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दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में राजनीतिक चेतना

*पुण्यतिथि (30 दिसंबर) पर विशेष*
- डॉ सुधीर शर्मा 
-अध्यक्ष हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिलाई, छत्तीसगढ़
हिंदी साहित्य में दुष्यंत कुमार (1933–1975) का नाम एक ऐसे कवि के रूप में दर्ज है, जिसने ग़ज़ल को महज़ प्रेम, विरह और व्यक्तिगत संवेदनाओं की सीमाओं से बाहर निकालकर राजनीतिक चेतना और सामाजिक प्रतिरोध का सशक्त माध्यम बना दिया। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल की परंपरागत रूमानियत को नकारे बिना उसे भारतीय लोकतंत्र की जमीनी सच्चाइयों से जोड़ा। यही कारण है कि दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें आज भी संसद, सड़क, अख़बार और आंदोलन—हर जगह समान रूप से प्रासंगिक दिखाई देती हैं।
दुष्यंत कुमार का रचनाकाल स्वतंत्र भारत के उस दौर से जुड़ा है, जब लोकतंत्र स्थापित तो हो चुका था, परंतु सत्ता और जनता के बीच दूरी बढ़ती जा रही थी। स्वतंत्रता के बाद के वादे—रोज़गार, समानता, न्याय—धीरे-धीरे खोखले प्रतीत होने लगे थे। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में दुष्यंत कुमार की राजनीतिक चेतना विकसित होती है।
दुष्यंत कुमार की राजनीतिक चेतना दल-विशेष या विचारधारा-विशेष से बंधी नहीं है। वह किसी राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के कवि हैं। उनकी ग़ज़लों में सत्ता का विरोध है, लेकिन अराजकता नहीं; व्यवस्था की आलोचना है, लेकिन निराशा नहीं; आक्रोश है, परंतु उम्मीद के साथ।
उनकी राजनीति मूलतः मानवीय राजनीति है—जहाँ केंद्र में आम आदमी है। वे सत्ता से सवाल पूछते हैं, क्योंकि सत्ता जनता से जवाबदेह होनी चाहिए। उनका एक प्रसिद्ध शेर है—
“सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”
यह शेर दुष्यंत कुमार के संपूर्ण राजनीतिक काव्य का घोषणापत्र कहा जा सकता है। वे केवल शोर मचाने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि परिवर्तन के पक्षधर हैं।
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों का सबसे सशक्त पक्ष है—सत्ता की संवेदनहीनता पर सीधा प्रहार। वे सत्ता के दमनकारी और झूठे चरित्र को बेनकाब करते हैं। उनकी भाषा सरल है, पर अर्थ गहरा और तीखा।
“मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।”
यह शेर सत्ता की उस मानसिकता पर कटाक्ष है, जहाँ हर असुविधाजनक सच को ‘व्यक्तिगत आलोचना’ कहकर नकार दिया जाता है। यहाँ ‘कोहरा’ राजनीतिक भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और नैतिक पतन का प्रतीक है।
दुष्यंत कुमार यह स्पष्ट कर देते हैं कि समस्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिस्टम की है। उनकी ग़ज़लें सत्ता के इस झूठे नैरेटिव को तोड़ती हैं।
दुष्यंत कुमार लोकतंत्र के सबसे बड़े समर्थक हैं, लेकिन वे उसके खोखलेपन के सबसे बड़े आलोचक भी हैं। वे उस लोकतंत्र पर प्रश्न उठाते हैं, जिसमें जनता केवल वोटर बनकर रह जाती है।
“यह जो लोकतंत्र है, इसमें कुर्सियाँ बहुत हैं,
जनता के लिए मगर रास्ते ही नहीं हैं।” 
यहाँ ‘कुर्सियाँ’ सत्ता, पद और अधिकार का प्रतीक हैं, जबकि ‘रास्ते’ जनता की भागीदारी और न्यायपूर्ण अवसरों के। यह शेर आज के राजनीतिक परिदृश्य में भी उतना ही सटीक बैठता है।
दुष्यंत कुमार लोकतंत्र की उस विडंबना को उजागर करते हैं, जहाँ सत्ता तो जनप्रतिनिधियों के पास है, लेकिन संवेदना गायब है।
दुष्यंत कुमार की राजनीतिक चेतना का केंद्र आम आदमी है—वह आदमी जो महँगाई, बेरोज़गारी, शोषण और अन्याय से जूझ रहा है। उनकी ग़ज़लें इस आदमी की सामूहिक आवाज़ बन जाती हैं।
“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”
यहाँ ‘पीर’ केवल निजी दुख नहीं, बल्कि पूरे समाज का संचित कष्ट है। ‘गंगा’ परिवर्तन, जनआंदोलन और नई चेतना का प्रतीक है। यह शेर राजनीतिक निष्क्रियता के विरुद्ध सक्रिय संघर्ष का आह्वान करता है। *प्रतिरोध का कवि* 
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें प्रतिरोध की संस्कृति को जन्म देती हैं। वे डर के माहौल में भी सच कहने का साहस प्रदान करती हैं।
“कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।”
यह शेर सत्ता द्वारा किए गए वादों और वास्तविकता के बीच की खाई को उजागर करता है। ‘चिराग़’ विकास, सुख और समान अवसर का प्रतीक है, जो जनता तक पहुँच ही नहीं पाता।
दुष्यंत कुमार की राजनीतिक ग़ज़लों की सबसे बड़ी ताक़त है—सरल, संवादात्मक और अख़बारी भाषा। वे कठिन बिंबों या दुरूह प्रतीकों का सहारा नहीं लेते। उनकी भाषा सीधे पाठक से संवाद करती है।
उनकी ग़ज़लें अक्सर संपादकीय टिप्पणी जैसी लगती हैं—संक्षिप्त, स्पष्ट और प्रभावशाली। यही कारण है कि उनके शेर नारे बन जाते हैं, पोस्टर पर लिखे जाते हैं और आंदोलनों में गूँजते हैं।
 *निराशा नहीं, उम्मीद का कवि* 
दुष्यंत कुमार का राजनीतिक स्वर निराशावादी नहीं है। वे अंधेरे को पहचानते हैं, लेकिन रोशनी की संभावना से इंकार नहीं करते।
“अँधेरे में ही सही, हाथ तो मिलाओ यारो,
नई सुबह की कोई तो शुरुआत हो।” 
यह आशावाद उनकी राजनीतिक चेतना को संतुलित बनाता है। वे जानते हैं कि परिवर्तन धीरे आता है, लेकिन आता ज़रूर है।
आज जब लोकतंत्र पर फिर से सवाल उठ रहे हैं—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की भूमिका, जनता की आवाज़—ऐसे समय में दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें और अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि—
सत्ता से सवाल करना नागरिक का अधिकार है चुप रहना सबसे बड़ा अपराध है
कविता भी प्रतिरोध का हथियार हो सकती है। दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में राजनीतिक चेतना केवल विचार नहीं, अनुभव और संघर्ष से उपजी हुई संवेदना है। उनकी ग़ज़लें सत्ता के विरुद्ध जनता का काव्यात्मक घोषणापत्र हैं। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि ग़ज़ल केवल महफ़िल की शायरी नहीं, बल्कि सड़क की आवाज़ भी बन सकती है।
अख़बार के पाठक के लिए दुष्यंत कुमार आज भी उतने ही ज़रूरी हैं, क्योंकि वे हमें यह सिखाते हैं कि—
साहित्य जब जनता के पक्ष में खड़ा होता है,
तब वह राजनीति से बड़ा और लोकतंत्र से गहरा हो जाता है।  
 

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