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- अक्षय तृतीया का पावन पर्व इस साल 19 अप्रैल को मनाया जाएगा. हिंदू धर्म में वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व बताया गया है. ‘अक्षय’ शब्द का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, यानी जो कभी समाप्त न हो. माना जाता है कि इस दिन किए गए दान, जप और तप का फल अनंत काल तक बना रहता है. यह दिन नई शुरुआत करने और जीवन में सुख-शांति लाने के लिए सबसे उत्तम माना जाता है.शास्त्रों के अनुसार इसी दिन सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ हुआ था, जो इस तिथि को और भी पावन बनाता है. इस विशेष अवसर पर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा करने से घर में खुशहाली आती है और मानसिक शांति मिलती है.अक्षय तृतीया का आध्यात्मिक अर्थ और मान्यताएंअक्षय तृतीया का दिन इतिहास और पुराणों की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी है. हिंदू मान्यता के अनुसार, इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का जन्म हुआ था. इसे ‘युगादि तिथि’ भी कहा जाता है क्योंकि माना जाता है कि इसी दिन से त्रेता युग की शुरुआत हुई थी.धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन महर्षि वेदव्यास ने महाभारत सुनानी शुरू की थी और भगवान गणेश ने उसे लिखना आरंभ किया था. इस तिथि का संबंध श्रीकृष्ण से भी है उन्होंने इसी दिन पांडवों को ‘अक्षय पात्र’ भेंट किया था और सुदामा की निर्धनता भी इसी दिन दूर की थी. ये सभी कथाएं हमें सिखाती हैं कि सच्ची भक्ति और अच्छे कर्मों से जीवन में कभी न समाप्त होने वाले सुख की प्राप्ति होती है.अनंत फल पाने के लिए इस दिन क्या करें?इस पावन दिन पर किए गए कुछ विशेष कार्य जीवन को सुखद बनाने में मदद करते हैं. अक्षय तृतीया पर दान का सबसे अधिक महत्व है. गर्मी के समय में जल, गुड़, सत्तू या पंखे का दान करना बहुत अच्छा माना जाता है. भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा में पीले फूलों और तुलसी दल का उपयोग करना चाहिए, जिससे घर में सकारात्मकता बढ़ती है. सोने या चांदी की वस्तु खरीदना भी शुभ माना जाता है, लेकिन अगर यह संभव न हो, तो केवल मिट्टी का एक घड़ा खरीदना भी सौभाग्य लाने वाला होता है. अपनी मधुर वाणी से दूसरों का सम्मान करें और कड़वी बातों से पूरी तरह दूर रहें. यह सादगी भरा व्यवहार ही हमें असल में मानसिक सुकून की ओर ले जाता है.सात्विक जीवन और सुखद भविष्य के लिए नेक संकल्पअक्षय तृतीया का पर्व हमें यह समझाता है कि असली संपत्ति हमारे अच्छे विचार और पुण्य कर्म हैं. इस दिन किसी की बुराई करने या मन में गलत ख्याल लाने से बचना चाहिए ताकि हमारे पुण्य का नाश न हो. सात्विक भोजन ग्रहण करने और भगवान के नाम का जाप करने से मानसिक तनाव दूर होता है और काम करने की नई शक्ति मिलती है. अपनी मेहनत पर भरोसा रखना और जरूरतमंदों की सेवा करना ही हमें एक बेहतर इंसान बनाता है. जब हम पवित्र भाव से इस दिन का स्वागत करते हैं, तो हमारे सभी काम बनने लगते हैं और घर में सुख का वास होता है. यह दिन आत्म-चिंतन करने और अपने जीवन को सही दिशा देने के लिए सबसे शुभ है.
- अक्षय तृतीया को 19 अप्रैल को मनाया जाएगा. इस साल की अक्षय तृतीया एक दुर्लभ खगोलीय संयोग के कारण विशेष महत्व रखती है. ज्योतिष के अनुसार, इस दिन सूर्य अपनी उच्च राशि मेष में और चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में विराजमान रहेंगे. यह विशेष स्थिति एक शक्तिशाली ‘अक्षय योग’ का निर्माण कर रही है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अक्षय योग में शुरू किए गए किसी भी कार्य का फल कभी समाप्त नहीं होता. 2026 के इस विशेष दिन पर ग्रहों की वापसी चार राशियों के जातकों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लाएगी. राजसी सुख के साथ-साथ आपकी जेबें धन से भरी रहेंगी.आइए जानते हैं कि मेष, वृषभ, सिंह और वृश्चिक राशि के लोगों क्या फायदा पहुंचने वाला है.मेष राशिअक्षय योग के प्रभाव से मेष राशि के जातकों का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ेगा. आपके साहस और कार्यक्षेत्र में निपुणता से उच्च अधिकारियों का ध्यान आकर्षित होगा, जिससे पदोन्नति की प्रबल संभावना है. इतना ही नहीं, इस दौरान आपकी आय में भी वृद्धि होगी. ज्योतिष के अनुसार, व्यापारियों को नए निवेशों से बड़ा लाभ प्राप्त हो सकता है.वृषभ राशिचूंकि इस राशि का स्वामी चंद्रमा है इसलिए अक्षय तृतीया आपके लिए शुभ है. जमीन या घर खरीदने जैसे आपके लंबे समय से संजोए सपने पूरे हो सकते हैं. पारिवारिक विवाद सुलझेंगे और मन को शांति मिलेगी. भाग्य का पहिया इतना अनुकूल रहेगा कि आप किसी भी नए उद्यम में अद्भुत सफलता प्राप्त करेंगे.सिंह राशिसिंह राशि के जातकों के लिए आज का दिन शुभ रहने वाला है. सरकारी कामकाज या लंबित कानूनी मामलों का तुरंत समाधान हो जाएगा. बड़े व्यापारिक सौदे करने का यह सबसे अच्छा समय है. समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा बढ़ने की प्रबल संभावना है.वृश्चिक राशिवृश्चिक राशि के जातकों को आर्थिक उन्नति के मामले में सबसे अधिक लाभ हो सकता है. पैतृक संपत्ति से बड़ी धनराशि प्राप्त होने की संभावना है. नौकरी की तलाश करने वालों के लिए उत्कृष्ट अवसर मिलेंगे. इस योग के प्रभाव से विदेश यात्रा की आपकी इच्छा भी पूरी हो सकती है.-----
- अक्षय तृतीया पर बद्रीनाथ, काशी विश्वनाथ, जगन्नाथ पुरी, केदारनाथ और महालक्ष्मी मंदिर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों पर पूजा करना बेहद शुभ माना जाता है।अक्षय तृतीया हिंदू धर्म का एक बेहद शुभ पर्व माना जाता है, जिसे सुख-समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य कभी खत्म नहीं होता और उसका फल जीवनभर मिलता रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन सोना खरीदने, दान करने और खासतौर पर मंदिरों में पूजा करने को बेहद शुभ मानते हैं।भारत में ऐसे कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां अक्षय तृतीया के दिन विशेष पूजा और दर्शन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन इन धार्मिक स्थलों पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।अगर आप भी इस अक्षय तृतीया को खास बनाना चाहते हैं, तो इस लेख में हम आपको भारत के कुछ प्रमुख मंदिरों के बारे में बताएंगे, जहां पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति मानी जाती है। साथ ही यह एक शानदार ट्रैवल एक्सपीरियंस भी बन सकता है। अक्षय तृतीया पर इन मंदिरों की यात्रा न सिर्फ धार्मिक आस्था को मजबूत करती है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक अनुभव भी देती है। यह यात्रा मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।श्री बद्रीनाथ मंदिरअक्षय तृतीया के दिन बद्रीनाथ मंदिर के कपाट खुलते हैं, जो इसे बेहद खास बना देता है। इस दिन यहां दर्शन करना अत्यंत शुभ माना जाता है और हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।काशी विश्वनाथ मंदिरवाराणसी में स्थित यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। अक्षय तृतीया पर यहां पूजा करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है।श्री जगन्नाथ मंदिरपुरी का जगन्नाथ मंदिर इस दिन विशेष अनुष्ठानों के लिए प्रसिद्ध है। यहां दर्शन करने से मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है।केदारनाथ मंदिरहालांकि केदारनाथ के कपाट अलग तिथि पर खुलते हैं, लेकिन अक्षय तृतीया के आसपास इसकी यात्रा की शुरुआत करना बेहद शुभ माना जाता है--
- फेंगशुई को चीनी वास्तु शास्त्र भी कहा जाता है। इसमें भी वास्तु शास्त्र की तरह जीवन को सुखमय बनाने के नियम बताए गए हैं। अगर घर में पारिवारिक विवाद खत्म नहीं हो रहा है, तो आप इससे छुटकारा पाने के लिए कुछ फेंगशुई टिप्स अपना सकते हैं। मान्यता है कि अगर आप अपने घर में फेंगशुई के नियमों का ध्यान रखते हैं, तो इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। आज हम आपको घर से नेगेटिविटी दूर करने के कुछ फेंगशुई टिप्स बताने जा रहे हैं।मुख्य द्वार का ख्यालफेंगशुई में घर के मुख्य द्वार को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि मुख्य द्वार से ही घर में ऊर्जाएं प्रवेश होती है। अगर आप चाहते हैं कि घर में पॉजिटिव एनर्जी जाए, तो दरवाजे को हमेशा साफ रखें।इन बातों का रखें ध्यानइस बात का भी ध्यान रखें कि आपका मुख्य द्वार जर्जर हालात में नहीं होना चाहिए और न ही मेन गेट पर नेम प्लेट टूटी हुई होनी चाहिए। मुख्य द्वार पर फालतू का सामान रखने से भी बचना चाहिए। इससे आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है, जिससे लड़ाई-झगड़े की स्थिति में आपको लाभ देखने को मिल सकता है।कछुए की मूर्तिघर में बिना वजह के लड़ाई-झगड़ा होता है, तो आप फेंगशुई में बताए गए ये उपाय कर सकते हैं। आपको घर में कछुए की मूर्ति रखने से फायदा मिल सकता है। फेंगशुई के अनुसार, कछुए को सही स्थान और सही प्रकार रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है। पौराणिक ग्रंथों और हिंदू धर्म में कछुए को सुख-समृद्धि देने वाला माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, विष्णुजी ने स्वयं कच्छप अवतार लिया था। साथ ही, कछुए को शांत जीव माना जाता है।फेंगशुई कछुआ रखने के नियममान्यता है कि उत्तर दिशा माता लक्ष्मी की होती है। ऐसे में कछुए को अपने घर में उत्तर दिशा में ही रखना चाहिए। मान्यता है कि उत्तर दिशा में कछुआ रखने से शत्रुओं का भी नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।कपूर के उपायों से लाभफेंगशुई के मुताबिक घर में कपूर जलाने से भी सकारात्मकता बढ़ती है। साथ ही घर में खुशबूदार चीजें जैसे मोमबत्तियां, फूलदान व क्रिस्टल बॉल आद भी रख सकते हैं, जिससे माहौल में शांति बनी रहती है।कौन सा प्लांट लगाएंइसके साथ ही फेंगशुई में माना गया है कि मनी प्लांट, जेड प्लांट और बैम्बू ट्री को घर में रखने से नकारात्मकता दूर होती है। फेंगशुई में माना गया है कि आपके घर में यदि घर में टपकता हुआ पानी, टूटी घड़ी, बर्तन, आइना, खराब पड़े जूते या फिर इलेक्ट्रॉनिक सामान आदि रखा हुआ है, तो इससे नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है। ऐसे में इन चीजों को या तो तुरंत ठीक करवा लेना चाहिए या फिर हटा देना चाहिए।
- वास्तु शास्त्र की ही तरह फेंगशुई चीन की प्राचीन विद्या है, जो घर में ऊर्जा (Chi) के संतुलन को बनाए रखने पर जोर देती है.कहा जाता है कि हमारे घर में रखी हर एक चीज घर के माहौल और परिवार के मनोबल पर गहरा असर डालती है. अगर घर में अशांति, लड़ाई-झगड़ा या नकारात्मक ऊर्जा बढ़ रही है, तो इसका एक कारण गलत या खराब चीजें घर में रखना भी हो सकता है. इसलिए, फेंगशुई के अनुसार कुछ ऐसी चीजें हैं जिन्हें घर से हटाकर शांति, सकारात्मकता और सुख-समृद्धि लाई जा सकती है.1. टूटी हुई घड़ीटूटी हुई या बंद पड़ी घड़ी को घर में रखना शुभ नहीं माना जाता. फेंगशुई के अनुसार घड़ी समय और ऊर्जा का प्रतीक होती है. अगर यह बंद होती है, तो यह रुकावट, धीमी चाल और नकारात्मक ऊर्जा का संकेत देती है. इसलिए टूटी घड़ी को तुरंत घर से बाहर निकाल देना चाहिए.2. टूटे हुए बर्तनघर में फालतू या टूटा हुआ बर्तन रखना न केवल बेकार सामान जमा करने जैसा लगता है, बल्कि इससे परिवार के रिश्तों में तनाव और नकारात्मक सोच भी बढ़ सकती है. फेंगशुई में कहा गया है कि जैसे घर की व्यवस्था साफ और व्यवस्थित होती है, वैसे ही जीवन में सुख-शांति बनी रहती है.इसलिए पुराने बर्तन को घर से हटा दें.3. टूटा हुआ शीशा / कांचटूटा हुआ शीशा या कांच सबसे अशुभ माना जाता है. इसकी ऊर्जा में नेगेटिव वाइब्स और तनाव भी होता है. फेंगशुई के हिसाब से ऐसे टूटे शीशे या ग्लास को घर से बाहर निकाल देना चाहिए ताकि सकारात्मक ऊर्जा का मार्ग खुल सके.4. टूटी हुई चप्पल / जूतेकई लोग टूटे हुए जूते या स्लीपर को घर में रख देते हैं, सोचते हैं कि शायद बाद में काम आ जाएं. लेकिन फेंगशुई के अनुसार ऐसे टूटे चप्पल घर की ऊर्जा को भारी बनाते हैं और मनमुटाव, चिंता और रिश्तों में खटास को बढ़ा सकते हैं.इन्हें तुरंत हटाना चाहिए.क्यों यह काम करता है?फेंगशुई विद्या के अनुसार, घर में अव्यवस्थित, टूटी-फूटी और पुरानी चीजें जमा होने से ऊर्जा का प्रवाह बाधित होता है. यह ऊर्जा घर के सदस्यों के मनोबल, रिश्तों और मानसिक स्थिति पर असर डालती है.जब आप इन चीजों को बाहर निकालते हैं, तो घर में पॉजिटिव एनर्जी का मार्ग खुलता है, जिससे तनाव, झगड़े और नकारात्मकता कम होती है और सुख-शांति बनी रहती है.
- हस्त रेखा शास्त्र में हाथ की रेखाओं के अलावा नाखूनों का भी खास महत्व है। हाथ के नाखूनों की बनावट भी व्यक्ति के व्यक्तित्व व स्वभाव से जुड़े कई राज खोलते हैं। हर व्यक्ति के हाथ के नाखूनों की बनावट अलग-अलग होती है। कुछ लोगों के नाखून छोटे, किसी के लंबे या चौड़े होते हैं। जानें हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार हाथ के नाखूनों की बनावट से क्या संकेत मिलते हैं।चौड़े नाखूनकहते हैं कि जिन लोगों के हाथ के नाखून चौड़े होते हैं वे बुद्धि के धनी होते हैं। ऐसे लोगों में सोचने व फैसला लेने की क्षमता अधिक होती है। ये अपने सभी कार्यों में सफलता पाते हैं।गोलाकार नाखूनहस्त रेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों के नाखून गोलाकार होते हैं, वे व्यक्ति सशक्त विचारों वाले एवं तुरंत फैसला लेने वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति जो भी फैसला लेते हैं उन पर अमल करना भी जानते हैं।चौकोर नाखूनहस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, चौकोर नाखून वाले व्यक्ति स्वभाव से गंभीर माने जाते हैं। इन लोगों में लीड करने की क्षमता होती है। कहते हैं कि लोग राजनीति में सफल होते हैं।लंबे नाखूनहस्त रेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों के लंबे नाखून होते हैं, वे रोमांस से भरपूर होते हैं। यह स्वभाव से भोले और विनम्र होते हैं। यह लोग आसानी से दूसरों पर भरोसा कर लेते हैं।पूर्ण नाखूनहस्त रेखा शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों के हाथ के नाखूनों चौड़ाई की अपेक्षा मामूली लंबे होते हैं और अपनी प्राकृतिक चमक लिए हुए होते हैं। ऐसे व्यक्ति उत्तम विचारों वाले और निरंतर आगे की ओर बढ़ते रहने की भावना रखने वाले होते हैं। ऐसे लोग सामाजिक मान-प्रतिष्ठा पाते हैं।--
- हिंदू धर्म में हस्तरेखा शास्त्र को हमेशा से खास महत्व दिया गया है। माना जाता है कि इंसान की हथेली में मौजूद रेखाएं उसके स्वभाव, भाग्य, करियर और धन योग तक का संकेत देती हैं। यही वजह है कि वर्षों से लोग अपनी हथेली की रेखाओं को देखकर भविष्य का आकलन करते आए हैं। खासकर वे रेखाएं, जो धन और भाग्य से जुड़ी होती हैं, उन्हें बेहद शुभ माना जाता है। आज हम समझेंगे कि किस प्रकार की रेखाएं यह बताती हैं कि व्यक्ति जीवन में कब और कैसे धनवान बन सकता है।भाग्य रेखा क्या होती है?हर व्यक्ति की भाग्य रेखा अलग होती है। किसी की सीधी, किसी की टूटी हुई, किसी की कटी-फटी तो किसी की पूरी तरह टेढ़ी-मेढ़ी। हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, वह रेखा जो कलाई के पास से शुरू होकर सीधे मध्यमा उंगली (सबसे लंबी उंगली) की तरफ जाती है, वही भाग्य रेखा कहलाती है। इस रेखा की मजबूती और गहराई यह बताती है कि व्यक्ति की किस्मत उसे कितनी दूर तक ले जाएगी और जीवन में कब अवसर मिलेंगे। अगर आपकी भाग्य रेगा सीधी और गहरी है तो यह अच्छे करियर और स्थिर सफलता का संकेत है। अगर टूटी या कटी हुई रेखा है तो ये जीवन में उतार-चढ़ाव और संघर्ष का संकेत है और अगर टेढ़ी-मेढ़ी रेखा है तो ये जीवन में अस्थिरता, लेकिन अचानक मिलने वाले अवसर का संकेत देती है।धन रेखा कहाँ होती है?हथेली में एक विशेष रेखा होती है जिसे धन रेखा कहा जाता है। जब आप अपनी हथेली को देखें, तो अनामिका ऊंगली यानी रिंग फिंगर के नीचे सूर्य पर्वत से निकलकर जो रेखा हृदय रेखा को पार करते हुए मस्तिष्क रेखा की ओर बढ़ती है, उसे धन रेखा माना जाता है।ऐसी रेखा वाले लोग माने जाते हैं बेहद भाग्यशालीहस्तरेखा शास्त्र में एक विशेष संयोजन को अत्यंत शुभ कहा गया है। अगर किसी व्यक्ति की रेखा कलाई के पास से शुरू होकर सीधे शनि पर्वत (मध्यमा उंगली के नीचे) तक जाती हो और फिर हल्का-सा मुड़कर गुरु पर्वत (तर्जनी उंगली के नीचे) की ओर पहुंच जाए, तो यह बहुत ही दुर्लभ और शुभ योग माना जाता है। ऐसे लोग बेहद भाग्यशाली होते हैं।
- 3 मार्च 2026 का दिन ज्योतिष दृष्टि से बेहद खास है। इस तिथि पर साल का पहला चंद्र ग्रहण लग रहा है। यह ग्रहण दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। बड़ी बात यह है कि, यह भारत में नजर आएगा और इसका प्रभाव भी मान्य होगा। ज्योतिषियों के मुताबिक, यह चन्द्र ग्रहण सूर्य की राशि सिंह में लग रहा है। सिंह राशि में पहले से केतु हैं और इसलिए यहां चंद्रमा से उनकी युति हो रही है, जिससे ग्रहण योग भी बन रहा है। ऐसे में यह समय 12 राशियों के जीवन पर असर डाल सकता है। इस दौरान कुछ राशियों को शुभ परिणाम, तो कुछ जातकों के तनाव में वृद्धि हो सकती हैं। ऐसे में आइए चंद्र ग्रहण का सभी राशियों पर प्रभाव जानते हैं।मेष राशिमेष राशि वालों के लिए समय थोड़ा सतर्क रहने वाला रहेगा।आपको निवेश से लेकर यात्रा पर जाने तक विशेष सावधानियां रखनी होगी।किसी भी कार्य में जल्दबाजी करना आपके तनाव को बढ़ा सकता है।वृषभ राशिआपको धन लाभ और नए घर की प्राप्ति के योग बन सकते हैं, क्योंकि समय लाभदायक साबित हो सकता है।रुके हुए कार्य पूरे होंगे और आर्थिक स्थिति में सुधार देखने को मिल सकता है।विवाह के योग है और परिवार का सहयोग भी मिलेगा।मिथुन राशिमिथुन राशि वालों को नई नौकरी की प्राप्ति होगी।कार्यक्षेत्र में नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं।किसी पर अधिक भरोसा करना आपके दुखों को बढ़ा सकता है।व्यापार करने वालों के कार्यों का विस्तार संभव है।कर्क राशिकर्क राशि वालों को अलर्ट रहने की जरूरत रहेगी।खासकर धन से जुड़े मामलों में सतर्क रहें।इस समय भूलकर भी आप भावनाओं में आकर कोई बड़ा निर्णय लेने से बचें।सिंह राशिसिंह राशि वालों की परेशानियां बढ़ सकती हैं और उनके विरोधी सक्रिय रह सकते हैं।सेहत का भी ध्यान रखना आवश्यक रहेगा।आर्थिक लाभ भी संभव है परंतु खर्च भी अधिक रहेगा।कन्या राशिकन्या राशि के लिए समय खास रहेगा और मेहनत का मनचाहा फल प्राप्त होगा।करियर में तरक्की के योग बन सकते हैं।पारिवारिक समस्याओं के चलते परेशान होना पड़ सकता है।तुला राशितुला राशि वालों को सफलता मिलने के संकेत हैं।सेहत पहले से बेहतर होगी और लंबे समय से चल रही परेशानियां दूर हो सकती हैं।समाज में आपका मान-सम्मान बढ़ेगा और स्वयं को भाग्यशाली महसूस करेंगे।वृश्चिक राशिवृश्चिक राशि वालों के लिए समय सामान्य रहेगा।नियमित कार्यों पर ध्यान दें और विवादों से दूर रहें।धन लाभ हो सकता है पर लेनदेन सावधानी से करें।धनु राशिधनु राशि वालों के जीवन में कुछ बदलाव आ सकते हैं।शुरुआत में थोड़ा दबाव महसूस हो सकता है।कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने का समय होगा।मकर राशिमकर राशि वालों को लाभ मिलने की संभावना है।व्यापार और नौकरी दोनों में सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।समय आपके लिए कई नई परेशानियां लेकर आ सकता है।कुंभ राशिकुंभ राशि वालों को भी लाभ के संकेत हैं।नए अवसर मिल सकते हैं और आय के नए स्रोत बन सकते हैं।लेकिन लव पार्टनर के साथ गलतफहमियां पनप सकती हैं।मीन राशिमीन राशि वालों को सावधानी रखने की आवश्यकता है।सेहत और खर्चों पर विशेष ध्यान दें।अचानक से कुछ एक बड़े खर्च आपके सामने आएंगे।
- अष्टधातु के छल्ले और अंगूठी का ज्योतिषशास्त्र में खास महत्व बताया गया है। यह आठ धातुओं सोना, तांबा, पीतल, चांदी, सीसा, लोहा, कांसा और जस्ता से मिलकर बना होता है। इन आठों धातुओं अलग-अलग महत्व होता है जो किसी न किसी ग्रह से संबंधित होता है। ऐसे में अष्टधातु के छल्ले को विधिपूर्वक और नियमों का ख्याल रखते हुए धारण करने से कुंडली में ग्रहों की स्थिति बेहतर होती है और उनके प्रतिकूल प्रभाव से भी राहत पाई जा सकती है। यह छल्ला जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। इसे धारण करने से धन संबंधी समस्याओं से भी मुक्ति मिल सकती है और फिजूलखर्ची दूर होने लगती है।ऐसे में आइए विस्तार से जानें की इसे कैसे, कब, किसे और किस दिन पहनना चाहिए। साथ ही, अष्टधातु का छल्ला धारण करने के फायदे भी जानें...अष्टधातु का छल्ला पहनने के नियमशास्त्रों के अनुसार अष्टधातु से निर्मित छल्ला या अंगूठी शनिवार और मंगलवार के दिन धारण करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा, इसे पूर्णिमा और शुक्ल पक्ष में शुभ मुहूर्त में धारण करना अत्यंत लाभदायक माना गया है। इससे जातक के जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं।अष्टधातु के छल्ले को अनामिका उंगली में पहनना सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अलावा, आप यह छल्ला तर्जनी उंगली में भी धारण कर सकते हैं, इसे गुरु की उंगली माना जाता है। इससे ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव से बचाव होता है।अष्टधातु का छल्ला धारण करने से पहले स्नानादि करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। फिर, पूजा-पाठ करके अपने कुल देवी-देवता, भाग्येश अथवा लग्नेश के मंत्रों का जाप करके छल्ला धारण करना चाहिए। इसे पूर्व दिशा की ओर मुख करके पहनना उत्तम माना जाता है।शनिवार या मंगलवार के दिन छल्ले को धारण करने से पहले इसे गंगाजल से शुद्ध भी अवश्य करना चाहिए और धूप अगरबत्ती दिखाकर अष्टधातु का छल्ला या अंगूठी धारण करें। इसे धारण करने वालों को तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए।मेष, वृश्चिक, धनु, मकर और कुंभ आदि राशि वालों को अष्टधातु का छल्ला अवश्य धारण करना चाहिए। ऐसा करने से बेहद शुभ फल की प्राप्ति होती है। वहीं, जिनकी कुंडली में राहु की स्थिति अशुभ हो वे भी इस छल्ले को पहन सकते हैं।अष्टधातु का छल्ला धारण करने से पहले ज्योतिषी को अपनी कुंडली जरूर दिखानी चाहिए। उनकी सलाह लेकर सही धातु धारण करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।अष्टधातु का छल्ला पहनने के फायदेज्योतिषशास्त्र में अष्टधातु के छल्ले को धारण करना बहुत शुभ माना जाता है। इससे कुंडली में ग्रहों के अशुभ प्रभावों को कम किया जा सकता है और उनकी स्थिति भी सही की जा सकती है। अगर आप करियर, नौकरी या कारोबार में समस्याओं और बाधाओं का सामना कर रहे हैं तो उससे भी यह निजात दिला सकता है। इससे जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और आर्थिक तंगी से छुटकारा मिल सकता है। साथ ही, फिजूलखर्ची कम होने लगती है। लेकिन अष्टधातु का छल्ला धारण करने से पहले नियमों का ध्यान जरूर रखना चाहिए। इससे जातक को जीवन में सुखों की प्राप्ति हो सकती है और सफलता के मार्ग खुलते हैं।
- -जानिये अपने मंदिरों कोनौलखा मंदिर' भारत में कई स्थानों पर हैं, जिनमें मुख्य रूप से बेगूसराय (बिहार) और देवघर (झारखंड) के मंदिर प्रसिद्ध हैं, जो अपनी अद्भुत वास्तुकला और धार्मिक महत्व के लिए जाने जाते हैं। बाबा वैद्यनाथ की नगरी में अपनी सुंदरता एवं वास्तुकला का अनूठा संगम नौलखा मंदिर देवघर शहर के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों में से एक है।सभी ने नौलखा हार के बारे में सुना होगा, परंतु मंदिर का यह नाम कैसे पड़ा इसके पीछे एक रोचक इतिहास है। भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप को समर्पित यह मंदिर नौ-लाख रुपये की लागत से बना अतः यह जनमानस के बीच नौलखा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दक्षिण भारतीय मंदिरों जैसी शैली, ग्रेनाइट और संगमरमर से निर्मित इस मंदिर में विग्रह स्वरूप भगवान श्री कृष्ण बाल रूप में विराजमान हैं, साथ ही साथ संत बालानंद ब्रह्मचारी जी की एक मूर्ति भी स्थापित है। अतः मंदिर का वास्तविक नाम गुरु और गोविंद के स्वरूप को समर्पित जुगल मंदिर है।नौलखा मंदिर की ऊंचाई 146 फीट है। मंदिर झारखंड के देवघर शहर से सिर्फ 2 किमी दूर स्थित है तथा अपनी स्थापत्य कला की सुंदरता के लिए भक्तों एवं पर्यटकों दोनों के ही बीच अत्यधिक प्रसिद्ध है। मंदिर की वास्तुकला कोलकाता में बेलूर मठ अर्थात रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय से प्रेरित जान पड़ती है।प्रचलित नाम: जुगल मंदिर, नौलखा मंदिर देवघर, नौलक्खा मंदिरदर्शन समय7.00 AM - 12.00 PM, 2.00 PM - 7:30 PMनौलखा मंदिर देवघर का इतिहासपथूरिया घाट की रानी श्रीमती चरुशिला ने अपने पति अक्षय घोष और बेटे जतिंद्र घोष को कम उम्र में ही खो दिया था। मौत की इन घटनाओं ने रानी को अत्यधिक दुखी कर दिया। शांति की तलाश में रानी ने अपना घर छोड़ दिया और संत श्री बालानंद ब्रह्मचारी से मुलाकात के लिए देवघर पहुँची और बालानंद ब्रह्मचारी के आश्रम में रहीं। उनकी शिक्षा और उपदेशों से प्रभावित होकर चरुशिला जी महाराज जी की शिष्या बन गईं। श्री बालानंद ब्रह्मचारी जी ने उन्हें भगवान श्री कृष्ण का एक मंदिर बनाने की प्रेरणा दी। मंदिर के निर्माण के लिए रानी चरुशिला ने 9 लाख रुपये का अभूतपूर्व दान दिया। 1941 के लगभग 9 लाख रुपये अपने में ही एक बहुत बड़ी राशि हुआ करती थी।1. बेगूसराय का नौलखा मंदिर (बिहार)स्थान: बिशनपुर, बेगूसराय.निर्माण: 1953 में संत महावीर दास द्वारा.खासियत: राजस्थानी वास्तुकला का प्रभाव, सफेद संगमरमर की मूर्तियां, सुंदर नक्काशी, और शहर का विहंगम दृश्य.2. अन्य नौलखा मंदिरबक्सर (बिहार): दक्षिण भारतीय शैली और सुंदर मूर्तियों वाला एक और धार्मिक स्थल.गुजरात (घुमली): 12वीं सदी का सूर्य मंदिर.
- मूलांक 1 – सूर्य का वर्षमूलांक 1 वाले 2026 में लीडरशिप और तरक्की के राजा बनेंगे। लकी नंबर 1, 3, 5 आपके लिए धन और सम्मान लाएंगे। शादी या रिलेशनशिप में मूलांक 2, 4 और 7 सबसे परफेक्ट हैं। ये जोड़ी आपको सपोर्ट करेगी और जीवन में बैलेंस लाएगी। मूलांक 1 की जोड़ी में हमेशा रोमांस और तरक्की बनी रहती है।मूलांक 2 – चंद्रमा की कृपामूलांक 2 वाले 2026 में भावनात्मक स्थिरता और पारिवारिक सुख पाएंगे। लकी नंबर 2, 4, 6 आपके लिए शांति और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 1, 4 और 6 सबसे अच्छे हैं। ये जोड़ी आपको समझेगी और जीवन में मिठास घोलेगी। मूलांक 2 की जोड़ी में प्यार गहरा और लंबा चलता है।मूलांक 3 – गुरु की कृपामूलांक 3 वाले 2026 में क्रिएटिविटी और प्रसिद्धि पाएंगे। लकी नंबर 3, 6, 9 आपके लिए धन और ज्ञान लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 3, 6 और 9 सबसे परफेक्ट हैं। ये जोड़ी आपको सपोर्ट करेगी और जीवन में रंग भरेगी। मूलांक 3 की जोड़ी में हमेशा खुशी और उत्साह रहता है।मूलांक 4 – राहु का प्रभावमूलांक 4 वाले 2026 में मेहनत का फल पाएंगे। लकी नंबर 4, 5, 8 आपके लिए स्थिरता और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 1, 2 और 7 सबसे अच्छे हैं। ये जोड़ी आपको सपोर्ट करेगी और जीवन में बैलेंस लाएगी। मूलांक 4 की जोड़ी में विश्वास और मजबूती रहती है।मूलांक 5 – बुध की कृपामूलांक 5 वाले 2026 में ट्रैवल और एडवेंचर पाएंगे। लकी नंबर 5, 1, 6 आपके लिए मौके और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 3, 5, 6 और 8 सबसे परफेक्ट हैं। ये जोड़ी आपको एक्साइटमेंट और सपोर्ट देगी। मूलांक 5 की जोड़ी में कभी बोरियत नहीं आती है।मूलांक 6 – शुक्र का प्रभावमूलांक 6 वाले 2026 में लव और लग्जरी पाएंगे। लकी नंबर 6, 3, 9 आपके लिए सुख और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 3, 6 और 8 सबसे अच्छे हैं। ये जोड़ी आपको प्यार और लग्जरी देगी। मूलांक 6 की जोड़ी में हमेशा रोमांस और सुख रहता है।मूलांक 7 – केतु का प्रभावमूलांक 7 वाले 2026 में आध्यात्म और ज्ञान पाएंगे। लकी नंबर 7, 2, 5 आपके लिए शांति और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 1 और 4 सबसे परफेक्ट हैं। ये जोड़ी आपको गहराई और समझ देगी। मूलांक 7 की जोड़ी में आत्मिक जुड़ाव रहता है।मूलांक 8 – शनि की कृपामूलांक 8 वाले 2026 में मेहनत का बड़ा फल पाएंगे। लकी नंबर 8, 4, 5 आपके लिए शक्ति और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 1, 3, 5 और 6 सबसे अच्छे हैं। ये जोड़ी आपको सपोर्ट और ताकत देगी। मूलांक 8 की जोड़ी में मजबूती और समृद्धि रहती है।मूलांक 9मूलांक 9 वाले 2026 में दान और सेवा से प्रसिद्धि पाएंगे। लकी नंबर 9, 3, 6 आपके लिए सम्मान और धन लाएंगे। शादी के लिए मूलांक 3 (क्रिएटिव), 6 (रोमांटिक) और 9 (धार्मिक) सबसे परफेक्ट हैं। ये जोड़ी आपको ऊर्जा और प्रेम देगी। मूलांक 9 की जोड़ी में हमेशा सेवा और सुख रहता है। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों के पूर्णतया सत्य एवं सटीक होने का हम दावा नहीं करते हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।--
- हिंदू ज्योतिष और धार्मिक परंपराओं में पुरुषों का कान छिदवाना और बाली पहनना मुख्य रूप से शुभ माना जाता है। कर्णवेध संस्कार हिंदू धर्म के षोडश संस्कारों में से एक है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कान छिदवाने से राहु-केतु के दुष्प्रभाव कम होते हैं, बुद्धि बढ़ती है और स्वास्थ्य लाभ मिलता है। हालांकि, कुछ मान्यताओं में एक कान छिदवाना या गलत धातु की बाली पहनना अशुभ हो सकता है। आधुनिक समय में यह फैशन भी है, लेकिन शास्त्रों में इसका गहरा महत्व है।कर्णवेध संस्कार का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्वहिंदू धर्म के 16 संस्कारों में कर्णवेध नवम संस्कार है। पुरुषों के लिए यह बहुत शुभ है। ज्योतिष के अनुसार, कान केतु ग्रह से जुड़े हैं। कान छिदवाने से केतु और राहु के बुरे प्रभाव कम होते हैं। इससे व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है और बुद्धि तेज होती है। प्राचीन काल में राजा-महाराजा और योद्धा कान छिदवाते थे, जो साहस और शक्ति का प्रतीक था। भगवान शिव और विष्णु से जुड़े होने से यह सम्मान और भक्ति का संकेत है।पुरुषों के लिए बाली पहनने के ज्योतिषीय लाभज्योतिष शास्त्र में सोने या चांदी की बाली पहनना पुरुषों के लिए शुभ है। सोना सूर्य और गुरु से जुड़ा है, जो आत्मविश्वास और निर्णय शक्ति बढ़ाता है। इससे मानसिक तनाव कम होता है और नकारात्मक विचार दूर रहते हैं। राहु-केतु के दोष में बाली पहनने से लाभ मिलता है। आयुर्वेद के अनुसार, कान में एक्यूप्रेशर पॉइंट्स होते हैं, जो बाली पहनने से रक्त संचार बेहतर होता है, सुनने की क्षमता बढ़ती है और सिरदर्द जैसी समस्याएं कम होती हैं। सेलिब्रिटी जैसे विराट कोहली और रणबीर कपूर भी बाली पहनते हैं, जो फैशन के साथ ज्योतिषीय लाभ लेते हैं।क्या अशुभ हो सकता है?कुछ स्थितियों में कान छिदवाना या बाली पहनना अशुभ हो सकता है:केवल एक कान छिदवाना (खासकर बायां पहले) कुछ मान्यताओं में अशुभ है।लोहे या निकल की बाली पहनना - इससे शनि या राहु का प्रभाव बढ़ सकता है।अशुभ मुहूर्त में छिदवाना - शनिवार-रविवार से बचें।अगर कुंडली में मंगल या शनि मजबूत नहीं तो पहले ज्योतिषी से सलाह लें।गलत धातु या तरीके से करने पर स्वास्थ्य समस्या या मानसिक अशांति हो सकती है।सही तरीका और उपाय--पुरुषों के लिए दोनों कान छिदवाना और सोने की बाली पहनना सबसे शुभ है। शुभ मुहूर्त में (सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार) करवाएं। बाली में सोना या चांदी चुनें। अगर फैशन के लिए कर रहे हैं, तो भी ज्योतिषीय लाभ मिलेगा। स्वास्थ्य और भाग्य के लिए यह परंपरा अपनाएं।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पुरुषों का कान छिदवाना और बाली पहनना शुभ है। यह स्वास्थ्य, बुद्धि और ग्रह दोष निवारण के लिए लाभदायक है।--
- नहीं करने चाहिए ये कामज्योतिष शास्त्र में हफ्ते के हर एक दिन के महत्व को बताया गया है। हिंदू धर्म में सोमवार से लेकर रविवार को किसी ना किसी वजह के चलते महत्वपूर्ण माना गया है। बात की जाए रविवार की तो इसका संबंध सूर्य ग्रह से होता है। सारे ग्रहों में सूर्य सबसे बड़ा होता है और इसका प्रभाव भी काफी पड़ता है। ऐसे में रविवार के दिन ऐसी चीजें करने से बचना चाहिए जिससे ये ग्रह कमजोर हो। नीचे विस्तार से जानें कि रविवार के दिन कौन सी चीजें करने से बचना चाहिए।ना कटवाएं अपने बालआम तौर पर लोग ग्रूमिंग से जुड़ी चीजों को छुट्टी वाले दिन करवाना पसंद करते हैं। इत्मीनान की वजह से लोग रविवार को ही हेयरकट और सेविंग करवाते हैं लेकिन शास्त्र के हिसाब से ये गलत है। रविवार के दिन बाल कटवाने से बचना चाहिए। अगर ऐसा किया जाता है तो धीरे-धीरे सूर्य ग्रह कमजोर होने लगता है। सूर्य के कमजोर होते ही सबसे बुरा प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। जिन लोगों का सूर्य कमजोर होने लगता है, उन्हें स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें होने लगती हैं।अवॉइड करें इस रंग के कपड़ेंहर एक दिन किसी ना किसी ग्रह से प्रभावित हैं। हर एक ग्रह का संबंध किसी ना किसी रंग के साथ जरूर होता है। ऐसे में किसी दिन विशेष के हिसाब से कुछ रंगों को अवॉइड करना भी जरूरी होता है। बात करें रविवार की तो इस दिन काले और नीले रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए। सूर्य की कृपा पाने के लिए रविवार को 4 रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन लाल, पीला, नारंगी और सुनहरे रंग के कपड़े पहनना अच्छा होता है। इन रंगों का सीधा संबंध सूर्य के साथ ही होता है।ना करें इन चीजों का सेवनरविवार के दिन मास-मदिरा और लहसुन-प्याज जैसी तामसिक चीजों को खाना अवाइड करना चाहिए। साथ ही इस दिन खट्टी चीजों के सेवन से बचना चाहिए। इसके अलावा रविवार को नींबू, इमली और आचार जैसी चीजों का सेवन भी नहीं करना चाहिए। कई लोग इस दिन काली उदड़ दाल भी नहीं खाते हैं।
- वास्तुशास्त्र केवल दिशा-निर्देश नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन, खुशहाली और स्थिरता लाने का एक प्राचीन तरीका है। माना जाता है कि घर में कुछ चीजें रखने से ऊर्जा का प्रवाह बेहतर होता है, रिश्तों में मधुरता आती है और आर्थिक स्थिरता भी बढ़ती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार हर घर में कुछ खास चीजें अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि यह न सिर्फ वातावरण को पवित्र बनाती हैं बल्कि परिवार के लोगों के मन पर भी अच्छा प्रभाव डालती हैं।तुलसी का पौधा- तुलसी घर में पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा लाती है। इसे पूर्व या उत्तर दिशा में लगाए तो सबसे अच्छा होता है। तुलसी नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखती है और घर के वातावरण को शांत करती है।पानी से भरा कलश- घर के मंदिर या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में तांबे या पीतल का जल-कलश रखना शुभ माना जाता है। यह शुद्धता, शांति और स्थिरता का प्रतीक है। कहा जाता है कि इससे घर में मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ती है।शंख- शंख घर में सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। पूजा के समय शंख बजाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। घर में शंख रखा होना भी शुभ माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि इससे बुरी शक्तियां प्रवेश नहीं करतीं।स्वास्तिक या ऊॅं का चिन्ह- मुख्य दरवाजे के पास स्वास्तिक, ऊॅं, शुभ-लाभ जैसे प्रतीक ऊर्जा को स्थिर रखते हैं। इन्हें लगाने से घर में समृद्धि आती है और बुरी नजर से सुरक्षा मिलती है।पीतल या तांबे की घंटी- घर में पीतल या तांबे की घंटी रखें। घंटी की ध्वनि घर से नकारात्मक ऊर्जा हटाती है। पूजा के समय पीतल या तांबे की छोटी घंटी बजाने से वातावरण पवित्र होता है और मन में शांति आती है। घर में इसे मंदिर के पास रखना शुभ माना जाता है।
- हिंदू धर्म में तुलसी का पौधा बहुत ही पवित्र माना जाता है. इन्हें सिर्फ मां लक्ष्मी का प्रतीक ही नहीं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक माना जाता है. हर घर के आंगन में माता तुलसी विराजमान होती है और जहां तुलसी होंगी वहीं श्रीहरि भी विराजमान होंगे. इनके बिना किसी भी धार्मिक कार्य को अधूरा समझा जाता है.वास्तु शास्त्र के अनुसार, हर सुबह-शाम तुलसी के सामने दीपक जलाना, जल चढ़ाना और इनकी परिक्रमा करना शुभ फल देता है. लेकिन बहुत से लोग गलती से माता तुलसी के पास ऐसे पौधे लगा देते हैं जो उनकी पवित्रता को कम कर देते हैं. वास्तुशास्त्र के अनुसार, ये पौधे तुलसी की ऊर्जा को कमजोर कर देते हैं, जिससे घर में अशुभ प्रभाव बढ़ता है. तो आइए जानते हैं उन पौधों के बारे में जिनको तुलसी के पास नहीं लगाना चाहिए.1. कैक्टसकैक्टस भले ही देखने में सुंदर लगे, लेकिन वास्तु शास्त्र के अनुसार इसके कांटे अशुभता और नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माने जाते हैं. तुलसी जहां शांति और सुख की ऊर्जा फैलाती है, वहीं कैक्टस के कांटे कलह, क्रोध और मतभेद बढ़ाने का कारण बनते हैं. साथ ही, इसको तुलसी के पास लगाने से परिवार में लड़ाई-झगड़े जैसी स्थिति भी उत्पन्न होने लगती है.2. मनी प्लांटवास्तु शास्त्र के अनुसार, वैसे तो मनी प्लांट को बहुत ही शुभ माना जाता है. लेकिन तुलसी के पास इसे रखना शुभ नहीं होता है. इन दोनों के स्वभाव में विरोध होने के कारण, दोनों साथ उगने पर एक-दूसरे की वृद्धि रोकते हैं.3. अपराजिताअपराजिता का पौधा बहुत ही शुभ और देवी की आराधना में उपयोगी माना जाता है, लेकिन इसे तुलसी के पास लगाना वर्जित है. दरअसल, तुलसी के पास अपराजिता लगाने से दोनों की ग्रोथ प्रभावित होती है और तुलसी का पौधा धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है.4. धतूराधतूरा भगवान शिव को अर्पित किया जाता है, लेकिन तुलसी के पास इसे रखना बहुत बड़ा दोष माना गया है. धतूरा विषैला पौधा है और उसकी तीव्र तासीर तुलसी की कोमल ऊर्जा को नष्ट कर देती है. तुलसी का पौधा जहां शुद्धता और सात्त्विकता का प्रतीक है.5. नींबू का पौधानींबू के पौधे में बहुत ही सारी औषधीय गुण पाए जाते हैं. लेकिन, वास्तु शास्त्र के अनुसार तुलसी के पास नींबू का पौधा नहीं लगाना चाहिए. कहते हैं कि ऐसा करने से घर की समृद्धि में रुकावट आ जाती है और आर्थिक कार्यों में बाधाएं आने लगती हैं.
- कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को तुलसी विवाह कराया जाता है. इस तिथि को देवोत्थान एकादशी, देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं. इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है, जिनमें भगवान विष्णु विश्राम अवस्था में रहते हैं. जब वे इस दिन पुनः जागृत होते हैं, तो समस्त सृष्टि में शुभ कार्यों का प्रारंभ होता है. इसी दिन तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है, जो धार्मिक रूप से अत्यंत शुभ माना गया है. तुलसी विवाह के दिन माता तुलसी का विशेष प्रकार से श्रृंगार किया जाता है. जानते हैं कि तुलसी विवाह के दिन माता तुलसी का श्रृंगार कैसे करें ताकि उनका आशीर्वाद प्राप्त हो सके.तुलसी विवाह की तैयारी और पूजन विधिसबसे पहले घर या आंगन में जहां तुलसी का पौधा स्थापित है, उस स्थान की सफाई करें, उसके बाद गंगाजल या पवित्र जल का छिड़काव करें. तुलसी माता को नए वस्त्र पहनाएं, पास में एक सुंदर आसन पर शालिग्राम भगवान को स्थापित करें, उन्हें पीले वस्त्र पहनाएं, चंदन, फूल और तुलसी दल अर्पित करें. इस दौरान मंगल गीत, विवाह मंत्र, और आरती गाई जाती है. पूजा के बाद प्रसाद स्वरूप पंचामृत, मिठाई या खीर का भोग लगाया जाता है. इस दिन देवउठनी एकादशी का व्रत रखा जाता है. संध्या समय तुलसी जी की आरती की जाती है.तुलसी विवाह का महत्वतुलसी विवाह में माता तुलसी (जिसे वृंदा देवी भी कहा जाता है) और श्री शालिग्राम भगवान (जो भगवान विष्णु का स्वरूप हैं) का विवाह होता है. मान्यता है कि इस विवाह से घर में सुख, समृद्धि, और सौभाग्य का वास होता है. जो लोग अपने घर में यह विवाह कराते हैं, उन्हें भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है. मान्याता है कि इस दिन व्रत रखने से अविवाहित कन्याओं को अच्छा वर मिलता है. वहीं विवाहित दंपतियों के जीवन में इस व्रत को रखने से खुशहाली आती है.तुलसी माता का श्रृंगारमां तुलसी का श्रृंगार करना तुलसी विवाह का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. इस दिन विशेष रूप से माता तुलसी को दुल्हन की तरह सजाया जाता है. सबसे पहले तुलसी के गमले या स्थान को अच्छी तरह साफ करें. पवित्र जल से शुद्ध करें. इसके बाद तुलसी माता को लाल या पीले रंग की साड़ी पहनाएं, क्योंकि ये रंग शुभता और मंगल के प्रतीक माने जाते हैं.मां तुलसी को चुनरी, चूड़ी, नथनी, मांग टीका, हार, कंगन, बिंदी, फूल, कमरबंद और अन्य हल्के आभूषणों से सजाएं. उनके चारों ओर सुंदर रंगोली बना कर दीपक जलाएं.
- हिंदू धर्म में तुलसी विवाह को पवित्र और बेहद ही शुभ माना जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है। कार्तिक द्वादशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व देव उठनी एकादशी के अगले दिन मनाया जाता है। इसलिए इसे देव उठान द्वादशी भी कहा जाता है। इस दिन माता तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के शालीग्राम रूप से कराया जाता है।तुलसी विवाह के दिन भगवान विष्णु के शालीग्राम स्वरूप और माता तुलसी का विधि-विधान से विवाह संस्कार किया जाता है। मान्यता है कि तुलसी विवाह में कराने से घर-परिवार में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का आगमन होता है। वैवाहिक जीवन में आ रही कठिनाइयों दूर होती हैं और विवाह में देरी जैसी समस्याओं का समाधान निकलता है। कहा जाता है कि तुलसी विवाह वैवाहिक जीवन में प्रेम को बढ़ाता है।पौराणिक मान्यता के अनुसार, धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने असुरराज जालंधर का वध किया था, जिससे क्रोधित होकर उसकी पत्नी वृंदा ने भगवान को श्राप दिया कि वे शालीग्राम पत्थर के रूप में पूजे जाएंगे। बाद में वृंदा ने शरीर त्याग दिया और उनका पुनर्जन्म तुलसी के रूप में हुआ। अपनी भक्ति के प्रभाव से उन्होंने भगवान विष्णु को पति रूप में प्राप्त किया। तभी से हर वर्ष तुलसी विवाह परंपरा प्रचलित है।हल्दी के उपाय से दूर होगी विवाह में देरीतुलसी विवाह के दिन हल्दी का उपाय करने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। तुलसी विवाह के दिन स्नान से पहले पानी में एक चुटकी हल्दी मिलाएं। यह उपाय शरीर-मन की शुद्धि और गुरु ग्रह की शक्ति बढ़ाने के लिए शुभ माना जाता है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर तुलसी और शालीग्राम की पूजा करें। पूजा में हल्दी या हल्दी मिले दूध का लेप अर्पित करें। ऐसा करने से कुंडली में बृहस्पति मजबूत होते हैं और शुभ विवाह के योग बनते हैं।
- पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी (31 अक्टूबर 2025) से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक भगवान विष्णु आंवले के वृक्ष पर निवास करते हैं, इसलिए इसे आंवला नवमी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन की गई पूजा-अर्चना और दान का अक्षय फल मिलता है, इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है। आंवला नवमी के दिन ही कृष्ण ने कंस के आमंत्रण पर वृंदावन छोड़कर मथुरा की ओर प्रस्थान किया था।भारतीय शास्त्रों में आंवले को दैवीय फल माना जाता है। ‘पद्म’ और ‘स्कंद’ पुराण में वर्णन है कि आंवला ब्रह्माजी के आंसुओं से उत्पन्न हुआ। वहीं, एक अन्य कथा कहती है कि समुद्र मंथन के समय निकले अमृत कलश से पृथ्वी पर अमृत की बूंदें गिरने से आंवले अस्तित्व में आया।एक बार देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं। उनकी इच्छा हुई कि भगवान विष्णु और शिव की एक साथ पूजा की जाए। उन्होंने विचार किया कि विष्णु को तुलसी अत्यधिक प्रिय है और शिव को बेल। इन दोनों के गुण एक साथ आंवले में हैं। देवी लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। माता लक्ष्मी ने आंवले के पेड़ के नीचे उन्हें भोजन कराया और उसके बाद स्वयं भोजन को प्रसाद रूप में ग्रहण किया। उस दिन से ही यह तिथि आंवला नवमी के नाम से प्रसिद्ध हुई।ऐसी मान्यता है कि इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा, आंवले से स्नान, आंवले को खाने और आंवले का दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है। चरक संहिता में उल्लेख मिलता है कि कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन ही महर्षि च्यवन ने आंवले के सेवन से सदा युवा रहने का वरदान प्राप्त किया था। एक मान्यता यह भी है कि सतयुग की शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को हुई थी।एक अन्य कथा के अनुसार इसी दिन आदि शंकराचार्य को एक निर्धन स्त्री ने भिक्षा में सूखा आंवला दिया था। उस निर्धन स्त्री की गरीबी से द्रवित होकर शंकराचार्य ने मां लक्ष्मी की मंत्रों द्वारा स्तुति की, जो ‘कनकधारा’ स्तोत्र के रूप में जानी जाती है। उस निर्धन स्त्री के भाग्य में धन न होते हुए भी शंकराचार्य की विनती पर मां लक्ष्मी ने उसके घर स्वर्ण आंवलों की वर्षा करके उसकी दरिद्रता दूर की।
- सुख-संपत्ति, वैभव व ऐश्वर्य आदि के कारक शुक्र समय-समय पर अपनी राशि व नक्षत्र में बदलाव करते रहते हैं। 7 नवंबर 2025, शुक्रवार को शुक्र रात 09 बजकर 13 मिनट पर स्वाति नक्षत्र में गोचर करेंगे। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, स्वाति नक्षत्र का स्वामी राहु है। राहु के नक्षत्र में शुक्र का गोचर मेष से लेकर मीन राशि तक अपना प्रभाव डालेगा। शुक्र के नक्षत्र परिवर्तन से कई राशि वालों की लाइफ में सकारात्मक बदलाव होंगे और यह अवधि वित्त, करियर व व्यावसायिक रूप से लाभकारी सिद्ध होगी। जानें शुक्र का नक्षत्र गोचर किन राशियों के लिए रहेगा अच्छा।1. वृषभ राशि- वृषभ राशि वालों को शुक्र नक्षत्र परिवर्तन से अच्छे फलों की प्राप्ति होगी। इस समय आपको करियर में नई उपलब्धि हासिल हो सकती है। नौकरी करने वालों को अच्छे प्रस्ताव मिल सकते हैं। इनकम के नए साधन बनेंगे और पुराने स्रोत से भी रुपए-पैसे आएंगे। परिवार का साथ मिलेगा। भौतिक सुखों में वृद्धि होगी।2. कुंभ राशि- कुंभ राशि वालों के लिए शुक्र नक्षत्र परिवर्तन अच्छा रहने वाला है। इस समय आपकी आय में आकस्मिक वृद्धि हो सकती है। अटके हुए धन की वापसी होने से आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। मानसिक तौर पर आप मजबूत महसूस करेंगे। व्यावसायिक रूप से आपकी स्थिति सुदृढ़ होगी। नौकरी चाकरी के लिहाज से समय अनुकूल रहने वाला है।3. मीन राशि- मीन राशि वालों के लिए शुक्र नक्षत्र गोचर लाभकारी रहने वाला है। इस समय आपकी आय में वृद्धि के साथ प्रमोशन मिलने के संकेत हैं। व्यापारिक विस्तार मिल सकता है। यात्रा लाभकारी रहेगी। पारिवारिक परेशानियां सुलझाने में सफल रहेंगे। अपनों का साथ मिलेगा। भाग्य का साथ मिलेगा और कार्यों में सफलता पाएंगे।
- गोवर्धन पर्वत ने एक बार ब्रज के गोप-गोपियों की रक्षा की थी। गोवर्धन पर्वत उठाने की यह घटना तब की है, जब भगवान कृष्ण को आत्मबोध हुआ था। भगवान आत्मबोध होने के बाद एक संकेत की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब गुरु गर्गाचार्य ने कृष्ण को याद दिलाया कि वह कौन हैं और उनके जीवन का ध्येय क्या है, तो गोवर्धन पर्वत पर खड़े-खड़े कृष्ण को एक तरह का बोध हुआ। फिर भी, गोकुलवासियों के लिए अपने प्यार के कारण उनका मन अब भी ऊहापोह में था।जो ध्येय अभी बहुत दूर है, क्या उसके लिए उन्हें वाकई यह सब भूल जाना चाहिए, जो वह जानते हैं और जो उन्हें पसंद है? अपने अंदर कहीं वह इसे पक्का करने का एक संकेत ढूंढ़ रहे थे कि उन्हें जो बोध हुआ है, और जो उन्हें याद दिलाया गया है, वह इतना अहम मकसद है कि उसके लिए उन्हें वह सब कुछ भूल जाना चाहिए, जो उन्हें पसंद है।इंद्रोत्सव मनाना बंद करने और गोपोत्सव का नया उत्सव शुरू करने के इस क्रांतिकारी कदम के बाद गोवर्धन पहाड़ की तराई में हर कोई खुशी मना रहा था। अचानक बारिश की जोरदार बौछारों के साथ एक भयानक तूफान उठा और नदी उफनने लगी। गोकुल के सीधे-सादे लोगों को लगा कि इंद्रोत्सव न मनाने के कारण इंद्र देव उनसे कुपित हो गए हैं और बारिश की इन बौछारों में उन्हें डुबाने वाले हैं। यमुना का पानी बढ़ता जा रहा था। कृष्ण इस इलाके को अच्छी तरह से जानते थे। उन्होंने गोवर्धन पहाड़ में कई जगह सुराख देखे थे। वह गोकुल के युवाओं को वहां लेकर गए। जब उन्होंने ज्यादा जगह बनाने के लिए कुछ चट्टानें हटाईं, तो वहां एक विशाल गुफा का पता चला। पशुओं सहित हर कोई उस विशाल गुफा के अंदर जाने लगा, मगर वह जगह काफी नहीं थी।फिर अचानक पूरा पहाड़ जमीन से छह फीट ऊपर उठ गया और वह गुफा इतनी बड़ी हो गई कि जानवरों समेत ब्रज का सारा जनसमूह उसमें समा सकता था। वे आराम से कुछ दिनों तक उसमें रहे। बाढ़ का पानी उतरने के बाद ही वे बाहर निकले। इस प्रकार कृष्ण ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की और इंद्र का मान-मर्दन किया।
- दिवाली का पवित्र त्योहार आने वाला है. इस साल दीपावली 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी. कहते हैं कि दिवाली-धनतेरस जैसे शुभ त्योहार आने से पहले घर की अच्छी तरह सफाई कर लेनी चाहिए और कुछ अशुभ चीजों को बाहर निकाल देना चाहिए, जिनके कारण घर में दरिद्रता पांव पसारती है. ऐसी ही कुछ चीजों के बारे में ज्योतिषाचार्य प्रवीण मिश्र ने बताया है.खंडित मूर्तियां-दिवाली से पहले घर के मंदिर की साफ-सफाई जरूर करनी चाहिए. इस दौरान टूटी या खंडित मूर्तियों को घर से बाहर निकाल दें. इन मूर्तियों को कूड़े-कचरे में बिल्कुल न फेंके. इन्हें या तो नदी-तालाब में विसर्जित कर दीजिए या फिर किसी पवित्र या खाली स्थान पर रख दीजिए.बंद घड़ीआपके घर में जितनी भी बंद घड़ियां हैं या तो उन्हें चालू करवा लें या फिर घर से बाहर कर दें. घर में बंद घड़ियों का होना शुभ नहीं माना जाता है. वास्तु शास्त्र के अनुसार, बंद घड़ियां इंसान के दुर्भाग्य का कारण बन सकती हैं. ऐसे लोगों के घर में दरिद्रता बहुत जल्दी पांव पसारती है.जंग लगी चीजेंयदि घर में जंग लगा हुआ लोहा या अनुपयोगी सामान पड़ा है तो उसे तुरंत बाहर कर दीजिए. कोई भी ऐसा सामान जो बहुत दिनों से उपयोग नहीं हुआ है. टूटा-फूटा या खराब हो चुका है, उसे फौरन बाहर कर दें. जंग लगा हुआ ताला, पुराने खोटे सिक्के, पुराने बर्तन या कोई भी गैर-जरूरी सामान घर में बिल्कुल न रहने दें.खराब फर्नीचरदिवाली की सफाई में टूटा हुआ फर्नीचर भी घर से बाहर करें. दीमक लगा सोफा, टूटी हुई कुर्सी या जंग खाई मेज घर में रहने रहने से नकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है. यदि वो रिपेयर कराने की स्थिति में है तो करवा लीजिए, अन्यथा घर से बाहर करना ही एकमात्र विकल्प है.टूटा शीशादिवाली की सफाई में कांच का टूटा हुआ सामान भी घर से बाहर कर दें. अक्सर लोग कांच का महंगा सामान घर ले आते हैं. लेकिन उसके टूटने के बावजूद उसे बाहर नहीं फेकते हैं. ऐसा करना गलत है. घर में टूटा हुआ कांच रखना अशुभ होता है. कांच के टूटे बर्तन या आईना रखना भी ठीक नहीं माना जाता है.फटे-पुराने कपड़ेअपने घर में फटे-पुराने कपड़े बिल्कुल न रखें. जो कपड़े पुराने हो चुके हैं. फट चुके हैं और आप अब उनका इस्तेमाल नहीं करते हैं, उन्हें तुरंत घर से बाहर कर दीजिए. ऐसे कपड़े आदमी को बदकिस्मत बनाते हैं.
- कार्तिक मास की शुरुआत 7 अक्टूबर, मंगलवार से हो चुकी है। इस महीने का हिंदू धर्म में खास महत्व होता है और इसे बेहद पवित्र माना गया है। इस दौरान विष्णुजी नारायण रूप में जल में विराजमान रहते हैं। ऐसे में इस माह को धर्म मास भी कहा जाता है। इसलिए इस महीने के दौरान कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए और खान-पान से जुड़े नियमों का ख्याल रखना भी आवश्यक होता है। शास्त्रों में कार्तिक मास में खान-पान के कई नियम बताए गए हैं। इनका पालन करने से स्वास्थ्य बेहतर रहता है और लक्ष्मी-नारायण की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि आने के संयोग बनते है। ऐसे में आइए विस्तार से जानें की कार्तिक मास में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए...कार्तिक मास में बैंगन से करें परहेजमान्यता है कि कार्तिक मास में बैंगन खाने से बचना चाहिए। कहा जाता है कि इस महीने के दौरान पित्त दोष संबंधित समस्याएं होने का भय अधिक रहता है। वहीं, बैंगन खाने से पित्त दोष बढ़ सकता है। यही कारण है कि कार्तिक के महीने में बैंगन खाने के मनाही होती है। उत्तेजना वर्धन होने के चलते बैंगन को धार्मिक दृष्टि से शुद्ध नहीं माना जाता है और इस महीने के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।कार्तिक मास में न खाएं दहीइस अवधि के दौरान दही खाने की मनाही होती है, क्योंकि इसे कार्तिक मास में स्वास्थ्य के लिए सही नहीं माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक के महीने में दही खाना संतान के लिए अच्छा नहीं होता है। हालांकि, इस अवधि में आप दही की जगह दूध का सेवन कर सकते हैं।भूलकर भी न खाएं मछलीकार्तिक के महीने में तामसिक भोजन करना वर्जित माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से इस अवधि में विशेष रूप से मछली का सेवन करना शुभ नहीं माना जाता है। कहा जाता है कि इस महीने में भगवान विष्णु जल में अपने मत्स्य अवतार के रूप में होते हैं। यही कारण है कि कार्तिक के महीने में मछली का सेवन करना वर्जित माना गया है। इसके अलावा, आषाढ़ में अधिक वर्षा और बाढ़ आने से जल प्रदूषित हो जाता है। ऐसे में वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसका सेवन करना सही नहीं माना जाता है।करेले का सेवन करना है वर्जितमाना जाता है कि कार्तिक मास में करेला का सेवन करने से भी बचना चाहिए। इसे वातकारक माना गया है और इसमें कभी-कभी कीड़े भी लग जाते हैं। ऐसे में अगर आप इस समय करेला खाते हैं तो स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि कार्तिक मास में करेले का सेवन करना सही नहीं माना जाता है।मूली का सेवन करने से मिलेगा लाभकार्तिक मास में कुछ चीजों को खाना सही नहीं माना जाता है। लेकिन कुछ चीजों का सेवन करना बेहद फायदेमंद माना गया है। माना जाता है कि इस महीने में मूली खाना बेहद लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इस मौसम में कफदोष और पित्तदोष जैसी समस्याएं होने का भय होता है। ऐसे में मूली का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।कार्तिक मास में खाएं आंवलाइस महीने में आंवला नवमी मनाई जाती है, जिसमें आंवले के वृक्ष और भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान होता है। स्वास्थ्य के लिहाज से भी कार्तिक के महीने में आंवला खाना बहुत फायदेमंद माना गया है। इससे जातक के सेहत पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। कार्तिक के महीने में आंवला नवमी पर आंवले की वृक्ष की पूजा करने से लक्ष्मी-नारायण का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।कार्तिक के महीने में जरूर करें ये कामइस अवधि में खान-पान से जुड़े नियमों का ध्यान रखने के साथ-साथ एक काम भी अवश्य करना चाहिए। मान्यता है कि कार्तिक के महीने में नियमित रूप से भगवान विष्णु को तिल जरूर अर्पित करने चाहिए। साथ ही, इस दौरान तिल का सेवन करना भी लाभदायक माना जाता है। ऐसा करने से आपको विष्णुजी की कृपा प्राप्त हो सकती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
- कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है. कहते हैं कि इसी दिन भगवान धनवंतरी समुद्र मंथन से अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे. धनतेरस पर धनवंतरी, मां लक्ष्मी और कुबेर महाराज की पूजा करने से बहुत लाभ मिलता है. इस दिन कुछ खास चीजों को खरीदना भी बहुत शुभ माना जाता है. इस साल 18 अक्टूबर को धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा. आइए जानते हैं कि धनतेरस पर कौन सी चीजें खरीदने से आपकी तकदीर संवर सकती है.लक्ष्मी जी की प्रतिमादिवाली के शुभ अवसर पर भगवान गणेश और लक्ष्मी जी की पूजा का विधान है. इस दिन मां लक्ष्मी और बुद्धि के देवता गणेश दोनों की संयुक्त पूजा की जाती है. धनतेरस पर माता लक्ष्मी और गणेश की मूर्ति खरीदें. लक्ष्मी और गणेश की मूर्तियां अलग-अलग होनी चाहिए. ध्यान रहे कि इस दिन कमल पर विराजित लक्ष्मी को घर लाना उत्तम होता है.दक्षिणावर्ती शंखसमुद्र मंथन से निकलने वाले दक्षिणावर्ती शंख को मां लक्ष्मी का भाई माना जाता है. इस शंख की ध्वनि बेहद मंगलकारी होती है. धनतेरस पर दक्षिणाणवर्ती शंख खरीदें और उसे घर के मंदिर में रख दें. दीपावली पर इसकी पूजा करना बेहद फलदायी माना जाता है.कुबेर यंत्रधनतेरस के त्योहार पर घर में कुबेर यंत्र की स्थापना करना भी बहुत शुभ होता है. इस दिन कुबेर यंत्र लेकर आएं और घर के मंदिर में स्थापित करें. पूरे साल धन लाभ होगा.चांदीचांदी सुख-समृद्धि देने वाली धातु मानी जाती है. धनतेरस पर चांदी के आभूषण या चांदी का सिक्का खरीदना शुभ माना जाता है. दिवाली पूजा में इस सामान को देवी लक्ष्मी के समक्ष रखा जाता है.गोमती चक्रगोमती चक्र एक खास तरह का पत्थर होता है. यह कई रंगों का होता है, लेकिन सफेद गोमती चक्र सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. आप इसे रत्न की तरह अंगूठी में डाल सकते हैं. धनतेरस पर आप दो या पांच गोमती चक्र खरीद सकते हैं. गोमती चक्र दीपावली के दिन मां लक्ष्मी को अर्पित किया जाता है.खील बताशेधनतेरस के दिन खील बताशे खरीदना बहुत शुभ माना जाता है. खील बताशे शुक्र का प्रतीक होते हैं और सुख-संपन्नता बढ़ाते हैं. दिवाली की पूजा के दौरान मां लक्ष्मी को खील बताशे अर्पित किए जाते हैं. खील बताशे को मिटटी के पात्र में रखकर पूजा करना उत्तम होता है.कौड़ीकौड़ी समुद्री जीवों का खोल है. धन के रूप में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है. धनतेरस पर पांच या नौ कौड़ियां खरीदें. कौड़ी को दीपावली के दिन अर्पित करने या पूजा में इस्तेमाल करने से आर्थिक मोर्चे पर लाभ होता है और घर में सुख-शांति बनी रहती है.झाड़ूशास्त्रों में झाड़ू को शुभता और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है. इसलिए धनतेरस पर झाड़ू खरीदने की परंपरा है. धनतेरस और दिवाली के दिन इसकी पूजा भी करनी चाहिए. इसके बाद ही इसका उपयोग करें.बर्तनधनतेरस पर आप किसी भी तरह का बर्तन खरीद सकते हैं. हालांकि इस त्योहार पर पानी का पात्र खरीदना सबसे अच्छा है. इस दिन आप गिलास, कलश या लोटा खरीद सकते हैं. इन बर्तनों को दीपावली के बाद प्रयोग करें.धनियाधनतेरस के दिन साबुत धनिया खरीदना भी बहुत शुभ माना जाता है. इस दिन धनिया लाने के बाद उन्हें पूजन स्थल पर रखें. कहते हैं कि इससे भगवान कुबेर और धनवतंरी प्रसन्न होते हैं. दिवाली के बाद सुबह इन्हें गमले में डाल दें.
- छोटे से कमरे के लिए रंगोली की डिजाइनदिवाली की सजावट रंगोली के बिना अधूरी लगती है। लेकिन बड़े शहरों में छोटे घरों में रहने वाले लोगों को बिना रंगोली बनाए ही दिवाली की सजावट करनी होती है। अगर आपको रंगोली बनाना पसंद है तो छोटे से कमरे में एक कोने में रंगोली की ये छोटी और सरल डिजाइन बनाएं।दीये वाली डिजाइनकमरे के कोने में छोटी सी जगह में दिवाली के दीये सी जगमगाती इस डिजाइन को बनाएं। कम रंगों के इस्तेमाल से ये डिजाइन फटाफट बनकर तैयार हो जाती है।शुभ लाभ वाली रंगोलीपूजा घर के कोने में रंगोली बनाना चाहती हैं तो इस तरह की शुभलाभ वाली रंगोली को बनाकर ट्राई कर सकती हैं। किनारों पर रंगों के ढेर रखने के साथ दीये जलाना ना भूलें।फूलों वाला कोनारंगोली के नाम पर वहीं पुराने टाइम वाला अल्पना ना बनाएं. बल्कि ये यूनिक, सिंपल और छोटी सी डिजाइन को घर के फ्रंट में एक कॉर्नर पर बनाकर डेकोरेशन को पूरा करें।मां लक्ष्मी के चरणपूजा घर के फ्रंट में छोटी सी जगह में मां लक्ष्मी के चरण के साथ रंगों को यूं बिखेर दें। बस दीया जलाकर रंगोली की डिजाइन को पूरा कर दें।मां लक्ष्मी के चरण और फूलसबसे छोटी और दिखने में सुंदर होने के साथ ही बनाने में बिल्कुल आसान सी है ये रंगोली। साथ ही इसमे आपको मां लक्ष्मी के चरण अलग से बनाने की भी जरूरत नहीं होगी।बनाएं फूलों के साथ दीयाघर के किसी कोने में थोड़ी जगह है तो दीया के साथ फूलों वाली इस डिजाइन को बना लें। ये बनाने में बहुत आसान है और फटाफट बनकर तैयार हो जाएगी।बना लें अल्पनारंगोली बनाने के लिए कोई डिजाइन नहीं बन पा रही है तो बस ये सुंदर से फूल को रंगों की मदद से सजा लें। बन जाएगी छोटे से कमरे के दरवाजे पर ये रंगोली डिजाइन।
- दिवाली, जिसे दीपावली भी कहा जाता है, हिंदू धर्म का प्रमुख पर्व है जो अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और अज्ञानता पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है. यह पर्व पांच दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली दो प्रमुख दिन होते हैं. इन दोनों में तिथियों, पूजा विधियों और धार्मिक महत्व के आधार पर अंतर होता है.छोटी दिवाली (नरक चतुर्दशी)छोटी दिवाली, जिसे नरक चतुर्दशी या रूप चौदस भी कहते हैं, दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाती है. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध कर 16,100 कन्याओं को मुक्त किया था. इसी कारण इस दिन को नरक चतुर्दशी कहा जाता है. इस दिन सूर्योदय से पहले उबटन और स्नान करने की परंपरा है, जिससे समस्त पाप समाप्त होते हैं. साथ ही यमराज की पूजा करके अकाल मृत्यु से मुक्ति की कामना की जाती है और घर में दीपक जलाकर वातावरण को शुद्ध किया जाता है.बड़ी दिवाली (लक्ष्मी पूजन)बड़ी दिवाली, जिसे मुख्य दिवाली या लक्ष्मी पूजन भी कहते हैं, कार्तिक माह की अमावस्या को मनाई जाती है. इस दिन भगवान रामचन्द्रजी 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे थे, तभी अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया. इसी कारण इस दिन को दीपावली कहा जाता है. इस दिन देवी लक्ष्मी, भगवान गणेश और सरस्वती की पूजा करके घर में सुख, समृद्धि और ज्ञान की प्राप्ति की कामना की जाती है. घर को दीपों और रंग-बिरंगी झालरों से सजाया जाता है.छोटी और बड़ी दिवाली: उत्सव और परंपराओं में अंतरछोटी दिवाली के दिन लोग सामान्य रूप से हल्का भोजन करते हैं और साधारण पूजा-अर्चना में ही अपने दिन की शुरुआत करते हैं. इस दिन का मुख्य उद्देश्य आत्म-शुद्धि और अंधकार पर विजय है, इसलिए उत्सव सरल और शांतिपूर्ण रहता है. इसके विपरीत, बड़ी दिवाली पर पूरे घर और परिवार में उल्लास और खुशी का माहौल होता है. लोग पूरे परिवार और मित्रों के साथ मिलकर दीप जलाते हैं, रंगोली बनाते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और विशेष पूजा-अर्चना के साथ समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं. बड़ी दिवाली का उत्सव न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और पारिवारिक रूप से भी आनंदपूर्ण होता है.




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