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हौसले की लौ जलाइए उम्र, बीमारी और कठिनाइयां मान लेंगी हार

-डॉ. नीरज गजेंद्र
जब मनुष्य के भीतर हौसला मजबूत होता है, तब उम्र सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाती है। बीमारी एक चुनौती और कठिनाइयां जीवन की परीक्षा बन जाती हैं। क्योंकि वास्तविक शक्ति शरीर में नहीं, सोच में बसती है। और जहां सोच सकारात्मक, आशावान और उद्देश्यपूर्ण हो, वहां सीमाएं स्वतः ही टूटने लगती हैं। भारतीय दर्शन और पुराणों में मन की इस शक्ति को बार-बार रेखांकित किया गया है। कठोपनिषद कहता है कि उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। अर्थात उठो, जागो और श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति तक मत रुको। यह वाक्य युवाओं के साथ हर उस व्यक्ति के लिए है, जो जीवन की किसी भी अवस्था में हताशा से घिर गया हो। जब भीतर से उठने का संकल्प जागता है, तब उम्र, बीमारी और परिस्थितियां स्वयं पीछे हटने लगती हैं।
 पुराणों में राजा हरिश्चंद्र की कथा सत्य और अदम्य हौसले का प्रमाण बनती है। राजपाट, परिवार और सम्मान सब कुछ खो देने के बाद भी उन्होंने सत्य और धैर्य का साथ नहीं छोड़ा। परिस्थितियां कितनी ही कठिन क्यों न हों, मन का संकल्प यदि अडिग हो, तो जीवन की दिशा बदली जा सकती है। यही संदेश आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है, जब लोग छोटी-सी असफलता में भी टूटने लगते हैं।
 आध्यात्म हमें सिखाता है कि बीमारी शरीर को छू सकती है, आत्मा को नहीं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः। आत्मा न कटती है, न जलती है। जब मनुष्य इस सत्य को आत्मसात कर लेता है, तब बीमारी का भय भी कम होने लगता है। आशा, विश्वास और सकारात्मक सोच स्वयं एक औषधि बन जाती है, जो शरीर और मन दोनों को संबल देती है। हमारे पुराणों में वृद्धावस्था को कमजोरी नहीं, अनुभव और तपस्या का काल माना गया है। ऋषि-मुनि वन में रहकर भी समाज को दिशा देते थे। उनकी आयु अधिक थी, साधन सीमित और संकल्प असीम थे। यह दर्शाता है कि जीवन की सार्थकता उम्र से नहीं, उद्देश्य से तय होती है। जब उद्देश्य स्पष्ट हो, तब कठिनाइयां राह की बाधा नहीं, अपितु सीढ़ी बन जाती हैं।
 आशा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उसकी कोई सीमा नहीं होती। वह अंधकार में भी दीपक बनकर रास्ता दिखाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो आशा ईश्वर से जुड़ने का माध्यम है। जब मनुष्य कर्म करता है और फल को ईश्वर पर छोड़ देता है, तब चिंता स्वतः कम हो जाती है। यही भाव कर्मयोग का मूल यानि पूरी निष्ठा से प्रयास और पूर्ण विश्वास के साथ आगे बढ़ना है। आज के दौर में जब तनाव, रोग और अनिश्चितता जीवन का हिस्सा बन चुके हैं, तब सकारात्मक सोच किसी विलासिता नहीं, आवश्यकता बन गई है। हर सुबह यदि मन में यह भाव हो कि मैं कर सकता हूं, मेरे भीतर सामर्थ्य है, तो वही भाव दिनभर की ऊर्जा तय करता है। जैसे-जैसे सोच बदलती है, वैसे-वैसे परिस्थितियां भी बदलने लगती हैं।
जीवन का सार यही है कि हौसला भीतर से जागे। क्योंकि जब हौसला मजबूत होता है, तब उम्र, बीमारी और कठिनाई तीनों पीछे रह जाते हैं। आशाएं अनंत हैं, सोच असीम है और मनुष्य की आत्मिक शक्ति अपार। यही वह सत्य है, जिसे हमारे धर्म, दर्शन और पुराण सदियों से कहते आए हैं। अब आवश्यकता इसे समझने और अपने जीवन में उतारने की है। 

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