नौसैनिक बेड़े में उथले समुद्री क्षेत्र में चलने वाला तीसरा पनडुब्बी रोधी युद्धपोत 'मंगरोल' शामिल
मुंबई. तटवर्ती और उथले समुद्री क्षेत्र में चलने वाले तीसरे पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) 'मंगरोल' को सोमवार को यहां भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल किया गया। इससे नौसेना की पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता मजबूत होने की उम्मीद है खासकर तटीय समुद्री क्षेत्रों में, जहां बड़े युद्धपोतों को संचालन संबंधी सीमाओं का सामना करना पड़ता है। कोच्चि स्थित कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) द्वारा निर्मित यह पोत समुद्री गश्ती विमानों, हेलीकॉप्टरों और अन्य युद्धपोतों के साथ मिलकर काम कर सकता है। यह दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उनके खतरे से निपटने में सक्षम है। इस पोत के नौसेना में शामिल होने से बंदरगाहों, समुद्री पत्तनों और तटीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा करने की नौसेना की क्षमता बढ़ेगी। इसके साथ ही, यह बेड़े के व्यापक अभियानों में भी मदद करेगा। नौसेना की पश्चिमी कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वात्सायन ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच आईएनएस मंगरोल को नौसेना में शामिल किया जाना विशेष महत्व रखता है। उन्होंने कहा कि समुद्र अब केवल व्यापार और संपर्क के माध्यम नहीं रह गए हैं, बल्कि रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी बदलाव और उभरती सुरक्षा चुनौतियों के केंद्र भी बन गए हैं। वात्सायन ने कहा कि भारत की विस्तृत तटरेखा, द्वीपों और महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों को देखते हुए एक विश्वसनीय, त्वरित प्रतिक्रिया देने में सक्षम और युद्ध के लिए तैयार नौसेना बनाए रखना बेहद जरूरी है। आईएनएस मंगरोल के कमांडिंग ऑफिसर यू. शरण कुमार ने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र भू-राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में कई देशों की ओर से पनडुब्बियों की तैनाती में काफी वृद्धि हुई है। कुमार ने कहा कि ऐसे में पानी के भीतर से उत्पन्न होने वाले खतरों, उनकी आशंका तथा उनका पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने की आवश्यकता पहले के मुकाबले कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा, ''इन घटनाओं के परिदृश्य में आईएनएस मंगरोल विशेष रूप से नौसेना की रक्षा क्षमता और समग्र रूप से भारत के समुद्री हितों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।'' उन्होंने कहा कि पानी के भीतर का क्षेत्र हमेशा से बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है।
कुमार ने कहा, ''समुद्र की सतह पर जो दिखाई देता है, उसके विपरीत पानी के भीतर क्या मौजूद है, यह दिखाई नहीं देता। इसलिए पहली चुनौती पानी के भीतर किसी चीज का पता लगाना है। दूसरी चुनौती यह पहचानना है कि पानी के भीतर क्या मौजूद है। तीसरी चुनौती उस लक्ष्य के खिलाफ कार्रवाई करना है।'' उन्होंने कहा, ''यह एक बेहद विशिष्ट क्षेत्र है। दुनिया के बहुत कम देशों के पास इस तरह के अभियान चलाने की क्षमता है। भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल है, जो ऐसे अभियान चलाने में सक्षम हैं। आईएनएस मंगरोल इसमें बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।'' कुमार ने कहा कि आईएनएस मंगरोल उथले पानी में भी अभियान चला सकता है, जहां बड़े युद्धपोत काम नहीं कर सकते। इस पोत की बहुमुखी क्षमता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इसका इस्तेमाल कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों (एलआईएमओ) के लिए भी किया जा सकता है। कुमार ने कहा, ''इसलिए हम कह सकते हैं कि यह पोत कई आयामों में नौसेना की क्षमता को मजबूत करेगा।''
इस पोत को नौसेना में शामिल किया जाना भारत की स्वदेशी पोत निर्माण क्षमताओं में हो रही वृद्धि को दर्शाता है। इस पोत का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय शहर और मछली पकड़ने वाले प्रमुख बंदरगाह मंगरोल के नाम पर रखा गया है। यह पोत पूर्ववर्ती आईएनएस मंगरोल (एम85) की विरासत को आगे बढ़ाता है। पूर्ववर्ती पोत एक बारूदी सुरंग-रोधी पोत था, जिसने अप्रैल 2004 तक भारतीय नौसेना में सेवाएं दी थीं। इस नए पोत का नामकरण नौसेना की उस परंपरा को जारी रखता है, जिसके तहत उसके पूर्ववर्ती युद्धपोतों की विरासत को संरक्षित किया जाता है। नौसेना ने बताया कि 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री से निर्मित 'मंगरोल' युद्धपोतों के डिजाइन, निर्माण तथा उन्नत हथियारों और सेंसरों को एकीकृत करने की भारत की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है। तटीय और कम गहराई वाले समुद्री क्षेत्रों में पानी के भीतर मौजूद खतरों का पता लगाने और उनसे निपटने के लिए तैयार 'मंगरोल' आधुनिक हथियारों और सेंसरों से लैस है। इनमें 'अभय' हल-माउंटेड सोनार, हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर और 'मारीच' उन्नत टॉरपीडो डिकॉय प्रणाली शामिल हैं। तीन डीजल इंजनों और वॉटरजेट प्रणोदन प्रणाली से संचालित यह पोत उथले समुद्री क्षेत्रों में बेहद कुशलता से दिशा बदलने और संचालन करने में सक्षम है। यह पानी के भीतर निगरानी, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों और बारूदी सुरंगों से जुड़े अभियानों को अंजाम देने में भी सक्षम है। वात्सायन ने कहा कि भारतीय नौसेना के बेड़े का विस्तार रणनीतिक जरूरतों को दर्शाता है। नौसेना ने 2026 में अब तक 10 पोतों को अपने बेड़े में शामिल किया है और इस साल के अंत तक आठ अन्य पोतों को शामिल किए जाने की संभावना है। वात्सायन ने कहा, ''वर्तमान में हमारे पास 151 प्लेटफॉर्म हैं, जिनमें 131 पोत और 20 पनडुब्बियां शामिल हैं। भारतीय शिपयार्ड में फिलहाल 42 पोतों का निर्माण हो रहा है। इसके अलावा, 69 अन्य पोतों, छह पनडुब्बियों और 120 तेज अवरोधन नौकाओं के लिए आवश्यकता की स्वीकृति दी जा चुकी है।'' वाइस एडमिरल ने कहा कि आने वाले कुछ वर्षों में भारतीय नौसेना के बेड़े में 170 से अधिक प्लेटफॉर्म होने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि हर 40 से 50 दिन में एक नया पोत नौसेना में शामिल किया जा रहा है।




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