आदिवासी ज्ञान और व्यवहार विज्ञान से संवरेगा किशोरों का भविष्य
-‘मूल मंथन’ में छत्तीसगढ़ मॉडल पर विमर्श
संस्कृति और समुदाय आधारित विकास रणनीति तैयार करने दो दिवसीय कार्यशाला
रायपुर। प्रदेश के आदिवासी अंचलों के बच्चों और किशोर-किशोरियों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सुरक्षित भविष्य के लिए समुदाय, संस्कृति और व्यवहार विज्ञान पर आधारित योजनाएं तैयार की जाएंगी। छत्तीसगढ़ शासन के आदिम जाति विकास विभाग और यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में आज राजधानी रायपुर में ‘मूल मंथन आदिवासी ज्ञान से किशोरावस्था की पुनर्कल्पना’ विषय पर दो दिवसीय क्षेत्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। कार्यशाला के पहले दिन विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और जनजातीय समुदाय के प्रतिनिधियों ने इस पर सहमति जताई कि स्थानीय संस्कृति और परंपरा बनाए रखते हुए सामुदायिक नेतृत्व को विकास की मुख्यधारा से जोड़कर ही स्थायी परिवर्तन संभव है।
शुभारंभ सत्र में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा कि जनजातीय समुदायों के साथ सम्मान, संवेदनशीलता और विश्वास के आधार पर जुड़ना ही किसी भी प्रभावी नीति की सफलता का मूल आधार है। उन्होंने कहा कि योजनाएं तभी सफल होंगी, जब उनका निर्माण समुदायों की वास्तविक आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को केंद्र में रखकर किया जाएगा।आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव श्री सोनमणि बोरा ने कार्यशाला को सम्बोधित करते हुए कहा कि बस्तर सहित जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा और बुनियादी सेवाओं की पहुंच लगातार बढ़ रही है। उन्होंने स्थानीय भाषाओं को व्यवहार परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि विकास का उद्देश्य जनजातीय संस्कृति को बदलना नहीं, बल्कि उसकी अंतर्निहित शक्ति को पहचानकर उसे समाज के हित में उपयोग करना है।
उन्होंने प्रदेश के जनजातियों को विकास की मूलधारा में लाने के लिए केंद्र और राज्य शासन द्वारा संचालित योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि दो दिवसीय इस मूलमंथन में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसी रिपोर्ट के आधार पर जनजातियों के विकास के लिए योजनाओं का संचालन तथा क्रियान्वयन की प्रक्रिया अपनायी जाएगी। छत्तीसगढ़ सरकार जनजातियों के विकास के लिए कृत संकल्पित है। उन्होंने सभी लोगों से जनजातियों के संरक्षण-संवर्धन के साथ विकास में सहभागी बनने की अपील की। प्रमुख सचिव श्री बोरा ने बताया कि छत्तीसगढ़ में 43 प्रकार के जनजातीय है इनकी विभिन्न उप जातियां भी हैं। राज्य की आबादी के 31 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या जनजातीय समुदाय की है। वहीं यदि हम भारतवर्ष की बात करे तो लगभग 10 करोड़ के आबादी जनजातियों की है। छत्तीसगढ़ शासन जनजातियों की समृद्ध विरासत कला, संस्कृति, परंपरा को सहेजते हुए उनके विकास के लिए निरंतर कार्य कर रही है। श्री बोरा बताया कि जनजातीय समाज मुख्य रूप से जल-जंगल, जमीन की बात करते हैं उनकी पूजा अराधना करते हैं, प्रकृति में ही लौकिक-और-अलौकिक शक्ति मानकर अपनी संस्कृति और परंपरा में उसे शामिल भी करते है। हालांकि आधुनिकता के दौर में संस्कृति और परंपराओं को बचाये रखना चुनौती है।
उन्होंने बताया कि पीएम जनमन योजना, धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान, एकलव्य विद्यालय के माध्यम से जनजातियों के मूलभूत सुविधाओं सहित उन क्षेत्रों का भी विकास किया जा रहा है। वहीं विद्यार्थियों को इंजीनियरिंग, नीट, प्रोफेसनल कोर्सेज सहित प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु सहयोग प्रदान कर विकास की गाथा भी लिखी जा रही है। इसके बाद भी इनके संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए भी कार्य किया जा रहा है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की पहल पर अखरा विकास योजना का शुभारंभ हुआ है। वहीं बैगा, गुनिया, मांझी चालकी और सिरहा को संस्कृति को बचाए रखने में उनके योगदान के लिए प्रोत्साहन राशि दिए जाने का प्रावधान है।राजधानी रायपुर में आयोजित इस परामर्श में राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधियों, विकास भागीदारों तथा युवा नेतृत्व ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य जनजातीय एवं विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के बच्चों और किशोरों के समग्र विकास के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यवहार परिवर्तन आधारित रणनीति तैयार करना है।दिनभर चले तकनीकी सत्रों में एनीमिया, कुपोषण, किशोर स्वास्थ्य, स्वच्छता, सुरक्षित किशोरावस्था, मानसिक स्वास्थ्य और सामुदायिक सहभागिता जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि स्थानीय नेतृत्व, सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त संवाद, व्यवहार विज्ञान आधारित हस्तक्षेप और विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों से ही दीर्घकालिक बदलाव संभव होगा।विशेष पैनल चर्चा में जनजातीय युवाओं, सामुदायिक प्रतिनिधियों और स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब समुदाय स्वयं परिवर्तन की प्रक्रिया का नेतृत्व करता है, तब स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सामाजिक विकास से जुड़े कार्यक्रम अधिक प्रभावी और टिकाऊ साबित होते हैं।
परामर्श में यह भी रेखांकित किया गया कि जनजातीय समाज की परंपराएं, सामाजिक मान्यताएं और पारंपरिक ज्ञान केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन के प्रभावी साधन भी हैं। ’’ह्यूमन-सेंटर्ड डिजाइन’’ और ’’बिहेवियरल इनसाइट्स’’ के माध्यम से समुदायों की सोच, जरूरतों और निर्णय प्रक्रिया को समझते हुए ऐसे समाधान विकसित किए जा सकते हैं, जिन्हें लोग सहजता से अपनाएं और जिनका दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे।
दो दिवसीय परामर्श के दूसरे दिन विषयगत समूहों की विस्तृत चर्चाओं के आधार पर राज्य के लिए व्यवहार परिवर्तन एवं सामुदायिक सहभागिता का एक व्यापक रोडमैप तैयार किया जाएगा। साथ ही आदिवासी किशोर कल्याण के लिए प्राथमिक व्यवहारों की पहचान, कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन और भविष्य की रणनीतियों पर आधारित महत्वपूर्ण अनुशंसाएं भी तैयार की जाएंगी।











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