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 भारत की 41 प्रतिशत आबादी खाना पकाने के लिए अब भी जैव ईंधन पर निर्भर : रिपोर्ट

  नयी दिल्ली। भारत की 41 प्रतिशत आबादी अब भी खाना पकाने के ईंधन के तौर पर लकड़ी, गाय के गोबर से बने उपले या अन्य जैव ईंधन का इस्तेमाल करती है और इससे हर साल कुल मिलाकर पर्यावरण में 34 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो भारत के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का तकरीबन 13 फीसदी है। एक नयी रिपोर्ट में यह कहा गया है। स्वतंत्र विचारक समूह (थिंक टैंक) विज्ञान व पर्यावरण केंद्र (सीएसई) की रिपोर्ट ‘‘भारत का ई-कुकिंग की ओर परिवर्तन'' में यह भी कहा गया है कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से भारत में एलपीजी गैस तक पहुंच के विस्तार में तेजी आयी लेकिन इससे यह सुनिश्चित नहीं हुआ कि लाभार्थी घरों में खाना पकाने में स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल ही जारी रहे। दुनिया की करीब एक तिहाई आबादी (जिसमें भारत के 50 करोड़ लोग शामिल हैं) के पास अब भी खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन तक पहुंच नहीं है। इससे अर्थव्यवस्था, जन स्वास्थ्य और पर्यावरण को बेहिसाब नुकसान पहुंचता है।
रिपोर्ट में पूर्व में किए गए अनुसंधान के हवाले से कहा गया है कि अनुमानित रूप से हर साल किसी बंद जगह के भीतर या घरों में वायु प्रदूषण के कारण दुनियाभर में 30 लाख लोगों (जिसमें भारत के छह लाख लोग शामिल हैं) की समय से पहले मौत हो जाती है। इनमें से ज्यादातर मौत खाना पकाने में लकड़ी के इस्तेमाल के कारण होती है। इसमें कहा गया है कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय यह दावा करता है कि देश में घरों तक एलपीजी ‘कवरेज' 99.8 फीसदी है जबकि 2019-21 में किए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण से पता चलता है कि 41 प्रतिशत आबादी अब भी खाना पकाने में जैव ईंधन का इस्तेमाल करती है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘सीएसई की अपनी गणना से पता चला है कि यह 41 प्रतिशत की आबादी जब लकड़ी, उपले या अन्य जैव ईंधन का इस्तेमाल कर खाना पकाती है तो हर साल पर्यावरण में करीब 34 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करती है जो भारत के राष्ट्रीय हरित गैस उत्सर्जन का करीब 13 फीसदी है।'' प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना मई 2016 में शुरू की गयी थी और मार्च 2023 के अंत तक भारत में 10 करोड़ से अधिक घरों को एलपीजी सिलेंडर प्राप्त हुए थे। सीएसई ने कहा कि इस योजना के तहत जिन घरों को नए एलपीजी सिलेंडर मिले, उनमें से 50 फीसदी से अधिक घरों ने एक बार भी इसे दोबारा नहीं भरवाया। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘ऐसा सिलेंडर भरवाने की ऊंची कीमत, सांस्कृतिक या व्यावहारिक मान्यताओं और लाभार्थियों के इलाके में एलपीजी सिलेंडर वितरण नेटवर्क की कमी के कारण हुआ।
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