पश्चिम बंगाल में गंगा प्रदूषण स्तर में बड़ा सुधार नजर आया: नमामि गंगे
नयी दिल्ली. गंगा नदी के समुद्र में गिरने से पहले उसके मुख्य प्रवाह मार्ग के अंतिम राज्य पश्चिम बंगाल में पिछली राज्यों से अपशिष्ट और औद्योगिक भार बढ़ने के बाद भी उसके प्रदूषण के स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। नमामि गंगे परियोजना में यह दावा किया गया है। स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन (एनएमसीजी) ने 'एक्स' पर पोस्ट में कहा कि पश्चिम बंगाल में नदी का अंतिम भाग हिमालय से घनी आबादी वाले गंगा बेसिन से होकर बहने वाली हर चीज को अपने साथ लाता है। नमामि गंगा ने कहा, ''गंगा का आखिरी हिस्सा सब कुछ अपने साथ लाता है। पश्चिम बंगाल पहुंचते-पहुंचते, यह हिमालय से लेकर ऊपर के सभी राज्यों, सभी शहरों, सभी नालों का संयुक्त भार वहन कर रही होती है।'' उसने कहा, ''और यही वह हिस्सा है जिसमें सबसे अधिक सुधार हुआ है।
मिशन ने पिछले सात वर्षों में जल गुणवत्ता में आए बदलाव को रेखांकित करने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के प्रदूषित नदी क्षेत्रों (पीआरएस) के आकलन का हवाला दिया। नमामि गंगे के अनुसार, पश्चिम बंगाल में त्रिवेणी से डायमंड हार्बर तक फैले नदी क्षेत्र को 2018 में 'प्राथमिकता तृतीय' प्रदूषित क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया था। सीपीसीबी के 2025 के आकलन में, यह क्षेत्र बहरामपुर से डायमंड हार्बर तक स्थानांतरित हो गया है और अब इसे 'प्राथमिकता पंचम' श्रेणी में रखा गया। मिशन ने कहा कि हालांकि नवीनतम आकलन में प्रदूषित क्षेत्र भौगोलिक रूप से लंबा दिखाई देता है, लेकिन वास्तविक प्रदूषण भार में काफी कमी आई है। उसमें कहा गया है, ''जब तक आप इसे ध्यान से नहीं पढ़ते, तब तक यह बात विरोधाभासी लगती है: मानचित्र पर एक लंबी रेखा नजर आती है, लेकिन पानी में प्रदूषण काफ़ी कम है।'' इस मिशन ने परिवर्तन का श्रेय पश्चिम बंगाल में नमामि गंगा कार्यक्रम के तहत अब तक स्वीकृत 5,028 करोड़ रुपये की 34 मलजल-अवसंरचना परियोजनाओं को दिया, जिनकी कुल क्षमता 816 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रति दिन) है। नमामि गंगे ने कहा कि बुनियादी ढांचे का निर्माण हुगली क्षेत्र के आसपास केंद्रित है, जहां नदी में कोलकाता महानगर क्षेत्र और आसपास के शहरों से भारी मात्रा में अशोधित जल आता है।




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