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 शरणागति का सिद्धांत हर धर्म मानता है. - सुश्री धामेश्वरी देवीजी

-दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 20 दिसम्बर तक रोज शाम 6 से रात 8 बजे तक होगा।
 भिलाई।, बडा दशहरा मैदान रिसाली सेक्टर में जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी की दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के पाॅंचवें दिन देवी जी ने वेद और शास्त्रों के प्रमाण सहित बताया कि भगवान कृपा सभी के ऊपर करना चाहते हैं। किन्तु भगवान की कृपा का भी एक कानून है। वह कानून है कि जो भी शर्त पूरा करेगा वह उसी पर कृपा करेंगें। और वह शर्त है शरणागति। शरणागति का सिद्धांत है उसे हर धर्म मानता है। लेकिन शरणागति का मतलब यह न समझे कि भगवान कोई मूल्य ले रहे हैं। फिर लोगो को भी यह लगेगा कि हमने चारों धाम किया, हमने भजन सुने, माला फेरी तो इससे लोगों का अंहकार बढ़ेगा। इसलिए भगवान ने गीता में शरणागति का अर्थ बताया अर्थात् कुछ न करना। कुछ न करना का मतलब कर्तापन का अभिमान त्याग देना। कि मैं शरणागत हूं। दूसरी बात यह है कि शरणागति मन को करनी होगी। हम सभी इन्द्रियों से भगवान शरणागति करते हैं जैसे हाथो से माला फेरना, वाणी से पाठ करना, पैरों से तीर्थो आदि में जाना इंद्रियों की भक्ति भगवान नोट नहीं करते । भगवान की मन भक्ति या मन की शरणागति नोट करते है इसलिये वह अकारण करूण है। जहां मन का प्रश्न आता है तो लोग बहाना बनाते हैं कि हमारा मन भगवान में नहीं लगता। मन की शरणागति पर इसलिये जोर दिया शास्त्रों ने क्योंकि मन बंधन का कारण है और मोक्ष का भी कारण है। यह मन अनादिकाल से संसार में आसक्त है और जब तक यह संसार मे ंआसक्त है तो भगवान में लग ही नहीं सकता। तदर्थ मन को संसार से विरक्त करना होगा यदि हम मन को संसार से विरक्त नहीं करेंगें तो केवल इंद्रियों से ही भगवान की भक्ति करेंगें और इंद्रियों की भक्ति भक्ति नहीं है।  मन भगवान में तभी लगेगा जब संसार से विरक्त हो जाए। और संसार से विरक्त तब तक नहीं हो सकता जब तक संसार का वास्तविक स्वरूप न समझ लें। तो संसार का वास्तविक स्वरूप क्या है यह देवी जी कल बताएंगी। दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 20 दिसम्बर 2024 तक रोज शाम 6 से रात 8 बजे तक होगा।

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