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जैन समुदाय को 2,000 से अधिक पांडुलिपियां लौटाएगा ब्रिटेन का संग्रहालय

लंदन. ब्रिटेन के प्रमुख संग्रहालयों में से एक 'वेलकम कलेक्शन' ने दक्षिण एशिया के बाहर मौजूद जैन पांडुलिपियों के सबसे बड़े संग्रह को लौटाने की "ऐतिहासिक" पहल की शुक्रवार को घोषणा की। लंदन स्थित इस संग्रहालय में एक सदी से अधिक समय से रखी गई 2,000 से अधिक पांडुलिपियों की वापसी का फैसला यहां स्थित 'इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी' के साथ संवाद और सहयोग के बाद लिया गया है। पांडुलिपियों के इस संग्रह में 15वीं शताब्दी की चित्रित पांडुलिपियों से लेकर 19वीं शताब्दी के दुर्लभ ग्रंथ शामिल हैं। इनमें धर्म, साहित्य, चिकित्सा और संस्कृति से संबंधित सामग्री प्राकृत, संस्कृत, गुजराती, राजस्थानी और प्रारंभिक हिंदी लिपियों में उपलब्ध है। इनमें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नैतिक सिद्धांतों का एक प्रारंभिक और प्रभावशाली उदाहरण भी शामिल है, जिनसे महात्मा गांधी ने प्रेरणा ली थी और उन्होंने इसे लोकप्रिय बनाया। यह दस्तावेज भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की बुनियाद की तीखी आलोचना करता है। अन्य पांडुलिपियों में जैन धर्मग्रंथ 'कल्पसूत्र' की 16वीं शताब्दी की एक ''दुर्लभ और भव्य चित्रों से सुसज्जित'' प्रति भी शामिल है। इसके अलावा 1688 की एक पतली, नाजुक और जर्जर कागजी पांडुलिपि भी संग्रह में है, जिसे प्रारंभिक हिंदी के पहले चिकित्सा ग्रंथ 'वैद्य मनोत्सव' (1592) की संभवतः सबसे पुरानी सुरक्षित प्रति माना जाता है। समझौते के तहत इस संग्रह को प्रारंभिक रूप से 'धर्मनाथ नेटवर्क इन जैन स्टडीज' के पास रखा जाएगा, जो बर्मिंघम विश्वविद्यालय में स्थित है। यहां शोधकर्ताओं और जैन समुदाय को इन पांडुलिपियों का अध्ययन, व्याख्या और अनुवाद करने की सुविधा मिलेगी। 'इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी' के प्रबंध न्यासी मेहुल संघराजका ने कहा, ''वेलकम कलेक्शन का इन 2,000 पवित्र पांडुलिपियों को लौटाने का साहसिक निर्णय ऐतिहासिक है और अन्य धार्मिक समुदायों के लिए भी एक आदर्श है।'' उन्होंने कहा, ''हम यह भी स्वीकार करते हैं कि भारत की स्वतंत्रता के बाद की उथल-पुथल में इनमें से कुछ पांडुलिपियां शायद सुरक्षित नहीं रह पातीं। इन ग्रंथों के प्रति वेलकम कलेक्शन द्वारा दिखाए गए सम्मान और संरक्षण के लिए हम आभारी हैं।'' संस्थान ने कहा कि ऐतिहासिक घटनाओं को आधुनिक नजरिए से परखने के बजाय सहयोग के माध्यम से ऐसे रास्ते खोजने की जरूरत है, जिससे ''जैन अध्ययन और शोध को नयी दिशा मिले और समुदाय को अपनी सांस्कृतिक विरासत तक पहुंच प्राप्त हो सके।'' संस्थान ने कहा, ''हम भविष्य की पीढ़ियों के लिए इन धरोहरों को सुलभ बनाने के सामूहिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक हैं।'' इस सप्ताह वेलकम ट्रस्ट, इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी और बर्मिंघम विश्वविद्यालय के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। बाद में विस्तृत कानूनी समझौता तैयार किया जाएगा।

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