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एक गांव बायोगैस से आत्मनिर्भर बना, 125 से अधिक घरों की रसोईघरों को आपूर्ति

चंदौली (उप्र)   पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की वजह से खाना पकाने वाली गैस समेत ईंधन की चुनौतियों के बीच चंदौली जिले का एक गांव बायोगैस से आत्मनिर्भर बन गया है। यहां 125 से अधिक घरों के रसोईघर एलपीजी की लगभग आधी कीमत पर चल रहे हैं। वाराणसी के पास चंदौली जिले के अलीनगर क्षेत्र के नियमातबाद ब्लॉक के एकौनी गांव में स्थित इस पहल ने अपनी किफायती लागत और पर्यावरणीय लाभों के कारण ध्यान आकर्षित किया है। स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाली पुणे की कंपनी के सहयोग से स्थापित बायोगैस संयंत्र, लगभग 500-600 लोगों की आबादी वाले इस गांव के लगभग 125 परिवारों को गैस की आपूर्ति करता है। वाराणसी जिले के रामनगर से तीन किमी की दूरी पर स्थित इस गांव के निवासी नागेन्द्र प्रताप सिंह पेशे से किसान हैं। उन्होंने  बताया कि 1995 से उनकी गौशाला है, जिसमें करीब 200 गायें हैं। उन्होंने बताया कि बीटेक की पढ़ाई कर चुका उनका बेटा चन्द्रप्रकाश सिंह ने इस समस्या से निजात के लिए अनुसंधान किया और उसे पुणे की कंपनी का साथ मिला। इस कंपनी की मदद से उसने 2016 में अपनी गौशाला का उन्नयन किया, उसने इसे प्रौद्योगिकी के साथ जोड़ा। चन्द्रप्रकाश ने बताया कि कंपनी ने ही उनके यहां बायो गैस संयंत्र स्थापित किया, इस पर 85 लाख रुपये का खर्च आया। उन्होंने बताया कि कंपनी ने ही संयंत्र के लिए वित्त पोषण किया और तबसे यह संयंत्र निरंतर काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन सुबह व शाम ढाई-ढाई घंटे बायो गैस की आपूर्ति दी जाती है। यह बायो गैस एलपीजी की तुलना में आधे दाम में पड़ रही है। पूरे महीने प्रयोग करने पर अधिकतम 400 रुपये का भुगतान करना पड़ता है। चन्द्रप्रकाश ने बताया कि वर्तमान में अमेरिका-इजराइल व ईरान के बीच जारी युद्ध के कारण ईंधन की कमी महसूस की जा रही है और चंदौली भी अछूता नहीं है। उन्होंने कहा कि यहां लगे बायोगैस संयंत्र की तरफ बाहरी गांवों के लोग भी आकर्षित हो रहे हैं। चन्द्रप्रकाश ने बताया कि उनके संयंत्र से हाल में करीब 25 और लोगों ने कनेक्शन लिया है।
पुणे की 'साफ एनर्जी कंपनी से जुड़े 'सस्टेन प्लस फाउंडेशन' के सह संस्थापक हर्षद कुलकर्णी ने  बताया कि चन्द्रप्रकाश के पिता की ओर से 2022 में मुहैया कराई गई जमीन पर बायोगैस संयंत्र की स्थापना की गई। उन्होंने बताया कि इसकी एवज में कंपनी ने चन्द्रप्रकाश के परिवार को बायोगैस से दो-तीन कनेक्शन दिये, साथ ही उनके गौशाला के गोबर को रोजाना उठाकर संयंत्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी ली। कुलकर्णी के मुताबिक कंपनी ने इस संयंत्र में गांव के दो लोगों को रोजगार भी दिया है। उन्होंने यह बताया कि स्थापना के 10 साल बाद 2032 में यह संयंत्र चंद्रप्रकाश के पिता को पूरी तरह से सौंप दिया जाएगा।

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