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राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने अभिभाषण में पढ़ी अटल बिहारी वाजपेयी की कविता की पंक्तियां

  नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बुधवार को देश के लक्ष्यों और उसके समक्ष आ रही चुनौतियों का जिक्र करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी की प्रसिद्ध कविता ‘न दैन्यं न पलायनम्’ की कुछ पंक्तियों का उल्लेख किया। उन्होंने बजट सत्र के पहले दिन लोकसभा एवं राज्यसभा की संयुक्त बैठक में करीब सवा घंटे के अभिभाषण के दौरान यह कविता पढ़ी। कविता पढ़ने से पहले उन्होंने कहा, ‘‘हम सभी का यह दायित्व है कि अमृत पीढ़ी के सपनों को पूरा करने में कोई कसर बाकी न रहे। विकसित भारत, हमारी अमृत पीढ़ी के सपनों को साकार करेगा। इसलिए, हम सभी को, एक साथ मिलकर, संकल्पों की सिद्धि के लिए जुटना होगा।’’

 राष्ट्रपति ने इसके बाद कहा कि वह ‘‘श्रद्धेय अटलजी की कविता की कुछ पंक्तियां उद्धृत’’ कर रही हैं,

‘‘अपनी ध्येय-यात्रा में,

 हम कभी रुके नहीं हैं।

 किसी चुनौती के सम्मुख

 कभी झुके नहीं हैं।’’

राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘मेरी सरकार, 140 करोड़ देशवासियों के सपनों को पूरा करने की गारंटी के साथ आगे बढ़ रही है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह नया संसद भवन भारत की ध्येय-यात्रा को निरंतर ऊर्जा देता रहेगा, नई और स्वस्थ परंपराएं बनाएगा।’’

इससे पहले उन्होंने उड़िया के प्रसिद्ध कवि एवं स्वतंत्रता सेनानी उत्कलमणि पंडित गोपबंधु दास की काव्य पंक्तियों का उल्लेख किया..

‘मिशु मोर देह ए देश माटिरे, देशबासी चालि जाआन्तु पिठिरे।

देशर स्वराज्य-पथे जेते गाड़,पूरु तहिं पड़ि मोर मांस हाड़।’’

इन पंक्तियों का हिंदी में अर्थ हुआ कि ‘‘ मेरा शरीर इस देश की माटी के साथ मिल जाए, देशवासी मेरी पीठ पर से चलते चले जाएं, देश के स्वराज्य-पथ में जितनी भी खाइयां हैं, वे मेरे हाड़-मांस से पट जाएं।’’

राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘इन पंक्तियों में हमें कर्तव्य की पराकाष्ठा दिखती है, ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ का आदर्श दिखाई देता है।’’

 राष्ट्रपति मुर्मू ने पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की जिस कविता की पंक्तियों का उल्लेख किया वह पूरी कविता इस प्रकार है -:

‘‘कर्तव्य के पुनीत पथ को हमने स्वेद से सींचा है,

कभी-कभी अपने अश्रु और—प्राणों का अर्ध्य भी दिया है।

किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—हम कभी रुके नहीं हैं।

किसी चुनौती के सम्मुख कभी झुके नहीं हैं।

आज,जब कि राष्ट्र-जीवन की

समस्त निधियाँ,दाँव पर लगी हैं,

 और, एक घनीभूत अंधेरा— हमारे जीवन के सारे आलोक को

 निगल लेना चाहता है;

हमें ध्येय के लिए

जीने, जूझने और

आवश्यकता पड़ने पर—

मरने के संकल्प को दोहराना है।

आग्नेय परीक्षा की इस घड़ी में—

आइए, अर्जुन की तरह उद्घोष करें :

‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’

 

 

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