलराम कथाकार ,पत्रकार, आलोचक को 'डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी स्मृति लघुकथा सम्मान -2026' से नवाजा गया।
श्री जयप्रकाश मानस ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि प्रसिद्ध कथाकार एवं समीक्षक श्री बलराम प्रेमनारायण छत्तीसगढ़ एवं मध्य भारत के साहित्य जगत में अत्यंत सम्मानित व्यक्तित्व हैं। उन्होंने लघु कथा एवं कहानी विधा में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
श्री बलराम जी (प्रेम नारायण) ने ‘इंद्रावती’ नामक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ का संपादन किया है।
यह पुस्तक बस्तर (छत्तीसगढ़) के आदिम जन-जीवन पर केंद्रित एक गंभीर संदर्भ ग्रंथ है।
इसमें बस्तर की आदिवासी संस्कृति, उनकी जीवनशैली, परंपराएँ, संघर्ष, प्राकृतिक पर्यावरण और इंद्रावती नदी क्षेत्र (जो बस्तर की जीवन रेखा मानी जाती है) के सामाजिक-मानवीय यथार्थ को विस्तार से दस्तावेजीकृत किया गया है। उल्लेखनीय योगदान दिया है।
कार्यक्रम के प्रमुख आकर्षण एवं वक्ता:
श्री बलराम प्रेमनारायण — मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता-उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि, उसकी आधुनिक प्रासंगिकता तथा अपने साहित्य में इसकी भूमिका पर गहन चर्चा की।
इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार श्री जयप्रकाश मानस की रचनाओं का पुस्तकों का विमोचन किया गया, जिसमें उनकी दो लघु कथाएं 'बची हुई हवा' और 'दो कतार पीछे' पुस्तकों का विमोचन हुआ। साथ ही उनके पुस्तकों की समीक्षा भी की गई। अन्य प्रमुख वक्ता: श्री शशांक शर्मा, पद्मश्री डॉ. महेंद्र कुमार मिश्र, डॉ. सुशील त्रिवेदी, ,श्री प्रभात मिश्रा ,डॉ. चितरंजन , श्री सुभाष मिश्रा, श्री अरविंद मिश्रा अपने वक्तव्य दिए।
इस कार्यक्रम में प्रमुख रूप से श्री पद्मश्री श्री महेंद्र मिश्र, श्री शशांक शर्मा ,श्री प्रभात मिश्रा ,डॉ. चितरंजन कर , डॉ.बिहारी लाल साहू, डॉ. सुशील त्रिवेदी, डॉ .सुनील कुमार, डॉ.गिरीश पंकज, डॉ.श्री दिवाकर मुक्तिबोध , श्री सुभाष मिश्रा, डॉ संजय अलंग, श्री अरविंद मिश्रा, श्री सतीश जायसवाल ,श्री रामकुमार तिवारी, श्री राम पटवा, श्री लोक बाबू ,श्री विनोद मिश्रा ,शायर मुमताज, श्री ऋषि गजपाल, डॉ. रत्ना वर्मा, श्री सुधीर शर्मा, श्री महेंद्र कुमार ठाकुर, श्रीमती शकुंतला तरार ,डॉ.सीमा निगम,ममता अहार,उपस्थित हुए।
गरिमामयी कार्यक्रम में श्री जयप्रकाश 'मानस' की लघुकथा पर समीक्षा प्रस्तुत की गई,जिसमें डॉ. चितरंजन कर, पद्मश्री डॉ. महेंद्र मिश्र ,शोधार्थी श्रुति शर्मा ने समीक्षा प्रस्तुत की। डॉ. सुभाष मिश्रा, श्री प्रभात मिश्रा ने समीक्षा प्रस्तुत की ।एससीईआरटी से डॉ. जयभारती चंद्राकर ने लघुकथा संग्रह 'बची हुई हवा'की समीक्षा प्रस्तुत की । समस्त वक्तागणों ने अपने वक्तव्य दिए।
श्री जयप्रकाश मानस का लघुकथा विधा में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
वे सिर्फ़ कवि नहीं । सिर्फ़ निबंधकार भी नहीं और सिर्फ़ सभ्यता समीक्षक लेखक ही नहीं । उनकी लघुकथाएँ विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं (जैसे कथाक्रम, वर्तमान साहित्य, साहित्य अमृत, हंस, वागर्थ ) में प्रकाशित हुई हैं।हिंदी में एक से कम 1 हज़ार लघुकथाओं की श्रृंखला उनकी रचनात्मकता को चरितार्थ करती हैं । 'बची हुई हवा' यह आपकी प्रमुख लघुकथा कृति है। 2025 में प्रकाशित इस संग्रह में मानवीय अंतर्द्वंद्व, सामाजिक यथार्थ, प्रकृति-चेतना और अस्तित्व संबंधी गहन संवेदनाएँ प्रमुख हैं। उनकी कृति हिंदी लघुकथा की उस परंपरा का सशक्त विस्तार है जो संक्षिप्तता को हथियार बनाकर यथार्थ की सच्ची तस्वीर खींचती है।
इस कार्यक्रम में एससीईआरटी छत्तीसगढ़ के अकादमिक सदस्य श्री सुशील राठोर, डॉ सीमा श्रीवास्तव, डॉ अर्चना वर्मा, श्री डेकेश्वर वर्मा, श्रीमती पुष्पा चंद्रा, श्री हेमंत साव, श्री संतोष तंबोली, श्रीमती अग्रवाल, श्रीमती प्रीति सिंह,श्रीमती चंचल देवांगन , श्री नरेंद्र जांगड़े,श्रीमती तृप्ता जोशी, डॉ.अलका पंडा ,डाइट प्राचार्य डॉ.जे .के. अग्रवाल एवं स्टाफ और शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय की समस्त स्टाफ, शोधार्थी एवं छत्तीसगढ़ के साहित्यकार उपस्थित हुए। प्रकोष्ठ प्रभारी डॉ.एम. विजयलक्ष्मी द्वारा आभार प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में पुस्तक चर्चा, मुख्य व्याख्यान, सम्मान एवं संवाद के सत्र शामिल थे। यह कार्यक्रम एससीईआरटी छत्तीसगढ़ के YouTube चैनल पर लाइव प्रसारित किया गया।
एसीईआरटी छत्तीसगढ़ के अधिकारियों ने इस कार्यक्रम को छत्तीसगढ़ में भारतीय ज्ञान प्रणाली और साहित्य को जोड़ने का एक सार्थक प्रयास बताया।













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