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विशेषज्ञों ने गैर-संचारी रोगों के खिलाफ भारत की नयी ढाल के रूप में “माइक्रो-हॉस्पिटल” की सिफारिश की

नयी दिल्ली.  भारत की स्वास्थ्य प्रणाली गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) की महामारी के कारण चरमरा रही है, ऐसे में विशेषज्ञों ने ‘‘माइक्रो-हॉस्पिटल'' स्थापित करने की वकालत की है। उनका कहना है कि इससे बिखरी हुई तृतीयक उपचार प्रणाली की जगह विशेषज्ञों द्वारा संचालित समन्वित इलाज और कम प्रतीक्षा समय के माध्यम से ‘एनसीडी' से होने वाली मौतों को कम किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में होने वाली सभी मौतों में से अनुमानित 63 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों के कारण होती हैं। अस्पताल के बिस्तरों का घनत्व 1,000 की जनसंख्या पर मात्र 0.55 है, जिसके कारण अस्पतालों में भीड़भाड़, लंबे समय तक प्रतीक्षा और देखभाल की गुणवत्ता में भिन्नता होती है। बिस्तरों का यह घनत्व विश्व स्वास्थ्य संगठन के 1,000 की आबादी पर तीन बिस्तर के मानक से काफी कम है। विशेषज्ञों ने कहा कि विश्वस्तरीय तकनीक और बुनियादी ढांचे के बावजूद भारत की स्वास्थ्य प्रणाली प्राथमिक क्लीनिक और अत्यधिक भीड़ वाले 500-बिस्तरों वाले अस्पतालों के बीच एक बड़े ‘‘मध्य-स्तरीय अंतर'' (माइक्रो-हॉस्पिटल) से ग्रस्त है। इसके कारण उपचार व्यवस्था खंडित हो रही है और चिकित्सकों एवं मरीजों के बीच विश्वास की कमी लगातार बढ़ रही है। स्वास्थ्य और निवारक देखभाल की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आयोजित एक स्वास्थ्य वार्ता 'हील वनहेल्थ कनेक्ट सीरीज' को संबोधित करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के पूर्व महानिदेशक स्वास्थ्य सेवा (डीजीएचएस) डॉ. जगदीश प्रसाद ने कहा, ‘‘भारत में चिकित्सक और तकनीक तो हैं, लेकिन वास्तव में निरंतर और समन्वित देखभाल की कमी है।'' पैसिफिक वनहेल्थ के सह-संस्थापक और अध्यक्ष डॉ. स्वदीप श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘स्वास्थ्य सेवा का भविष्य बड़े अस्पताल बनाने में नहीं है; यह बेहतर ढंग से समन्वित प्रणालियों के निर्माण में है। ‘माइक्रो-हॉस्पिटल' साधारण रूप से छोटे अस्पताल नहीं होते, बल्कि इन्हें मरीजों और समुदायों की जरूरतों को ध्यान में रखकर विशेष रूप से तैयार किया जाता है, जिससे इलाज की बिखराव वाली व्यवस्था कम होती है और विशेषज्ञों तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित होती है।''

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