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डीपीआईआईटी ने फुटवियर उद्योग को दी बड़ी राहत, गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों में संशोधन

 नई दिल्ली। उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और घरेलू फुटवियर विनिर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से फुटवियर से जुड़े दो गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (क्यूसीओ) में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। नए प्रावधानों के तहत पुराने स्टॉक को बेचने की समय सीमा एक वर्ष बढ़ाकर 31 जुलाई 2027 कर दी गई है। साथ ही अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) के लिए हर साल 4,500 जोड़ी फुटवियर नमूनों के आयात की अनुमति भी दी गई है।

 डीपीआईआईटी द्वारा 12 जून 2026 को अधिसूचित संशोधनों के अनुसार, चमड़े तथा रबर एवं पॉलिमर सामग्री से बने फुटवियर से संबंधित गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों में बदलाव किया गया है। इसके तहत पुराने स्टॉक के निपटान की समय सीमा 31 जुलाई 2026 से बढ़ाकर 31 जुलाई 2027 कर दी गई है। सरकार का कहना है कि फुटवियर एक मौसमी उत्पाद है और इसका स्टॉक अक्सर एक बिक्री चक्र से अधिक समय तक आपूर्ति श्रृंखला में बना रहता है। ऐसे में अतिरिक्त समय मिलने से निर्माताओं, वितरकों और खुदरा विक्रेताओं को मौजूदा स्टॉक का व्यवस्थित तरीके से निपटान करने में सुविधा होगी। इसके बाद बाजार में केवल बीआईएस प्रमाणित फुटवियर की बिक्री सुनिश्चित करने का लक्ष्य है।
 संशोधित नियमों के तहत चमड़े और फुटवियर निर्माता अनुसंधान एवं विकास तथा अन्य गैर-व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए प्रति वर्ष 4,500 जोड़ी फुटवियर आयात कर सकेंगे। हालांकि, इन नमूनों की व्यावसायिक बिक्री नहीं की जा सकेगी। प्रत्येक नमूने पर स्पष्ट रूप से “बिक्री के लिए नहीं” अंकित होना अनिवार्य होगा और उपयोग के बाद उनका निर्धारित तरीके से निपटान करना होगा। निर्माताओं को इन आयातों का वर्षवार रिकॉर्ड भी रखना होगा, जिसे आवश्यकता पड़ने पर सरकार को उपलब्ध कराना होगा। सरकार के अनुसार यह छूट उत्पाद डिज़ाइन के मूल्यांकन, तकनीकी परीक्षण, दस्तावेज़ आधारित आकलन और भारत में स्थानीय उत्पादन के लिए आवश्यक नमूनों के परीक्षण में मदद करेगी। आयातित नमूनों का उपयोग केवल विक्रेता प्रस्तुति, डिज़ाइन मूल्यांकन और भारत में प्रतिकृति विकसित करने के लिए किया जा सकेगा।
 डीपीआईआईटी ने कहा कि ये संशोधन ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने, अनुपालन प्रक्रिया को सरल बनाने, नवाचार को प्रोत्साहित करने और गुणवत्ता मानकों से समझौता किए बिना उद्योग संचालन को सुगम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। यह पहल प्रधानमंत्री के “जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट” विनिर्माण दृष्टिकोण और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को मजबूत करेगी तथा भारत को गुणवत्तापूर्ण विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने में मदद करेगी।

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