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महिलाओं ने अनूठी पहल के माध्यम से किया ईरी रेशम कीट पालन

नलबाड़ी (असम) .अखरी बोडो कई वर्षों से 'ईरी रेशम कीट' का पालन कर रही हैं, लेकिन उन्हें व्यावसायिक रूप से कोई लाभ नहीं मिला था। हाल ही में नलबाड़ी जिले के प्रशासन ने एक अनूठी पहल शुरू की है, जिसका उद्देश्य अखरी बोडो जैसी ग्रामीण परिवेश वाली महिलाओं को विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना और स्थायी आजीविका सुनिश्चित करना है। कभी अपनी रसोई में ईरी कीटों का पालन करने वाली अखरी के पास अब इसके लिए एक उचित 'शेड' है और वह अच्छी कमाई कर रही हैं। बरखेत्री विकास खंड के नौरा गांव निवासी अखरी ने कहा, "पहले मैं साल में मुश्किल से दो-तीन फसलें ही उगा पाती थी क्योंकि मेरे पास उचित 'शेड' नहीं था और कीटों के पोषण के लिए पत्तियां भी उपलब्ध नहीं थीं। अब मैं साल में पांच-छह फसलें उगाने में सक्षम हूं और प्रति फसल 8,000-10,000 रुपये कमा रही हूं।" जिले की ग्रामीण परिवेश वाली महिलाएं एक अनूठी पहल के माध्यम से लाभ ले रही हैं, जिसमें मनरेगा और अन्य योजनाओं का उपयोग आजीविका सृजन के साथ-साथ बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए किया जा रहा है। जिला आयुक्त (डीसी) वर्णाली डेका ने कहा कि इस पहल में विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभों को एक साथ लाकर ग्रामीण महिलाओं के लिए स्थायी आजीविका 'मॉडल' बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया है। डेका ने कहा, "यह एक बहुआयामी आजीविका पहल है जिसमें हमने आत्मनिर्भर मूल्य श्रृंखला बनाने के लिए विशेष प्रयास किए हैं। इस पहल ने यह सुनिश्चित किया है कि महिलाएं अपने दैनिक घरेलू कामों के साथ-साथ व्यावसायिक पालन-पोषण भी कर सकती हैं।" उन्होंने कहा कि इसके लिए भूमि पर निर्भर न होकर अन्य स्थायी आजीविका विकल्पों की खोज आवश्यक हो गई और प्रशासन ने जिले की पारंपरिक ईरी कीट पालन संस्कृति को प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया। मनरेगा के माध्यम से जिले के सभी सात विकास खंडों में 200-250 स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को ईरी शेड प्रदान किए गए हैं। डेका ने दावा किया कि अपनी शुरूआत के छह महीने के भीतर ही इस पहल ने जिले के हजारों परिवारों को लाभ पहुंचाया है, जिससे उन्हें बेहतर आजीविका के विकल्प उपलब्ध हो रहे हैं। डीसी ने कहा कि इस पहल के शुभारंभ के बाद से जिले ने ईरी बीज उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है। उन्होंने कहा कि पहले इसे कामरूप और रेशम उत्पादन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले केन्द्रीय रेशम बोर्ड से मंगाना पड़ता था, लेकिन अब जिला न केवल स्थानीय आपूर्ति को पूरा कर रहा है, बल्कि रंगिया, बाजाली और पानीखैती, गुवाहाटी की कपड़ा मिलों को भी आपूर्ति कर रहा है।

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