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- पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व को दिवाली या दीपावली भी कहा जाता है. इस पर्व में धनतेरस, नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली), दिवाली (लक्ष्मी पूजा), गोवर्धन पूजा और भाई दूज शामिल हैं. यह पर्व कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुरू होता है और शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि तक मनाया जाता है. यह प्रकाश और समृद्धि का प्रतीक है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतिनिधित्व करता है. इस उत्सव में हर दिन का अपना विशेष महत्व और अनुष्ठान होता है. पंंचांग के अनुसार, साल 2025 में दिवाली का पर्व 20 अक्टूबर दिन सोमवार को मनाया जाएगा.पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व कब है?पांच दिवसीय प्रकाश पर्व की शुरुआत धनतेरस के साथ होती है और भाई दूज पर इसका समापन होता है. पांच दिनों तक मनाया जाने वाला यह त्योहार इस बार 6 दिनों का होने वाला है. इस साल पंच दीपोत्सव की शुरुआत 18 अक्टूबर से हो रही है, जिसका समापन 23 अक्टूबर 2025 को होगा. इस तरह से दीपोत्सव 5 नहीं, बल्कि 6 दिनों तक मनाया जाएगा.इस बार 6 दिन का होगा दीपोत्सवपांच दिवसीय दीपोत्सव का 6 दिन पड़ने के पीछे का कारण है त्रयोदशी तिथि में बढ़ोतरी. इस बार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि दो दिन पड़ेगी. जिसकी वजह से दीपोत्सव 6 दिनों का हुआ है. इस साल छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली दोनों एक ही दिन मनाई जाएगी. आइए जानते हैं किस तिथि पर कौन से त्योहार मनाए जाएंगे.दीपावली के 5 दिन कौन से हैं?धनतेरस:- दिवाली पर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है, जिसे धनत्रयोदशी भी कहते हैं. इस दिन भगवान धन्वंतरी, कुबेर और लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और लोग बर्तन, धातु व आभूषण खरीदते हैं.नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली):- धनतेरस के अगले दिन छोटी दिवाली का पर्व मनाया जाता है. इस दिन भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर राक्षस का वध किया गया था, जो कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है.दिवाली (बड़ी दिवाली):- दिवाली का त्योहार कार्तिक अमावस्या के दिन मनाया जाता है और इसमें लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा के साथ दीपक जलाए जाते हैं. यह दीपावली का मुख्य दिन होता है.गोवर्धन पूजा:- यह पांच दिवसीय दीपोत्सव का चौथा दिन होता है. इस दिन भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने का स्मरण किया जाता है, जिसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है.भाई दूज:- पांच दिवसीय उत्सव का आखिरी दिन भाई दूज भाई-बहन के रिश्ते को समर्पित है, जिसमें भाई अपनी बहन के घर जाकर भोजन करते हैं और बहन भाई की लंबी उम्र की कामना करती है.
- धनतेरस के त्यौहार से ही दिवाली की शुरुआत मानी जाती है. धनतेरस का पर्व सुख समृद्धि और नई शुरुआत का संदेश देता है. प्राचीन काल से ही धनतेरस के दिन सोना-चांदी और नए बर्तन खरीदने की परंपरा चली आ रही है. हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस का पर्व मनाया जाता है. इस दिन सोना,-चांदी और नए बर्तन खरीदने के साथ-साथ भगवान धन्वंतरि देव की पूजा की जाती है.इस दिन को ‘धन त्रयोदशी’ भी कहा गया है. इस दिन धातु और नई वस्तुएं खरीदने को शुभ माना जाता है, लेकिन क्या कभी आपने इस पर विचार किया है कि आखिर इस दिन सोना-चांदी और नए बर्तन क्यों खरीदे जाते हैं? तो चलिए जानते हैं कि प्राचीन काल से लोग इस परंपरा को क्यों निभाते चले आ रहे हैं?कब है धनतेरस?हिंदू पंचांग के अनुसार, शनिवार 18 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 18 मिनट पर कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत हो रही है. इसके अगले दिन 19 अक्टूबर को दोपहर 01 बजाकर 51 मिनट पर ये त्रयोदशी तिथि समाप्त हो जाएगी. इस प्रकार 18 अक्टूबर को धनतेरस मनाया जाएगा.इसलिए धनतेरस पर की जाती है खरीदारीहिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को समुद्र मंथन के दौरान धन्वंतरि देव अमृत कलश लेके प्रकट हुए थे. धन्वंतरि देव जो कलश लेकर प्रकट हुए थे वो सोने का था, इसलिए इसे ‘धन त्रयोदशी’ भी कहा जाता है. माना जाता है कि इस दिन सोना,-चांदी या नए बर्तन खरीदने से मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे घर में धन-धान्य बढ़ता है. धनतेरस के दिन लोग सिर्फ सोना-चांदी ही नहीं, बल्कि तांबे, पीतल और स्टील के बर्तनों की भी खरीदारी करते हैं. ये धातुएं शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है. यही कारण है कि धनतेरस पर सोना-चांदी और नए बर्तन खरीदने की परंपरा है. वहीं, धनतेरस के दिन काले रंग की वस्तुएं भूलकर भी नहीं खरीदना चाहिए. धनतेरस के दिन काले रंग की वस्तुएं खरीदना अशुभ होता है.
- हिंदू धर्म में हर पर्व का अपना विशेष धार्मिक और पौराणिक महत्व होता है. दिवाली, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है इसका समुद्र मंथन से भी गहरा संबंध है. पुराणों में उल्लेख मिलता है कि प्राचीन समय में देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, ताकि अमृत कलश प्राप्त कर अमरता का वरदान प्राप्त कर सके. इस मंथन से कई दिव्य रत्न और अद्भुत वस्तुएं प्रकट हुईं. सबसे महत्वपूर्ण था धन्वंतरि देव का प्रकट होना, जिनके हाथ में अमृत कलश था. धन्वंतरि देव को आयुर्वेद और स्वास्थ्य के देवता माना जाता है, इसलिए उनका प्रकट होना स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक बन गया.दिवाली और समुद्र मंथन में संबंधइस पौराणिक घटना का प्रत्यक्ष संबंध धनतेरस से है, जो दिवाली से दो दिन पहले आता है और इसे धन त्रयोदशी कहा जाता है. मान्यता है कि इस दिन धन्वंतरि देव सोने का अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे. इसी कारण इस दिन सोना, चांदी और नए बर्तन खरीदने की परंपरा शुरू हुई. यह केवल एक धार्मिक रिवाज नहीं, बल्कि घर में मां लक्ष्मी की कृपा लाने, धन-वैभव बढ़ाने और परिवार में सुख-शांति बनाए रखने का माध्यम माना जाता है.धनतेरस पर होने वाले शुभ कार्य और परंपराएं--धनतेरस के दिन कुछ विशेष उपाय और परंपराएं अपनाने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.सोना, चांदी और धातु के बर्तन खरीदें: केवल सोना और चांदी ही नहीं, बल्कि तांबे, पीतल और स्टील के बर्तन खरीदना भी शुभ माना जाता है. ये धातुएं शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती हैं.घर की साफ-सफाई: घर को अच्छे से साफ करना बहुत शुभ होता है. इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में शांति और खुशहाली बनी रहती है.दीपक जलाना: मुख्य द्वार, खिड़कियों और घर के महत्वपूर्ण स्थानों पर दीपक जलाने से उजाला और सकारात्मक ऊर्जा फैलती है. यह मां लक्ष्मी और धन की देवी को आमंत्रित करने का भी प्रतीक है.कुबेर यंत्र स्थापित करना: घर में धन के देवता कुबेर का यंत्र रखने से आर्थिक स्थिरता और धन-वैभव बढ़ता है.दान करना: जरूरतमंदों को भोजन, कपड़े या अन्य आवश्यक वस्तुएं दान करने से पुण्य मिलता है और मन में संतोष और करुणा का भाव बढ़ता है.
- दीपोत्सव की शुरुआत का प्रतीक, धनतेरस का त्योहार हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन सोना, चांदी, और नए बर्तन खरीदना बेहद शुभ माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि धनतेरस पर खरीदारी करने से घर में धन-धान्य और सौभाग्य में तेरह गुना वृद्धि होती है. पंचांग के अनुसार, इस साल धनतेरस का शुभ पर्व शनिवार, 18 अक्टूबर को मनाया जाएगा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन खरीदारी को इतना शुभ क्यों माना जाता है? इसके पीछे दो प्रमुख पौराणिक कथाएं हैं, जो इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देती हैं.धनतेरस पर खरीदारी का महत्व, भगवान धन्वंतरि की कथासमुद्र मंथन और अमृत कलशपौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीर सागर में समुद्र मंथन किया था. कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही, मंथन के दौरान, भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे. जब वह प्रकट हुए, तो उनके हाथों में अमृत से भरा एक स्वर्ण/पीतल का कलश था. यह कलश धन और आरोग्य का प्रतीक था. चूंकि भगवान धन्वंतरि अपने साथ अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को ‘धन त्रयोदशी’ कहा गया.इस दिन किसी भी धातु या नई वस्तु (विशेषकर बर्तन और धातु) को खरीदना बहुत शुभ माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि इससे घर में धन और आरोग्य का वास होता है, और धन की कमी दूर होती है. खास तौर पर पीतल के बर्तन खरीदना बहुत ही शुभ माना जाता है क्योंकि भगवान धन्वंतरि के हाथ में पीतल का कलश था.धनतेरस पर सोना-चांदी खरीदने की दूसरी पौराणिक कथाएक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने राजा बलि के अहंकार को तोड़ने के लिए वामन अवतार लिया था, तब उन्होंने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में माँगी थी. राजा बलि ने दान देने का वचन दिया.वामन भगवान ने अपने पहले पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया.दूसरे पग में स्वर्गलोक को नाप लिया. तीसरा पग रखने के लिए जब कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर वामन भगवान के चरणों में रख दिया.इस तरह राजा बलि ने अपना सब कुछ दान में गंवा दिया. माना जाता है कि राजा बलि ने देवताओं से जो धन-संपत्ति छीन ली थी, उससे कई गुना धन-संपत्ति देवताओं को वापस मिल गई थी. इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है, जिससे धन-संपत्ति की वृद्धि का संदेश मिलता है.
- कार्तिक मास हिंदू कैलेंडर का आठवां महीना होता है, जो कि बहुत ही पवित्र माना गया है. यह मास जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है. इस दौरान भगवान विष्णु के साथ ही तुलसी की पूजा को बहुत महत्व दिया गया है. इसके अलावा, कार्तिक मास में दीपदान करना बेहद खास माना जाता है. इस लेख में हम आपको बताएंगे कि दीपदान क्या होता है, दीपदान करने की विधि और कार्तिक मास में दीपदान का क्या महत्व होता है.दीपदान क्या होता है?दीपदान का अर्थ है दीपक जलाकर किसी उपयुक्त स्थान पर दान करना या रखना. दीपदान किसी देवता, पवित्र नदी या किसी विद्वान ब्राह्मण के घर किया जाता है. मुख्य रूप से दीपदान जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है. दीपदान को ज्ञान और उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक भी माना जाता है. खासकर कार्तिक मास में दीपदान का विशेष महत्व है और इससे अक्षय पुण्य मिलता है.कार्तिक मास में दीपदान का महत्वकार्तिक मास में दीपदान बहुत शुभ फल देने वाला माना जाता है. कार्तिक मास में दीपदान करने से व्यक्ति को दिव्य कान्ति से युक्त होने और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होने का लाभ मिलता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, कार्तिक मास में दान करने से व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल सकती है और अगले जन्म में महान कुल में जन्म लेने का आशीर्वाद भी मिलता है.मोक्ष और पुनर्जन्म से मुक्ति:- कार्तिक मास में दीपदान करने से व्यक्ति जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है.दिव्य कान्ति की प्राप्ति:- कार्तिक मास में श्रीकेशव के निकट अखंड दीपदान करने से व्यक्ति दिव्य कान्ति से युक्त हो जाता है.पुण्य की प्राप्ति:- कार्तिक माह में दीपदान करने से सभी यज्ञों और तीर्थों का फल प्राप्त होता है, जो कि अन्य दान-पुण्य से प्राप्त होने वाले फल से कहीं ज्यादा है.पापों का नाश:- कार्तिक मास में सूर्योदय से पहले स्नान करके दीपदान करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है.अगले जन्म में शुभ फल:- कार्तिक मास में तुलसी के सामने दीपक जलाने से व्यक्ति के अगले जन्म में एक महान कुल में जन्म लेने की संभावना बनती है.कार्तिक मास में दीपदान करने से कौन सा लोक प्राप्त होता है?धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक मास में दीपदान करने से विष्णु लोक, लक्ष्मी लोक और मोक्ष जैसे लोक प्राप्त होते हैं. साथ ही, कार्तिक मास में दीपदान करने से अक्षय पुण्य भी मिलता है. कार्तिक मास में मंदिर में दीपदान से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है. वहीं, नदी घाट पर दीपदान दान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष मिलता है. घर के मुख्य द्वार या तुलसी के पौधे के पास दीपदान करने से धन और समृद्धि आती है और सभी पाप नष्ट होते हैं.दीपदान कब करें?दीपदान विशेष रूप से कार्तिक मास में किया जाता है, जो दीपदान का महीना कहलाता है. इसके अलावा, दीपावली, नरक चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर भी दीपदान करना महत्वपूर्ण माना जाता है. दीपदान इसे अंधेरा होने पर यानी सूर्योदय से पहले (ब्रह्म मुहूर्त) या सूर्यास्त के बाद करना चाहिए. दीपदान घर के पूजा स्थान, तुलसी के पौधे के पास, नदी या तालाब के घाट पर और मंदिरों में किया जाता है.दीपदान करते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?कार्तिक मास में दीपदान करते समय ‘शुभं करोति कल्याणं’ मंत्र बोलना चाहिए, जिसका अर्थ है कि शुभ और कल्याण करने वाली, आरोग्य और धन-संपदा देने वाली और शत्रु बुद्धि का विनाश करने वाली दीपक की ज्योति को नमस्कार है.कार्तिक मास में दीप दान कैसे करें?दीपक तैयार करें:- एक मिट्टी का दीपक लेकर उसमें घी या तिल का तेल भरें. फिर एक रुई की बत्ती बनाकर दीपक में रखें.स्थान चुनें:- किसी नदी या तालाब के किनारे, घर के मंदिर या तुलसी के पौधे के पास दीपदान कर सकते हैं.दीपदान करें:- दीपक को सीधे जमीन पर रखने के बजाय चावल या सप्तधान के ऊपर रखें, ताकि भूमि को नुकसान न पहुंचे.प्रार्थना और मंत्र:- दीपक जलाते समय भगवान का स्मरण करें और अपनी मनोकामना बोलनी चाहिए.जल अर्पित करें:- दीपक के साथ थोड़ा जल भी अर्पित करें.वापस घर आएं:- दीपक जलाने और पूजन करने के बाद बिना देखे वापस घर आ जाएं.दीपदान करने के नियम---दीपदान में दीपों की संख्या और बत्तियां मनोकामना के अनुसार तय की जाती हैं.अगर नदी के पास नहीं जा सकते, तो घर पर ही नदी का आवाहन करके दीपदान कर सकते हैं.दीपदान करते समय एक दीपक से दूसरा दीपक नहीं जलाना चाहिए.
- बालोद से पंडित प्रकाश उपाध्यायसूर्य 17 अक्तूबर 2025 को दोपहर 1 बजकर 36 मिनट पर तुला राशि में प्रवेश करेंगे। अगले दिन यानी 18 अक्तूबर 2025 को धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा। 19 अक्तूबर 2025 को गुरु राशि परिवर्तन करने वाले हैं। वह इस दिन दोपहर 12 बजकर 57 मिनट पर कर्क में गोचर करेंगे। इस दिन छोटी दिवाली भी मनाई जाएगी। इसके बाद चंद्रमा कन्या से तुला में प्रवेश करेंगे। 23 अक्तूबर को भाई दूज का पर्व मनाया जाएगा। फिर वृश्चिक राशि में 24 अक्तूबर 2025 को बुध आएंगे। मंगल भी 27 अक्तूबर 2025 को दोपहर 02 बजकर 43 मिनट पर वृश्चिक में प्रवेश करेंगे। ऐसे में ग्रहों के इस दुर्लभ संयोग का खास प्रभाव कुछ राशि वालों पर बना रहेगा। इन जातकों को धन लाभ, शुभ समाचार और हर क्षेत्र में सफलता मिल सकती हैं। आइए इनके बारे में जानते हैं।सिंह राशियह समय सिंह राशि वालों के लिए शुभ रहेगा। व्यापारियों को नए सौदे मिलेंगे। आप वाहन की खरीदारी करेंगे। निवेश करने पर अच्छा रिटर्न आएगा। पार्टनरशिप का प्रस्ताव भी आपको मिल सकता है। इस दौरान जो लोग नौकरीपेशा हैं, उनको नए मौके मिलेंगे। भाग्य का साथ मिलेगा।कन्या राशिआपके लिए ग्रहों की ये चाल बदलावों से भरी रहेगी। आप जो भी काम करेंगे, उसमें धन लाभ, विस्तार और नए लोगों का साथ आपको मिलेगा। इस दौरान कोर्ट के मामले पक्ष में आ सकते हैं। आप अपनी नौकरी के साथ-साथ कोई दूसरा काम भी करेंगे।तुला राशितुला राशि वालों के विवाह की बात बन सकती हैं। कार्यक्षेत्र में नए-नए तरह के अवसरों की प्राप्ति होने से प्रभाव बढ़ेगा। इस समय आप सोना-चांदी या वाहन खरीदने का सपना अपना पूरा करेंगे। विदेश यात्रा या विदेश व्यापार संबंधी योजनाओं में सफलता मिलने की संभावना बन रही है।वृश्चिक राशिआपके लिए समय कई उम्मीदें और सकारात्मक बदलाव लेकर आ सकता है। रिश्तों में बदलाव आपके तनाव को कम करेंगे और विश्वास और बढ़ेगा। विवाह के अच्छे प्रस्ताव आ सकते हैं। संतान सुख की प्राप्ति होगी। अच्छा आर्थिक लाभ मिलेगा।
- कार्तिक मास में जो कार्तिक के नियमों का पालन करता है, वो भगवान विष्णु की कृपा पाता है। कार्तिकके महीने में मोन-व्रत का पालन करना चाहिए। इस महीने में कई नियमों का पालन होता है, जैसे तिल से मिले हुए जल में स्नान, धरत पर सोना, ऐसा करने वालों के युग-युग के पापों का नाश कर डालता है। जो कार्तिक मासमें भगवान् विष्णुके सामने जागरण करता है, उसे सहस्त्र गोदानों का फल मिलता है। इस महीने में दिवाली, धनतेरस, करवा चौथ, आदि पर्व और त्योहार आते हैं।08 अक्टूबर 2025 : कार्तिक मास का प्रारंभ।10 अक्टूबर शुक्रवार: करवा चौथ, वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी।13 अक्टूबर सोमवार: अहोई अष्टमी (अहोई अष्टमी), कालाष्टमी।17 अक्टूबर शुक्रवार: रमा एकादशी, गोवत्स द्वादशी, सूर्य तुला संक्रांति।18 अक्टूबर शनिवार: धनतेरस (धन त्रयोदशी), यम दीपदान, प्रदोष व्रत19 अक्टूबर रविवार: काली चौदस (रूप चतुर्दशी), नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)।20 अक्टूबर सोमवार: दीपावली (लक्ष्मी-कुबेर पूजन), नरक चतुर्दशी (उदया तिथि), कार्तिक अमावस्या।21 अक्टूबर मंगलवार: स्नान-दान कार्तिक अमावस्या।22 अक्टूबर बुधवार: गोवर्धन पूजा, अन्नकूट।23 अक्टूबर गुरुवार: भाई दूज (यम द्वितीया), चित्रगुप्त पूजा।25 अक्टूबर शनिवार: छठ पूजा का प्रारंभ (नहाय खाय), विनायक चतुर्थी।26 अक्टूबर रविवार: छठ पूजा (खरना) पंचमी।27 अक्टूबर सोमवार: छठ पूजा (संध्या अर्घ्य) षष्ठी।28 अक्टूबर मंगलवार: छठ पूजा (उषा अर्घ्य) सप्तमी।30 अक्टूबर गुरुवार: गोपाष्टमी पर्व।31 अक्टूबर शुक्रवार: आंवला नवमी (अक्षय नवमी)।02 नवंबर रविवार: देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी)।03 नवंबर सोमवार: तुलसी विवाह, सोम प्रदोष व्रत।05 नवंबर 2025 बुधवार: कार्तिक पूर्णिमा (देव दिवाली), गुरु नानक जयंती।
- कार्तिक मास कल से शुरू होने वाला है। इस मास में मां तुलसी और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि इस महीने में विष्णु भगवान जल में निवास करते हैं। इस महीने में तुलसी और जो मनुष्य कार्तिक में आंवले की जड़ में भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, उसके सभी कष्ट का निवारण श्री विष्णु करते हैं। है। जैसे भगवान् विष्णुकी महिमाका पूरा-पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता है, उसी प्रकार आंवले और तुलसी के माहात्म्य का भी वर्णन नहीं हो सकता | जो आंवले और तुलसी की उत्पत्ति-कथा को भक्तिपूर्वक सुनता वो मोक्ष को पाता है। जो लोग कार्तिक मास में तुलसी का वृक्ष लगाते हैं, वे कभी यमराजको नहीं देखते। कार्तिक स्नान क्या होता है और इसमें क्या करना चाहिए, यहां पढ़ें सब कुछकार्तिक स्नान में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, वो भगवान विष्णु की कृपा पाता है। इसकी बाद तुलसी के पास दीपक जलाकर कार्तिक स्नान की कथा सुनी जाती है। पद्म पुराण में लिखा है कि पुष्कर आदि तीर्थ, गंगा आदि नदियां तथा वासुदेव आदि देवता--ये सभी तुलसीदल में निवास करते हैं। जो मनुष्य तुलसीकाष्ठ का चन्दन लगाता है, उसके शरीरको पाप नहीं लगता है।कार्तिक मास के दौरान सात्विक आहार और संयम का खास महत्व है। इस दौरान तामसिक चीजों को ग्रहण नहीं किया जाता है। इस समय प्याज, लहसुन, मांस और मद्यपान का पूर्ण त्याग कर फल, दूध और सादा आहार लेने का विधान है। मां तुलसी की विशेष अराधना करनी चाहिए। सुबह-शाम तुलसी के सामने दीपक जलाना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि इस मास में तुलसी का एक दीप कई दीप के बराबर माना जाता है।
- वास्तु शास्त्र में उत्तर दिशा को धन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, जो कुबेर और जल तत्व से संबंधित है। इस दिशा की दीवारों के लिए हल्का हरा, नीला या सफेद रंग शुभ है। ये रंग सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करते हैं और आर्थिक प्रगति में मदद करते हैं। गहरे रंगों से बचें, क्योंकि वे ऊर्जा को बाधित कर सकते हैं।पूर्व दिशा के लिए रंगपूर्व दिशा सूर्य और स्वास्थ्य से जुड़ी है। वास्तु के अनुसार, इस दिशा में हल्का पीला, क्रीम या सफेद रंग का उपयोग करें। ये रंग सकारात्मकता, ऊर्जा और स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं। विशेष रूप से, दीपावली के समय पीले रंग का उपयोग सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। गहरे लाल या काले रंगों से बचें।दक्षिण दिशा के लिए रंगदक्षिण दिशा मंगल ग्रह और शक्ति से संबंधित है। वास्तु के अनुसार, इस दिशा में हल्का लाल, गुलाबी या कोरल रंग शुभ है। ये रंग ऊर्जा और स्थिरता लाते हैं। हालांकि, बहुत गहरे लाल रंग से बचें, क्योंकि यह आक्रामकता को बढ़ा सकता है। दीपावली से पहले इस दिशा को संतुलित रंगों से सजाएं।पश्चिम दिशा के लिए रंगपश्चिम दिशा शनि और वरुण से जुड़ी है, जो शांति और रचनात्मकता का प्रतीक है। इस दिशा के लिए हल्का नीला, ग्रे या सफेद रंग उपयुक्त है। ये रंग मानसिक शांति और रचनात्मकता को बढ़ाते हैं। दीपावली के समय इन रंगों का उपयोग परिवार में सौहार्द और शांति लाता है। गहरे काले रंग से बचें।पूजा कक्ष के लिए रंगवास्तु शास्त्र में पूजा कक्ष उत्तर-पूर्व दिशा में होना चाहिए। इसकी दीवारों के लिए सफेद, हल्का पीला या हल्का नारंगी रंग शुभ है। ये रंग आध्यात्मिक ऊर्जा और शुद्धता को बढ़ाते हैं। दीपावली पर पूजा कक्ष को इन रंगों से सजाने से लक्ष्मी-गणेश की कृपा प्राप्त होती है। गहरे या चटकीले रंगों से बचें, क्योंकि वे ध्यान भटका सकते हैं।वास्तु टिप्स और सावधानियांरंगों को दिशा के अनुसार चुनें। हल्के और सौम्य रंगों को प्राथमिकता दें। गहरे काले, भूरे या बहुत चटकीले रंगों से बचें। दीपावली से पहले घर को साफ करें और फिर पेंट करें। रंगाई से पहले वास्तु विशेषज्ञ से सलाह लें। ये उपाय घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि लाते हैं।शुभ रंगों से सजाएं घरवास्तु शास्त्र के अनुसार, दिवाली से पहले घर को शुभ रंगों से पेंट करना सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि को आकर्षित करता है। उत्तर में हरा, पूर्व में पीला, दक्षिण में गुलाबी और पश्चिम में नीला रंग चुनें। पूजा कक्ष में हल्के रंगों का उपयोग करें। सही रंगों का चयन कर घर को दीपावली के लिए सजाएं और सुख-शांति का स्वागत करें।
- शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म में एक बहुत ही पवित्र और शुभ रात मानी जाती है। इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी धरती पर आती हैं और भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। इस पवित्र रात में चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों से अमृत बरसता है। इस साल शरद पूर्णिमा 6 अक्टूबर को है। शरद पूर्णिमा की रात को खीर बनाने और चंद्रमा की रोशनी में रखने का खास महत्व है। कहा जाता है कि ऐसा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है और मां लक्ष्मी की कृपा मिलती है। इसके अलावा इस रात कुछ और उपाय भी किए जा सकते हैं, जो घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली लाते हैं।शरद पूर्णिमा पर करें ये उपाय:चंद्रमा को अर्घ्य दें: एक लोटे में पानी भरें, उसमें चावल और फूल डालकर चंद्रमा की ओर मुख करके अर्पित करें। ऐसा करने से चंद्र देव की कृपा मिलती है और घर में शांति व धन का वास होता है।खीर का महत्व: खीर बनाकर रात में खुले आसमान के नीचे रखें, preferably मिट्टी के बर्तन में। इससे अच्छी सेहत और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद मिलता है।मंत्र जप: “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रिभुवन महालक्ष्म्यै अस्मांक दारिद्र्य नाशय प्रचुर धन देहि देहि क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ” का 108 बार जाप करें। इससे धन-संपत्ति और समृद्धि बढ़ती है।घी का दीपक जलाएं: तुलसी के पौधे के पास शुद्ध घी का दीपक जलाएं और तुलसी माता को प्रणाम करें। इससे घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है।पूजा सामग्री: धान की बाली, ईख, नारियल और ताड़ के फल से बने खूजा का उपयोग पूजन में करें। यह पूजा अधिक प्रभावी होती है।जागरण करें: रातभर जागरण करें और मां लक्ष्मी की पूजा करें। इससे मां लक्ष्मी की विशेष कृपा करती हैं और घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।
- सोमवार को शरद पूर्णिमा के अवसर पर मां कोजागरी लक्ष्मी व लक्खी पूजा होगी। पारंपरिक रीति रिवाज के अनुसार पूजा व अनुष्ठान किया जाता है। विवाहित स्त्रियां जहां परिवार की सुख-समृद्धि और उन्नति के लिए व्रत रखती हैं। पंडित के अनुसार 6 अक्टूबर की रात घी का दीपक जलाकर महालक्ष्मी का पूजन करने का विधान है। इस दिन लक्ष्मी घर घर घूमती है। और रात्रि जागरण कर पूजन करने वाले को सुख समृद्धि प्रदान करती हैं। शरद पूर्णिमा की अमृतोमय चांदनी से सिक्त खीर दूसरे दिन प्रात: प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने से धन ऐश्वर्य और बल में वृद्धि होती है।इस दिन 100 दीपक जलाने का विधान है। पश्चिम बंगाल से सटे इलाकों के हर गांव व घर में होती है पूजा बोकारो से सटे पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे क्षेत्र में सोमवार हर गांव और प्रत्येक घर में मां लक्खी की पूजा होगी। मंदिरों में विधि-विधान से मां की मूर्ति स्थापित की जाएगी। जिनके बाद ग्रामीण इस दौरान विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम कर सारी रात मां की आराधना में विलिन रहते हैं। चंदनकियारी, कसमार, चास सहित कई स्थानों में शरद पूर्णिमा पर मां की मूर्ति स्थापित कर मां का पूजन विधि पूर्वक किया जाता है। चंदनकियारी में हर दशकों से बांग्ला यात्रा का आयोजन होता है, जिसमें लोग मां की आराधना करने के पश्चात बांग्ला यात्रा देख रातजग्गा करते हैं।कैसे करें कोजागिरी पूर्णिमा पूजाकोजागिरी पूर्णिमा के संध्या समय में स्नान करने के पश्चात स्वर्ण, रजत अथवा मिट्टी के कलश स्थापित कर मां लक्ष्मी की स्वर्णमयी प्रतिमा लाल वस्त्र में लपेटकर कलश के ऊपर स्थापित कर उसकी उपलब्ध सामग्रियों से पूजा करनी चाहिए रात्रि में भजन, कीर्तन और जागरण निश्चित रूप से करनी चाहिए। चंदनकियारी में यात्रा का आयोजन लक्खी पूजा के अवसर पर हर बार की तरह इस बार भी चंदनकियारी में कोलकाता के प्रसिद्ध यात्रा का आयोजन किया जाएगा। इस बाबत पंडित ने जानकारी देते हुए बताया कि चंदनकियारी में इस बार नीलाम होलो सिथेर सिंदूर बांग्ला यात्रा का आयोजन किया जाएगा। जिसमें पश्चिम बंगाल के पसिद्ध कलाकार यात्रा में भाग लेंगे। इस दौरान भारी संख्या में आम लोगों की भीड़ उमड़ने की संभावना है। पूरे देश में मनाया जाता हैत्योहार : उड़िया मान्यता के अनुसार शरण पूर्णिमा के दिन भगवान शिव के पराक्रमी पुत्र कुमार कार्तिकेय का जन्म हुआ था। इसलिए ओड़िशा में इसे कुमार पूर्णिमा कहते हैं। गुजराती समुदाय के लोग आज शरद पूनम मनाते हैं।मराठी समुदाय में शरद पूर्णिमा को परिवार के जेष्ठ संतान को सम्मानित करने की परंपरा है। बंगाली समुदाय के लोग शरद पूर्णिमा को हर्षोल्लास के साथ मां लक्खी की पूजा करते हैं, जिसे कोजोगोरी लक्खी पूजा कहा जाता है। लोग रातभर जागकर समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं।
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शरद पूर्णिमा का त्योहार 6 अक्टूबर को मनाया जाएगा. ऐसी मान्यताएं हैं कि इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है और मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक पर भ्रमण करती हैं. ज्योतिषविद ऐसा मानते हैं कि शरद पूर्णिमा के दिन कुछ खास बातों का विशेष ख्याल रखना चाहिए. इस दिन एक छोटी सी गलती आपको आर्थिक मोर्चे पर कंगाल बना सकती है. आइए जानते हैं कि ये गलतियां कौन सी हैं.
1. दूध, चीनी और चावल का उधारशरद पूर्णिमा की रात चांद की रोशनी में खीर रखकर खाने की परंपरा है. कहते हैं कि इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है. इसलिए इसकी छाया में रखी खीर खाने से इंसान का भाग्योदय होता है. खीर दूध, चीनी और चावल से मिलकर बनती है और ज्योतिष में इन तीनों चीजों को चंद्रमा से जोड़कर देखा जाता है. इसलिए कहते हैं कि शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाने के लिए इसकी सामग्री को किसी से उधार नहीं लेना चाहिए. इन्हें अपनी मेहनत की कमाई से खरीदकर ही खीर बनाएं और मां लक्ष्मी को भोग लगाएं.2. भोजन का अपमानइंसान के घर में अन्न-धन का अंबार लगाने वाली मां अन्नपूर्णा और मां लक्ष्मी जब तक कृपा बरसाती हैं, तब तक आदमी का जीवन खुशियों से भरा रहता है. लेकिन एक बार देवी नाराज हुईं तो दुख-कष्ट पीछा नहीं छोड़ते हैं. कहते हैं कि अन्न का अपमान करने से मां लक्ष्मी और अन्नपूर्णा नाराज होती हैं. शरद पूर्णिमा के दिन भूलकर भी घर में यह गलती न करें.3. सूर्यास्त के बाद धन का लेन-देनज्योतिषविद कहते हैं कि शरद पूर्णिमा के शुभ अवसर पर शाम को सूर्यास्त के समय पैसों का लेन-देन करने की भूल न करें. इस एक गलती से भी मां लक्ष्मी रुष्ट हो सकती हैं. सूर्यास्त के बाद न तो किसी से पैसा उधार लें और न ही किसी को पैसा दें. यदि इस दिन धन का लेन-देन करना आवश्यक है तो इस काम को शाम होने से पहले ही निपटा लें4. मुख्य द्वार पर गंदगीमां लक्ष्मी को साफ-सफाई अत्यंत प्रिय है. इसलिए शरद पूर्णिमा के दिन घर में बिल्कुल गंदगी न करें. खासतौर से मुख्य द्वार और उत्तर दिशा में तो साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें. अन्यथा मां लक्ष्मी घर में वास नहीं करेंगी. एक बात का और ख्याल रखें कि इस दिन शाम होने के बाद घर में झाड़ू न लगाएं. घर की साफ-सफाई से जुड़े कार्य दोपहर तक निपटा लें. -
6 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाएगा. मान्यता है कि इस रात चंद्रमा धरती के सबसे निकट होता है. शरद पूर्णिमा के व्रत की भी विशेष महिमा बताई गई है. कहते हैं कि इसी दिन धन की देवी मां लक्ष्मी का अवतरण हुआ था. ऐसा विश्वास है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है.
नारद पुराण के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी उल्लू पर सवार होकर पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं. इसलिए इस दिन माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है. कहा जाता है कि इस दिन लक्ष्मी जी अपने श्रद्धालुओं को धन, वैभव, यश और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं. इसलिए घर के मुख्य द्वार पर दीप जलाकर देवी का स्वागत करना चाहिए.शरद पूर्णिमा की रात होती है बेहद खासशास्त्रों के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात ही भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में राधा और गोपियों संग अद्भुत महारास का आयोजन किया था. कहा जाता है कि इस दिन भगवान कृष्ण ने गोपियों संग नृत्य करने के लिए अनेक रूप प्रकट किए थे. यह दिव्य रासलीला केवल नृत्य नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और आनंद का अद्वितीय प्रतीक भी मानी जाती है.मां लक्ष्मी का अवतरणशरद पूर्णिमा की रात ही समुद्र मंथन के समय माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं. यही कारण है कि शरद पूर्णिमा का दिन लक्ष्मी पूजन के लिए बेहद खास माना जाता है. कई जगहों पर इस दिन कुंवारी कन्याएं सूर्य और चंद्र देव की पूजा करती हैं. और उनसे आशीर्वाद लेती हैं.क्यों खुले आसमान के नीचे रखी जाती है खीर?शरद पूर्णिमा के दिन आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा है. कहते हैं कि इस रात चंद्रमा की रोशनी से अमृत वर्षा होती है. इस खीर को खाने से अच्छी सेहत का वरदान और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद भी मिलता है. इसलिए लोग शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की छाया में खीर रखते हैं और फिर उसे अगले दिन सुबह खाते हैं. कहते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात चांद की रोशनी में रखी खीर खाने से इंसान का भाग्योदय होता है और परिवार को रोग-बीमारियों से मुक्ति मिलती है. -
अक्टूबर माह का नया सप्ताह शुरू होने वाला है. यह सप्ताह 6 अक्टूबर से लेकर 12 अक्टूबर तक रहेगा. खास बात यह है कि इस सप्ताह की शुरुआत शरद पूर्णिमा से हो रही है. शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है और इस दिन मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक पर भ्रमण भी करती हैं. ज्योतिषविदों का कहना है कि यह दुर्लभ संयोग तीन राशि के जातकों को शुभ परिणाम दे सकता है. आइए इन लकी राशियों के बारे में जानते हैं.
मिथुन राशि- आपके रुके हुए काम पूरे होंगे. धन लाभ होगा. कहीं से उधार दिया हुआ या फंसा हुआ पैसा वापस मिल सकता है. करियर की समस्याएं हल हो सकती हैं. पारिवारिक समस्याएं हल होंगी. स्वास्थ्य बेहतर होता जाएगा. घर में जिन बुजुर्गों की सेहत खराब चल रही थी, उसमें सुधार आने वाला है. धार्मिक कार्यों में व्यस्तता रहेगी. परिवार में खुशहाली आएगी. शिवजी को जल अर्पित करें.तुला राशि- अचानक धन लाभ के योग बनते दिख रहे हैं. आपका कोई महत्वपूर्ण काम बन जाएगा. मानसिक तनाव कम होगा. घर-परिवार में चल रही कोई बड़ी चिंता दूर हो सकती है. ऑफिस की समस्या हल हो सकती है. कार्यस्थल पर आपके काम से लोग प्रसन्न रहेंगे. छोटी यात्रा हो सकती है. परिवार संग किसी धार्मिक स्थल पर दर्शन के लिए जा सकते हैं. स्वास्थ्य में सुधार होगा. शिवजी को जल अर्पित करें.कुंभ राशि- धन लाभ के उत्तम योग बनने वाले हैं. आय के स्रोतों में वृद्धि होगी. गुप्त स्रोतों से धन की प्राप्ति हो सकती है. करियर में सफलता मिलेगी. क्रिएटिव फील्ड में कार्यरत लोगों को विशेष लाभ मिल सकता है. आपके लंबे समय से रुके हुए काम अब पूरे होंगे. करियर की रुकावट दूर होगी. प्रमोशन-इन्क्रीमेंट की प्रबल संभावनाएं बन रही हैं. स्वास्थ्य अच्छा रहेगा.उपायइस बार शरद पूर्णिमा सोमवार के दिन पड़ रही है. यह वार भगवान शिव को समर्पित है. ऐसे में शरद पूर्णिमा और सोमवार के संयोग में भगवान शिव को प्रसन्न करने से बहुत लाभ मिल सकता है. इस दिन सुबह स्नानादि के बाद शिवलिंग का जलाभिषेक करें. शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाएं. फिर महादेव के मंत्रों का जप करें. यह एक उपाय आपके जीवन की दिशा-दशा बदल सकता है. - साल 2025 में दशहरा या विजयादशमी 2 अक्टूबर, गुरुवार को है। हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर माता सीता को मुक्त कराया था। यह त्योहार पूरे भारत में अलग-अलग रूपों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध करके राक्षसों से पृथ्वी को मुक्त किया था। इसलिए, दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। कहीं रावण दहन होता है तो कहीं देवी दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन।तिथि और शुभ मुहूर्त-दशमी तिथि: 1 अक्टूबर 2025 की शाम 7:01 बजे से 2 अक्टूबर 2025 की शाम 7:10 बजे तक।विजय मुहूर्त: 2 अक्टूबर को 2:09 PM से 2:56 PM तक।अपराह्न पूजा मुहूर्त: 1:21 PM से 3:44 PM तक।रावण दहन का समय: सूर्यास्त के बाद, लगभग 6:05 बजे के बाद।पूजा विधि:सुबह-सुबह उठकर स्नान करें, साफ वस्त्र पहनें।घर के मंदिर या पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। यह भी माना जाता है कि घर के दरवाजे पर हल्दी या लाल रंग से स्वस्तिक बनाने से शुभता बढ़ती है।दुर्गा प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और धूप-अगरबत्ती लगाएं।सिंदूर, अक्षत (चावल), लाल पुष्प, नारियल, मिठाई और मौसमी फल रखें। देवी को लाल चुनरी अर्पित करना भी शुभ माना जाता है।दशहरा पर शस्त्र, औजार, किताबें और वाहन की पूजा करना परंपरा है। यह विजय और सफलता का प्रतीक माना जाता है।आरती और मंत्रोच्चारण- दुर्गा चालीसा, रामरक्षा स्तोत्र या दुर्गा मंत्र का पाठ करें। अंत में आरती करें और परिवार के सभी सदस्य आरती में शामिल हों।रावण दहन- शाम को रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण की पुतलियों का दहन करना अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।महत्व- दशहरा को “विजयादशमी” कहा जाता है। ‘विजय’ यानी जीत और ‘दशमी’ यानी दसवां दिन। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि चाहे बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंततः अच्छाई की ही जीत होती है। इस दिन को लेकर कई मान्यताएं हैं। कई लोग इस दिन शमी वृक्ष की पूजा करते हैं और उसके पत्तों को “सोना” मानकर एक-दूसरे को भेंट करते हैं। व्यवसायी वर्ग इस दिन अपने पुराने खातों को बंद कर नए खातों की शुरुआत करते हैं। विद्यार्थी अपनी किताबों और पेन की पूजा करते हैं, ताकि ज्ञान और सफलता बनी रहे। दक्षिण भारत में इसे “आयुध पूजा” कहा जाता है।उपायनए कार्य का आरंभ: विजय मुहूर्त में नया व्यवसाय, नौकरी या निवेश शुरू करने से सफलता मिलती है।दान-पुण्य: जरूरतमंदों को अन्न, कपड़े, मिठाई या धन दान करने से पुण्य मिलता है।मां दुर्गा की आराधना: इस दिन मां दुर्गा को लाल पुष्प अर्पित करना और दुर्गा मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।शमी पत्तों का आदान-प्रदान: रिश्तों में मजबूती के लिए लोग शमी पत्तों को “सोना” मानकर आदान-प्रदान करते हैं।रावण दहन की परंपरारावण दहन केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रतीक है अहंकार, लोभ और अन्य बुराइयों को जलाने का। बड़े-बड़े मैदानों में पुतले बनाए जाते हैं, जहां हजारों लोग इकट्ठा होकर आतिशबाजी के बीच रावण दहन देखते हैं। यह दृश्य बच्चों और बड़ों, दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र होता है।
- नवरात्रि के 9 दिन पूरे होने के बाद अगले दिन यानी दशमी तिथि पर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करने के बाद उनकी विदाई की जाती है। दशहरा को विजयदशमी के नाम से भी जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार, दशहरा का दिन बेहद शुभ होता है और इस तिथि पर दसों दिशाएं खुली रहती हैं। ऐसे में इस दिन किया गया कोई नया काम, पूजा और उपाय जातक को कई गुना फल दिला सकते हैं। ऐसे में 2 अक्टूबर, गुरुवार को दशहरा के दिन कुछ खास और आसान उपाय किए जा सकते हैं। इनमें से एक भी कर लेने से व्यक्ति को पूरे साल लाभ प्राप्त हो सकता है। साथ ही, जीवन में उन्नति प्राप्त होती है।आर्थिक समस्याओं से राहत पाने का उपायदशहरा के दिन एक छोटा सा उपाय करने से आपको आर्थिक समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है। इसके लिए दशहरा के दिन अपने पास के किसी मंदिर में जाकर झाड़ू का दान करें। ऐसा करने से जातक को धन की तंगी से निजात मिल सकती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। साथ ही, इस उपाय से घर की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होने लगती है। इस उपाय को शाम के समय करना सबसे उत्तम माना जाता है और झाड़ू दान करते समय मन में देवी लक्ष्मी का ध्यान करें।धन-धान्य में वृद्धि का उपायइसके लिए दशहरा के दिन शाम के समय भगवान गणेश और लक्ष्मी मां की विधि-विधान से पूजा करें। इस दौरान उन्हें एक नारियल भी जरूर अर्पित करें। इसके बाद, नारियल को अपनी तिजोरी में रख दें और रात के समय नारियल को लेजाकर किसी राम मंदिर में चढ़ाकर आ जाएं। मंदिर में प्रभु श्रीराम से जीवन में सुख-समृद्धि और धन-धान्य में वृद्धि का कामना करें। इस उपाय को करने से जातक को बेहद शुभ फल की प्राप्ति होती है और घर से दरिद्रता दूर हो सकती है।इस एक उपाय से पुण्य फल होगा प्राप्तदशहरा के मौके पर प्रभु श्रीराम की आराधना करने का खास महत्व होता है। ऐसा करने के बाद एक लाल रंग के कलम से कम से कम 108 बार राम नाम लिखना चाहिए। इस उपाय को करने श्रद्धापूर्वक करने से जातक को भगवान राम की कृपा प्राप्त हो सकती है और आंतरिक शांति का अनुभव होता है। दशहरा पर श्रीराम से जुड़े इस उपाय से आपको बेहद पुण्य फल प्राप्त हो सकता है।जीवन में उन्नति प्राप्त करने का उपायदशहरा के अवसर पर आप नारियल से जुड़ा एक विशेष उपाय कर सकते हैं। इसके लिए एक नारियल को पीले रंग के साफ वस्त्र में लपेट दें और उसे लेजाकर राम मंदिर में चढ़ा दें। इस उपाय को करने से आपके कार्यों में आ रही बाधाएं दूर हो सकती हैं। साथ ही, जीवन में तरक्की और उन्नति प्राप्त होने लगती है। नारियल का यह उपाय आपको करियर और नौकरी में भी सफलता के मार्ग पर लेकर जा सकता है।इस उपाय से प्रभु श्रीराम और बजरंगबली की कृपा होगी प्राप्तमान्यता है कि दशहरा के दिन सुंदरकांड का पाठ करना बेहद शुभ होता है। ऐसा करने से व्यक्ति को भगवान राम, बजरंगबली और जानकीजी की आराधना करने के समान फल प्राप्त होता है। इस दिन पूजा-पाठ करने के साथ-साथ नई चीजें जैसे- वाहन, घर आदि खरीदना भी शुभ माना जाता है। साथ ही, आप दशहरा पर किसी नए काम की शुरुआत कर सकते हैं। इससे जीवन में तरक्की प्राप्त होती है।--
- दशहरा का पर्व हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है और इसे बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है. इस दिन सिर्फ रावण दहन नहीं होता, बल्कि जीवन में शुभता और सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए कई पारंपरिक उपाय भी किए जाते हैं. मान्यता है कि दशहरा के दिन किए गए उपाय खास प्रभाव रखते हैं और घर-परिवार में खुशहाली और समृद्धि ला सकते हैं. खासकर नींबू का प्रयोग, जो सदियों से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और धन की वृद्धि के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है, अगर आप इस दशहरा अपने घर में सुख-शांति और धन के अवसर लाना चाहती हैं, तो कुछ आसान लेकिन असरदार उपाय हैं जिन्हें आप आजमा सकती हैं. यहां हमें भोपाल निवासी एक ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित बताने जा रहे हैं तीन ऐसे नींबू के रहस्यमयी उपाय जो आपके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं और घर में लक्ष्मी के वास को मजबूत कर सकते हैं.1. घर के मुख्य द्वार पर नींबू-मिर्च की माला लटकाएंदशहरा के दिन घर के मुख्य द्वार पर नींबू और हरी मिर्च की माला लटकाना एक पुरानी परंपरा है. ऐसा माना जाता है कि इससे कोई भी बुरी नजर या नकारात्मक ऊर्जा घर के भीतर प्रवेश नहीं कर सकती. इस उपाय को करने के लिए आप सुबह जल्दी उठकर नींबू और मिर्च की माला तैयार करें और अपने मुख्य दरवाजे पर लटका दें. इस उपाय का असर सिर्फ नकारात्मकता को दूर करना ही नहीं है, बल्कि यह धन को आकर्षित करने में भी मदद करता है. सदियों से यह तरीका परिवारों में अपनाया जाता रहा है और इसे आज भी कारगर माना जाता है, अगर आप इस उपाय को नियमित रूप से दशहरा के दिन करती हैं, तो आपके घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है.2. नींबू के छिलकों से करें धन लाभ का उपायनींबू के छिलके भी धन लाभ और घर की सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने में मदद करते हैं. इसके लिए सबसे पहले नींबू को अच्छे से धोकर उसके छिलके अलग कर लें. अब इन छिलकों को एक बर्तन में रखें और उस पर हल्का सा हल्दी और अक्षत छिड़कें.इन छिलकों को आप घर के मंदिर या पूजा स्थान में रखें, ऐसी जगह जहां किसी की नजर न पड़े. अगले दिन इन्हें किसी नदी में प्रवाहित कर दें या घर के बाहर किसी पेड़ के नीचे रख दें. यह उपाय घर की नकारात्मकता को दूर करता है और नए अवसर व धन के योग बनाने में सहायक होता है.3. नींबू के छिलके का दीपक जलाएंदशहरा से एक दिन पहले ही नींबू के छिलकों को धूप में सुखा लें. दशहरा की रात को इन छिलकों का दीपक जलाकर घर के मुख्य दरवाजे पर या बालकनी जैसे खुले स्थान पर रखें. यह न केवल घर की नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है, बल्कि घर में लक्ष्मी का वास भी बनाए रखता है.यदि आप घर के मंदिर में भी नींबू के छिलके का दीपक जलाती हैं, तो यह उपाय घर की खुशहाली और समृद्धि को बढ़ाने में और भी मददगार साबित होता है. इसे नियमित रूप से अपनाने से आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और परिवार के सभी सदस्य खुशहाल रहते हैं.
- हिंदू धर्म में नवरात्रि को अत्यंत पवित्र और पावन पर्व माना गया है। इन नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की आराधना की जाती है। इस दौरान भक्त सात्विक जीवन जीते हैं और वातावरण में भी एक विशेष शुद्धता बनी रहती है। शास्त्रों में कहा गया है कि नवरात्रि के समय जन्म लेने वाले लोग भी खास गुणों के धनी होते हैं। आइए जानते हैं कि इस अवधि में जन्मे लोगों का स्वभाव कैसा होता है और उनके जीवन कैसा होता है।नवरात्रि में जन्मे लोगों का स्वभावनवरात्रि में जन्म लेने वाले बच्चे बहुत भाग्यशाली माने जाते हैं, क्योंकि इन पर मां दुर्गा की विशेष कृपा होती है। इनके स्वभाव में सकारात्मकता और विनम्रता झलकती है। सामाजिक जीवन में ये अपनी बातों से दूसरों को आकर्षित कर लेते हैं। हालांकि कभी-कभी ये एकांतप्रिय भी हो जाते हैं। ऐसे लोग सीमित मित्र बनाते हैं, लेकिन जिनसे जुड़ते हैं उनके लिए समर्पण भाव रखते हैं।बौद्धिक क्षमतानवरात्रि के दौरान जन्म लेने वालों की बुद्धि तेज होती है। वे नई चीजें जल्दी सीखने की सक्षमता रखते हैं। साथ ही कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखते हैं। शिक्षा और ज्ञान की ओर इनका विशेष झुकाव होता है, जिससे इन्हें पढ़ाई में सफलता और सम्मान दोनों मिलते हैं। अक्सर इनके जीवन में शैक्षणिक या बौद्धिक क्षेत्र से जुड़ी कोई न कोई उपलब्धि देखने को मिलती है।भाग्य का साथऐसे लोग भाग्यशाली माने जाते हैं। हालांकि इन्हें परिश्रम भी करना पड़ता है, लेकिन इनकी मेहनत अपेक्षाकृत जल्दी फल देती है। कई बार इनका भाग्योदय अचानक और अप्रत्याशित रूप से होता है। इनकी एक खासियत यह भी होती है कि ये कर्मशील रहते हैं, इसलिए इनका भाग्य खुद ही इनके प्रयासों का साथ देता है।नवरात्रि में जन्मी कन्यानवरात्रि के दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना होती है। मान्यता है कि इस अवधि में यदि किसी घर में कन्या जन्म ले, तो उसका आगमन सुख-समृद्धि का सूचक होता है। ऐसी कन्याएं जहां जाती हैं, वहां समृद्धि और शुभता का संचार होता है। ये कन्याएं प्रभावशाली व्यक्तित्व की धनी होती हैं और समाज में अपना अलग स्थान बना लेती हैं।
- शारदीय नवरात्रि का पर्व आरंभ हो चुका है। यह समय देवी दुर्गा की साधना और आराधना के लिए अत्यंत शुभ है। शारदीय नवरात्रि के इन नौ दिनों में देशभर के धार्मिक स्थलों सहित मंदिरों में पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन और विभिन्न मांगलिक कार्यक्रमों का भव्य आयोजन किया जाता है। इस दौरान श्रद्धालु सच्चे भाव से व्रत रखते हैं, माता के नौ स्वरूपों की आराधना करते हैं।धार्मिक मान्यता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और व्यक्ति मानसिक शांति का एहसास करता है। यही नहीं, इस अवधि में देवी की उपासना से आर्थिक समृद्धि, परिवार में सुख-शांति और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति भी होती हैं।शास्त्रों के अनुसार शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के शक्तिशाली नामों का स्मरण करने से भी व्यक्ति का भाग्योदय होता है और वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सफलता प्राप्त करता है। ऐसे में आप भी शारदीय नवरात्रि के दिनों में देवी के इन 108 नामों का जाप कर सकते हैं। यह बेहद शुभ होता है। आइए इसके बारे में जानते हैं।शारदीय नवरात्रि 2025 कैलेंडर22 सितंबर 2025 – प्रतिपदा (शैलपुत्री पूजा)23 सितंबर 2025 – द्वितीया (ब्रह्मचारिणी पूजा)24 सितंबर 2025 – तृतीया (चन्द्रघण्टा पूजा)26 सितंबर 2025 – चतुर्थी (कूष्माण्डा पूजा)27 सितंबर 2025 – पञ्चमी (स्कन्दमाता पूजा)28 सितंबर 2025 – महाषष्ठी (कात्यायनी पूजा)29 सितंबर 2025 – महासप्तमी (कालरात्रि पूजा)30 सितंबर 2025 – महाअष्टमी (महागौरी पूजा)1 अक्टूबर 2025 – महानवमी (सिद्धिदात्री पूजा)2 अक्टूबर 2025 – विजयादशमीमां दुर्गा के नाम1. ॐ श्रियै नमः।2. ॐ उमायै नमः।3. ॐ भारत्यै नमः।4. ॐ भद्रायै नमः।5. ॐ शर्वाण्यै नमः।
6. ॐ विजयायै नमः।
7. ॐ जयायै नमः।
8. ॐ वाण्यै नमः।
9. ॐ सर्वगतायै नमः।
10. ॐ गौर्यै नमः।
11. ॐ वाराह्यै नमः।
12. ॐ कमलप्रियायै नमः।
13. ॐ सरस्वत्यै नमः।
14. ॐ कमलायै नमः।
15. ॐ मायायै नमः।
16. ॐ मातंग्यै नमः।
17. ॐ अपरायै नमः।
18. ॐ अजायै नमः।19. ॐ शांकभर्यै नमः।20. ॐ शिवायै नमः।21. ॐ चण्डयै नमः।22. ॐ कुण्डल्यै नमः।
23. ॐ वैष्णव्यै नमः।
24. ॐ क्रियायै नमः।
25. ॐ श्रियै नमः।
26. ॐ ऐन्द्रयै नमः।
27. ॐ मधुमत्यै नमः।
28. ॐ गिरिजायै नमः।
29. ॐ सुभगायै नमः।
30. ॐ अंबिकायै नमः।
31. ॐ तारायै नमः।
32. ॐ पद्मावत्यै नमः।
33. ॐ हंसायै नमः।
34. ॐ पद्मनाभसहोदर्यै नमः।
35. ॐ अपर्णायै नमः।
36. ॐ ललितायै नमः।
37. ॐ धात्र्यै नमः।
38. ॐ कुमार्यै नमः।
39. ॐ शिखवाहिन्यै नमः।
40. ॐ शांभव्यै नमः।
41. ॐ सुमुख्यै नमः।
42. ॐ मैत्र्यै नमः।
43. ॐ त्रिनेत्रायै नमः।
44. ॐ विश्वरूपिण्यै नमः।
45. ॐ आर्यायै नमः।46. ॐ मृडान्यै नमः।47. ॐ हींकार्यै नमः।
48. ॐ क्रोधिन्यै नमः।
49. ॐ सुदिनायै नमः।
50. ॐ अचलायै नमः।
51. ॐ सूक्ष्मायै नमः।
52. ॐ परात्परायै नमः।
53. ॐ शोभायै नमः।
54. ॐ सर्ववर्णायै नमः।
55. ॐ हरप्रियायै नमः।
56. ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
57. ॐ महासिद्धयै नमः।
58. ॐ स्वधायै नमः।
ॐ. स्वाहायै नमः।
60. ॐ मनोन्मन्यै नमः।
61. ॐ त्रिलोकपालिन्यै नमः।
62. ॐ उद्भूतायै नमः।
63. ॐ त्रिसन्ध्यायै नमः।
64. ॐ त्रिपुरान्तक्यै नमः।
65. ॐ त्रिशक्त्यै नमः।
66. ॐ त्रिपदायै नमः।
67. ॐ दुर्गायै नमः।
68. ॐ ब्राह्मयै नमः।
69. ॐ त्रैलोक्यवासिन्यै नमः।
70. ॐ पुष्करायै नमः।
71. ॐ अत्रिसुतायै नमः।72. ॐ गूढ़ायै नमः।73. ॐ त्रिवर्णायै नमः।74. ॐ त्रिस्वरायै नमः।75. ॐ त्रिगुणायै नमः। - नवरात्रि भारत का प्रमुख धार्मिक पर्व है जो शक्ति की उपासना को समर्पित है। इस पर्व के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। नवरात्रि के अष्टमी और नवमी तिथि को कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। इसे कंजक पूजन भी कहा जाता है। इस परंपरा में छोटी-छोटी कन्याओं और एक छोटे बालक (लांगुरिया/भैरव) को आमंत्रित कर उन्हें भोजन कराया जाता है और उनका पूजन किया जाता है।शास्त्रों के अनुसार, कन्याएं स्वयं मां दुर्गा का ही रूप मानी जाती हैं। देवी भागवत में वर्णन है कि “जहां कन्याओं का पूजन होता है, वहां मां दुर्गा स्वयं प्रसन्न होकर वास करती हैं।” नवरात्रि के दौरान जब साधक नौ दिनों तक व्रत, भक्ति और अनुष्ठान करते हैं, तो कन्या पूजन को उस साधना का पूर्ण फल माना जाता है। माना जाता है कि जब कन्याओं को श्रद्धा और भक्ति से पूजन कर भोजन कराया जाता है, तो मां दुर्गा साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं।नवदुर्गा का प्रत्येक रूपदेवी भागवत में नौ कन्याओं को नवदुर्गा का प्रत्यक्ष विग्रह बताया गया है। उसके अनुसार नवकुमारियां भगवती के नवस्वरूपों की जीवंत मूर्तियां है। इसके लिए दो से दस वर्ष तक की कन्याओं का चयन किया जाता है।दो वर्ष की कन्या ‘कुमारिका’ कहलाती है, जिसके पूजन से धन-आयु-बल की वृद्धि होती है।तीन वर्ष की कन्या ‘त्रिमूर्ति’ कही जाती है। इसके पूजन से घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।चार वर्ष की कन्या ‘कल्याणी’ के पूजन से विवाह आदि मंगल कार्य संपन्न होते हैं।पांच वर्ष की कन्या ‘रोहिणी’ की पूजा से स्वास्थ्य लाभ होता है।छह वर्ष की कन्या ‘कालिका’ के पूजन से शत्रु का दमन होता है।आठ वर्ष की कन्या ‘शांभवी’ के पूजन से दुःख-दरिद्रता का नाश होता है।नौ वर्ष की कन्या ‘दुर्गा’ पूजन से असाध्य रोगों का शमन और कठिन कार्य सिद्ध होते हैं।दस वर्ष की कन्या ‘सुभद्रा’ पूजन से मोक्ष की प्राप्ति होती है।देवी भागवत में इन नौ कन्या को कुमारी नवदुर्गा की साक्षात प्रतिमूर्ति माना गया है। दस वर्ष से अधिक आयु की कन्या को कुमारी पूजा में सम्मिलित नहीं करना चाहिए। कन्या पूजन के बिना भगवती महाशक्ति कभी प्रसन्न नहीं होतीं।नवरात्रि में कन्या पूजन कैसे करें?महाअष्टमी या महानवमी के दिन स्नान आदि करने के बाद भगवान गणेश और माता गौरी की पूजा करें।इसके बाद कन्या पूजन के लिए 9 कन्याओं और एक बालक को भी आमंत्रित करें।पूजा की शुरुआत कन्याओं के स्वागत से करें।इसके बाद सभी कन्याओं के साफ पानी से पैर धोएं और साफ कपड़े से पोछकर आसन पर बिठाएं।फिर कन्याओं के माथे पर कुमकुम और अक्षत का टीका लगाएं।इसके बाद कन्याओं के हाथ में कलावा या मौली बांधें।एक थाली के में घी का दीपक जलाकर सभी कन्याओं की आरती उतारें।आरती उतारने के बाद कन्याओं को भोग में पूड़ी, चना, हलवा और नारियल खिलाएं।भोजन के बाद उन्हें अपने सामर्थ्य अनुसार भेंट दें।आखिर में कन्याओं के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद जरूर लें।अंत में उन्हें अक्षत देकर उनसे थोड़ा अक्षत अपने घर में छिड़कने को कहें।कन्या पूजन का महत्वहिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, कन्या पूजन के लिए दो से दस साल तक की कन्या उपयुक्त होती हैं. दो से दस साल तक की कन्याएं मां दुर्गा के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं. इसके अलावा लंगूर के रूप में एक बालक को भी इस पूजा में शामिल किया जाता है, जिसे भैरव बाबा या हनुमान जी का प्रतीक कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्या पूजन करने से देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं और उनकी कृपा आपके परिवार पर सदा बनी रहती है।
- शक्ति और साधना का महापर्व शारदीय नवरात्रि पूरे देश में आस्था और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में इन नौ दिनों को अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है। यही वजह है कि बहुत से लोग एक नई शुरुआत के लिए अपने नए घर में प्रवेश (गृह प्रवेश) जैसे मांगलिक कार्य करने की योजना बनाते हैं। मान्यताओं के अनुसार, इतने पावन पर्व पर गृह प्रवेश करने से घर में मां दुर्गा का आशीर्वाद बना रहता है और सुख-समृद्धि का वास होता है। आइए इस लेख में जानते हैं कि इस बार शारदीय नवरात्रि में गृह प्रवेश करना शुभ है या नहीं।क्या नवरात्रि में गृह प्रवेश शुभ है?आम तौर पर नवरात्रि के नौ दिनों को 'सिद्ध मुहूर्त' माना जाता है, यानी यह समय इतना पवित्र है कि कई नए कार्यों की शुरुआत के लिए विशेष मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती। मान्यता है कि इन दिनों में सकारात्मक ऊर्जा अपने चरम पर होती है, इसलिए इस दौरान गृह प्रवेश करने से घर में देवी का वास होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।क्या शारदीय नवरात्रि 2025 में गृह प्रवेश कर सकते हैं?इस वर्ष शारदीय नवरात्रि चातुर्मास के दौरान पड़ रही है, और शास्त्रों में चातुर्मास के समय गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं। इसलिए इस बार नवरात्रि में गृह प्रवेश नहीं कर सकते हैं। गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त देखते समय चातुर्मास जैसे अशुभ योगों का विशेष ध्यान रखा जाता है। चातुर्मास वह चार महीने की अवधि है जब भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हैं। इस दौरान कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन या गृह प्रवेश करना वर्जित होता है।इस नवरात्रि क्या करें?इस वर्ष शारदीय नवरात्रि चातुर्मास के भीतर पड़ रही है। चूंकि नवरात्रि चातुर्मास के दौरान है, इसलिए ज्योतिषियों के अनुसार इस अवधि में गृह प्रवेश करना शुभ नहीं है। आप इस दौरान नए घर की खरीदारी कर सकते हैं या सामान ले जा सकते हैं, लेकिन मुख्य पूजा और रहने की शुरुआत चातुर्मास के बाद ही करनी चाहिए।इस वर्ष शारदीय नवरात्रि में गृह प्रवेश का कोई शुभ मुहूर्त नहीं है। यह समय नए घर की खरीदारी करने, अनुबंध करने या घर के लिए सामान खरीदने के लिए अत्यंत शुभ है। आप चाहें तो अपने नए घर में दुर्गा सप्तशती का पाठ रखवा सकते हैं। गृह प्रवेश के लिए अगला शुभ मुहूर्त नवंबर 2025 में देवउठनी एकादशी के बाद ही उपलब्ध होगा।
- घर-घर माता रानी पधार चुकी हैं। माता के 9 स्वरूपों की इस बार 10 दिन उपासना की जाएगी। इस साल शारदीय नवरात्रि 10 दिनों की है। नवरात्रि व्रत का समापन कन्या पूजन के बाद ही किया जाता है। माता की भक्ति में लीन होकर माता का आशीर्वाद प्राप्त हो सकता है। वहीं, पूजा-पाठ करते समय कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखा जाता है। नवरात्रि पूजा शुरू करने से पहले एक काम करना जरूरी माना जाता है, जिसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। यह काम करना न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि लाभदायक भी है। आइए जानते हैं-नवरात्रि में पूजा शुरू करने से पहले करें ये काम--शारदीय नवरात्रि की पूजा शुरू करने से पहले भगवान श्री गणेश को प्रणाम करें। प्रभु का ध्यान करें। मान्यता है किसी भी शुभ कार्य या पूजा-पाठ की शुरुआत बिना भगवान गणेश जी का ध्यान किए नहीं होती है। ऐसे में नवरात्रि से जुड़ा कार्य शुरू करने से पहले भगवान गणेश जी की पूजा करें। प्रभु का जलाभिषेक करें, चंदन और पुष्प अर्पित कर नमन करें।दशमी तक माता को लगाएं इन चीजों का भोग---प्रतिपदा तिथि को माता को घी का भोग लगाएं- द्वितीया को माता को शक्कर का भोग लगाएं- तृतीया को गाय के दूध का भोग लगाएं-चतुर्थी को माता को माल पूआ का भोग लगाएं- पंचमी को माता को केला का भोग लगाएं-षष्ठी तिथि को शहद का भोग लगाएं- सप्तमी तिथि को माता को गुड़ का भोग लगाएं- अष्टमी को माता को नारियल का भोग लगाएं-नवमी को माता को लावा का भोग लगाएं-दशमी को माता को तिल का भोग लगाएं
- शारदीय नवरात्र की शुरुआत हो चुकी है. ये पवित्र दिन मां दुर्गा की उपासना के लिए बेहद पावन माना जाता है. इन दिनों में मां की पूजा, आरती, व्रत रखना बेहद उत्तम माना गया है. नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना के समय मां की चौकी लगाई जाती है, जिसके कुछ खास नियम होते हैं.धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां की कृपा पाने के लिए चौकी का सही दिशा में लगाना बेहद जरूरी माना गया है. चौकी की सही दिशा उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) बताई गई है, ऐसी मान्यता है कि चौकी को इस दिशा में रखने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. इसके अलावा, माता की चौकी को कभी भी खाली नहीं रखने की भी मान्यता है. ऐसा करना शुभ नहीं माना जाता है. कहते हैं कि नवरात्र में अगर माता की चौकी सूनी छोड़ दी जाए तो पूजा का फल नहीं मिलता है. इसके पीछे कई धार्मिक मान्यताएं भी हैं. आइये जानते हैं उसके बारे में1. मां दुर्गा का सम्माननवरात्र मां दुर्गा के आगमन का समय होता है और घर में स्थापित चौकी मां दुर्गा को समर्पित होती है. अगर घर में माता की चौकी स्थापित करके इसे सूना छोड़ दिया जाए तो इसे माता का अनादर समझा जाता है. इसलिए ऐसा न करें. चौकी के पास हर वक्त कोई न कोई जरूर होना चाहिए. देवी की चौकी के पास ठहरने वाले व्यक्ति को सात्विक और शुद्धि का भी विशेष ख्याल रखना चाहिए.2. नकारात्मक शक्तियों का संचारनवरात्र में माता की चौकी स्थापित करने से घर में पवित्रता आती है. कहते हैं कि यदि साधक चौकी को सूना छोड़ दे तो घर में नकारात्मक शक्तियों के प्रवेश का खतरा बढ़ सकता है. लगातार निगरानी से चौकी की पवित्रता और सुरक्षा दोनों कायम रहती है.4. कलश और जौनवरात्र के दौरान चौकी पर रखे कलश के पास जौ बोए जाते हैं, जो सुख-समृद्धि और देवी के आशीर्वाद का प्रतीक हैं. इसे सूना या अकेला छोड़ना अशुभ माना जाता है. नवरात्र में इनकी बहुत बारीकी से देख-रेख की जाती है5. भक्ति और समर्पणनवरात्र में देवी के सारे भक्त निरंतर पूजा, व्रत और आराधना में लगे रहते हैं. चौकी को कभी खाली न छोड़ना इसी भक्ति और समर्पण का हिस्सा है, जो यह दिखाता है कि भक्त हर पल देवी की उपासना में लीन है.
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नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो गया है। नवरात्रि के दौरान मां के अलग-अलग 9 रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यह आध्यात्मिक और मानसिक उन्नति का समय भी है। इस दौरान कुछ चीजों की खरीदारी करना बेहद शुभ माना जाता है, जिससे घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा आती है। आइए जानते हैं, नवरात्रि के दौरान किन चीजों की खरीदारी करना शुभ रहता है…
श्रृंगार का सामान- नवरात्रि में श्रृंगार सामग्री खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। इससे घर में समृद्धि आती है और सौभाग्य भी बढ़ता है। कोशिश करें कि श्रृंगार का सामान सप्तमी, अष्टमी या नवमी के दिन ही खरीदा जाए, इससे पुण्य फल दोगुना होता है।देवी-देवताओं की मूर्ति या तस्वीर- इस पावन पर्व पर घर में देवी-देवताओं की मूर्ति या तस्वीर रखना बेहद शुभ है। अपनी इष्ट देवी या देवता की मूर्ति घर लाने से जीवन में शुभ फल, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।पौधे घर में लाएं- नवरात्रि में घर में तुलसी, शमी, केले या मनी प्लांट जैसे पौधे लगाना भी बेहद लाभकारी है। ये न सिर्फ नकारात्मक ऊर्जा को दूर करते हैं बल्कि वास्तु दोषों से मुक्ति दिलाने में भी मदद करते हैं।कामधेनु की मूर्ति- यदि आप नवरात्रि में कामधेनु की मूर्ति घर लाते हैं, तो यह धन-धान्य और आरोग्य दोनों में लाभ देती है। घर में कामधेनु की पूजा से आर्थिक संकट और नकारात्मक ऊर्जा से राहत मिलती है।घर या जमीन की खरीदारी- नवरात्रि के दौरान नया घर या जमीन का टुकड़ा खरीदना भी शुभ माना जाता है। इस दौरान खरीदा गया घर या जमीन लंबे समय तक सुख-समृद्धि और शांति देता है।नया वाहन खरीदना- अगर आप नवरात्रि के दिनों में नया वाहन खरीदते हैं, तो यह भी लाभकारी है। खासकर शनिवार के दिन खरीदा गया वाहन लंबे समय तक टिकाऊ और लाभकारी रहता है।अन्य शुभ चीजें- नवरात्रि में आप चांदी का सिक्का, श्री यंत्र, चंदन, कलश जैसी चीजें भी घर ला सकते हैं। ये सभी वस्तुएँ माता दुर्गा की कृपा और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने में मदद करती हैं। - शारदीय नवरात्रि माता दुर्गा की उपासना का पवित्र पर्व है। नवरात्रि में वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन करने से पूजा का प्रभाव बढ़ता है और माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। बता दें कि साफ-सफाई, पूजा की सही दिशा और सजावट से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।घर में साफ-सफाई रखेंवास्तु शास्त्र में स्वच्छता सकारात्मक ऊर्जा का आधार है। नवरात्रि से पहले घर की अच्छी तरह साफ-सफाई करें। फर्श पर गंगाजल का छिड़काव करें और पुराने, टूटे सामान को हटाएं। रसोई और पूजा कक्ष को विशेष रूप से साफ रखें। स्वच्छ घर माता रानी की कृपा को आकर्षित करता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है।सही दिशा में करें कलश स्थापनावास्तु के अनुसार, नवरात्रि में कलश स्थापना उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में करें, जो सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र है। कलश को पीतल या तांबे के बर्तन में स्थापित करें और उसमें गंगाजल, सुपारी, और आम के पत्ते डालें। माता की मूर्ति के सामने कलश रखें। यह समृद्धि और शांति को आकर्षित करता है।पूजा कक्ष की सही दिशानवरात्रि के लिए पूजा कक्ष उत्तर-पूर्व दिशा में बनाएं, क्योंकि यह दिशा आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़ी है। पूजा कक्ष में माता की मूर्ति को पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके रखें। सुनिश्चित करें कि पूजा स्थान के पास कोई अव्यवस्था ना हो और दीपक, धूपबत्ती नियमित जलाएं। यह माता रानी की कृपा को बढ़ाता है।दीपक जलाने की सही दिशावास्तु के अनुसार, नवरात्रि में दीपक को दक्षिण-पूर्व (अग्नि कोण) में जलाएं। यह अग्नि तत्व को संतुलित करता है और सकारात्मक ऊर्जा लाता है। घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं और माता के सामने रखें। दीपक को रोज साफ करें और रात में बुझने न दें। यह माता का आशीर्वाद दिलाता है।मुख्य द्वार को सजाएंमुख्य द्वार को नवरात्रि में आम के पत्तों के तोरण और स्वास्तिक से सजाएं। वास्तु में मुख्य द्वार सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश द्वार है। लाल या पीले रंग का स्वास्तिक बनाएं और फूलों की माला लगाएं। यह माता रानी को आमंत्रित करता है और घर में सुख-समृद्धि लाता है।शुभ रंगों से बढ़ाएं ऊर्जानवरात्रि में पूजा कक्ष और घर में लाल, पीला और नारंगी जैसे शुभ रंगों का उपयोग करें। ये रंग सूर्य और गुरु ग्रह से जुड़े हैं, जो समृद्धि और सकारात्मकता लाते हैं। पूजा स्थल पर रंगीन कपड़ा बिछाएं और फूलों से सजावट करें। यह माता की कृपा और शुभ ऊर्जा को आकर्षित करता है।वास्तु से नवरात्रि की शक्तिशारदीय नवरात्रि में साफ-सफाई, सही दिशा में कलश और पूजा कक्ष, दीपक और मुख्य द्वार की सजावट जैसे वास्तु उपाय अपनाएं। ये उपाय सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाते हैं और माता रानी का आशीर्वाद दिलाते हैं। श्रद्धा से इनका पालन करें, ताकि घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे।

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