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74 प्रतिशत से अधिक झीलें सिमटीं या सूखीं, गंभीर पारिस्थितिक संकट की चेतावनी

 जम्मू, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने जम्मू-कश्मीर में झीलों के तेजी से हो रहे क्षरण पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि केंद्र शासित प्रदेश की 697 प्राकृतिक झीलों में से 518 (74 प्रतिशत से अधिक) वर्ष 1967 के बाद या तो पूरी तरह समाप्त हो गई हैं या उनके आकार में कमी आई है। अधिकारियों ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक झीलों के तेजी से हो रहे इस क्षरण से पारिस्थितिक असंतुलन और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचा है। अधिकारियों ने बताया कि 31 मार्च 2024 को समाप्त वर्ष के लिए केंद्र शासित प्रदेश में झीलों के संरक्षण पर कैग की रिपोर्ट के अनुसार, कुल 28,990 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली 697 झीलों में से 315 झीलें (1,537.07 हेक्टेयर क्षेत्र) पूरी तरह समाप्त हो गई हैं, जबकि 203 झीलों का क्षेत्रफल 1,314.19 हेक्टेयर तक घट गया है। रिपोर्ट में कहा गया है, ''518 झीलों में कुल मिलाकर 2,851.26 हेक्टेयर क्षेत्र में कमी या समाप्ति दर्ज की गई है।'' कैग ने झीलों के प्रभावी संरक्षण और प्रबंधन के लिए ठोस, समयबद्ध और संरचित रणनीति अपनाने की जोरदार सिफारिश की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि झीलों के बड़े पैमाने पर सिकुड़ने से वनस्पति और जीव-जंतुओं की हानि, पारिस्थितिक तंत्र में व्यवधान और जल, खाद्य व जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इसमें यह भी कहा गया है कि झीलों के क्षेत्र में कमी से जलवायु को लेकर असुरक्षा की भावना बढ़ी है और यह सितंबर 2014 में जम्मू-कश्मीर में आई विनाशकारी बाढ़ के कारणों में से एक रही, क्योंकि झीलें प्राकृतिक रूप से बाढ़ को नियंत्रित करने का काम करती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के 20 जिलों में फैली 697 प्राकृतिक झीलों का पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक महत्व अत्यधिक है। इनमें पांच हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल वाली 185 प्रमुख झीलें शामिल हैं, जैसे कि वुलर झील, जो मीठे पानी की भारत की सबसे बड़ी झील है। इसके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण जलाशय भी हैं। कैग की रिपोर्ट में बताया गया कि 150 झीलों के क्षेत्रफल में 538.22 हेक्टेयर की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि 29 झीलों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। हालांकि, संबंधित विभाग इन झीलों के क्षेत्रफल बढ़ने के कारणों का विश्लेषण या निगरानी नहीं कर पाए। कैग ने झीलों के सूखने और क्षरण के लिए मुख्य रूप से झीलों तथा उनके जलग्रहण क्षेत्रों में भूमि उपयोग में बदलाव, वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन एवं अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया है।

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