आया मधुमास प्रिय न आए
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
आया मधुमास प्रिय न आए, नैन नीर हैं छलकाते ।
बिन माली की देखभाल के, प्रीति-पुष्प अब मुरझाते ।।
दहक रहा मन अनल विरह का, नैनों का सरवर सूखा ।
रुचिर नहीं लगता है भोजन , प्रिय-दर्शन का मन भूखा ।।
तड़पूँ जैसे जल बिन मछली, नीर बिना वह मरती है ।
सुंदर छवि चितचोर तुम्हारी, साँस-साँस में बसती है ।।
चाँद खिला अंबर में जैसे, सुधियों में तुम जब आते ।।
प्रियतम नीरव निस्तब्ध रात ,विगत बात स्मरण कराती ।
लिपट वृक्ष से ललिता लतिका, उर को मेरे नहीं सुहाती ।
शीत पवन के निर्मम झोंके , विरह व्यथा को भड़काती ।
आँसू की स्याही से लिखती, पीड़ा भरी तुम्हें पाती ।
साँस-साँस बन बैठे बैरी, मधुर मिलन के गीत सुनाते।।
खिला हुआ गुलमोहर कहता , सहना धूप ताप सीखो ।
विषम परिस्थितियों में जीना, रहना विनत आप सीखो ।
धूप छाँव में शहर गाँव में, जहाँ रहें तृण मुस्काएँ ।
आँधी बारिश तूफानों के, आगे भी वे अड़ जाएँ।
सीख लिया समझौता करना , कठिन राह वे चल पाते ।।



.jpg)

.jpeg)




Leave A Comment