कोविड के बाद शिक्षकों को प्रशिक्षित करने, मिश्रित व्यवस्था को कुशल बनाने की जरूरत: शिक्षाविद
कोलकाता. नामी शिक्षाविदों और विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षकों को नए पठन-पठन के तरीकों का अधिक से अधिक लाभ उठाने के लिए प्रशिक्षित किया जाना और डिजिटल एवं कक्षा में पढ़ाई का एक विवेकपूर्ण मिश्रण, कोविड-19 के बाद के दौर में शिक्षा के भविष्य को आकार देगा। हालांकि, उन्होंने कहा कि शिक्षा पर प्रौद्योगिकी के प्रभाव का आकलन किया जाना बाकी है कि यह एक क्रांति साबित होगी या पूरी तरह से विफल। ब्रिटिश काउंसिल (पूर्व और पूर्वोत्तर) के निदेशक डॉ. देवांजन चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘महामारी के कारण शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को सबसे आगे लाया गया, हालांकि शिक्षा पर डिजिटलीकरण की छाप दिखना अभी बाकी है...डिजिटल तरीके से पठन-पाठन का कौशल अभी भी कमजोर है।'' ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था को दुनिया भर में प्रमुखता मिली, क्योंकि महामारी और बार-बार होने वाले लॉकडाउन ने 2020 और 2021 के लिए प्रत्यक्ष कक्षाओं को लगभग बेमानी बना दिया। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा हाल में आयोजित ‘एजुकेशन ईस्ट समिट' में शिक्षकों ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान धीरे-धीरे धीरे-धीरे फिर से खुलने लगे हैं, ऐसे में छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों को एक महत्वपूर्ण सवाल का सामना करना पड़ रहा है कि कोविड के बाद के परिदृश्य में शिक्षा कैसे आकार लेगी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के पूर्व प्रोफेसर और पद्म श्री से सम्मानित अजय कुमार रे ने कहा, ‘‘कोविड के आने के बाद से ऑनलाइन और ऑफलाइन मिलीजुली व्यवस्था में समस्याएं आई हैं...लेकिन शिक्षकों को कुछ प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए फिर से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।'' उन्होंने कहा, ‘‘महामारी के बाद सबसे अधिक विश्लेषणात्मक सोच बनाने और ढर्रे से हटकर सोच को प्रोत्साहित करने की जरूरत है ताकि हमारे छात्र अपने आस-पास हो रहे परिवर्तनों के अनुकूल होने के लिए कुशल बनें।'' शिक्षायतन फाउंडेशन की महासचिव ब्रताती भट्टाचार्य के अनुसार, महामारी के बाद हर स्तर पर संकाय प्रशिक्षण आवश्यक हो गया है। उन्होंने कहा, ‘‘ऑनलाइन पठन-पाठन व्यवस्था के आगमन के साथ, छात्रों का ध्यान कम हो रहा है और शिक्षकों को सीमित समय अवधि के दौरान उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए शैक्षणिक सामग्री को आकर्षक बनाने के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता है। छात्रों के बीच विचारात्मक क्षमता विकसित करना शिक्षकों के लिए एक और चुनौती है।'' शिक्षा के भविष्य पर यूनेस्को के अंतरराष्ट्रीय आयोग की एक हालिया रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि डिजिटल तकनीक जो दूर तक संचार, सहयोग और पठन की व्यवस्था को सक्षम बनाती है, वह सारी चीजों का समाधान नहीं बल्कि नवाचार और विस्तारित क्षमता का एक कठिन उपकरण है। कोविड-19 के बाद के दौर में शिक्षा को लेकर इस रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘यह सोचना एक भ्रम है कि ऑनलाइन शिक्षा सभी के लिए आगे बढ़ने का रास्ता है...आज यह स्पष्ट है कि शिक्षकों की भागीदारी को कोई भी विकल्प नहीं बना सकता है, जिसका कार्य तैयार प्रौद्योगिकियों या पूर्व-तैयार पाठों को लागू करना नहीं बल्कि ज्ञान प्रवर्तक और शैक्षणिक मार्गदर्शक के रूप में अपनी भूमिका को निभाना है।
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