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बाज की उड़ान और युवा चेतना का वैचारिक जीवन सूत्र

-डॉ. नीरज गजेंद्र
स्वामी विवेकानंद की जयंती भारतीय युवा चेतना को आत्मबल, विवेक और साहस की याद दिलाने का अवसर है। विवेकानंद का पूरा दर्शन इस मूल भाव पर टिका है कि मनुष्य कमजोर नहीं है, वह स्वयं में असीम शक्ति का स्रोत है। आज का युवा जब प्रतिस्पर्धा, आलोचना, असुरक्षा और निरंतर दबाव से घिरा हुआ है, तब विवेकानंद के विचार उसे भीतर से सशक्त बनाने का कार्य करते हैं। वे युवाओं को संघर्ष से भागने के बजाए साधना में बदलने की प्रेरणा देते हैं। धर्म के विषय में स्वामी विवेकानंद की दृष्टि अत्यंत स्पष्ट और आधुनिक रही है। उनके लिए धर्म किसी एक पंथ या कर्मकांड तक सीमित नहीं रहा। वह मनुष्य के चरित्र, साहस और आत्मविश्वास का निर्माण करने वाली शक्ति रहा है। वे कहते थे कि जो धर्म आपको निर्बल बनाता है, वह स्वीकार्य नहीं हो सकता। आज जब धर्म को लेकर शोर, आरोप-प्रत्यारोप और टकराव दिखाई देता है, तब स्वामी जी का संदेश युवाओं को यह सिखाता है कि सच्चा धर्म वह है जो भीतर दृढ़ता, करुणा और उद्देश्य पैदा करे।
इसी संदर्भ में एक प्रेरक दृष्टांत हमारे जीवन को गहराई से समझाता है। कहा जाता है कि बाज दुनिया का सबसे शक्तिशाली पक्षी होता है। उसकी दृष्टि तीक्ष्ण होती है और उड़ान ऊंचाइयों की ओर होती है। परंतु कई बार एक साधारण कौंआ उसकी पीठ पर बैठकर उसकी गरदन पर चोंच मारने लगता है। कौंआ बाज को परेशान करने की कोशिश करता है, उसे चुनौती देता है। आश्चर्य की बात यह है कि बाज न तो पलटकर कौंए पर हमला करता है, न ही उससे उलझता है। वह बस अपने पंख और फैलाता है और ऊपर की ओर उड़ान भरने लगता है। जैसे-जैसे वह ऊंचाई पर जाता है, हवा का दबाव बदलता है, सांस लेना कठिन हो जाता है और अंततः कौंआ स्वयं ही नीचे गिर जाता है, क्योंकि उस ऊंचाई पर टिके रहने की उसकी क्षमता ही नहीं होती। बाज कौंए को जवाब नहीं देता, क्योंकि वह जानता है कि अपनी ऊर्जा व्यर्थ करने से बेहतर है अपनी उड़ान पर ध्यान देना।
स्वामी विवेकानंद का जीवन और विचार इसी बाज की उड़ान जैसे हैं। उन्होंने युवाओं को सिखाया कि हर आलोचना का उत्तर देना आवश्यक नहीं, हर विरोध से उलझना बुद्धिमानी नहीं है। जीवन में ऐसे लोग, परिस्थितियां और व्यवस्थाएं मिलेंगी जो प्रतिभाशाली की प्रगति से असहज होंगी, उन्हें रोकने या नीचा दिखाने का प्रयास करेंगी। लेकिन प्रतिभाशाली अपनी ऊर्जा प्रतिक्रियाओं में खर्च कर देगा, तो वह अपनी ऊंचाई खो बैठेगा। विवेकानंद कहते थे कि ताकतवर बनो, निर्भीक बनो। अध्यात्म को उन्होंने पलायन नहीं, आत्मजागरण का मार्ग बताया है। उनके अनुसार अध्यात्म का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, संसार में रहते हुए स्वयं को पहचानना है। आधुनिक जीवन में जब युवा मानसिक तनाव, असमंजस और उद्देश्यहीनता से जूझ रहा है, तब अध्यात्म उसे भीतर स्थिरता देता है। आज जिसे हम आत्मविश्वास, फोकस और मानसिक स्वास्थ्य कहते हैं, वही विवेकानंद के अध्यात्म का आधुनिक रूप है।
आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन विवेकानंद की विशेषता थी। उन्होंने पश्चिम की वैज्ञानिक सोच, संगठन और कर्मठता की प्रशंसा की, लेकिन उन्होंने भारत की आत्मा और आध्यात्मिक दृष्टि को नहीं छोड़ा। आज का युवा तकनीक, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ रहा है, पर यदि उसके पास आंतरिक अनुशासन और मूल्य नहीं होंगे, तो सफलता भी उसे संतोष नहीं दे पाएगी। विवेकानंद का संदेश है ऊंचा सोचो, बड़ा करो, लेकिन भीतर से खोखले मत बनो।
बाज और कौंए की कथा आज के सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन का प्रतीक है। हर प्रतिभाशाली युवा के आसपास ऐसे लोग होंगे जो उसकी उड़ान से चिढ़ेंगे, उसे व्यर्थ विवादों में उलझाना चाहेंगे। पर विवेकानंद का युवा वही है जो अपनी दिशा नहीं छोड़ता, जो ऊंचाई चुनता है। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता है, नकारात्मकता स्वयं छूटती चली जाती है। आशय कि हमें अपनी ऊर्जा जवाब देने में नहीं, उड़ान भरने में लगानी चाहिए। आलोचनाओं से नहीं, कर्म से उत्तर देना चाहिए। और यह भी याद रखना चाहिए कि जिस ऊंचाई पर आपको पहुंचना है, वहां हर कोई साथ नहीं चल सकता। यही जीवन का सत्य है, यही स्वामी विवेकानंद का अमर संदेश।
(लेखक हिंदी पत्रकारिता के वरिष्ठ हस्ताक्षर, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक और विचारोत्तेजक लेखन के वैचारिक स्तंभकार हैं।)

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