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  बिजली जरूरत का आकलन करने में डीटीयू की नाकामी से 1.55 करोड़ रुपये का नुकसान: सीएजी रिपोर्ट

 नयी दिल्ली। दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (डीटीयू) द्वारा वास्तविक आवश्यकता के अनुरूप स्वीकृत बिजली भार का आकलन करने में विफलता के परिणामस्वरूप 20 महीनों में 1.55 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च हुआ। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में यह कहा गया है। अपने बचाव में डीटीयू ने कहा कि वह एक अनुसंधान और नवाचार विश्वविद्यालय है तथा विभिन्न शोध करता है, जिसके लिए हर समय बिजली की ‘‘निश्चित उपलब्धता'' की आवश्यकता होती है। इसलिए, यह आवश्यक था कि किसी भी अप्रत्याशित परिस्थितियों के मामले में स्वीकृत भार विश्वविद्यालय को उपलब्ध हो। हालांकि, सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया कि स्पष्टीकरण में दम नहीं था क्योंकि डीटीयू को बिजली की आवश्यकता में ऐसी कोई अनिश्चितता नहीं थी। कैग की रिपोर्ट मंगलवार को दिल्ली विधानसभा में प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि डीटीयू के रिकॉर्ड की ऑडिट जांच से पता चला है कि 2015-16, 2016-17 और 2017-18 के दौरान बिजली की वास्तविक मांग (अधिकतम भार) 756 से 1,866 किलोवाट, 679-1,962 किलोवाट और 714-2,042 किलोवाट के बीच थी। डीटीयू के पास 4,256 किलोवाट के स्वीकृत लोड के साथ टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (टीपीडीडीएल) का घरेलू बिजली कनेक्शन है।
बिल में स्वीकृत लोड के आधार पर एक निश्चित घटक होता है और वास्तविक बिजली की खपत के आधार पर परिवर्तनीय घटक होता है। अगर स्वीकृत भार आवश्यकता से ज्यादा हो, तो बढ़े हुए नियत शुल्क के कारण अधिक व्यय होता है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘वास्तविक आवश्यकता 4,256 किलोवाट के स्वीकृत भार से काफी कम रहने के बावजूद, डीटीयू ने स्वीकृत भार को कम करने के लिए लाइसेंसधारी से संपर्क करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की ताकि अधिक स्वीकृत भार पर निश्चित शुल्क के भुगतान से बचा जा सके।'' मई 2018 में, टीपीडीडीएल ने जुलाई 2018 से शुरू होने वाली बिलिंग अवधि के लिए स्वीकृत लोड को कम करने के बारे में डीटीयू के साथ चर्चा की थी क्योंकि 2017-18 में अधिकतम मांग के लिए मौजूदा 4,256 किलोवाट के मुकाबले केवल 1,709 किलोवाट के स्वीकृत लोड की आवश्यकता थी। हालांकि, डीटीयू ने स्वीकृत लोड में कमी के लिए सहमति देने को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की और 4,256 किलोवाट के स्वीकृत लोड पर बिजली शुल्क का भुगतान करना जारी रखा, जिससे जुलाई 2018 से मार्च 2020 तक 1.55 करोड़ रुपये का व्यय हुआ, जिससे बचा जा सकता था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नियमों के मुताबिक जरूरत पड़ने पर वास्तविक खपत के आधार पर स्वीकृत लोड को बढ़ाया जा सकता है।

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