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आलेख -प्रशांत शर्माआज सुबह -सुबह एक बड़ी मनहूस खबर मिली... दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार नहीं रहे। आज तडक़े उन्होंने मुंबइ के अस्पताल में इलाज के दौरान अंतिम सांस ली। पता नहीं क्यों कल रात से ही मैं उनकी फिल्म रोटी कपड़ा और मकान का गाना - मैं ना भूलूंगा ...गुनगुना रहा था....यह गाना मुझे काफी पसंद है। मुकेश और लता मंगेशकर की खूबसूरत आवाज से सजा यह गाना आज भी लोगों की जुबान पर है।आज पूरा देश अपने पसंदीदा नायक को श्रद्धाजंलि अर्पित कर रहा है। उन्हीं के सम्मान में आज इस गाने के बारे में जिक्र कर रहा हूं। मनोज कुमार की फिल्म रोटी कपड़ा और मकान 1974 में रिलीज हुई थी। फिल्म में मनोज कुमार के साथ जीनत अमान और मौसमी चटर्जी नजर आई। वहीं शशि कपूर और अमिताभ बच्चन भी इस फिल्म का हिस्सा थे। फिल्म में यह भावुक गाना दो वर्जन में है- एक सामान्य और दूसरा सेड माहौल में रचा - बसा है। गाने को कंपोज किया था लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल की जोड़ी ने और लिखा संतोष आनंद ने।यह फि़ल्म सन 1974 की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली भारतीय फि़ल्म बन गई, और इसे ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर घोषित किया गया। फि़ल्म को तीन फि़ल्मफ़ेयर पुरस्कार मिले, साथ ही ग्यारह अन्य पुरस्कारों के लिए नामांकित भी किया गया।फिल्म में छह गाने थेे और सभी 4 से 6 मिनट वाले थे। "मेहंगाई मार गई" कव्वाली जो लता मंगेशकर, नरेंद्र चंचल , मुकेश, जानी बाबू कव्वाल की आवाज में थी 8 मिनट 51 सेकंड लंबी थी। सभी गानों की एक खास बात ये थी कि लंबे होने के बाद भी वे कभी बोझिल नहीं लगे। फिल्म को लिखा मनोज कुमार ने और निर्देशित भी किया । फिल्म के निर्माता भी वहीं थे। फिल्म के लिए मनोज कुमार को सर्वेश्रे्ठ निर्देशक अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। वहीं गायक महेन्द्र कपूर ने -और नहीं बस और नहीं... गाने के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार जीता। इसी तरह गीतकार संतोष आनंद को भी यह सम्मान मिला। फिल्म की झोली में एक और फिल्म फेयर अवार्ड गया जो सर्वश्रेष्ठ फिल्म का था।अब इस गाने के बारे में .....मैं ना भूलूंगा, मैं ना भूलूंगी....गीत मोहब्बत का एक हसीं वादा प्रस्तुत करता है। यह गाना मुझे इसलिए भी पसंद है क्योंकि इससे निश्छल प्रेम-बंधन की भीनी-भीनी खूशबू महसूस होती है। इस पूरे गाने में प्रेमी और प्रेमिका अपने-अपने हिस्से के वादों में खोए हुए हैं। इसमें रस्मों और कसमों का बंधन दोनों को अपने मोहपाश में जैसे समेट लेता है।जैसे कि- मैं ना भूलूँगा, मैं ना भूलूँगीइन रस्मों को इन क़समों को इन रिश्ते नातों कोमैं ना भूलूँगा, मैं ना भूलूँगी
चलो जग को भूलें, खयालों में झूलेंबहारों में डोलें, सितारों को छूलेंआ तेरी मैं माँग संवारूँ तू दुल्हन बन जायेमाँग से जो दुल्हन का रिश्ता मैं ना भूलूँगीगाने के फिल्मांकन में उस समय के कैमरे की उम्दां तकनीक की झलक देखने को मिलती है। ऐसी ही तकनीक मनोज कुमार ने फिल्म शोर के गाने - एक प्यार का नगमा है... में इस्तेमाल की थी। यह गाना भी कालजयी है।मैं ना भुलूंगा.. गीत में एक पंक्ति आती है - 'इन रस्मों को, इन क़समों को'..तब कैमरा नायिका जीनत अमान की उंगली पर पहनी अंगूठी पर फोकस होता है जैसे नायिका कह रही हो- हां यही प्रेम- भाव है जो उसने पहन रखा है। गाने की अगली पंक्ति में जग को भूलने.... सितारों को छूने जैसी कल्पनाओं के बाद नायक का मांग भरने की बात कहना , उनके प्रेम को आजीवन निभाने का वादा है और नायिका कहती है कि मांग से दुल्हन का रिश्ता मैं ना भुलूंगी।इसी तरह से गीत की आगे की पंक्तियों में नायक- नायिका जीवन-सांसों के गठजोड़ के साथ कभी भी साथ न छोडऩे का वादा करते हैं। वहीं मंदिर से पूजा तक के पवित्र रिश्ते की बात करते नजर आते हैं। किसी ने सही कहा है कि यदि प्रिय साथी हमसफर हो तो जमाने की क्या चिंता करना। जहां कहीं बस जाएंगे और दिन कट जाएंगे। मोहब्बत की शिद्धत ही कुछ ऐसे होती है।गीतकार संतोष आनंद ने सच में इस पूरे गाने में ऐसा अनोखा भाव. प्रेम रस, वादा पिरोया है, जिसे निर्माता-निर्देशक , अभिनेता मनोज कुमार ने जीवंत किया है। ऐसे महान कलाकार को देश कभी नहीं भूलेगा।महान कलाकार , निर्देशक मनोज कुमार को शत शत नमन। -
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
चैत्र की नवरात्रि आई , मात आई आज द्वार ।
भोर शुभ नव वर्ष आया , रंग रंगोली पुष्प हार ।।
आ सजाएँ तोरणों से , अंबुजा कर श्वेत धार ।
दैत्य का संहार करती , बोझ धरती का उतार ।। 1 ।।
धारिणी जग तारिणी माँ , शेर पर होकर सवार ।
मारना लालच घृणा को , तोम तम मद को उतार ।।
भाव परिमल पावनी हों , लें सभी जीवन सुधार ।
भक्ति करते शक्ति देना , कीजिए भवसार पार ।। 2 ।।
श्वेत वसना पद्मजा तू , कालरात्री कर प्रहार ।
खेलते जो लाज से वो , नर्क में जाएँ सिधार ।।
शैलपुत्री विंध्य वासी , धारती कर असि त्रिशूल ।
कोप से बच शत्रु भागे , आसुरी निज कृत्य भूल ।। 3 ।। -
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
बेगानों की बस्ती में हम, आए हैं ठौर बनाने ।
जीत सकेंगे हृदय प्रेम से, सोचा करते दीवाने ।।
हाथ बढ़ाकर गले लगाया, केवल अपनापन चाहा।
द्वेष - दंभ के दावानल में, मूल्य हुए सारे स्वाहा ।
छल कर जाते मित्र बनाकर, छद्मवेष मानव देखा ।
सत्य - झूठ के बीच नहीं है, खिंची हुई कोई रेखा ।
भ्रष्ट आचरण के दलदल में, धँसते जाते मनमाने ।।
लेन-देन की आदी दुनिया ,पहले नजरों से तौले ।
लाभ-हानि का हिसाब करती , अपनाती हौले-हौले ।
हित देखे संबंधों में भी , स्वार्थ निजी देखा करते ।
देख सदा धन पद वैभव को, मृदुल बोल मुख से झरते ।
हम बनते जा रहे तंत्र के , हिस्से जाने-अनजाने ।।
कील चुभा जाता है पग में, राहों पर सच की निकले।
आँच सेंक कर आत्मबोध की, बर्फ जमी शायद पिघले।
जन्म लिया है मानव का तो, आन रखें मानवता की।
क्षुद्र सोच के तोड़ दायरे, बात करें अब समता की।
नीति जियो जीने दो वाली, अपनाएँ सब सुख पाने ।। - *आलेख - अमिताभ कांत *ट्रम्प प्रशासन अपने दूसरे कार्यकाल में टैरिफ और ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ की नीतियों पर दोगुना जोर दे रहा है। ट्रम्प प्रशासन अतीत के गठबंधनों को फिर से परिभाषित और पुनर्लेखन करने का काम भी कर रहा हैजिसकी गूंज यूरोप और एशिया में उनके सहयोगियों द्वारा महसूस की जा रही है। इन कदमों का उद्देश्य व्यापार संतुलन में सुधार और सार्वजनिक व्यय को कम करके अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। अमेरिका ने पेरिस समझौते वविश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से खुद को अलग कर लिया है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) से भी वह पहले ही अलग हो चुका है। ये कदम वैश्विक भू-राजनीतिक व्यवस्था में एक शून्य पैदा कर रहे हैं। यह शून्य लंबे समय तक नहीं रहेगा-इसे प्रतिस्पर्धी शक्तियों द्वारा भरा जाएगा। अमेरिका सबसे शक्तिशाली बना हुआ है और हम एक बार फिर एक बहुध्रुवीय दुनिया का उदय देख रहे हैं। विखंडित वैश्वीकरण, तकनीकी वर्चस्व की लड़ाई, ऊर्जा की भू-राजनीति और ढहता वैश्विक शासन विश्व को नया आकार देने वाले प्रमुख भू-राजनीतिक रुझान हैं जिनसे भारत को निपटना होगा।वैश्वीकरण का विखंडनजैसा कि हम जानते हैं, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के युग में हमने जो वैश्वीकरण का युग देखा था, वह समाप्त होने वाला है। वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से, हमने वैश्वीकरण का विखंडन देखा है। व्यापार युद्धों ने इस विखंडन को और तेज़ कर दिया है। कोविड-19 महामारी ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारी व्यवधान पैदा कियाऔर इसके फलस्वरूप देशों और व्यवसायों को वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाने के लिए प्रेरित किया। ट्रम्प प्रशासन द्वारा फिर से टैरिफ़ लगाने के साथ, व्यापार युद्धों का दूसरा युग हमारे सामने है। चाहे पारस्परिक हो या सभी टैरिफ़, व्यापार युद्ध विश्व व्यापार को बहुत ज़्यादा बाधित करेंगे। व्यापार युद्ध अब सिर्फ़ बिक्री की वस्तु ओं के बारे में नहीं रह गए हैं। वे प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और औद्योगिक नीति जैसे कारकों को प्रभावित करते हैं। देश ऊर्जा और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रणनीतिक उद्योगों में संरक्षणवाद और क्षमताओं का निर्माण करने का सहारा ले रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के अधर में लटके होने के साथ, देश द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यापार समझौतों की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं। फ्रेंड-शोरिंग का उदय और वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाने का लक्ष्य भारत के लिए अवसर प्रस्तुत करता है। हम सही नीतियों, रणनीतिक द्विपक्षीय व्यापार सौदों और व्यापार सुगमता पर ध्यान केंद्रित करके विनिर्माण के क्षेत्र में निवेश को आकर्षित कर सकते हैं।प्रौद्योगिकी: वैश्विक शक्ति के लिए युद्ध का मैदानप्रथम औद्योगिक क्रांति से लेकर चौथी तक वैश्विक शक्ति गतिशीलता को आकार देने में प्रौद्योगिकी प्रमुख प्रेरक शक्ति रही है। आज के युग में, सेमीकंडेक्टपर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और उभरती हुई प्रौद्योगिकियां प्रमुख प्रेरक शक्ति हैं। राष्ट्र तकनीकी संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए चिप निर्माण में अरबों रुपए डाल रहे हैं। एआईमें देशों और कंपनियों से समान रूप से बड़े पैमाने पर निवेश हो रहा है। साथ ही, साइबर युद्ध और एआईद्वारा उत्पन्न जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। साइबर युद्ध पूरे ऊर्जा ग्रिड को बाधित कर सकता है या भुगतान और बैंकिंग प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है। एआईद्वारा संचालित भ्रामक सूचना चुनावों को बाधित कर सकते हैं और सामाजिक कलह को जन्म दे सकते हैं। एआईको दुनिया भर के समुदायों द्वारा आकार दिया जाना चाहिए, स्वामित्व में लिया जाना चाहिए और तैनात किया जाना चाहिए। हमें कुशलता से नवाचार करना चाहिए, कम से कम में अधिक करना चाहिए, ओपन सोर्स और सरल इंजीनियरिंग को बढ़ावा देना चाहिए और बहुभाषी और मल्टीमॉडल मॉडल बनाना चाहिए। वैश्विक समुदाय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रौद्योगिकी, नुकसान को सीमित करते हुए समावेशी हो। भारत मॉडल, जिसमें प्रौद्योगिकी का उपयोग विभाजन को बढ़ाने के बजाय उसे पाटने के लिए किया जाता है, दुनिया के लिए एक आदर्श हो सकता है।ऊर्जा की भू-राजनीति और ऊर्जा परिवर्तनस्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव शक्ति गतिशीलता को फिर से परिभाषित कर रहा है। महत्वपूर्ण खनिजों (लिथियम, कोबाल्ट, दुर्लभ मृदा तत्वों) से समृद्ध राष्ट्र या इन महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण को नियंत्रित करने वाले देश अधिक प्रभावशाली बन रहे हैं। आज, लगभग 70-80 प्रतिशत दुर्लभ मृदा तत्वों(आरईई) निष्कर्षण और प्रसंस्करण चीन द्वारा नियंत्रित किया जाता है। दुनिया के 80 प्रतिशतसौर सेल चीन द्वारा उत्पादित किए जाते हैंऔर इसी तरह लगभग 70 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी भी चीन द्वारा उत्पादित की जाती हैं। चीन पहले से ही तकनीकी अपनाने के मामले में आगे है, ट्रम्प प्रशासन के तहत अमेरिका पेरिस समझौते से बाहर हो गया है और इसके बजाय वह जीवाश्म ईंधन विस्तार पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। यह वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन के लिए बहुत बड़ा जोखिम पैदा करता है। विकसित राष्ट्र पहले ही वैश्विक कार्बन बजट का 80 प्रतिशतहिस्सा खर्च कर चुके हैंऔर जी7 देशों से कोयले का चरणबद्ध तरीके से उन्मूलन अब 2030 के बजाय 2035 तक होगा। इसके अलावा, विकसित राष्ट्र विकासशील देशों को जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी प्रदान करने की अपनी जिम्मेदारी में विफल हो रहे हैं। इससे विकासशील देशों के लिए अपनी विकास महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बहुत कम जगह बचती है। स्वच्छ ऊर्जा की ओर हमारी दौड़ को वैश्विक गठबंधनों के नए रूपों की आवश्यकता है। देशों को अगली पीढ़ी के सौर पैनल, इलेक्ट्रोलाइज़र और वैकल्पिक सेल केमिस्ट्री (एसीसी) बैटरी जैसी तकनीक पर सहयोग करना चाहिए। भारत को निर्णायक रूप से कार्य करना चाहिए, ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में अपने घरेलू इकोसिस्टम का निर्माण जारी रखना चाहिए। हमें प्रसंस्करण और शोधन के लिए क्षमताओं का विकास करते हुए महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए व्यापार साझेदारी भी सुरक्षित करनी चाहिए।बढ़ते वैश्विक संघर्ष के बीच ढहता वैश्विक शासनऐसे समय में जब वैश्विक सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता है, हमारे पास जो संरचनाएं हैं, वे विफल हो रही हैं। संयुक्त राष्ट्र अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। वैश्विक तापमान पहले ही 1.5 डिग्री सेल्सियस के सीमा को पार कर चुका है। ग्लोबल साउथ,अपने प्रतिनिधित्व और अपनी प्राथमिकताओं दोनों के मामले में हाशिये पर है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गतिरोध बना हुआ है, विश्व व्यापार संगठन में विवाद समाधान तंत्र का अभाव है और कॉप29बहुत जरूरी जलवायु वित्त पोषण प्रदान करने में विफल रहा है। यूक्रेन से लेकर गाजा और सूडान तक, दुनिया भर में संघर्ष बढ़ रहा है। जैसा कि पीएम मोदी ने बार-बार कहा है, जलवायु परिवर्तन, महामारी और वित्तीय अस्थिरता की आज की चुनौतियां राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं देखती हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि हम पुरानी संस्थाओं के साथ 21वीं सदी की चुनौतियों से नहीं लड़ सकते। एक नए वैश्विक शासन ढांचे की आवश्यकता है जो ग्लोबल साउथको अपने केंद्र में रखे और यह स्वीकार करे कि दुनिया अब कुछ चुनिंदा शक्तियों का क्षेत्र नहीं है। यह क्षण भारत के लिएएक वैकल्पिक वैश्विक आर्थिक मॉडल को आकार देने और अधिक समावेशी अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली की वकालत करने काएक अवसर है।आने वाला दशक वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के भविष्य को आकार देगा। भारत उभर रहा है और वैश्विक मंच पर एक व्यावहारिक नेता के रूप में अपनी स्थिति बना रहा है। हम ग्लोबल साउथ के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने ला रहे हैं जबकि वैश्विक संघर्ष पर एक समझौतावादी रुख अपना रहे हैं। प्रधानमंत्री का हालिया बयान कि हमें मतभेद के बजाय संवाद पर जोर देना चाहिए, ने वैश्विक स्तर पर एक गूंज पैदा की है। भारत का कूटनीतिक संतुलन इस युग की एक परिभाषित विशेषता बन रहा है।*लेखक भारत के जी20 शेरपा और नीति आयोग के पूर्व सीईओ हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)जग बनाने पुण्य पावन, प्रेम का विस्तार कर लें ।बाँध लें स्नेहिल पलों को, अक्षयी भंडार कर लें ।।है सुहानी शाम शीतल, भोर भी लगती भली- सी ।प्रिय तुम्हारी बाँह प्यारी, ठौर स्वप्निल सुख गली- सी ।बाग मनहर हो सुवासित, पुष्प घर संसार कर लें ।।आस की किरणें उजाला, भर रही हैं जिंदगी में ।मधुरिमा विश्वास की ले, आस बैठी बंदगी में ।कल्पनाओं को सजा कर, रूप हम साकार कर लें ।।भावनाओं की कलम से, हम लिखें अपनी कहानी ।रागिनी गूँजे मधुरतम, नाद हो पावन रुहानी ।साथ हो अपना हमेशा, ईश का आभार कर लें ।।
- सजल-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)सृष्टि की रचयिता नारी, उसका मत अपमान करो ।श्रद्धा के पुष्प चढ़ाओ , नारी का सम्मान करो ।।अपना प्रतिरूप बनाकर ,माँ को ईश्वर ने भेजा ।पालन- पोषण वह करती , जग उनका गुणगान करो ।।दया क्षमा का संगम वह , बुद्धि शक्ति की धात्री है ।धैर्य त्याग की मूरत वह , क्षमता की पहचान करो ।।हृदय -सरोवर ममता का , सदा छलकता ही रहता ।नेह- नीर में पीर छुपी , अधरों पर मुस्कान करो ।।भार्या ,भगिनी और सुता , सारे दायित्व निभाती ।आदरणीय हर रूप में ,नारी पर अभिमान करो ।।
- आलेख--अश्विनी वैष्णवलेखक भारत सरकार के केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी, रेल तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्री हैं।महाराष्ट्र के बारामती में एक छोटा किसान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के साथ कृषि के नियमों को फिर से निर्धारित करने में जुटा है। यह बात अपने-आप में अद्वितीय है। हम उर्वरक के इस्तेमाल में कमी, जल संसाधन के बेहतर इस्तेमाल से अधिक उपज के बारे में बात करते हैं, जो एआई समर्थित है।यह भारत की एआई-संचालित क्रांति की एक झलक मात्र है। तकनीक और नवाचार अब प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आम नागरिकों के जीवन को बखूबी बदल रहे हैं। कई अर्थों में इस किसान की कहानी एक बहुत बड़े परिवर्तन का सूक्ष्म रूप है। यह सूक्ष्म रूप 2047 तक विकसित भारत की ओर हमारे प्रस्थान का है।डिजिटल नियति का निर्धारणभारत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई), एआई, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पर जोर देकर अपने डिजिटल भविष्य को आकार दे रहा है। दशकों से, भारत सॉफ़्टवेयर के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी रहा है, किंतु अब यह हार्डवेयर विनिर्माण में भी बड़ी प्रगति कर रहा है।पांच सेमीकंडक्टर संयंत्र निर्माणाधीन हैं, जो वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में भारत की भूमिका को मजबूत करते हैं। आज इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद हमारे शीर्ष तीन निर्यातों में शुमार हैं और जल्द ही हम एक प्रमुख मील के पत्थर यानी इस साल भारत की पहली “मेक इन इंडिया” चिप के लॉन्च तक पहुंच जाएंगे।एआई का निर्माण: कंप्यूट, डेटा और इनोवेशनसेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स इसकी रीढ़ हैं, जबकि डीपीआई भारत की तकनीकी क्रांति को आगे बढ़ाने वाली प्रेरक शक्ति के रूप में कार्य करता है। भारत अपने तरह की एक एआई संरचना के माध्यम से इसे सभी के लिए सुलभ बनाकर एआई का लोकतंत्रीकरण कर रहा है।इस संबंध में एक प्रमुख पहल 18,000 से अधिक ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (जीपीयू) के साथ भारत की कॉमन कंप्यूट सुविधा है। 100 रुपए प्रति घंटे से कम की रियायती लागत पर उपलब्ध, यह पहल सुनिश्चित करेगी कि अत्याधुनिक अनुसंधानकर्ताओं, स्टार्टअप, शिक्षाविदों और अन्य हितधारकों के लिए सुलभ हो। यह पहल मूलभूत मॉडल और अनुप्रयोगों सहित एआई -आधारित प्रणालियों को विकसित करने के लिए जीपीयू तक आसान पहुंच को सक्षम करेगी।भारत विविध और उच्च-गुणवत्ता वाले डेटा पर एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए बड़े पैमाने पर गैर-व्यक्तिगत अनाम डेटासेट भी विकसित कर रहा है। यह पहल पूर्वाग्रहों को कम करने और सटीकता में सुधार करने में मदद करेगी, जिससे एआई सिस्टम अधिक विश्वसनीय और समावेशी बनेंगे। ये डेटासेट कृषि, मौसम पूर्वानुमान और यातायात प्रबंधन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में एआई-संचालित समाधानों को शक्ति प्रदान करेंगे।सरकार भारत के अपने आधारभूत मॉडलों के विकास में सहायता कर रही है, जिसमें बड़े भाषा मॉडल (एलएलएम) और भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप समस्या-विशिष्ट एआई समाधान शामिल हैं। एआई से जुड़े अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए, कई उत्कृष्टता केंद्र भी स्थापित किए गए हैं।भारत का डीपीआई, डिजिटल नवाचार की रूपरेखाडीपीआई में भारत के अग्रणी कार्य ने वैश्विक डिजिटल परिदृश्य को महत्वपूर्ण रूप से आकार दिया है। कॉर्पोरेट या राज्य-नियंत्रित मॉडल के विपरीत, भारत का सरल सार्वजनिक-निजी दृष्टिकोण का आधार, यूपीआई और डिजीलॉकर जैसे प्लेटफ़ॉर्म बनाने के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग करता है। निजी क्षेत्र के दिग्गज डीपीआई के शीर्ष पर उपयोगकर्ता के अनुकूल, एप्लिकेशन-विशिष्ट समाधान बनाते हैं और नवाचार प्रस्तुत करते हैं।इस मॉडल को अब एआई के साथ सुपरचार्ज किया जा रहा है, क्योंकि यूपीआई और डिजीलॉकर जैसे वित्तीय और शासन प्लेटफॉर्म बुद्धिमान समाधानों को एकीकृत करते हैं। भारत की डीपीआई संरचना में वैश्विक रुचि जी20 शिखर सम्मेलन में स्पष्ट थी, जहां विभिन्न देशों ने मॉडल को दोहराने की इच्छा व्यक्त की थी। जापान ने भारत की यूपीआई भुगतान प्रणाली को पेटेंट प्रदान किया है, जो इसकी व्यापकता का प्रमाण है।महाकुंभ, परंपरा और तकनीक का संगमभारत ने महाकुंभ 2025 के निर्बाध संचालन के लिए अपने डीपीआई और एआई-संचालित प्रबंधन का लाभ उठाया, जो अब तक का सबसे बड़ा मानव समागम है। एआई -संचालित उपकरणों ने प्रयागराज में रेलवे स्टेशनों पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए तत्क्षण रेलवे यात्रियों की आवाजाही की निगरानी की।भाषिणी, कुंभ सहायक चैटबॉट में एकीकृत, सभी के लिए आवाज आधारित खोया और पाया सुविधा, तत्क्षण अनुवाद और बहुभाषी सहायता सक्षम करती है। भारतीय रेल और उत्तर प्रदेश पुलिस जैसे विभिन्न विभागों के साथ इसके सहयोग ने समस्याओं के शीघ्र समाधान के लिए संचार प्रणाली को सुव्यवस्थित किया।डीपीआई का लाभ उठाकर, महाकुंभ 2025 ने तकनीक-सक्षम प्रबंधन के लिए एक वैश्विक मानदंड स्थापित किया है, जो इसे अधिक समावेशी, कुशल और सुरक्षित बनाता है।भविष्य के लिए तैयार कार्यबल का निर्माणभारत का कार्यबल इसकी डिजिटल क्रांति के केंद्र में है। देश हर हफ्ते एक वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) जोड़ रहा है, जो वैश्विक आरएंडआई और तकनीकी विकास के लिए एक पसंदीदा गंतव्य के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करता है। हालांकि, इस वृद्धि को बनाए रखने के लिए शिक्षा और कौशल विकास में निरंतर निवेश की आवश्यकता होगी। सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के अनुसार, एआई, 5जी और सेमीकंडक्टर डिजाइन को शामिल करने के लिए विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में बदलाव करके इस चुनौती का समाधान कर रही है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि स्नातक रोजगार के लिए तैयार कौशल के साथ कार्यबल में प्रवेश करें, जिससे शिक्षा और रोजगार के बीच का फासला कम हो।एआई को विनियमित करने के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोणभारत भविष्य के लिए तैयार कार्यबल का निर्माण कर रहा है। इसकी एआई नियामक संरचना को उत्तरदायी तैनाती सुनिश्चित करते हुए नवाचार को बढ़ावा देना चाहिए। ‘कठोर’ नियामक संरचना के प्रतिकूल, जो नवाचार को दबाने का जोखिम उठाता है, या ‘बाजार संचालित शासन’, जो अक्सर कुछ लोगों के हाथों में शक्ति केंद्रित करता है, भारत एक व्यावहारिक, तकनीकी-कानूनी दृष्टिकोण का पालन कर रहा है।एआई से संबंधित जोखिमों को दूर करने के लिए केवल कानून पर निर्भर रहने के बजाय, सरकार तकनीकी सुरक्षा से जुड़े उपायों में निवेश कर रही है। सरकार डीप फेक, गोपनीयता संबंधी सरोकारों और साइबर सुरक्षा के जोखिमों से निपटने के लिए उपकरण विकसित करने के क्रम में शीर्ष विश्वविद्यालयों और आईआईटी में एआई संचालित परियोजनाओं को वित्तपोषित कर रही है।एआई वैश्विक उद्योगों को नया आकार दे रहा है। इसलिए भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट है। इसके तहत समावेशी विकास के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना और साथ ही नवाचार को बढ़ावा देने वाली नियामक संरचना को बनाए रखना होगा, लेकिन नीतियों और इन्फ्रास्ट्रक्चर से परे, यह परिवर्तन हमारे लोगों के बारे में है।
- -दीक्षा के दोहे-लेखिका-डॉ. दीक्षा चौबे, दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)मंद-मंद बहती हवा, पड़ती ओस फुहार।प्रेम प्रसारित हर हृदय, करती सुख-संचार ।।चंचल चितवन रूपसी, करते नैन कटाक्ष।पाती लेकर प्रेम की, झाँके हृदय-गवाक्ष।।काया कंचन कामिनी, अद्भुत मोहापाश।कदमों में सिमटी धरा, बाँहों में आकाश।।नवाचार का सूर्य ले, ढूँढें नवल वितान।कठिन प्रश्न को हल करें, सोचें सरल विधान।।बोझ नहीं हों पाठ सब, मनरंजन भरपूर।खेल-खेल में सीख दें, मुश्किल कर दें दूर।।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)बातें सुनना और सुनाना अच्छा लगता है।कभी-कभी खुद में खो जाना अच्छा लगता है ।।फिक्र सदा ही करते आए दुनिया वालों की।अपने को भी कभी मनाना अच्छा लगता है।।जिम्मेदारी के साये में भूल गए बचपन।उन गलियों में दौड़ लगाना अच्छा लगता है।।रेशम से रिश्तों के सारे रेशे हैं उलझे ।धीरे-धीरे सब सुलझाना अच्छा लगता है।।बुजुर्गों की दुआओं से ऐसे कुछ लोग मिले।कड़ी धूप में छाया पाना अच्छा लगता है।।
- लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)जीवन-पथ में चलो चलें हम, हँसते मुस्काते।पार करेंगे हर मुश्किल को, प्रेम गीत गाते।।मोती सच्चे अनमोल बड़े , हैं विश्वासों के ।वक्त-वृक्ष की शाखाओं में, फल हैं साँसों के।पूर्व टूटने के जगती को, खुशियाँ दे जाते ।।जीवन पथ में चलो चलें हम, हँसते मुस्काते ।।डगमग होती तूफानों में, जीवन की नैया ।धरे हाथ पर हाथ नहीं अब, बैठो खेवैया ।धैर्य कुशलता साहस संबल, गुण पार लगाते ।।जीवन पथ में चलो चलें हम, हँसते मुस्काते ।।सपन-पतंगें भरें उड़ानें, सीमा से आगे ।लक्ष्य-प्राप्ति की दृढ संकल्पित, डोरी झट भागे ।पथ से विचलित नहीं खिलाड़ी , अंबर छू पाते ।।जीवन-पथ में चलो चलें हम, हँसते मुस्काते ।।
- लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)नमन करूँ हे मात शारदे,मुझको नित ही ज्ञान मिले ।कलम करे शुचि कर्म निरंतर ,लेखन को पहचान मिले ।।द्वेष-दंभ छल कलुष भाव से ,अंतस मेरा दूर रहे ।गंगाजल सम निर्मल जीवन ,खुशियों से भरपूर रहे ।बढ़ती रहूँ सत्य के पथ पर ,राह नहीं तूफान मिले ।हृदय बने विशाल सागर सम ,लहरों-सा उत्थान मिले ।।अधरों पर मुस्कान सजाए ,मधुरिम मीठी वाणी हो ।शुभता का उजियारा मन में ,कर्म सदा कल्याणी हो ।स्नेह मिले मुझको अपनों का ,ज्ञानी मित्र सुजान मिले ।सुंदर , सरल , सहज हो जीवन ,कभी नहीं अपमान मिले ।।सुमन सरिस सुरभित सुंदर ,मृदुल मनोहर मन मेरा ।निशिगंधा-सी महकीं रातें ,सुखद प्रात का पग-फेरा ।साहस संबल सदा साथ हो ,प्यार , मान - सम्मान मिले ।क्षणिक सुखद यश-वैभव होते ,भक्ति-शक्ति वरदान मिले ।।
- आलेख- दिलीप संघानी (अध्यक्ष- एनसीयूआई, इफको और गुजकोमासोल, पूर्व सहकारिता मंत्री, गुजरात)सहकारिता रूपी नदी धाराप्रवाह बहती जा रही है। यह किसी बंधन से नहीं बांधी जा सकती है । यह जहां भी जाती है, विकास के छोटे से लेकर बड़े बीज बोती जाती है और आर्थिक समर्थन का आधार पैदा करती है। वास्तव में, इसके शाब्दिक अर्थ से कहीं अधिक, सहकारिता सामाजिक और आर्थिक उत्थान का द्योतक है। हम सभी किसी न किसी तरह सहकारिता से जुड़े हुए हैं, और इसकी यात्रा में निरंतर सहयोग कर रहे हैं।भारत की सहकारी परंपरा प्राचीन है, जिसकी जड़ें इसकी संस्कृति और आर्थिक प्रणालियों में गहरी पैठ रखे हुए है। चाणक्य के अर्थशास्त्र के अनुसार, गाँवों की वित्तीय संरचना सहकारी ढांचे, रोजगार प्रदान करने, परिवारों का समर्थन करने और सामाजिक विकास में योगदान करने को दर्शाती हैं। हमारे स्वतंत्रता संग्राम में भी सहकारिता की भावना की प्रमुख भूमिका थी। रियासतों को एकजुट करने के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल के दूरदर्शी प्रयासों और महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन ने सामाजिक सहयोग का प्रदर्शन किया। इस प्रकार, यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि सहकारिता हमारे राष्ट्र के लोकाचार में शुरू से ही शामिल रही है।सहकारी मॉडल की परिवर्तनकारी क्षमता पहचानते हुए भारत सरकार ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के गतिशील नेतृत्व में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की, जो आधुनिक भारत में एक ऐतिहासिक कदम है। यह पहल समावेशी विकास और समृद्धि के लिए मोदी जी की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाती है।केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह, जो एक अनुभवी सहकारी नेता हैं, ने इस क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तनों का नेतृत्व करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की दूरदर्शी नीतियों और मार्गदर्शन में भारत के सहकारी आंदोलन को एक नई दिशा मिली है, जिसमें "सहकार से समृद्धि" के सूत्र वाक्य पर जोर है। श्री अमित शाह के मार्गदर्शन में सहकारी क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास हो रहा है और वैश्विक स्तर पर यह क्षेत्र तेजी से मान्यता प्राप्त कर रहा है।लगभग 132 साल पहले स्थापित अंतर्राष्ट्रीय सहकारी गठबंधन ने नवंबर 2024 में 107 से अधिक देशों के साथ भारत में अपनी पहली बैठक की। भारत के सहकारी इकोसिस्टम की बढ़ती ताकत को देखना सभी भारतीयों के लिए गर्व का पल था। नई दिल्ली में इफको द्वारा आयोजित आई. सी. ए. वैश्विक सम्मेलन की सफल मेजबानी से भारत ने सहकारी आंदोलन के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है।आई. सी. ए. अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने किया, जिसमें भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे, फिजी के उप-प्रधानमंत्री मनोआ कामिकामिका, आई. सी. ए. के अध्यक्ष एरियल ग्वार्को और 107 देशों के 1,500 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान, संयुक्त राष्ट्र ने सहकारिता क्षेत्र के वैश्विक प्रभाव को मान्यता देते हुए वर्ष 2025 को "अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष" घोषित किया है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की प्रेरक दृष्टि और रणनीतिक नेतृत्व ने भारत के सहकारी आंदोलन को वैश्विक महत्व दिया है। जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण पर उनके जोर के साथ-साथ अमित शाह जी की सहकारी मॉडल की गहरी समझ ने इस क्षेत्र को दुनिया के लिए आशा की नई किरण के तौर पर पेश किया है। इस सम्मेलन की सफलता उनके अनुकरणीय नेतृत्व और वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते कद का प्रमाण है।कई अंतर्राष्ट्रीय सहकारी नेताओं ने भारत के सहकारी आंदोलन के बारे में जानने और भारत में प्रमुख सहकारी संगठनों के साथ साझेदारी की खोज करने में गहरी रुचि व्यक्त की। इस अनुभव ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ (दुनिया एक परिवार है) के दृष्टिकोण की भावना को मजबूत किया, जो हमारे राष्ट्र के मूल्यों और परंपराओं से मेल खाती है।भारत की डेयरी सहकारी समितियां ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के दृष्टिकोण और सहकारिता की सफलता को आगे बढाने के लिए मजबूती से खड़ी हैं। अमूल डेयरी कोऑपरेटिव की स्वप्निल यात्रा विस्मय पैदा करने वाली है। एक छोटे स्तर पर शुरू करके यह दुनिया की सबसे बड़ी डेयरी सहकारी समितियों में से एक बन गई है। इसके अलावा, "आणंद पैटर्न" पर आधारित अमूल की सफलता, जिसमें किसान ही सह-स्वामी होने के साथ-साथ आपूर्तिकर्ता भी है, ने आय और लाभ का उचित वितरण सुनिश्चित किया है। निर्णय लेने में किसानों की प्रत्यक्ष भागीदारी से और भी बेहतर प्रबंधन हुआ है। इसकी सफलता आर्थिक विकास से परे है, और महिला सशक्तिकरण के लिए एक मंच प्रदान करती है जो इसे देश और दुनिया भर की अन्य कृषि और डेयरी सहकारी समितियों के लिए एक आदर्श खाका बनाती है। इस क्षेत्र के लिए काम करने से सहकारिता के आदर्शों के प्रति मेरी प्रतिबद्धता की पुष्टि हुई है। मैंने 30 साल पहले 1995 में ‘वसुंधरा-अमरेली’ नामक संगठन की स्थापना की थी। यह संगठन वसुधैव कुटुम्बकम’ के सिद्धांत को बढ़ावा देने के महान लक्ष्य से प्रेरित है। इसका उद्देश्य सभी जीवित प्राणियों के बीच प्रेम और एकता को बढ़ावा देना है।प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी और केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह के दूरदर्शी नेतृत्व से सशक्त भारत का सहकारी ढांचा विकास के लिए एक प्रेरक मॉडल के रूप में उभरा है। "सहकार से समृद्धि" के दृष्टिकोण को न केवल भारत बल्कि विश्व स्तर पर स्वीकृति मिल रही है। आई. सी. ए. वैश्विक सम्मेलन ने सहकारी नीतियों को और मजबूत करने, उद्यमशीलता पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण, नेतृत्व को बढ़ावा देने, समानता सुनिश्चित करने और सहकारिता के माध्यम से न्याय को आगे बढ़ाने के लिए आधार तैयार किया है।आज की दुनिया में एक शांतिपूर्ण क्रांति केवल सहकारी ढांचे के माध्यम से ही संभव है। दुनिया में असमानता के बढ़ते विभाजन को केवल सहकारी उपायों के माध्यम से ही कम किया जा सकता है। युवाओं और समाज के अन्य वर्गों के बीच अलगाव की बढ़ती भावना को सहकारी समितियों के बंधन से ही कम किया जा सकता है। साझा भविष्य के लिए यह अनिवार्य है कि सहकारी आंदोलन केंद्र में रहें और न्यायसंगत आर्थिक और सामाजिक विकास करें।***
- आलेख- नवीन पी सिंहभारतीय कृषि क्षेत्र अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 18 प्रतिशत का योगदान देता है और लगभग 58 प्रतिशत आबादी को आजीविका प्रदान करता है। यह अनिवार्य क्षेत्र खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है और कई संबद्ध उद्योगों का समर्थन करता है। जैसे-जैसे हम वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्रीय बजट के करीब पहुंच रहे हैं, हमें उन असंख्य चुनौतियों को पहचानना चाहिए, जो इसकी स्थिरता और प्रगति को खतरे में डालती हैं। पिछले कुछ समय में, कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव और किसानों का बढ़ता कर्ज फिलहाल कृषि उत्पादकता और कल्याण पर विपरीत प्रभाव डालता है। मध्यम अवधि की चुनौतियों में जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने के लिए स्थायी प्रणालियों को अपनाने की तत्काल आवश्यकता शामिल है, ताकि पारंपरिक कृषि पद्धतियां बाधित न हों। भविष्य का ध्यान रखते हुए, इस क्षेत्र को तेजी से बदलते आर्थिक परिदृश्य में अपनी महत्वपूर्ण स्थिति बनाए रखने के लिए नवाचार को अपनाकर और विकास की ओर बढ़ना चाहिए। नीति निर्माताओं को आगामी बजट में दीर्घकालिक सतत विकास पहलों के साथ इन तत्काल दबावों को रणनीतिक रूप से संतुलित करना चाहिए। संकटग्रस्त किसानों के लिए तत्काल राहत के उपायों को प्राथमिकता देकर, जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों में निवेश करके और नवाचार को बढ़ावा देकर, सरकार कृषि क्षेत्र के लिए एक व्यापक कार्यक्रम बना सकती है, जो आर्थिक विकास का समर्थन करे और भारतीय कृषि के भविष्य को सुरक्षित करे।कृषि अनुसंधान एवं विकास में ऊंची छलांग - समय की आवश्यकताभारतीय कृषि अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) को बहुत कम धन उपलब्ध है, जो वैश्विक औसत 1 प्रतिशत की तुलना में कृषि सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.4 प्रतिशत है। यह कमी नवाचार और जलवायु-अनुकूल फसलों, जल प्रबंधन और उन्नत कीट नियंत्रण जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों के लिए समाधान अपनाने में बाधा डालती है। बजट में आरएंडडी आवंटन को दोगुना करना चाहिए, आईसीएआर और एसएयू जैसे संस्थानों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) से प्राप्त बेहतर कर लाभों के माध्यम से निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिए। ये पहल शिक्षाविदों, उद्योग और किसानों के बीच मजबूत सहयोग पर आधारित इको-सिस्टम का निर्माण करेगी, जिससे ऐसी सफलताएं सुनिश्चित होंगी और कृषि उत्पादकता के साथ-साथ स्थायित्व को बढ़ावा मिल सकता है।फसल की कटाई के बाद के नुकसान को कम करने हेतु इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी दूर करनाभारत में फसल की कटाई के बाद का नुकसान सालाना 10-20 प्रतिशत तक होता है, जो भंडारण, रसद और वितरण संबंधी अक्षमताओं को चिन्हित करता है। कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर कोष के अंतर्गत आवंटन के बावजूद, ये अंतर अपनी जगह कायम हैं। इस बजट में ग्रामीण क्षेत्रों में भंडारण सुविधा, कोल्ड चेन और डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार करने के कार्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि बर्बादी को कम किया जा सके और किसानों का बाजार से संपर्क बढ़ाया जा सके। इसके अलावा, बढ़ते खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र और बढ़ती प्रति व्यक्ति आय भारत में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की मांग को बढ़ाती है। इसके लिए एक मजबूत आपूर्ति श्रृंखला की आवश्यकता होती है। मशरूम की खेती और मधुमक्खी पालन जैसी वैकल्पिक कृषि गतिविधियों में निवेश करने से अतिरिक्त ग्रामीण रोजगार पैदा हो सकते हैं। सूक्ष्म सिंचाई पहलों का विस्तार करने से उत्पादकता में और भी अधिक वृद्धि होने के साथ ही पानी की कमी दूर की जा सकेगी।जलवायु अनुकूलन : कृषि नीति का एक नया स्तंभअप्रत्याशित मौसम, बेमौसम बारिश और मिट्टी के क्षरण के कारण जलवायु परिवर्तन भारतीय कृषि के लिए जोखिम उत्पन्न करता है। फसल विविधीकरण और प्राकृतिक तथा जैविक खेती सहित टिकाऊ प्रणालियों के लिए एक मजबूत प्रतिबद्धता आवश्यक है। जल की कमी वाले क्षेत्रों को कवर करने के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का विस्तार करना और सौर ऊर्जा से सिंचाई के लिए सब्सिडी प्रदान करना जलवायु के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है। तिलहन और दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए लक्षित मिशन-मोड कार्यक्रम जलवायु से जुड़ी चुनौतियों से निपट सकते हैं, साथ ही आयात पर निर्भरता कम कर आत्मनिर्भरता बढ़ा सकते हैं।फसल विविधीकरण: किसानों की आर्थिक मजबूती का माध्यमपशुधन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसे संबद्ध क्षेत्रों में आय स्रोतों में विविधता लाना किसानों की फसल आय पर निर्भरता को कम करने के लिए आवश्यक है। पशुधन कृषि सकल घरेलू उत्पाद का 28 प्रतिशत है, और मत्स्य पालन को पशुपालन इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास निधि और पीएमएमएसवाई जैसी लक्षित योजनाओं के माध्यम से अधिक धन की आवश्यकता है। इसी तरह, बागवानी इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश, जैसे कि फ्रीजिंग, भंडारण और प्रसंस्करण से जुड़ी सुविधाएं, इस क्षेत्र की निर्यात क्षमता को बढ़ा सकती हैं। बजट में इन क्षेत्रों को एक ऐसी समेकित कृषि प्रणाली में एकीकृत किया जाना चाहिए, जो किसानों को अधिकतम लाभ प्रदान करे।डिजिटल कृषि: खेती की परंपराओं में सुधारकृषि क्षेत्र में डिजिटल क्रिया-कलाप शामिल होने से निर्णय प्रक्रिया और दक्षता में क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकता है। पारदर्शिता और बाजार की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ई-एनएएम जैसे प्लेटफॉर्म का विस्तार करके इसमें सभी मंडियों को शामिल किया जाना चाहिए। आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन, फसल बीमा और मृदा स्वास्थ्य निगरानी में एआई और ब्लॉकचेन जैसी उन्नत तकनीकों को एक साथ जोड़ने से दक्षता और जोखिम प्रबंधन में काफी सुधार हो सकता है। 10,000 कृषक उत्पादक संगठनों (एफपीओ) की स्थापना के लिए मजबूत वित्तीय और तकनीकी सहायता की आवश्यकता है, ताकि सामूहिक सौदेबाजी और बाजार पहुंच में वृद्धि के माध्यम से लघु एवं सीमांत किसानों को सशक्त बनाया जा सके।डिजिटल इकोसिस्टम के साथ स्पॉट और वायदा बाजारों को जोड़नाकेंद्रीय बजट में मजबूत डिजिटल इकोसिस्टम और डेटा-संचालित संरचना विकसित करके स्पॉट और वायदा बाजारों को एक साथ जोड़ने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। ई-एनएएम जैसे डिजिटल स्पॉट बाजारों का विस्तार करके इसमें सभी मंडियों को शामिल करना और उन्हें इलेक्ट्रॉनिक वेयरहाउस रिसीट (ई-डब्ल्यूआर) से जोड़ना किसानों को उनकी फसल की कुल उपज का मुद्रीकरण करने, संकट की स्थिति में बिक्री को कम करने और वैश्विक व्यापार मानकों का अनुपालन करने में सक्षम बना सकता है। वस्तुओं के लिए एक केंद्रीकृत डेटा भंडार, वेयरहाउसिंग सिस्टम, ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म और सरकारी एजेंसियों से इनपुट को समेकित करके, वायदा बाजारों में सटीक मूल्य का पता लगाने और जागरूक निर्णय लेने की सुविधा प्रदान कर सकता है। इसके अलावा, स्पॉट और वायदा बाजारों के विकास को सुसंगत बनाने के लिए लगातार नीतिगत समर्थन आवश्यक है। इस पूरी प्रक्रिया में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वे इनके बीच तालमेल बिठाते हुए कार्य करें। यह दृष्टिकोण पारदर्शिता को बढ़ावा देगा, मूल्य का पता लगाने की संभावना बढ़ाएगा और एक कृषि बाजार के एक मजबूत इको-सिसस्टम का निर्माण करेगा, जो वैश्विक बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देते हुए सभी हितधारकों को सशक्त बनाएगा।लघु और सीमांत किसानों की ऋण तक पहुंच बढ़ानासंस्थागत ऋण तक पहुंच छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है, जिसमें किरायेदार किसान भी शामिल हैं, जिनकी संख्या भारत के शहरीकरण के साथ बढ़ रही है। ये किसान अक्सर अनौपचारिक ऋणदाताओं से उच्च ब्याज दर पर कर्ज लेते हैं। छोटे और पट्टे पर खेती करने वाले किसानों पर ध्यान केंद्रित करते हुए कृषि ऋण लक्ष्य को 20 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 25 लाख करोड़ रुपये करना आवश्यक है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के तहत प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने से फसल बीमा अपनाने को बढ़ावा मिल सकता है। एक मजबूत ऋण और बीमा संरचना किसानों की सुरक्षा कर सकता है, उनकी वित्तीय कमजोरियां कम कर सकता है और लाभदायक निवेश को प्रोत्साहित कर सकता है।महिला सशक्तीकरण : भारतीय कृषि का आधारभारत के कृषि कार्यबल में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। उन्हें संसाधनों तक पहुंचने और निर्णय लेने वाले प्लेटफार्मों में भाग लेने के लिए प्रणालीगत बाधाओं का सामना करना पड़ता है। वे लगभग 33 प्रतिशत कृषि भूमि मालिकों का प्रतिनिधित्व करती हैं, किंतु उनके पास अक्सर आय और परिसंपत्तियों पर नियंत्रण नहीं होता है। ऐसे में यह बात महत्वपूर्ण है कि उन्हें कौशल विकास, भूमि स्वामित्व अधिकार और संस्थागत ऋण तक पहुंच को बढ़ावा देने हेतु महिला-पुरुष आधारित विशिष्ट कार्यक्रम तैयार किए जाएं। बजट में महिला किसानों को सशक्त बनाने की पहल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि सुनिश्चित करने में उनकी आवश्यक भूमिका को स्वीकार करना चाहिए।भारत को कृषि व्यापार में वैश्विक अग्रणी बनानाभारत के कृषि निर्यात में वृद्धि की अपार संभावना है, जिसका मूल्य 2023-24 के लिए 50 बिलियन डॉलर है। निर्यात इन्फ्रास्ट्रक्चर और रसद को बढ़ाने के लिए 10,000 करोड़ रुपये का कोष स्थापित करने से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सुधार होगा। जैविक और मूल्यवर्धित उत्पादों में निवेश उच्च मूल्य वाले अंतरराष्ट्रीय बाजारों को लक्षित कर सकता है। रणनीतिक व्यापार साझेदारी और द्विपक्षीय समझौतों में गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने और भारतीय निर्यात को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। किसान प्रतिनिधियों और व्यापार विशेषज्ञों से युक्त एक वैधानिक निकाय व्यापक निर्णय प्रक्रिया सुनिश्चित कर सकता है, जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाते हुए देश के किसानों के हितों की रक्षा करे।संक्षेप में, केंद्रीय बजट वित्त वर्ष 2025-26 भारतीय कृषि के भविष्य की फिर से कल्पना करने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। मौजूदा चुनौतियों का समाधान करके तथा अनुसंधान और विकास को प्राथमिकता देने, इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार करने, जलवायु के प्रति अनुकूलन को बढ़ावा देने और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने जैसी रणनीतिक पहलों को लागू करके, सरकार कृषि को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी उद्योग के रूप में आगे बढ़ा सकती है। इसके अतिरिक्त, डिजिटल प्रगति के माध्यम से किसानों को सशक्त बनाना और ऋण तक समान पहुंच सुनिश्चित करना अर्थव्यवस्था के आधार को मजबूत करेगा और लाखों लोगों के लिए स्थायी आजीविका प्रदान करेगा। जीएसटी परिषद की तर्ज पर कृषि विकास परिषद (एडीसी) की स्थापना वर्तमान समय की मांग है। इनके परिणामस्वरूप भारतीय कृषि विकास और नवाचार का एक शक्तिशाली प्रतीक बनकर दूसरों के लिए एक बेंचमार्क स्थापित कर सकती है।(डॉ. नवीन पी सिंह, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि लागत और मूल्य आयोग के आधिकारिक सदस्य हैं, आलेख में व्यक्त किए गए विचार विशुद्ध रूप से उनके निजी हैं।)
- लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)यह मिट्टी चंदन सी महकी ,खेतों में सावन हँसता है ।वंदन करते मातृभूमि को ,हर दिल में भारत बसता है ।।छाई हरियाली वन-उपवन ,वसुधा ओढ़े चूनर धानी ।पूजे जाते पर्वत पौधे ,नदियों को माता मानी ।गूँजे स्वर अजान गुरुबानी ,वेद मंत्र पावन करता है ।।हर दिल में भारत बसता है ।।
सहिष्णुता समुदायों में है ,प्रेम समन्वय भाईचारा ।संस्कृतियों की गंगा बहती ,सुविचारों की निर्मल धारा ।विपदा संबल धैर्य बढ़ातीं ,वक्त कसौटी में कसता है ।हर दिल में भारत बसता है ।।
त्यौहारों की धूम यहाँ पर ,रंगोली घर के आँगन में ।सोंधी खुशबू व्यंजनों की ,झूले सजते हैं सावन में ।तीज दिवाली होली राखी ,लाती मन में समरसता है ।।
गौतम गाँधी सुभाष नेहरू ,अनमोल रत्न भारत के हैं ।विश्वगुरु बना शांति प्रणेता ,किस्से कई शहादत के हैं ।राम कृष्ण जन्मे जिस भू पर ,मूल्य धर्म की सरसता है ।।
कबीर नानक रहीम तुलसी ,संत हुए हैं ज्ञानी ध्यानी ।महिमा राम नाम गुण गाए ,समझें मूढ़ मति अज्ञानी।ग्रंथ कई महान रच डाले ,जीवन-शिक्षा पावनता है ।।सीमा की रक्षा के प्रहरी ,साहस शौर्य की मूरत हैं ।मर-मिटने को तैयार सदा ,त्याग समर्पण की सूरत हैं ।इन वीर सैनिकों के आगे ,दुश्मन न कोई भी टिकता है ।। - आलेख- श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, केंद्रीय संस्कृति मंत्रीपराक्रम दिवस के अवसर पर, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 128वीं जयंती को रेखांकित करता है, हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके अपार योगदान और उनकी अदम्य भावना का सम्मान करते हैं, जो आज भी युवाओं को प्रेरित करती है। इस दूरदर्शी नेता के जीवन और आदर्शों का उत्सव मनाने के लिए स्थापित, पराक्रम दिवस इस बात पर विचार करने का एक अवसर है कि हम उनके सिद्धांतों को अपनी व्यक्तिगत और राष्ट्रीय आकांक्षाओं के साथ कैसे एकीकृत कर सकते हैं। यह दिन, न केवल उनके बलिदान की याद दिलाता है, बल्कि कार्रवाई का आह्वान भी करता है तथा हमें साहस, निष्ठा और नेतृत्व के उनके सिद्धांतों को अपनाने का आग्रह करता है, ताकि एक समृद्ध, आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण किया जा सके।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, नेताजी के योगदान को संस्थागत रूप दिया गया है तथा इसे पहले से कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर मनाया जा रहा है। 2021 में, सरकार ने 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में नामित किया, जिससे नेताजी की विरासत का सम्मान करने के लिए वार्षिक राष्ट्रव्यापी समारोह सुनिश्चित हुआ। कर्त्तव्य पथ पुनर्विकास परियोजना के तहत इंडिया गेट पर नेताजी की प्रतिमा का अनावरण, उनके विजन के प्रति एक ऐतिहासिक श्रद्धांजलि थी। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे "भारतीय गौरव और संस्कृति के पुनरुत्थान" का प्रतीक घोषित किया, जो बोस के राष्ट्रवाद के आदर्शों के अनुरूप है।इसके अलावा, नेताजी से जुड़ी 304 फाइलों को सार्वजनिक करना एक ऐतिहासिक कदम था, जिसने दशकों से चल रही अटकलों को खत्म कर दिया और जनता को उनके जीवन और कार्य से जुड़े महत्वपूर्ण रिकॉर्ड तक पहुंच प्रदान की। इसके अतिरिक्त, मणिपुर के मोइरंग में आईएनए मेमोरियल का पुनरुद्धार, जहां इंडियन नेशनल आर्मी ने पहली बार तिरंगा फहराया था, नेताजी की विरासत को संरक्षित करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। माननीय प्रधानमंत्री मोदी ने बोस के वैश्विक प्रभाव पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, "नेताजी का जीवन स्वतंत्रता के लिए समर्पित था और उन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी, जो आत्मनिर्भर और आत्मविश्वास से भरा हो।"सुभाष बोस का जन्म कटक में एक सम्मानित परिवार में हुआ था। वे एक प्रतिभाशाली छात्र थे। कटक के रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल, कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज और भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) परीक्षा में उन्होंने अपने अध्ययन का बेहतरीन प्रदर्शन किया। देशभक्ति की गहरी भावना और अपने देश की सेवा करने की इच्छा से प्रेरित होकर, उन्होंने एक सम्मानजनक करियर की सुख-सुविधाओं को ठुकराते हुए आईसीएस से इस्तीफा देने का फैसला किया। बाद में, उन्होंने देशभक्ति की भावना जगाने और देशवासियों के बीच स्वतंत्रता का संदेश फैलाने के लिए 1921 में 'स्वराज' नामक एक समाचार पत्र शुरू किया।नेताजी का स्वतंत्र भारत का सपना सिर्फ़ एक सपना नहीं था, बल्कि कार्रवाई का आह्वान था। जब वे 1941 में नज़रबंदी से भाग निकले और अंतरराष्ट्रीय समर्थन मांगा, तो यह सिर्फ़ एक रणनीतिक कदम नहीं था - यह दृढ़ संकल्प, सहनशीलता और ज़रूरत पड़ने पर अपरंपरागत रास्ते अपनाने की इच्छाशक्ति का एक साहसिक दावा था।उन्होंने घोषणा की, "मुझे खून दो और मैं तुम्हें आजादी दूंगा," यह उनके इस विश्वास को दर्शाता है कि सच्ची आज़ादी के लिए सिर्फ़ शब्दों की नहीं, बल्कि कार्यों की भी जरूरत होती है। चाहे वह इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) के निर्माण के ज़रिए हो या आज़ाद हिंद रेडियो पर उनके भाषणों के ज़रिए, बोस ने दिखाया कि आज़ादी हासिल करने के लिए सामूहिक प्रयास, बलिदान और प्रगति के व्यापक दृष्टिकोण में योगदान देने की इच्छा की ज़रूरत होती है। पूर्व ब्रिटिश पीएम क्लेमेंट एटली ने एक बयान में अंग्रेजों के भारत छोड़ने के कई कारण बताए, "उनमें से सबसे प्रमुख कारण था - नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरूप भारतीय सेना और नौसेना कर्मियों के बीच ब्रिटिश राज के प्रति वफादारी का कम होना।"यद्यपि महात्मा गांधी के साथ उनके वैचारिक मतभेद जगजाहिर थे, लेकिन गांधी के सिद्धांतों के प्रति बोस का सम्मान अटल रहा और उनके विपरीत रास्ते उनके पृथक दृष्टिकोणों को उजागर करते थे। नेताजी ने 1939 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया, लेकिन भारत की स्वतंत्रता की उनकी प्रतिबद्धता कभी कम नहीं हुई। आज के युवाओं के लिए, यह हमें अपने आदर्शों के प्रति सच्चे रहने का महत्व सिखाता है, भले ही आगे का रास्ता चुनौतियों से भरा हो।नेताजी ने आईएनए के भीतर “झांसी की रानी रेजिमेंट” का गठन करके “नारी शक्ति” के महत्व को मान्यता दी, एक पूरी तरह से महिला रेजिमेंट जिसने महिला सशक्तिकरण के प्रति उनके विश्वास को सुदृढ़ किया। ये आदर्श माननीय प्रधानमंत्री के भारत के विज़न में अच्छी तरह से परिलक्षित होते हैं, जहाँ महिलाएँ देश के भविष्य को आकार देने में एक अभिन्न भूमिका निभाती हैं।पराक्रम दिवस, नेताजी की अमर विरासत का एक वार्षिक अनुस्मारक आयोजन बन गया है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रदर्शनियों से युक्त समारोहों के पिछले आयोजनों ने उनके योगदान को प्रतिष्ठा दी है, जिसमें कोलकाता और दिल्ली प्रमुख आयोजन स्थल हैं, जहाँ उनकी एकता और देशभक्ति की भावना सड़कों पर गूंजती थी। इस वर्ष, कटक में, इस कार्यक्रम का विशेष महत्व है, क्योंकि यह उनके मूल स्थान का सम्मान करता है।एक ऐसी दुनिया में जो सुदृढ़ता और नवाचार की मांग करती है, उनकी जीवन गाथा युवाओं को एक विकसित भारत - एक आत्मनिर्भर, विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने और कार्य करने के लिए एक शक्तिशाली प्रेरणा के रूप में कार्य करती है। जैसा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था, "सुभाष चंद्र बोस का नाम देशभक्ति की भावना जगाता है और राष्ट्र को साहस और निस्वार्थ भाव से कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।"आइए हम एक उज्ज्वल, मजबूत भविष्य के लिए मिलकर काम करके उनकी विरासत को आगे बढ़ाएं।
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सजल
लेखिका-डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)शुभ कर्मों का सुखद परिणाम होता है।सफल होने का निश्चित दाम होता है।।बोझ ढोती हर सदी परिणामों की।देव-दनुज में सदा संग्राम होता है।।आत्म-परीक्षण जीत की है प्रथम सीढ़ी।दृढ़ संकल्पों से पूर्ण काम होता है।।नत्वर्थक बातों को अंतस से निकाल।शुचिता से तीर्थ पावन धाम होता है।।धन वैभव पद बल होतीं नश्वर चीजें ।सत्कर्मों से जगत में नाम होता है।। - - डॉ. जितेंद्र सिंह (केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय, अंतरिक्ष विभाग और परमाणु ऊर्जा विभाग राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ क्षेत्र में सूर्योदय होने के साथ ही महा-आयोजन की व्यापकता और विशालता दिखने लगती है। वहां उपस्थित विशाल मानव समूह की केवल कल्पना कीजिए जहां प्रत्येक व्यक्ति आस्था और भक्ति के सागर में हिलोरें ले रहा है। लेकिन विश्व की इस विस्मयकारी महाघटना में पर्दे के पीछे अथक परिश्रम करने वाले मूक नायक के तौर पर उन्नत अपशिष्ट प्रबंधन प्रौद्योगिकियां काम कर रही हैं। एक भव्य संगीत सिम्फनी के अनाम परिचालकों की तरह ये नवाचार सुनिश्चित करते हैं कि सफाई और स्वच्छता, संगीत के हर सुर-लहरी की तरह पूरी तरह लयबद्ध हो।महाकुंभ में उच्च तकनीक वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से लेकर प्राकृतिक शुद्धिकरण तालाबों तक, प्रत्येक उपाय पर्यावरण की शुद्धता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। परंपरा और प्रौद्योगिकी का यह सामंजस्यपूर्ण मिश्रण न केवल महाकुंभ के आध्यात्मिक सार को संरक्षित करता है, बल्कि दुनिया भर में भविष्य के बड़े पैमाने पर आयोजित होने वाले समारोहों के लिए एक मानक भी स्थापित करता है।एक हलचल भरे शहर की कल्पना करें जो रातोंरात अस्तित्व में आ गया हो, जहां करोड़ों लोग एक भव्य आयोजन के लिए जुटे हों। 45 दिनों के इस विशाल धार्मिक आयोजन में जिसमें अनुमानित तौर पर 40 करोड़ आगंतुक पहुंचे हों, वहां हर दिन उत्पन्न कचरे का प्रबंधन हैरत में डालने वाला है। हालांकि इससे अधिकारी विचलित नहीं हुए और उन्होंने इस कठिन कार्य के लिए भारत के दो प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) की मदद ली है।महाकुंभ में उत्पन्न अपशिष्ट दिमाग को चकरा देने वाला है। वहां हर दिन लगभग 16 मिलियन लीटर मल विष्ठा, 240 मिलियन लीटर ग्रे-वाटर (शौचालय को छोड़कर अपशिष्ट जल) और करोड़ों तीर्थयात्रियों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पन्न ठोस अपशिष्ट शामिल हैं। इसके निपटान प्रबंधन के लिए परिष्कृत समाधानों की आवश्यकता पड़ी और तभी उन्नत प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल काम आया।इनमें से एक हाइब्रिड ग्रेनुलर सीक्वेंसिंग बैच रिएक्टर (एचजीएसबीआर) है, जिसे इसरो और बार्क के सहयोग से विकसित किया गया है। ये उच्च तकनीक की वॉशिंग मशीन जैसा है जो कपड़े साफ करने की बजाय सीवेज का निपटान करता है। इस तकनीक का उपयोग तीन प्रीफैब्रिकेटेड मल विष्ठा ट्रीटमेंट प्लांट (एफएसटीपी) में किया जा रहा है, जो मानव अपशिष्ट को कुशलतापूर्वक संसाधित कर सुनिश्चित करता है कि वातावरण स्वच्छ और सुरक्षित रहे।वहां एक अन्य तकनीक जीओ ट्यूब टेक्नोलॉजी अपनाई जा रही है जो कचरे के नियंत्रण और उपचार में सहायक है। यह सुनिश्चित करती है कि पर्यावरण में केवल स्वच्छ पानी ही छोड़ा जाए। यह एक विशाल चाय बैग की तरह है जो बड़ी मात्रा में तरल अपशिष्ट सोखकर उसे साफ करता है।महाकुंभ में स्वच्छता के लिए इस्तेमाल की जा रही एक अन्य तकनीक बायोरिमेडिएशन है। यह बड़े तालाबों के लाभकारी सूक्ष्मजीवों जैसा है जो प्रदूषकों को विखंडित कर पानी को शुद्ध करता है। इस प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल विधि को लगभग 75 बड़े तालाबों में एकत्र किए गए ग्रेवाटर में इस्तेमाल की जाएगी ताकि जल को प्रभावी और सुरक्षित रूप से उपचारित किया जाए।उत्तर प्रदेश सरकार ने 7,000 करोड़ रुपये के कुल महाकुंभ बजट में अपशिष्ट प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता दर्शायी है। वहां अपशिष्ट और जल प्रबंधन के लिए 1,600 करोड़ रुपए और खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) बुनियादी ढांचे के लिए 316 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। यह वित्तीय और ढांचागत प्रतिबद्धता आयोजन के दौरान स्वच्छता और साफ-सफाई बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करता है।स्वच्छता उपायों में इन प्रौद्योगिकियों के इस्तेमाल का उद्देश्य महत्वपूर्ण पर्यावरणीय चिंताओं को कम करना है। वे नदी के जल प्रदूषण को रोकते हैं, अपशिष्ट और सीवेज से संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को कम करते हैं, और बड़े पैमाने पर लोगों के एकत्रित होने के पारिस्थितिकी नुकसान में कमी लाते हैं। अपशिष्ट प्रबंधन परिचालन रणनीति में मैनुअल हैंडलिंग को कम से कम करना, उन्नत तकनीकों का उपयोग कर स्रोत-स्तरीय अपशिष्ट पृथक्करण पर जोर देना और व्यापक निपटान तंत्र को लागू करना शामिल है।इसके अतिरिक्त वहां अन्य आरंभिक उपायों में 1 लाख 45 हजार पोर्टेबल शौचालयों की स्थापना, निरंतर सफाई के लिए बड़ी संख्या में सफाई कर्मियों की तैनाती, पर्याप्त चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था और एक व्यापक अपशिष्ट संग्रह और प्रबंधन बुनियादी ढांचे शामिल हैं।ये उन्नत प्रौद्योगिकियां बड़े पैमाने पर धार्मिक समारोहों के प्रबंधन में व्यापक बदलाव दर्शाते हैं। वे पर्यावरणीय स्थायी अपशिष्ट प्रबंधन, अल्प स्वास्थ्य जोखिम, न्यूनतम पारिस्थितिक व्यवधान और कुशल संसाधन उपयोग के उपाय प्रदान करते हैं। यह महाकुंभ 2025 में बड़े पैमाने पर धार्मिक समागमों से जुड़ी जटिल प्रचालनतंत्र और पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रबंधन में भारत की तकनीकी कौशल का दस्तावेज है। यह एक दीप्तिमान उदाहरण है कि प्रौद्योगिकी और परंपरा सबके लिए कैसे एक स्वच्छ, स्वस्थ भविष्य निर्मित कर सकते हैं।
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-कहानी
लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
बरसों बाद अनुभा अपनी सहेलियों के साथ छुट्टी मनाने अपने गाँव जा रही थी । दादा - दादी के गुजर जाने के बाद पापा ने ही वहाँ जाना छोड़ दिया तो बाकी लोगों का तो प्रश्न नहीं उठता । बचपन की कुछ बातें अभी भी स्मृतियों में स्थान
बनाये हुए हैं । गाँव है भी तो बहुत दूर..पहाड़ों के आँचल तले
हरे - भरे वनों के बीच नदी ,तालाबों , बावड़ियों से भरपूर ।ऐसी घनी छाँह फिर नसीब नहीं हुई , वह तो हार गई पापा की मिन्नतें कर - कर के पर पापा ने तो कुछ न कहने की कसम खा ली थी । अनुभा समझ सकती थी उनका मन..उस जगह उनकी कितनी खट्टी - ,मीठी यादें हैं । उनके अपने जिन्होंने उन्हें गोद में खिलाया , साथ पढ़े हमजोली बने । कुछ हैं तो कुछ बिछड़ गये । ज्यादातर तो चले ही गये , उन्हें याद कर अधिक उदास हो जाते थे पापा इसलिए कभी किसी ने बहुत जिद नहीं की । अब वक्त काफी आगे निकल चला है ,अनुभा की शादी हो गई और अब वह अपने निर्णय लेने में समर्थ है।एक दिन उसने अपनी सहेलियों के सामने अपने खूबसूरत गाँव का जिक्र किया तो वे भी व्यग्र हो उठीं कि कुछ दिन शहर के कोलाहल , नौकरी की चिखचिख और व्यस्तताओं के बीच कुछ सुकून के पल चुरा लिया जाये । भीड़ भरे हिल स्टेशन जाना कोई नहीं चाहता था इसलिए आनन -फानन प्रोग्राम बन गया ।
विंध्याचल की खूबसूरत शिखरों के बीच एक छोटा सा गाँव था रामपुर जिसकी आबादी बमुश्किल ढाई सौ होगी । हाँ थोड़ा मालगुजार लोगों का गाँव था तो बड़े - बड़े मकानों के नक्काशीदार दरवाजों , मण्डपों के खंडहर आज भी उस वक्त की सम्पन्नता की कहानी कह रहे थे । अब तो लगभग खाली हो चुका था यह , सभी शहरों की ओर पलायन कर गये । दो - चार लोग जिनकी जिंदगी मजदूरी व खेती के सहारे चलती थी , वे ही रुके हुए थे ।अनुभा के दादा के घर में उनका एक बहुत पुराना नौकर पीढ़ियों से घर की देखभाल कर रहा था और अपने परिवार के साथ वहीं रहता था । चूंकि पापा ने खबर भिजवा दी थी तो उन्होंने घर की सफाई व अन्य व्यवस्था ठीक कर दी थी ।
गाँव के संघर्ष भरे , झुर्रीदार चेहरों के बीच कोई पहचाना चेहरा ढूँढना अनुभा के लिए मुश्किल था , पापा का नाम बताने पर कुछ किस्से निकल पड़ते । दादाजी को सभी जानते थे । गाँव के आस - पास के कई मंदिर और दर्शनीय स्थल देखकर वे भावाभिभूत थे । नैसर्गिक सौंदर्य वहाँ के कण - कण में विद्यमान था । जंगली हवा के झोंके की तरह वे इधर - उधर डोलते रहे । एक दिन अनुभा को याद आया कि बचपन में उसे और सभी बच्चों को एक बावड़ी की तरफ जाने की सख्त मनाही थी । बच्चे क्या बड़े भी उधर झाँकने नहीं जाते थे । कहा जाता था कि वह बावड़ी अभिशप्त है । उसका स्वच्छ जल देखकर कई लोगों ने कोशिश की उसे खुलवाने की पर वह जीवित नहीं बचा । क्या आज भी उसे खोला नहीं गया है -अनुभा ने उसकी पड़ताल की तो पता चला कि अब भी उस खूनी बावड़ी के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता । उनके नौकर की पत्नी ने बताया कि वर्षों पहले उस बावड़ी में नैना की खुदकुशी करने के बाद वह बावड़ी अभिशप्त है और अब उसमें झाँकने वाला हर शख्स दूसरे दिन मरा हुआ मिलता है इसलिए उस बावड़ी को तारों से घेर कर बन्द कर दिया गया है ताकि अब और कोई जान न जाये ।
अनुभा और उसकी सहेलियाँ उस कहानी को जानने को बेचैन हो उठीं जो रोंगटे खड़े कर देने वाली थी । किसी पहाड़ी नदी की तरह चंचल व निश्छल थी नैना , बेहद खूबसूरत । उसका सरस् चितवन चर्चा का विषय बन चुका था , यौवन के आरंभ में ही उसे पाने को कई लोग बेताब हो उठे थे । बड़े - बड़े घरों के रिश्ते आने लगे थे पर वह पगली अपने बचपन के साथी श्रवन से मन ही मन प्यार करने लगी थी । एक मालगुजार की बेटी , हजारों बंदिशों के बीच पलती रही और अपने घर काम करनेवाले रामू काका के बेटे श्रवन को दिल फे बैठी । पिता को जब यह जानकारी हुई तो खानदान की इज्जत बचाने की जिद ने सही - गलत भुला दिया । श्रवन की हत्या कर उसी बावड़ी में डाल दिया गया । दुःख और प्रेम के वियोग में पागल हो गई नैना । वह अपनी सुध - बुध भूल बैठी ,सच्चाई मालूम होने पर उसी बावड़ी में कूदकर उसने अपनी जान दे दी । उसके बाद तो गाँव में मौत का तांडव होने लगा । न जाने कितनी जानें ली उस खूनी बावड़ी ने । भूलकर भी कोई उधर चला गया तो जिंदा नहीं बचता इसलिए लोग अपना घर बार , खेती - बाड़ी बेचकर यहाँ से निकलते गये और कभी लौटकर नहीं आये । अनुभा को अब समझ आया कि पापा जी इसीलिए गाँव जाने के नाम से ही सहम जाते थे और उदास हो जाते थे । अब वे शीघ्र वहाँ से निकल जाना चाहते थे क्योंकि अनुभा जानती थी पापा तब तक चिंतित रहेंगे जब तक वह वापस घर नहीं पहुँच जाती । कुछ सोचकर उसके होठों पर मधुर मुस्कान खिल गई थी .....जिंदगी के कठोर अनुशासन में रहे पापा जी ने उसके प्रेम - विवाह को स्वीकार कर लिया था शायद यह उस अभिशप्त खूनी बावड़ी का उसे उपहार था । - आलोख- श्री गिरिराज सिंह, केंद्रीय कपड़ा मंत्री"कभी-कभी कोई नई प्रौद्योगिकी, कोई लंबे अर्से से चली आ रही समस्या और कोई साहसिक विचार मिलकर नवाचार की रचना करते हैं " - डीन कामेनयह विचारशील उद्धरण सफलताओं के सार को रेखांकित करता है: जब चुनौतियां नए परिप्रेक्ष्यों से जुड़ती हैं और प्रौद्योगिकी नए समाधानों तक पहुंचने के सेतु का काम करती है। वस्त्र जैसे उद्योगों में, यह तालमेल पारंपरिक तरीकों में बदलाव ला रहा है, स्थिरता को बढ़ावा दे रहा है, और नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है। पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता और सहायक सरकारी नीतियां मिश्रित सामग्रियों में सुदृढीकरण के रूप में बास्ट फाइबर के उपयोग में तेजी ला रही हैं, ताकि बढ़ती आबादी की ज़रूरते पूरी की जा सकें। बास्ट फाइबरों का प्राकृतिक रूप से सड़नशील होना और उनकी प्रचुरता, पर्यावरण के अनुकूल नवाचार की ओर बदलाव को चिह्नित करते हुए उन्हें ऑटोमोटिव उद्योग, संरचनात्मक कंपोजिट, पल्पिंग और टेक्सटाइल में प्रयोग के लिए आदर्श बनाती है।प्राकृतिक चमत्कार मिल्कवीड फाइबर, भारत के वस्त्र परिदृश्य में क्रांति लाने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के विजन को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान देने को तत्पर है। अपने आशाजनक गुणों, टिकाऊ खेती और किसानों की आजीविका को बढ़ाने की अपार संभावनाओं के साथ, मिल्कवीड बढ़ती आबादी के साथ वैकल्पिक फाइबर की अत्यावश्यक मांग का समाधान है, जो भारत के सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय लक्ष्यों के अनुरूप है।मिल्कवीड कोई साधारण फाइबर नहीं है। इसके बीज की फली के भीतर लगे रेशमी, खोखले तंतुओं से प्राप्त, यह हल्का फाइबर असाधारण गुणों से युक्त होता है, जो इसे टिकाऊ सामग्रियों की तलाश में अग्रणी बनाता है। इसकी खोखली संरचना इसे उच्च संपीड़न और बेहतरीन थर्मल इन्सुलेशन प्रदान करती है, जिसका थर्मल मूल्य 100 प्रतिशत पॉलिएस्टर नॉनवॉवन (या बिना बुने कपड़े) से लगभग दोगुना है। मिल्कवीड को पॉलिएस्टर, ऊन, विस्कोस या कपास जैसे अन्य फाइबरों के साथ मिश्रित किए जाने पर, यह कपड़े की कोमलता, सांस लेने की क्षमता और गर्माहट को बढ़ाता है, जिससे न केवल आरामदायक बल्कि प्रीमियम गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार होते हैं।मिल्कवीड की तकनीकी विशेषताओं के अतिरिक्त इसकी खेती भारत के कृषक समुदाय के लिए परिवर्तनकारी अवसर प्रस्तुत करती है। इस बारहमासी फसल को न्यूनतम इनपुट की आवश्यकता होती है। यह नाना प्रकार की मिट्टी की स्थितियों में पनपता है, और बदलती जलवायु के साथ सामंजस्य स्थापित कर लेता है। एक बार लगाए जाने के बाद, यह 10 साल तक उपज देता रहता है, और इसकी पैदावार में सालाना वृद्धि होती है। किसान प्रति एकड़ लगभग 1.5-2 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त कर सकते हैं, जो कपास जैसी पारंपरिक फसलों से होने वाली आय की तुलना में काफी अधिक है। यह न केवल वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करता है बल्कि संसाधन-गहन फसलों पर निर्भरता को भी कम करता है, जिससे यह एक टिकाऊ और आकर्षक विकल्प बन जाता है।नॉनवॉवन फैब्रिक(30प्रतिशत मिल्कवीड फाइबर सहित)भारत में भेड़ों की आबादी 7.4 करोड़ से अधिक है और वह सालाना 3.69 करोड़ किलोग्राम कार्पेट-ग्रेड ऊन का उत्पादन करता है, लेकिन परिधान में इस्तेमाल होने वाले मेरिनो जैसे उत्तम ग्रेड के ऊन के लिए वह वित्तीय वर्ष 2023-24 के अनुसार लगभग 1,800 करोड़ रुपये मूल्य जितने आयात पर निर्भर करता है। घरेलू स्तर पर उत्पादित ऊन आम तौर पर बेहतर गुणवत्ता का नहीं होता है, जिससे अक्सर असुविधा होती है और यह त्वचा के अनुकूल नहीं होता है। जबकि पश्मीना ऊन, जिसका माइक्रोन मूल्य 20 से कम है, असाधारण गुणवत्ता का होता है, इसका उत्पादन सीमित है। सरकार की पश्मीना ऊन विकास योजना और एकीकृत ऊन विकास कार्यक्रम जैसी पहलों ने लद्दाख, जम्मू -कश्मीर और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में भेड़ पालन, पश्मीना उत्पादन और बुनियादी ढांचे को मजबूत किया है। यह क्षेत्र 35 लाख लोगों को आजीविका प्रदान करता है और वैश्विक बाजारों में भारत के ऊनी कार्पेट, कपड़ों और परिधानों के निर्यात को बढ़ावा देता है।मिल्कवीड-ऊन मिश्रण एक टिकाऊ समाधान के रूप में उभरा है, जो फाइबर की गुणवत्ता को बढ़ाते हुए आयात पर निर्भरता को कम करता है। उत्तर भारत वस्त्र अनुसंधान संघ (निटरा) द्वारा उद्योग जगत के हितधारकों के सहयोग से हाल ही में की गई प्रगति ने एक अभिनव 80:20 ऊन-मिल्कवीड मिश्रण की औद्योगिक व्यवहार्यता को प्रदर्शित किया है। यह मिश्रण थर्मल इन्सुलेशन, हल्के गुणों और कोमलता में 100 प्रतिशत ऊन से आगे निकल जाता है, जो इसे उच्च-स्तरीय और कार्यात्मक वस्त्रों के लिए प्रीमियम पसंद बनाता है।मिल्कवीड की बहु उपयोगिता कई तरह के अनुप्रयोगों तक फैली हुई है। परिधान, घरेलू वस्त्र और स्वच्छता उत्पादों से लेकर विभिन्न उत्पादों में पारंपरिक फाइबर की जगह लेने की इसकी क्षमता अपार है। लद्दाख की अपनी यात्रा के दौरान, मुझे मिल्कवीड के रेशों से बने उत्पादों की असाधारण गुणवत्ता का प्रत्यक्ष अनुभव करने का अवसर मिला। मैंने इस फाइबर से बनी एक रजाई का परीक्षण किया और इसे बेहद गर्म और आरामदायक पाया – यहां तक कि मुझे किसी भी हीटिंग उपकरण का उपयोग करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ी। मैंने निटरा द्वारा विकसित एक टोपी और जैकेट को भी आज़माया, जिन्होंने पूरी यात्रा के दौरान मुझे बखूबी गर्म रखा। मिल्कवीड उत्पादों के टिकाऊपन और प्रदर्शन का जायजा लेने के लिए इन सर्दियों में मैं स्वयं इन उत्पादों को नियमित रूप से पहन रहा हूं। अपने अनुभव के आधार पर मुझे विश्वास है कि मिल्कवीड फाइबर एक आशाजनक विकल्प है, जो रोजगार सृजन और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।मिल्कवीड जैकेटमिल्कवीड हाइकिंग कैपइस पहल के मूल में आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करने - स्वदेशी संसाधनों और नवीन तकनीकों के माध्यम से स्वावलंबी भारत बनाने की प्रतिबद्धता निहित है। मिल्कवीड को वस्त्र मूल्य श्रृंखला में एकीकृत करके, भारत आयातित फाइबर पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है और खुद को टिकाऊ वस्त्रों के क्षेत्र में ग्लोबल लीडर के रूप में स्थापित कर सकता है। यह तकनीकी वस्त्रों के साथ एनबीएस (प्रकृति-आधारित समाधान) को बढ़ावा देने और संबद्ध करने के हमारे दृष्टिकोण के अनुरूप है, जिससे आर्थिक विकास और सामाजिक सशक्तीकरण का तरंग प्रभाव या रिपेल इफेक्ट उत्पन्न होता है।मिल्कवीड के पर्यावरणीय लाभ भी इतने ही आकर्षक हैं। इसकी खेती में कपास की तुलना में कम मात्रा में पानी, उर्वरक और कीटनाशकों की आवश्यकता होती है, जिससे पारंपरिक कृषि से जुड़े पर्यावरणीय तनाव कम होते हैं। इसके अतिरिक्त, पौध-आधारित, प्राकृतिक रूप से सड़नशील फाइबर के रूप में मिल्कवीड स्थिरता और सर्कुलेरिटी के वैश्विक प्रयास के साथ सहजता से जुड़ता है। यह सिंथेटिक फाइबर का एक व्यवहार्य विकल्प प्रदान करता है। मिल्कवीड को अपनाकर भारत जीवाश्म-व्युत्पन्न सामग्रियों पर अपनी निर्भरता कम करने और वस्त्र उद्योग में पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाता है।इस क्षेत्र के अन्य प्रयासों में हमारा फोकस जूट-बांस, सिसल, फ्लैक्स और रेमी जैसे नए युग के फाइबरों पर है, जो टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प प्रदान करके वस्त्र उद्योग में क्रांति ला रहे हैं। अपनी विशाल जैव विविधता के साथ भारत इस परिवर्तन का नेतृत्व करने के लिए विशिष्ट स्थिति में है। सिसल, अपने जीरोफाइटिक लचीलेपन के साथ, शुष्क परिस्थितियों में पनपता है, वस्त्रों, रस्सियों और कंपोजिट के लिए आदर्श टिकाऊ फाइबर उत्पन्न करता है। रेमी अपनी उच्च उपज और बहु उपयोगिता के लिए जाना जाता है और पर्यावरण के अनुकूल अपने गुणों तथा उच्च तन्यता शक्ति के साथ परिधान में उपयोग किया जाता है। इसी तरह, लिनन के कपड़ों जैसे डैमस्क, लेस और चादरों के लिए फ्लैक्स के सर्वोत्तम ग्रेड का उपयोग किया जाता है। वर्तमान में, फ्लैक्स फाइबर और 100प्रतिशत लिनन फैब्रिक के संबंध में आयात पर बहुत अधिक निर्भरता है, इस पहल से वस्त्र क्षेत्र में अवसरों के नए द्वार खुलेंगे। सुतली और रस्सी के निर्माण के लिए मोटे ग्रेड का उपयोग किया जाता है।इसके अलावा, जूट-बांस फाइबर सिंथेटिक फाइबर के लिए एक स्थायी विकल्प और लिनन कपड़े के लिए एक और असाधारण विकल्प की पेशकश करते हुए वस्त्र उद्योग के लिए अभूतपूर्व नवाचार और आशाजनक संभावनाएं प्रस्तुत करता है। 1.39 करोड़ हेक्टेयर में फैले और सालाना 1.4 करोड़ टन उपज प्रदान करने वाले बांस जैसे प्राकृतिक फाइबर, टिकाऊ उत्पादन में भारत की क्षमता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इन रेशों का उपयोग परिधान से लेकर तकनीकी वस्त्रों, रस्सियों, कंपोजिट और घरेलू साज-सज्जा तक पूरे वस्त्र सेक्टर में किया जा रहा है। इन रेशों को न केवल न्यूनतम संसाधनों की आवश्यकता होती है, अपितु वे विविध प्रकार की जलवायु के अनुकूल भी होते हैं, और किसानों की आय को बढ़ाकर ग्रामीण आजीविका में सहायता करते हैं, लेकिन साथ ही स्थिरता और सर्कुलेरिटी को भी बढ़ावा देते हैं।एक साधारण खरपतवार से लेकर राष्ट्रीय महत्व के रेशे तक मिल्कवीड की यात्रा भारत की आविष्कारशीलता और लचीलेपन का प्रमाण है। शोधकर्ताओं, किसानों और उद्योग के हितधारकों के सम्मिलित प्रयासों से, इस फाइबर में भारत के वस्त्र इतिहास को फिर से परिभाषित करने की क्षमता मौजूद है। यह परंपरा और नवाचार के समन्वय का प्रतीक है, जहां टिकाऊ प्रथाएं अत्याधुनिक तकनीक से मिलकर ऐसे उत्पाद बनाती हैं जो न केवल विश्व स्तरीय हैं बल्कि भारत के लोकाचार में भी गहराई से निहित हैं।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन, "नवाचार सूचकांक में, हम आगे बढ़ रहे हैं। हमें भारत को नवाचार के लिए एक आकर्षक गंतव्य बनाना होगा" के अनुरूप, भारत नवाचार का वैश्विक केंद्र बनने को तैयार है। जिस तरह वस्त्र उद्योग बढ़ती आबादी और बदलती जलवायु की चुनौतियों के अनुकूल बन रहा है, मिल्कवीड आर्थिक क्षमता को पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ जोड़ते हुए स्थिरता के प्रतीक के रूप में उभर रहा है। मिल्कवीड को अपनाकर, भारत हरित, अधिक समावेशी भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रहा है - एक ऐसा भविष्य, जहां आत्मनिर्भर भारत के आदर्श राष्ट्र की प्रगति में अलंकृत रूप से बुने हुए हैं। खेती का विस्तार करने, प्रसंस्करण को बढ़ाने और अनुसंधान एवं विकास में तेजी लाने के समर्पित प्रयासों के साथ भारत एक ऐसी वस्त्र क्रांति का नेतृत्व कर रहा है, जो वैश्विक पर्यावरणीय आवश्यकताओं और बाजार की मांगों, दोनों की पूर्ति करते हुए परंपरा का नवाचार के साथ बेजोड़ तरीके से विलय कर रही है।
- आलोख- डॉ. पी.एस. गोयल, भारत सरकार के पूर्व सचिव, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालयजुलाई 2006 में, जब पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय अस्तित्व में आया, तो भारत पृथ्वी प्रणाली विज्ञान के लिए समर्पित मंत्रालय रखने वाला पहला देश था। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को देश में पृथ्वी प्रणाली विज्ञान से संबंधित ज्ञान उत्पन्न करने और सेवाएँ प्रदान करने का कार्य सौंपा गया था: मौसम, जलवायु, महासागर और तटीय स्थिति, जल विज्ञान, भूकंप विज्ञान और प्राकृतिक खतरे; समुद्री सजीव और निर्जीव संसाधन; और पृथ्वी के ध्रुवों (आर्कटिक, अंटार्कटिक और हिमालय) के लिए सार्वजनिक लाभ के लिए। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भारत सरकार द्वारा राष्ट्रपति की अधिसूचना के माध्यम से महासागर विकास विभाग को पुनर्गठित करके बनाया गया था।प्रोफेसर रोधम नरसिम्हा द्वारा समुद्र और वायुमंडल को एक युग्मित प्रणाली के रूप में मानने और ठोस पृथ्वी और क्रायोस्फेयर को सोखने के द्वारा मौसम के पूर्वानुमान को बेहतर बनाने की आवश्यकता का हवाला देते हुए, मैं पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को तैयार करने के सावधानीपूर्वक कार्य का नेतृत्व करने के लिए सहमत हुआ। जुलाई 2005 में महासागर विकास विभाग का कार्यभार संभालने से पहले, मैं भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) सैटेलाइट सेंटर, बेंगलुरु में था। फिर, जब 2006 में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय अस्तित्व में आया, तो मैं (आधिकारिक रूप से) पहला सचिव था, जिसने मंत्रालय के समग्र संस्थागत ढांचे में वायुमंडलीय विज्ञान को महासागर विज्ञान घटक में एकीकृत करने का विशाल कार्य निष्पादित किया। उस समय, सीएसआईआर-राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान, गोवा और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की समुद्री शाखा को पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में शामिल करना भी विचाराधीन था विस्तृत अंतर-मंत्रालयी परामर्श के बाद, मंत्रिमंडल ने 12 जुलाई, 2006 को पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और पृथ्वी आयोग के गठन को मंजूरी दे दी। पृथ्वी आयोग ने चार सफल बैठकों के साथ अच्छा काम किया, जिनमें से दो प्रधानमंत्री कार्यालय में आयोजित की गईं। दुर्भाग्य से, मंत्रिमंडल ने घोषणा की कि पृथ्वी आयोग को कैबिनेट नोट का मसौदा तैयार करने में मामूली चूक के कारण एक वर्ष के फलदायी कामकाज के बाद मंजूरी नहीं मिली। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिवों और प्रतिष्ठित पृथ्वी विज्ञान विशेषज्ञों ने आर्कटिक और अंटार्कटिक में बर्फ पिघलने के कारण जलवायु परिवर्तन और बदलती विश्व व्यवस्था को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए एक पृथ्वी आयोग की स्थापना की आवश्यकता महसूस की है।1982 में, महासागर विकास विभाग मुख्य रूप से अंटार्कटिका में भारत की उपस्थिति को चिह्नित करने के लिए बनाया गया था। यह गोवा में राष्ट्रीय ध्रुवीय और महासागर अनुसंधान केंद्र (एनसीपीओआर) की स्थापना का अग्रदूत भी बना, जो भारत का एकमात्र वैज्ञानिक संस्थान है जो अंटार्कटिका, आर्कटिक और हिमालय में भारतीय वैज्ञानिक अभियानों की सुविधा प्रदान करता है, इन भौगोलिक क्षेत्रों में भारतीय अनुसंधान केंद्रों की स्थापना और रखरखाव करता है, और पृथ्वी के ध्रुवों में देश की रणनीतिक उपस्थिति और गतिविधियों को सुनिश्चित करता है। महासागर विकास विभाग (तत्कालीन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय) के संस्थापक सचिव डॉ एसजेड कासिम ने 1981-82 में अंटार्कटिका में पहले भारतीय वैज्ञानिक अभियान का नेतृत्व किया और 1983 में अंटार्कटिका में 'दक्षिण गंगोत्री' नाम से पहला भारतीय अनुसंधान स्टेशन स्थापित किया। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में महासागर विकास विभाग ने राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी), चेन्नई और भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (आईएनसीओआईएस), हैदराबाद को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया, जिससे अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन में महासागर प्रौद्योगिकी और महासागर आधारित सेवाओं के महत्वपूर्ण महत्व को रेखांकित किया गया, जिसकी महासागर विकास विभाग के तत्कालीन सचिव डॉ ए ई मुथुनायगम ने पुरजोर वकालत की थी। उनके पूर्ववर्ती और उत्तराधिकारी डॉ वीके गौर और डॉ एचके गुप्ता प्रसिद्ध भूकंपविज्ञानी थे, जिन्होंने राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद में प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया था। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) को 2006 में ही पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन लाया गया था, हालाँकि यह भारत सरकार के सबसे पुराने विभागों में से एक है। 1875 में स्थापित (मुख्य रूप से भारतीय मानसून को समझने के लिए) और भारत की स्वतंत्रता तक अंग्रेजों के नेतृत्व में, IMD 14 जनवरी, 2025 को अपनी 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। IMD कई भारतीयों के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाला और लाखों किसानों के जीवन और आजीविका को प्रभावित करने वाला सबसे प्रमुख संस्थान बना हुआ है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), पुणे और राष्ट्रीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (NCMRWF), नोएडा, क्रमशः 1962 और 1988 में IMD की वैज्ञानिक गतिविधियों और सेवाओं को बढ़ाने के लिए स्थापित किए गए थे, जो 2006 से पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन हैं। IMD, IITM और NCMRWF पहले विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन थे।1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, IMD को नागरिक उड्डयन में स्थानांतरित कर दिया गया, और इसके कैडर (वैज्ञानिक पदों सहित) को संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के तहत स्थापित किया गया। ऐसा इसलिए था क्योंकि IMD को केवल एक सेवा इकाई माना जाता था, जो पायलटों को मौसम संबंधी ब्रीफिंग प्रदान करती थी। यह तब था जब IMD के वैज्ञानिक चरित्र को एक महत्वपूर्ण झटका लगा, एकमात्र राहत यह थी कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) जैसे निकायों के साथ इसका संपर्क जारी रहा। 1985 में, IMD को विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ इसने मौसम और जलवायु पूर्वानुमान प्रदान करने के लिए पारंपरिक तकनीकों और मानव विशेषज्ञता पर निर्भरता जारी रखी। 2006 में IMD का पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में विलय कई मोर्चों पर एक ऐतिहासिक निर्णय था। अधिक ध्यान अवलोकन नेटवर्क और बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने (अधिक और बेहतर डॉपलर मौसम रडार, स्वचालित मौसम स्टेशन और रेडियोसॉन्ड स्थापित करना, दिल्ली और पुणे में केंद्रीय प्रसंस्करण स्टेशनों को डेटा प्रवाह को जोड़ना) और पूर्वानुमानों के लिए भौतिकी-आधारित संख्यात्मक मॉडलिंग दृष्टिकोण को अपनाने पर था। इसके अलावा, इसे वैज्ञानिक इकाई में बदल दिया गया, जिसका अर्थ है कि पद वैज्ञानिक कैडर के थे। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप मौसम, चक्रवातों और चरम मौसम की घटनाओं के बेहतर पूर्वानुमान सामने आए, जिन्हें दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना गया। भविष्य की दिशाएँ भारत एक कृषि प्रधान समाज है, जिसमें 70% से अधिक हिस्सेदारी छोटे किसानों की है और मौसम से संबंधित समय पर और सटीक जानकारी के लिए एक बहुत बड़ी उपयोगिता है। पिछले दस वर्षों में मौसम और जलवायु सेवाओं और बुनियादी ढाँचे में सुधार की दिशा में जबरदस्त प्रगति हुई है। 2024 में मिशन मौसम के शुभारंभ का लक्ष्य आने वाले दो वर्षों में हमें और भी बड़ा और बेहतर बनाना है। देश का अवलोकन नेटवर्क, डेटा रिज़ॉल्यूशन, सूचना प्रसार और लीड टाइम सभी का उद्देश्य हमारे लोगों के लिए अधिक उपयोगी बनना है। हमें अपनी कृषि-मौसम सेवाओं को अधिक किसान-विशिष्ट और सटीक बनाने के लिए प्रयास जारी रखना चाहिए तथा ओलावृष्टि, विमानों में बर्फ जमना, चरम मौसम-आधारित भूस्खलन, बाढ़ आदि जैसी घटनाओं के लिए पूर्वानुमान और शमन क्षमताओं को बढ़ाना चाहिए। हम जल-घाटे वाले क्षेत्रों में कृत्रिम वर्षा के लिए क्लाउड सीडिंग जैसे मौसम प्रबंधन के नवीन तरीकों का अध्ययन और परीक्षण करने के लिए उन्नत सुविधाएं भी स्थापित कर रहे हैं।मौसम एक अव्यवस्थित प्रणाली है, इसलिए दीर्घकालिक पूर्वानुमान (विशेष रूप से चार से छह महीने पहले के मानसून के पूर्वानुमान) केवल संख्यात्मक मॉडलिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के माध्यम से किए जा सकते हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए भी सामान्य एआई तकनीकों की आवश्यकता होती है। आईएमडी के पास एक विशाल डेटाबेस है, जो एआई-आधारित पूर्वानुमान के लिए एक परिसंपत्ति साबित हो सकता है। मंत्रालय के उच्च-प्रदर्शन वाले सुपरकंप्यूटर को 2024 में ~ 22 पेटाफ्लॉप (संयुक्त क्षमता में) (~ 6 पेटाफ्लॉप से) में अपग्रेड किया गया था, और पिछले दशक में रिज़ॉल्यूशन 70 किलोमीटर से 12 किलोमीटर तक सुधर गया है। हालाँकि, उच्च कंप्यूटिंग कौशल और बेहतर रिज़ॉल्यूशन मौसम पूर्वानुमान के पहलुओं का केवल एक अंश है। रिज़ॉल्यूशन को विस्तारित अवलोकन नेटवर्क के साथ मेल खाना चाहिए। इसके लिए, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय/IMD ने डॉपलर मौसम रडार, रेडियोसॉन्ड, AWS आदि का एक सघन नेटवर्क स्थापित करने की योजना बनाई है। फिर भी, ये केवल भूमि पर हैं, जिसका अर्थ है कि विश्वसनीय परिणाम देने वाले मॉडल के लिए वांछित संकल्प के अनुकूल महासागर अवलोकन निकट भविष्य में स्थापित किए जाने हैं। मंत्रालय कंप्यूटर में अगली बड़ी चीज का भी सबसे अच्छा उपयोग कर सकता है: एक क्वांटम कंप्यूटर, जिसकी 50Qbit क्षमता सेकंड में एन्क्रिप्शन को डिकोड कर सकती है, जिसे निष्पादित करने में एक पारंपरिक सुपर कंप्यूटर को अरबों साल लगेंगे। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को प्रधान मंत्री विज्ञान और प्रौद्योगिकी नवाचार सलाहकार परिषद (पीएम-एसटीआईएसी) के तहत राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के एक सक्रिय सदस्य के रूप में परिकल्पित किया जाना चाहिए, जो भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (पीएसए) के कार्यालय द्वारा संचालित है। मौसम और जलवायु से संबंधित प्रेक्षणों के लिए मल्टी-चैनल प्रोफाइलर्स, माइक्रोवेव साउंडर्स, स्कैटरोमीटर, महासागर रंग मॉनिटर आदि जैसे उच्च-स्तरीय सेंसरों के साथ निचली कक्षाओं में और अधिक उपग्रहों की आवश्यकता बनी हुई है। इसलिए, इसरो और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को मिलकर काम करना जारी रखना चाहिए। साथ ही, इसरो की भूमिका उपग्रह प्रदाता से बढ़कर उपग्रह मौसम विज्ञान में भागीदार की हो सकती है। राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली की उपसमितियों की तर्ज पर पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और इसरो के बीच एक कार्य समूह लाभकारी होगा। WMO जैसे संयुक्त राष्ट्र निकायों को मानक विनिर्देशों, उपग्रहों को लॉन्च करने और डेटा साझा करने के लिए एक सहकारी और व्यापक ढांचे के विकास की सुविधा प्रदान करनी चाहिए। क्षमता निर्माण और मानव संसाधन विकास में निवेश को मुख्य बिंदु पर रहना चाहिए।भारतीय मौसम विभाग के 150 वर्ष, पूरे पिछले वर्ष में सार्वजनिक आउटरीच और जुड़ाव के साथ कई गतिविधियों के माध्यम से मनाए गए, जो हमारी अमिट भावना, समृद्ध इतिहास और हमारे लोगों की सेवा करने के उत्साह की याद दिलाते हैं। हम अपने उद्देश्य एस3: समाज के लाभ के लिए अपने लोगों की सेवा के लिए विज्ञान, को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं।
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- कहानी
लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
आज संडे को कहाँ जा रही हो ? शिवी को आलमारी से कपड़े निकालते देख प्रतीति ने पूछा ।
हताशा और गुस्से में सिर हिलाते हुए शिवी ने जवाब दिया , "क्या मॉम , संडे तो एक दिन होता है मजे से घूमने का ।"
वही एक संडे हमारे लिए भी तो होता है न बेटा कि हम अपने बच्चे से दो बातें करें , उसके साथ लंच करें…प्रतीति यही कहना चाहती थी , लेकिन शिवी का तड़ाकेदार जवाब और उपेक्षा भरा चेहरा देखकर उसने कहा , ' हाँ तो कुछ कैम्पस के लिए तैयारी ही कर लो । ढंग की जॉब मिल जाएगी । पूरे दिन अपने फालतू दोस्तों के साथ बिताने से वो तैयारी तो होने से रही । '
शिवी तमककर बोली, ' मॉम, मेरे दोस्त फालतू नहीं हैं और मुझे पता है कैसी तैयारी करनी है ।' पंद्रह मिनट बाद शिवी अपनी गाड़ी उठा कर जा चुकी थी और दरवाजे पर प्रतीति 'कहाँ जा रही, कब तक आएगी ' के अपने सवाल लिए खड़ी रह गई ।
भुनभुनाती निकली शिवी आधे घंटे बाद अपने दोस्तों के साथ खिलखिला रही थी । पूरे दिन दोस्तों संग हँसी-ठट्ठा करते, बाजार में घूमती रही । इस बीच तीन बार माँ का फोन शिवी काट चुकी थी । रात होते-होते यश ने सुझाया, 'चलो आज बाइक रेसिंग करेंगे । नए शहर के बाहर एक बिल्डिंग बन रही है, वहाँ रात को बहुत कम ट्रैफिक होता है, वहाँ से शुरू करेंगे ।' सारे दोस्तों ने ए…..की टेर लगा दी । शिवी सोच में थी । ' मॉम को बताऊँ? वो फिर टोकेंगी । बाइक रेस में हर बाइक पर एक कपल । कितना रोमांचक होगा ।'
अब एक तरफ लगातार माँ का फोन आ रहा था और दूसरी तरफ दोस्त अपनी-अपनी बाइक की तरफ बढ़ रहे थे । मन की सारी उलझनों को एक तरफ झटक कर शिवी उनकी ओर बढ़ ही रही थी कि अचानक सौरभ के पैर से वहीं सोए एक कुत्ते के पिल्ले को पैर लग गया । उसके बाद न जाने कहाँ से आकर उसकी मरियल-सी माँ आक्रामक हो उठी । अपने बच्चे को खतरे में जानकर भौंक-भौंक कर उसने आसमान सिर पर उठा लिया ।
शुभम चिल्लाया - " अबे ! चुपचाप वहीं खड़ा हो जा , वह माँ है यार…वह निश्चिंत हो जाए कि उसके बच्चों को हमसे कोई खतरा नहीं है , फिर वह चली जाएगी । थोड़ी देर बाद सचमुच वह शांत होकर अपने पिल्लों को साथ लिए चली गई । " वह माँ है यार…" ये शब्द शिवी के सिर पर मानो हथौड़े की तरह बजने लगे । वह भी तो माँ है जो सदैव अपनी बेटी को सुरक्षित और आगे बढ़ते देखना चाहती है और इसीलिए रोक-टोक करती है , सावधान रहना सिखाती है कि उसकी बेटी को कोई चोट मत लगे । कहाँ जा रही है , कब तक घर आएगी जैसे प्रश्न जो उसे बेकार लगते थे , आज उसके मायने समझ में आ रहे हैं ।ओह ! वह कितने रूखे ढंग से पेश आई आज माँ के साथ । मालूम है वह अब भी दरवाजे पर चिंतित खड़ी होगी , उसकी राह देखते । अचानक शिवी ने अपने कदम पीछे किए और दोस्तों के साथ रेस लगाने की बात छोड़ कर घर जाने का फैसला कर लिया । - -शहर की यात्रा कर इन जगहों की खूबसूरती को करें महसूसआलेख- रचना मिश्रापर्यटन एक ऐसी यात्रा है जो न केवल हमें नये स्थानों से परिचित कराती है बल्कि हमारे जीवन को भी समृद्ध बनाती है। पर्यटन हमें नये अनुभव प्रदान करता है। नये लोगों से मिलने का अवसर देता है। छत्तीसगढ़ का बिलासपुर जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक महत्व और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। जिले में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। पर्यटन स्थलों को संवारने जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग द्वारा पहल की जा रही है। प्राकृति ने यहां अपनी पूरी छटा बिखेरी है। घने जंगलों से आच्छादित इस जिले में नदियां और पहाड़ भी है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की मंशानुरूप जिले में पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शासन द्वारा नित नये प्रयास किये जा रहे हैं। सैलानियों को ठहरने की सुविधा देने छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड द्वारा कुरदर और बेलगहना में रिजॉर्ट बनाया गया है वहीं पर्यटन स्थलों में पहुंचमार्ग से लेकर सौंदर्यीकरण आधारभूत सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा गया है।तालायह अतीत में वापस जाने और कालातीत मूर्तियों द्वारा मंत्रमुग्ध होने जैसा है। निश्चित रूप से अनंत काल और कलात्मक पत्थर की मूर्तियों की भूमि ताला अमेरिकापा के गांव के पास मनियारी नदी के तट पर स्थित है। ताला शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम पर स्थित है। देवरानी-जेठानी मंदिरों के लिए सबसे मशहूर, ताला की खोज 1873-74 में जे.डी. वेलगर ने की थी, जो प्रसिद्ध पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम के सहायक थे। इतिहासकारों ने दावा किया है कि ताला गांव 7-8 वीं शताब्दी ईस्वी की है।ताला के पास सरगांव में धूम नाथ का मंदिर है। इस मंदिर में भगवान किरारी के शिव स्मारक हैं, और मल्हार यहां से केवल 18 किमी दूर है। ताला बहुमूल्य पुरातात्विक खुदाई की भूमि है जिसने उत्कृष्ट मूर्तिकला के काम को प्रकट किया है। पुरातत्त्वविदों और इतिहासकारों को जटिल रूप से तैयार पत्थर की नक्काशी से मंत्रमुग्ध कर दिया जाता है। इन उत्कृष्ट खुदाई 6 वीं से 10 वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान ताला की समृद्धि का वर्णन करती हैं। हालांकि, विभिन्न खुदाई वाले खंडहर प्राप्त हुए और मूर्तिकला-शैली हमें विभिन्न राजवंशों को बताती है जो ताला में शासन करते थे और भगवान शिव के भक्त और शिव धर्म के प्रचारक थे।देवरानी - जेठानी मंदिर, अमेरीकांपा (जिला बिलासपुर)प्राचीन काल में दक्षिण कोसल के शरभपुरीय राजाओं के राजत्वकाल में मनियारी नदी के तट पर ताला नामक स्थल पर अमेरिकापा गाँव के समीप दो शिव मंदिरों का निर्माण कराया गया। देवरानी, जेठानी मंदिर भारतीय मूर्तिकला और कला के लिए बहुत प्रसिद्ध है।दुर्लभ रुद्रशिव1987-88 के दरमियान देवरानी मंदिर में प्रसिद्ध खुदाई में भगवान शिव की एक बेहद अनोखी ‘रुद्र’ छवि वाली मूर्ति प्रकट हुई। शिव की यह अनूठी मूर्ति विभिन्न प्राणियों का उपयोग करके तैयार की जाती है। यह विशाल एकाश्ममक द्विभूजी प्रतिमा समभंगमुद्रा में खड़ी है तथा इसकी उचांई 2.70 मीटर है। यह प्रतिमा शास्त्र के लक्षणों की दृष्टी से विलक्षण प्रतिमा है। इसमें मानव अंग के रूप में अनेक पशु, मानव अथवा देवमुख एवं सिंह मुख बनाये गये हैं। इसके सिर का जटामुकुट (पगड़ी) जोड़ा सर्पों से निर्मित है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ के कलाकार को सर्प-आभूषण बहुत प्रिय था क्योंकि प्रतिमा में रुद्रशिव का कटी, हाथ एवं अंगुलियों को सर्प के भांति आकार दिया गया है। इसके अतिरिक्त प्रतिमा के ऊपरी भाग पर दोनों ओर एक-एक सर्पफण छत्र कंधो के ऊपर प्रदर्शित है। इसी तरह बायें पैर लिपटे हुए, फणयुक्त सर्प का अंकन है। दुसरे जीव जन्तुओ में मोर से कान एवं कुंडल, आँखों की भौहे एवं नाक छिपकली से, मुख की ठुड्डी केकड़ा से निर्मित है तथा भुजायें मकरमुख से निकली हैं। सात मानव अथवा देवमुख शरीर के विभिन अंगो में निर्मित हैं।लुतरा शरीफबाबा सैय्यद इंसान अली शाह की दरगाह के रूप में प्रसिद्ध “लुतरा शरीफ” बिलासपुर में स्थित है। जो पुरे छत्तीसगढ़ में धार्मिक सौहार्द्र, श्रध्दा और आस्था का पावन स्थल तथा प्रमुख केंद्र माना जाता है। हजरत बाबा का पवित्र स्थल लुतरा शरीफ छत्तीसगढ़ में एक पवित्र और चमत्कारिक दरगाह के रूप में विख्यात है। यहां वर्ष भर मनौतियां मानने वालो का मेला लगा रहता है। छत्तीसगढ़ राज्य में यह एक ऐसा दरगाह है जिसकी आस्था सभी धर्माे के लोगो में है। यह दरगाह एक धर्म विशेष से ऊपर उठकर कल्याणकारी होने का जीवंत उदहारण है।यह पर्यटकों के लिए दर्शनीय स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। श्रद्धालु, पर्यटकों के लिए यह पवित्र दर्शनीय स्थल है। बिलासपुर क्षेत्र में धार्मिक आस्था केंद्र के रूप में विख्यात लुतरा शरीफ दरगाह में माथा टेकने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पर्यटक आते हैं।मल्हारमल्हार नगर बिलासपुर से दक्षिण-पश्चिम में बिलासपुर से शिवरीनारायण जाने वाली सडक पर स्थित मस्तूरी से 14 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। मल्हार में ताम्र पाषाण काल से लेकर मध्यकाल तक का इतिहास सजीव हो उठता है। मल्हार के उत्खनन में ईसा की दूसरी शती की ब्राम्हीव लिपी में आलेखित उक मृणमुद्रा प्राप्त हुई है, जिस पर गामस कोसलीया (कोसली ग्राम की) लिखा है। कोसली या कोसल ग्राम का तादात्यपी मल्हार से 16 किमी उत्तर पूर्व में स्थित कोसला ग्राम से स्थित जा सकता है। कोसला गांव से पुराना गढ़ प्राचीर तथा परिखा आज भी विद्यमान है, जो उसकी प्राचीनता को मौर्याे के समयुगीन ले जाती है। वहां कुषाण शासक विमकैडफाइसिस का एक सिक्का भी मिला है। सातवीं से दसवीं शदी के मध्य विकसित मल्हार की मूर्तिकला में उत्तर गुप्त युगीन विशेषताएं स्पष्ट परिलक्षित है। मल्हार में बौद्ध स्मारकों तथा प्रतिमाओ का निर्माण इस काल की विशेषता है। मल्हार में भीम किचक मंदिर, माता दाई डिड़िनेश्वरी का निवास, ऋषभदेव नाथ मंदिर, भगवान बुद्ध व महावीर की इत्यादि मूर्तियां है। यहां से ताम्र पत्र, शिलालेख और अनेक मूर्तियां खुदाई से प्राप्त हुई है।रतनपुरबिलासपुर-कोरबा मुख्यमार्ग पर 25 कि.मी. पर स्थित आदिशक्ति महामाया देवी कि पवित्र पौराणिक नगरी रतनपुर का प्राचीन एवं गौरवशाली इतिहास है। त्रिपुरी के कलचुरियों ने रतनपुर को अपनी राजधानी बना कर दीर्घकाल तक छ.ग. मे शासन किया। इसे चतुर्युगी नगरी भी कहा जाता है. जिसका तात्पर्य इसका अस्तित्व चारो युगों में विद्यमान रहा है। राजा रत्नदेव प्रथम ने रतनपुर के नाम से अपनी राजधानी बसाया।श्री आदिशक्ति माँ महामाया देवी - लगभग नौ वर्ष प्राचीन महामाया देवी का दिव्य एवं भव्य मंदिर दर्शनीय है। इसका निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा ग्यारहवीं शताब्दी में कराया गया था। 1045 ई. में राजा रत्नदेव प्रथम ने श्री महामाया देवी का भव्य मंदिर निर्मित कराया। मंदिर के भीतर महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी स्वरुप देवी की प्रतिमाएं विराजमान है। मान्यता है कि इस मंदिर में यंत्र-मंत्र का केंद्र रहा होगा। रतनपुर में देवी सती का दाहिना स्कंद गिरा था। भगवान शिव ने स्वयं आविर्भूत होकर उसे कौमारी शक्ति पीठ का नाम दिया था। जिसके कारण माँ के दर्शन से कुंवारी कन्याओ को सौभाग्य की प्राप्ति होती है। नवरात्री पर्व पर यहाँ की छटा दर्शनीय होती है। इस अवसर पर श्रद्धालूओं द्वारा यहाँ हजारों की संख्या में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्जवलित किये जाते है।कानन पेंडारीबिलासपुर शहर कानन पेंडारी चिड़ियाघर के लिए प्रसिद्ध है। यह मुंगेली रोड पर बिलासपुर से लगभग 10 किलोमीटर सकरी के पास स्थित एक छोटा चिड़ियाघर है। सिटी बस का संचालन बिलासपुर सिटी बस लिमिटेड द्वारा यात्रियों के परिवहन के लिए किया जाता है।खूंटाघाट (खारंग जलाशय)खूंटाघाट बांध बिलासपुर का एक मुख्य आकर्षण स्थल है। यह बांध बिलासपुर में रतनपुर में स्थित है। यह बांध रतनपुर से करीब 4 किलोमीटर दूर है। यह बांध चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ है। खुटाघाट बांध को खारंग जलाशय भी कहा जाता है। यह बांध खारंग नदी पर बना हुआ है। यह बांध पर्यटकों के लिए एक अच्छी जगह है। यहां एक सुंदर गार्डन भी है।
- आलेख- ताराशंकर सिन्हा-चित्ताकर्षक पहाड़ों, जंगलों और जलप्रपातों से परिपूर्ण है कांकेर जिला- ग्राम गोटीटोला, उड़कुड़ा की पहाड़ियों में हैं अतिप्राचीन एलियननुमा आकृतियांबस्तर का स्वागत द्वार कहलाने वाला कांकेर जिला विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्राकृतिक सम्पदाओं के अलावा सांस्कृतिक, पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक धरोहरों को समेटा हुआ है। यहां पर्यटन की अप्रतिम एवं अपार संभावनाएं हैं, जिन्हें संरक्षित एवं विकसित करने की आवश्यकता है। जिले में एक ओर जहां प्राकृतिक जलप्रपात- मलाजकुंडुम (कांकेर) तथा चर्रे-मर्रे (अंतागढ़) स्थित है वहीं जिला मुख्यालय में ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित गढ़िया पहाड़ अपनी नैसर्गिक सुंदरता के लिए विख्यात है। इसके अलावा अनेक प्राकृतिक गुफाएं भी यहां मौजूद है, जिनमें जोगीगुफा, रानीडांगरी, ग्राम उड़कुड़ा एवं गोटीटोला आदि शामिल हैं।ग्राम गोटीटोला की पहाड़ियों में है अतिप्राचीन शैलचित्रजिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूरी पर चारामा विकासखण्ड के ग्राम गोटीटोला के निकट पहाड़ियों के बीच रामगुड़ा नामक विशाल वृत्ताकार शैलखण्ड है, जिसकी परतों पर रहस्यमयी आकृतियां उकेरी गई हैं। यह अपने आप में रहस्यमयी और कौतुहल का विषय है। ये आकृतियां कितनी प्राचीन हैं, यह पुरातात्विक शोध एवं अन्वेषण का विषय है, किन्तु ग्रामीणों को कहना है कि ये अति प्राचीन आकृतियां हैं, जो लगभग 7 से 10 हजार साल पुरानी है। ग्रामीण श्री भूमिलाल मण्डावी ने बताया कि यह गांव वालों के लिए यह आस्था एवं धार्मिक महत्व का क्षेत्र है। वे प्रतिवर्ष कृष्ण जन्माष्टमी और नवरात्रि पर्व में विशेष पूजा करने यहां आते हैं।इन शैल चित्रों को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि विशाल चट्टान की परत पर मानव की आकृति लाल एवं पीले रंग से उकेरी गई है, इसमें स्त्री, पुरूष एवं निचले हिस्से पर बच्चे भी दिखाई दे रहे हैं। इन आकृतियों के रंग इतने पक्के व अमिट हैं कि इतने हजारों साल भी फीके नहीं हुए हैं। इसके अलावा शैलचित्रों के ऊपरी हिस्से मनुष्य के हाथ के पंजों के निशान परिलक्षित हो रहे हैं। इन मानवाकृतियों की बांयी ओर थोड़े ऊपर में दो और मनुष्यनुमा आकृति बनी हुई है, जो किसी एलियन या यूएफओ की भांति दिख रही है। अर्थात उक्त आकृतियों में पैर से सिर तक विभिन्न अंग दृष्टिगोचर हो रहे हैं, किन्तु इनके सिर के बाल मनुष्य के बालों से बिलकुल ही अलग ही प्रतीत हो रहे हैं तथा पैरों एवं हाथों में तीन-तीन उंगलियां ही दिखाई पड़ रही हैं, जो यूएफओ के जैसी दिख रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग इन चित्रों के अध्ययन के लिए नासा और इसरो की सहायता लेने की योजना बना रहा है।एलियन्सनुमा आकृतियां शोध का विषयपुरातत्वविद् के अनुसार, इन चित्रों में दर्शाए गए प्राणी हॉलीवुड और बॉलीवुड फिल्मों में दिखाए गए एलियंस से काफी हद तक मिलते-जुलते हैं। स्थानीय निवासियों के बीच इन चित्रों को लेकर विभिन्न मान्यताएं हैं। कुछ लोग इनकी पूजा करते हैं, जबकि अन्य अपने पूर्वजों से सुनी किंवदंतियों का उल्लेख करते हैं, जिनमें ‘रोहेला’ (छोटे आकार के प्राणी) के बारे में भी जिक्र करते हैं। इन चित्रों में प्राणियों की आकृतियां हथियार जैसी वस्तुएं पकड़े हुए हैं, लेकिन उनकी नाक और मुँह स्पष्ट नहीं हैं। कुछ चित्रों में वे स्पेस सूट पहने हुए प्रतीत होते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि इन चित्रों में दिखाए गए उड़न खटोले पंखे जैसे एंटीना और तीन पैरों वाले स्टैंड के साथ यूएफओ से मिलते-जुलते हैं, जैसा कि फिल्मों में दिखाया जाता है। इन चित्रों के रंग प्राकृतिक हैं, जो हजारों वर्षों के बाद भी फीके नहीं पड़े हैं। हालांकि यह संभव है कि प्रागैतिहासिक मानवों की कल्पना का परिणाम हो, लेकिन इस विषय पर और अधिक शोध की आवश्यकता है।
- -आस्था और विरासत की दिव्य यात्रा-" महाकुंभ की दिव्य छत्रछाया में एकत्रित हुए हम सभी की आस्था और भक्ति का अमृत हमारी आत्माओं को पवित्र करे। "महाकुंभ नगर में केंद्रीय अस्पताल आध्यात्मिक उत्साह के बीच, आशा और जीवन शक्ति के एक नए अध्याय की शुरुआत करता है। महाकुंभ उत्सव के प्रारंभ से तुंरत पहले ' गंगा ' नाम की एक बच्ची का जन्म पवित्रता और पवित्र नदियों के सार का प्रतीक है। एक और नवजात शिशु, ' कुंभ ' नाम के एक बच्चे के जन्म के साथ , ये जन्म जीवन के चक्र और महाकुंभ के उत्सव के आशीर्वाद को समाहित किए हुए है। महाकुंभ की आधिकारिक शुरुआत से पहले प्रारंभ हुआ यह अस्पताल उत्तर प्रदेश सरकार की कुशल तैयारियों का एक प्रमाण है। अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह अस्पताल सुनिश्चित करता है कि महाकुंभ की पवित्रता मानव कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता और परंपरा को प्रगति के साथ संबंध कर प्रदर्शित हो।सनातन धर्म के शिखर के रूप में प्रतिष्ठित महाकुंभ, 2025 में प्रयागराज में अपनी भव्यता को प्रदर्शित करेगा । "तीर्थराज" या तीर्थराज के रूप में जाना जाने वाला प्रयागराज एक ऐसा शहर है जहाँ पौराणिक कथाओं, आध्यात्मिकता और इतिहास का संगम होता है, जो इसे सनातन संस्कृति का एक कालातीत अवतार बनाता है। यह पवित्र भूमि, जहाँ गंगा , यमुना और रहस्यमयी सरस्वती नदियाँ मिलती हैं , दिव्य आशीर्वाद और मोक्ष चाहने वाले लाखों लोगों के लिए एक आध्यात्मिक आकर्षण के रूप में कार्य करता है । भक्ति, ध्यान और आध्यात्मिकता की 'त्रिवेणी' के रुप में महाकुंभ एक दिव्य यात्रा में बदल जाता है।प्रयागराज के आध्यात्मिक रत्नों में से एक है, लोकनाथ इलाके में स्थित प्रतिष्ठित बाबा लोकनाथ महादेव मंदिर । काशी के बाबा विश्वनाथ के प्रतिरूप माने जाने वाले बाबा लोकनाथ मंदिर में शाश्वत भक्ति की गूंज सुनाई देती है। इस स्वयंभू शिव लिंग का उल्लेख स्कंद पुराण और महाभारत में मिलता है, जो इसकी प्राचीन जड़ों को रेखांकित करता है। तीर्थयात्रियों का मानना है कि बाबा लोकनाथ का आशीर्वाद लेने से सांसारिक संघर्ष कम हो सकते हैं और भव्य महाकुंभ के दौरान हजारों लोग इस पवित्र स्थल पर दिव्य अनुभव करने के लिए एकत्रित होते हैं। मदन मोहन मालवीय जैसी हस्तियों के साथ जुड़ने से मंदिर की सांस्कृतिक विरासत और समृद्ध हुई है। शिवरात्रि पर इसका प्रतिष्ठित शिव बारात जुलूस और जीवंत होली समारोह प्रयागराज के आध्यात्मिक उत्साह की जीवंत तस्वीर में चार चांद लगा देते हैंमहाकुंभ के आध्यात्मिक शहर का अखाड़ा क्षेत्र भक्ति से सराबोर है, क्योंकि नागा संन्यासी और संत अनुष्ठान करने, ध्यान करने और ज्ञान साझा करने के लिए एकत्रित होते हैं। उनमें से, महंत श्रवण गिरि और महंत तारा गिरि की कहानियाँ एक अनोखे आकर्षण के साथ गूंजती हैं। अपने पालतू जानवरों - क्रमशः लाली और सोमा - के प्रति उनका गहरा प्रेम सनातन धर्म के दयालु सार को उजागर करता है, जहाँ हर जीवित प्राणी को दिव्य माना जाता है। सांसारिक बंधनों को त्यागने वाले ये संत अपने पालतू जानवरों के साथ पारिवारिक बंधन पाते हैं, जो अहिंसा और बिना शर्त प्यार के सिद्धांत को स्वीकारते हैं। इस तरह की कहानियाँ तपस्वियों के कठोर जीवन को मानवीय बनाती हैं और महाकुंभ की समावेशिता की भावना को रेखांकित करती हैं और आध्यात्मिकता और अस्तित्व के सरल आनंद के बीच समानताएँ दर्शाती हैं।शांत झूंसी क्षेत्र में स्थित महर्षि दुर्वासा आश्रम प्रयागराज के आध्यात्मिक आकर्षण में एक और कड़ी जोड़ता है। पौराणिक ऋषि महर्षि दुर्वासा से जुड़ा यह प्राचीन स्थल दैवीय तपस्या और मोचन की कहानियां रखता है। ऐसा कहा जाता है कि महर्षि दुर्वासा के गहन ध्यान ने भगवान शिव को प्रसन्न किया, जिन्होंने उन्हें भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के क्रोध से सुरक्षा प्रदान की। ऋषि द्वारा स्थापित शिवलिंग 'अभयदान' (भय से मुक्ति) चाहने वाले भक्तों के लिए आशा की किरण बना हुआ है। महाकुंभ की तैयारी में, आश्रम में महत्वपूर्ण जीर्णोद्धार हुआ है, इसके लाल बलुआ पत्थर के द्वार और बढ़ी हुई सुविधाएं तीर्थयात्रियों को इसकी पवित्रता में समाहित होने के लिए आमंत्रित करती हैं। यह प्रयागराज को परिभाषित करने वाली पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिकता के बीच शाश्वत बंधन की याद दिलाता है ।कुंभ को चार आयामी उत्सव के रूप में वर्णित किया गया है - एक आध्यात्मिक यात्रा, एक तार्किक चमत्कार, एक आर्थिक घटना और वैश्विक एकता का प्रमाण । कल्पवास की अवधारणा , जहाँ व्यक्ति जीवन के शाश्वत सत्य को अपनाने के लिए क्षणिक डिजिटल दुनिया से अलग हो जाते हैं, महाकुंभ की परिवर्तनकारी शक्ति का प्रतीक है। महाकुंभ केवल एक आयोजन नहीं है; यह जीवन जीने का एक तरीका है , एक ऐसा त्यौहार जो ईश्वरीय संविधान द्वारा संचालित होता है। इसकी आत्मा संतों और ऋषियों के सत्संग में निहित है, जहाँ धर्म वाणिज्य के साथ जुड़ता है, सनातन वैदिक हिंदू धर्म के मूल्यों को कायम रखता है ।वर्ष 2025 में संगम की पवित्र रेत पर लाखों श्रद्धालुओं की प्रतीक्षा है, महाकुंभ एक ऐसा आध्यात्मिक महापर्व होने का वादा करता है, जैसा इससे पूर्व कभी नहीं हुआ । यह अपनी जड़ों से फिर से जुड़ने, सनातन धर्म के शाश्वत ज्ञान का अनुभव करने और सांसारिकता से परे उत्सव में भाग लेने का निमंत्रण है। बाबा लोकनाथ के दिव्य आशीर्वाद से लेकर महर्षि दुर्वासा की पौराणिक विरासत तक, तपस्वियों के मानवीय बंधनों से लेकर जीवन के चमत्कारों तक, महाकुंभ आस्था, भक्ति और उत्कृष्टता का एक ताना-बाना है। (पीआईबी, दिल्ली)
- लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
सुआगत हे तोर नवा बछर।
सुख लेके आबे डगर डगर।।अंधियारी मेटावय मन के ।रोग शोक फेंकावय तन के ।सुनता के अंजोर जगर मगर।।सुआगत हे तोर नवा बछर ।।खोर दुआरी ला बुहार लव ।सुन्ना रद्दा हे गुहार दव ।संगी चलबो सबो हाथ धर ।।सुआगत हे तोर नवा बछर ।।हँसी खुशी राहव हिलमिल के।गोठ मया के कह लव खिल के।जिनगी सबके राहय सुग्घर ।।सुआगत हे तोर नवा बछर ।।

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