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राज्यों को खनन पर कर लगाने का हक, सर्वोच्च न्यायालय के 9 न्यायाधीशों की पीठ ने अपने फैसले में कहा रॉयल्टी टैक्स नहीं

 नई दिल्ली। जिन राज्यों में खनिज संपदा और खानें हैं, उन्हें खनन एवं खनिज के इस्तेमाल की गतिवि​धियों पर उपकर लगाने का अ​धिकार है। सर्वोच्च न्यायालय के 9 न्यायाधीशों के पीठ ने  गुरुवार को  यह फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्यों के कर लगाने के अधिकार पर संसद के खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के कारण किसी तरह की बंदिश नहीं लगती।

अदालत ने 1 के मुकाबले 8 न्यायाधीशों की रजामंदी वाले अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार को खान संचालकों से मिलने वाली रॉयल्टी असल में कर नहीं है। शीर्ष अदालत के फैसले से खनिज संपदा से समृद्ध राज्यों का राजस्व बढ़ सकता है। ऐसे ज्यादातर राज्य पूर्वी भारत में हैं। मगर अदालत ने यह नहीं बताया कि सेस की गणना किस तारीख से की जाएगी और राज्य तथा केंद्र अलग-अलग यानी दो बार कर तो नहीं लगाएंगे। उद्योग इस पर स्थिति स्पष्ट किए जाने की मांग कर सकता है।
दो दशक से ज्यादा पुराने इस मामले पर फैसला सुनाने वाले पीठ में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति हृषीकेश रॉय, अभय एस ओका, बी वी नागरत्ना, जेबी पारदीवाला, मनोज मिश्रा, उज्ज्वल भुइयां, सतीश चंद्र शर्मा और अगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे। न्यायमूर्ति नागरत्ना की राय बहुमत के खिलाफ रही।
मुख्य न्यायाधीश ने फैसला पढ़ते हुए कहा, ‘रॉयल्टी कर नहीं है। हमने निष्कर्ष निकाला है कि इंडिया सीमेंट के फैसले में यह कहा गया था कि रॉयल्टी कर है, वह गलत है। सरकार को किया गया भुगतान केवल इसीलिए कर नहीं कहला सकता क्योंकि कानून में इसकी वसूली का प्रावधान है।’इस प्रकार अदालत ने इंडिया सीमेंट बनाम तमिलनाडु राज्य के मामले में 1989 का अपना फैसला पलट दिया। मगर न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने बहुमत से अलग जाते हुए कहा कि राज्यों को खदान और खनिजों वाली जमीन पर कर लगाने का विधायी अ​धिकार नहीं है।
 सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने देश में खनिजों पर कराधान के असमंजस को दूर कर दिया है। मगर क्षेत्र के विशेषज्ञों और उद्योग के अ​धिकारियों ने चिंता जताई कि पहले से ही कर के बोझ का सामना कर रहे खनन क्षेत्र को अब नई चुनौतियों से जूझना होगा। विशेषज्ञों ने कहा कि इस फैसले से देसी कंपनियों के लिए खनन आर्थिक रूप से काम का नहीं रहेगा और विदेशी कंपनियां भी महत्त्वपूर्ण खनिज क्षेत्र में निवेश से परहेज करेंगी।
एफआईएमएल के अतिरिक्त महासचिव बीके भाटिया ने कहा, ‘इस फैसले से राज्यों को अतिरिक्त कर लगाने की आजादी होगी, जिससे खनन क्षेत्र के प्रति उद्योगों का आकर्षण कम हो जाएगा। इससे ​खनन क्षेत्र खास तौर पर महत्त्वपूर्ण खनिज क्षेत्र के विकास में अड़चन आएगी, जबकि सरकार इसे खूब प्रोत्साहित कर रही है।’वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट, इंडिया में एनर्जी पॉलिसी के प्रमुख तीर्थंकर मंडल ने कहा कि इससे राज्यों को अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है, जो खनिजों से समृद्ध राज्यों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने के लक्ष्य के लिए उपयोगी होगा।
 फैसला सुनाए जाने के वक्त अदालत में मौजूद वकीलों ने संविधान पीठ से पूछा कि अगर यह निर्णय पिछली ति​थि से प्रभावी है तो भारी मात्रा में कर की वसूली की जाएगी। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पीठ इसे अगले बुधवार को देखेगा और वकीलों से इस बारे में सं​क्षिप्त नोट दा​खिल करने के लिए कहा। कराधान के बारे में सिरिल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर (कराधान के प्रमुख) एस आर पटनायक ने कहा कि यह निर्णय संभवत: दोहरा कराधान रोकने में मदद करता है, जहां एक ही कंपनी पर एक ही संसाधन के लिए राज्य और केंद्र दोनों कर लगा सकते हैं। सीमेंट उद्योग के कुछ अ​धिकारियों ने कहा कि इस फैसले पर अभी कोई प्रतिक्रिया देना जल्दबाजी होगी और कुछ कहने से पहले वह इसका अध्ययन करेंगे। सीमेंट, इस्पात और अन्य धातु विनिर्माता कच्चे माल की जरूरत के लिए खदानों के पट्टे पर निर्भर रहते हैं।

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