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भारत ने क्षय रोग के आधुनिक उपचारों को आयुर्वेद से एकीकृत करने वाले अध्ययन की शुरुआत की

नयी दिल्ली. भारत ने मंगलवार को क्षयरोग (टीबी) के आधुनिक उपचारों के पूरक के रूप में पारंपरिक आयुर्वेद उपचार का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने के लिए अपनी तरह के पहले वैश्विक क्लीनिकल ​​अध्ययन की शुरुआत की है। इस अध्ययन में आठ संस्थानों में टीबी से हाल में संक्रमित पाए गए 1,250 रोगियों को शामिल किया जाएगा। इस दौरान मरीजों के शरीर के वजन, पोषण संबंधी परिणाम, रोग की प्रगति, जीवन की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रतिरोध क्षमता पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने अध्ययन की शुरुआत करने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा, ''सफल उपचार के बाद भी, कई टीबी रोगियों को कमजोरी, वजन कम होना और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो सहायक और जीवाणु प्रभाव आधारित उपचारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।'' उन्होंने कहा कि आयुर्वेद की भारत की समृद्ध विरासत इस तरह के मामलों में उपचार के लिए अद्वितीय अवसर प्रदान करती है, विशेष रूप से पोषण, प्रतिरक्षा और समग्र स्वास्थ्य लाभ में सुधार के लिए। मंत्री ने रेखांकित किया कि भारत में क्षय रोग के मामलों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई और यह संख्या 2024 में प्रति एक लाख आबादी पर घटकर 187 मामलों पर आ गई है, जो 2015 के मुकाबले 21 प्रतिशत की कमी को दर्शाती है। उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया में क्षय रोग के कुल मामलों में भारत की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत है। सिंह ने कहा, ''भारत ने राष्ट्रीय क्षयरोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत इस बीमारी के उन्मूलन की दिशा में एक महत्वाकांक्षी और त्वरित रास्ता अपनाया है, जिसमें शीघ्र निदान को मजबूत करना, सार्वभौमिक दवा संवेदनशीलता परीक्षण, डिजिटल अनुपालन तकनीक और रोगी-केंद्रित देखभाल शामिल है।

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