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 नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या आठ से घटकर सात

नयी दिल्ली. वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से प्रभावित क्षेत्रों की एक नई समीक्षा के बाद देश में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या आठ से घटकर सात रह गई है। यह बदलाव केंद्र सरकार द्वारा मार्च 2026 तक नक्सलवाद को समाप्त करने की घोषणा के अनुरूप है। ' एक न्यूज़ एजेंसी ' को अधिकारियों ने बताया कि गृह मंत्रालय ने हाल में नौ फरवरी से प्रभावी सभी नक्सल प्रभावित राज्यों का नया वर्गीकरण जारी किया है। केंद्र सरकार ने हाल ही में 'एलडब्ल्यूई से निपटने की राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना' की व्यापक समीक्षा की, जिसमें झारखंड, बिहार, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल सहित नौ राज्यों के 38 जिलों का विश्लेषण किया गया। पिछली समीक्षा दिसंबर 2025 में हुई थी। राष्ट्रीय कार्य योजना सुरक्षा संबंधी व्यय श्रेणी के दो मुख्य मद के तहत इन राज्यों और जिलों को आवंटित संसाधनों को विनियमित करती है। ये मद हैं- 'एलडब्ल्यूई प्रभावित जिले' और 'विरासत और विशेष महत्व (लिगेसी एंड थ्रस्ट) के जिले'। नक्सली हिंसा से प्रभावित जिलों को तीन और उप-वर्गों में बांटा गया है। नए वर्गीकरण के अनुसार, दिसंबर 2025 की समीक्षा में चिह्नित आठ जिलों की तुलना में अब नक्सली हिंसा से प्रभावित जिलों (जहां नक्सली हिंसा और गतिविधियां अभी दर्ज की जा रही हैं) की संख्या घटकर सात रह गई है। ये सात जिले छत्तीसगढ़ में बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा, कांकेर और दंतेवाड़ा; झारखंड में पश्चिम सिंहभूम और ओडिशा में कंधमाल हैं। नक्सली हिंसा से प्रभावित जिलों की तीन उप-श्रेणियां हैं: 'सबसे अधिक प्रभावित जिले', 'चिंताजनक स्थिति वाले जिले' और 'अन्य नक्सली हिंसा से प्रभावित जिले'। सबसे अधिक प्रभावित जिले पिछली समीक्षा के समान ही हैं - छत्तीसगढ़ में बीजापुर, नारायणपुर और सुकमा। दो 'चिंताजनक स्थिति वाले जिले' भी हैं, जहां नक्सलवाद कम हो रहा है पर संसाधनों की केंद्रित तैनाती अब तक आवश्यक है। ये जिले छत्तीसगढ़ में कांकेर और झारखंड में पश्चिम सिंहभूम हैं। दिसंबर 2025 से 'अन्य उग्रवाद प्रभावित जिलों' की श्रेणी में एक जिले की कमी आई है। वर्तमान में इस श्रेणी में दो जिले हैं: छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा और ओडिशा का कंधमाल। 'विरासत और निगरानी की जरूरत वाले जिलों की श्रेणी में अब नौ राज्यों के 31 जिले हैं, जबकि दिसंबर 2025 में यह संख्या 30 थी। गृह मंत्रालय की परिभाषा के अनुसार, 'विरासत' जिले' वे हैं जो अब वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित नहीं हैं, लेकिन उन्हें कुछ समय के लिए सुरक्षा और विकास कार्यों के संदर्भ में सहायता की आवश्यकता है। विशेष महत्व के जिले वे हैं जो नक्सली विस्तार के संभावित स्थल हैं और इसलिए उन्हें निरंतर समर्थन की आवश्यकता है। शाह ने नक्सली हिंसा को लोकतंत्र के लिए एक चुनौती बताते हुए कहा था कि इसमें अब तक लगभग 17,000 नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की जान  जा चुकी है.

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