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- पाशुपत, संभवत: शिव को सर्वोच्च शक्ति मानकर उपासना करने वाला सबसे पहला हिंदू संप्रदाय। माना जाता है कि बाद में इस सम्प्रदाय ने असंख्य उपसंप्रदायों को जन्म दिया, जो गुजरात और महाराष्टï्र में कम से कम 12 वीं शताब्दी तक फले-फूले तथा जावा और कंबोडिया भी पहुंचे। इस संप्रदाय ने यह नाम शिव की एक उपाधि पशुपति से लिया है, जिसका अर्थ है पशुओं के देवता, इसका अर्थ बाद में विस्तृत होकर प्राणियों के देवता हो गया।महाभारत में पाशुपत संप्रदाय का उल्लेख है। शिव को ही इस व्यवस्था का प्रथम गुरु माना गया है। बाद के साहित्य, जैसे वायु-पुराण में वर्णित जनश्रुतियों के अनुसार शिव ने स्वयं यह रहस्योद्घाटन किया था कि विष्णु के वासुदेव कृष्ण के रूप में अवतरण के दौरान वह भी प्रकट होंगे। शिव ने संकेत दिया कि वह एक मृत शरीर में प्रविष्टï होंगे और लकुलिन (या नकुलिन अथवा लकुलिश, लकुल का अर्थ है गदा) के रूप में अवतार लेंगे।10 वीं तथा 13 वीं शताब्दी के अभिलेख इस जनश्रुति का समर्थन करते प्रतीत होते हैं, चूंकि उनमें लकुलिन नामक एक उपदेशक का उल्लेख मिलता है, जिनके अनुयायी उन्हें शिव का एक अवतार मानते थे। वासुदेव संप्रदाय की तरह कुछ इतिहासकार पाशुपत के उद्भव को दूसरी शताब्दी ई.पू. का मानते हैं, जबकि अन्य इसके उद्भव की तिथि दूसरी शताब्दी ई. मानते हैं।पाशुपत द्वारा अंगीकृत की गई योग प्रथाओं में दिन में तीन बार शरीर पर राख मलना, ध्यान लगाना और शक्तिशाली शब्द ओम का जाप करना शामिल है। इस विचारधारा की ख्याति को तब धक्का लगा, जब कुछ रहस्यवादी प्रथाओं में अति की जाने लगी।पाशुपत सिद्घांत से दो अतिवादी विचारधाराएं, कालमुख और कापालिक के साथ-साथ एक मध्यम संप्रदाय, शैव (जो सिद्घांत विचारधारा भी कहलाता है) का विकास हुआ। अधिक तार्किक तथा स्वीकार्य शैव से, जिसके विकास से आधुनिक शैववाद का उदय हुआ। भिन्न विशिष्टïता बनाए रखने के लिए पाशुपत तथा अतिवादी संप्रदाय अतिमार्गिक (मार्ग से भटकी हुई विचारधारा) कहलाए।----
- अलकनन्दा नदी को ही पौराणिक विष्णुगंगा नदी कहा जाता है। यह गंगा की सहयोगी नदी हैं। यह गंगा के चार नामों में से एक है। चार धामों में गंगा के कई रूप और नाम हैं। गंगोत्री में गंगा को भागीरथी के नाम से जाना जाता है, केदारनाथ में मंदाकिनी और बद्रीनाथ में अलकनन्दा। यह उत्तराखंड में शतपथ और भगीरथ खड़क नामक हिमनदों से निकलती है। यह स्थान गंगोत्री कहलाता है।अलकनंदा नदी घाटी में लगभग 229 किमी तक बहती है। देव प्रयाग या विष्णु प्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है और इसके बाद अलकनंदा नाम समाप्त होकर केवल गंगा नाम रह जाता है। अलकनंदा चमोली टेहरी और पौड़ी जिलों से होकर गुजऱती है। गंगा के पानी में इसका योगदान भागीरथी से अधिक है। हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनाथ अलकनंदा के तट पर ही बसा हुआ है। राफ्टिंग इत्यादि साहसिक नौका खेलों के लिए यह नदी बहुत लोकप्रिय है। तिब्बत की सीमा के पास केशवप्रयाग स्थान पर यह आधुनिक सरस्वती नदी से मिलती है। केशवप्रयाग बद्रीनाथ से कुछ ऊंचाई पर स्थित है।उत्तराखंड के चार धामों में गंगा की कई धाराएं उद्गमित होती हैं। गंगोत्री से उद्गमित होने वाली गंगा की धारा को भागीरथी, केदारनाथ से उद्गमित होने वाली धारा को मंदाकिनी और बद्रीनाथ से उद्गमित होने वाली धारा को अलकनंदा के नाम से जाना जाता है। अलकनंदा नदी का पौराणिक नाम विष्णुगंगा है। वास्तव में अलकनंदा नदी देवप्रयाग में भागीरथी से संगम के पश्चात ये दोनों नदियां गंगा में परिवर्तित होती हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में भागीरथी एवं अलकनंदा नदियों को क्रमश: सास-बहू के रूप में जाना जाता है। अपने कोलाहल भरे प्रवाह के कारण भागीरथी नदी सास एवं अलकनंदा नदी को बहू के रूप में प्रसिद्ध हैं। अपने उदगम से भागीरथी में संगम तक अलकनंदा नदी में पांच विभिन्न नदियां मिलती हैं जिसके कारण उत्तराखंड में इस क्षेत्र को पंच प्रयाग कहा जाता है। प्रयाग उस स्थल को कहते है जहां दो नदियों का संगम होता है। उत्तराखंड के पंच प्रयाग क्षेत्र में अलकनंदा नदी में विभिन्न स्थलों पर क्रमश: विष्णुगंगा, नंदाकिनी, पिंडर, मंदाकिनी, एवं भागीरथी नदियों का संगम होता है। इन स्थलों को क्रमश: विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग एवं देवप्रयाग के नाम से जाना जाता है। अलकनंदा नदी का उद्गम सतोपंथ हिमनद है।अलकनंदा की पांच सहायक नदियां हैं जो गढ़वाल क्षेत्र में 5 अलग-अलग स्थानों पर अलकनंदा से मिलकर पंच प्रयाग बनाती हैं, जो हैं-1. विष्णु प्रयाग जहां धौली गंगा अलकनंदा से मिलती है।2. नंद प्रयाग जहां नंदाकिनी अलकनंदा से मिलती है।3. कर्ण प्रयाग जहां पिंडारी अलकनंदा से मिलती है।4. रूद्र प्रयाग जहां मंदाकिनी अलकनंदा से मिलती है।5. देव प्रयाग जहां भागीरथी अलकनंदा से मिलती है।---
- चक्रवर्ती एक संस्कृत शब्द है। विश्व शासक की प्राचीन भारतीय अवधारणा है, जो संस्कृत के चक्र, यानी पहिया और वर्ती यानी घूमता हुआ, से उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार, चक्रवर्ती को ऐसा शासक माना जा सकता है, जिसके रथ का पहिया हर समय घूमता हो या जिसकी गति को कोई रोक नहीं सके। पहिए के घूमने को धार्मिकता और नैतिक सत्ता के चक्र धर्म से भी जोड़ा जा सकता है, जैसा बौद्ध धर्म में होता है। बुद्ध का सारनाथ का उपदेश विधि का घूमता हुआ चक्र है और एक चक्रवर्ती से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने राज्य में सदाचारिता या धार्मिकता के चक्र का घूर्णन सुनिश्चित करेगा।बौद्ध और जैन स्रोतों में तीन प्रकार के धर्मनिरपेक्ष चक्रवर्तियों का उल्लेख मिलता है-1. चक्रवाल चक्रवर्ती-प्राचीन भारतीय सृष्टिशास्त्र में वर्णित सभी चार महाद्वीपों पर राज करने वाला राजा।2. दीप चक्रवर्ती- सिर्फ एक महाद्वीप पर राज करने वाला राजा, जो पहले वाले से कम शक्तिशाली होता है।3. प्रदेश चक्रवर्ती- एक महाद्वीप के किसी हिस्से के लोगों पर शासन करने वाला राजा, जो स्थानीय राजा के समकक्ष होता है।चक्रवाल चक्रवर्ती, की उपाधि ग्रहण करने वाले सबसे पहले सम्राट अशोक (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) थे। अशोक ने अपने अभिलेखों में चक्रवर्ती उपाधि का उल्लेख नहीं किया है। बाद के साहित्य में उनका इस रूप में वर्णन जरूर मिलता है। उस काल के बौद्ध और जैन दार्शनिकों ने चक्रवाल चक्रवर्ती की अवधारणा को सदाचारी और नैतिक कानूनों को बनाए रखने वाले राजा के साथ जोड़ा दिया। धर्मनिपेक्षता मेें चक्रवर्ती को बुद्ध के समकक्ष माना जाता है। उन्हें बुद्ध के समान ही कई गुणों से जोड़ा जाता है।भारत में चक्रवर्ती एक सरनेम भी है।---
- बन उड़द को हिन्दी में जंगली उड़द, मषवन, माषोनी, संस्कृत में माषपर्णी, सूर्यपर्णी, कांबोजी, हय पुच्छिका, मराठी में रान उड़द, गुजराती में जंगली उड़द, बंगाली में भाषानी बनकलई, लैटिन में टिरेनन्स लेबिएलिस कहा जाता है।बन उड़द एक प्रकार का औषधीय पौधा है। गुण में यह चिकना, तीखा, मधुर, शीतल वात-पित्तशामक, कफवद्र्धक, उत्तेजक, स्नेहन, अनुलोमन, ग्राही, रक्तवद्र्धक और शोधक, रक्तपित्तनाशक, सूजन को दूर करने वाला, चेहरे की चमक बढ़ाने वाले, धातुवद्र्धक, जलन को नष्ट करने वाला और जीवनीय होता है। यह अर्दित, लकवा, आमवात, जोड़ों का दर्द आदि वात रोगों में तथा पैत्तिक विकार, पेट दर्द, पेशाब के साथ धातु का जाना और टीबी आदि रोगों में प्रयोग किया जाता है।
- कालमेघ एक बहुवर्षीय शाक जातीय औषधीय पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम एंडोग्रेफिस पैनिकुलाटा है। कालमेघ की पत्तियों में कालमेघीन नामक उपक्षार पाया जाता है, जिसका औषधीय महत्व है। यह पौधा भारत एवं श्रीलंका का मूल निवासी है तथा दक्षिण एशिया में व्यापक रूप से इसकी खेती की जाती है। इसका तना सीधा होता है जिसमें चार शाखाएं निकलती हैं और प्रत्येक शाखा फिर चार शाखाओं में फूटती हैं। इस पौधे की पत्तियाँ हरी एवं साधारण होती हैं। इसके फूल का रंग गुलाबी होता है। इसके पौधे को बीज द्वारा तैयार किया जाता है जिसको मई-जून में नर्सरी डालकर या खेत में छिड़ककर तैयार करते हैं। यह पौधा छोटे कद वाला शाकीय छायायुक्त स्थानों पर अधिक होता है। पौधे की छंटाई फूल आने की अवस्था अगस्त-नवम्बर में की जाती है। बीज के लिये फरवरी-मार्च में पौधों की कटाई करते है। पौधों को काटकर तथा सुखाकर बिक्री की जाती है7 औसतन 300-400 कि शाकीय हरा भाग (60-80 किग्रा सूखा शाकीय भाग) प्रति हेक्टेयर मिल जाती है।भारतीय चिकित्सा पद्वति में कालमेघ एक दिव्य गुणकारी औषधीय पौधा है जिसको हरा चिरायता, बेलवेन, किरयित् के नामों से भी जाना जाता है। भारत में यह पौधा पश्चिमी बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश में अधिक पाया जाता है। इसका स्वाद कड़वा होता है, जिसमें एक प्रकार क्षारीय तत्व-एन्ड्रोग्राफोलाइडस, कालमेघिन पायी जाती है जिसके पत्तियों का उपयोग ज्वर नाशक, जांडिस, पेचिस, सिरदर्द कृमिनाशक, रक्तशोधक, विषनाशक तथा अन्य पेट की बीमारियों में बहुत ही लाभकारी पाया गया है। कालमेघ का उपयोग मलेरिया, ब्रोंकाइटिस रोगो में किया जाता है। इसका उपयोग यकृत सम्बन्धी रोगों को दूर करने में होता है। इसकी जड़ का उपयोग भूख लगने वाली औषधि के रूप में भी होता है। कालमेघ का उपयोग पेट में गैस, अपच, पेट में कृमि आदि को दूर करता है। इसका रस पित्तनाशक है। यह रक्तविकार सम्बन्धी रोगों के उपचार में भी लाभदायक है। सरसों के तेल में मिलाकार एक प्रकार का मलहम तैयार किया जाता है जो चर्म रोग जैसे दाद, खुजली इत्यादि दूर करने में बहुत उपयोगी होता है। चिली में किए गए एक प्रयोग में यह पाया गया कि सर्दी के कारण बहती नाक वाले रोगियों को कालमेघ का रस दिये जाने पर उसकी सर्दी ठीक हो गई। इंडियन ड्रग इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया है कि कालमेघ में रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता पाई जाती है और यह मलेरिया और अन्य प्रकार के बुखार के लिए रामबाण दवा है। इसके नियमित सेवन से रक्त शुद्ध होता है तथा पेट की बीमारियां नहीं होतीं। यह लीवर यानी यकृत के लिए एक तरह से शक्तिवर्धक का कार्य करता है। इसका सेवन करने से एसिडिटी, वात रोग और चर्मरोग नहीं होते।
- राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने वरिष्ठ अभिनेता परेश रावल को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया है। वर्ष 1959 में स्थापित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित एक पूरी तरह से स्वायत्त संगठन है। एनएसडी दुनिया में चार सबसे अग्रणी थिएटर प्रशिक्षण संस्थानों में से एक है, संगीत नाटक अकादमी के तत्वाधान में इसकी स्थापना हुई थी और यह 1975 में एक स्वतंत्र संस्था बनी। यह थिएटर के विभिन्न स्वरूपों में 3 वर्षीय पूर्णकालिक, आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की पेशकश करता है।संस्थान के पूर्व छात्रों और संकाय सदस्यों की उल्लेखनीय सूची यह सुनिश्चित करती है कि संस्था प्रदर्शन कला के क्षेत्र में शीर्ष पर बनी हुई है। इस प्रतिष्ठित संस्थान से उत्तीर्ण अनेक थियेटर कार्मिकों जैसे नाटककार, अभिनेता, निर्देशक, मंच और लाईट डिजाइनर और संगीत निर्देशकों ने भारतीय थियेटर को समृद्ध किया है और यह कार्य अभी भी जारी है। रंगमंच के अलावा, एनएसडी के पूर्व छात्रों की कलात्मक अभिव्यक्तियों ने हमेशा अन्य मीडिया में भी अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है। एनएसडी के दो परफॉर्मिग विभाग हैं- रेपर्टोरी कंपनी और थियेटर इन एजुकेशन कंपनी (टीआईई) जो क्रमश: 1964 और 1989 में प्रारंभ हुए थे। ऑउटरीच कार्यक्रम के तहत एनएसडी नई दिल्ली के साथ चार केंद्र वाराणसी, गंगटोक, अगरतला और बेंगलूरु में भी स्थापित किए गए हैं।
- गुप्त रूप से राजनीतिक या अन्य प्रकार की सूचना देने वाले व्यक्ति को गुप्तचर या जासूस कहते हैं। गुप्तचर अति प्राचीन काल से ही शासन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता माना जाता रहा है। भारतवर्ष में गुप्तचरों का उल्लेख मनुस्मृति और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में गुप्तचरों के उपयोग और उनकी श्रेणियों का विशद वर्णन किया है। राज्याधिपति को राज्य के अधिकारियों और जनता की गतिविधियों एवं समीपवर्ती शासकों की नीतियों के संबंध में सूचनाएं देने का महत्वपूर्ण कार्य उनके गुप्तचरों द्वारा संपन्न होता था। रामायण में वर्णित दुर्मुख ऐसा ही एक गुप्तचर था जिसने लंका प्रवास के बाद श्री रामचंद्र को सीता के विषय में जानकारी दी थी।अर्थशास्त्र में उल्लेख है कि राजा के पास विश्वासपात्र गुप्तचरों का समुदाय होना चाहिए और इन गुप्तचरों को योग्य एवं विश्वस्त मंत्रियों के निर्देशन में काम करना चाहिए। अर्थशास्त्र में समष्ट एवं संचार नामक दो प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख मिलता है। समष्ट कोटि के गुप्तचर स्थानीय सूचनाएं देते थे और संचार कोटि के गुपतचर विभिन्न स्थानों का परिभ्रमण करके सूचनाएं एकत्र करते थे। समष्ट कोटि के गुप्तचरों के अनेक प्रकार होते थे, यथा कापातिक, उष्ठित, गृहपतिक, वैदाहक तथा तापस। संचार नामक गुप्तचर में सत्रितिक्ष्ण, राशद एवं स्त्री गुप्तचर जैसे भिक्षुकी, परिव्राजिका, मुंड, विशाली भी होती थीं। चंद्रगुप्त मौर्य के युग में सुदूर स्थित अधिकारियों पर नियंत्रण करने के लिए गुप्त संवाददाता एवं भ्रमणशील निर्णायकों का उपयोग किया जाता था। ये संवाददाता अथवा निर्णायक उन अधिकारियों के कार्यकलापों का निरीक्षण एवं मूल्यांकन करते थे और राजा को इस संबंध में गुप्त रूप से सूचनाएं भेजते थे। हिंदूकाल में इस प्रकार के गुप्तचरों का वर्ग अशोक के काल तक सुचारु रूप से कार्य करता रहा। उसके बाद भी शासन में गुप्तचरों का महत्व बना रहा। इन गुप्तचरों का पद राज्य के अत्यंत विश्वासपात्र व्यक्तियों को ही दिया जाता था। गुप्तचरों का उपयोग संगठित रूप से और विस्तृत पैमाने पर मुस्लिम और मुगलकाल में नहीं हुआ। वर्तमान समय में राजनीतिक प्रयोजनों के निमित्त देश के भीतर और बाहर गुप्तचरों का प्रयोग एक सर्वमान्य राजनीतिक धारणा है।-----
- हींग (Asafoetida) का उपयोग आमतौर पर दाल-सब्जी में डालने के लिए किया जाता है। इसलिए इसे बघारनी के नाम से भी जाना जाता है। हींग फेरूला फोइटिस नामक पौधे का चिकना रस है। इसका पौधा 60 से 90 सेमी तक ऊंचा होता है। ये पौधे -ईरान, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान, ब्लूचिस्तान , काबुल और खुरासन के पहाड़ी इलाकों में अधिक होते हैं। हींग के पत्तों और छाल में हलकी चोट देने से दूध निकलता है। यहीं दूध सूखकर गोंद बनता है उसे निकालकर पत्तों या खाल में भरकर सुखाया लिया जाता है। सूखने के बाद इसे हींग के नाम से जाना जाता है। वैद्य जो हींग उपयोग में लाते हैं, वह हीरा हींग होती है और यही सबसे अच्छी होती है।हमारे देश में हींग की बड़ी खपत होती है। हींग बहुत से रोगों को खत्म करती है। वैद्यों का कहना है कि हींग का उपयोग लाने से पहले उसे सेंक लना चाहिए। चार प्रकार की हींग बाजारों में पाई जाती है जैसे कन्धारी, हींग, यूरोपीय वाणिज्य हींग, भारतवर्षीय हींग और वापिंड हींग।हींग का रंग सफेद , हल्का और पीला, और सुरखी मायल जैसा होता है। इसका स्वाद खाने में कडुवा और गंध से भरा होता है। हींग गर्म और खुश्क होती है। यह गर्म दिमाग और गर्म मिजाज वालों को नुकसान पहुंचा सकती है। कतीरा और बनफ्सा हींग में दोषों को दूर करते हैं। हींग की तुलना सिकंजीव से की जा सकती है।हींग पुट्ठे और दिमाग की बीमारियों को खत्म करती है जैसे मिर्गी, फालिज और लकवा आदि। वैद्यों के अनुसार हींग आंखों की बीमारियों में फायदा पहुंचाती है। खाने को हजम करती है और भूख को बढ़ा देती है। यह शरीर में गरर्मी पैदा करती है और आवाज को साफ करती है। हींग का लेप घी या तेल के साथ चोट पर करने से लाभ होता है। हींग को कान में डालने से कान में आवाज का गूंजना और बहरापन दूर होता है। हींग जहर को भी खत्म करती है। हवा से लगने वाली बीमारी को भी यह मिटाती है। हींग गर्म, हलकी और पाचक है। यह कफ और वात को खत्म करती है। हींग श्वास की बीमारी और खांसी का नाश करती है। इसलिए हींग को वैद्य एक गुणकारी औषधि भी मानते हैं।
- सिद्ध चिकित्सा के वैज्ञानिक आधार का लम्बा और विविध इतिहास है। परम्परा के अनुसार यह द्रविड़ संस्कृति द्वारा विकसित सबसे पुरानी परम्परागत उपचार विधि है। ताड़ के पत्तों पर लिखी पांडुलिपियों में बताया गया है कि भगवान शिव ने सबसे पहले अपनी पत्नी पार्वती को इसके बारे में बताया था। पार्वती ने यह ज्ञान अपने पुत्र मुरुग को दिया। उसने यह सारा ज्ञान अपने प्रमुख शिष्य अगस्त्य को दिया। अगस्त्य ऋषि ने 18 सिद्धों को इसके बारे में बताया और उन्होंने इस ज्ञान का लोगों में प्रचार किया।सिद्ध शब्द हिन्दी के शब्द सिद्धि से बना है, जिसका मोटे तौर पर अर्थ है- विशेष योग्यता की प्राप्ति। सिद्धि को उन 8 अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति के साथ भी जोड़ा जाता है, जो मानवीय प्रयासों के अंतिम लक्ष्य का एक हिस्सा हैं। जिन लोगों ने उपरोक्त शक्तियों को प्राप्त किया, उन्हें सिद्ध कहा जाता है। प्राचीन काल में 18 महत्वपूर्ण सिद्ध थे, जिन्होंने सिद्ध चिकित्सा पद्धति को विकसित किया। ऐतिहासिक रूप से माना जाता है कि प्रमुख सिद्ध 18 थे। अगस्त्य ऋषि को सिद्ध चिकित्सा का जनक माना जाता है। सिद्धों का सिद्धांत है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का विकास हो सकता है। इसलिए उन्होंने ऐसी विधियां और औषधियां विकसित कीं, जिनसे शरीर पुष्ट होता है और आत्मा को पुष्टि मिलती है।सिद्ध पद्धति की पांडुलिपियों से पता चलता है कि 18 सिद्धों की शिक्षाओं से एक संयुक्त चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ। आज सरकारी विश्वविद्यालयों के अंतर्गत मान्यता प्राप्त सिद्ध मेडिकल कॉलेज हैं, जहां सिद्ध चिकित्सा के बारे में पढ़ाया जाता है। सिद्ध चिकित्सा की औषधि का मतलब है परिपूर्ण औषधि। सिद्ध चिकित्सा शरीर के रोगी अवयवों को फिर से जीवंत और सक्रिय करने में कुशलता का दावा करती है। यह चिकित्सा मानव स्वास्थ्य के लिए आवश्यक तीन महत्वपूर्ण अंशों- वात, पित्त और कफ़ के अनुपात में भी उचित संतुलन बनाने का दावा करती है।आमतौर पर सिद्ध चिकित्सा के मूल सिद्धांत अन्य भारतीय स्वास्थ्य विज्ञान - आयुर्वेद जैसे हैं। केवल मात्र अंतर यही है कि सिद्ध चिकित्सा, बाल अवस्था, प्रौढ़ अवस्था और वृद्ध अवस्था में क्रमश: वात, पित्त और कफ़ की प्रमुखता को मान्यता देती है, जबकि आयुर्वेद में यह इसके पूरी तरह उलट है, यानी आयुर्वेद में बाल अवस्था में कफ़, वृद्ध अवस्था में वात और प्रौढ़ अवस्था में पित्त की प्रमुखता को माना जाता है।
- युद्ध में टैंकों का इस्तेमाल आज आम बात है। अपने निर्माण के 105 साल के सफर में टैंक की तकनीक में समय के साथ काफी सुधार आया है। दुनिया का सबसे पहला युद्धक टैंक 1915 में बना था। यह टैंक ब्रिटेन ने बनाया था। लिटिल विलि नाम का यह टैंक सिर्फ नाम का ही छोटा नहीं था। इस टैंक का वजन 14 टन के आसपास था और अपने टेस्ट रन के दौरान यह कई बार गड्ढों में फंसा, उबड़ खाबड़ सतह पर बमुश्किल ही चल पाया। मगर आगे चलकर इसी प्रोटोटाइप में काफी सुधार किए गए और फिर इन्हें युद्ध के मैदान में उतारने लायक बनाया गया। 1918 में सामने आए सुधरे हुए मॉडल को बिग विलि कहा गया। मार्क वन नाम के टैंक का पहला इस्तेमाल फ्रांस में किया गया। दूसरे विश्व युद्ध में टैंकों का खूब इस्तेमाल हुआ।ब्रिटेन को टैंक बनाने की प्रेरणा पहले विश्व युद्ध के ट्रेंच वॉर से मिली। 1914 में ब्रिटिश आर्मी के कर्नल अर्नेस्ट स्विंटन और विलियम हैंके ने सबसे पहले एक ऐसे युद्धक वाहन की परिकल्पना पेश की जिसके पहियों पर कन्वेयर बेल्ट जैसी संरचना हो। शुरुआत में इसे लैंड बोट मॉडल कहा गया। दुश्मनों से इस तरह के वाहन के विकास की प्रक्रिया को गुप्त रखने के लिए यह बताया गया कि युद्ध के मैदान में पानी पहुंचाने के लिए एक टंकी वाला वाहन बनाया जा रहा है। इसी कारण नया वाहन टैंक के नाम से जाना गया।-----
- हिन्दू ग्रंथों में युद्ध के लिए विभिन्न प्रकार की व्यूह रचना रची जाती थी, ताकि शत्रुओं को चारों ओर से घेर कर परास्त किया जा सके और शत्रु उनकी व्यूह को समझ भी न पाए। इस प्रकार के व्यूह रचना का उल्लेख मुख्य रूप से महाभारत के युद्ध में मिलता है। इसमें प्रमुख व्यूह रचना है-अर्धचन्द्र व्यूह- कौरवों के गरुड़ व्यूह का मुकाबला करने के लिए महाभारत युद्ध के तीसरे दिन पांडु पुत्र अर्जुन ने अर्धचन्द्र व्यूह की रचना की थी। इसमें आधे चंद्रमा के आकार में सेना सज्जित होकर युद्ध किया करती थीं।चक्र व्यूह- यह व्यूह सबसे विख्यात है। गुरु द्रोण ने युद्ध के तेरहवें दिन इस व्यूह की रचना की थी। इस व्यूह को अर्जुन ही भेदना जानते थे। अर्जुन पुत्र अभिमन्यु इसे भेद तो सकते थे, लेकिन वहां से बाहर निकलने का रास्ता उन्हें पता नहीं था। कौरवों ने इसी बात का फायदा उठाया और अभिमन्यु को इसी चक्रव्यूह में फंसा कर उसकी हत्या कर दी।क्रौंच व्यूह- महाभारत युद्ध के दूसरे दिन युधिष्ठिर ने दृष्टद्युम्न को इस व्यूह के अनुसार सेना को सजाने का सुझाव दिया था। उड़ते हुए क्रौंच पक्षी की तरह ही इसमें सेनाओं को सुसज्जित किया गया था।मंडल व्यूह- भीष्म पितामह ने युद्ध के सातवें दिन कौरव सेना को इस व्यूह के अनुसार सजाया था। इस व्यूह के बीच में भीष्म खुद खड़े हुए थे।चक्रशकट व्यूह- युद्ध के चौदहवें दिन द्रोण ने जयद्रथ को अर्जुन के हाथों मारे जाने से बचाने के लिए इस व्यूह की रचना की थी, लेकिन वे जयद्रथ को बचा नहीं पाए। इसमें एक चक्र होता था जिसकी शुरुआत हाथी सवारों से होती थी।वज्र व्यूह- महाभारत युद्ध के पहले दिन अर्जुन ने पांडव सेना को इस व्यूह के अनुसार सजाया था। इसमें सेनाएं आयताकार में फैली होती थीं और उसके बीच में मुख्य योद्धा युद्ध लड़ता था।
- शल्लकी एक प्रकार की औषधि है। सदियों से आयुर्वेद के चिकित्सक जोड़ों के दर्द की चिकित्सा में इसका प्रयोग कराते आ रहे हैं । बोस्वेलीया सीराटा के नाम से प्रचलित यह वनस्पति अंग्रेजी दवाओं मैं पेन-किलर्स का एक बेहतर विकल्प है। इस वनस्पति के अच्छे प्रभाव संधिवात (ओस्टीयोआर्थ्रराईटीस) एवं रयूमेटाइडआर्थराईटीस जैसे घुटनों के सूजन की अनेक अवस्थाओं में कारगर साबित हुए हैं। राजस्थान,मध्यप्रदेश एवं आंध्रप्रदेश में शलाई के नाम से जाना जाने वाला यह पौधा अपने सक्रिय तत्व बोस्वेलिक एसिड के कारण वैज्ञानिकों की नजऱों में आया है ।यह प्राथमिक एवं सेकेंडरी स्तर के ब्रेन ट्यूमर में भी प्रभावी पाई गई है। शल्लकी में पाया जानेवाला सक्रिय तत्व जिसे ए.के.बी.ए.नाम दिया गया ,आस्टीयोआर्थ्रायटीस से जूझ रहे रोगियों के लिए एक अच्छा विकल्प है । ब्रिटिश विशेषज्ञ भी इस बात को मानते हंै कि आस्टीयोआर्थ्रायटीस के रोगियों के लिए एक सुरक्षित दर्द निवारक औषधि की जरूरत है ,क्योंकि वर्तमान में उपलब्ध दर्द एवं सूजन सहित मांसपेशियों को रिलेक्स करने वाली औषधियां दुष्प्रभाव के कारण भी जानी जा रही हैं। अभी इस वनस्पति पर और भी अधिक शोध किये जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने इसे कोलाईटीस, ब्रोंकाईटीस सहित अनेक सूजन प्रधान व्याधियों में प्रभावी पाया है ।
- सदाबहार पुष्प एक औषधीय पौधा भी है, जिसे सदाफूली, नयनतारा नामों से भी जाना जाता है। सदाबहार की कुल आठ जातियां हैं। इनमें से सात मेडागास्कर में तथा आठवीं भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाती हैं। सदाबहार का वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस है। भारत में पाई जाने वाली प्रजाति का वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस रोजस है। यह फूल न केवल सुन्दर और आकर्षक है, बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर माना गया है। इसे कई देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।सदाबहार बारहों महीने खिलने वाला फूल है। तेज ठंड के कुछ दिनों को छोड़कर यह पूरे वर्ष खूब खिलता है। सदाबहार को भारत की किसी भी उष्ण जगह की शोभा बढ़ाते हुए सालों साल बारह महीने देखे जा सकते हैं। फूल तोड़कर रख देने पर भी पूरा दिन ताजा रहता है। मंदिरों में पूजा पर चढ़ाए जाने में इसका उपयोग खूब होता है। यह फूल सुंदर तो है ही आसानी से हर मौसम में उगता है, हर रंग में खिलता है और इसके गुणों का भी कोई जवाब नहीं, शायद यही सब देखकर नेशनल गार्डेन ब्यूरो ने सन् 2002 को इयर आफ़ विंका के लिए चुना। विंका या विंकारोज़ा सदाबहार का अंग्रेज़ी नाम है।पांच पंखुडिय़ों वाला सदाबहार पुष्प श्वेत, गुलाबी, फालसाई, जामुनी आदि रंगों में खिलता है। अब यूरोप, भारत, चीन और अमेरिका के अनेक देशों में इस पौधे की खेती होने लगी है। पूरे भारत और संभवत: एशिया के पाँचों महाद्वीपों में पाया जाने वाला यह अत्यंत दृढ़ प्रकृति व क्षमता वाला पौधा है, जो खूब मजे से उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में खिलता व लोकप्रिय है।अनेक देशों में इसे खांसी, गले की खऱाश और फेफड़ों के संक्रमण की चिकित्सा में इस्तेमाल किया जाता है। सबसे रोचक बात यह है कि इसे मधुमेह के उपचार में भी उपयोगी पाया गया है। आयुर्वेद में स्कर्वी, अतिसार, गले में दर्द, टांसिल्स में सूजन, रक्तस्नव आदि रोगों में इसके प्रयोग के विषय में लिखा गया है। भारत में प्राकृतिक चिकित्सक मधुमेह रोगियों को इसके श्वेत फूल का प्रयोग सुबह ख़ाली पेट करने की सलाह देते हैं। इसमें दो सक्रिय यौगिक होते हैं एल्कलॉइड और टैनिन। कहा जाता है इस पौधे में करीब 100 से ज्यादा अल्कलॉइड पाया जाता है जो काफी फायदेमंद होता है।
- 1. वैदिक सभ्यता के संस्थापक आर्य थे। आर्यों का आरंभिक जीवन मुख्यत: पशुचारण था। वैदिक सभ्यता मूलत: ग्रामीण थी।2. वैदिक सभ्यता की जानकारी के स्रोत वेद हैं। इसलिए इसे वैदिक सभ्यता के नाम से जाना जाता है।3. आर्यों ने ऋग्वेद की रचना की, जिसे मानव जाति का प्रथम ग्रन्थ माना जाता है। ऋग्वेद द्वारा जिस काल का विवरण प्राप्त होता है उसे ऋग्वेद वैदिक काल कहा जाता है।4. ऋग्वेद भारत-यूरोपीय भाषाओं का सबसे पुराना निदर्श है। इसमें अग्नि, इंद्र, मित्र, वरुण, आदि देवताओं की स्तुतियां संगृहित हैं।5. वैदिक सभ्यता के संस्थापक आर्यों का भारत आगमन लगभग 1500 ई.पू. के आस-पास हुआ। हालाँकि उनके आगमन का कोई ठोस और स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है।6. आर्यों के मूल निवास के सन्दर्भ में विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग विचार व्यक्त किये हैं।7. अस्तों मा सद्गमय वाक्य ऋग्वेद से लिया गया है।8. अधिकांश विद्वान् प्रो. मैक्समूलर के विचारों से सहमत हैं कि आर्य मूल रूप से मध्य एशिया के निवासी थे।9. ऋग्वेद में नदियों का उल्लेख मिलता है। नदियों से आर्यों के भौगोलिक विस्तार का पता चलता है।10. भारत में आर्य सर्वप्रथम सप्तसैंधव प्रदेश में आकर बसे इस प्रदेश में प्रवाहित होने वाली सैट नदियों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।11. ऋग्वैदिक काल की सबसे महत्वपूर्ण नदी सिन्धु का वर्णन कई बार आया है। ऋग्वेद में गंगा का एक बार और यमुना का तीन बार उल्लेख मिलता है।12. ऋग्वेद की सबसे पवित्र नदी सरस्वती थी। इसे नदीतमा (नदियों की प्रमुख) कहा गया है।13. सप्तसैंधव प्रदेश के बाद आर्यों ने कुरुक्षेत्र के निकट के प्रदेशों पर भी कब्ज़ा कर लिया, उस क्षेत्र को 'ब्रह्मवर्तÓ कहा जाने लगा। यह क्षेत्र सरस्वती व दृशद्वती नदियों के बीच पड़ता है।14. गंगा एवं यमुना के दोआब क्षेत्र एवं उसके सीमावर्ती क्षेत्रो पर भी आर्यों ने कब्ज़ा कर लिया, जिसे 'ब्रह्मर्षि देशÓ कहा गया।15. आर्यों ने हिमालय और विन्ध्याचल पर्वतों के बीच के क्षेत्र पर कब्ज़ा करके उस क्षेत्र का नाम 'मध्य देशÓ रखा।16. कालांतर में आर्यों ने सम्पूर्ण उत्तर भारत में अपने विस्तार कर लिया, जिसे 'आर्यावर्तÓ कहा जाता था।17. भौगोलिक विस्तार के दौरान आर्यों को भारत के मूल निवासियों, जिन्हें अनार्य कहा गया है से संघर्ष करना पड़ा।18. दशराज्ञ युद्ध में प्रत्येक पक्ष में आर्य एवं अनार्य थे। इसका उल्लेख ऋग्वेद के 10वें मंडल में मिलता है। यह युद्ध रावी (पुरुष्णी) नदी के किनारे लड़ा गया, जिसमे भारत के प्रमुख काबिले के राजा सुदास ने अपने प्रतिद्वंदियों को पराजित कर भारत कुल की श्रेष्ठता स्थापित की।19. ऋग्वेद में आर्यों के पांच कबीलों का उल्लेख मिलता है- पुरु, युद्ध, तुर्वसु, अजु, प्रह्यु। इन्हें 'पंचजनÓ कहा जाता था।20. ऋग्वैदिक कालीन राजनीतिक व्यवस्था, कबीलाई प्रकार की थी। ऋग्वैदिक लोग जनों या कबीलों में विभाजित थे। प्रत्येक कबीले का एक राजा होता था, जिसे 'गोपÓ कहा जाता था।---
- पवाड़ को पवांर, जकवड़ आदि नामों से पुकारा जाता है। वर्षा ऋतु की पहली फुहार पड़ते ही इसके पौधे खुद उग आते हैं और गर्मी के दिनों में जो-जो जगह सूखकर खाली हो जाती है, वह घास और पवाड़ के पौधे से भरकर हरी-भरी हो जाती है। इसके पत्ते अठन्नी के आकार के और तीन जोड़े वाले होते हैं।विभिन्न भाषाओं में नाम -संस्कृत- चक्रमर्द। हिन्दी-पवाड़, पवांर, चकवड़। मराठी- टाकला। गुजराती- कुवाडिय़ों। बंगला- चाकुन्दा। तेलुगू- तागरिस। तामिल- तगरे। मलयालम- तगर। फरसी- संग सबोया। इंगलिश- ओवल लीव्ड केशिया। लैटिन- केशिया टोरा।यह हलकी, रूखी, मधुर, शीतल, हृदय को हितकारी, तीनों दोषों का शमन करने वाली, श्वास, खांसी, कृमि, खुजली, दाद तथा चर्मरोगनाशक होती है। इसका फल (बीज) कड़वा एवं गरम प्रकृति वाला होता है और कोढ़, विष, वात, गुल्म, कृमि, श्वास इन सब रोगों को नष्ट करने वाला होता है।वर्षाकाल में पवाड़ का पौधा अपने आप सब तरफ पैदा हो जाता है। यह दो प्रकार का होता है- चक्र मर्द और कासमर्द। त्वचा पर दाद गोलाकार में होती है अत: दाद को अंग्रेजी में रिंग वार्म कहते हैं। चक्र मर्द नाम का पौधा दाद के गोल-गोल घेरे (चक्र) को नष्ट करता है, इसीलिए इसे संस्कृत में चक्र मर्द यानी चक्र नष्ट करने वाला कहा गया है।चक्रमर्द शब्द का अपभ्रंश नाम ही चकवड़ हो गया। इसके पत्ते मैथी के पत्तों जैसे होते हैं। इसी से मिलता-जुलता एक पौधा और होता है, जिसे कासमर्द या कसौंदी कहते हैं। यह पौधा चक्र मर्द से थोड़ा छोटा होता है और इसकी फलियां पतली व गोल होती हैं। यह खांसी के लिए बहुत गुणकारी होता है, इसलिए इसे कासमर्द यानी कास (खांसी) का शत्रु कहा गया है।ग्रामीणजन तो इसकी कोमल पत्तियों की सब्जी बनाकर खाते हैं और इसे बहुत गुणकारी मानते हैं। इसके बीजों को पीसकर करंजी के तेल में मिलाकर मल्हम बनाकर दाद पर लगाने से दाद ठीक हो जाते हैं। इसकी पतियों को पीसकर लुग्दी बनाकर और पुल्टिस तैयार कर फोड़े पर बांधने से फोड़ा पककर फूट जाता है, चीरा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके पत्तों से बने काढ़े को पीने से पेट साफ होता है, कब्ज दूर होती है और पेट के कीड़े नष्ट होते हैं।
- दुनिया में हर साल 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस मनाया जाता है। नारियल की उपज को बढ़ाने के लिए जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से एशिया-प्रशांत नारियल समुदाय द्वारा वर्ष 2009 से इसका आयोजन किया जा रहा है।भारत में, केरल में नारियल का सबसे अधिक उत्पादन होता है। तमिलनाडु और कर्नाटक में भी अब इसकी उपज को बढ़ाया गया है। तमिलनाडु में सालाना लगभग 2 करोड़ 17 लाख नारियल पैदा होते हैं और इसे आगे बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए समन्वित नारियल उत्पादन योजना शुरू की गई है। राष्ट्रीय नारियल बोर्ड भी नारियल के उत्पादन और विकास के साथ ही इससे जुड़े अन्य उत्पादों जैसे सॉफ्ट ड्रिंक, चिप्स और जैम पर भी काम कर रहा है। नारियल के खोल और उसके अन्य अवययों से बनाये जाने वाले हस्तशिल्प उत्पादों के विकास पर भी काम किया जा रहा है।
- पफर मछली एक खास तरह की मछली होती है जिनमें न्यूरोटॉक्सिन नाम का ड्रग पाया जाता है। यूं तो ये मछली जहरीली मानी जाती है , लेकिन डॉल्फिन पर इसका जहर नुकसान की बजाय नशा चढ़ा देता है। युवा डॉल्फिन पफर फिश को इसके नशीले व्यवहार के चलते ही पसंद करती हैं। पफर फिश पानी में तो किसी सामान्य मछली की ही तरह तैरती है लेकिन जैसे ही उसे पानी से बाहर निकाला जाता है, उसका आकार बदल जाता है और वो गेंद की तरह गोल हो जाती है।मजेदार बात ये है कि जैसे ही इसे दोबारा पानी में डाला जाता है, ये किसी भी सामान्य मछली की तरह तैरने लगती है। गोलमटोल सी दिखने वाली पफर फिश आसानी से पहचानी जा सकती है। खतरा महसूस होने पर ये अपने पेट को कुछ ही सेकेंड में फुलाकर बड़ा कर लेती है। हिंद, प्रशांत और अटलांटिक महासागरों के कुनकुने पानी में पफर फिश की 120 से ज्यादा प्रजातियां पायी जाती हैं। जानकारों के अनुसार, इनकी सिर्फ 30 प्रतिशत प्रजातियां ताजे पानी में रहती है।पफर की कुछ प्रजातियां ऐसी भी हैं जो प्रजनन के दौरान खारे या ताजे पानी में आकर रहने लगती हैं। हालांकि पहले पफर फिश की आबादी स्थिर थी लेकिन आज महासागरों में प्रदूषण का स्तर बढ़ चुका है, साथ ही इनके प्राकृतिक आवास घटते जा रहे हैं जिससे इनके जीवन पर खतरा मंडरा रहा है। सामान्य रूप से इनकी उम्र दस साल होती है। इन मछलियां की लंबाई एक इंच से लेकर दो फुट तक होती है। एक इंच लंबी पफर फिश को पिग्मी कहते हैं और ज्यादा बड़ी को जायंट पफर कहते हैं। सभी पफर फिश में सामान्य बात यह है कि इनमें अपने भीतर ढेर सारा पानी रखने की क्षमता होती है। कभी-कभी ये पानी की जगह ज्यादा मात्रा में हवा भी खींच लेती हैं। इससे इनके शरीर का आकार बढ़ जाता है और ये देखने में फुटबॉल जैसा प्रतीत होती है । वैज्ञानिक मानते हैं कि पफर फिश आत्मरक्षा के लिए अपने शरीर को फुलाकर बड़ा कर लेती हैं। वे अच्छी तैराक नहीं होतीं। अचानक खतरा सामने हो तो ये भाग नहीं पातीं और शिकारियों को सिर्फ डराने के लिए ऐसा करती हैं। पफर की लगभग सभी प्रजातियों के शरीर में जहर होता है। इसे टेट्रॉडोटोक्सिन कहते हैं। इनका जहर सायनाइड के मुकाबले 1200 गुना तक घातक हो सकता है। एक पफर फिश के भीतर इतना जहर होता है कि वह 30 वयस्क लोगों को मार सकता है। जहर इनके हर अंग में नहीं पाया जाता। जापान में कुछ संस्कृतियां ऐसी हैं जहां पफर फिश से फुगू नामक व्यंजन बनाया जाता है। जापानी लोग फुगू को स्वादिष्ट बनाने के तरीके जानते हैं। केवल प्रशिक्षित शेफ ही पफर फिश को साफ करते हैं , क्योंकि उन्हें ही पता होता है कि इन्हें किस तरह स्वादिष्ट बनाया जा सकता है।कहते हैं कि पफर फिश को काटने में थोड़ी सी गलती हो जाए तो खाने वाले की मौत भी हो सकती है। शार्क मछलियां ही एकमात्र समुद्री जीव हैं जिन पर पफर फिश के जहर का कोई असर नहीं होता। इसलिए शार्क पफर फिश को बिना किसी डर के खा लेती हैं। कुछ पफर ऐसी होती हैं जो देखने में काफी चमकीले रंग की होती हैं। इनका चमकीलापन इनके शरीर के भीतर मौजूद रंग निर्माण और जहर पैदा करने की मात्रा पर निर्भर है। ज्यादा चमकीली पफर के भीतर ज्यादा मात्रा में जहर होता है।------
- सर्पगंधा एपोसाइनेसी परिवार का द्विबीजपत्री, बहुवर्षीय झाड़ीदार सपुष्पक और महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है। इस पौधे का पता सर्वप्रथम लियोनार्ड राल्फ ने 1582 ई. में लगाया था। भारत तथा चीन के पारंपरिक औषधियों में सर्पगंधा एक प्रमुख औषधि है। भारत में तो इसके प्रयोग का इतिहास करीब 3000 वर्ष पुराना है।सर्पगंधा के पौधे की ऊंचाई 6 इंच से 2 फुट तक होती है। इसकी प्रधान जड़ प्राय: 20 से. मी. तक लम्बी होती है। जड़ में कोई शाखा नहीं होती है। सर्पगन्धा की पत्ती एक सरल पत्ती का उदाहरण है। इसका तना मोटी छाल से ढंका रहता है। इसके फूल गुलाबी या सफेद रंग के होते हैं। ये गुच्छों में पाए जाते हैं। भारतवर्ष में समतल एवं पर्वतीय प्रदेशों में इसकी खेती होती है। पश्चिम बंगाल एवं बांग्लादेश में सभी जगह स्वाभाविक रूप से सर्पगंधा के पौधे उगते हैं।सर्पगंधा में रिसार्पिन तथा राउलफिन नामक उपक्षार पाया जाता है। सर्पगंधा के नाम से ज्ञात होता है कि यह सर्प के काटने पर दवा के नाम पर प्रयोग में आता है। इस पौधे की जड़, तना तथा पत्ती से दवा का निर्माण होता है। इसकी जड़ में लगभग 25 क्षारीय पदार्थ, स्टार्च, रेजिन तथा कुछ लवण पाए जाते हैं। सर्पगंधा को आयुर्वेद में निद्राजनक कहा जाता है इसका प्रमुख तत्व रिसरपिन है,जो पूरे विश्व में एक औषधीय पौधा बन गया है इसकी जड़ से कई तत्व निकाले गए हैं जिनमें क्षाराभ रिसरपिन, सर्पेन्टिन, एजमेलिसिन प्रमुख हैं जिनका उपयोग उच्च रक्त चाप,अनिद्रा, उन्माद, हिस्टीरिया आदि रोगों को रोकने वाली औषधियों के निर्माण किया जाता है इसमें 1.7 से 3.0 प्रतिशत तक क्षाराभ पाए जाते हैं जिनमें रिसरपिन प्रमुख हैं इसका गुण रूक्ष, रस में तिक्त, विपाक में कटु और इसका प्रभाव निद्राजनक होता है।दो-तीन साल पुराने सर्पगंधा के पौधे की जड़ को उखाड़ कर सूखे स्थान पर रखते है, इससे जो दवाएं निर्मित होती हैं, उनका उपयोग उच्च रक्तचाप, गर्भाशय की दीवार में संकुचन के उपचार में करते हैं। इसकी पत्ती के रस को निचोड़ कर आंख में दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसका उपयोग मस्तिष्क के लिए औषधि बनाने के काम आता है। अनिद्रा, हिस्टीरिया और मानसिक तनाव के दूर करने में सर्पगंधा की जड़ का रस, काफी उपयोगी है। इसकी जड़ का चूर्ण पेट के लिए काफी लाभदायक है। इससे पेट के अन्दर की कृमि खत्म हो जाती है।
- गंगोत्री ग्लेशियर (संस्कृत, नेपाली और हिन्दी- गंगोत्री) उत्तरकाशी जिला, उत्तराखण्ड, भारत में स्थित है,जिसकी सीमा तिब्बत से लगती है । यह ग्लेशियर गंगा नदी का एक प्राथमिक स्त्रोत है। हिमालय में यह सबसे बड़ा ग्लेशियर है। एक अनुमान के अनुसार इसमें बर्फ की मात्रा 27 से अधिक घन किलोमीटर है । इस ग्लेशियर की मात्रा 27 घन किमी. है और इसकी लंबाई और चौड़ाई लगभग क्रमश: 30 और 4 किमी. है। यह ग्लेशियर चारों तरफ से गंगोत्री समूह जैसे - शिवलिंग, थलय सागर, मेरू और भागीरथी तृतीय की बर्फीली चोटियों से घिरा हुआ है, ये बर्फीली पहाडिय़ां कठिन चढ़ाई के लिए जानी जाती हैं।यह ग्लेशियर, अपने निचले स्तर पर एक सर्किल से मिला हुआ है जिसे चौखंभा पीक कहते हैं जो पश्चिमोत्तर की ओर बहती है और अंत में एक गाय के मुंह के आकार में परिवर्तित हो जाती है। इसीलिए, इस जगह को गोमुख कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है गाय का मुंह।यह हिंदुओं के लिए एक अनुष्ठान होता है कि वह इस ग्लेशियर के जमा देने वाले ठंडे पानी में डुबकी लगाएं। यह ग्लेशियर वर्ष 1780 में मापा गया था, जिसके बाद से यह हर साल 19 मीटर प्रति वर्ष की दर से गल रहा है। इस ग्लेशियर से निकलने वाली तीन सहायक नदियां भी है जिनका नाम है - रक्तवर्ण, चतुरंगी और कीर्ति। इसके अतिरिक्त, यहां 18 से अधिक छोटे ग्लेशियर भी हैं।इस ग्लेशियरों की ऊंचाई, समुद्र स्तर से 4120 मीटर से 7 हजार मीटर तक है। यह सभी ग्लेशियर, ढलान शंकु, बर्फ के हिमस्खलन से, चिकने पत्थरों से, बर्फ के मृत टीलों, शक्वांकार चोटी, टेढ़े - मेढ़े नुकीले पर्वतों,हिमनदियों, छोटे - छोटे नदियों के साथ बहने वाले पत्थरों, झरनों, पहाड़ी घाटियों और हिमनदियों की झीलों आदि से बनते हैं।
- विश्व का सबसे पहला विश्वविद्यालय -तक्षशिला विश्वविद्यालय भारत में था। वर्तमान में यह पाकिस्तान के रावलपिंडी में स्थित है। इसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय वर्तमान पाकिस्तान की राजधानी रावलपिण्डी से 18 मील उत्तर की ओर स्थित था। जिस नगर में यह विश्वविद्यालय था उसके बारे में कहा जाता है कि श्री राम के भाई भरत के पुत्र तक्ष ने उस नगर की स्थापना की थी। यह विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी।तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के साढ़े दस हजार से अधिक छात्र अध्ययन करते थे। यहां 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था। 326 ईसवी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकंदर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, बल्कि उस समय के चिकित्सा शास्त्र का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकास विभिन्न रूपों में हुआ था। इसका कोई एक केन्द्रीय स्थान नहीं था, बल्कि यह विस्तृत भू भाग में फैला हुआ था। विविध विद्याओं के विद्वान आचार्यों ने यहां अपने विद्यालय तथा आश्रम बना रखे थे। छात्र अपनी रुचि के अनुसार अध्ययन हेतु विभिन्न आचार्यों के पास जाते थे। महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में यहां वेद-वेदान्त, अष्टादश विद्याएं, दर्शन, व्याकरण, अर्थशास्त्र, राजनीति, युद्धविद्या, शस्त्र-संचालन, ज्योतिष, आयुर्वेद, ललित कला, हस्त विद्या, अश्व-विद्या, मन्त्र-विद्या, विविद्य भाषाएं, शिल्प आदि की शिक्षा विद्यार्थी प्राप्त करते थे। प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरुषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेतनभोगी शिक्षक नहीं थे और न ही कोई निर्दिष्ट पाठयक्रम था। आज कल की तरह पाठयक्रम की अवधि भी निर्धारित नहीं थी और न कोई विशिष्ट प्रमाणपत्र या उपाधि दी जाती थी। शिष्य की योग्यता और रुचि देखकर आचार्य उनके लिए अध्ययन की अवधि स्वयं निश्चित करते थे। परंतु कहीं-कहीं कुछ पाठयक्रमों की समय सीमा निर्धारित थी। चिकित्सा के कुछ पाठयक्रम सात वर्ष के थे तथा पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक छात्र को छरू माह का शोध कार्य करना पड़ता था। इस शोध कार्य में वह कोई औषधि की जड़ी-बूटी पता लगाता तब जाकर उसे डिग्री मिलती थी।अनेक शोधों से यह अनुमान लगाया गया है कि यहां बारह वर्ष तक अध्ययन के पश्चात दीक्षा मिलती थी। 500 ई. पू. जब संसार में चिकित्सा शास्त्र की परंपरा भी नहीं थी तब तक्षशिला आयुर्वेद विज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र था। जातक कथाओं एवं विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि यहां के स्नातक मस्तिष्क के भीतर तथा अंतडिय़ों तक का ऑपरेशन बड़ी सुगमता से कर लेते थे। अनेक असाध्य रोगों के उपचार सरल एवं सुलभ जड़ी बूटियों से करते थे। तक्षशिला विश्वविद्यालय से स्नातक होना उस समय अत्यंत गौरवपूर्ण माना जाता था। यहां धनी तथा निर्धन दोनों तरह के छात्रों के अध्ययन की व्यवस्था थी। धनी छात्रा आचार्य को भोजन, निवास और अध्ययन का शुल्क देते थे तथा निर्धन छात्र अध्ययन करते हुए आश्रम के कार्य करते थे। सुप्रसिद्ध विद्वान, चिंतक, कूटनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री चाणक्य ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूर्ण की थी। उसके बाद यहीं शिक्षण कार्य करने लगे। छठवीं शताब्दी में यह विश्वविद्यालय आक्रमणकारियों द्वारा पूरी तरह नष्ट कर दिया आज भी इसके अवशेष मौजूद हैं।-------
- 1. सिंधु नदी- नदी तिब्बत की मानसरोवर झील के निकट 5,180 मीटर की ऊंचाई से निकलती है। भारत में जम्मू कश्मीर राज्य में प्रवेश करती है और उसके बाद पाकिस्तान में प्रवाहित होती हुई कराची के निकट अरब सागर में मिलती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं- सतलज, व्यास रावी, चिनाब, झेलम, सिंगी, जास्कर, गरबंग, यू, स्यांग इत्यादि।2. सतलज- सतलज नदी का उद्गम तिब्बत में मानसरोवर झील के निकट राक्षसताल है, इसे शतद्रू नदी भी कहते हैं। पंजाब में रुपनगर में भाखड़- नांगल बांध इसी नदी पर बना हुआ है। नाथपा-झाकड़ी बांध और कोल बांध इसी पर बने हुए हैं। स्पिति तथा वासपा इसकी सहायक नदियां हैं।3. ब्रह्मपुत्र- ब्रम्हपुत्र नदी का उद्गम तिब्बत में मानसरोवर झील के दक्षिण पूर्व में स्थित चीमयुंगडंग नामक हिमनद से होता है तथा यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है। ब्रम्हपुत्र तिब्बत में सांग्पो असम में दिहांग के नाम से जानी जाती है। ब्रहमपुत्र की प्रमुख सहायक नदियां मानस, मटेली, सुबानसीरी, लोहित, तीस्ता, सुरमा आदि हैं।4. गंगा- गंगा नदी उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में केदारनाथ चोटी के उत्तर में 7,010 मी. की ऊंचाई पर स्थित गंगोत्री हिमनद से निकलती है तथा बंगाल की खाड़ी में गिरती है। देवप्रयाग में जब अलकनंदा एवं भागीरथी आपस में संयुक्त होती है तब इस संयुक्त धारा को गंगा के नाम से जाना जाता है। गंगा की प्रमुख सहायक नदियो में रामगंगा, घागरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कोसी, यमुना, सोन आदि हैं। भागीरथी पर टिहरी बांध तथा गंगा पर फरक्का बांध बनाया गया है।5. यमुना- यमुना नदी बंदरपूंछ के पश्चिमी ढाल पर स्थित यमुनोत्री हिमनद से निकलती है। इसकी सहायक नदियो में चंबल, बेतवा, गिरी तथा केन मुख्य हैं।6. गोमती- गोमती नदी पीलीभीत जिले से निकलती है। सई, जोमकाई, बर्ना, गच्छाई और चुहा इसकी सहायक नदियां हैं।7. दामोदर- दामोदर नदी पलामू (झारखंड) से निकलती है। इसे बंगाल का शोक भी कहा जाता है। बाशकर इसकी प्रमुख सहायक नदी है। पंचेट, तिलैया, कोनार, अय्यर, बर्गो और मैथन बांध इसी नदी पर स्थित हैं।8. केसी- कोसी नदी माउंट एवरेस्ट के पास गोसाईं थान से निकलती है। इसे बिहार का शोक भी कहा जाता है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां सूनकोसी, लिक्ष कोसी, तासू कोसी, फूल कोसी, अरुणाकोसी हैं।9. महानदी- महानदी मध्यप्रदेश में अमरकंटक के दक्षिण में सिहावा के निकट से निकलती है। हीराकुंड, तिरकपाड़ा और बरोज बांध इसी नदी पर बना हुआ है। सियोनाथ, तेल, ओल, मंड इसकी सहायक नदियां हैं।10. गोदावरी- गोदावरी नदी महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित त्रियम्बक गांव से निकलती है। गोदावरी नदी प्रायद्वीपीय पठार की सबसे बड़ी नदी है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां, प्राणहिता, इंद्रावती, पेनगंगा, वेनगंगा, वर्धा और मंजीरा हैं।11. कृष्णा- कृष्णा नदी महाराष्ट्र में महाबलेश्वर से निकलती है। श्री सलेम, नागार्जुन सागर और धोम बांध इसी नदी पर बनाए गए हैं। कोएना, यरला, वर्णा, पंचगंगा, दूधगंगा, घाटप्रभा, मालप्रभा, भीमा, तुंगभद्रा और मूसी इसकी सहायक नदियां हैं।12. कावेरी- कावेरी नदी पश्चिमी घाट के कुर्ग जिले मेँ ब्रम्हागिरीयाला से निकलती है। इस नदी पर गेरसोप्पा जल प्रपात दर्शनीय है। हेमावती, लोकपावनी, शिमसा, लक्ष्मणतीर्थ, कब्बीरी, स्वर्णवती, भवानी और अमरावती इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं।13. नर्मदा- नर्मदा नदी घाट मध्य प्रदेश में अमरकंटक से निकाल कर गुजरात में भड़ौच के निकट अरब सागर में खंभात की खाड़ी में जाकर मिलती है। नर्मदा नदी पर भेड़ाघाट का संगमरमर का कपिलधारा या धुआंधार जल प्रपात बहुत दर्शनीय है।14. ताप्ती- ताप्ती नदी का उदगम स्थल बेतूल जिले में मुलताई नमक स्थल है, यह प्रायदीप की पश्चिमी प्रवाह की दूसरी सबसे बडी नदी है। लावदा, पटकी पूर्णा, हरकी, अरुणावती, पंझरा आदि इसकी सहायक नदियां हैं।
- मुर्दों का टीला यानी मोहन जोदड़ो वह स्थान है, जहां सिंधु घाटी सभ्यता के अंश मिले हैं। इसका उत्खनन कार्य 1922 में राखालदास बनर्जी के द्वारा किया गया। सिंध के लरकाना जिले में इसका आकार लगभग एक वर्गमील में है। यह दो खंडों में पश्चिमी और पूर्वी विभाजित है। पश्चिमी खंड छोटा है। इसका संपूर्ण क्षेत्र गारे और कच्ची ईटों का चबूतरा बनाकर ऊंचा उठाया गया है। सारा निर्माण कार्य इस चबूतरे के ऊपर किया गया है। इसके आसपास कच्ची ईटों से किलेबंदी की दीवार बनी है, जिसमें मीरारें और बुर्ज बने हैं। इस पश्चिमी खंड में अनेक सार्वजनिक भवन स्थित हैं। जैसे अन्न भंडार, पुरोहित वास। इनमें से कोई भी भवन साधारण आवास का स्थान नहीं था।इस खंड की सबसे संरचनात्मक विशेषता लगभग 39 x 23 फीट का एक तालाब है, जिसमें ईंटों की तह लगाकर ऊपर से बिटुमन का लेप कर दिया गया है, ताकि पानी उससे बाहर न निकल सके । इसे विशाल स्नानागार कहा गया है। एक स्तंभयुक्त भवन का अवशेष मिला है, जिसका प्रयोग संभवत: बाजार या सभास्थल के रूप में किया जाता था। मोहन जोदड़ो के पश्चिमी भाग में स्थित दुर्ग टीले को स्तूप टीला भी कहा जाता है, क्योंकि यहां पर कुषाण शासकों ने एक स्तूप का निर्माण करवाया था।मोहन जोदड़ो में भी हड़प्पा की तरह दुर्ग प्राचीर का बाहरी भाग पक्की ईटों की तिरछी चिनाई से सुरक्षित था। स्नानागार के पश्चिम में स्थित अन्नागार मोहन जोदड़ो के दुर्ग क्षेत्र का विशालतम महत्वपूर्ण भवन है। कुल क्षेत्रफल 2035 वर्ग किलोमीटर है। पूर्वीय खंड, पश्चिमी खंड की अपेक्षा बड़ा है और यह चारों ओर एक दीवार से घिरा था।नगर योजना में सड़कों को महत्वपूर्ण स्थान मिला था, जिनका निर्माण पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण दिशा में किया गया था। एक दूसरे को समकोण पर काटती चौड़ी सड़कों द्वारा मोहनजोदड़ो को बारह विशाल आयताकार खंडों में विभक्त किया गया था। मोहनजोदड़ो की मुख्य सड़कें 9.15 मीटर चौड़ी तथा उसकी सहायक सड़कें 3 मीटर चौड़ी थीं। नालियों में ईंटों की तह लगाई जाती थी और बहुत सी नालियां ऊपर से ढंकी थीं। मुख्य सार्वजनिक मार्ग के साथ-सथ जल निकाल के कुछ गड्ढïे पहचाने गए हैं। कुछ कुएं मिले हैं, जिनमें ईटों की तह लगी थीं। लगभग प्रत्येक घर में कुएं प्राप्त होते हैं। प्रत्येक मकान के बीच में आंगन होता था, जिसके तीन ओर छोटे-बड़े आकार के अनेक कमरे बने होते थे। प्रत्येक घर के आंगन का एक कोना स्नानागार के रूप में प्रयुक्त होता था।मकानों के दरवाजे और खिड़कियां सड़कों की ओर न होकर गलियों की ओर होती थीं। निवासग्रहों का निर्माण पक्की ईंटों से किया था। मोहन जोदड़ो से प्राप्त अन्य अवशेषों में कांस्य की नर्तकी की मूर्ति, दरारों में गेहूं और जौ के दाने, बुना हुआ सूती कपड़ा, गले हुए तांबे के ढेर, हाथी का कपास खंड। सीपी की बनी हुई पटरी, कुभकारों के छह भ_ïों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहां प्राप्त ईंटों का आकार 4:2:1 है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त किसी भी बर्तन पर लेख नहीं मिला है। मोहनजोदड़ो में नगर के अंदर शव-विसर्जन के दो प्रकार के साक्ष्य मिले हैं- पहला आंशिक शवाधान और दूसरा पूर्ण समाधिकरण।
- जल महल का मतलब है पानी का किला ,जो कि जयपुर में स्थित है। इसका निर्माण 1750 वीं सदी में आमेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय द्वारा ठीक आम सागर के बीचों-बीच किया गया था । यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। यह जल महल राजपूत और मुग़ल शैली की वास्तुकला का एक नायब संयोजन है। यह एक पांच मंजिला इमारत है। जब झील के पानी से भर जाती है तब इसकी चार मंजि़ले पानी से डूब जाती है और फिर केवल शीर्ष मंजि़ल दिखाई पड़ती है।यह बिल्कुल मान सागर झील के मध्य में स्थित है। यह राजपूत और मुग़ल शैली की वास्तुकला का एक बेहतरीन संयोजन है। यहां से मान सागर झील और नाहरगढ़ हिल्स के चारो तरफ के नज़ारे बहुत आकर्षक नजऱ आते है। इसका निर्माण महल शाही परिवारों के खातिर एक पिकनिक स्पॉट के रूप में किया गया था।अभी जहां सरोवर है पहले उस जगह का उपयोग पानी को इकट्टा करने के लिये किया जाता था। 1596 में इस क्षेत्र में पानी का अकाल पड़ा हुआ था। तभी आमेर के शासक ने एक बांध बनाने का निर्णय लिया ताकि वे बर्बाद हो रहे पानी को इकट्टा कर सके। योजना के अनुसार डैम का निर्माण किया गया और आमेर पर्वत और अमागढ़ पर्वत से पानी इकट्टा कर के इसके जमा किया जाने लगा। कुछ समय के लिये बने इस बांध को 17 वीं शताब्दी में पत्थरों का बनाया गया और आज यह बांध तकऱीबन 300 मीटर (980 फीट) लंबा और 28.5-34.5 मीटर (94-113 फीट) गहरा है। पानी बहाने के लिये आतंरिक 3 गेट का निर्माण भी किया गया है, ताकि जरुरत पडऩे पर खेती के लिए पानी को स्थानांतरित किया जा सके। तभी से यह बांध स्थानीय लोगों में काफी प्रसिद्ध हो गया और इसके बाद राजस्थान के बहुत से शासकों ने समय-समय पर इसकी मरम्मत भी करवाई और 18 वीं शताब्दी में आमेर के जय सिंह द्वितीय ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। उस समय और भी बहुत सी ऐतिहासिक इमारतें वहां थी, जैसे कि आमेर किला, जयगढ़ किला, नाहरगढ़ किला, खिलानगढ़ किला और कनक वृन्दावन घाटी। राजस्थान की ये सभी इमारतें और स्मारक आज भी पर्यटकों के लिये आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई हैं।
- चतुरंगिणी - प्राचीन भारतीय संगठित सेना। सेना के चार अंग- हस्ती, अश्व, रथ, पदाति माने जाते हैं और जिस सेना में ये चारों हैं, वह चतुरंगिणी कहलाती है। चतुरंगबल शब्द भी इतिहास पुराणों में मिलता है। इस विषय में सामान्य नियम यह है कि प्रत्येक रथ के साथ 10 गज, प्रत्येक गज के साथ 10 अश्व, प्रत्येक अश्व के साथ 10 पदाति रक्षक के रूप में रहते थे, इस प्रकार सेना प्राय: चतुरंगिणी ही होती थी।सेना की सबसे छोटी टुकड़ी (इकाई) पत्ति कहलाती है, जिसमें एक गज, एक रथ, तीन अश्व, पांच पदाति होते थे। ऐसी तीन पत्तियां सेनामुख कहलाती थीं। इस प्रकार तीन तीन गुना कर यथाक्रम गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू और अनीकिनी का संगठन किया जाता था। 10 अनीकिनी एक अक्षौहिणी के बराबर होती थी। तदनुसार एक अक्षौहिणी में 21 हजार 870 गज, 21 हजार 970 रथ, 65 हजार 610 अश्व और 10 लाख 9 हजार 350 पदाति होते थे। कुल योग 2 लाख 18 हजार 700 होता था। कहते हैं, कुरुक्षेत्र के युद्ध में ऐसी 18 अक्षौहिणी सेना लड़ी थी। अक्षौहिणी का यह परिमाण महाभारत (आदि पर्व 2/19-27) में उल्लेखित है। महाभारत में (उद्योग पर्व 155/24-26) में सेना परिमाण की जो गणना है, उससे इस गणना में कुछ विलक्षणता है। शांतिपर्व 59/41-42 में अष्टांग सेना का उल्लेख है, उसमें भी प्रथम चार यही चतुरंगिणी सेना है।
- डेथ वैली उत्तरी अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में स्थित पृथ्वी के सबसे गर्म स्थानों में से एक है। इसकी लंबाई 225 किमी है। अलग-अलग स्थानों पर इसकी चौड़ाई अलग-अलग है और यह 8 से 24 किमी के बीच में है। यहां गर्मियों के दिनों में तापमान 54 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और सर्दियों में रात में तापमान जमाव बिंदु से भी नीचे चला जाता है। चारों ओर से पर्वतों द्वारा घिरे रहने के कारण यह स्थान अत्यंत गर्म हो जाता है। अधिकांश लोगों की जान लेने और अपनी विषम परिस्थितियों के कारण ही इस क्षेत्र को डेथ वैली कहा जाता है।दरअसल डेथ वैली पूर्वी कैलिफोर्निया में स्थित एक रेगिस्तान है। यह मोजावे रेगिस्तान में स्थित है और उत्तरी अमेरिका के सबसे निचले, शुष्क, तथा गरम स्थानों में से एक है। डेथ वैली के भीतर स्थित बैडवॉटर नामक एक बेसिन, समुद्र तल से 282 फीट (86.0 मी) नीचे होने के साथ उत्तरी अमेरिका की सबसे निचली ऊंचाई का स्थान है। 14 हजार 505 फीट (4,421 मी) की ऊंचाई के साथ यह बिंदु निकटस्थ अमेरिका के उच्चतम बिंदु माउंट व्हिटनी से केवल 84.6 मील (136.2 किमी) की दूरी पर स्थित है।कैलिफोर्निया और नेवादा की सीमा के निकट सिएरा नेवादा पहाड़ों के पूर्व के ग्रेट बेसिन में स्थित डेथ वैली, डेथ वैली नेशनल पार्क के अधिकांश हिस्से में फैली हुई है और मोजावे तथा कोलोराडो डेजट्र्स बायोस्फीयर रिजर्व की प्रमुख विशेषता है। यह अधिकांशत: कैलिफोर्निया की इन्यो काउंटी में स्थित है। इसका विस्तार पूर्व के अमार्गोसा रेंज तथा पश्चिम के पैनामिंट रेंज के बीच उत्तर से दक्षिण में है; सिल्वानिया तथा आउल्सहेड पहाड़ क्रमश: इसकी उत्तरी तथा दक्षिणी सीमाओं का निर्माण करते हैं। इसका क्षेत्रफल लगभग 3 हजार वर्ग मील है। डेथ वैली की कई विशेषताएं समुद्र तल से नीचे पाए जाने वाले अन्य स्थानों के समान ही हैं।शुरुआत में अमेरिका आने वाले लोगों को यह घाटी पार करके ही आना पड़ता था। इसके उच्च तापमान और सूखेपन के कारण बहुत से लोग घाटी को पार करने से पहले ही मर जाते थे। कैलिफ़ोर्निया के आस-पास के क्षेत्रों में सोने के भण्डारों का पता लगाने के लिए जाने वाले बहुत से लोग इस घाटी को पार करते समय मर गए। इन भयानक परिस्थितियों के कारण ही इस घाटी का नाम डेथ वैली यानी मौत की घाटी पड़ गया। सन 1870 में जब घाटी का अध्ययन किया गया तो इसमें हज़ारों जानवरों और मनुष्यों की हड्डियों के ढांचे मिले।सन 1933 में इस वैली को अमेरिका का नेशनल मोनूमेंट घोषित कर दिया गया। इसकी विचित्रता को देखने हर वर्ष 4-5 लाख लोग यहां आते हैं।


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