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झोपड़ी से पक्के घर तक: एक परिवार की बदली हुई जिंदगी की कहानी

प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) बनी सहारा, अब परिवार को मिला सुरक्षित छत और बेहतर भविष्य का भरोसा
रायपुर/
जब दूसरे लोग अपने घरों की मरम्मत या सजावट के बारे में सोचते हैं, उसी समय तिल्दा के ग्राम पंचायत बेमता की बृहस्पति निषाद के मन में बस एक ही सवाल रहता था कि क्या कभी उसका भी अपना पक्का घर होगा?
श्रीमती बृहस्पति निषाद अपने पति श्री बहादुर निषाद और तीन बच्चों के साथ जिस जगह रहती थीं, उसे घर कहना भी मुश्किल था। लकड़ी के सहारे और फटे-पुराने कपड़ों से बना एक अस्थायी सा ढांचा जो बारिश, हवा और धूप में हर बार नए सिरे से खड़ा करना पड़ता था। और इसी में उनका पूरा परिवार जीवन काट रहा था।
गांव में जब भी किसी का पक्का घर बनता, श्रीमती बृहस्पति चुपचाप उसे देखतीं। कई बार वह पंचायत पहुंचकर पूछतीं कि उनका घर कब बनेगा। जवाब लगभग हर बार एक जैसा होता। 2011 की जनगणना सूची में नाम नहीं है। धीरे-धीरे उन्होंने यह मान लिया कि शायद उनका घर इस जन्म में नहीं बन पाएगा।
फिर 2018 में एक छोटी सी जानकारी ने उनके सोचने का तरीका बदल दिया। पंचायत से पता चला कि उनका नाम “आवास प्लस” सूची में जोड़ दिया गया है। यह खबर उम्मीद जैसी थी, लेकिन उसके बाद भी इंतजार खत्म नहीं हुआ। वह बार-बार पंचायत जातीं, खाते में पैसे आने के बारे में पूछतीं, और हर बार उन्हें थोड़ा और इंतजार करने को कहा जाता।
समय बीतता रहा। उम्मीद बनी रही, लेकिन धीमी।
फिर 2024-25 में एक दिन पंचायत सचिव उनके घर पहुंचे। उन्होंने आवास स्वीकृत होने की जानकारी दी और जरूरी दस्तावेज लेकर चले गए। एक हफ्ते के भीतर जब पहली किस्त उनके खाते में आई, तो श्रीमती बृहस्पति को पहली बार लगा कि अब बात आगे बढ़ेगी।
कुछ दिनों बाद निरीक्षण के लिए आईं अधिकारी ने उन्हें एक सीधी सलाह दी कि जितनी राशि है, उसी में छोटा लेकिन पक्का घर बनाएं। उधार लेकर बड़ा बनाने के बजाय, अपने हिसाब से एक कमरा और रसोई तैयार करें। श्रीमती बृहस्पति ने इस बात को गंभीरता से लिया।
इसके बाद घर बनना शुरू हुआ, धीरे-धीरे, किस्तों के साथ। बहादुर और बृहस्पति दोनों ने खुद मजदूरी करते हुए, सामान जुटाते हुए, अपने ही घर को खड़ा किया। बच्चों के साथ मिलकर ईंटें उठाना, रेत डालना, दीवारें खड़ी करना, यह सिर्फ निर्माण नहीं था, यह उनके जीवन में एक स्थिरता बनाने की कोशिश थी।
हर नई दीवार के साथ उनका भरोसा भी मजबूत होता गया। अब उन्हें हर मौसम से डरकर रात नहीं बितानी पड़ती थी।
आज उनका घर तैयार है छोटा है, लेकिन मजबूत है। पहले जहां उन्हें काम के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता था, अब वे अपने ही गांव में रहकर मजदूरी करते हैं। पंचायत में बन रहे अन्य घरों में काम करते हुए वे दूसरों के सपनों को भी साकार होते देखते हैं।
श्रीमती बृहस्पति कहती हैं कि अब घर लौटने पर एक सुकून मिलता है, जो पहले कभी नहीं था। उनके लिए यह सिर्फ छत नहीं, बल्कि एक सुरक्षित शुरुआत है।

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