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कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक चढ़ने के बाद थोड़ा नरम पड़ा

शिकागो. ईरान युद्ध के तेज होने से पश्चिम एशिया में उत्पादन और पोत परिवहन पर मंडराते खतरे के बीच सोमवार को कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं। हालांकि, बाद में कीमतों में कुछ नरमी देखी गई, लेकिन इस उथल-पुथल से दुनिया भर के शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय तेल मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत सुबह उछलकर 119.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, लेकिन बाद में यह 14 प्रतिशत की बढ़त के साथ 106 डॉलर के आसपास कारोबार कर रही थी। इसी तरह, अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) 119.48 डॉलर तक पहुंचने के बाद घटकर 103 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया। जमीनी हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। बहरीन ने ईरान पर पीने के पानी की आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण एक खारे पानी को पीने लायक बनाने के संयंत्र पर हमला करने का आरोप लगाया है। वहीं, बहरीन की राष्ट्रीय तेल कंपनी ने अपने रिफाइनरी परिसर में आग लगने के बाद खेपों के लदान के लिए 'अपरिहार्य परिस्थिति' घोषित कर दी है। इसका अर्थ यह है कि युद्ध के कारण पैदा हुई असाधारण परिस्थितियों की वजह से कंपनी अब तेल की आपूर्ति से जुड़े अपने पिछले समझौतों को पूरा करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। इधर, इजराइल द्वारा रात भर किए गए हमलों के बाद तेहरान में तेल डिपो से धुआं उठते देखा गया।
युद्ध के दूसरे सप्ताह में प्रवेश करने के साथ ही फारस की खाड़ी से ऊर्जा आपूर्ति पर संकट गहरा गया है। कीमतों में आई ताजा नरमी का कारण उन खबरों को माना जा रहा है जिनमें कहा गया है कि जी-7 देश रणनीतिक तेल भंडार से आपूर्ति जारी करने पर विचार कर रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे एक विकल्प बताते हुए कहा कि जी-7 नेता इस सप्ताह समन्वय के लिए बैठक कर सकते हैं, जबकि जी-7 के वित्त मंत्री सोमवार को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये चर्चा कर रहे हैं। स्वतंत्र शोध कंपनी रिस्टैग एनर्जी के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते रोजाना लगभग 1.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल भेजा जाता है, जो वैश्विक आपूर्ति का 20 प्रतिशत है। ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे के कारण इस मार्ग से टैंकर की आवाजाही लगभग ठप है। ईरान प्रतिदिन लगभग 1.6 करोड़ बैरल तेल निर्यात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा चीन को जाता है। चीन ने आपूर्ति स्थिर रखने की अपील करते हुए कहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। इस संकट का असर एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर सबसे ज्यादा दिख रहा है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने तेल की जमाखोरी के खिलाफ सख्त चेतावनी दी है। शेयर बाजारों में भी भारी गिरावट रही, जापान का निक्की सात प्रतिशत से अधिक गिरा, जबकि दक्षिण कोरिया का कॉस्पी छह प्रतिशत टूटकर 5,251.87 अंक पर आ गया। ऊर्जा लागत बढ़ने से अमेरिका में भी महंगाई का दबाव बढ़ा है, जहां पेट्रोल की औसत कीमत 3.48 डॉलर और डीजल 4.66 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गया है। प्राकृतिक गैस की कीमतें भी बढ़कर 3.34 डॉलर प्रति 1,000 घन फुट हो गई हैं। तेल की कीमतों में ऐसा उछाल आखिरी बार 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी देखा गया था।

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