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भारत-चीन में कोयला आधारित बिजली उत्पादन घटा, ग्रीन एनर्जी ने पकड़ी तेज रफ्तार

नई दिल्ली। साल 2025 में भारत और चीन दोनों में कोयले से बनने वाली बिजली में कमी दर्ज की गई है। यह पहली बार हुआ है जब 1970 के दशक के बाद एक ही साल में दोनों देशों में कोयले से बिजली उत्पादन घटा है। इसकी मुख्य वजह यह है कि दोनों देशों ने बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जल विद्युत जैसे गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की ओर रुख किया है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में यह बात कही गई है। 
 रिपोर्ट के आधार पर ब्रिटेन के अखबार इंडिपेंडेंट में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, पिछले साल चीन में कोयले से बिजली उत्पादन 1.6 प्रतिशत और भारत में 3 प्रतिशत कम हुआ। इसे एक ऐतिहासिक बदलाव बताया गया है, क्योंकि ऐसा 1970 के दशक की शुरुआत के बाद पहली बार हुआ है, जब दोनों देशों में एक ही वर्ष में कोयला बिजली उत्पादन में गिरावट आई है।
 इस बदलाव का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ा महत्व है, क्योंकि भारत और चीन मिलकर दुनिया की आधे से ज्यादा कोयले से बनने वाली बिजली का उत्पादन करते हैं। इसलिए इन दोनों देशों की ऊर्जा नीति में बदलाव का असर पूरी दुनिया के प्रदूषण स्तर पर पड़ता है। जलवायु न्यूज वेबसाइट कार्बन ब्रीफ द्वारा जारी की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वच्छ ऊर्जा के रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ने और कोयले से बिजली उत्पादन में गिरावट को भविष्य में होने वाले बड़े बदलावों का संकेत माना जा सकता है।
 रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने 300 गीगावाट सौर ऊर्जा और 100 गीगावाट पवन ऊर्जा जोड़ी, जो किसी भी देश के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। यह क्षमता ब्रिटेन की कुल मौजूदा बिजली उत्पादन क्षमता से पांच गुना से भी ज्यादा है।विश्लेषण के अनुसार, सौर और पवन ऊर्जा से बिजली उत्पादन में 450 टेरावाट घंटे की बढ़ोतरी हुई, जबकि परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन 35 टेरावाट घंटे बढ़ा।
 वहीं, भारत ने साल के पहले 11 महीनों में 35 गीगावाट सौर ऊर्जा, 6 गीगावाट पवन ऊर्जा और 3.5 गीगावाट जल विद्युत क्षमता जोड़ी। इस दौरान नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में सालाना आधार पर 44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ने से कोयला बिजली संयंत्रों को कम चलाना पड़ा। इससे आर्थिक विकास जारी रहने के बावजूद कोयले से बिजली उत्पादन में गिरावट आई। रिपोर्ट के अनुसार, यह पहली बार है, जब स्वच्छ ऊर्जा की बढ़त ने भारत में कोयले से बिजली उत्पादन को कम करने में अहम भूमिका निभाई है।
 रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर चीन में स्वच्छ ऊर्जा का यह विकास जारी रहता है, तो वहां कोयले से बिजली उत्पादन अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने के लिए पर्याप्त है। भारत में भी अगर तय किए गए स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य पूरे हो जाते हैं, तो 2030 से पहले ही कोयले से बिजली उत्पादन अपने चरम पर पहुंच सकता है, भले ही बिजली की मांग फिर से तेज हो जाए। हालांकि, अत्यधिक गर्मी एक बड़ी अनिश्चितता बनी हुई है।
 भीषण गर्मी के दौरान, खासकर शाम के समय जब सौर ऊर्जा कम हो जाती है, तब बिजली की अधिक मांग को पूरा करने के लिए अक्सर कोयला बिजली संयंत्रों का सहारा लिया जाता है। वहीं, ज्यादा तापमान से कोयला संयंत्रों की कार्यक्षमता भी घटती है और पानी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ता है।
 कोयले से बिजली उत्पादन में गिरावट के बावजूद, दोनों देशों ने नए कोयला बिजली संयंत्र लगाने का काम जारी रखा। चीन में ऊर्जा सुरक्षा और अधिकतम मांग को पूरा करने की चिंता के चलते नए कोयला संयंत्रों को मंजूरी दी जाती रही। भारत में भी औद्योगिक विकास और अत्यधिक गर्मी के समय बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए नए कोयला प्रोजेक्ट्स पर काम जारी रहा।
 इस कारण कोयला आधारित बिजली क्षमता और वास्तव में बनने वाली बिजली के बीच का अंतर बढ़ गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों देशों में कोयला बिजली संयंत्रों के चलने के घंटे प्रति वर्ष लगातार कम होते जा रहे हैं, जिससे लंबे समय में खर्च बढ़ने और निवेश की बर्बादी को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। 

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