सुखद भविष्य
-लघुकथा
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
आज अक्षत घर आ रहा था । घर में त्यौहार-सा माहौल था। राखी बेहद खुश थी , उसका बेटा अर्चित केलिफोर्निया में एक अच्छी नौकरी पाकर आ रहा था । उसे ऐसा लग रहा था मानो उसकी वर्षों की साधना आज सफल हुई हो । अतीत के काले साए अब उसे डराने नहीं, उसका हौसला बढ़ाते महसूस हो रहे थे । आज से बीस वर्ष पहले यदि उसने अपने शराबी व दुर्व्यसनी परन्तु अमीर पति को छोड़ने का साहस नहीं दिखाया होता तो शायद यही बेटा घर के किसी कोने में पीकर पड़ा होता । पिता को देखकर उनके पीने व लड़खड़ाने का अभिनय करता अर्चित समझ ही नहीं पाया था कि माँ ने क्यों उसे तमाचा लगा दिया था । शायद पिता का अनुकरण करने के भय ने ही राखी को इतनी हिम्मत दी कि वह परिवार व समाज के खिलाफ उठ खड़ी हुई थी । बहुत परिश्रम और संघर्ष करके वह अपने बच्चों को स्वावलंबन की शिक्षा दे पाई थी । बच्चे तो कच्ची मिट्टी से होते हैं जो देखते हैं वही सीखते हैं , उन्हें जिस साँचे में ढालो ,वे ढल जाते हैं । उसकी लगन और संस्कार का बच्चों ने मान रखा था । अर्चित और आराध्या ने उसे अपना आदर्श मानकर कभी श्रम से जी नहीं चुराया और आगे बढ़े । सच है सुखद *भविष्य* के सपने कठोर परिश्रम के पलकों में ही पलते हैं विलासिता के हिंडोले में नहीं ।








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