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- - लेखिका-डॉ. दीक्षा चौबेदुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)रश्मिरथी का हुआ आक्रमण, तम ने राजपाठ सब हारा।विजयमाल हो कंठ उसी के, जिसने जीवन जग पर वारा।।करते स्वच्छ कंटकित पथ को, मानें सबके दुख को अपना।जग-कल्याणी भाव हृदय में, देखें हरदम जन-हित सपना।राष्ट्रधर्म सर्वोपरि समझें, न्यौछावर तन-मन-धन कर दें।धरती माता के आँचल को, प्रियता के पुष्पों से भर दें।दिल में दीप जलाने वाले , कर जाते हैं जग उजियारा ।विजयमाल हो कंठ उसी के, जिसने जीवन जग पर वारा।।अंतस के कलुष-कुतर्कों को, ज्ञानदीप आलोकित करता।स्त्रोत जहाँ हो पावन प्रेमिल, शुचि स्नेह-नीर अविरल झरता।द्वेष-दंभ की बढ़ती खाई, दूरी लाती संबंधों में।टूटी कड़ियाँ परिवारों की, चलती केवल अनुबंधों में।जागृत जीवन-मूल्य करें तो, बचा सकेंगे भाईचारा।।विजयमाल हो कंठ उसी के, जिसने जीवन जग पर वारा।।संकल्पों की शक्ति संपदा, दृढ़ करती है आधारों को।स्त्रोतस्विनी उद्दाम वेग से, देती ज्यों बहा किनारों को।भारत-भू के अनमोल रत्न, प्रेरित करते जनमानस को।संतों गुरुओं की वाणी से, ज्योतित कर लेना अंतस को।प्यास बुझाती और तारती, सुरसरिता की निर्मल धारा।।विजयमाल हो कंठ उसी के, जिसने जीवन जग पर वारा।।
- - कहानी- लेखिका-डॉ. दीक्षा चौबेदुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)प्रशांत के फोन आते ही रवि की नजर घड़ी पर चली गई । रात के एक बजे उसे क्या काम आ गया । रवि समझ नहीं पा रहा था कि प्रशांत ने उसे तुरंत अपने घर आने के लिए क्यों कहा । शायद उसकी तबीयत ठीक नहीं, ऐसा लगता है । वैसे भी वह मम्मास बॉय ही रहा शुरू से , वो तो नौकरी के कारण उसे घर से दूर रायपुर आना पड़ा.. नहीं तो वह मम्मी पापा को छोड़कर कभी नहीं आता । शुक्र है यहाँ उसके बचपन का दोस्त रवि था, उसके घर कुछ दिन रहकर वह एक किराये के घर में शिफ़्ट हो गया था । रवि और उसकी पत्नी तो यही चाहते थे कि वह उनके साथ रहे, पर कितने दिन कोई किसी के साथ रहे .. दो- चार दिन की बात तो थी नहीं ।उन दोनों ने न जाने कितने सारे घर देखे पर कोई पसन्द ही नहीं आ रहा था । रवि का एक दोस्त था सुमित जो न्यूयार्क में रहता था । उसका बंगला खाली पड़ा था और उसने रवि को यह जिम्मेदारी दी थी कि वह उसके लिए किरायेदार ढूँढे ताकि बंगले की उचित देखभाल होती रहे । हालांकि प्रशांत का बजट इतने बड़े बंगले के लायक नहीं था , लेकिन रवि के कहने पर बंगले के आधे हिस्से को बंद करके आधे हिस्से में प्रशांत को रहने की अनुमति सुमित ने दे दी थी ।रवि तुरंत प्रशांत के घर जाने के लिए निकल पड़ा । रात्रि की नीरवता और अंधेरे में पूरा शहर किसी बच्चे की भाँति निश्चिंत सो रहा था । प्रशांत घर के बाहर ही रवि की प्रतीक्षा कर रहा था । वह बहुत घबराया सा दिख रहा था, इस कड़ाके की ठंड में भी वह पसीने से तरबतर था । हाथ - पैर कांप रहे थे और वह कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था । रवि प्रशांत को साथ लेकर अपने घर आ गया था और उसे दवा देकर सुला दिया था ।दूसरे दिन सुबह प्रशांत की हालत सामान्य हुई तब रवि ने उससे रात की घटना पर प्रश्न किया - "आखिर वह कौन सी घटना हुई जिसने तुम्हें स्तब्ध कर दिया प्रशांत ?प्रशांत ने बताया - जब से मैं वहाँ रहने गया था मुझे कुछ न कुछ अजीबोगरीब घटनाएँ होते दिखाई दी पर मैंने उन्हें उतनी गम्भीरता से नहीं लिया । रात को अजीब सी आवाजें सुनाई देतीं पर कल पहली बार मैंने बंगले के बन्द वाले हिस्से की खिड़की में किसी को बैठे देखा । वह एक औरत थी जिसका चेहरा बहुत डरावना था, उसके बाल लंबे व बिखरे हुए थे ।आँखें बड़ी - बड़ी और लाल दिखाई दे रही थी मानो उनमें अंगारे भरे हों । मैं वह सब देखकर बहुत डर गया था, बड़ी मुश्किल से तुझे फोन कर पाया । आगे का हाल तो तू जानता ही है ।मुझे तो बहुत अचरज हो रहा है ऐसा सुनकर क्योंकि मैंने उस बंगले के बारे में कोई बात नहीं सुनी । हो सकता है यह तुम्हारा भरम हो । उस घर को जब सुमित ने लिया तब भी उसके बारे में हमें कुछ गलत नहीं कहा किसी ने । सुमित के विदेश जाने के बाद उसकी मम्मी वहाँ अकेली बहुत वर्षों तक रही । उनके निधन के बाद कई लोग वहाँ रहे तो भी किसी ने कुछ नहीं कहा । यदि तुम्हारे मन में कोई शंका है तो तुम अब वहाँ मत जाओ । अभी यहीं हमारे साथ रहो, फिर कोई दूसरा मकान देख लेते हैं ।अरे नहीं यार ! ऐसी भी कोई बात नहीं, रहकर देखते हैं.. वैसे कोई भूत हो तो भी रह लेंगे... एक से भले दो - प्रशांत ने हँसते हुए कहा । अच्छा बच्चू , कल की हालत भूल गया क्या, अभी इतनी हिम्मत आ गई कि भूत के साथ रहने की इच्छा हो रही है । चल देख लेते हैं , यह किसी की बदमाशी भी हो सकती है, ध्यान रखना । उस घर पर बहुत लोगों की नजर थी खरीदने के लिए , पर सुमित की ढेर सारी यादें जुड़ी हैं उस घर से इसलिए वह बेचना नहीं चाहता । परदेश में आखिर कब तक रहेगा हो सकता है कभी लौट भी आये ।उस दिन के बाद प्रशांत पुनः अपनी दिनचर्या में सामान्य हो गया । पर कभी - कभी कई घटनाएं उसे चौंका देती थीं, मानो कोई उसका बहुत ध्यान रख रहा हो । प्रशांत को कई बार माँ की याद आ जाती थी और वह वीडियो कॉल करके उनसे मिलने की अपनी इच्छा पूरी कर लेता । पिताजी का स्वास्थ्य खराब होने के कारण वह उसके साथ नहीं आ सकती थी । प्रशांत सुबह कुछ नाश्ता कर ड्यूटी चला जाता और वहीं कुछ खा लेता , शाम को फल , दूध लेकर घर आता और रात का खाना स्वयं बना लेता । अकेले टी वी देखकर कितना टाईम पास करता तो इसी बहाने थोड़ा व्यस्त भी रहता , वैसे वह मम्मी का लाडला था तो किचन में चक्कर लगाता रहता । कभी - कभी मम्मी की मदद भी कर देता । यहाँ घर की सफाई व अन्य कार्यों के लिए उसे एक नौकर शिव भी मिल गया था । कई बार रात का खाना बनाते हुए उसका आधा -अधूरा छोड़ा हुआ काम उसे सुबह खत्म हुआ मिलता , उसे घर में किसी की उपस्थिति महसूस होती थी एक छाया सी ,....पर उसने प्रशांत को कभी कोई चोट नहीं पहुंचाई । कुछ दिन पहले शिव काम पर नहीं आया था तो उस दिन ऑफिस जाने में प्रशांत को देर हो गई और हड़बड़ी में वह दूध गैस पर चढ़ाकर बन्द करना भूल गया । ऑफिस में अचानक याद आने पर दौड़ा - भागा वापस आया तब तक तीन - चार घण्टे बीत चुके थे । दूध के जलने से अधिक उसे गैस के खुले रहने का डर था कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाये , पर जब वह घर पहुँचा तो उसने गैस बंद पाया मानो किसी ने बंद किया हो । एक - दो बार ऐसी कई दुर्घटनाएं होते - होते बचीं । भूत प्रेत तो नहीं पर यहाँ उसकी सहायक कोई दिव्य - शक्ति जरूर है , उसने सोचा ।उस रात की तरह खिड़की पर उस औरत की परछाई उसे कई बार दिखी पर अब उसे डर नहीं लगता था हाँ वह सच जरूर जानना चाहता था । वह परछाई अक्सर उसे रात के वक्त दिखती थी खिड़की पर कोहनी टिकाये मानो उसे किसी के आने का इंतजार हो । एक दिन शिव को सफाई करते हुए एक डायरी मिली जिसे वह प्रशांत को देकर गया । यह प्रशांत की डायरी नहीं थी पर उसे पढ़ने का मोह वह छोड़ नहीं पाया ।दिव्याभा ...हाँ यही नाम लिखा था उस पर । पढ़ना शुरू किया तो पढता ही चला गया । उसने अपनी पूरी जिंदगी उन पन्नों में उतार दी थी । एक स्त्री जीवन के विभन्न पक्षों का सजीव चित्रण था । उसके मन की गहराइयों में डूबी पीड़ा शब्दों में उभर आई थी । उन पन्नों से लगाव हो गया था प्रशांत को , इतना अधिक कि उसे न खाने की सुध रही न पीने की । वीकेंड कैसे बीता पता ही नहीं चला । वह एक प्यारी व अपने माता - पिता की चिंता करती बेटी थी तो एक आज्ञाकारी जिम्मेदार पत्नी भी । फिर बेटे के जन्म के बाद डायरी के पन्ने खाली छूट गए थे जो उसका अपने बच्चे की देखभाल की व्यस्तता बता रहा था । कुछ वर्षों के बाद पुनः डायरी लिखना प्रारंभ हुआ शायद बेटे के बड़े होने के बाद उसने फिर से लिखा हो । उसके बाद बेटे के विदेश जाने के बाद के पन्ने एक माँ के दर्द से लिखे हुए थे । कितनी करुणा थी उन शब्दों में , मानो वे स्याही से नहीं आँसुओं से लिखे गए हों । इंतजार का हर पल कितना लम्बा होता है, दिव्याभा ने हर पल अपने बेटे का इंतजार किया था, उसकी शादी, बच्चे के जन्म पर मिलने की इच्छा बड़ी शिद्दत से व्यक्त की थी । बेटा बहाने ही बनाते रहा, काम की व्यस्तता क्या मनुष्य को अपने प्रियजनों से अधिक प्रिय हो सकता है । लोग क्यों भूल जाते हैं कि सुख - सुविधाएं इंसान के लिए है पर इंसान उसके लिए अपना सब कुछ भूल जाता है । जिंदगी क्या इंतजार करती है मनुष्य के सफल होने का, वह तो अपना कार्य करती रहती है । कहाँ कितनी देर रुकना है... यह तो मनुष्य को ही तय करना रहता है।प्राथमिकता किसे देनी है यह तो उसके हाथ में है, मनुष्य अपनी मुट्ठी में वक्त को भर कर रख लेना चाहता है और कल के लिए अपनी खुशियों को स्थगित करते रहता है जो कभी आता ही नहीं । अपने बेटे और उसके परिवार का इंतजार करते एक माँ की आँखें पथरा गई, काया हड्डी के ढाँचे में बदल गई और वह उन अस्थियों के विसर्जन के लिए भी नहीं आ पाया । माँ का शरीर तो चला गया पर आत्मा यहीं रह गई ।प्रशांत की आँखों से आँसू अनवरत बह रहे थे ...तो वह एक माँ है । माँ तो माँ होती है चाहे वह सदेह हो, भूत - प्रेत हो या उसकी रूह ..वात्सल्य से भरी । प्रशांत की नजरें उस खिड़की पर लगी थी...आँसुओं के धुंधलके के पार आज वह उस माँ को देखना व नमन करना चाहता था ।
- स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबेबढ़े देश का मान, तीज- त्यौहार से सदा ।भारत की पहचान , भाँति - भाँति के पर्व से ।। 1निर्जला निराहार , तीजा पर्व मना रहीं ।खुशियाँ मिले अपार , गौरी के आशीष से ।। 2पावन यह त्यौहार, रंग भरे संसार में ।सिखलाता व्यवहार, शिक्षा दे तप त्याग की ।। 3जग में भरे उजास, शुभ दीपावली से सदा ।भरे मन में प्रकाश, उर का अँधियारा मिटा ।। 4मिले सबको रोजगार, भूखे को रोटी मिले ।हो जाये त्यौहार, घर में जब चूल्हा जले ।। 5देना यह वरदान , गौरी माता तुम मुझे ।रखना मेरा मान , सदा सुहागन मैं रहूँ ।। 6लेकर पूजन थाल , गौरी अर्चन को चली ।तृतीय तिथि हर साल , शुक्ल पक्ष यह भाद्र का ।। 7जीवन भर का साथ , अमर सुहाग मेरा रहे ।रखना सिर पर हाथ , कृपा करो माँ पार्वती ।। 8जीवन का क्या मोल , पति परमेश्वर के बिना ।रिश्ता यह अनमोल प्रेम के बंधन बंधा ।। 9कहीं मने त्यौहार , कोई उदास है कहीं ।सुखी रहे संसार , सीखें जब हम बाँटना ।। 10
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विशेष आलेख= एल.डी. मानिकपुरी, सहायक जनसंपर्क अधिकारी
आज जब पूरी दुनिया डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ रही है, भारत भी इस बदलाव की अगुवाई कर रहा है। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ राज्य भी ’’डिजिटल युग’’ में कदम से कदम मिलाते हुए अपने विकास की कहानी लिख रहा है। बीते कुछ महीनों में, छत्तीसगढ़ ने डिजिटल प्रगति और सुशासन की दिशा में जो उल्लेखनीय कदम उठाए हैं, वे न सिर्फ राज्य को विकास की ओर ले जा रहे हैं, बल्कि प्रदेश के नागरिकों के जीवन को भी सरल और सुविधाजनक बना रहे हैं। यह विकास प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की गारंटी और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के कुशल नेतृत्व का प्रमाण है।डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़छत्तीसगढ़ राज्य ने सरकार की योजनाओं और कार्यों को पारदर्शी और कुशल बनाने के लिए डिजिटल तकनीक को अपना प्रमुख साधन बनाया है। जनता की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने ’’ई-ऑफिस’’ प्रणाली लागू की है, जिसके माध्यम से सरकारी दस्तावेजों का प्रबंधन, सुरक्षा और फाइलों का निपटारा तेजी से किया जा रहा है। इस कदम से न केवल सरकारी प्रक्रिया की गति बढ़ी है, बल्कि कामकाज में पारदर्शिता भी आई है। इसी तरह मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ मुख्यमंत्री कार्यालय छत्तीसगढ़ शासन) में भी डिजिटल रूपांतरण की दिशा में कदम उठाए गए हैं। ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से नागरिकों को मुख्यमंत्री के रोजमर्रा के कार्यक्रम, राज्य की योजनाओं और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों के साथ विभिन्न जिलों की जानकारी उपलब्ध होने से आम लोगों को भी सहूलियत होगी। यह डिजिटल पहल न केवल सरकारी कार्यप्रणाली को सरल बना रही है, बल्कि नागरिकों को भी राज्य के विकास में भागीदार बना रही है।’स्वागतम’ पोर्टल: समय और सुविधा का संगमछत्तीसगढ़ सरकार ने आम नागरिकों के लिए मंत्रालय में प्रवेश को सुगम बनाने के लिए ’स्वागतम’ पोर्टल की शुरुआत की है। इस पोर्टल के माध्यम से बड़े शहर हो या सुदूर क्षेत्र के लोग ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं और उन्हें एसएमएस और ई-मेल के जरिए प्रवेश पास प्राप्त होगा। इससे समय की बचत होगी और कतारों में लगने की आवश्यकता नहीं होगी। यह पहल न केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बना रही है, बल्कि आम जनता के लिए सरकार के द्वार खोल रही है।दस महीनों में सुशासन की ओर कदममुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ ने करीब दस महीनों में ’’सुशासन’’ की एक नई परिभाषा गढ़ी है। सरकार ने विकास के साथ-साथ आम जनता का विश्वास वापस पाने में भी सफलता हासिल की है। ’मोदी की गारंटी’ को पूरा करने के लिए विष्णु सरकार ने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। इन दस महीनों में सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान दिया गया, जिससे जनता को सीधे लाभ मिल रहा है।डिजिटल छत्तीसगढ़ : भविष्य की ओर बढ़ता राज्यछत्तीसगढ़ का डिजिटल सफर न केवल राज्य को प्रगति के पथ पर ले जाएगा, बल्कि यह भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए भी राज्य को तैयार कर रहा है। डिजिटल माध्यमों का प्रभावी उपयोग जहां सरकारी प्रक्रियाओं को तेज और पारदर्शी बना रहा है, वहीं यह नागरिकों के लिए भी एक आसान और त्वरित सेवा का माध्यम बन रहा है। ’’मोदी की गारंटी’’ और ’’विष्णु के सुशासन’’ में छत्तीसगढ़ जिस तेजी से डिजिटल युग की ओर कदम बढ़ा रहा है, वह न केवल राज्य के वर्तमान को समृद्ध बना रहा है, बल्कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ को एक मॉडल राज्य के रूप में स्थापित करेगा। यह डिजिटल क्रांति प्रदेश के विकास की कहानी का नया अध्याय लिख रही है और छत्तीसगढ़ को एक नई दिशा में ले जा रही है। - - लेखिका-डॉ. दीक्षा चौबेदुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)मात शैलपुत्री सदा , करना जग-उत्थान ।मिटे आसुरी वृत्तियाँ , मूल्यों का हो गान ।।ब्रह्मचारिणी मातु को , करते कोटि प्रणाम ।योग-क्षेम गृहवास हो , सफल रहे हर काम ।।मात सिद्धिदात्री नमन , श्रद्धा कर स्वीकार ।रोग शोक संताप को , दूर करें हर बार ।।जीवन-सुख संतोष हो , उपजे मन में शांति ।द्वेष क्लेश फटकें नहीं , यश वैभव की कांति ।।शांत रूप है आठवां , करती शिव अनुराग ।मात महागौरी कृपा , रक्षित करे सुहाग ।।श्वेत वृषभ वाहन बना , गौर वर्ण है मात ।पूर्ण मनोरथ माँ करें , भक्ति शक्ति निष्णात ।।कालरात्रि माँ सुन विनय , भक्त करें मनुहार ।बुरी शक्तियों को मिटा , देना जगत सँवार ।।दूर करें संकट सभी , दुख का करें विलोप ।दीर्घ आयु जीवन मिले , निष्फल काल-प्रकोप ।।सदाशयी माता करें , कृपा जगत अविलंब ।शक्ति मिले संकट हटे , गिरे रोध के खंब ।।षष्ठी को कात्यायिनी , आतीं अपने द्वार ।कलुष रूप हर दैत्य का , कर देती संहार ।।पंचम दिन नवरात्रि का , सिद्धि प्रदात्री स्कंद ।कार्तिकेय की मात श्री, काटे भव-भय फंद ।।अष्टभुजी तेजोमयी , सूर्यप्रभा भी नाम ।कूष्मांडा देवी तुम्हें , करते कोटि प्रणाम ।।दिव्य कांति है सूर्य सम , रच डाला ब्रह्मांड ।चंड-मुंड संहारिका , भोग लगे कूष्मांड ।।मात चन्द्रघंटा करें , सभी बुराई नष्ट ।अर्द्ध चंद्र ले भाल पर , हरतीं सारे कष्ट ।।सिंह-सवारी पर चलीं , करने जग-भयमुक्त ।मूरत संबल साहसी , धी धृति बल से युक्त ।।शक्ति बनी शिव की सदा , मुख-मंडल में ज्योति ।शुचिता शुभता से भरें , पग धरतीं जिस धाम ।।अब के इस नवरात्र में , खा लें हम सौगंध ।निर्भय घूमें बेटियाँ , रक्षा करें प्रबंध ।।
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- अगली सदी की गाथा और अर्थव्यवस्था पर प्रभुत्व के लिए भारत की कुंजी
-आलेख- अनुराग सक्सेना, नीतिगत मामलों के विशेषज्ञ और ऑपएड स्तंभकार हैं।पश्चिमी देशों ने नवाचार, बौद्धिक संपदा (आईपी) और तकनीकी प्रगति पर सदियों से अपना फोकस निरंतर बनाए रखने का लाभ उठाया है। अक्सर विनिर्माण और सेवा की तुलना में सृजन को महिमामंडित करके, इन देशों ने न केवल अपने आविष्कारों का आर्थिक लाभ प्राप्त किया है, बल्कि अपनी अवधारणाओं को वैश्विक स्तर पर निर्यात भी किया है। इन उपायों से वे आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित हुए हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका ने इंटरनेट, फार्मास्यूटिकल और एयरोस्पेस जैसी विघटनकारी तकनीकों के माध्यम से उद्योग जगत को बदल दिया। इसके परिणामस्वरूप, उनके उत्पादों और सेवाओं की वैश्विक मांग पैदा हुई। इसी तरह, यूरोपीय देशों ने इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे- रेलमार्गों के आर्थिक लाभ), ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग और लक्जरी सामान जैसे क्षेत्रों में नेतृत्व किया है, जहां नवाचार और बौद्धिक संपदा (आईपी) उनके वैश्विक प्रभुत्व के मूल में हैं।इसके विपरीत, भारत और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं ने ऐतिहासिक रूप से विनिर्माण और सेवाओं पर अपने विकास को टिकाया है। यह दोनों ही क्षेत्र मूल्य-संवर्धन के परिदृश्य में निचले स्थान पर हैं। यह दृष्टिकोण, औद्योगिकीकरण और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी होने के बावजूद, नवाचार या आईपी सृजन को प्राथमिकता नहीं देता है। वास्तव में बौद्धिक संपदा आर्थिक लाभ उठाने योग्य है। यही कारण है कि ये देश उन्नत प्रौद्योगिकियों के निर्माता बनने के बजाय उपभोक्ता बन गए हैं।हालांकि, चीन ने हाल के वर्षों में इस मॉडल को तोड़ दिया है। इसने नवाचार, बौद्धिक संपदा और तकनीकी प्लेटफार्मों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। देश ने दूरसंचार, सोशल मीडिया और गेमिंग जैसे क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीकों का विकास किया है। हुआवेई, टिकटोक और टेंसेंट जैसी वैश्विक दिग्गज कंपनियां इसके उदाहरण हैं। इन प्रयासों ने चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है। इतना ही नहीं, इसे एक मजबूत वैश्विक निर्यातक के रूप में स्थापित किया है, और इसे दुनिया भर के अमूल्य डेटा तक पहुंच प्रदान की है।दूसरी ओर, भारत ने एक अलग तीव्र प्रगति का अनुसरण किया। उत्पादीकरण और प्रौद्योगिकी निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, भारत संपर्क केंद्रों, वैश्विक क्षमता केंद्रों (जीसीसी) और आईटी सेवाओं का पर्याय बन गया। इस स्थिति ने भारत को "दुनिया का बैकरूम" का नाम दिया। यह एक ऐसी भूमिका है, जिसने आर्थिक रूप से लाभकारी होने के बावजूद, नवाचार और उच्च-मूल्य प्रौद्योगिकी निर्माण के मामले में देश को पिछड़ा बना दिया। जबकि भारत ने सेवाएं प्रदान करने में उत्कृष्टता हासिल की, इसने अक्सर अन्य देशों के नवाचार और उत्पाद विकास से जुड़े प्रयासों का नेतृत्व करने के बजाय उनका समर्थन किया।हालांकि, पिछले दशक में भारत के वैश्विक रुख में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया है। भारत एक भू-राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा है और इसने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी ताकत दिखाई है। कूटनीतिक रूप से, भारत ने वैश्विक मंच पर एक अधिक मुखर स्थिति अपनाई है, अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपनी स्वायत्तता बनाए रखते हुए प्रमुख शक्तियों के साथ रणनीतिक साझेदारी भी कायम की है। भू-राजनीतिक क्षेत्र में, भारत ने अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत किया है और क्वाड जैसी पहलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, ताकि भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव का मुकाबला किया जा सके। व्यापार के मोर्चे पर, भारत ने व्यापार सौदों पर फिर से बातचीत की है और इसे खासकर कोविड-19 महामारी के कारण वैश्विक व्यवधानों के मद्देनजर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक महत्वपूर्ण हस्ती के रूप में देखा जा रहा है।यह नई मुखरता इस बात को निहित करती है कि भारत का “क्रिएट इन इंडिया” पर वर्तमान ध्यान समयोचित और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्यों है। नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देने और स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के विकास का समर्थन करके, भारत आर्थिक रूप से और सॉफ्ट पावर के मामले में, अगली सदी पर प्रभुत्व कायम करने के लिए खुद को तैयार कर रहा है। आर्थिक रूप से, सृजन पर ध्यान केंद्रित करने से भारत मूल्य श्रृंखला में ऊपर उठ सकेगा, अपनी बौद्धिक संपदा पर अधिक लाभ अर्जित कर सकेगा और विदेशी प्रौद्योगिकियों पर अपनी निर्भरता कम कर सकेगा। सॉफ्ट पावर के मामले में, मीडिया और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में अग्रणी होने से भारत को विकृत पश्चिमी कथानकों पर लगातार प्रतिक्रिया करने के बजाय अपने खुद के कथानकों को आकार देने की सुविधा मिलेगी।जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आह्वान किया, "आइए हम सब मिलकर 'क्रिएट इन इंडिया’ यानी ‘भारत में सृजन करें' आंदोलन शुरू करें।" ऐसे में हर कोई इसके दूसरे और तीसरे क्रम के प्रभावों, खासकर कथानक-सुधार और हमारे सभ्यतागत विचारों को वैश्विक स्तर पर निर्यात करने पर पड़ने वाले प्रभाव को नहीं समझ पाया। ईस्टमैन कलर और विनाइल रिकॉर्ड की "प्रौद्योगिकियों" ने अमेरिका को अपने नायकों और रॉकस्टार को आगे बढ़ाने में मदद की। एक्सआर और गेमिंग का युग भारत को अपने नायकों और रॉकस्टार को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने हाल ही में वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरटेनमेंट समिट (वेव्स) 2025 के तत्वावधान में 'क्रिएट इन इंडिया' चैलेंज की घोषणा की। यह एक अनूठा आयोजन है, जो दुनिया के सामने हमारे एवीजीसी सेक्टर के भविष्य को दर्शाता है। यह ब्रॉड स्पेक्ट्रम चैलेंज 25 प्रकार के कंटेंट और गेम में हमारी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा को प्रदर्शित करती है। भारत को ऐसे और भी दृश्यमान समारोहों की आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि दुनिया हमारी रचनात्मकता और हमारी महत्वाकांक्षा को देखे।हालांकि, इस क्षमता के द्वार को पूरी तरह से खोलने के लिए, भारत को भी भारी निवेश करना होगा। एवीजीसी सेक्टर डिजिटल इंटरैक्शन और मनोरंजन के भविष्य का प्रतिनिधित्व करता है। भविष्य के इस द्वार को खोलने के लिए कौशल-विकास, निवेश पाइपलाइन, ऐसे प्लेटफॉर्म हैं, जो मायने रखते हैं। इसके लिए एक प्रगतिशील नियामक प्रणाली के साथ-साथ और भी कई आवश्यकताएं हैं। यह वास्तव में एक कठिन काम है। लेकिन यहां गंगोत्री स्थापित करके, भारत आने वाले वर्षों के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था और कथानक में अपना नेतृत्व सुनिश्चित कर सकता है। -
सफलता की कहानी
- लक्ष्मीकांत कोसरिया, डिप्टी डायरेक्टर जनसंपर्कमुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की पहल पर वनौषधि प्रसंस्करण के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है ताकि वे आर्थिक रूप से सशक्त हो सकें। वन औषधियों के प्रसंस्करण से न केवल प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग हो रहा है, बल्कि स्थानीय महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर भी मिल रहे हैं। मुख्यमंत्री श्री साय ने इस क्षेत्र में महिलाओं की सक्रीय भूमिका को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करने का आह्वान किया है।छत्तीसगढ़ के कटघोरा वनमंडल में स्थित हरिबोल स्व सहायता समूह, डोंगानाला की 12 महिलाओं द्वारा संचालित वनौषधि प्रसंस्करण केंद्र ने अपनी मेहनत, लगन और सामूहिक प्रयासों से एक प्रेरक सफलता हासिल की है। वर्ष 2006-07 में शुरू हुई यह केंद्र यूरोपियन कमीशन परियोजना के अंतर्गत संचालित होता है। आज यह समूह अपने अनूठे प्रयासों के कारण प्रदेशभर में एक मिसाल बन चुका है।इस समूह की महिलाओं का शुरुआती जीवन बेहद संघर्षपूर्ण था। पहले वे गांव में मजदूरी करके अपनी आजीविका चलाती थी। उनकी मासिक आय मुश्किल से 500-600 रुपये होती थी। आर्थिक तंगी से जूझते हुए उनके सामने कई चुनौतियाँ थी, लेकिन एक सामूहिक संकल्प ने उनकी जिंदगी बदल दी।समूह ने वनौषधियों के प्रसंस्करण के क्षेत्र में कदम रखा और आयुर्वेदिक उत्पादों का निर्माण शुरू किया। समूह द्वारा हिंगवाष्टक चूर्ण, अश्वगंधादि चूर्ण, सीतोपलादी चूर्ण, पुष्यानुग चूर्ण, बिलवादी चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, पंचसम चूर्ण, शतावरी चूर्ण, आमलकी चूर्ण, पयोकिल दंतमंजन, हर्बल काफ़ी चूर्ण, महिला मित्र चूर्ण, हर्बल फेसपैक चूर्ण, हर्बल केशपाल चूर्ण आदि जैसी कई आयुर्वेदिक वनौषधियों का निर्माण किया जाता है। कच्ची वनौषधियों का संग्रहण, घटकों का निर्धारण और प्रसंस्करण कार्य आयुर्वेद चिकित्सक (टेक्निकल स्टाफ) के मार्गदर्शन में किया जाता है। समूह ने हाल ही में आयुष विभाग से 2 करोड़ रुपये का ऑर्डर प्राप्त किया है, जिससे समूह की गुणवत्ता का प्रमाण स्वयं सिद्ध होता है। यह न केवल उनकी उत्कृष्टता को दर्शाता है, बल्कि उनके प्रयासों की निरंतर बढ़ती विश्वसनीयता और मांग को भी साबित करता है।हरिबोल स्व सहायता समूह की महिलाओं की उद्यमिता से उत्पादित इन वनौषधियों की मांग स्थानीय और प्रदेश स्तर पर अत्यधिक है। समूह द्वारा प्रतिवर्ष औसतन लगभग 44 लाख की वनौषधियों का विक्रय किया जाता है। इसके अलावा केंद्र में नियुक्त अनुभवी वैद्य की देखरेख में स्थानीय एवं आसपास के सैकड़ों मरीजों का विभिन्न बीमारियों का इलाज भी किया जा रहा है।हरिबोल स्व सहायता समूह की कड़ी मेहनत और समर्पण का परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2007-08 में 97,204 रुपये का लाभ अर्जित किया गया। यह शुरुआत की सफलता ने महिलाओं का आत्मविश्वास और बढ़ा दिया। वर्ष 2023-24 में समूह ने 6,57,254 रुपये का शुद्ध लाभ कमाया, जिससे प्रत्येक सदस्य की वार्षिक आय लगभग पौने दो लाख रुपये तक पहुँच गई। यह आर्थिक परिवर्तन उनकी पुरानी स्थिति के मुकाबले एक विशाल उन्नति थी।इसके अतिरिक्त समूह की प्रत्येक सदस्य को प्राप्त लाभांश में से 3000 रुपये घरेलू कामों के लिए दिया जाता है, जबकि शेष राशि का उपयोग केंद्र के उन्नयन और विकास के लिए किया जाता है। इस प्रकार समूह न केवल व्यक्तिगत आय में वृद्धि कर रहा है, बल्कि स्थिर और दीर्घकालिक विकास की दिशा में भी अग्रसर है।हरिबोल स्व सहायता समूह ने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारा है, बल्कि समाज में अपनी पहचान भी मजबूत की है। महिलाएँ अब आत्मनिर्भर हैं और अपने परिवारों को बेहतर जीवन प्रदान कर रही हैं। उनके आत्मविश्वास में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, और वे अपनी उद्यमशीलता से दूसरों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।समूह की अध्यक्ष श्रीमती सरोज पटेल ने इस सफलता के बारे में कहा, राज्य वन विभाग के सहयोग से हमारा जीवन स्तर बहुत सुधर गया है। आज हम आत्मनिर्भर हैं और समाज में सम्मानित स्थान पा चुके हैं।इस परियोजना की सफलता में छत्तीसगढ़ वन विभाग ने अहम भूमिका निभाई है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख श्री व्ही. श्रीनिवास राव ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं वन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में वन औषधियों के संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन में स्व सहायता समूहों को शामिल करके आय सृजन के प्रति राज्य वन विभाग प्रतिबद्ध है। इस पहल से न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया गया है, बल्कि राज्य की वन संपदा का भी सही उपयोग हो रहा है।हरिबोल स्व सहायता समूह को न केवल स्थानीय स्तर पर सराहा गया है, बल्कि इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला है। सिंगापुर में इसे प्रतिष्ठित ग्रिट पुरस्कार से सम्मानित किया गया और भारत सरकार के ट्राइफेड और छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा बेस्ट फॉरेस्ट प्रोड्यूस पुरस्कार से नवाजा गया है। डोंगानाला का यह वनौषधि प्रसंस्करण केंद्र न केवल हरिबोल स्व सहायता समूह की महिलाओं के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बन गया है। इस पहल ने यह साबित किया है कि सही दिशा और संकल्प के साथ किए गए प्रयास बड़े से बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। आज यह समूह अन्य स्व सहायता समूहों और ग्रामीण समुदायों के लिए एक आदर्श उदाहरण है कि सामूहिकता, मेहनत और दृढ़ निश्चय से सपने पूरे किए जा सकते है। -
विशेष लेख- डॉ. दानेश्वरी संभाकर
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की सरकार वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण की प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। वरिष्ठ नागरिकों के सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा में सरकार ने कई हितकारी फैसले लिए हैं, जिनमें उनके भरण-पोषण, रहवास के लिए वृद्धाश्रमों की व्यवस्था, उनके लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था, संपत्ति के संरक्षण समेत कई अहम कार्य शामिल हैं। प्रदेश में माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों को भरण पोषण एवं कल्याण अधिनियम प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है।वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं के निराकरण के लिए अनुविभागीय अधिकारी की अध्यक्षता में सभी अनुविभागों में भरण पोषण अधिकरण का गठन किया गया है, अधिकरण से जुड़े अपीलीय नियमों में जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में जिला स्तरों पर भी अधिकरण का गठन हुआ है। वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं के निराकरण एवं भरण पोषण का लाभ दिलाने के लिए आवेदन की आसान व्यवस्था भी प्रभावी है। 60 वर्ष या इससे अधिक आयु के वृद्धजनों को निःशुल्क भोजन, आश्रय, देखभाल, मनोरंजनात्मक सुविधाएं आदि उपलब्ध कराने लिए राज्य के 26 जिलों में 35 वृद्धाश्रम भी चलाए जा रहे हैं जिसका लाभ लगभग एक हजार वरिष्ठ नागरिकों को हो रहा है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार पूरी संवेदनशीलता से वरिष्ठ नागरिकों का ध्यान रख रही है। 60 वर्ष या इससे अधिक के ऐसे वरिष्ठ नागरिक जो बढ़ती उम्र के कारण गंभीर बीमारियों के कारण बिस्तर पर रहने को मजबूर हैं, उनकी समुचित देखरेख, उन्हे स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रशामक देखरेख गृह संचालन की योजना भी शुरू की गई है। इनके अंतर्गत 6 जिलों रायपुर, दुर्ग, कबीरधाम, रायगढ़, बालोद एवं बेमेतरा में देखरेख गृह का संचालन किया जा रहा है, जहां वरिष्ठ नागरिकों का सम्पूर्ण ध्यान रखा जा रहा है।छत्तीसगढ़ सरकार वरिष्ठ नागरिकों की आस्था को पूरा सम्मान प्रदान करने की प्रतिबद्धता के साथ उनके लिए तीर्थ स्थलों की यात्रा की योजना भी चला रही है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले वरिष्ठ नागरिकों की वृद्धावस्था में होने वाली समस्या को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार न केवल उनकी देखभाल कर रही बल्कि उन्हें उचित स्वास्थ्य लाभ भी दिला रही है। वरिष्ठ नागरिक सहायक उपकरण प्रदाय योजना के अंतर्गत व्हीलचेयर, श्रवणयंत्र, चश्मा, छड़ी आदि उपकरण प्रदान किए जा रहे है। इस योजना से राज्य के 50 हजार से ज्यादा वरिष्ठ नागरिकों को लाभान्वित किया गया है।छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले वरिष्ठ नागरिकों को पेंशन राशि दी जाती है। वर्तमान में 14 लाख से अधिक वरिष्ठ नागरिकों को पेंशन योजना से लाभान्वित किया जा रहा है।इसी तरह वरिष्ठ नागरिकों के सुरक्षा, संरक्षण एवं सम्मान के प्रति समाज में सकारात्मक और जागरूक वातावरण बनाने के लिए हर वर्ष विकासखण्ड स्तर से राज्य स्तर तक 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस का आयोजन किया जाता है। वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं के त्वरित निराकरण, सहायता और मार्गदर्शन के लिए समाज कल्याण संचालनालय में हेल्पलाईन 155-326 एवं टोल फ्री नं. 1800-233-8989 का संचालन किया जा रहा है, जिसका लाभ प्रदेशभर के वरिष्ठ नागरिकों को मिल रहा है। इस तरह छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ नागरिकों के सुरक्षा, सम्मान, स्वास्थ्य और कल्याण को लेकर सतत कार्य किया जा रहा है। -
-कहानी
- लेखिका-डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
आज दीदी के फोन ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था ..ऐसी कौन सी बात हो गई कि दीदी मुझे फोन पर
बताना नहीं चाह रही हैं बल्कि घर आने को कह रही हैं ।
वह परेशान तो लग रही थीं ...हम दोनों बहनों में कोई दो वर्षों का ही अंतर होगा पर हम सहेली की तरह ही रहते थे । साथ सोना , उठना , पढ़ना , कहीं जाना हो तो
साथ - साथ । नहीं जाना है तो दोनों ही नहीं जाते , कई
बार किसी विवाह आयोजन में भेजने के लिए माँ हमें
बहुत मनातीं ।जिम्मेदारियों के बोझ तले लड़कपन कहाँ छुप जाता है पता ही नहीं चलता । शादी के बाद दीदी का व्यक्तित्व पूरा ही बदल गया , पहले की चंचल , हंसोड़ दीदी का स्थान धीर , गम्भीर ,समझदार रमा ने
ले लिया था । इसकी जिम्मेदार वह नहीं , जीवन के वे
उतार - चढ़ाव हैं जिन्होंने उन्हें बदल दिया ।
उनका कोई भी कार्य सरलतापूर्वक पूर्ण नहीं हुआ। बचपन में बार - बार बीमार पड़ती रही ...जीवन
से काफी संघर्ष किया । पीएच. डी. करते - करते अपने
निर्देशक से कुछ कहासुनी हो गई और उन्होंने दीदी की
रिसर्च पूरी होने में न जाने कितनी बाधाएं खड़ी कर दी..
पर ये दीदी की जीवटता ही थी कि उन्होंने काम पूरा
करके ही दम लिया ,उनकी जगह कोई और होता तो वह
काम पूरा ही नहीं कर पाता । बाधा - दौड़ के खिलाड़ी
के लिए बाधाओं से भरी हुई राह भी आसान हो जाती
है वैसी ही दीदी के लिये कठिनाइयों का सामना करना
आसान हो गया था ।कॉलेज में व्याख्याता हो जाने के बाद उनके विवाह में उतनी अड़चन नहीं आई क्योंकि
उनके ही कॉलेज के सहायक प्राध्यापक अनिरुद्ध त्रिपाठी ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था जिसे दीदी के साथ माँ - पिताजी ने भी सहर्ष स्वीकार
कर लिया था । अपनी बेटी नजर के सामने रहे , माता -
पिता को और क्या चाहिये । दीदी भी बहुत खुश थीं
क्योंकि लड़कियों के विवाह के बाद सबसे बड़ी समस्या
नौकरी बरकरार रखने की आती है ...पति कहीं बाहर हो तो नौकरी छोड़ो या नौकरी करनी हो तो पति से दूर
रहो । खुशियाँ उनके आँगन की रौनक बन गई थी पर
हमारे आँगन में सूनापन छा गया था । हम दोनों बहनें
माता - पिता के जीवन का आधार थीं , दीदी जब भी घर
आतीं तो ऐसा लगता मानो मरुस्थल में फूल खिल गये हों ...मैं तो पल भर के लिए भी उन्हें नही छोड़ती थी ।
दो वर्षों के बाद दीदी एक प्यारे से बेटे की माँ
बन गई थी ....पर कुछ समस्या होने के कारण उन्हें महीनों बेड रेस्ट करना पड़ा ...मातृत्व के दायित्व ने
दीदी को बहुत गम्भीर बना दिया था । बेटे के बड़े होने
के बाद एक दिन दीदी और जीजाजी रोज की तरह कॉलेज जा रहे थे कि उनकी मोटरसाइकिल एक बैलगाड़ी से टकरा गई.... मेरी गाड़ी मेरे इशारों पर चलती है कह कर अपनी ड्राइविंग पर नाज करने वाले
जीजाजी उसी के कारण इस दुनिया से चले गये ।दुर्घटना में उन्हें बहुत चोटें आई थी... लगभग दस दिन
आई. सी. यू. में जीवन से संघर्ष करते हुए आखिर उन्होंने हार मान ली । दीदी को इस सदमे ने आहत कर
दिया ....अभी उनका बेटा नीरज एक वर्ष का भी नहीं
हुआ था , जीजाजी कितनी बड़ी जिम्मेदारी के साथ उन्हें अकेला छोड़ गये थे । दुःखो के महासागर में डूब
गई थी दीदी.... हमें समझ नहीं आ रहा था कि किस तरह उन्हें दिलासा दिया जाये ....उनके दर्द को बाँटना
किसी के लिए सम्भव न था ...घर के हर कोने में जीजाजी की यादें समायी हुई थी... उन दोनों के देखे
हुए सपने फूलों की खुशबू की तरह कमरों में बिखरे पड़े
थे ...माँ - पिताजी को लगा कि यदि दीदी हमारे साथ रहने लगे तो शायद बीते दिनों की बातों को वह भुला
सकें लेकिन वह तो उन्हें भुलाना ही नहीं चाहती थीं बल्कि उन्हें ही अपनी पूंजी मानकर उन्हीं के सहारे जीना चाहती थीं ।कम से कम नीरज तो था उनके पास
जिसकी परवरिश की जिम्मेदारी में वह व्यस्त हो सकीं।
वक्त गुजरने के साथ दीदी और गम्भीर और खामोश
होती गईं... माँ - पिताजी वृद्ध हो चले थे , उन्हें दीदी के
एकाकी जीवन की चिंता थी किन्तु उनकी गहरी खामोशी देखकर किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उनसे
पुनर्विवाह की बात करते । एक बार चाची जी ने उनके सामने विवाह की बात छेड़कर अपनी आफत ही
बुला ली...दीदी बहुत क्रोधित हुईं ...खूब चिल्लाई उन पर...फिर फूट - फूट कर रो पड़ी ...फिर किसी ने यह
राग नहीं छेड़ा । उन्होंने नीरज के पालन - पोषण को
ही अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लिया । इसी
बीच मेरी भी शादी हो गई और मै अपनी घर - गृहस्थी
में रम गई ।
कालचक्र चलता रहा.. वह कहाँ रुकता है किसी
के लिए चाहे कोई उससे सन्तुष्ट हो या न हो । पर यह अपना कर्म करते रहने के लिए व्यक्ति को प्रेरित करता रहता है... परिस्थिति अपने अनुकूल हो या प्रतिकूल उसे तो चलते ही रहना है । यह तो अच्छा है कि जिम्मेदारियां मनुष्य को व्यस्त रखती हैं वरना हम अपने दुखों के बारे में सोचते ही रहते और जी नहीं पाते।
कुछ वर्षों बाद माँ बीमारी के कारण हमें छोड़कर चली
गई ...उनके जाने के बाद पिताजी अकेलेपन का दंश
झेलते रहे , पर दीदी के साथ बने रहे । दीदी ने बहुत ही
धैर्य के साथ नीरज को पाला ...कितना संघर्ष कर रही
थी वे अपने - आप से..किन तकलीफों से गुजर रही थीं,
उनसे मैं अनजान नहीं थी । पिताजी के भी चले जाने के
बाद वह बिल्कुल अकेली रह गई , पर मैं क्या करती जैसे विभिन्न ग्रहों की एक निश्चित धुरी , परिधि और
भ्रमण का पथ होता है उसी तरह पत्नी और माँ बनने
के बाद प्रत्येक स्त्री को एक निश्चित केंद्रबिंदु , पथ और
परिधि ( सीमायें ) मिल जाती हैं जिसमें उसे बंध जाना
होता है । सम्बन्धों का यह आकर्षण गुरुत्वाकर्षण बल
से क्या कम होगा ? मैं भी इस बन्धन में बंधकर उनके
लिए समय नहीं निकाल पाई ।
अब तो नीरज इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा है..... दीदी की परेशानी का क्या कारण होगा ...तभी
अचानक दरवाजे की घण्टी बजी और मैं अतीत की
यादों से बाहर आई । मेरे पति ही थे...उनसे दीदी के
फोन के बारे में बात कर मैं जाने की तैयारी करने लगी।
सफर के दौरान भी अनेक विचार मन को उद्वेलित करते रहे....कहीं नीरज को तो कुछ नहीं हो
गया...क्या दीदी की तबीयत खराब हो गई इत्यादि
अनेक सम्भावनाओ से जूझती मैं दीदी के घर पहुँची।
वह घर पर अकेली थी....नीरज कहीं बाहर था । बालों
की सफेदी और चेहरे पर अवसाद की लकीरें उन्हें उम्र
से अधिक कमजोर दिखा रही थी...दुःखों और संघर्षों
ने वैसे भी उनकी सहजता और सरलता को समय से
पहले ही गम्भीरता और परिपक्वता की चादर से ढक
दिया था ।
मेरी कुशलक्षेम पूछने के बाद दीदी ने कहा - " प्रिया , तुम सफर के कारण थक गई होगी... थोड़ा
आराम कर लो , फिर बातें करेंगे ।" किन्तु मेरे मन में तो
अनेक आशंकाएं बादलों की तरह उमड़ - घुमड़ रही थीं
इसलिये उनकी बात अनसुनी कर उन्हें सवालिया निगाहों से एकटक देखने लगी । मुझे अपनी ओर देखती
पाकर पहले तो उनकी आंखे नम हो आईं और अंततः
बरस पड़ीं ...शायद उनके सब्र का बाँध टूट गया था जिसे उन्होंने बहुत प्रयास करके रोक रखा था । मैंने
उन्हें रोने दिया.... बहुत दिनों से उन्होंने सारे दुःख , व्यथा अपने एकाकी मन के प्राँगण में जमा कर रखा
था , आज वे आँसुओ से धुल जाएं तो शायद वे हल्कापन महसूस कर सकें ।
कुछ संयत होने के बाद उन्होंने अपने मन की
सारी बातें मुझसे कह दी ...बात नीरज की ही थी ...
पितृहीन होने के कारण मिले अधिक लाड़ - प्यार और
कुछ संगति के असर ने उसे उद्दण्ड बना दिया था । देर
रात तक बाहर घूमना , समय - बेसमय पैसों की माँग
और माँ से बहस करना उसके लिए आम बात हो गई
थी । दीदी बोलते - बोलते रोने लगी थी....प्रिया... मैंने
जीवन में बहुत कुछ सहा , जमाने भर की बातें , ताने
सुनती रही लेकिन कभी हार नहीं मानी ...बस अपने
रास्ते चलती रही लेकिन अब मुझमें हिम्मत नहीं रही...
इतनी भी नहीं कि अपनों की बातें सुन सकूँ । मैंने
हमेशा यही चाहा कि वह पढ़ - लिखकर अपने पैरों पर
खड़ा हो जाये ,उसका भविष्य सुरक्षित हो...अपनी तरफ से पूरी कोशिश की....उसे कोई अभाव महसूस न
हो...लेकिन पता नहीं कहाँ कमी रह गई...आज वह
मुझसे पूछता है कि मैंने उसके लिए क्या किया ....न जाने किन लोगों की सोहबत में पड़कर मुझे, अपनी
पढ़ाई , अपने जीवन का उद्देश्य भूल गया है... डरती हूँ कहीं गलत रास्ते में चला गया तो उसे हमेशा के लिए खो न बैठूँ । ऐसा क्या करूँ कि वह सुधर जाये .. अपने भविष्य को गम्भीरता से ले ...।
दीदी की बातें सुनकर मेरी आँखे भर आईं और मन दुःखी हो गया लेकिन उससे भी अधिक गुस्सा आया उस नीरज पर ...जिसे पाकर दीदी अपने सारे दुःख - दर्द भूल गई थी....जिसके लिये उन्होंने अपने जीवन के दूसरे विकल्पों के बारे में सोचा तक नहीं उसने माँ के प्रति अपना दायित्व तो समझा नहीं उल्टे उसके दर्द का बोझ बढ़ा दिया ।
मैंने नीरज से बात करने का फैसला कर लिया था
इसलिए देर रात तक उसके लौटने का इंतजार करती रही । वह काफी देर से घर आया और आते ही अपने
कमरे में जाने लगा । मैंने ही उसे आवाज लगाई - सुनो नीरज ! " अरे मौसी , आप ....आप कब आई । वह मुझे देखकर चौक गया..
आज दोपहर में आई , " नीरज मैं दीदी को अपने साथ ले जाने आई हूँ ..बिना कोई भूमिका बाँधे मैंने अपनी बात कह दी थी । "
क्यो ? अचानक उसके मुँह से फूट पड़ा था...ओ दो - चार दि...नों के लिए घूमने जाना चाहती हैं... इट्स ओके. उसने कंधे उचकाते हुए कहा था ।
दो - चार दिन के लिए नहीं बेटे....अब मैं उन्हें हमेशा के लिए अपने साथ ले जाना चाहती हूँ...तुम तो
अब बड़े और काफी समझदार हो गए हो...अपने पैरों पर खड़े होने वाले हो ...अब तुम्हें उनकी क्या जरूरत है ? " यह आप क्या कह रही हैं मौसी ? "
मैं ठीक कह रही हूँ नीरज...जिस माँ ने तुम्हें जन्म
दिया ...अपनी ममता और प्यार से सींचकर तुम्हें बड़ा किया ...तुम्हारे अलावा कुछ भी नहीं सोचा... तुम्हें उन्होंने अपने जीने का मकसद बना लिया....उनसे तुम
पूछते हो कि तुमने मेरे लिए क्या किया । उन्होंने अपने जीवन में बहुत तकलीफ पाई है नीरज....मैं सोचती थी कि तुम इस बात को महसूस करोगे और उन्हें हमेशा खुश रखने का प्रयास करोगे....क्योंकि दुनिया के बाकी
लोग उनका दर्द महसूस नहीं कर सकते लेकिन तुम उनके हर दर्द में साझेदार रहे हो... पेड़ में लिपटी लता की तरह तुमने उनके मन के हर पहलू को देखा है,
जाना है...जीजाजी के जाने के बाद आने वाले सुख - दुख के सिर्फ तुम दोनों साझेदार रहे हो ...पर कब से तुमने उन्हें अपना दुश्मन मान लिया नीरज...तुम तो उनका साया हो...तुमने अपने आपको उनसे अलग कैसे मान लिया ।
तुम जिन दोस्तों से अपनी तुलना करते हो वे ममता का मोल क्या जानेंगे जिन्होंने अपनी माँ के हाथों एक निवाला भी नहीं खाया । उनके माँ - बाप ने सिर्फ सुविधाएं देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली...उनके साथ रहकर तुम यह भूल गए कि तुम्हें दीदी ने माँ और पिता दोनों बनकर पाला है ....न जाने कितने
जतन करती रही कि तुम्हे किसी बात की कमी न रहे , कितनी मुश्किलें आई पर कभी खुद से तुम्हें जुदा नहीं किया । सिर्फ तुम्हारी खुशी के लिये जीती आई है वो...
अब समय आया है कि तुम्हारी तरक्की और खुशहाली देखकर वह भी खुश होती....माली को अपने लगाये हुए पौधे की छाया मिले न मिले पर वह उसके फलने - फूलने की ही कामना करता है...उसी प्रकार तुम्हारी माँ
सिर्फ तुम्हारी खुशी देखकर ही जी लेगी , बस तुम सही राह पर चलो और खुश रहो , उसे और कुछ नहीं चाहिये । मैं इससे आगे कुछ न कह पाई और अपने कमरे में चली गई ।
दूसरे दिन सोकर उठी तो सूरज की किरणें पूरे घर में
उजाला फैला चुकी थीं.. नीरज दीदी की गोद में लेट कर हमेशा की तरह अपनी माँ से लाड़ जता रहा था...शायद
माँ - बेटे के बीच के गिले - शिकवे दूर हो गए थे । पश्चाताप के आंसुओं ने दिलों में जमी गर्द धो डाली थी... नीरज को कर्तव्यबोध हो गया था.. रिश्तों की मजबूती के लिए यह जरूरी था... मैंने आगे बढ़कर नीरज को गले लगा लिया था और दीदी की ओर देखकर राहत की सांस ली...अब इस पेड़ को कोई तूफान नहीं गिरा सकता क्योंकि उसने मिट्टी में जड़ें जमा ली हैं... दीदी के चेहरे पर मुस्कुराहट और पलकों
में खुशियों की बूंदें झिलमिला उठी थीं । -
भारत रत्न लता मंगेशकर के जन्मदिन पर
विशेष आलेख- प्रशांत शर्मा
भारत रत्न और सुरों की मलिका लता मंगेशकर यानी सबकी प्यारी लता दीदी की आज जयंती है। 28 सितंबर, 1929 को उनका जन्म मराठी ब्राम्हण परिवार में, मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में सबसे बड़ी बेटी के रूप में पंडित दीनानाथ मंगेशकर के मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। लता दीदी ने गायकी में जो ऊंचाइयां हासिल की हैं, वहां आज तक कोई पहुंच नहीं पाया है और शायद ही कोई वहीं तक पहुंच पाएगा। लता दीदी हैं ही ऐसी कि उनकी तुलना करना नामुमकिन है।
आज उनके जन्मदिन पर उनके गाये कुछ गानों का हम यहां जिक्र कर रहे हैं, जो लताजी के भी पसंदीदा थे।
1. नैनों में बदरा छाए (फिल्म -मेरा साया- 1966)
2. ए मेरे वतन के लोगों (फिल्म हकीकत-1964)
3.सत्यम शिवम सुंदरम ( सत्यम शिवम सुंदरम-1978)
4. कुछ दिन ने कहा (अनुपमा-1966)
5. लग जा गले (वो कौन थी-1964)
6. रहे न रहे हम (ममता-1966)
7. आएगा आएगा आने वाला (महल- 1949)
8. प्यार किया तो डरना क्या (मुगल ए आजम- 1960)
9. जरा की आहट (हकीकत- 1964)
10. ए दिले नादान (रजिया सुल्तान-1983)
11. अजीब दास्तां है ये (दिल अपना और प्रीत पराई-1960)
12. वो भूली दास्तां (संजोग-1961)
13. तेरे बिना जिंदगी से (आंधी-1975)
14. दिखाई दिए यूं (बाजार- 1982)
15. क्या जानूं सजन (बहारों के सपने - 1967)
इन सब के अलावा मुझे लताजी की गाया एक भजन काफी पसंद है और वो है अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम ....। यह गीत फिल्म हम दोनों का है और इस गाने का फिल्मांकन अभिनेत्री नंदा और लीला चिटनीस पर हुआ है। फिल्म में नंदा, साधना और देवानंद मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म में देवसाहब की दोहरी भूमिका थी। फिल्म के हर गाने लोकप्रिय हुए थे। लेकिन इसका भजन अल्लाह तेरो नाम, आज भी फिल्मी भजनों के श्रृंखला में हिट माना जाता है। इसे लिखा साहिर लुधियानवी ने। फिल्म हम दोनों 1961 की फिल्म थी जिसका निर्माण किया था देव आनंद ने अपने नवकेतन के बैनर तले। फि़ल्म का निर्देशन किया अमरजीत ने। निर्मल सरकार की कहानी पर इस फि़ल्म के संवाद और पटकथा को साकार किया विजय आनंद ने। देव आनंद, नंदा और साधना अभिनीत इस फि़ल्म में संगीत दिया था जयदेव का। इस फि़ल्म में लता जी के गाए दो भजन ऐसे हैं कि जो फि़ल्मी भजनों में बहुत ही ऊंचा मुक़ाम रखते हैं। अल्लाह तेरो नाम के अलावा दूसरा भजन है-प्रभु तेरो नाम जो ध्याये फल पाए। दोनों ही भजनों को सुनकर लगता है कि जैसे लता जी ने उन्हें अंतर्आत्मा से गाया है। अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम भजन में धर्मनिरपेक्षता साफ झलकती है। यह भजन राग गौड़ सारंग पर आधारित है। शांत रस इसका भाव ही है। जाहिर है कि इसे सुनने के बाद मन शांत हो जाता है यदि आप इसे दिल से सुने तब। शांत रस मन का वह भाव है, वह स्थिति है जिसमें है सुकून है चैन है। इसलिए यह रस तभी जागृत हो सकता है जब हम ध्यान और साधना से इसे जागृत करें। 1962 के चीनी आक्रमण के समय दिल्ली में आयोजित सिने कलाकारों के एक समारोह की शुरुआत लताजी ने इसी भजन से की थी। इस भजन की रिकॉर्डिंग के समय की अपनी एक कहानी है। संगीतकार जयदेव, संगीतकार सचिनदेव बर्मन के सहायक हुआ करते थे। हम दोनों फिल्म में उन्होंने अकेले ही संगीत संयोजन का जिम्मा लिया। उस समय लता और बर्मन साहब के बीच कुछ कहासुनी हो गई थी और उनके संबंध अच्छे नहीं चल रहे थे। ऐसे में जयदेव इस बात को लेकर असमंजस में थे कि वे लता जी को अपनी फिल्म में लें या न लें । दरअसल न चाहते हुए भी जयदेव इस विवाद का हिस्सा बन गए थे। लता के बिना इस भजन में भला कैसे प्राण फूंका जा सकता था। फिर उनके मन में कर्नाटक संगीत की सुपरस्टार एम. एस. सुब्बूलक्ष्मी से यह भजन गवाने की बात उठी, लेकिन बाद में जयदेव ने मन को कड़ा किया और निश्चय किया कि वे लता से ही ये भजन गवाएंगे। सुलह कराने के लिए जयदेव ने रशीद खान को लता के पास भेजा और अपना संदेश भिजवाया। जाहिर है कि लता ने साफ इंकार कर दिया। ऐसे में देवआनंद सामने आए और उन्होंने लता से कहा कि यदि वे फिल्म का हिस्सा नहीं बनेंगी, तो वे जयदेव को ही हटाकर किसी और को संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी सौंप देंगे। यह सुनकर लताजी के समक्ष असमंजस की स्थिति निर्मित हो गई। लता जी यह भी जानती थीं कि जयदेव ने फिल्म में कमाल की कम्पोजिशन की है।
आखिरकार वे मानीं और स्टुडियो रिकॉडिंग के लिए पहुंच गईं। आखिरकार एक लंबे संघर्ष के बाद दोनों भजन रिकॉर्ड किए गए और यह संघर्ष नाकामयाब नहीं रहा। दोनों ही भजन हिट हो गए। जयदेव ने फिल्म में आशा जी से अभी न जाओ छोड़कर, जैसा गीत गवाया। जाने-माने शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने एक बार कहा था कि इस भजन को जब उन्होंने सुना तो उनकी आंखों में आंसू आ गए और अभिभूत होकर वे आधी नींद से जाग गए। लता ने भी 1967 में घोषित अपने दस सर्वश्रेष्ठ गीतों में तो इसे शामिल किया था। लता जी की आवाज में और भी कई भजन हैं, जिनमें 1952 की फिल्म नौ बहार के गाने ए री मैं तो प्रेम दीवानी प्रमुख है। इस गाने को नलिनी जयवंत पर फिल्माया गया था। साथ में अशोक कुमार भी थे। इस गाने का संगीत दिया था संगीतकार रोशन ने। गाने के बोल लिखे थे सत्येन्द्र अत्थैया ने। यह गाना राग तोड़ी पर आधारित है। फिल्म हम दोनों की बात करें, तो इसके सभी गाने लोकप्रिय हुए थे.... जैसे कि अभी न जाओ छोड़कर, मैं जिदंगी का साथ निभाता चला गया...।
- आलेख - लक्ष्मीकांत कोसरिया, उप संचालक, जनसंपर्कमुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के मार्गदर्शन में राज्य सरकार द्वारा मानव हाथी द्वंद को रोकने लगातार जन जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। सरगुजा से ‘‘हमर हाथी हमर गोठ’’ रेडियो कार्यक्रम का प्रसारण कर हाथियों के विचरण की जानकारी स्थानीय लोगों को दी जा रही है। मुख्यमंत्री श्री साय के निर्देश पर राज्य सरकार द्वारा स्थानीयजनों को अपनी ओर हाथियों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बनाने गज यात्रा अभियान चलाई जा रही है। साथ ही ‘‘गज संकेत एवं सजग एप’’ के माध्यम से भी हाथी विचरण की जानकारी दी जा रही है।तमोर पिंगला अभयारण्य की विस्तृत सीमाओं के पास स्थित घुई वन रेंज के रामकोला हाथी राहत और पुनर्वास केंद्र वन्यजीव संरक्षण और प्रबंधन के लिए छत्तीसगढ़ वन विभाग की प्रतिबद्धता का उदाहरण है। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए), नई दिल्ली से सैद्धांतिक मंजूरी के साथ 2018 में यह केन्द्र आधिकारिक तौर पर स्थापित किया गया। यह 4.8 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है जो हाथियों की विशेष देखभाल और प्रबंधन के लिए समर्पित है। यह छत्तीसगढ़ का एकमात्र हाथी राहत और पुनर्वास केंद्र है, जो सीजेडए के दिशा-निर्देशों के तहत संचालित होता है।उल्लेखनीय है कि राज्य में हाथी के संवर्धन के लिए यहां के वन अनुकूल है। राज्य का 44 प्रतिशत क्षेत्र वनों से आच्छदित है, जिसमें हाथियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए वातावरण उपयुक्त है। यहां के अनुकूल वातावरण के कारण हाथियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। राज्य में वनों के संवर्धन के लिए ‘‘एक पेड़ मां के नाम’’ अभियान के तहत वृक्षारोपण किया जा रहा है तथा विभाग द्वारा 3 करोड़ 80 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया था। महतारी वंदन योजना के तहत लाभान्वित महिलाओं को भी इस अभियान से जोड़ा गया है।हाथी रिजर्व सरगुजा के प्रबंधन के तहत इस केन्द्र में नौ हाथियों का एक संपन्न समुदाय है, जिसमें तीन उत्साही शावक भी शामिल हैं। वर्ष 2018 के प्रारंभ में, मानव-हाथी संघर्ष व्यवहार को देखते हुए महासमुंद वन प्रभाग के पासीद रेंज में एक अस्थायी शिविर में कर्नाटक से पांच कुमकी हाथियों को लाया गया था। एक साल बाद, इन हाथियों को रामकोला स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ उन्हें विशेष देखभाल हाथी रिजर्व सरगुजा के उप निदेशक श्री व्ही. श्रीनिवास राव के मार्ग दर्शन में सहायक पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ अजीत पांडे द्वारा की जाती है। कर्नाटक के दुबारे हाथी शिविर में प्रशिक्षित कुशल महावत यह सुनिश्चित करते हैं कि हाथियों को उचित देखभाल मिले।श्री राव ने केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका पर कहा कि जंगली हाथियों द्वारा उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए वन विभाग द्वारा इस द्वंद को कम करने पूरी लगन से कार्य किया जा रहा है। हाथी राहत एवं पुनर्वास केंद्र इन प्रयासों का केंद्र है, जो विशेष रणनीतियों को नियोजित करता है और स्थानीय समुदायों और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व को बढ़ावा देता है।” इस केंद्र में हाथियों में प्रमुख हैं कुमकी नर तीर्थराम, दुर्याेधन और परशुराम, साथ ही मादा गंगा और योगलक्ष्मी, जिन्होंने हाल ही में क्रमशः एक नर और मादा बच्चे को जन्म दिया है। इसके अतिरिक्त यह केंद्र जशपुर वन प्रभाग से बचाए गए मादा बच्चे जगदंबा की देखभाल भी करता है, जिसे वन विभाग द्वारा उसके झुंड के साथ फिर से मिलाने के असफल प्रयासों के लिए जाना जाता है।वर्ष 2018 में अपनी स्थापना के बाद से यह हाथी राहत और पुनर्वास केन्द्र राज्य में बाघों, तेंदुओं और जंगली हाथियों सहित वन्यजीवों के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। केन्द्र के प्रशिक्षित कुमकी हाथी मानव-वन्यजीवन संघर्षों को कम करने और वन्यजीवों की आवाजाही को निदेर्शित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे स्थानीय समुदायों के लिए हताहत होने और वित्तीय नुकसान में काफी कमी आयी है। उनके प्रयासों में आक्रामक जंगली हाथियों को जंगल में वापस खदेड़ना और वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से उनके रेडियो-कॉलर लगाने में सहायता करना शामिल है, जिससे वन्यजीव आबादी स्थिर होती है और संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा मिलता है।इन कुमकी हाथियों के प्रभाव को कई उल्लेखनीय बचाव अभियानों द्वारा चिह्नित किया जा चुका है। कोरबा वन प्रभाग से गणेश और प्रथम जैसे जंगली हाथियों के साथ-साथ सरगुजा वन मंडल से प्यारे, महान, मैत्री, कर्मा, मोहनी, गौतमी और बेहरादेव जैसे अन्य हाथियों को इन प्रयासों के माध्यम से प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया गया है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने मनेंद्रगढ़ वन प्रभाग के जनकपुर रेंज से एक तेंदुए और सूरजपुर वन प्रभाग के ओढगी रेंज से एक गंभीर रूप से घायल बाघिन को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बचाव के बाद, बाघिन को चिकित्सा उपचार के लिए रायपुर में जंगल सफारी और उसके बाद पुनर्वास के लिए अचानकमार टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित कर दिया गया। बाघिन अब स्वस्थ है और अच्छी तरह से अनुकूलित हो गई है। ये ऑपरेशन पेशेवर देखभाल और ध्यान के साथ जटिल वन्यजीव आपात स्थितियों के प्रबंधन में केंद्र की विशेषज्ञता को उजागर करते हैं।केंद्र में चिकित्सा देखभाल और आवास प्रबंधन उच्चतम पशु चिकित्सा मानकों का पालन करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि हाथियों के साथ कभी भी कोई दुर्व्यवहार न किया जाए। सभी हाथियों को नियमित टीकाकरण, परजीवी-रोधी उपचार मिलते हैं, और उन्हें एक स्थिर, रोग-मुक्त वातावरण प्रदान करने के लिए अनुरूप पोषण योजनाएं दी जाती हैं। महावतों, चारा काटने वालों और पशु चिकित्सकों द्वारा नियमित देखभाल, साथ ही दैनिक जंगल की सैर, यह सुनिश्चित करती है कि हाथी स्वस्थ और प्राकृतिक व्यवहार बनाए रखें तथा हर कदम पर उनकी भलाई को प्राथमिकता दी जाए।केंद्र की असाधारण देखभाल का एक मार्मिक उदाहरण एक जंगली हाथी सोनू है जिसे अचानकमार टाइगर रिजर्व से पकड़ा गया था और बाद में सिहावल सागर हाथी शिविर में स्थानांतरित कर दिया गया था। थोड़े समय रहने के बाद, सोनू को इस केंद्र में ले जाया गया, जहाँ उसे नियमित स्वास्थ्य जाँच और सावधानीपूर्वक तैयार की गई पोषण योजना सहित विशेष देखभाल मिल रही है, जिससे उसकी सेहत और उसके नए वातावरण को सहज अनुकूलन सुनिश्चित हो रहा है।वरिष्ठ आई.एफ.एस. अधिकारी श्री प्रेम कुमार और श्री के.आर. बरहाई ने बताया कि इस केंद्र में हाथियों की सर्वाेत्तम देखभाल सुनिश्चित की जाती है, साथ ही नियमों और विनियमों के अनुसार सुविधाओं में और सुधार के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। केंद्र में सभी हाथी अपने नए वातावरण में पनप रहे हैं। उनका बेहतर स्वास्थ्य पूरे स्टाफ द्वारा की गई समर्पण और देखभाल का प्रमाण है। छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण प्रयासों को आगे बढ़ाने और मानव-पशु संघर्षों के प्रभावी प्रबंधन में हाथी राहत और पुनर्वास केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका है।
- (छत्तीसगढ़ी कहिनी)- लेखिका-डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)संझौती के बेरा चिरई-चिरगुन मन चिचियात एके संघरा अपन-अपन खोन्दरा डहर लहुटत रिहिन हे । जम्मो कमइया मन घलो दिन भर के कमाई करे के बाद थके-मांदे घर पहुँचे के जल्दी करत रिहिन । जाड़ के बेरा झटकुन मुंधियार होय के सेतिर सब्बो ल घर जाय के जल्दी लागे रिहिस । मंदिर के घंटी बाजत रहिस अउ आरती के आवाज हर चारों खूंट गूंजत रहिस । जम्मो झन कर्मचारी मन तको अपन घर कोती निकर गे रिहिन हे दास बाबू ल छोड़ के । नगर निगम के ऑफिस म हेडकलर्क दास बाबू के घरवाली मीरा ल मरे दू बछर होवत हे , फेर सुन्ना घर म जाय के अभो ले मन नई लागय । लइका मन अपन गोड़ म खड़े होगे अउ शहर ले बाहिर निकरगें । दास बाबू काम म अपन आप ल ब्यस्त राखथे , ठीक टाइम म ऑफिस आ जाथे अउ सबले पाछू घर जाथे । उहां के चपरासी हर कहिथे चलव न बाबूजी जाबो तब उठथे अपन जगह ले ।घर लहुटीस त दू झन लइका मन ओला अगोरत बैठे रिहिन । घर सुन्ना-सुन्ना लागथे कइके ऊपर के घर ल किराया देबर विज्ञापन देहे रहिस ओखरे सेतिर ओमन आय रिहिन ।घर ल देखाइस तह ले एडवांस , बिजली बिल जम्मो बात ल गोठिया के हाँ कही दिस । ओ लइका मन पढ़े बर आय रिहिन त तुरते एडवांस तको दे दिन।सुन्ना घर मां चिराई चिरगुन तको आ जथे त ओ घर हर बसे सही लागे लगथे फेर उमन त जीयत जागत लइका रिहिन ।दास बाबू ल बोले बताय बर एक ठिन सहारा होगे। अपने घर के लइका सही ओमन के तोरा करय । रवाना खाये हव के नहीं ,बने पढाई करत हें कि नहीं, अइ सन हे दू चार ठिन गोठ बात के सहारा होगिस। दास बाबूतको अब समय म घर लहूटे लागीस । परीया परे भुंया म एक ठन अंकुर के फुटे तको बड़ सुख देथे , अपन लइका बर मेहनत करना मा बाप के जुम्मेदारी समझे जाथे फेर दूसर बर उही काम करे ले ओमन जिनगी भर सुरता राखथे अउ मान गौन तको करथें। लइका मन दास बाबू बर अब्बड़ मया करय। प्रेम अइसे जिनीस ए तैं हर एक देबे त तोला दुगुना चौगुना होके मिलही।लइका मन फोन मा बाबूजी के तोरा ल लेवत रहिथें अउ कहिथें -”रिटायर होय के बाद हमरे संघरा रहे बर आ जाहु बाबूजी, हमन ल तुंहर स्वास्थ्य के चिंता लागे रहिथे ।”ले अभी त टाइम हे कइके उमन ल भुलवार देथे फेर अब नौकरी के एक साल बाँचे म दास बाबू घलो फिकिर म परगे रिहिसे। बहू बने सेवा जतन करथे फेर थोरकिन बर आथें त बात-ब्यवहार अलग होथे अउ हरदम बर रहिबे तव अब्बड़ कन बात के धियान राखे बर परथे।ओ दिन ऑफिस ले लहुटत खानी ओखर बचपन के मितान श्याम संग भेंट होगे त ओला लेवा के दास बाबू हर अपन घर ले आईस। श्याम ल तभे मीरा के इंतकाल के पता चलिस।”बिन घरनी भूत के डेरा “ केहे जाथे फेर ओहर इहाँ परगट रूप देखत रिहिस। दास बाबू हर रांधय-गढ़य नहीं खाना बनवइया राखे रिहिस ,ओहर अपन मर्जी ले घर के जतना जतन कर देथे दास बाबू ओमा सन्तुष्ट रहिथे। ओहर जादा खिचिर-पिचिर नई करय। श्याम ल चाय बना के पियाइस अउ बचपन के सुरता के नदी म दुनों संगवारी बोहाय लागीन । ओही बीच म किराया म रहइया लइका मन दास बाबू तीर आ के कोनो कुछु माँग के लेगे अउ कोनो दास बाबू बर साग त कोनो दवाई लेके आइन। श्याम हर अचंभा म उमन के बात ब्यवहार ल देखत रिहिस, उंखर जाय ले कहिथे -” बने ए लइका मन तोर सहारा होगे हे ,इही ल कहिथे आम के आम अउ गुठली के दाम ।”“हव जी, इही बात ल मने मन गुनत रहिथव के रिटायर होय के बाद कइसे करव। लइका मन त अपन घर म आय बर कहत हावय फेर मैं कुछु निर्णय नई ले पावत हव। तैं हर अपन बिचार ला बता”।“काली तैं हर रात कुन मोर घर मा तोर नेवता हे, तैं आ तब तक मेंहर सोच के बताहूँ ।”“ले का होही “ कइके उंखर सभा खतम होइस।.दूसर दिन रात कुन दास बाबू हर भोजन करे श्याम के घर पहुँच गे ओतका टेम श्याम हर घर म नई रिहिस, ओखर बहु हर दरवाजा ल खोलिस अउ ओला बैठक म बइठार के पानी पियाइस ,बने गोठियाइस। ओहर बताइस के श्याम हर अपन दु बछर के नतनीन ल घुमाय बर लेगे हे आवत होही। मोला ओहर खाना बनावन नई देत रिहिस कका त बाबूजी हर ओला भुलवार के लानत हव कइके लेगिस हे। थोरकिन समय बाद दुनो झन आगे, ओकर नतनीन हर चाकलेट अउ कुरकुरे धरे बड़ प्रसन्न दिखत रिहिस अउ अपन मम्मी तीर चल दिस। ऊंखर बोलत बतावत ले बेटा घलो आगे फेर जम्मो झन जुरमिल के बने खाना खाईन। खाना लाय के बाद म श्याम हर बहु ल तको बुलाइस -”आजा बेटा तहूं संगे म खा, अउ कुछु लेना होही त हमन निकाल लेबो। उहाँ सबो झन काम ल बाँट लेवत रिहिन। श्याम हर तको बहु के मदद करय नई तो लइका ल धर के बहु ल मुक्त कर दय। बेटा बहु नतनीन के संग म श्याम हर खुश दिखत रिहिस। दास बाबू समझगे के श्याम हर ओखर प्रश्न के उत्तर दे दे हवय।लइका मन के घलो अपन जिनगी रहिथे, अपन शौक ,दिनचर्या रहिथे । बड़े-बुजुर्ग मन ऊंखरेच ले जम्मो आस लगा के राखथे अउ अब्बड़ उम्मीद बना के राखथे अउ ओहर पूरा नई होवय त दुखी होथें के बेटा बहु बने तोरा ल नई करय। दुनो ल अपन-अपन हिस्सा के जुम्मेदारी ल निभाय बर परथे। उंखर तकलीफ ल बुजुर्ग मन ल तको समझे बर परही, अपनेच स्वारथ ल नई देख के उंखरों परिस्थिति ल समझे बर परही तभे लइका मन ल ओमन बोझ नई लागय। वैसनहे लइका मन ल तको ए सोच रखना चाही के माँ-बाप मन उंखर जिनगी के ,घर के रौनक हावय अउ उंखर उपस्थिति हर लइका मन बर वरदान ए, बड़े-बुजुर्ग के रहे ले लइका मन सुसंस्कारी बनथें, परिवार म सुनता रहिथे। लइका मन ल माता पिता के उमर अउ स्वास्थ्य के हिसाब से ब्यवहार करना चाही। दुनो के बीच म संतुलन बनाये ले घर हर चलथे अउ इही प्रेम अउ सुख के आधार ए। दास बाबू के मन के सब्बो दुविधा हर खतम होगे रिहिस अउ उहू जिनगी के दूसर पारी चालू करे बर तइयार होगे रिहिस। -
-राष्ट्रव्यापी उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है पोषण माह अभियान
-पोषण अभियान से महिलाओं और बच्चों के आहार और व्यवहार में आ रहा सकारात्मक बदलाव-राज्य के 52 हजार से अधिक आंगनबाड़ियों में चल रहा है पोषण अभियानविशेष लेख •डॉ.दानेश्वरी सम्भाकर, सहायक संचालकरायपुर / प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर राष्ट्रीय पोषण अभियान ने एक जन आंदोलन का रूप ले लिया है। चालू माह में पोषण अभियान को राष्ट्रव्यापी उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। राज्य के 52 हजार से अधिक आंगनबाड़ियों में पोषण अभियान संचालित हो रहा हैं। वहीं स्वास्थ्यवर्धक विभिन्न गतिविधियों को आयोजन भी किया जा रहा है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ने गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं, किशोरियों और छह वर्ष की आयु तक के बच्चों की पोषण स्थिति पर ध्यान केंद्रित करके कुपोषण को दूर करने के लिए वर्ष 2018 में ’राष्ट्रीय पोषण अभियान’ के रूप में शुरू किया था।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि सुपोषण छत्तीसगढ़ बनाने के लिए हमारी सरकार दृढ़ संकल्पित है, उन्होंने राज्य के समस्त जनप्रतिनिधि, पंचायती राज संस्था के प्रतिनिधियों महिला स्व-सहायता समूहों, प्रबुद्ध वर्ग, विद्यार्थी वर्ग, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों के निकायों के प्रतिनिधि एवं समस्त जनसमुदाय से अपील करते हुए कहा है कि पोषण माह की गतिविधियों में पूरे उत्साह और ऊर्जा के साथ छत्तीसगढ़ को कुपोषण और एनीमिया मुक्त बनाने में सहभागी बने। महिलाओं और बच्चों को पोषण के प्रति जागरूक करने के लिए है जन प्रतिनिधियों, पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों, महिला स्वसहायता समूह, प्रबुद्ध नागरिकों, विद्यार्थियों और स्थानीय जन समुदाय को शामिल किया गया है।महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े ने कहा कि सितंबर माह के प्रथम दिवस से पोषण माह 2024 मनाया जा रहा है, जो पोषण जागरूकता को बढ़ावा देने और एक स्वस्थ भारत के निर्माण की दिशा में समर्पित एक राष्ट्रव्यापी उत्सव है। इस वर्ष अपने 7वें चरण में, पोषण माह अभियान एनीमिया की रोकथाम, विकास निगरानी, सुशासन और प्रौद्योगिकी के माध्यम से प्रभावी सेवा वितरण, पोषण भी पढ़ाई भी और पूरक पोषण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय पोषण माह के तहत् छत्तीसगढ़ के लगभग 52 हजार आंगन बाड़ी केन्द्रों में महिलाओं और बच्चों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने और उनके पोषण संबंधित देख-भाल के लिए समझाईश दी जा रही है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ को एनीमिया और कुपोषण मुक्त बनाने के लिए गांवों में महिला बाल विकास विभाग द्वारा सुुपोषण रथ के माध्यम से जागरूकता लाई जा रही।राष्ट्रीय पोषण माह के अंतर्गत राज्य के सभी आंगनबाड़ी केंद्रो में प्रतिदिन पोषण व स्वच्छता संबंधी विभिन्न गतिविधियां आयोजित हो रही हैं। साथ ही जिले में 23 सितंबर 2024 तक सभी केंद्रों में वजन त्यौहार मनाया जा रहा है। इस दौरान आंगनबाड़ी केंद्रों में 0 से 06 वर्ष के बच्चों का वजन एवं ऊंचाई मापना, पोषण स्तर की जांच एवं उनके अभिभावकों को पोषण संबंधित जानकारी दी जा रही है। राज्य में राष्ट्रीय पोषण माह अंतर्गत अब तक डैशबोर्ड में 29 लाख 60 हजार 333 गतिविधियों की एंट्री की जा चुकी है। महिला एवं बाल विकास विभाग की संचालक सुश्री तूलिका प्रजापति ने विभाग के सभी अधिकारी-कर्मचारियों को की जा रही शत-प्रतिशत गतिविधियों की ऑनलाइन एंट्री करने के निर्देश दिए हैं। सभी आंगनबाड़ी केंद्रों में भी समूह बैठक में वजन त्यौहार के बारे में चर्चा की जा रही है। ग्रामीण महिलाओं से चर्चा के दौरान 0 से 06 साल के बच्चे, किशोरी बालिकाओं को खान-पान और स्वास्थ्य देखभाल के बारे में बताया जा रहा है। महिला बाल विकास की योजनाओं की जानकारी देने के साथ ही गर्भवती महिलाओं से पौष्टिक आहार भोजन में शामिल करने का आग्रह किया जा रहा है।राष्ट्रीय पोषण माह के साथ ही 12 से 23 सितम्बर तक प्रदेश की आंगनबाड़ियों में वजन त्यौहार भी मनाया गया। जिसके अंतर्गत बच्चों के वजन में बढ़ोत्तरी को मापने के साथ ही सामुदायिक जागरूकता का कार्य भी किया गया। वजन त्यौहार के दौरान बच्चों के वजन सहित अन्य विवरण महिला और बाल विकास विभाग के मोबाइल ऐप पर दर्ज किया गया। इसी तरह, पोषण माह के दौरान सुपोषण चौपाल, अन्नप्राशन दिवस, परिवार चौपाल, पोषण मेला, व्यंजन प्रदर्शन जैसे आयोजन पंचायत और शहरी क्षेत्रों में किए जा रहे हैं। पोषण के प्रति बच्चों को जागरूक करने के लिए स्कूलों में नारा लेखन, निबंध, चित्रकला और दीवार लेखन, स्पर्धाएं आयोजित की जा रही हैं। साथ ही स्वस्थ बालक-बालिका प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जा रहा है। राष्ट्रीय पोषण माह के तहत ग्राम पंचायत के सहयोग से आंगनबाड़ी केंद्रों और शालाओं में पोषण वाटिका भी विकसित की जा रही है।राष्ट्रीय पोषण माह 2024 सिर्फ़ एक अभियान नहीं है - यह एक आंदोलन है। किशोरियों को शामिल करके ’एनीमिया मुक्त भारत’ कार्यक्रम के लिए निरंतर समर्थन देकर और सामुदायिक भागीदारी का लाभ उठाकर, भारत कुपोषण मुक्त भविष्य की ओर अपनी यात्रा को तेज़ कर रहा है।पोषण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता सतत विकास के लिए उसकी महत्वाकांक्षा का आधार है। आइए हम सब मिलकर काम करने का संकल्प लें, ताकि भारत में हर बच्चे, माँ और परिवार को पौष्टिक भोजन और स्वस्थ भविष्य मिल सके। इस अभियान में हम सभी शामिल हों। साथ मिलकर हम कुपोषण मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। - आलेख-श्रीमती अनीता प्रवीण, सचिव, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालयभारत दुनिया की सबसे बड़ी एवं सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और इसका खाद्य प्रसंस्करण उद्योग आर्थिक विकास को गति देने एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत सरकार ने विभिन्न व्यावहारिक पहलों के साथ-साथ सुधारों के एक नए युग की शुरुआत की है, जिसने भारत को तेजी से विकास के पथ पर ला खड़ा किया है। राष्ट्र न केवल अभूतपूर्व प्रगति एवं विकास का साक्षी बना है, बल्कि एक जीवंत एवं विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था द्वारा संचालित एक वैश्विक शक्ति के रूप में भी उभरा है।भारत सरकार की प्रगतिशील नीतिगत पहलों एवं उपायों के कारण, खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र ने हाल के वर्षों में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है और मैन्यूफैक्चरिंग के सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) में 7.66 प्रतिशत और वित्तीय वर्ष 2022-23 के दौरान कृषि के जीवीए में 8.45 प्रतिशत का योगदान दिया है।समृद्ध एवं विविधतापूर्ण कृषिगत संसाधनों से लैस भारत वैश्विक स्तर पर खाद्य उत्पादन के मामले में एक महत्वपूर्ण शक्ति है। दूध, पोषक अनाज, खाद्यान्न, फल, सब्जियां, चाय और मछली जैसी कई खाद्य पदार्थों का सबसे बड़ा उत्पादक होने के नाते, इसने खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया है। वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान भारत का कृषि-खाद्य निर्यात बढ़कर 46.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जो इस क्षेत्र की तीव्र प्रगति और इसके बढ़ते वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है। कुल कृषि-खाद्य निर्यात में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी 2014-15 में 4.90 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2023-24 में 10.88 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई। नवाचार, निवेश और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सही मिश्रण के साथ, यह क्षेत्र अपनी क्षमता का संपूर्ण दोहन करने और देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए तैयार है।भारत के खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में अपार एवं विविधतापूर्ण अवसर उपलब्ध हैं और इसका प्रत्येक उप-क्षेत्र विकास की अनूठी संभावनाएं प्रदान करता है। प्रौद्योगिकी के आगमन ने इस उद्योग में क्रांति ला दी है, जिससे खाद्य सुरक्षा, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति श्रृंखला के प्रबंधन में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। ई-कॉमर्स में आए उछाल और उपभोग के लिए तैयार (रेडी-टू-ईट) व सुविधाजनक खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग ने इस क्षेत्र के विकास के नए रास्ते खोल दिए हैं, जिससे यह निवेशकों और उद्यमियों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन गया है।खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के समग्र विकास को सहायता प्रदान करने हेतु, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) ने ऐसी कई योजनाएं और पहल लागू की हैं जो बदलाव लाने और एक मजबूत इकोसिस्टम को बढ़ावा देने में अहम रही हैं। यह इकोसिस्टम सूक्ष्म, लघु, मध्यम एवं बड़े उद्यमों में नवाचार, निवेश और समावेशिता को प्रोत्साहित करता है। प्रधानमंत्री किसान सम्पदा योजना (पीएमकेएसवाई) नाम की प्रमुख योजना ने खेतों से रिटेल आउटलेट तक कुशल आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन के साथ आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।इन प्रयासों से न केवल फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सका है, बल्कि निर्यात क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके अलावा, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएस) भारत के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के विकास और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देने की दिशा में एक प्रमुख प्रयास है। मंत्रालय देश में सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों की स्थापना/उन्नयन के लिए वित्तीय, तकनीकी और व्यावसायिक सहायता प्रदान करने हेतु केन्द्र प्रायोजित “पीएम सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों की औपचारिकीकरण योजना (पीएमएफएमई)” भी लागू कर रहा है।‘वर्ल्ड फूड इंडिया’: वैश्विक स्तर पर ‘फूड बास्केट’ के रूप में भारतखाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा परिकल्पित ‘वर्ल्ड फूड इंडिया’ वैश्विक स्तर पर एक खाद्य प्रसंस्करण केंद्र के रूप में उभरने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। यह वार्षिक उत्सव एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है, जो खाद्य मूल्य श्रृंखला के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित हितधारकों को एक साथ लाता है, पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देता है, ज्ञान साझा करने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करता है और भारत को एक वैश्विक खाद्य प्रसंस्करण केन्द्र बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में प्रेरित करता है। यह बहुप्रतीक्षित कार्यक्रम 19 से 22 सितंबर 2024 के दौरान नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित किया जाएगा। पिछले संस्करणों की सफलता को आगे बढ़ाते हुए, इस वर्ष के आयोजन का लक्ष्य अपेक्षाकृत अधिक बड़ा और प्रभावशाली कार्यक्रम का संचालन करना है जो नेटवर्किंग और सहयोग के अद्वितीय अवसर प्रदान करे। मंत्रालय वैश्विक निवेशकों, व्यापारिक जगत की अग्रणी हस्तियों, खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों, निर्यातकों, आयातकों, नवोन्मेषकों तथा सरकारी प्रतिनिधियों को इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम में शामिल होने और भारत के विशाल खाद्य बाजार व आर्थिक अवसरों का लाभ उठाने के लिए आमंत्रित किया है।वर्ल्ड फूड इंडिया 2024 में पेट फूड, एचओआरईसीए (होटल, रेस्तरां और कैटरिंग) और फसल की कटाई के बाद (पोस्ट हार्वेस्ट) उपयोग में आने वाली मशीनरी सहित कई नए क्षेत्रों को समर्पित विशेष खंड शामिल होंगे। ये नए समावेश खाद्य उद्योग के उभरते परिदृश्य को दर्शायेंगे और इनका उद्देश्य विविध किस्म के निवेश व नवाचारों को आकर्षित करना है। यह आयोजन उद्योग जगत के हितधारकों के बीच ज्ञान साझा करने और सहयोग की सुविधा की दृष्टि से डिजाइन किए गए विभिन्न विषयगत सत्रों की एक श्रृंखला का आयोजन करेगा। इसके मुख्य विषयों में टिकाऊ पैकेजिंग प्रौद्योगिकियां; अपशिष्ट को न्यूनतम करना, मूल्य को अधिकतम करना; खाद्य-पदार्थ एवं व्यापार के मामले में क्रांतिकारी बदलाव लाना शामिल होंगे। ये सत्र विशेषज्ञों को चुनौतियों का समाधान करने, सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को साझा करने और सतत विकास के लिए उपयुक्त रणनीतियों का पता लगाने के लिए एक मंच प्रदान करेंगे। इसी के समानांतर, ‘रिवर्स बायर सेलर मीट’ अंतर्राष्ट्रीय खरीदारों एवं भारतीय विक्रेताओं के बीच सीधे बातचीत को संभव बनाएगी, बाजार तक पहुंच सुलभ करेगी और नई साझेदारियों को बढ़ावा देगी।उपरोक्त बातों के अलावा, भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण द्वारा आयोजित वैश्विक खाद्य नियामक शिखर सम्मेलन का आयोजन वर्ल्ड फूड इंडिया के साथ किया जायेगा। इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य खाद्य सुरक्षा, गुणवत्ता और नवाचार से संबंधित महत्वपूर्ण समस्याओं के समाधान हेतु वैश्विक खाद्य नियामकों के बीच निरंतर बातचीत एवं सहयोग को प्रोत्साहित करना है।खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय एक ऐसे जीवंत व सुदृढ़ खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है जो न केवल भारत की आर्थिक समृद्धि में योगदान दे, बल्कि देश के लोगों का कल्याण भी सुनिश्चित करे। साथ मिलकर, हम एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, जहां विकसित भारत की आकांक्षाओं और एक आत्मनिर्भर राष्ट्र के सपने को साकार करते हुए भारत खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर एक अग्रणी देश के रूप में स्थापित होगा।
- लेखक- प्रल्हाद जोशी, केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा और उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रीभारत का 2070 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन प्राप्त करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विस्तार और एकीकरण पर केंद्रित है, जो सतत विकास पथ के प्रति देश की प्रतिबद्धता का एक प्रमुख घटक है। तेजी से बढ़ती आबादी के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में से एक के रूप में, भारत कार्बन उत्सर्जन को कम करते हुए बढ़ती ऊर्जा खपत की मांग को पूरा करने की संयुक्त चुनौती का सामना कर रहा है। इन कारकों को संतुलित करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा सबसे व्यवहार्य समाधान को दर्शाती है।आत्मनो मोक्षार्थं जगदहिताय च - जो स्वयं की मुक्ति और दुनिया के कल्याण का संकेत देता है। विश्व में सबसे कम प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वाले देशों में से एक होने के बावजूद, भारत न केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में स्वच्छ ऊर्जा के मुद्दे की वकालत कर रहा है बल्कि अन्य देशों को भी इस मुहिम में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहा है।ग्लासगो में कॉप26 में अपनी घोषणा में जलवायु परिवर्तन से निपटने के भारत के संकल्प पर जोर दिया गया, जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने "पंचामृत" पहल के तहत पांच प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किए। उनमें नवीकरणीय ऊर्जा महत्वपूर्ण घटक है।देश ने 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा क्षमता हासिल करने और उसी वर्ष तक अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का 50 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा करने का संकल्प लिया है जिसमें सौर ऊर्जा का योगदान 58 प्रतिशत और पवन ऊर्जा का योगदान लगभग 20 प्रतिशत है। ये लक्ष्य 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को अनुमानित एक अरब टन तक कम करने और अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता में 45 प्रतिशत की कमी करने के भारत के व्यापक उद्देश्य के अनुरूप हैं।नवीकरणीय ऊर्जा ऐसा क्षेत्र है जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने पिछले 10 वर्षों में परिवर्तनकारी बदलाव किए हैं। नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र पर प्रधानमंत्री के विशेष ध्यान ने भारत को वैश्विक स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित क्षमता में चौथे, पवन स्थापित क्षमता में चौथे और सौर क्षमता में पांचवें स्थान पर लाने में मदद की है। सौर ऊर्जा क्षमता में, भारत 2014 तक केवल 12.5 गीगावॉट तक पहुंच पाया था लेकिन अब लगभग 89 गीगावॉट हासिल रहा है, जो केवल 10 वर्षों में 30 गुना से अधिक हो गई है। यहां तक कि पवन स्थापित क्षमता में भी, 10 वर्षों में 2.2 गुना वृद्धि हुई है जो 21 गीगावॉट से बढ़कर 47 गीगावॉट हो गई है।वहनीयता के मामले में, ग्रिड कनेक्टेड सौर ऊर्जा संयंत्रों के टैरिफ में 76 प्रतिशत की कमी आई है जो 2010-11 के टैरिफ 10.95 रुपये की तुलना में घटकर 2023-24 के दौरान 2.60 रुपये हो गया। प्रधानमंत्री ने आगे बढ़कर नेतृत्व किया है और हमें नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में दिशा दिखाई है, जिससे अब देश को काफी लाभ मिल रहा है।पिछले 10 वर्षों में, ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों का विकास एवं क्रियान्वयन मिशन मोड में किया गया है। देश में नवीकरणीय ऊर्जा की स्थापित क्षमता 200 गीगावॉट का लगभग 55 प्रतिशत सौर ऊर्जा से आता है। लगभग 30 प्रतिशत का एक और बड़ा हिस्सा पवन ऊर्जा से आता है।भारत ने सौर मॉड्यूल के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने और आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना जैसे कार्यक्रम भी लागू किए हैं। घरेलू सेल उत्पादन के लिए प्रोत्साहन भारत में हरित विकास के लिए वरदान साबित हुआ है, जिससे इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला है। इसके साथ ही, ग्रीन हाइड्रोजन में ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन (साइट) कार्यक्रम के लिए रणनीतिक उपाय इलेक्ट्रोलाइज़र के विनिर्माण और हरित हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए प्रोत्साहन प्रदान करते हैं।भारत की हरित हाइड्रोजन की विकास गाथा प्रेरणादायक है। भारत ने कोविड से निपटने हेतु अपनी स्वयं की वैक्सीन का उत्पादन करके जो हासिल किया, ठीक उसी तरह भारत हरित हाइड्रोजन क्रांति का नेतृत्व कर रहा है। इसका उद्देश्य विश्व में उत्पादन और निर्यात का केंद्र बनना है। यहां भी पीएम मोदी द्वारा उठाए गए कदमों ने ही इस परिवर्तन को संभव बनाया!दरअसल, जब देश में ईवी इंफ्रास्ट्रक्चर को अपनाने की बात आती है तो प्रधानमंत्री भविष्य में ईवी वाहन चार्जिंग के लिए केवल नवीकरणीय स्रोतों का उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करने की बात करते हैं, ताकि जीवाश्म ईंधन ऊर्जा स्रोतों का उपयोग न करना पड़े। पीएम सूर्य घर योजना सौर छतों का उपयोग करने वाले नागरिकों के साथ उनके वाहनों को बिजली उपलब्ध कराने के जरिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।भारत जिस पैमाने और गति से नवीकरणीय यात्रा को आगे बढ़ा रहा है वह बेजोड़ है और यह प्रधानमंत्री मोदी के सीधे हस्तक्षेप का परिणाम है। अब, भारत इस क्षेत्र में सिर्फ अन्य देश भर नहीं है, बल्कि हम भी अग्रणी हैं! पिछले 10 साल में नवीकरणीय क्षेत्र में भारत की परिवर्तनकारी यात्रा ने हमें अग्रणी देशों में स्थान दिया है और हमें वैश्विक पहचान दिलाई है ।इसका असर अब महसूस किया जा रहा है और ब्रांड इंडिया बिल्कुल सही धूम मचा रहा है। इसने नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय को 16-18 सितंबर 2024 को गुजरात के गांधीनगर में री-इन्वेस्ट 2024 का आयोजन करने के लिए प्रेरित किया है। इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे। री-इन्वेस्ट 2024 का उद्देश्य इस क्षेत्र की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों से सीखने का आदान-प्रदान करना और 2030 तक स्थापित 500 गीगावॉट स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य हासिल करने के लिए नए गठबंधन बनाना है। इसमें जर्मनी, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया, नॉर्वे और संयुक्त अरब अमीरात भाग लेंगे। इस कार्यक्रम में विभिन्न राज्य सरकारें, बैंक, वित्तीय संस्थान, निवेशक और निजी कंपनियां भी भाग लेंगी जो शपथ-पत्र के रूप में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए अपनी योजनाओं/लक्ष्यों को निर्दिष्ट करते हुए प्रतिबद्धताएं व्यक्त करेंगी।सरकार नवीकरणीय ऊर्जा खरीद दायित्व और नवीकरणीय उत्पादन दायित्व के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दे रही है। ये शासनादेश हरित विकास की दिशा में आगे बढ़ने और दायित्वों के पालन की राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुकूल हैं जो व्यक्तिगत संस्थाओं के लिए ऊर्जा परिवर्तन के पथ पर आगे बढ़ना संभव बनाता है।भारत 2030 तक अपनी संचयी विद्युत स्थापित क्षमता का 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ईंधन-आधारित ऊर्जा संसाधनों से हासिल करना चाहता है। हर साल कम से कम 50 गीगावॉट क्षमता बोली लगाने की योजना है। सरकार ने सौर, पवन, सौर-पवन हाइब्रिड, आरटीसी आरई ऊर्जा, आदि की बोलियां आमंत्रित करने के लिए एसईसीआई, एनटीपीसी लिमिटेड, एनएचपीसी और एसजेवीएन को नवीकरणीय ऊर्जा कार्यान्वयन एजेंसियों (आरईआईए) के रूप में अधिसूचित किया है।भारत में नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में जबरदस्त बढ़त के बावजूद, अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कुछ मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, प्रमुख परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण, विशेष रूप से विकासशील देशों में रणनीति बनाने की आवश्यकता है। विदेशी वित्तीय संस्थान और जलवायु कोष भारत के नवीकरणीय ऊर्जा परिवर्तन को प्रमुख सहायता प्रदान कर रहे हैं। अनुमान के अनुसार भारत को 2030 तक 500 गीगावॉट के अपने नवीनकरणीय और गैर-जीवाश्म ऊर्जा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए करीब 30 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी ।भारत की नवीकरणीय ऊर्जा यात्रा को मजबूत नीति सहायता का समर्थन हासिल है। भारत और फ्रांस द्वारा स्थापित अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) जैसी पहल का उद्देश्य दुनिया भर में, विशेषकर विकासशील देशों में सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना है।भारत को नवीकरणीय ऊर्जा आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तन से महत्वपूर्ण सामाजिक आर्थिक लाभ होगा। इसके अलावा, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, नौकरियां उपलब्ध और स्थानीय आर्थिक विकास को प्रोत्साहित कर सकती हैं। वायु प्रदूषण के बारे में सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के समाधान के लिए आरई विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो कई शहरों में एक समस्या है। स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर परिवर्तन का परिणाम बेहतर स्वास्थ्य के रूप में सामने आ सकता है।प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने पिछले 10 वर्ष में आर्थिक विकास से कोई समझौता किए बिना नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य की ओर उल्लेखनीय प्रगति की है। हमारी स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता आसमान छू रही है और मार्च 2014 में 75.52 गीगावॉट से बढ़कर अब 203 गीगावॉट से अधिक हो गई है। 10 वर्ष में 165 प्रतिशत बढ़ोतरी अभूतपूर्व बात है।यद्यपि चुनौतियां बनी हुई हैं, इसलिए 2070 तक भारत के नेट-जीरो भविष्य के दृष्टिकोण को साकार करने में निरंतर नीति समर्थन, तकनीकी नवाचार और वैश्विक सहयोग महत्वपूर्ण होगा।नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के सभी संबंधि पक्षों और निवेशकों, राज्य सरकारों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह है कि टिकाऊ भविष्य के उद्देश्य से मिलकर काम करने के लिए इस प्रमुख री-इन्वेस्ट शिखर सम्मेलन में भाग लें ।दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और तेजी से विकासशील राष्ट्र के रूप में भारत की नवीकरणीय ऊर्जा यात्रा अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए स्थिरता के मार्ग के मॉडल के रूप में काम करेगी।
- • नसीम अहमद खान, उप संचालक जनसंपर्करायपुर / प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा विशेष रूप से पिछड़ी जनजातियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए संचालित पीएम जनमन योजना (प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाभियान) के चलते छत्तीसगढ़ राज्य अति पिछड़े जनजातीय समुदाय तकदीर और इनकी बसाहटों की तस्वीर तेजी से बदलने लगी है। विशेष पिछड़ी जनजातियों के रहवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का तेजी से विकास होने लगा है। बरसों-बरस से आवास, स्वच्छ पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित इन जनजातीय समूहों को अब मिशन मोड में यह बुनियादी सुविधाएं सुभल होने लगी है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पीएम जनमन योजना के सफल क्रियान्वयन से राज्य के सभी विशेष पिछड़ी जनजातीय इलाकों में बुनियादी विकास एवं निर्माण के कार्य तेजी से कराये जा रहे है। राज्य में पीएम जनमन योजना को शुरू हुए अभी एक साल का भी अरसा पूरा नहीं हुआ है, फिर भी छत्तीसगढ़ सरकार की प्रतिबद्धता के चलते इसके सार्थक परिणाम दिखाई देने लगे है। कबीरधाम जिले में प्रधानमंत्री जनमन योजना के चलते बैगा समुदाय की तकदीर और इनकी बसाहटों की तस्वीर बदलने लगी है।छत्तीसगढ़ राज्य के उत्तर-पश्चिम भाग में स्थित कबीरधाम, राजनांदगांव, मुंगेली, बिलासपुर और कोरिया जिले में विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समुदाय के लोग निवास करते है। जनसंख्यात्मक दृष्टिकोण से बैगा, छत्तीसगढ़ राज्य की विशेष पिछड़ी जनजातियों में सर्वाधिक आबादी वाला जनजाति समुदाय है। छत्तीसगढ़ राज्य में उक्त 5 जिलों में बैगा समुदाय के 24 हजार 589 परिवार निवासरत है, जिसमें से लगभग 46 प्रतिशत यानि 11 हजार 261 परिवार कबीरधाम जिले में रहते हैं।कबीरधाम जिले के बोड़ला एवं पंडरिया में बैगा समुदाय के लोग निवास करते हैं। इस समुदाय की 38 बसाहटों में निवासरत 255 परिवारों के घरों में विद्युत सुविधा से रौशन किया जा चुका है, जबकि 56 बैगा बसाहटों को जोड़ने के लिए 186.20 किलोमीटर लम्बाई वाली 47 सड़कों के निर्माण के लिए 135.72 करोड़ रूपए की स्वीकृति दी गई है। इनमें से 42 सड़कों के निर्माण प्रारंभ हो चुका है, जिसके अंतर्गत पक्की डामरीकृत सड़क एवं नदी-नालों पर पुल-पुलियों का निर्माण जारी है।कबीरधाम के पंडरिया विकासखंड के ग्राम भागड़ा, जामुनपानी, कामठी, कुई, मंगली सारपानी टाकटाईयां, बदना, गुडा, छिरहा, मुनमुना, नेउर और लालपुर में विशेष शिविर लगाकर बैगा समुदाय के लोगों के स्वास्थ्य एवं सिकलसेल की जांच के साथ ही 1870 बैगा परिवारों को आयुष्मान कार्ड प्रदान किए गए हैं। इन गांवों के 86 गर्भवती माताओं का सुरक्षित प्रसव कराया गया। स्वास्थ के प्रति जन-जागरूकता का विशेष अभियान संचालित करने का यह परिणाम है कि अब बैगा समुदाय की महिलाएं भी प्रसव के लिए सरकारी अस्पतालों एवं स्वास्थ्य केन्द्रों में बिना झिझक आने लगी है।छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा खेती-किसानी के लिए दी जा रही मदद के चलते अब बैगा समुदाय के लोग बेवर खेती को छोड़ परंपरागत तौर-तरीकों से खेती-किसानी करने लगे है। बेवर खेती दरअसल झूम खेती है। बैगा समुदाय के लोग एक स्थान पर स्थायी तौर पर निवास न करने के कारण बेवर यानी झूम खेती किया करते थे। बिना ब्याज के कृषि ऋण, अनुदान पर कृषि यंत्रों सहित अन्य सुविधाएं मिलने की वजह से बैगा समुदाय के लोग अब बेवर खेती को छोड़ स्थायी खेती करने लगे है। कबीरधाम जिले में शासन द्वारा बैगा समुदाय के लोगों को किसान क्रेडिट कार्ड एवं खेती-किसानी के लिए इस वर्ष 11.70 लाख रूपए का कृषि ऋण दिया जा चुका है।ग्राम दमगढ़ निवासी समेलाल बैगा के पास 5.5 एकड़ कृषि भूमि है। प्रधानमंत्री जनमन येाजना के तहत उन्होंने एक लाख रूपए ऋण लेकर अपनी कृषि भूमि पर धान की खेती के लायक बना दिया है। समेलाल का कहना है कि धान की समर्थन मूल्य पर खरीदी और राशि का तत्काल भुगतान होने से उन्हें कृषि से लाभ होने लगा है। ग्राम रोखनी के राजकुमार बैगा के पास 02 एकड़ कृषि भूमि है। प्रधानमंत्री जनमन योजना से ऋण लेकर उन्होंने खेत का सुधार कराया है और धान की खेती की है। फसल अच्छी होने की वजह से उन्हें, इससे लाभ होने की उम्मीद है। नवीन क्रेडिट कार्ड से ऋण मिलने से खेती की जरूरतें पूरी होने लगी है।पीएम-जनमन योजना के चलते कबीरधाम जिले की 260 बैगा बसाहटों में सोलर पंप, पानी टंकी, पाईप लाईन के माध्यम से बैगा परिवारों के घरों में नल से जल की आपूर्ति का काम तेजी से कराया जा रहा है। वर्तमान में विकासखंड बोड़ला के 181 बसाहटों में से 62 बसाहटों में सोलर पंप, पानी टंकी, पाईप लाईन के माध्यम से जलापूर्ति शुरू कर दी गई है, शेष 119 बसाहटों में नल कनेक्शन दिए जाने का काम जारी है। पंडरिया ब्लॉक अंतर्गत 78 बैगा बसाहटों में से 18 बसाहटों में नल से जल प्रदाय करने का काम पूरा हो चुका है, जबकि शेष बसाहटों में पानी टंकी निर्माण कार्य, पाईप लाईन बिछाने का काम जारी है। बैगा बसाहटों में पेयजल के लिए पहले से हैण्डपंप स्थापित है।प्रधानमंत्री जनमन योजना अंतर्गत कबीरधाम जिले में 8 हजार 596 विशेष पिछड़ी जनजाति के तहत बैगा समुदाय के परिवारों का सर्वे में 8 हजार 440 परिवार बैगा परिवार आवास के लिए पात्र पाए गए है, जिनमें से 7853 का परिवारों का पंजीयन आवास पोर्टल में किया गया है एवं 7394 परिवारों को आवास की स्वीकृति प्रदान की गई है। स्वीकृत परिवारों में से 6 हजार 678 हितग्राहियों को प्रथम किश्त, 3031 हितग्राहियों को द्वितीय किश्त एवं 1081 हितग्राहियों को तृतीय किश्त की राशि ऑनलाईन डी.बी.टी. के माध्यम से सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर की जा चुकी है। बैगा समुदाय के रहवासी इलाकों में 4 छात्रावास, 39 आंगनबाड़ी केन्द्र, 2 वनधन केन्द्र, 13 बहुद्देशीय केन्द्र सहित कुल 370 कार्यों की स्वीकृति दी गई हैं, जिन्हें तेजी से पूरा कराया जा रहा है।
- लेखिका- सुश्री शोभा करंदलाजे, (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय और श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की राज्य मंत्री)भारत पारंपरिक कला और शिल्प के विभिन्न प्रतिरूपों का देश रहा है। ये कला और शिल्प न केवल हमारी गौरवशाली विरासत का हिस्सा रहे हैं, बल्कि ये बड़ी संख्या में लोगों के लिए जुड़ाव और रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। मिट्टी के बर्तन बनाने, नाव बनाने, जूते बनाने जैसे व्यवसायों में कार्यरत कारीगर और शिल्पकार अपने आस-पास के लोगों के जीवन से जुड़े होते हैं और ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान महत्वपूर्ण होता है। इनमें से ज़्यादातर कारीगर और शिल्पकार अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहे हैं तथा वे अपने हाथों और औज़ारों से काम करते हैं।इस पृष्ठभूमि में, माननीय प्रधानमंत्री ने 17.09.2023 को विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर पीएम विश्वकर्मा योजना का शुभारंभ किया था, ताकि विभिन्न सकारात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से इन कारीगरों और शिल्पकारों, जिन्हें विश्वकर्मा के नाम से जाना जाता है, के जीवन में बदलाव लाया जा सके।पीएम विश्वकर्मा योजना एक समग्र योजना है, जो कारीगरों और शिल्पकारों को प्रारंभ से अंत तक सहायता प्रदान करती है। इस योजना के अंतर्गत शामिल पारंपरिक व्यवसाय हैं: बढ़ई (सुथार/बधाई), नाव निर्माता, कवच निर्माता, लोहार, हथौड़ा और औजार निर्माता, ताला निर्माता, सुनार (सोनार), कुम्हार, मूर्तिकार (पत्थर तराशने वाले), पत्थर तोड़ने वाले, मोची (चर्मकार/जूते बनाने वाले), राजमिस्त्री, टोकरी/चटाई/झाड़ू निर्माता/कॉयर बुनकर, गुड़िया और खिलौना निर्माता (पारंपरिक), नाई, माला निर्माता (मालाकार), धोबी, दर्जी और मछली पकड़ने के जाल निर्माता इत्यादि।यह योजना “संपूर्ण सरकार” दृष्टिकोण पर आधारित है। भारत सरकार के तीन मंत्रालयों अर्थात् सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय, कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय और वित्तीय सेवा विभाग द्वारा इस योजना को सह-कार्यान्वित किया जा रहा है। इन मंत्रालयों और राज्य सरकारों के बीच निरंतर समन्वय और रचनात्मक सहयोग होते हैं, जो इसे देश में अब तक शुरू की गई और कार्यान्वित की गई सबसे अनूठी योजनाओं में से एक बनाता है। योजना के लाभार्थियों की त्रिस्तरीय सत्यापन प्रक्रिया में राज्य सरकारें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।योजना को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही है। जब 2023 में योजना शुरू की गई थी, तो उम्मीद थी कि पांच साल की अवधि में 30 लाख लाभार्थी इससे जुड़ जाएंगे। यह देखकर खुशी होती है कि 11 महीनों के भीतर 2.36 करोड़ नामांकन हो चुके हैं और इनमें से 17.16 लाख लाभार्थियों ने तीन-चरणीय सत्यापन प्रक्रिया के बाद सफलतापूर्वक पंजीकरण कराया है।कर्नाटक में कई विश्वकर्मा समुदाय हैं, जिनकी अपनी अनूठी रचनात्मकता और क्षमता है। ये समुदाय पत्थर की नक्काशी, लकड़ी का काम, चंदन की नक्काशी, बिदरी का काम जैसा धातु का काम, गुड़िया और खिलौने बनाना आदि विभिन्न कला रूपों में काम कर रहे हैं। कर्नाटक राज्य में पीएम विश्वकर्मा योजना के लिए बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। कर्नाटक में अब तक 28.99 लाख नामांकन हो चुके हैं। इनमें से 3.93 लाख लाभार्थियों ने सफलतापूर्वक पंजीकरण कराया है। लगभग 2 लाख लाभार्थियों ने अपना कौशल प्रशिक्षण पूरा कर लिया है और 35,000 से अधिक लाभार्थियों के लिए 1 लाख रुपये तक के ऋण स्वीकृत किये गए हैं। कुल मिलाकर, इन लाभार्थियों को ऋण के रूप में 305.08 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई है।इस योजना में इन व्यवसायों में लगे विश्वकर्माओं को ‘सम्मान’ देने, उनके ‘सामर्थ्य’ को उन्नत करने और उनमें ‘समृद्धि’ लाने पर जोर दिया गया है। लाभार्थियों को पंजीकृत होने के बाद पीएम विश्वकर्मा प्रमाण पत्र और पहचान पत्र देकर ‘सम्मान’ दिया जाता है।‘सामर्थ्य’ निर्माण के लिए, इस योजना में कारीगरों और शिल्पकारों के कौशल उन्नयन की परिकल्पना की गई है। लाभार्थियों को संबंधित कारीगरी और शिल्पकारी के मास्टर प्रशिक्षकों द्वारा 6 दिनों का उच्च गुणवत्ता युक्त प्रशिक्षण दिया जाता है। लाभार्थियों को पारिश्रमिक मुआवजे के रूप में प्रतिदिन 500 रुपये का वजीफा और 1,000 रुपये का यात्रा भत्ता दिया जाता है। इसके अलावा, प्रशिक्षण के दौरान लाभार्थियों के लिए भोजन और आवास की सुविधा पूरी तरह से सरकार द्वारा वित्त पोषित है और निःशुल्क प्रदान की जाती है। ‘सामर्थ्य’ का एक अन्य पहलू कारीगरों और शिल्पकारों को अपने संबंधित कार्य-क्षेत्र में आधुनिक और नवीनतम उपकरणों का उपयोग करने में सक्षम बनाने के लिए 15,000 रुपये तक का टूलकिट प्रोत्साहन दिया जाता है। एमएसएमई मंत्रालय ने डाक विभाग के साथ सहयोग स्थापित किया है, जो देश भर में फैले अपने नेटवर्क के माध्यम से यह सुनिश्चित करेगा कि लाभार्थियों को उनके घरों पर ही टूलकिट सौंपे जाएं।किफायती ऋण और व्यापक बाजारों तक पहुंच प्रदान करने के जरिये लाभार्थियों की 'समृद्धि' की परिकल्पना की गई है। इस योजना के तहत 5% की रियायती ब्याज दर पर 1 लाख रुपये और 2 लाख रुपये की दो किस्तों में 3 लाख रुपये तक के गिरवी-मुक्त ऋण उपलब्ध कराए जाते हैं। लाभार्थियों से कोई गारंटी शुल्क नहीं लिया जाता है। इसके अलावा, यह योजना लाभार्थियों को डिजिटल लेनदेन अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है और हर बार डिजिटल लेनदेन करने पर कैशबैक दिया जाता है। हर महीने, प्रत्येक डिजिटल भुगतान या रसीद के लिए लाभार्थी के खाते में अधिकतम 100 लेनदेन तक प्रति डिजिटल लेनदेन 1 रुपये जमा किया जाता है। इस योजना का एक हिस्सा है - घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों बाजारों में इन कारीगरों के उत्पादों और सेवाओं को बढ़ावा देने की विपणन रणनीति। इसमें गुणवत्ता प्रमाणन, ब्रांडिंग, विज्ञापन, प्रचार और अन्य विपणन गतिविधियां शामिल हैं, जिनका उद्देश्य मूल्य श्रृंखलाओं के साथ उनके संबंधों का विस्तार करना है। योजना के विपणन घटक के तहत जीईएम, ओएमडीसी जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर शामिल होने और गुणवत्ता प्रमाणन प्राप्त करने आदि को प्रोत्साहित किया जाता है।यह योजना पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को अपने स्वयं के उद्यम स्थापित करने के लिए सक्षम बनाकर एक नए भारत के निर्माण में सहायक बनने के लिए तैयार है। यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने वालों का समर्थन करने के लिए सरकार द्वारा किया गया एक सराहनीय प्रयास है और राष्ट्र हमारे आर्थिक परिदृश्य में विश्वकर्माओं के उत्थान को देखने के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।**
- -साय सरकार की नीतियों से निखर रहा आदिवासी समुदायों का जीवन-सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का तेजी से हो रहा विकास-सरकार के ठोस कदम से आदिवासी युवाओं के अच्छे भविष्य की नींव भी मजबूतरायपुर / छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों के हित में ठोस कदम उठा रही है| दूरस्थ और पिछड़े वनांचल इलाकों में मूलभूत सुविधाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के अलावा बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का काम तेजी से हो रहा है| छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐसी कई योजनाएं शुरू की हैं जिनके जमीनी स्तर पर व्यापक प्रभाव से जन-जीवन जीवन बदल रहा है| मुख्यमंत्री की पहल पर नियद नेल्लानार योजना से आज आदिवासी परिवारों के जीवन में आशा की नई किरण आई है| इस योजना में माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में स्थापित नए कैम्पों के आसपास के गांवों का चयन कर शासन के 12 विभागों की 32 कल्याणकारी योजनाओं के तहत आवास, अस्पताल, पानी, बिजली, पुल-पुलिया, स्कूल इत्यादि मूलभूत संसाधनों का विकास किया जा रहा|दूरस्थ आदिवासी इलाकों से अयोध्या धाम तक सीधी कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री श्री साय की पहल पर भारत सरकार ने हरी झंडी दे दी है| सडकों के विकास को लेकर भी लगातार कार्य किया जा रहा है, जिससे आदिवासी अंचलों तक आवाजाही आसान हुई है| छत्तीसगढ़ सरकार ने 68 लाख गरीब परिवारों को 05 साल तक मुफ्त राशन देने का निर्णय भी लिया, जिसका लाभ बड़ी मात्रा में आदिवासी अंचलों के जरूरतमंद रहवासियों को मिल रहा है|तेंदूपत्ता वनवासियों की आजीविका का मजबूत स्रोत है, इससे होने वाली आमदनी को बढ़ाते हुए सरकार ने तेंदूपत्ता संग्रहण पारिश्रमिक दर 4000 रुपए प्रति मानक बोरा से 5500 रुपए प्रति मानक बोरा किया, जिसका लाभ चालू तेंदूपत्ता सीजन से ही 12 लाख 50 हजार से अधिक संग्राहकों को मिल रहा है। तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिए छत्तीसगढ़ सरकार जल्द ही चरण पादुका योजना भी शुरू करने जा रही है, इसके साथ ही उन्हें बोनस का लाभ भी दिया जाएगा|सुरक्षा और विकास के दोहरे मोर्चे पर काम करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है| इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि आज अनुपात के हिसाब से छत्तीसगढ़ का बस्तर देश में सबसे सैन्य संवेदनशील क्षेत्र बन चुका है, बस्तर डिवीजन में प्रत्येक 9 नागरिकों के पीछे एक पैरामिलिट्री का जवान है| जल्द ही इन क्षेत्रों में सुरक्षाबलों के 250 से ज्यादा कैम्प और नियद नेल्लानार से 58 नए कैम्प स्थापित होंगे ताकि सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का दायरा बढ़ सके| मुख्यमंत्री श्री साय के नेतृत्व में आदिवासी संस्कृति और परम्पराओं को आगे बढ़ाने के लिए बस्तर में प्राचीन काल से चले आ रहे अनेक ऐतिहासिक मेलों को भी शासकीय संरक्षण और आर्थिक सहायता दी जा रही है।दूरस्थ आदिवासी इलाकों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के सरकार के मजबूत प्रयास से देश के दूसरे सबसे कम साक्षर जिले बीजापुर में नए भविष्य की बुनियाद गढ़ी जा रही है| बीजापुर जिले में माओवादियों द्वारा बंद 28 स्कूल अब मुख्यमंत्री श्री साय की पहल से खुल गए हैं| स्थानीय बोलियों को सहेजने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ सरकार ने आदिवासी अंचलों में स्थानीय बोलियों में प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने का निर्णय नई शिक्षा नीति के तहत आदिवासी समुदायों में शिक्षा की पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा, जिसमें 18 स्थानीय भाषा-बोलियों में स्कूली बच्चों की पुस्तकें तैयार की जा रही हैं। प्रथम चरण में छत्तीसगढ़ी, सरगुजिहा, हल्बी, सादरी, गोंड़ी और कुडुख में पाठ्यपुस्तक तैयार होंगे।छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासी युवाओं के सुनहरे भविष्य की नींव भी मजबूत कर रही है, इसी क्रम में नई दिल्ली के ट्रायबल यूथ हॉस्टल में सीटों की संख्या 50 से बढ़ाकर अब 185 कर दी गई है। इस निर्णय से देश राजधानी में रहकर संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा की तैयारी करने के इच्छुक अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए अब इस हॉस्टल में तीन गुने से भी अधिक सीटें उपलब्ध होंगी| इसी तरह आईआईटी की तर्ज पर राज्य के जशपुर, बस्तर, कबीरधाम, रायपुर और रायगढ़ में प्रौद्योगिकी संस्थानों का निर्माण भी किया जाएगा|मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की पहल पर छत्तीसगढ़ के माओवादी आतंक प्रभावित जिलों के विद्यार्थियों को तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा के लिए ब्याज रहित ऋण मिलेगा| शेष जिलों के विद्यार्थियों को एक प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण प्रदान किया जाएगा, जिससे स्वरोजगार की ओर बढ़कर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकेंगे I
- -नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग के लिए वरदान साबित हो रही नियद नेल्लानार योजनारायपुर / मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की पहल पर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए नियद नंेल्लानार योजना चलाई जा रही है। इससे क्षेत्रों के विकास में तेजी आई है। मूलभूत सुविधाओं का विस्तार हो रहा है। नियद नेल्लानार योजना के तहत स्थानीय लोगों को सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए सुरक्षा कैंप खोले गए हैं और इन सुरक्षा कैंपों की पांच किमी की परिधि में आने वाले गांवों में सरकार की 12कल्याणकारी एवं विकास योकजनाओं के अंतर्गत मूलभूत संसाधन जैसे आवास, पानी बिजली,सड़क, स्कूल आदि सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। मुख्यमंत्री की इस योजना के माध्यम से विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रहने वालों को सार्वभैम सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सस्ते में खाद्यान्न और प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत बस्तर संभाग के 1335 पकरवरों को घरेलू गैस सिलेंडर मिल गया है, जिससे उनका जीवन सहज और खुशहाल हुआ है। नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में 10हजार154 परिवारों का राशनकार्ड बनवाया गया है, जिससे उन्हें सस्ता खाद्यान्न मिलने लगा है।मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के बच्चों के भविष्य की चिंता करते हुए बस्तर संभाग में नक्सल आतंक से बंद हुए42 प्राथमिक शालाओं को ॅिफर से खुलवाया है। मुख्यमंत्री श्री विश्णुदेव साय की पहल पर विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग के लोगों और नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए पानी टंकी का निर्माण कराकर सोलर मोटरपंप के माध्यम से स्वच्छजल उपलब्ध कराया जा रहा है। इस तरह राज्य सरकार की नियद नेल्लानार योजना नक्सल प्रभावित क्षेत्रों और विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग क लोगों के जीवन स्तर को उठाने के साथ ही वरदान साबित हो रही है।
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- लेखिका-डॉ. दीक्षा चौबे
दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
महज भाषा नहीं है हिंदी ,सरस संस्कार धानी है ।
वेदों की अनुपम गाथा है , पुराणों की जुबानी है ।।
सूर कबीरा तुलसी मीरा ,पद रसखान बसे इनमें ,
बहती है भावों की सरिता, यह पुरखों की कहानी है ।।
रचयिता यह महाकाव्यों की , संतों की शुचि बानी है ।
श्रमिकों का स्वेद बूँद इसमें ,नयन-पीर का पानी है ।
कई धर्मों संस्कृतियों की ,बहती है धारा इसमें ,
संचित पिटारी अनुभवों की ,उमंग भरी जवानी है ।।
जलनिधि-सी यह विशाल हृदया,सरिता आनी-जानी है ।
अपनाया राह में जो मिला ,पावन गंगा का पानी है ।
एक सूत्र में बाँध रही है ,भिन्न-भिन्न परिवेशों को ,
सहज सरल हिंदी हैअपनी,विश्व भाषा बनानी है ।।
सुदृढ समृद्ध भाषा है यह,शब्द-माधुर्य का क्या कहना ।
अलंकृता रस ,छंद अर्थ की ,अभिधा लक्षणा व्यंजना ।
ताल राग भाव अनुगामिनी ,अनुपमेय हृद भाव कहे ।
शब्द-शब्द मोती बन खनके ,प्रेम-सुधा बह जानी है ।।
- -लेखक- श्री शाजी के वी, अध्यक्ष, नाबार्डदुनिया भर में ‘अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष - 2025’ के स्वागत की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है जब भारत का सहकारिता क्षेत्र मजबूत स्थिति में है और देशभर में नई, मजबूत और तेजी से उभरती हुई प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) का प्रसार हो रहा है। आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों से लैस ये PACS अब ग्रामीण और कृषि प्रधान भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘सहकार से समृद्धि’ के सपने को साकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।यद्यपि भारत में सहकारिता का गौरवशाली इतिहास रहा है, लेकिन कुप्रबंधन, संकट के समय पर्याप्त सरकारी समर्थन की कमी और आवश्यक सुधारों की अनुपस्थिति के कारण इसके विकास में रुकावट आई है। हालाँकि, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने दूसरे कार्यकाल में सहकारिता मंत्रालय का गठन करने और अपने भरोसेमंद सहयोगी अमित शाह को इसकी कमान सौंपने के तुरंत बाद सहकारिता क्षेत्र में बदलाव की बयार बहने लगी।गुजरात में सहकारिता आंदोलन को नया आकार देने वाले सुधारों के प्रणेता के रूप में विख्यात सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कार्यभार संभालने के तुरंत बाद राष्ट्रीय सहकारिता परिदृश्य में बड़े पैमाने पर सुधार किए, जिससे दुनिया इस क्षेत्र की ओर उम्मीद से देखने लगी। सहकारिता की क्षमता को अब देश के भविष्य को आकार देने वाले क्षेत्र के रूप में देखा जा रहा है। वित्त मंत्रालय के साथ हुए बजट परामर्श में भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (NCUI) ने प्रमुख क्षेत्रों में सेवाएं प्रदान करने की क्षमता को बढाने के लिए सहकारी समितियों के व्यापक नेटवर्क का लाभ उठाने की सिफारिश की।सहकारिता क्षेत्र के पुराने जानकार अमित शाह सहकारिता क्षेत्र के विकास में बाधा डालने वाली वजहों से अच्छी तरह परिचित हैं। इन बाधाओं में PACS के विविधीकरण की कमी थी, जिसने उन्हें लगभग अव्यवहार्य बना दिया।। श्री शाह ने PACS के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया, वह उनके बायलॉज यानी उप-नियमों में बदलाव लाना था। PACS की समस्याओं से छुटकारे के लिए मॉडल बायलॉज लाकर उन्हें बहुउद्देश्यीय बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इससे उन्हें अपने व्यवसाय को 25 से अधिक व्यावसायिक गतिविधियों से जोड़ कर विविधता लाने में मदद मिली है। अब वे कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के रूप में काम कर रहे हैं, जो ग्रामीण भारत में 300 से अधिक ई-सेवाएं, जैसे - बैंकिंग, बीमा, आधार नामांकन/अपडेशन, स्वास्थ्य सेवाएं, PAN कार्ड और IRCTC/बस/हवाई टिकट आदि सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं। अब तक 35,000 से अधिक PACS ने ग्रामीण नागरिकों को CSC सेवाएं प्रदान करना शुरू कर दिया है। साथ ही, अब उन्हें प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र (PMKSK), जल समितियों, LPG वितरकों, खुदरा पेट्रोल/डीजल दुकानों, किसान उत्पादक संगठनों (FPO) आदि के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाया जा रहा है। PACS अब गांवों में सस्ती दरों पर गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाओं के वितरण के लिए प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्र (PMBJAK) के रूप में भी काम कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण आबादी के लिए सस्ती दवाएं उपलब्ध कराते हुए आय का एक और स्रोत पैदा हो रहा है। ये सभी प्रयास PACS की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए किए जा रहे हैं।सहकारिता मंत्रालय का अगला महत्वपूर्ण कार्य इस क्षेत्र में लोगों का विश्वास जीतना था, जो दशकों से कुप्रबंधन से ग्रस्त था। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए 63,000 PACS का कम्प्यूटरीकरण किया जा रहा है। अब तक 23 हजार से अधिक PACS को एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग (ERP) सॉफ्टवेयर के साथ एकीकृत किया जा चुका है। PACS के कम्प्यूटरीकरण से उन्हें सीधे राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) से जोड़ा जा सकेगा। कॉमन अकाउंटिंग सिस्टम (CAS) और मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (MIS) से संचालन में एकरूपता आएगी। इससे PACS संचालन में जनता का विश्वास बढ़ेगा।सहकारिता क्षेत्र में हुई अनूठी पहलों से यह क्षेत्र अब नए आत्मविश्वास के साथ पूरे देश में संगठित रूप में काम कर रहा है, जो इसके लिए बहुत फायदेमंद है। सहकारिता मंत्री अमित शाह ने सहकारी क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों से जिला सहकारी बैंकों में बैंक खाते खोलने का आह्वान किया है ताकि उन्हें व्यवहार्य बनाया जा सके। उनके अनुसार, सहकारी समितियों के बीच सहयोग (Cooperation amongst Cooperatives) एक मजबूत आर्थिक सिद्धांत है जो मजबूत सहकारी क्षेत्र के निर्माण के लिए ज़रूरी है। साल 2024 में सहकारिता मंत्रालय का दूसरी बार कार्यभार संभालते हुए अमित शाह ने जमीनी स्तर पर नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करके इस क्षेत्र को मजबूत करने का संकल्प लिया है। उन्होंने कहा था कि उनके पिछले कार्यकाल में नीतिगत ढांचा बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया था और वर्तमान कार्यकाल में उनकी प्राथमिकता इन नीतियों को जमीनी स्तर तक ले जाने की होगी।सहकारिता मंत्रालय द्वारा की गई सबसे महत्वपूर्ण पहल में से एक सहकारी क्षेत्र में ‘विश्व का सबसे बड़ा विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण कार्यक्रम’ है। इस योजना का उद्देश्य PACS स्तर पर अनाज भंडारण के लिए विकेंद्रीकृत गोदाम, कस्टम हायरिंग सेंटर, प्राथमिक प्रसंस्करण इकाइयाँ और अन्य कृषि अवसंरचनाएँ बनाना है। कृषि अवसंरचना कोष (AIF), कृषि विपणन अवसंरचना (AMI), कृषि यंत्रीकरण पर उप-मिशन (SMAM), प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों का औपचारिकीकरण (PMFME) आदि सरकार की विभिन्न योजनाओं को मिलाकर इस योजना का उद्देश्य देश के लिए एक विशाल भंडारण क्षमता का निर्माण करना है। इससे खाद्यान्न की बर्बादी और परिवहन लागत में कमी आएगी, किसानों को उनकी उपज के बेहतर दाम मिलेंगे और विभिन्न कृषि जरूरतों को PACS स्तर पर ही पूरा किया जा सकेगा।चूंकि PACS ग्रामीण विकास की रीढ़ हैं, इसलिए इनके सुदृढ़ीकरण और पुनरुद्धार से बहुत जल्द ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास को बढ़ावा मिलेगा। PACS से जुड़ी गतिविधियों के बढ़ने से जहां मौसमी बेरोजगारी खत्म होने की उम्मीद है, वहीँ इससे करीब 1 लाख PACS से सीधे जुड़े 13 करोड़ किसानों को विशेषरूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय सृजन में फायदा होगा।***
- लेखक- विनोद के. पॉलस्वच्छता, सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक बुनियादी उपाय है। स्वच्छता से डायरिया, हैजा, टाइफाइड, हेपेटाइटिस, कृमि संक्रमण एवं मलाशय संबंधी रोग जैसी जल-जनित बीमारियों के साथ-साथ कुपोषण का खतरा कम हो जाता है। वर्ष 2012 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के एक अध्ययन में यह अनुमान लगाया गया था कि स्वच्छता में निवेश किए गए प्रत्येक अमेरिकी डॉलर के एवज में स्वास्थ्य संबंधी लागत में कमी, अधिक उत्पादकता और असामयिक मौतों में कमी के रूप में 5.5 अमेरिकी डॉलर के बराबर का लाभ मिलता है।भारत में स्वच्छता का इतिहास बहुत पुराना है और इसकी शुरुआत उस सिंधु घाटी सभ्यता से होती है, जहां शौचालय निर्माण एवं अपशिष्ट प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग किया जाता था। हमारे शास्त्रों में कहा गया है– ‘स्वच्छे देहे स्वच्छचित्तं, स्वच्छचित्ते स्वच्छज्ञानम्’ यानी स्वच्छ शरीर में शुद्ध मन का निवास होता है और शुद्ध मन में सच्चे ज्ञान का निवास होता है।इस समृद्ध विरासत के बावजूद, व्यापक स्वच्छता की दिशा में भारत की यात्रा चुनौतियों से भरी रही है। वर्ष 1981 की जनगणना के समय तक, मात्र एक प्रतिशत ग्रामीण घरों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध थी। इस हकीकत ने भारत सरकार द्वारा विभिन्न स्वच्छता कार्यक्रमों- केन्द्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम, संपूर्ण स्वच्छता अभियान और निर्मल भारत अभियान- के शुभारंभ का मार्ग प्रशस्त किया। इन सभी कार्यक्रमों की सहायता से ग्रामीण इलाकों में स्वच्छता कवरेज 39 प्रतिशत तक पहुंच गया।दुनिया भर में होने वाले खुले में शौच का लगभग 60 प्रतिशत बोझ भारत पर था। यहां 50 करोड़ से अधिक लोग खुले में शौच करते थे। हमारी महिलाओं के सामने अधेरे में अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने और अपनी गरिमा एवं सुरक्षा बनाए रखने की दुविधा थी।इसी पृष्ठभूमि में, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पांच वर्षों में ग्रामीण भारत को खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) बनाने के लक्ष्य के साथ 2014 में स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) की शुरुआत की थी। भारत ने 2 अक्टूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर यह उपलब्धि हासिल कर ली। उन पांच महत्वपूर्ण वर्षों के दौरान, ग्रामीण स्वच्छता कवरेज बढ़कर शत-प्रतिशत हो गया।इस मिशन के तहत, 2014 से 1.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक के सार्वजनिक निवेश के साथ 11.7 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण किया गया है। यह महज परिसंपत्ति निर्माण की एक कवायद भर नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसा राष्ट्रव्यापी आंदोलन था जिसने व्यवहार में परिवर्तन से संबंधित एक ठोस क्रांति के साथ बुनियादी ढांचे के विकास को मिलाकर एक अरब से अधिक लोगों को प्रेरित किया। इसकी पहचान एक 'जन आंदोलन' के तौर पर थी और यह शायद व्यवहार में परिवर्तन से संबंधित दुनिया की सबसे बड़ी कवायद थी। बच्चों, महिलाओं, पुरुषों, समुदाय के नेताओं, नागरिक समाज और सरकारी मशीनरी ने एकजुट होकर काम किया। स्वच्छता से जुड़े संदेश हर माध्यम से लोगों तक पहुंचे। मशहूर हस्तियों ने इस सामूहिक सुर में सुर मिलाया। ग्राम-स्तर के स्वयंसेवक ('स्वच्छाग्रही') ज़मीनी स्तर पर परिवर्तन के चैंपियन बन गए। प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों, बैठकों, ‘मन-की-बात’ में किए जाने वाले वार्तालापों और स्थानों एवं परिसरों की सफाई के आदर्श कार्यों के माध्यम से देश का नेतृत्व किया और लोगों को प्रेरित किया।एसबीएम चरण-I की सफलता के बाद, चरण-II की शुरुआत की गई। इस चरण का उद्देश्य ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन, परिदृश्य स्वच्छता और समग्र ग्रामीण स्वच्छता के व्यापक पहलुओं का समाधान करते हुए ओडीएफ संबंधी उपलब्धियों को बनाए रखना है। वर्ष 2024-25 तक, सभी गांवों को स्थायी तौर-तरीकों और बेहतर स्वच्छता की विशेषता से लैस ओडीएफ प्लस मॉडल में बदलने का लक्ष्य है। इस मिशन का अगला लक्ष्य संपूर्ण स्वच्छता है- जिसके लिए देश के प्रत्येक नागरिक, समुदाय और संस्थान की ओर से निरंतर समर्पण की आवश्यकता होगी।शीर्ष अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन सार्वजनिक स्वास्थ्य पर एसबीएम के व्यापक प्रभाव को रेखांकित करता है, खासकर शिशु मृत्यु दर को कम करने के मामले में। ‘स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण और शिशु मृत्यु दर’ शीर्षक वाले इस अध्ययन में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (यू5एमआर) के रुझानों से संबंधित 10 वर्षों की अवधि (2011-20) में 35 भारतीय राज्यों और 640 जिलों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। लेखकों ने शौचालय की बढ़ती सुलभता और बाल मृत्यु दर में गिरावट के बीच एक मजबूत संबंध का दस्तावेजीकरण किया है। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि एसबीएम के बाद जिला स्तर पर शौचालयों की सुलभता में प्रत्येक 10 प्रतिशत अंक की वृद्धि से जिला स्तर पर आईएमआर में 0.9 अंक और यू5एमआर में औसतन 1.1 अंक की कमी आई है। एक सीमा प्रभाव का भी सबूत है, जिसमें जिला स्तर पर 30 प्रतिशत (और उससे अधिक) का शौचालय कवरेज आईएमआर में 5.3 अंक और प्रति हजार जीवित जन्मों पर यू5एमआर में 6.8 अंक की कमी के समतुल्य है। लेखकों का अनुमान है कि एसबीएम के कारण बड़े पैमाने पर शौचालय की सुलभता ने सालाना 60,000- 70,000 शिशु मृत्यु को रोकने में योगदान दिया है।हालांकि, यहां इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह मात्र प्रभाव संबंधी अध्ययन भर नहीं है, जो एसबीएम की परिवर्तनकारी भूमिका पर प्रकाश डालता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (2018) के अनुसार, 2014 और 2019 के बीच डायरिया से होने वाली 3,00,000 से अधिक मौतों को रोकने में एसबीएम की अहम भूमिका रही है। बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (2017) ने बताया कि गैर-ओडीएफ गांवों की तुलना में ओडीएफ वाले इलाकों के बच्चों में वेस्टिंग के मामले 37 प्रतिशत कम थे, जो इस बात की पुष्टि करती है कि स्वच्छता कैसे बचपन के पोषण पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। ओडीएफ गांवों के बच्चों में डायरिया के मामले लगभग एक तिहाई कम थे। वर्ष 2017 में एक अध्ययन में, यूनिसेफ ने अनुमान लगाया कि 93 प्रतिशत महिलाएं घर में शौचालय उपलब्ध होने के बाद सुरक्षित महसूस करती हैं, जो महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को बढ़ाने में एसबीएम की भूमिका को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, इस अध्ययन में किए गए आर्थिक विश्लेषण से पता चला कि ओडीएफ गांवों में प्रत्येक परिवार ने स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की अपेक्षाकृत कम लागत और बचाए गए जीवन के आर्थिक मूल्य एवं समय की बचत की दृष्टि से सालाना लगभग 50,000 रुपये की बचत की।स्वच्छता एवं स्वास्थ्य के बीच के संबंध को देखते हुए, एसबीएम से हासिल हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी लाभ अपरिहार्य हैं। हाल के अध्ययन से हमें जो जानकारी मिली है, वह शौचालय की सुलभता के कारण बच्चों के जीवित रहने की संभावनाओं में सुधार का एक ठोस परिमाण है। राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता से संबंधित बदलाव निश्चित रूप से वयस्कों में जल-जनित संक्रमण को कम करने के साथ-साथ संभवतः रोगाणुरोधी प्रतिरोध के बोझ को भी कम करने में प्रभाव डालेगा। इसका बचपन में स्टंटिंग एवं विकास पर भी निरंतर प्रभाव माना जाता है। आईसीएमआर और शिक्षा जगत को एसबीएम के इन आयामों पर वस्तुनिष्ठ अध्ययन करना चाहिए।स्वच्छ भारत मिशन इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि समर्पण, सहयोग, योजना, शानदार कार्यान्वयन और निरंतर जन आंदोलन के जरिए क्या कुछ हासिल किया जा सकता है। एसबीएम के 4पी वाले मंत्र- राजनीतिक इच्छाशक्ति, सार्वजनिक वित्त, साझेदारी और जनभागीदारी- के साथ-साथ अनुनय, इस कार्यक्रम की सफलता एवं प्रसार में सहायक रहे हैं। यह ‘रणनीतिक पैकेज’ देश में और विदेश में अन्य सामाजिक परिवर्तन मिशनों के लिए एक मॉडल है।अब जबकि हम विकसित भारत @2047 की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, हमें स्वच्छता और साफ-सफाई के मामले में वैश्विक स्तर पर अग्रणी देश के रूप में उभरने की जरूरत है। व्यवहार में बदलाव को बनाए रखने, निर्मित शौचालयों का निरंतर उपयोग सुनिश्चित करने और अपशिष्ट प्रबंधन के उन्नत उपायों को समन्वित करने की प्रतिबद्धता अटल रहनी चाहिए। स्वच्छता एक ऐसा साझा मूल्य बनना चाहिए, जिसके स्वामित्व और पालन की जिम्मेदारी हम सभी को उठानी चाहिए।यह मिशन अगले महीने गांधी जयंती पर अपनी 10वीं वर्षगांठ मनाएगा। एसबीएम के एक दशक की अवधि में हमें अभूतपूर्व लाभ हुए हैं- स्वच्छ पर्यावरण, महिलाओं की गरिमा एवं सुरक्षा, जीवनयापन में आसानी, घरेलू बचत और हमारी परंपरा के अनुरूप स्वच्छता की संस्कृति से हम समृद्ध हुए हैं। अब हम सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और जीवन बचाने में एसबीएम की एक मजबूत छाप भी देख रहे हैं।इस नेक मिशन की सफलता वास्तव में हर भारतीय के लिए गर्व की बात है।(डॉ. विनोद पॉल नीति आयोग के सदस्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
- लेखक- चिराग पासवान, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रीभोजन का महत्व बुनियादी जीविका से कहीं बढ़कर है। यह हमारी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक गतिशीलता को प्रतिबिम्बित करते हुए हमारे त्योहारों, सामाजिक समारोहों और अनुष्ठानों में प्रमुख भूमिका निभाता है। आर्थिक रूप से, खाद्य उद्योग विकास को गति देता है, रोजगार के अवसरों का सृजन करता है तथा ग्रामीण एवं कृषि संबंधी विकास को बढ़ावा देता है। यह घरेलू खपत और निर्यात दोनों के माध्यम से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। अपनी स्वतंत्रता के 78वें वर्ष में भारत जैसे-जैसे विकसित भारत के विजन की ओर बढ़ रहा है, खाद्य सुरक्षा और संरक्षा को आगे बढ़ाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाले भोजन का संदूषित पदार्थों से सुरक्षित होना तथा भोजन की हानि एवं बर्बादी को कम से कम किया जाना सुनिश्चित करना शामिल है, ताकि सभी को पर्याप्त, पौष्टिक भोजन की उपलब्धता की गांरटी मिल सके।खाद्य सुरक्षा और निरंतरता बढ़ाने के लिए खाद्य पदार्थों, खासकर फलों और सब्जियों जैसे जल्दी खराब होने वाले पदार्थों की हानि और बर्बादी को कम करना बहुत जरूरी है। इससे हमारे किसानों के लिए लाभकारी दाम सुनिश्चित करने में भी मदद मिलती है।इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों काव्यापार बढ़ता है, प्रभावी खाद्य सुरक्षा प्रबंधन और भी महत्वपूर्ण होता जाता है। कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में आयात होने वाले खाद्य पदार्थों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुत कड़े खाद्य सुरक्षा नियम और कार्यप्रणालियां हैं। खाद्य सुरक्षा संबंधी घटनाओं के सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम, उपभोक्ता विश्वास में कमी और खाद्य आपूर्ति और मूल्य स्थिरता में व्यवधान जैसे गंभीर आर्थिक परिणाम हो सकते हैं। इसलिए, न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए, बल्कि आर्थिक विकास में सहयोग करने, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने तथा बाजार तक पहुंच बनाए रखने के लिए भी खाद्य सुरक्षा की रक्षा करना आवश्यक है।खाद्य सुरक्षा एवं संरक्षा की समस्याओं से निपटने और अपने सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में भारत की प्रतिबद्धता के अनुरूप, वर्ष 2024-25 के केंद्रीय बजट में एमएसएमई क्षेत्र में 50 बहु-उत्पाद खाद्य विकिरण इकाइयों की स्थापना के लिए धनराशि आवंटित की गई है। यह खाद्य सुरक्षा और संरक्षा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है क्योंकि खाद्य विकिरण प्रौद्योगिकी कृषि खाद्य उत्पादों की शेल्फ लाइफ और सुरक्षा में इजाफा करती है, जिससे उनका उपभोक्ताओं तक उपयुक्त स्थिति में पहुंचना तथा उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में खाद्य हानि का कम होना सुनिश्चित होता है।खाद्य विकिरण में खाद्य पदार्थों को, चाहे वे पैक किए गए हों या बल्क में, सावधानीपूर्वक नियंत्रित वातावरण में आयनकारी विकिरण के संपर्क में लाना शामिल है। यह पद्धति हानिकारक सूक्ष्मजीवों को नष्ट करके खाद्य जनित बीमारियों के जोखिम को प्रभावी ढंग से कम करती है। यह समय से पहले पकने, फुटाव या अकुरण में देरी करके खाद्य हानि को कम करते हुए क्षय की प्रक्रिया को धीमा करके और उसमें खराबी उत्पन्न करने वाले जीवों को नष्ट करके खाद्य पदार्थों को खराब होने से भी बचाती है। यह खाद्य उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने में रासायनिक परिरक्षकों की आवश्यकता को भी कम करती है, जिससे अधिक टिकाऊ खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में योगदान मिलता है। विकिरण प्रसंस्करण में आमतौर पर अपेक्षित प्रभाव प्राप्त करने के लिए केवल एक एक्सपोज़र ट्रीटमेंट की आवश्यकता होती है, जो प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करता है, खाद्य सुरक्षा पद्धतियों को सरल बनाता है, और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में लागत में कमी लाने में योगदान देता है।हालांकि खाद्य संरक्षण के लिए विकिरण के उपयोग की अवधारणा कोई नई नहीं है- सदियों से संरक्षण के लिए फल, सब्जियां, वनस्पति, मांस, मछली आदि को धूप में सुखाने जैसे पारंपरिक तरीकों का उपयोग किया जाता रहा है- संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के संयुक्त खाद्य मानक कार्यक्रम के अंतर्गत कोडेक्स एलिमेंटेरियस आयोग द्वारा वैश्विक मानक स्थापित किए जाने पर खाद्य विकिरण प्रौद्योगिकी के प्रति आधुनिक दिलचस्पी बढ़ी।खाना पकाने की तरह ही खाद्य विकिरण भी सभी पहलुओं में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का सुरक्षित और प्रभावी तरीका है। इसे खासकर अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे उन्नत खाद्य सुरक्षा मानकों वाले देशों में व्यापक रूप से अपनाया गया है, जहां इसका घरेलू और निर्यात दोनों ही तरह के बाजारों में बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। इसके प्रभाव का उल्लेखनीय उदाहरण 2012 का समझौता है, जिसने 20 साल के प्रतिबंध के बाद भारतीय आमों को अमेरिका को निर्यात करने की अनुमति दी। यह सफलता भारत द्वारा कीटों के खतरे को खत्म या काफी हद तक कम करने के लिए निर्यात से पहले अपने आमों को विकिरणित करने पर सहमत होने, फलस्वरूप अमेरिका की घरेलू कृषि की रक्षा होने से हासिल हुई।भारत ने भी समूचे देश में 34 विकिरण प्रसंस्करण सुविधाएं स्थापित करते हुए उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है। इनमें से 16 सुविधाओं को एमओएफपीआई की सहायता प्राप्त होने सहित इस बुनियादी ढांचे को विकसित करने में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यद्यपि यह प्रगति सराहनीय है, लेकिन सुविधाओं की संख्या और वितरण का विस्तार करने से हमारे जीवंत कृषि खाद्य बाजार की बढ़ती मांगों को पूरा करने की हमारी क्षमता में और वृद्धि होगी।हालांकि, खाद्य विकिरण सुविधाओं की व्यापक कमीशनिंग उच्च पूंजीगत लागतों से अवरुद्ध है। 1एमसीआई कोबाल्ट 60 सोर्स युक्त एक विकिरण सुविधा स्थापित करने के लिए भूमि और अतिरिक्त बुनियादी ढांचे की लागतों के बिना लगभग 25 से 30 करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होती है। इसकी कमीशनिंग प्रक्रिया में प्रस्ताव की जांच, अनुमोदन, साइट क्लीयरेंस, संयंत्र का निर्माण, स्रोत स्थापना, सुरक्षा आकलन और मार्गदर्शन, पर्यवेक्षण, कमीशनिंग और विकिरण स्रोतों के सामयिक प्रतिस्थापन सहित निरंतर रखरखाव जैसे कई महत्वपूर्ण चरण शामिल हैं। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड जैसे प्रमुख संगठन इस प्रक्रिया का निरीक्षण करते हैं।इन सुविधाओं से संबंधित शुरुआती उच्च पूंजीगत लागतों के बावजूद, यहां निवेशकों के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों तरह के बाजारों में सुरक्षित, लंबे समय तक चलने वाले खाद्य उत्पादों की बढ़ती मांग निवेश के लाभप्रद अवसर प्रस्तुत करती है। खाद्य सुरक्षा संवर्धित करने और शेल्फ लाइफ बढ़ाने की क्षमता खाद्य विकिरण सुविधाओं को खाद्य अपशिष्ट में कमी लाने और कड़े निर्यात मानकों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण बनाती है। वर्ष 2025-26 तक भारतीय खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के 535 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की संभावना और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात की लगातार बढ़ती हिस्सेदारी के साथ, विकिरण सुविधाएं निवेश के आशाजनक अवसर प्रस्तुत करती हैं।खाद्य की बर्बादी में कमी लाने के उद्देश्य से बुनियादी ढांचे के विकास में सहायता करने के लिए खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) खाद्य विकिरण इकाइयों की स्थापना के लिए प्रति परियोजना 10 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता भी प्रदान करता है। अनुदान या सब्सिडी के रूप में प्रदान की जाने वाली यह सहायता फलों और सब्जियों सहित जल्दी खराब होने वाले उत्पादों को बचाने और उनकी स्वच्छता एवं शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए प्रदान की जाती है। केंद्रीय बजट 2024-25 में घोषणा के बाद, एमओएफपीआई ने एकीकृत कोल्ड चेन और मूल्य संवर्धन अवसंरचना (कोल्ड चेन योजना) के तहत बहुउत्पाद खाद्य विकिरण इकाइयों की स्थापना के लिए उद्यमियों से अभिरुचि की अभिव्यक्ति आमंत्रित की हैं।खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और जल्दी खराब होने वाले उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने में खाद्य विकिरण की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए, भारतीय खाद्य आपूर्ति श्रृंखला और कृषि खाद्य निर्यात क्षेत्र की बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए हमारे बुनियादी ढांचे का विस्तार करने की सख्त जरूरत है। हम निवेशकों और उद्यमियों से आग्रह करते हैं कि वे खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा प्रदान की जाने वाली वित्तीय सहायता का उपयोग करके अतिरिक्त विकिरण सुविधाएं स्थापित करने के इस अवसर का लाभ उठाएं। विकिरण सुविधाओं में निवेश करने से खाद्य सुरक्षा बढ़ेगी, बर्बादी में कमी आएगी और समूचे भारत में खाद्य सुरक्षा में सुधार होगा, साथ ही हमारे किसानों के लिए बेहतर दाम भी सुनिश्चित होंगे। भारत के खाद्य उद्योग में पूरी तरह बदलाव लाने के लिए हमारे साथ जुड़िए- आपका निवेश टिकाऊ कृषि के भविष्य को गति देगा और उन्नतिशील अर्थव्यवस्था में योगदान देगा।
- लेखक - रवनीत सिंह बिट्टू, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्रीहमारे देश की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भारत का खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र एक प्रकाश-पुंज की तरह है, जो विकसित भारत की दिशा में हमारे द्वारा उठाए जा रहे कदमों के रूप में प्रतिबिम्बित होता है। अब यह क्षेत्र केवल अर्थव्यवस्था में योगदानकर्ता भर नहीं रह गया है, बल्कि तेजी से भारत की विकास गाथा का आधार बनता जा रहा है। माननीय प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व में नीतियों, पहलों और बुनियादी ढांचे के विकास के बेहतरीन मिश्रण ने इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है, जिससे यह वैश्विक मंच पर एक मजबूत ताकत बनकर उभरा है। वर्तमान में भारत 3.7 ट्रिलियन डॉलर वाली समृद्ध अर्थव्यवस्था होने का दावा करता है, जिसका महत्वाकांक्षी लक्ष्य 2047 में देश की स्वतंत्रता की शताब्दी तक 30-35 ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनना है।भारत में हो रहे बदलावों के मूल में इसकी समृद्ध कृषि-जलवायु विविधता है, जो हमारे किसानों को विभिन्न प्रकार की विशिष्ट फसलें उगाने में सक्षम बनाती है। दालें, मोटे अनाज, दूध, गेहूं, चावल तथा फलों और सब्जियों के उत्पादन में वैश्विक स्तर पर अग्रणी देश होने के रूप में, भारत के पास मूल्य वर्धन के लिए संसाधनों का अद्वितीय आधार मौजूद है। हमारे मेहनतकश किसानों द्वारा सावधानीपूर्वक पोषित इस कृषि प्रचुरता ने नवाचार और उद्यमिता के दौर को जन्म दिया है, जिससे उन्नतिशील खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का उदय हुआ है।यह क्षेत्र भारत के आर्थिक विकास का आधार बन चुका है, जो रोजगार के अवसरों के सृजन, तकनीकी प्रगति और बाजार के नए अवसरों के निर्माण के माध्यम से विकास को गति दे रहा है। भारत शीर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बड़ी और सबसे युवा कामकाजी आबादी होने का भी दावा करता है, जिससे इस महत्वपूर्ण परिवर्तन को और बढ़ावा मिलता है। उन्नत प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके, इस उद्योग ने फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने, उत्पाद की शेल्फ लाइफ बढ़ाने और किसानों को उनके प्रयासों के लिए बेहतर रिटर्न दिलाना सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।भारत का खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र जैसे-जैसे विकसित हो रहा है, यह न केवल गुणवत्ता के अंतर्राष्ट्रीय मानकों की कसौटी पर खरा उतर रहा है, बल्कि वैश्विक उपभोक्ताओं की लगातार बदलती पसंद और प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिए अपनी पेशकशों में विविधता भी ला रहा है। इस प्रकार कृषि और खाद्य प्रसंस्करण के बीच का घनिष्ठ सामंजस्य आर्थिक प्रगति के शक्तिशाली साधन का रूप ले चुका है। यह इस बात को रेखांकित करता है कि हमारे किसान और कृषि देश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और यह सुनिश्चित करते हुए कि भारत के कृषि उत्पाद दुनिया के कोने- कोने में संवर्धित मूल्य और गुणवत्ता के साथ पहुंचे। ऊर्जावान और युवा कार्यबल द्वारा समर्थित इस एकीकरण के माध्यम से, हम इस सशक्त, वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी क्षेत्र के उद्भव का साक्षी बन रहे हैं जो भारत को एक समृद्ध और टिकाऊ भविष्य की ओर ले जाने के लिए तत्पर है।एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में, कोविड-19 महामारी ने इस क्षेत्र के प्रभावशाली लचीलेपन को दर्शाया, जो प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग के अनुरूप तेजी से अनुकूलित हुआ। रेडी-टू-ईट, रेडी-टू-कुक और मूल्य-वर्धित उत्पादों की ओर धीरे-धीरे बदलाव ने खाद्य सुरक्षा और पोषण में इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया। भारत में खाद्य और पोषण सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से निपटने, सुविधा प्रदान करने, लंबी शेल्फ लाइफ और दूरदराज के क्षेत्रों तक बेहतर पहुंच प्रदान करने के लिए मजबूत खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र आवश्यक है। यह किसानों के लिए बेहतर दामों की प्राप्ति भी सुनिश्चित करते हुए और बाजार के अवसरों में वृद्धि करते हुए, जीडीपी पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है और आजीविका में सहायता प्रदान करता है।इस संबंध में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) सबसे अग्रणी है, जो पीएम किसान संपदा योजना (पीएमकेएसवाई) जैसे प्रमुख कार्यक्रमों का समर्थन कर रहा है। यह पहल अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे का विकास करके और खेत से लेकर खुदरा तक आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन को अनुकूलित करके इस क्षेत्र को बदल रही है। इन प्रयासों को पूर्णता प्रदान करते हुए प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों का औपचारिकीकरण (पीएमएफएमई) योजना प्रौद्योगिकी उन्नयन, क्षमता निर्माण और विपणन में सहायता के माध्यम से सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के विकास को बढ़ावा देती है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएस) वृद्धिशील बिक्री से जुड़े वित्तीय पुरस्कारों की पेशकश करके घरेलू विनिर्माण एवं निर्यात वृद्धि को और बढ़ावा देती है। इसके अतिरिक्त, नाबार्ड के अंतर्गत 2000 करोड़ रुपये का विशेष अवसंरचना कोष इस क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूती प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह समन्वित दृष्टिकोण खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और संबंधित क्षेत्रों को उन्नत बनाने के लिए एक व्यापक रणनीति को रेखांकित करता है, जो मजबूत, एकीकृत और दूरंदेशी विकास पथ सुनिश्चित करता है।भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और इसका जनसांख्यिकीय लाभांश खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए नई ऊंचाइयों को छूने के अनूठे और अभूतपूर्व अवसरों का सृजन करता है। सरकार के महत्वपूर्ण कर संबंधी प्रोत्साहनों, कारोबार करने में सुगमता की सुव्यवस्थित पहल और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास सहित दूरदर्शी व्यवसाय समर्थक सुधारों ने निवेश और विकास के लिए अनुकूल वातावरण को बढ़ावा दिया है। यह सहयोगपूर्ण परिदृश्य न केवल वैश्विक ध्यान आकर्षित करता है बल्कि भारत को खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में नवाचार और विस्तार के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी स्थापित करता है।वर्ष 2023 में पिछले संस्करण की शानदार सफलता के बाद, मंत्रालय 19 से 22 सितंबर 2024 तक वर्ल्ड फूड इंडिया के तीसरे संस्करण का आयोजन कर रहा है। इस आयोजन में खाद्य उद्योग के हर पक्ष से जुड़े हितधारक विचारों का आदान-प्रदान करने, अवसरों का अन्वेषण करने और इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के समग्र विकास में योगदान देने के लिए एक साथ आएंगे। यह एक अनोखा सम्मेलन होगा जिसमें दुनिया भर के खाद्य इकोसिस्टम से जुड़े निर्माता, उत्पादक, निवेशक, नीति-निर्माता और संगठन शामिल होंगे।वर्ल्ड फूड इंडिया 2024 एक ऐसा मंच है, जहां हितधारक नवाचारों का अन्वेषण करने, साझेदारी बनाने और टिकाऊ खाद्य भविष्य की दिशा में मार्ग प्रशस्त करने के लिए एकत्रित होते हैं। आइए, हम अपने सामने मौजूद अवसरों का लाभ उठाएं तथा अधिक समृद्ध और लचीली खाद्य प्रणाली की दिशा में ऐसी यात्रा की शुरुआत करें, जो मूल्य श्रृंखला में सभी हितधारकों को लाभान्वित करे। सामंजस्य के इस दौर में, हम न केवल एक उद्योग को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर रहे हैं, बल्कि एक ऐसे भविष्य के साझा विजन को भी अंगीकार कर रहे हैं जहां नवाचार, स्थिरता और समृद्धि हमारे देश के कोने-कोने का उत्थान करे।
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वन संरक्षण से महिला सशक्तिकरण तक : मां महामाया स्व-सहायता समूह की प्रेरणादायक यात्रा
• लक्ष्मीकांत कोसरिया, उप संचालकमुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने वन विभाग को महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए विशेष निर्देश दिए हैं। उन्होंने वन विभाग की विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार के सभी संभव प्रयास करने कहा है। वन उत्पादों से जुड़े कार्यों एवम अन्य आजीविका मूलक कार्यों में महिलाओं की अधिक से अधिक सहभागिता को प्रोत्साहित करने उन्हें प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान करने के निर्देश दिए हैं जिसके बेहद ही सुखद परिणाम देखने को मिल रहे हैं।छत्तीसगढ़ वन विभाग संयुक्त वन प्रबंधन के तहत वनांचल में रहने वाले ग्रामीणों को वन संरक्षण और प्रबंधन में सक्रिय रूप से शामिल कर आर्थिक सशक्तिकरण के मार्ग प्रशस्त करता है। संयुक्त वन प्रबंधन समितियां स्थानीय ग्रामीणों से मिलकर बनती हैं जो वन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं एवं वन संसाधनों के साझा उपयोग की अवधारणा से प्रेरित हैं। वन विभाग इन समितियों को प्रशिक्षण प्रदान करता है, जिससे वन पर निर्भर लोगो की आजीविका में सुधार हो सके। छत्तीसगढ़ के मरवाही वन मंडल में बसे छोटे से गांव मड़ई की 11 महिलाओं का मां महामाया स्वसहायता समूह ने यह साबित कर दिया है कि दृढ़ संकल्प और सही मार्गदर्शन से अपनी आय के स्त्रोतों में वृद्धि कर जीवन स्तर को ऊँचा किया जा सकता है। वन विभाग के सहयोग से इस समूह ने एक साधारण कृषि-वनीकरण की पहल को एक फलते-फूलते आर्थिक उद्यम में बदल दिया है। वन विभाग के मार्गदर्शन से एवं अपनी उद्यमिता से इस समूह की महिलाओं ने अब तक सात लाख रूपये से ज्यादा की आय अर्जित कर ली है। उनकी यह यात्रा न केवल आर्थिक समृद्धि की है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक सशक्तिकरण का भी प्रतीक है।इस यात्रा की शुरुआत वित्तीय वर्ष 2018-19 में माँ महामाया स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष मीरा बाई और सचिव सुमित्रा तथा समिति की सदस्यों केवल्या, बुधकुंवर, रमेशिया, मनीषा, सेमकुंवर, मैकिन, लौंग कुंवर, सुखंता, और सुक्षेन ने साथ मिलकर, पथर्रा (रुमगा) राजस्व क्षेत्र की 5 हेक्टेयर भूमि में 2,000 आम के पेड़ लगाए। इन महिलाओं ने दशहरी, लंगड़ा, आम्रपाली, चौसा, बॉम्बे ग्रीन जैसी लोकप्रिय किस्मों के साथ-साथ स्थानीय किस्मों के भी आम के पेड़ लगाए। ग्रीन इंडिया मिशन के तहत कृषि वानिकी को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया यह कदम केवल एक वृक्षारोपण अभियान नहीं था बल्कि हरित आवरण को बढ़ाने, मृदा नमी संरक्षण में सुधार करने, और स्थानीय समुदाय के लिए स्थायी रोजगार के अवसर प्रदान करने की एक सुनियोजित रणनीति थी।समूह की दीदियों ने बताया कि शुरुआती वर्षों में संघर्ष और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पहले वर्ष में आम के पौधों की देखभाल के लिए उन्हें जमीन की गहरी जुताई करनी पड़ी। जिससे पौधों की जड़ें मजबूत हों और मिट्टी में नमी बनी रहे। इस दौरान उन्होंने सब्जियों की खेती नहीं की, क्योंकि नए आम के पौधों के लिए और भी देखभाल की जरूरत थी। हालांकि कोई मुनाफा नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वर्ष 2019-20 में, जब आम के पेड़ थोड़े बड़े हुए, तो उन्होंने अंतरवर्ती स्थानों में सब्जियां उगानी शुरू कीं। बीन्स, टमाटर, पत्तागोभी, फूलगोभी, मटर, मिर्च, भिंडी, प्याज, सूरन, अदरक, हल्दी, लौकी, करेला, और कद्दू जैसी सब्जियों की खेती से होने वाली आय का उपयोग उन्होंने समूह की जरूरतों को पूरा करने और अगले मौसम के लिए बीज और खाद खरीदने में किया।वर्ष 2020-21 और 2021-22 के वर्षों में समूह ने आम के पेड़ों की देखभाल के साथ-साथ सब्जियों की खेती का विस्तार किया। उन्होंने अपने बगीचे में विविध प्रकार की सब्जियां उगाईं और उनकी बिक्री से आय अर्जित की। इस दौरान उन्होंने आम के पौधों से फूल हटाने का कठिन निर्णय लिया ताकि पेड़ों की वृद्धि बेहतर तरीके से हो सके और भविष्य में अच्छी फसल मिल सके। वर्ष 2022-23 में समूह की मेहनत रंग लाई। आम के पेड़ पूर्ण रूप से विकसित हो गए और अच्छी फसल दी। उन्होंने 4,203 किलो आम को स्थानीय और बिलासपुर बाजारों में बेचा, जिससे उन्हें इस पहल की शुरुआत से अब तक 7 लाख रुपये से ज्यादा का मुनाफा हुआ। यह आर्थिक लाभ उनकी मेहनत, धैर्य और योजना का प्रत्यक्ष प्रमाण था।वर्त्तमान में भी मां महामाया स्वसहायता समूह ने 98 प्रतिशत जीवित पेड़ों की दर के साथ अपनी सफलता को बनाए रखा है। उनकी यह पहल न केवल स्थानीय रोजगार और आर्थिक लाभ को बढ़ावा दे रही है, बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता और महिला सशक्तिकरण का भी प्रतीक है। ग्रीन इंडिया मिशन के तहत, इस समूह की पहल गुड प्रैक्टिस का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस पहल ने यह सिद्ध किया है कि सही मार्गदर्शन और सामुदायिक सहयोग से कैसे ग्रामीण महिलाएं न केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकती हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। अपने वर्तमान कृषिवानिकी की उद्यमिता की सफलता से प्रेरित होकर यह स्व-सहायता की दीदियां सब्जियों और आमों के परिवहन के लिए ई-रिक्शा खरीदने पर विचार कर रही हैं। इसके अतिरिक्त भविष्य में वे आम के स्वाद में विशेषीकृत एक लघु आइसक्रीम निर्माण की इकाई स्थापित करने की योजना बना रही हैं, जिससे उनकी आय में और वृद्धि हो सके। मां महामाया स्वसहायता समूह की अध्यक्ष मीरा बाई ने कहा कि हम वन विभाग के निरंतर सहयोग के लिए आभारी हैं। उनकी मदद से हम न सिर्फ उच्च गुणवत्ता के आमों की सफलतापूर्वक खेती कर रहे हैं, बल्कि अंतरवर्ती रिक्त स्थानों में सब्जियों की भी खेती कर रहे हैं। इससे हमारी आय में बढ़ोतरी हुई है और हमारे समूह की महिलाएं सशक्त हुई हैं। साथ ही इस पहल ने आसपास के गांवों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। हमारे जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।मां महामाया स्वसहायता समूह की सफलता की यह कहानी न केवल आर्थिक उन्नति की मिसाल है, बल्कि एक स्थायी और समृद्ध भविष्य की दिशा में भी एक प्रेरक कदम है।






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