सेहतमंद बचपन की ओर बढ़े नन्हे कदम, ‘पोट्ठ लईका’ बना सहारा
-पालक चौपाल से घर की थाली तक पहुंची पोषण की सीख, हजारों बच्चे कुपोषण से बाहर आए
बिलासपुर /नन्हे बच्चे की सेहत से पूरे परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। उसका वजन बढ़े, उसे पर्याप्त पोषण मिले और वह स्वस्थ रहे, इसके लिए सही जानकारी और समय पर मार्गदर्शन भी जरूरी है। बिलासपुर जिले में ‘पोट्ठ लईका’ पहल ने इसी जरूरत को समझते हुए बच्चों की देखभाल को परिवार और समुदाय की साझा जिम्मेदारी बनाया। घर में उपलब्ध भोजन से बेहतर पोषण, नियमित निगरानी और अभिभावकों की भागीदारी के परिणाम सामने आए हैं। पहल के पहले चरण में 2240 और दूसरे चरण में 1379 बच्चे कुपोषण की श्रेणी से बाहर आए।
कलेक्टर की पहल पर 16 जून 2025 को शुरू हुए इस अभियान ने बच्चों के पोषण के लिए परिवारों तक पहुंच बनाई। आंगनबाड़ी केंद्रों और गांवों में हर शुक्रवार आयोजित पालक चौपाल इस प्रयास की महत्वपूर्ण कड़ी बनी। यहां माता-पिता को बच्चों के वजन और स्वास्थ्य की जानकारी देने के साथ भोजन में विविधता तथा स्वच्छता का महत्व समझाया गया। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध खाद्य सामग्री से ‘तिरंगा भोजन’ तैयार करने और उसे बच्चों के आहार में शामिल करने के लिए प्रेरित किया गया।
बच्चे को क्या खिलाएं और उसके भोजन में विविधता कैसे लाएं, ऐसे रोजमर्रा के सवालों पर पालक चौपालों में चर्चा की गई। अभिभावकों को अपने आसपास उपलब्ध खाद्य सामग्री का उपयोग कर बच्चों का पोषण बेहतर बनाने की जानकारी मिली। बच्चे के वजन की निगरानी के साथ उसके आहार और स्वास्थ्य पर लगातार ध्यान दिया गया। इससे परिवारों को देखभाल में जरूरी बदलाव समझने और अपनाने में मदद मिली।
जून से दिसंबर 2025 तक चले पहले चरण में जिले के 250 आंगनबाड़ी केंद्रों के 3970 कुपोषित बच्चों को चिन्हांकित किया गया था। इनमें 2431 बच्चे मध्यम तीव्र और 1539 बच्चे गंभीर तीव्र कुपोषण की श्रेणी में थे। निर्धारित कार्ययोजना के अनुसार नियमित निगरानी, पोषण संबंधी परामर्श और परिवारों की सहभागिता से इनमें से 2240 बच्चे कुपोषण से बाहर आए। यह चिन्हांकित बच्चों का 56.4 प्रतिशत है।
पहले चरण के परिणामों को देखते हुए फरवरी से जुलाई 2026 तक पहल का दूसरा चरण चलाया गया। इस बार बच्चों के पोषण में पुरुषों और परिवार के अन्य सदस्यों की भागीदारी पर विशेष ध्यान दिया गया। पालक चौपालों में गर्भवती और शिशुवती माताओं सहित ग्रामीणों को जीवन के प्रथम एक हजार दिनों के महत्व और छोटे बच्चों के पोषण के पांच सुनहरे नियमों की जानकारी दी गई। स्वच्छता और मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए भी नियमित परामर्श दिया गया। दूसरे चरण में सर्वाधिक कुपोषण वाले 250 आंगनबाड़ी केंद्रों के 3292 बच्चों को चिन्हांकित किया गया। इनमें 2293 बच्चे मध्यम तीव्र और 999 बच्चे गंभीर तीव्र कुपोषण की श्रेणी में थे। इन प्रयासों से 1379 बच्चे कुपोषण की श्रेणी से बाहर आए।
‘पोट्ठ लईका’ की उपलब्धि के केंद्र में वे बच्चे हैं, जिनकी सेहत बेहतर हुई है। इसके पीछे आंगनबाड़ी केंद्रों का नियमित मार्गदर्शन और घर में बच्चों की देखभाल के लिए परिवारों का प्रयास जुड़ा है। पालक चौपाल से मिली पोषण की सीख जब घर की थाली और रोजमर्रा की आदतों तक पहुंची, तो हजारों नन्हे बच्चों के लिए स्वस्थ बचपन की राह खुली।







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