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एमआईएफएफ :  संजीव सिवन ने कहा: फिल्म निर्माता का सबसे बड़ा उपकरण कैमरा नहीं, बल्कि जिज्ञासा है

 नई दिल्ली।   राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता और डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार श्री संजीव सिवन ने शुक्रवार को 19वें मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (एमआईएफएफ) में “सामाजिक प्रचार-प्रसार का सिनेमा: मुद्दों को कहानी में बदलना और उन्हें सामने लाना” विषय पर मास्टरक्लास देते हुए उभरते कहानीकारों से कहा कि वे टेक्नोलॉजी से अधिक जिज्ञासा को महत्व दें।

 महोत्‍सव की चल रही मास्टरक्लास सीरीज़ के तहत आयोजित इस कार्यशाला में, सिवन ने प्रतिभागियों को दिखाया कि असल ज़िंदगी के मुद्दों को असरदार फ़िल्मी कहानियों में कैसे बदला जा सकता है। इसके लिए उन्होंने अपने करियर में बनाई 75 से अधिक डॉक्यूमेंट्री, 30 से ज़्यादा शॉर्ट फ़िल्मों और कई फ़ीचर फ़िल्मों के उदाहरण दिए।सिवन ने कहा, "मुझे लगता है कि आपके लिए सबसे ज़रूरी कैमरे नहीं, बल्कि जिज्ञासा होनी चाहिए।" उन्होंने कहा कि शानदार कहानियां महंगे उपकरणों से नहीं, बल्कि लोगों को देखने-समझने, रिसर्च करने और उनसे सच्चे जुड़ाव से बनती हैं।
सिवन ने अपने फिल्म निर्माण के सफर से जुड़े अनुभव साझा करते हुए, अपनी कई सराहनीय कृतियों के बनने की कहानी बताई। उन्होंने बताया कि कैसे अमेरिका में एक 'ओइजा बोर्ड' (Ouija board) से अचानक हुई मुलाक़ात से उनकी जिज्ञासा बढ़ी, जिससे उनकी 15 मिनट की पहली एक डॉक्यूमेंट्री बनी और बाद में ममूटी स्टारर मलयालम फ़ीचर फ़िल्म 'अपरिचितन' बनी। उन्होंने बताया,"यह फ़िल्म पहले एक डॉक्यूमेंट्री थी, लेकिन बाद में फ़ीचर फ़िल्म बन गई।" इस तरह उन्होंने समझाया कि कैसे एक ही विचार अलग-अलग फ़ॉर्मेट में विकसित हो सकता है।
पूरे सत्र के दौरान, सिवन ने उभरते फिल्मकारों को याद दिलाया कि डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में अंततः विषयों की बजाय लोगों के बारे में होती हैं। उन्होंने कहा, "यदि आप मछुआरों पर कोई डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं, तो कहानी मछली पकड़ने के बारे में नहीं है। यह उनके जीवन निर्वाह के बारे में है। यदि आप किसी गांव पर फ़िल्म बना रहे हैं, तो वह भूगोल के बारे में नहीं, बल्कि उसकी पहचान के बारे में है।"उन्होंने डॉक्यूमेंट्री के विषयों (जिन लोगों पर फ़िल्म बन रही है) के साथ भरोसा कायम करने के महत्व पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, "लोगों को खुलकर बात करने से पहले सहज महसूस करना चाहिए। इसमें कई दिन, कई महीने या यहां तक कि कई वर्ष भी लग सकते हैं।"
सिवन ने नॉन-फ़िक्शन फ़िल्ममेकिंग में नैतिक ज़िम्मेदारियों की चर्चा करते हुए, सनसनी फैलाने से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा, "जब आप डॉक्यूमेंट्री बनाते हैं, तो आपकी एक ज़िम्मेदारी होती है। आप सिर्फ़ इसे नाटकीय बनाने के लिए गलत चीज़ें नहीं दिखा सकते या बता सकते हैं।"अनुभवी फिल्म निर्माता ने अपनी फिल्मों  जैसे 'लिटिल विमेन' पर भी चर्चा की, जिसमें तस्करी और वेश्यावृत्ति के बाद अपना जीवन फिर से संवारने वाली महिलाओं के जीवन को दिखाया गया था। उन्होंने संगीतकार शंकर महादेवन पर आधारित बायोग्राफिकल डॉक्यूमेंट्री 'डिकोडिंग शंकर' और भारतीय नौसेना के लिए किए गए प्रोजेक्ट्स  पर भी बात की। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे उनकी डॉक्यूमेंट्री 'आफ़्टर लाइफ़' से उन्हें अपनी पुरस्कार विजेता मलयालम फ़ीचर फ़िल्म 'वेनालोडुंगाथे' (एंडलेस समर) बनाने की प्रेरणा मिली। इससे पता चलता है कि डॉक्यूमेंट्री में की गई ऑब्ज़र्वेशन (अवलोकन) कैसे फ़िक्शन (काल्पनिक कहानी) का आधार बन सकती हैं।
युवा फ़िल्म निर्माताओं को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और ओटीटी सर्विस की वजह से उपलब्ध अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित करते हुए सिवन ने कहा कि फ़िल्म बनाना अब पहले से कहीं ज़्यादा आसान हो गया है। उन्होंने कहा, "आपको बड़े क्रू की ज़रूरत नहीं है। बस अच्छी लाइव साउंड होनी चाहिए। इसके अलावा, फ़िल्म शूट करने के लिए तीन से अधिक लोगों की आवश्यकता नहीं होती है।" सत्र का समापन करते हुए, सिवन उसी बात पर वापस आए जिसने उनके करियर को दिशा दी है। उन्होंने कहा, "हर जगह, हर उस व्यक्ति में जिससे आप मिलते हैं, एक कहानी होती है। अपनी कहानी बनाएं और उसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में सही तरीके से प्रदर्शित करें, ताकि आपकी पहचान बढ़े और फ़िल्म के डिस्ट्रीब्यूशन के अवसर मिल सकें।"

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