पिछले 4-5 वर्षों में शिक्षा क्षेत्र में 40,000 से अधिक लोगों की नियुक्ति की गई : धर्मेंद्र प्रधान
नयी दिल्ली. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बुधवार को राज्यसभा में कहा कि केंद्र सरकार ने पिछले 4-5 वर्षों में शिक्षा क्षेत्र में रिक्त पदों पर 40,000 से अधिक लोगों की नियुक्ति की है। प्रधान ने कहा कि आईआईटी जैसे उच्च शैक्षणिक संस्थानों में उद्योग से अनुभवी लोगों को लाने के लिए प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस (पीओपी) प्रणाली शुरू की गई है। विश्वविद्यालयों द्वारा नियुक्त किए जाने वाले पीओपी ‘‘आवश्यकता-आधारित'' होते हैं, न कि यह कोई स्थायी पद है। प्रधान ने कहा कि पीओपी शिक्षा में विशेषज्ञता और नए विचार लाएंगे।
प्रधान ने कहा, पीओपी नयी शिक्षा नीति के तहत एक प्रमुख सिफारिश है। अब आम सहमति है कि डिग्री के अलावा हमें योग्यता को भी महत्व देना होगा।'' शिक्षा को रोजगारपरक और उद्यमिता की ओर ले जाने का प्रयास किया जा रहा है। इसलिए, उद्योग और शिक्षा के बीच संबंध आवश्यक है। मंत्री माकपा सदस्य जॉन ब्रिटास द्वारा पूछे गए पूरक प्रश्न का उत्तर दे रहे थे, जिन्होंने पूछा था कि क्या सरकार ने पीओपी के लिए 10 प्रतिशत शैक्षणिक पद आरक्षित किए हैं और क्या इससे उच्च संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण कम हो जाएगा। ब्रिटास ने कहा कि लगभग 26 प्रतिशत शैक्षणिक पद और 46 प्रतिशत अन्य पद अभी रिक्त हैं और क्या इस तरह की पीओपी प्रणाली युवाओं के लिए रोजगार के अवसर को प्रभावित करेगी। प्रधान ने कहा, ‘‘हमने पिछले 4-5 वर्षों में रिक्त पदों पर 40,000 से अधिक लोगों को नियुक्त किया है।'' उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय या कॉलेजों के किसी भी मौजूदा पद पर कब्जा नहीं करेगा। राकांपा सांसद फौजिया खान जानना चाहती थीं कि कितनी महिला प्रोफेसरों को पीओपी के रूप में नियुक्त किया जाता है। इस पर प्रधान ने कहा कि यह विशेष संस्थानों की आवश्यकता, व्यक्ति की योग्यता और क्षमता पर निर्भर करता है।







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