महिला दिवस
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
“ सुनो! आज हमारी संस्था महिला दिवस पर कुछ विशिष्ट सफल महिलाओं को सम्मानित करने जा रही है तो आज मुझे देर हो जाएगी, तुम खाना खा लेना “ दिया ने अपने पति अमन से कहा।
“ हूँ…जरूर , पर यह बताओ महिला दिवस क्या प्रबुद्ध व विशिष्ट महिलाओं के लिए ही है या सबके लिए? “ अमन ने सफाई करती रमिया और खाना बनाती केतकी की ओर इशारा करते हुए पूछा।
“ ओह ! मैंने यह क्यों नहीं सोचा ? दिया ने अपने पर्स से पाँच-पाँच सौ के नोट निकाल कर रमिया, केतकी को देते हुए कहा –” आप दोनों शाम को अपने परिवार के साथ कुछ खा लेना और हाँ शाम की छुट्टी ..महिला दिवस की शुभकामनाएं ।” दोनों के खिले चेहरे देखकर दिया को महिला दिवस की सार्थकता अब महसूस हुई।










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