नाना पाटेकर हमेशा किसानों, सूखे से परेशान गांवों और जरूरतमंद परिवारों की मदद करते रहे
मुंबई। दिग्गज एक्टर नाना पाटेकर की आज सुबह 75 की उम्र में मृत्यु हो गई है. उनकी मृत्यु गोवा में सुबह कार्डियक अटैक के कारण हुई है. सुबह वह अपने घर में बेहोश पाए गए, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल में नाना पाटेकर को मृत घोषित किया गया. बता दें कि नाना पाटेकर केवल फिल्मों तक सीमित नहीं थे. पर्दे से दूर वह लंबे समय तक किसानों, सूखे से परेशान गांवों और जरूरतमंद परिवारों की मदद भी करते रहे. उन्होंने अपनी कमाई का एक हिस्सा सामाजिक कामों में लगाया है और कई ऐसे परिवारों तक मदद पहुंचाई है, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी.
नाना पाटेकर नाम फाउंडेशन
साल 2015 में नाना पाटेकर ने मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाम फाउंडेशन की शुरुआत की थी. इसका मकसद सूखे और कर्ज की परेशानी से जूझ रहे किसान परिवारों की मदद करना था. बता दें कि महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे इलाकों में किसानों की स्थिति उस समय काफी खराब थी. कहा जाता है कि नाना पाटेकर ने करीब 1.5 करोड़ रुपये की लग्जरी कार खरीदने का अपना फैसला बदल दिया था. उन्होंने उस पैसे को किसान परिवारों की मदद में लगाने का फैसला किया था. इसके बाद उन्होंने किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों और सूखे से परेशान लोगों तक सीधे मदद पहुंचाने की कोशिश शुरू की.
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नाम फाउंडेशन का काम केवल आर्थिक मदद देने तक नहीं रहा है. संस्था ने किसान परिवारों की महिलाओं के लिए सिलाई मशीन, आटा चक्की और बकरियां जैसी चीजें उपलब्ध कराईं, जिससे वह अपने लिए कमाई का रास्ता बना सकें. कई जरूरतमंद परिवारों को आर्थिक सहायता दी गई. किसानों के बच्चों की पढ़ाई, भोजन और घर से जुड़ी जरूरतों में भी मदद की गई. गरीब परिवारों के सामूहिक विवाह जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए गए. नाम फाउंडेशन के अनुसार, उसकी अलग-अलग पहलों से लाखों किसान परिवारों तक मदद पहुंची है. संस्था ने आपदा से प्रभावित परिवारों, शहीद जवानों के परिवारों और विधवाओं की भी सहायता की है.
गांवों को बनाया आत्मनिर्भर
नाना पाटेकर की सोच केवल तत्काल मदद देने तक सीमित नहीं थी. उनका जोर इस बात पर भी रहा कि गांवों की समस्याओं का ऐसा समाधान निकले जिससे लोगों को बार-बार बाहर से मदद न मांगनी पड़े. नाम फाउंडेशन ने महाराष्ट्र के कुछ गांवों को गोद लेकर वहां पानी बचाने, खेती सुधारने और रोजगार बढ़ाने पर काम किया. इनमें छत्रपति संभाजीनगर जिले का धोंदल गांव और वर्धा जिले का आमला गांव शामिल हैं.
इन गांवों में पानी की कमी दूर करने, पेड़ लगाने, खेती से जुड़े प्रशिक्षण और युवाओं व महिलाओं के लिए रोजगार के मौके बनाने पर काम किया गया. लक्ष्य ऐसे गांव तैयार करना था जहां पानी के लिए टैंकरों पर निर्भरता कम हो और लोग अपने गांव में ही बेहतर जीवन जी सकें.
नाना पाटेकर की मदद महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं रही. जम्मू-कश्मीर के राजौरी और पुंछ में सीमा पार से हुई गोलाबारी से प्रभावित परिवारों की मदद के लिए भी उन्होंने योगदान दिया. उन्होंने राहत के लिए लाखों रुपये दिए और प्रभावित परिवारों के बच्चों की पढ़ाई से जुड़े कामों में भी सहयोग किया. इसके अलावा बिहार जैसे राज्यों में बाढ़ के समय भी उन्होंने राहत कार्यों में मदद की. फिल्म से मिलने वाली कमाई और पुरस्कार राशि का हिस्सा सामाजिक कामों में लगाने के लिए भी वह जाने जाते रहे हैं.

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