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तेल के दाम युद्ध से पहले के स्तर पर, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं

 नयी दिल्ली.  वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमत पश्चिम एशिया में तनाव शुरू होने से पूर्व के स्तर पर आ गयी है। इससे महंगाई का खतरा कम होने, आयात बिल घटने और सरकार की वित्तीय स्थिति में सुधार के साथ दुनिया के तीसरे सबसे बड़े कच्चा तेल आयातक भारत के लिए स्थिति काफी अनुकूल हो गयी है। वैश्विक मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत टूटकर लगभग 72-73 डॉलर प्रति बैरल, जबकि अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई है। इससे उस भू-राजनीतिक जोखिम के कारण बढ़ी हुई कीमत का असर खत्म हो गया है, जिसके कारण इस साल की शुरुआत में तनाव बढ़ने पर दाम 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। दोनों मानक अब फरवरी के आखिर के स्तर के करीब आ गए हैं। कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट के बावजूद बृहस्पतिवार को खुदरा ईंधन के दाम में कोई बदलाव नहीं हुआ। हाल ही में वैश्विक स्तर पर तेल के दाम में तेजी के दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी। हालांकि, उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के खुदरा ईंधन विक्रेताओं ने अब तक पेट्रोल पंप पर कीमतें कम नहीं की हैं। अधिकारियों ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र की तीन खुदरा ईंधन विक्रेता अभी पेट्रोल पर अच्छा विपणन मार्जिन कमा रहे हैं। हालांकि, डीजल की बिक्री से अब भी थोड़ा नुकसान हो रहा है। कंपनियों ने वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद लगभग ढाई महीने तक खुदरा कीमतें स्थिर रखी थीं और उसके बाद ही कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी की थी। उन्होंने कहा कि ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चा तेल बाजार में रोजाना होने वाले उतार-चढ़ाव के आधार पर तय नहीं की जाती हैं, बल्कि आमतौर पर पिछले दो सप्ताह या महीने की औसत तेल कीमतों के आधार पर तय की जाती हैं। इसके कारण, अगर अंतरराष्ट्रीय दरें कम बनी रहती हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में हाल की गिरावट का फायदा पेट्रोल पंप तक पहुंचने में समय लग सकता है। भारत जो कच्चा तेल खरीदता है, उसकी कीमत ईरान पर अमेरिका और इजाइल के हमले से एक दिन पहले 27 फरवरी को औसतन 71.17 डॉलर प्रति बैरल थी। इस हमले के जवाब में ईरान ने बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई की, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावी रूप से बंद हो गया। इस रास्ते से खाड़ी देशों से भारत जैसे देशों को तेल और गैस की आपूर्ति होती थी। पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी) के आंकड़ों के अनुसार, 24 जून को भारत में आयातित होने वाले कच्चे तेल की औसत कीमत 70.71 डॉलर प्रति बैरल थी। जून महीने के लिए, कच्चे तेल की औसत कीमत 86.31 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि फरवरी, 2026 में यह औसत 72.47 डॉलर प्रति बैरल थी। ब्रेंट क्रूड की कीमतें अब संघर्ष से पहले के स्तर के करीब आ गई हैं। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक हाल के उच्चतम स्तर से नीचे बनी रहती हैं, ईंधन बेचने वाली कंपनियों और सरकार पर यह दबाव बढ़ सकता है कि वे कुछ फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचाएं। ईंधन की कम कीमतें महंगाई के दबाव को और कम कर सकती हैं। यह गिरावट होर्मुज जलडमरूमध्य से टैंकर की आवाजाही सामान्य होने के बाद हुई है। इस रास्ते से दुनिया भर की तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा आता है। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि पिछले 24 घंटों में इस जलमार्ग से कम से कम दो करोड़ बैरल तेल गुजरा है और आपूर्ति का प्रवाह युद्ध से पहले के स्तर के करीब पहुंच गया है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की गिरावट का मतलब है कि उसके आयात बिल में सालाना अरबों डॉलर की बचत होगी और इससे चालू खाते के घाटे को कम करने में मदद मिलेगी। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से ईंधन, परिवहन और विनिर्माण लागत कम होने की उम्मीद है, जिससे खुदरा महंगाई का दबाव कम हो सकता है। इससे ऊर्जा सब्सिडी का बोझ भी कम हो सकता है और परिणामस्वरूप सरकारी वित्त में सुधार हो सकता है। तेल की कम कीमतें विमानन, पेंट, रसायन, लॉजिस्टिक और उपभोक्ता वस्तु जैसे क्षेत्र के लिए खास तौर पर फायदेमंद हैं, क्योंकि इनमें ईंधन और पेट्रोरसायन से बनी चीजें लागत का बड़ा हिस्सा होती हैं। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से डॉलर की मांग कम होती है, क्योंकि ऊर्जा आयात के लिए डॉलर की जरूरत होती है। इससे रुपये की स्थिति भी मजबूत होती है। तेल का बिल कम होने से आयातित महंगाई को काबू में रखने और घरेलू खपत को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है, जो भारत की आर्थिक वृद्धि के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भारतीय रिजर्व बैंक के लिए, अगर महंगाई काबू में रहती है, तो ऊर्जा की कम कीमतें 'उदार मौद्रिक नीति' बनाए रखने के पक्ष को और मजबूत कर सकती हैं। इससे आर्थिक गतिविधियों को और बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन बृहस्पतिवार के घटनाक्रम से कीमतें संघर्ष से पहले के स्तर पर लौट आई हैं। इससे तेल पर सबसे अधिक निर्भर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से भारत को राहत मिली है।

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