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 राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्राप्त शारदा को  आंध्र साहित्य समिति ने पलकों पे बैठाया

 
-नैतिक शिक्षा पर आधारित कहानियों का पंद्रह भाषाओं में अनुवाद करने की योजना बनाई है शारदा ने
 टी सहदेव
भिलाई नगर। राष्ट्रीय फलक पर भिलाई तथा आंध्र समाज का नाम रोशन करने वाली सर्वोच्च राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित के शारदा को समाज के विभिन्न संगठनों ने पलकों पर बैठा लिया है। इस बार समाज के एक बड़े संगठन आंध्र साहित्य समिति ने बालाजी मंदिर के आंध्र भवन में शनिवार को भव्य समारोह आयोजित कर भिलाई की लाड़ली बिटिया के शारदा का आत्मीय अभिनंदन किया। उन्हें सम्मानित करने समिति के संस्थापक ए रमनाराव, कोषाध्यक्ष टीवीएन शंकर, तेलुगु सेना के प्रदेशाध्यक्ष नीलम चन्ना केशवलु, समाजसेविका बी पोलम्मा तथा पूर्व सभापति पी श्यामसुंदर राव खास तौर पर मौजूद थे। शारदा को शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार और उत्कृष्ट योगदान के लिए शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया था।
 बारह संगठनों ने किया सम्मान 
दिव्यांग शिक्षिका के शारदा मंच पर व्हील चेयर से पहुंचीं थीं। सबसे पहले आंध्र साहित्य समिति के पदाधिकारियों ने के शारदा का शॉल, स्मृति चिह्न, फूलमालाओं तथा पुष्पगुच्छ से सम्मान किया। उसके बाद अखिल भारतीय तेलुगु सेना, कलांजलि नाट्य एवं सांस्कृतिक संस्था, आंध्र महिला मंडली, आंध्र ब्राह्मण समाज, साईं नाथ जनसेवा समिति, प्रजा सेवा समिति, घंटसाला चैतन्य वेदिका, भिलाई रेड्डी संघ, भिलाई यादव समाज, श्रीकोदंडा रामालयम-हुडको तथा मां राज राजेश्वरी स्व सहायता समूह के सदस्यों ने उन्हें फूलमालाओं से लाद दिया। इस मौके पर उनके पिता के गुम्मड़िराव और माता के सावित्री का भी पुष्पमालाओं से सम्मान किया गया।
 छोटी उम्र में बड़ी उपलब्धि 
समिति के अध्यक्ष पीवी राव ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि के शारदा द्वारा शारीरिक चुनौतियों का सामना करते हुए इतनी छोटी सी उम्र में सर्वोच्च राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार पाना असाधारण बात है। उनकी इस उपलब्धि ने समूचे आंध्र समाज को गौरवान्वित किया है। सचिव पीएस राव ने कहा कि गणित जैसे जटिल विषय को वीडियो और स्व रचित पुस्तकों के माध्यम से आसान और दिलचस्प बनाना, निस्संदेह प्रशंसनीय‌ है। इनके कृतित्व से प्रेरणा प्राप्त कर छात्र शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ सकते हैं। सह सचिव बीए नायडु ने समारोह का संचालन करते हुए शिक्षिका शारदा के संघर्ष और सफलता की कहानी का जीवंत चित्रण किया। कार्यकारिणी सदस्य के लक्ष्मीनारायण ने आभार जताया। 
 संघर्ष की कहानी उन्हीं की जुबानी 
शिक्षिका शारदा अपने संघर्ष के दिनों को याद करके भावुक भी हो गईं। उन्होंने कहा कि एक सामान्य बच्चे का लालन-पालन आसान होता है, लेकिन मेरे जैसे दिव्यांग को पालना और शिक्षित करना चुनौतीपूर्ण होता है। दरअसल, यह सिर्फ मेरे संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि मेरे माता-पिता की संघर्ष-गाथा है। दिव्यांगता के कारण मेरे सामने जो चुनौतियां आईं, उन्हें मैं अवसर में बदला। एक समय ऐसा भी आया जब मेरे पैर काम नहीं कर रहे थे और एक हाथ निष्क्रिय भी हो गया था। स्थिति ऐसी हो गई थी कि मैं अपने हाथ से पानी का गिलास भी नहीं उठा सकती थी। मैं पूरी तरह टूट चुकी थी, लेकिन मेरे परिवार ने मेरे हौसलों को टूटने नहीं दिया। आज मैं जिस भी मुकाम पर हूं, उसके पीछे मेरे परिवार का बहुत बड़ा हाथ है। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में नैतिक मूल्यों के पतन से व्यथित शिक्षिका ने नैतिक शिक्षा पर आधारित कहानियों का 15 भाषाओं में अनुवाद करने की योजना भी बनाई है। इसके अलावा वे पचास एवार्डी शिक्षकों के सहयोग से विभिन्न राज्यों की समृद्ध संस्कृति को लेकर एक किताब भी लिखने वाली हैं, जिसका संपादन वे स्वयं ही करेंगी। 
 

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