सजल
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
दीप जलाने से हो जाता, जगमग घर का आँगन।
माँ का होना कर देता है, घर को सुंदर कानन।।
रहे व्यवस्थित सारी चीजें, स्वच्छ रहे हर कोना।
साँझ ढले तुलसी को दीपक, पूजन-अर्चन पावन ।।
त्यौहारों की रौनक माँ से, पकवानों की खुशबू।
रीति-रस्म संस्कार सिखाती, महके घर ज्यों चंदन।।
थकित व्यथित अंतस् को लगती, मरहम माँ की ममता।
संबल संयम धैर्य हौसला, आशा दे अपनापन।।
सबकी उलझन सुलझाती है, पीर रखे निज मन में।
संघर्षों में तपकर निखरी, माँ होती है कंचन।।
आँचल है ममता का सागर, देवपगा सुरसरिता।
माँ धीरज में धरणी जैसी, नभ-सम विस्तृत दामन।।










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