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 हिंदू को आचरण से होना चाहिए पक्का: रामनाथ रामचंद्र

0- महाराष्ट्र मंडल में जारी वाल्मिकी रामायण कथा में कथावाचक ने कहा रामकथा को उतारें चरित्र में 
रायपुर। किसी भव्य सभा में मंच से कहना कि गर्व से कहो हम हिंदू हैं और इसे जयघोष के रूप में दोहराना अलग बात है। जबकि हिंदू होने के लिए हमें वैसा आचरण भी करना चाहिए। केवल नारेबाजी से हिंदू नहीं बना जा सकता। महाराष्ट्र मंडल के शिवाजी महाराज सभागृह में जारी रामकथा के तीसरे दिन आचार्य रामनाथ रामचंद्र अय्यर ने इस आशय का संदेश दिया। 
आचार्य ने कहा रामकथा को जीवन में, व्यक्तित्व में लाना होगा। तब हमें न धर्म ग्रंथ पढ़ने की जरूरत होगी, न ही प्रवचन सुनने की। आप सिर्फ राम चरित्र का पाठ कीजिए और अपने चरित्र में प्रभु श्रीराम को उतारिए। कथावाचक ने कहा कि कहीं भी प्रवचन अथवा कथा सुनने जाने के लिए खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। प्रसाद, दान स्वरूप कुछ न कुछ ले जाना चाहिए। कुछ न हो तो, कम से कम फूल तो ले ही जाना चाहिए।
आचार्य अय्यर ने समाज में बढ़ती नकारात्मकता को लेकर कहा कि लोगों की नकारात्मक प्रतिक्रिया से निराश होने की जरूरत नहीं है और न ही उस पर ध्यान देने की। बिना वास्तविक स्थिति जाने या विषय का समग्र अध्ययन किए बिना ऐसी टिप्पणी करने वाले लोग आमतौर पर ज्ञानचंद होते हैं। वे अपनी बड़ी- बड़ी बातों से आपको सही रास्ता बताने का दावा तो करते हैं, लेकिन यदि आपने साथ चलने को कहा, तो वे बिदक जाते हैं। हमारे समाज में रामायण से लेकर प्रभु श्रीराम तक नकारात्मक टिप्पणी करने वालों की कमी नहीं है। फिर भी हमारे धर्म में रामायण श्रेष्ठतम धर्मग्रंथ है और प्रभु श्रीरामचंद्र मर्यादा पुरूषोत्तम और पूज्यनीय हैं।   
रामकथा में बड़ी संख्या में उपस्थित भक्तजनों का मार्गदर्शन करते हुए आचार्य अय्यर ने कहा कि भगवान शिव को जलधारा अतिप्रिय है। उसी तरह प्रथम पूज्य गणेशजी को उबला हुआ मोदक। होटल से मंगाए गए रेडिमेड मोदक से वे प्रसन्न नहीं होते। वहीं यथासंभव भगवान को स्वयं के तोड़े हुए फूल चढ़ाने से जो पुण्य की प्राप्ति होती है, वह अन्य किसी माध्यम से नहीं। उन्होंने गंध (चंदन) घीसने की विधि भी श्रद्धालुओं को बताई। उन्होंने कहा कि गुरु का स्मरण करते अथवा नाम लेते समय कर्णपाली (कान का निचला हिस्सा) को पकड़ना चाहिए, यह धर्म है। राजा श्रीराम भी यही करते थे। आज की कथा की यजमान मंजूषा वैशंपायन थीं। कथा उपरांत महाआरती की गई। तत्पश्चात महाप्रसाद वितरित किया गया।
 

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