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दरार

-लघुकथा 
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
आज वर्षों बाद उषा को स्टेशन में देख कर रेखा  की आँखें भर आईं। एक जमाने में दोनों की दोस्ती लोगों के लिए मिसाल बन गई थी। दोनों ने बचपन से एक साथ पढ़ाई की , दोनों के घर भी पास थे तो वे हर जगह साथ ही जाते । उषा की तबीयत खराब होने पर रेखा उसके लिए नोट्स तैयार करती इसी प्रकार रेखा को कहीं जाना पड़ता तो उषा उसके सारे काम करती । गर्मी की छुट्टियों के दिन थे, रेखा के मम्मी-पापा को कुछ काम से बाहर जाना पड़ा ।उसकी दादी के बीमार होने के कारण  रेखा को रुकना पड़ा ।उसने उषा को साथ रहने के लिए बुलाया। वह जाने के लिए तैयार ही हुई थी कि उसके पापा को हृदयाघात हुआ और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा । व्यस्तता के कारण उषा रेखा को कुछ बता पाई नहीं पाई और रेखा को यह गलतफहमी हो गई कि वह जान-बूझकर नहीं आई । उसने सच्चाई या कारण पता करने की जरूरत भी नहीं समझी और आना- जाना , बात करना बंद कर दिया ।इधर  उषा भी  रेखा से नाराज थी कि उसके पापा की इतनी गम्भीर स्थिति होने पर   रेखा मिलने नहीं आई , न ही उनका हाल पूछा । दोनों अपने मन में शिकायतें रखे रहे और एक- दूसरे से दूर होते गए । कुछ समय बाद उषा के पापा का स्थानांतरण हो गया और वे वहाँ से चले गये । उनके जाने के बाद रेखा को असलियत मालूम हुई और उसे अपने दुर्व्यवहार पर बहुत अफसोस हुआ परन्तु तब तक उनकी दोस्ती में बहुत बड़ी दरार पड़ चुकी थी । वक्त ने कभी मौका भी नहीं दिया कि वह माफी माँगकर इस गलती को सुधार ले । आज  उषा को सामने देख उसकी पीड़ा आँसुओं के रूप में बह निकली थीं । 

 

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