कैसे हुई एनेस्थीसिया की खोज?
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी मरीज का ऑपरेशन हो और उसे एनेस्थीसिया न दिया जाए, तो दर्द कितना डरावना हो सकता है? शायद इस बात की कल्पना करना भी मुश्किल है, लेकिन एक दौर था जब एनेस्थीसिया के बगैर ही ऑपरेशन किए जाते थे और मरीज दर्द से तड़पते थे। पुराने समय में दर्द को कम करने के लिए शराब, अफीम, भांग और कुछ जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन इनका असर सीमित और अनिश्चित था। बड़ी सर्जरी में ये उपाय असरदार नहीं थे। यूरोप में साल 1200 से 1500 के बीच नशीले पदार्थों में भिगोए स्पंज से मरीज को बेहोशी जैसी अवस्था में लाने की कोशिश की जाती थी। हालांकि, इस तकनीक का असर सीमित समय तक रहता था और बड़ी एवं जटिल सर्जरी में मरीज को दर्द महसूस होता था, फिर पहली बार साल 1774 में लाफिंग गैस के नाम से मशहूर नाइट्रिक ऑक्साइड का इस्तेमाल एनेस्थीसिया के लिए किया गया।
एनेस्थीसिया का मतलब क्या है?
शब्दकोश में एनेस्थीसिया का मतलब होता है कोई भी सेंस न रहना या होश न रहना। यानी किसी भी मेडिकल प्रक्रिया या सर्जिकल ऑपरेशन के दौरान मरीज को दर्द न महसूस हो, इसके लिए ही एनेस्थीसिया का इस्तेमाल किया जाता है। एनेस्थीसिया का इतिहास बहुत पुराना है। पहली सदी में जिक्र मिलता है मेडा गोरा प्लांट के बारे में जो अपने स्लीपिंग इफेक्ट्स के कारण चर्चित हुआ। इसके बाद वैज्ञानिक ओलिवर वेंडेल होम्स ने एनेस्थीसिया शब्द का पहली बार प्रयोग किया।
दांत दर्द को कम करने के लिए हुआ लाफिंग गैस का इस्तेमाल
लाफिंग गैस या नाइट्रिक ऑक्साइड, साल 1774 में प्रचलित हुई। इसके असर से व्यक्ति काफी देर तक हंसता रहता है। दांत के दर्द को कम करने के लिए लाफिंग गैस पर शोध किया गया। साल 1845 में इनेमल एक्सट्रैक्शन के लिए नाइट्रिक ऑक्साइड का इस्तेमाल किया गया जो कि असफल रहा।
16 अक्टूबर को क्यों मनाया जाता है वर्ल्ड एनेस्थीसिया डे?
एक सब्सटेंस जिसे दर्द कम करने के लिए इस्तेमाल किया गया उसका नाम ईथर (Ether) था। इसे साल 1540 में खोजा गया था। 16 अक्टूबर 1846 में को एनेस्थीसिया के लिए ईथर का प्रैक्टिकल इस्तेमाल प्रूफ किया गया। इसलिए 16 अक्टूबर को विश्व भर में वर्ल्ड एनेस्थीसिया डे (World Anaesthesia Day) मनाया जाता है।
क्लोरोफॉर्म को एनेस्थीसिया के लिए लोकप्रिय किया
क्लोरोफॉर्म का इस्तेमाल 19वीं सदी में ऑपरेशन के दौरान दर्द कम करने के लिए तेजी से बढ़ा। जेम्स यंग सिम्पसन ने साल 1847 में प्रसव के दौरान क्लोरोफॉर्म के इस्तेमाल को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई।
क्वीन विक्टोरिया ने क्लोरोफॉर्म से डिलीवरी कराई
साल 1853 में ब्रिटेन की क्वीन विक्टोरिया ने अपने आठवें बच्चे, प्रिंस लियोपोल्ड के जन्म के दौरान क्लोरोफॉर्म का इस्तेमाल कराया। इसके बाद प्रसव के दौरान दर्द कम करने के लिए क्लोरोफॉर्म को लेकर लोगों का भरोसा बढ़ा।
इनहेल करके एनेस्थीसिया देने का दौर
एनेस्थीसिया के शुरुआती दौर में ईथर, क्लोरोफॉर्म और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी दवाएं मुख्य रूप से सांस के जरिए दी जाती थीं। मरीज इन दवाओं की गैस को सांस के साथ अंदर लेते थे। बाद में नस के जरिए दवा देने की तकनीक विकसित हुई, जिससे एनेस्थीसिया देना और उसकी मात्रा को कंट्रोल करना ज्यादा आसान बन गया।
साल 1934 में नस के जरिए एनेस्थीसिया की खोज हुई
साल 1934 के आसपास थियोपेंटोन (Thiopentone) के विकास ने बड़ा बदलाव किया। इसे नस के जरिए देने पर मरीज तेजी से बेहोशी की अवस्था में जा सकता था। इससे एनेस्थीसिया देने के लिए केवल गैस पर निर्भरता कम हुई।
आंख की सर्जरी में कोकेन का इस्तेमाल और लोकल एनेस्थीसिया
साल 1884 में कार्ल कोलर ने आंख की सर्जरी में कोकेन का इस्तेमाल करके लोकल एनेस्थीसिया को लोकप्रिय बनाया। हर ऑपरेशन में मरीज को पूरी तरह बेहोश करना जरूरी नहीं होता। छोटे या शरीर के किसी खास हिस्से में किए जाने वाले ऑपरेशन के लिए लोकल का इस्तेमाल प्रचलित हुआ। बाद में कोकेन की जगह अधिक सुरक्षित एनेस्थीसिया के ड्रग ने ले ली। साल 1898 में स्पाइनल एनेस्थीसिया और एपिड्यूरल एनेस्थीसिया का दौर शुरू हुआ जिसमें रीढ़ की हड्डी और एपिड्यूरल स्पेस में इंजेक्शन देकर लोअर बॉडी को नंब किया जाने लगा।
मसल को रिलैक्स करने वाले ड्रग का इजात हुआ
सर्जरी के दौरान केवल दर्द कम करना काफी नहीं होता। सर्जरी में मसल्स को रिलैक्स करना जरूरी होता है। इसके लिए साल 1942 में मसल रिलैक्सेंट का इस्तेमाल हुआ।
विंडपाइप के जरिए एनेस्थीसिया
विंडपाइप में ट्यूब डालकर एनेस्थीसिया देने की तकनीक का विकास 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में हुआ। 1878 में ब्रिटिश सर्जन ने बच्चों में डिप्थीरिया के दौरान सांस की नली को खुला रखने के लिए ट्यूब का इस्तेमाल किया। इसके बाद इस तकनीक को सर्जरी और एनेस्थीसिया में विकसित किया गया।
साल 1917 में बॉइल एनेस्थीसिया मशीन का इस्तेमाल हुआ
साल 1917 में हेनरी बॉयल ने बॉइल एनेस्थीसिया मशीन विकसित की। इस मशीन से एनेस्थीसिया के लिए इस्तेमाल होने वाली गैस और ऑक्सीजन को कंट्रोल तरीके से मरीज तक पहुंचाना संभव हुआ।
साल 2000 में अल्ट्रासाउंड से नसों को सुन्न करने की तकनीक
साल 2000 से 2005 के बीच अल्ट्रासाउंड तकनीक के बेहतर होने से डॉक्टर शरीर की नसों को स्क्रीन पर देखकर उनके आसपास सुन्न करने वाली दवा देने लगे। इस तकनीक में लोकल एनेस्थीसिया की दवा को नस के आसपास सावधानी से पहुंचाया जाता है। इससे शरीर के सिर्फ उस हिस्से को सुन्न करना संभव हुआ, जहां सर्जरी की जानी होती है।
AI आने के बाद जल्दी रिकवरी पर जोर
मौजूदा समय में नए एनेस्थेटिक ड्रग्स का असर जल्दी शुरू और खत्म किया जा सकता है, जिससे मरीज को ऑपरेशन के बाद जल्दी होश आने और रिकवरी में मदद मिलती है। वैज्ञानिक अब AI और स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम को विकसित कर रहे हैं। इससे मरीज की जल्दी रिकवरी पर जोर दिया जाएगा। आज के समय में एनेस्थीसिया टीम का लक्ष्य सिर्फ ऑपरेशन के दौरान मरीज को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि कम दर्द और फास्ट रिकवरी कराना भी है।








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