कमजोर मानसून से जल में घुलनशील उर्वरकों की मांग बढ़ सकती है: एसएफएआई
नयी दिल्ली. अनिश्चित मानसून इस खरीफ मौसम में घुलनशील उर्वरक (सॉल्युबल फर्टिलाइजर) उद्योग के लिए मांग बढ़ाने वाला कारक बन सकता है, लेकिन इन उर्वरकों की कीमतों में आई तेज वृद्धि मांग पर अधिक बड़ा असर डाल सकती है। उद्योग संगठन 'सॉल्युबल फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसएफएआई)' ने रविवार को यह बात कही। एसएफएआई के अध्यक्ष राजीब चक्रवर्ती ने कहा कि चीन द्वारा निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण आपूर्ति प्रभावित होने से पिछले एक वर्ष में प्रमुख कच्चे माल की कीमतों में 60 से 100 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा, "मौजूदा समय में कीमतें 60 से 100 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मोनो अमोनियम फॉस्फेट (एमएपी) की कीमत लगभग 1,000 डॉलर प्रति टन थी, जो अब बढ़कर 1,500 से 1,600 डॉलर प्रति टन हो गई है। चक्रवर्ती ने कहा, "प्रति टन 600 डॉलर की वृद्धि बहुत बड़ी बढ़ोतरी है।"
इस मौसम में उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि कीमतों में भारी वृद्धि के कारण खपत घटने की आशंका सबसे बड़ा जोखिम है। उन्होंने कहा, "जैसे ही कीमतें बहुत अधिक बढ़ जाती हैं, किसान इनका इस्तेमाल कम कर देते हैं। उन्होंने कहा कि कीमतों को नियंत्रित करना उद्योग के हाथ में नहीं है।
चक्रवर्ती ने कहा कि चीन द्वारा प्रमुख उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध और पश्चिम एशिया संकट के कारण भारत के लिए आयात प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि देश में जल में घुलनशील उर्वरकों का घरेलू उत्पादन बहुत कम है। ऐसे में आयात में कमी की भरपाई घरेलू स्तर पर करना संभव नहीं है। चक्रवर्ती ने कहा कि कीमतों में तेजी के बावजूद फिलहाल आपूर्ति की स्थिति चिंताजनक नहीं है, क्योंकि पिछले वर्ष का बचा हुआ भंडार उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि पिछले साल प्रमुख कृषि क्षेत्रों में अधिक बारिश और बाढ़ के कारण इन उर्वरकों की खपत कम रही थी। उन्होंने कहा, "फिलहाल मुझे कोई बड़ी समस्या नहीं दिख रही है।"
हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि यदि इस मौसम में मांग तेजी से बढ़ी तो आगे की आपूर्ति पर दबाव पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि भारत हर साल लगभग चार लाख टन जल में घुलनशील उर्वरकों का आयात करता है और यह मात्रा लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि चालू वित्त वर्ष में कुल आयात दो लाख से 2.5 लाख टन रहने का अनुमान है, जिसमें से जून तक लगभग एक लाख टन उर्वरक भारत पहुंच चुका है। इन उर्वरकों की अधिकांश खपत सितंबर से मार्च के बीच होती है। चक्रवर्ती ने कहा कि ऊंची कीमतों के कारण किसान कम कीमत वाले विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि कई किसान पहले ही सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) जैसे फॉस्फेट आधारित उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। हालांकि, इनमें फॉस्फोरस की मात्रा 20-22 प्रतिशत होती है, जबकि एमएपी में यह 61 प्रतिशत होती है, लेकिन इनकी कीमत काफी कम है। चक्रवर्ती ने कहा कि यदि किसान फिर से यूरिया और डीएपी जैसे पारंपरिक उर्वरकों का अधिक इस्तेमाल करने लगते हैं तो सरकार पर उर्वरक सब्सिडी का बोझ भी बढ़ेगा। चक्रवर्ती ने कहा कि यदि इस मौसम में वर्षा असमान रहती है तो जल में घुलनशील उर्वरकों की मांग बढ़ सकती है, क्योंकि इनके उपयोग में पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में काफी कम पानी लगता है। उन्होंने कहा कि कपास जैसी फसलों में, जहां सामान्यतः एक मौसम में दो बार इन उर्वरकों का छिड़काव किया जाता है, शुष्क मौसम बने रहने पर इनका उपयोग बढ़ सकता है। उन्होंने कहा, "यदि बारिश नहीं होगी तो पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगेंगी। ऐसे में किसान इन उर्वरकों का अधिक इस्तेमाल करेंगे।" उन्होंने कहा कि कृषि संकट की परिस्थितियों में विशेष प्रकार के उर्वरकों का उपयोग सामान्यतः बढ़ जाता है।









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